दान करने की विधि और मंत्र :
दान विषयक महत्वपूर्ण तथ्य : एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय यह है कि जब चर्चा दान-धर्म आदि की हो तो उसे विवादास्पद करके जनमानस को भ्रमित करने का भी कुप्रयास किया जाता है और इससे यह भी प्रतीत होता है कि ये नास्तिकों/अधर्मियों/वामपंथियों का षड्यंत्र है। क्योंकि जिसकी आस्था धर्म में होती है वह शास्त्र-सम्मत चर्चा करता है कुतर्क नहीं रचता। अब दान का विषय ही लीजिये इसमें कुतर्क इस प्रकार रचा जाता है :
दान का मूल उद्देश्य तो गरीबों की सहायता ही होता है न, इसलिये दान गरीबों को किया जाना चाहिये। और ऐसे कुतर्कों के कारण ही यह स्पष्ट हो जाता है कि ये किसी ब्राह्मणद्रोही का कुतर्क है जिसका धर्म और शास्त्रों से कोई संबंध तो नहीं है किन्तु धर्म के नाम पर जनमानस को दिग्भ्रमित करने का प्रयास कर रहा है।
जब दान की चर्चा हो और मुख्य रूप से विशेष अवसरों पर हो तब उसका मुख्य तात्पर्य होता है विधिपूर्वक विद्वान ब्राह्मण को दान देना न कि गरीब को देना। यदि दैन्यता का भाव भी लिया जाय जो कुतर्क करके वो षड्यंत्रकारी बताया करते हैं तो उसमें भी ब्राह्मण ही सिद्ध होता है क्योंकि अन्य सबके लिये अनेकानेक वृत्तियां निर्धारित हैं किन्तु ब्राह्मण के लिये कोई वृत्ति नहीं है। जब ब्राह्मण के लिये वृत्ति ही नहीं है तो सोचो सबसे दीन कौन होगा ? किन्तु यहां दीनता भाव को ग्रहण करना ही नहीं है।

दान को जैसे ही गरीबों से जोड़ा जाता है वहीं आभास हो जाता है कि ये षड्यंत्रकारी सोच है। क्योंकि शास्त्रों में दीन सेवा और उपकार ये पृथक विषय हैं यद्यपि उनको देना भी दान शब्द से ही सम्बोधित किया जायेगा किन्तु उपकार भी कहा जा सकता है, दीनसेवा भी कह सकते हैं, सहायता भी कह सकते हैं आदि-इत्यादि। वहां विधि और मंत्रों की आवश्यकता नहीं होती और न ही विशेष अवसरों की वहां मात्र आवश्यकता देखकर देने की बात होती है, सहायता या उपकार करने की बात होती है।
दीन-दुखियों की सेवा करना, उनके ऊपर दया करना, उनकी सहायता करना ये भी धर्म ही है। किन्तु गरीब शब्द कहकर ब्राह्मण शब्द का लोप कर देना ये तो स्वयं में अधर्म है और षड्यंत्र को सिद्ध करता है, वामपंथी/अधर्मी/नास्तिक मानसिकता को स्थापित करता है। ये षड्यंत्र शहरों में बहुत बड़े स्तर पर चलाया जा रहा है। ध्यान रखें ये अधर्मी दान के अधिकारी नहीं कहे गए हैं, ऐसे अधर्मियों को या इन अधर्मियों के अनुसार दान आदि करना भी अधर्म और पतन का ही कारण बनता है ऐसा शास्त्रों में वर्णित है।
अस्तु निष्कर्ष यह है कि मकर संक्रांति पर जो दान करने का विधान है वह ब्राह्मण को दान करने का विषय है। किन्तु इससे दिनों में कम्बल आदि वितरण का निषेध नहीं होता और वो भी धर्म ही है अतः किया जा सकता है किन्तु इस विवेक के साथ कि जिसे गरीब समझकर दे रहे हैं वो अधर्मी/नास्तिक आदि तो नहीं है न।
१. खिचड़ी दान : त्रिकुशहस्त चंदन मिश्रित पुष्पाक्षत लेकर तीन बार खिचड़ी, चूड़ा, सब्जी, तिलकुट, शक्कर आदि पर छिड़के :
ओं तिलचिपटान्नलड्डूकसहितसोपकरणकृशरान्तेभ्यो नमः ॥३॥
तीन बार ब्राह्मण या उत्तराग्र त्रिकुशा की पूजा करे : ओं ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
तत्पश्चात दान वस्तु को जल से सिक्त करके तिल, जल लेकर उत्सर्ग करे – ओं सर्वात्मा सर्वलोकेशः सर्वव्यापी सनातनः । नारायणः प्रसन्नः स्यात् कृशरान्नप्रदानतः ॥ ओं अद्य …… मासे, …….. पक्षे, …… तिथौ, ……. वासरे मकरार्कसंक्रमणप्रयुक्तपुण्यकाले ……… गोत्रस्य मम श्री ……… शर्मणः विष्णुप्रीतिकामः एतानि तिलचिपटान्नलड्डूकसहितानि सोपकरणकृशरान्नानि विष्णु दैवतानि यथानामगोत्राय ब्राह्मणायाऽहं ददे ॥
प्रणाम करते हुये अगला मंत्र पढ़े –
ओं कृशरं सर्वंशीतघ्नं शनिप्रीतिकरं सदा । तस्मादस्य प्रदानेन मम सन्तु मनोरथाः ॥
ओं सतिलं गुडसंयुक्तं रसप्रीतिकरं नृणाम् । वर्धितं संगृहाणेदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥
इसके बाद तिल-जल-दक्षिणा लेकर इस मंत्र से दक्षिणा दे – ओमद्य कृतैतत्तिल चिपटान्नलड्डूकसहित सोपकरणकृशरान्नदान प्रतिष्ठार्थमेतावद्रव्यमूल्यकं हिरण्यमग्निदैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे ॥ ओं स्वस्तोति प्रतिवचनम् ॥
२. तिल से भरा घड़ा दान : त्रिकुश हस्त चंदन मिश्रित उजला फूल अक्षत लेकर तिल भरे हुये घड़े पर इस मंत्र से तीन बार छिड़के – ओं तिलपूर्णकुम्भाय नमः ॥३॥
ब्राह्मण या उत्तराग्र त्रिकुशा की इस मंत्र से तीन बार पूजा करे – ओं ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
तिल जल लेकर इस मंत्र से उत्सर्ग करे – ओं अद्य …… मासे, …….. पक्षे, …… तिथौ, ……. वासरे मकरार्कसंक्रमणप्रयुक्तपुण्यकाले ……… गोत्रस्य मम श्री ……… शर्मणः रसवारि निमित्त सकल दुरितोपसर्वापच्छान्ति पूर्वक यावत्तिल संख्यक वर्षसहस्रावच्छिन्न विष्णुलोक प्राप्ति कामनया इदं तिलपूर्ण कुम्भं विष्णु दैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणायाऽहं ददे।
उत्सर्ग करके प्रणाम करे – ओं नमो वरुणरूपाय रसाम्बुपतये नमः । रसवारिनिमित्तानि यान्तु नाशमघानि मे ॥
फिर तिल, जल, दक्षिणा लेकर यह मंत्र पढ़े – ओमद्य कृतैतत तिलकुम्भदान प्रतिष्ठार्थमेतावद्रव्य मूल्य हिरण्यमग्निदैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे ॥
३. कम्बल दान : चंदन मिश्रित पुष्पाक्षत लेकर अगले मंत्र को पढ़ते हुये तीन बार कम्बल पर छिड़के – ओं शीतवर्षाहरकम्बल वस्त्राय नमः ॥३॥
तीन बार अगले मंत्र से ब्राह्मण या उत्तराग्र त्रिकुशा की पूजा करे – ओं ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
ब्राह्मण पूजा करने के बाद तिल-जल लेकर अगले मंत्र से उत्सर्ग करे – ओं अद्य …… मासे, …….. पक्षे, …… तिथौ, ……. वासरे मकरार्कसंक्रमणप्रयुक्तपुण्यकाले ……… गोत्रस्य मम श्री ……… शर्मणः कम्बलवस्त्रतन्तु समसंख्यकवर्ष सहस्रावच्छिन्न विष्णुलोकवास कामनया अमुं कम्बलवस्त्रं विष्णु दैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणायाऽहं ददे ॥
तत्पश्चात प्रणाम करके अगला मंत्र पढ़े –
ओं शीतवर्षाहरः पुण्यो दृष्टो बलविवर्धनः । कम्बलस्य प्रदानेन शान्तिरस्तु सदा मम ॥
ओं ऊर्णावस्त्रं चारु चित्रं देवानां प्रीतिवर्धनम् । सुखस्पर्शकरं यस्मादतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥
फिर तिल, जल, दक्षिणा लेकर यह मंत्र पढ़े – ओमद्य कृतैतत कम्बलवस्त्रदान प्रतिष्ठार्थमेतावद्रव्य मूल्य हिरण्यमग्निदैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे ॥
यदि रजाई दान करे तो ‘ओं तूलपट्टिकायै नमः’ कहें ।
४. वस्त्र दान : चंदन मिश्रित पुष्पाक्षत लेकर अगले मंत्र को पढ़ते हुये तीन बार वस्त्रों पर छिड़के – ओं वस्त्राय नमः ॥३॥
अगले मंत्र से तीन बार ब्राह्मण या उत्तराग्र त्रिकुशा की पूजा करे – ओं ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
ब्राह्मण पूजा करने के बाद तिल-जल लेकर अगले मंत्र से उत्सर्ग करे – ओं अद्य …… मासे, …….. पक्षे, …… तिथौ, ……. वासरे मकरार्कसंक्रमणप्रयुक्तपुण्यकाले ……… गोत्रस्य मम श्री ……… शर्मणः कार्पास वस्त्रतन्तु समसंख्यकवर्ष सहस्रावच्छिन्न विष्णुलोकवास कामनया अमुं कार्पासिकं वस्त्रं विष्णुदैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणायाऽहं ददे ।
तत्पश्चात प्रणाम करके अगला मंत्र पढ़े –
ओं शरण्यं सर्वलोकानां लज्जाया रक्षणं परम् । देहालङ्करणं वस्त्रमतः शान्ति प्रयच्छ मे ॥
फिर तिल, जल, दक्षिणा लेकर यह मंत्र पढ़े – ओमद्य कृतैतत वस्त्रदान प्रतिष्ठार्थमेतावद्रव्य मूल्य हिरण्यमग्निदैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे ॥
यदि ‘रेशमी वस्त्र’ दान करे तो ‘ओं कौशेयवस्त्राय नमः’ उच्चारण करे ।
One thought on “मकर संक्रांति का महत्व और दान विधि – Makar Sankranti Significance”