“अशुद्धदेहेन संपादिते अर्चने प्रायश्चित्तम्”
यद्यपि कलयुग में प्रायश्चित्त विधान का समापन लगभग हो चुका है और प्रतीकात्मक रूप से गाय-बछड़े (बंधन मृत्यु में) की मृत्यु होने पर कुछ अवशेष मिलता है। वैसे इसकी घोषणा भी शास्त्रों में की जा चुकी है “कलियुगे नास्ति प्रायश्चित्तं” अर्थात कलयुग में प्रायश्चित्त का लोप हो जायेगा तथापि इसके ज्ञान का भी लोप कर दें यह अनुचित होगा। यहां प्रायश्चित्त विधान के प्रमाणों का संकलन किया गया है और जिज्ञासुओं के लिये ज्ञानवर्द्धक है।
“अद्भिः शुध्यन्ति गात्राणि बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति । अहिंसया च भूतात्मा मनः सत्येन शुध्यति”
प्रायश्चित्त विधान और आत्मकल्याण का मार्ग – प्रमाण संकलन
“सर्वेषामेव शौचानामन्नशौचं परं स्मृतम् । योऽन्ने शुचिर्हि स शुचिर्नमृद्वारिशुचिः शुचिः”
वर्त्तमान युग की वास्तविकता का वर्णन “कर्माधिकार” प्रकरण में स्पष्ट किया जा चुका है और वहीं पर यह भी स्पष्ट किया जा चुका है कि ऐसी अवस्था में कर्माधिकार की प्राप्ति कैसे होती है। प्रायश्चित्त के अभाव में प्रत्याम्नाय गोदान अथवा गोनिष्क्रिय दान का विकल्प प्राप्त होता है किन्तु इसकी आज्ञा देने के लिये इतना तो अनिवार्य है कि कर्मकांडी को प्रायश्चित्त विधान का ज्ञान हो। कर्मकांडियों को भी पाप का ज्ञान नहीं है इसी कारण स्वयं भी कर्मकांड में अहर्निश विधिलोप ही नहीं विधिविरुद्ध भी करते रहते हैं।
यह प्रमाण संग्रह उन ब्राह्मणों के लिये अधिक उपयोगी सिद्ध होगा जो धर्म और शास्त्र में निष्ठा रखते हैं। जिनकी निष्ठा ही नहीं है उनकी तो बात ही क्या करें ?
आत्मकल्याण का मार्ग
यह स्पष्ट है कि वर्त्तमान में सभी पापाचारलिप्त तो हैं किन्तु प्रायश्चित्त कोई नहीं करते और यह चिंत्ताजनक है क्योंकि इसके कारण पातित्यता को ही प्राप्त करते हैं। चिंताजनक यह भी है कि कोई भी व्यक्ति भगवा धारण करके धर्मगुरु/कथावाचक/संत इत्यादि बन जाता है अथवा राजनीति द्वारा स्थापित कर दिया जाता है जो कि शास्त्र से पूर्णतः अनभिज्ञ होता है, हां मीठी-मीठी, चिकनी-चुपड़ी बातें करने में पारंगत होता है और जनमानस को जिसमें से यदि कुछ ज्ञान चाहते भी हैं तो दिग्भ्रमित करता रहता है। ये सब “एक घड़ी आधो घड़ी आधो में पुनि आध, तुलसी संगति साधु के हरहिं कोटि अपराध” का अनर्थ करते हुये जनमानस को धर्मविमुख ही करते जा रहे हैं।
हरहिं कोटि अपराध का तात्पर्य यह कैसे हो सकता है कि अपराध की छूट प्रदान कर दी जाये और उससे भी बड़ी बात कि संत/साधु इतनी सरलता से मिलते कहां हैं कि तर जायें “बिनु हरि कृपा मिलहिं नहीं संता”, “बड़े भाग पाइव सत्संगा” आदि से समझा जा सकता है। हां यदि भगवा धारण करने वाला ही संत/साधु होता हो तो बात भिन्न है। दिन-रात पापाचार में लिप्त व्यक्ति के ऊपर हरिकृपा कैसे संभव है, बड़ा भाग कैसे संभव है ? क्योंकि “निर्मल मन जन सो मोहि पावा।” जब मन में छल-प्रपञ्च, काम, क्रोध, लोभ, मोह, राग, द्वेष, ईर्ष्या आदि ही भरे हैं तो वह निर्मल कैसे हो जाता है।

प्रगति के लिये यह आवश्यक है कि लक्ष्य निर्धारित करके उस दिशा में प्रयत्न करें, लक्ष्य सांसारिक यश, लाभ आदि है तो प्रयत्न आत्मकल्याण के लिये कैसे सिद्ध होगा और प्रयत्न सांसारिक है तो प्रगति आत्मकल्याण की दिशा में कैसे होगी ? अर्थात यह आवश्यक है कि सर्वप्रथम आत्मकल्याण का लक्ष्य निर्धारित किया जाय और तब उसके मार्ग ज्ञात किये जायें।
आत्मकल्याण का मार्ग इस प्रकार है :
- सर्वप्रथम आत्मकल्याण का लक्ष्य निर्धारित करें।
- तदुपरांत अपने कर्मों की समीक्षा करें।
- पापाचरण की स्मृति होने से पश्चाताप भी होगा।
- अपने पापों के निवारण का उपाय ढूंढें जो कि प्रायश्चित्त कहलाता है।
- निःसंदेह वर्त्तमान काल में पापों का प्रायश्चित्त सामान्य लोगों के लिये असंभव सा है और यही विचार मन में आएगा कि मैं तो आजन्म प्रायश्चित्त कर ही नहीं पाउँगा। तत्पश्चात मन व्यथित होगा, आत्मग्लानि होगी, अहंकार की निवृत्ति होगी कि किस बात का अहंकार कर रहे हैं जब नरकगामी ही बने हुये हैं।
- फिर वह भाव जगेगा जो हरिकृपा का कारण होगा। दीनता, हीनता, आत्मग्लानि आदि के भाव ही आत्मकल्याण के मार्ग का द्वार है।
- यहां आकर निरंतर प्रयास की आवश्यकता होगी जबतक हरिकृपा प्राप्त न हो जाये।
- आप संत/साधु को ढूंढ ही नहीं सकते, हरिकृपा से स्वतः मिलेंगे और आपको एक ही याचना करनी है कि संत को पहचानने की दृष्टि प्राप्त हो जाये। ऐसा न हो कि संत तो आ जायें किन्तु पहचानें ही नहीं।
- यही वर्त्तमान काल में आत्मकल्याण का सरल मार्ग है किन्तु इसके लिये भी प्रयास करना अनिवार्य है।
यह आलेख आपको प्रायश्चित्त विषयक वह ज्ञान प्रदान करने वाला है जिससे दीनता-हीनता आदि के भाव उत्पन्न होंगे, आत्मग्लानि होगी, अहंकार मिटेगा। इस आलेख को बारम्बार पढ़ने-समझने का प्रयास करें, एक-एक श्लोकों के अर्थ विद्वानों से ज्ञात करें और चिंतन-मनन करें। यहां मैं यह भी स्पष्ट कर दूँ कि यद्यपि यहां ढेरों प्रमाण प्रस्तुत किये गए हैं किन्तु सम्पूर्ण नहीं हैं और न ही हो सकते हैं।
अनेकों श्लोकों के अर्थ सामान्य ही होंगे किन्तु भिन्न-भिन्न ग्रंथों से प्रस्तुत किये गए हैं ताकि यह भ्रम भी उत्पन्न न हो कि अंग्रेजों द्वारा प्रक्षिप्त किये गए हैं, क्योंकि इतने ग्रंथों में छेड़छाड़ करना संभव ही नहीं है जो कि मूढ़ों द्वारा प्रचारित किया जा रहा है। प्रायश्चित्त विषयक बहुत से प्रमाण अन्यान्य आलेखों में प्रस्तुत किये गये हैं जैसे भक्ष्याभक्ष्य, नारी नियम आदि।
अंगिरा स्मृति
आश्रमेषु च सर्वेषु वर्णानामनुसर्वशः । प्रायश्चित्तविधिं कृत्स्नं वक्ष्यमाणं निबोधत ॥
अन्त्यानामविशेषेण जग्ध्वाऽन्नं हि द्विजन्मनाम् । चान्द्रं कृच्छ्रे तदर्धे च ब्रह्मक्षत्रविशां स्मृतम् ॥
चाण्डालकूपभाण्डेषु यस्त्वपः पिवते द्विजः। प्रायश्चित्तं कथं तेषां वर्णे वर्णे विनिर्दिशेत् ॥
चरेत्सांतपनं विप्रः प्राजापत्यं तु भूमिपः । तदर्धे तु चरेद्वैश्यः पादं शूद्रः समाचरेत् ॥
चाण्डालोदकभाण्डेषु यः पिवेत्तृषितो जलम् । तत्क्षणं तत्समुत्तार्य प्राजापत्यं समाचरेत् ॥
यदि चानुद्धृतं तोयं शरीरे तस्य जीर्यति । तदा विप्रः स्वशुद्धयर्थं कृच्छ्रे सांतपनं चरेत् ॥
चाण्डालभाण्डसंस्पृष्टं पिबेच्चत्तृषितो जलम् । गोमूत्रयावकाहारस्त्रिरात्रेण विशुद्ध्यति ॥
यस्तु चाण्डालसंस्पृष्टं पिबेत्तोयमकामतः । स तु सांतपनं कृच्छ्रे चरेच्छुद्ध्यर्थमात्मनः ॥
कृतेमूत्रपुरीषे तु भुक्तोच्छिष्टोऽथ वा द्विजः। श्वादिस्पृष्ट्वा जपेत्स्नात्वा गायत्र्या अयुतद्वयम् ॥
कूपे विण्मूत्रसंयुक्ते पीत्वा तोयं द्विजोत्तमः । कृच्छ्रे सांतपनं कृत्वा त्रिरात्रेण विशुध्यति ॥
वलाकाभासगृध्राखू खरश्चबकसूकराः । दृष्ट्वा चैपाममेध्यानि स्पृष्ट्वाऽऽचम्य विशुद्ध्यति ॥
इच्छयैषाममेध्यानि भक्षयित्वा द्विजोत्तमाः । कुर्युः सांतपनं कृच्छ्रं प्राजापत्यमनिच्छया ॥
एतदेव व्रतं कुर्युरेषां मांसस्य भक्षणे । श्वकाकयोश्च मांसानि भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
स्पर्शनं चैव कुरुते ब्राह्मणो ब्राह्मणैः सह । आहतुः शङ्खलिखितौ विण्मूत्रोच्चारभोजने ॥
तूलिका चोपधानं च पुष्परक्ताम्बराणि च । पतिताद्यैरुपस्पृष्टं शोषणैः प्रोक्षणैः शुचि ॥
रजकं चर्मकारं च नटं धीवरमेव च । बुरुडं च तथा स्पृष्ट्वा शुध्येदाचमनाद्विजः ॥
संस्पृष्ट एभिरुच्छिष्टैरेकरात्रं पयः पिबेत् । संस्पृश्य चैतानुच्छिष्ट उपोष्य त्रिदिनं क्षिपेत् ॥
भुक्त्वा चैषां समुच्छिष्टं विप्रः सांतपनं चरेत् । पादोनमर्धपादं च क्षत्रविट्शूद्रयोनयः ॥
यश्च भार्यां श्वपाकस्य ब्राह्मणो ह्यधिगच्छति । सचैलो जलमाप्लुत्य घृतं प्राश्य विशुद्ध्यति ॥
स चोदक्यादिभिः स्पृष्टो यदा स्यादातुरोनरः। अनातुरः सप्तवारं स्पृष्ट्वा स्नानं समाचरेत् ॥
आतुरा चैव या नारी रजसा मलिनी भवेत् । चतुर्थेऽहनि संप्राप्ते स्पृष्ट्वा तामप्यनातुरः ॥
दशैकादश वारान्वा स्नानं कुर्याद्विचक्षणः । एवं तस्या विशुद्धिः स्यात्परिवर्तितवाससः ॥
प्रारब्धदीर्घतपसां नारीणां यद्रजो भवेत् । न तेन तद्व्रतं तासामुपहन्येत कर्हिचित् ॥
स्वभाव एष नारीणां ज्ञेयो मूत्रपुरीषवत्। अत ऊर्ध्वं न दुष्यन्ति चरेयुश्चैव तद्व्रतम् ॥
चाण्डालपतितोदक्यां स्पृष्ट्वोच्छिष्टो द्विजोत्तमः । प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रं सुमन्तुवचनं यथा ॥
चण्डालपतितादीनामुच्छिष्टान्नादि भोजने । द्विजः शुध्येत्पराकेन शूद्रः कृच्छ्रेण शुध्यति ॥
पतितानां स्त्रियो गत्वा भुक्त्वा च प्रतिगृह्य च । मासोपवासं कुर्वीत चान्द्रायणमथापि वा ॥
श्वगर्दभखरादीनां नरमांसादिदूषणे । उद्धरेत्सकलं वारि कूपवापी विशोधनम् ॥
यस्तु कूपे पिवेत्तोयं ब्राह्मणः शवदूषिते । अहोरात्रोषितो भूत्वा पञ्चगव्येन शुध्यति ॥
क्लिन्नभिन्नशवव्याप्तं वारि विप्रो यदापिबेत् । शुद्धिश्चान्द्रायणं तस्य तप्तकृच्छ्रमथापि वा ॥
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि नीली शौचस्य यो विधिः। स्त्रीणां क्रीडार्थसंभोगे शयनीये न दुष्यति ॥
संध्या स्नानं जपो होमः स्वाध्यायः पितृतर्पणम् । वृथा तस्य महायज्ञा नीलीरक्तस्य धारणात् ॥
पालनादिक्रयाच्चैव नीलीवृत्त्युपजीवनात् । पतितस्तु भवेद्विप्रस्त्रिभिः कृच्छ्रैर्विशुध्यति ॥
नीलीरक्तं यदा वस्त्रं विप्रो देहेषु धारयेत् । अहोरात्रोषितो भूत्वा पञ्चगव्येन शुध्यति॥
नीलीमध्ये यदा गच्छेत्प्रमादाद्ब्राह्मणः कचित् । अहोरात्रोषितः स्नात्वा पञ्चगव्येन शुध्यति ॥
नील्या चोपहते क्षेत्रे सस्यं यच्च प्ररोहति । अभोज्यं तद्विजातीनां भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
वापयेद्यत्र नीलीं तु तावत्स्यादशुचिर्मही । प्रमाणं द्वादश समामत ऊर्ध्वं शुचिर्भवेत् ॥
अंगिरा स्मृति २ – ३८
यद्विष्ठया काकबलाकयोर्वा अमेध्यलिप्तं च भवेच्छरीरम् ।
श्रोत्रे मुखे न प्रविशेच्च सम्यक्स्नानेन लेपोपहतस्य शुद्धिः ॥
अभक्ष्याणामपेयानामलेह्यानां च भक्षणे । रेतोमूत्रपुरीषाणां प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ॥
पद्मोदुम्बरबिल्वानां कुशाश्वत्थपलाशयोः । एतेषामुदकं पीत्वा षड्रात्रेण विशुध्यति ॥
ये प्रत्यवसिता विप्राः प्रव्रज्याग्निजलोद्वहाः । अनाशकनिवृत्तिश्च गृहस्थत्वं चिकीर्षति ॥
स चरेत्रीणि कृच्छ्राणि त्रीणि चान्द्रायणानि च जातकर्मविधिं कृत्वा पुनः संस्कारमर्हति ॥
अंगिरा स्मृति १३७ – १४१
कृत्वा पापं हि शोचन्वै ब्राह्मणो वेदपारगः । स्मृत्यर्थं विन्दति योऽपि तस्मात्पापात्ममुच्यते ॥
नैव कुर्यां पुनरिति निवृत्त्यात्मा भवेद्यदि । वह्निर्वेदागमाभ्यासः सर्वं पापं विशुध्यति ॥
यथा जातबलो वह्निर्दहत्यार्द्रानपि द्रुमान् । एवं दहति वेदज्ञः कर्मजं दोषमात्मनः ॥
न वेदबलमाश्रित्य पापकर्मरतिर्भवेत् । अज्ञानाद्वा प्रमादाद्वा दहते कर्म नेतरत् ॥
अंगिरा स्मृति ९९ – १०२
गवां च पतने कृच्छ्रं पाषाणे च द्वयं चरेत् । अर्धकृच्छ्रं तु वाप्यां स्यात्पादकृच्छ्रं तु कूपके ॥
शस्त्रहा त्रीणि कृच्छ्राणि यष्टिघाती द्वयं चरेत् । मृत्पिण्डादतिकृच्छ्रं तु प्राजापत्यं च गोमये ॥
एकपादं चरेद्रोधे द्वौ पादौ बन्धने चरेत् । योजने पादहीनं स्याच्चरेत्सर्वं निपातने ॥
न स्त्रीषु वंचनं कुर्यानैव गानमुपत्रजेत् । नं च रात्रौ भवेद्गोष्ठे न कुर्याद्वैदिकीं क्रियाम् ॥
लाङ्गूलच्छेदने पादौ तथा चैवानुधारणे । पादहीने शिखावर्जं सशिखं च निपातने ॥
एवमेव तु नारीणां मुण्डमुण्डापनं स्मृतम् । एकीकृत्य कचान्सर्वांश्छेदयेदङ्गुलद्वयम् ॥
अनुच्छिष्टेन संस्पृष्टो येन चाऽऽचमनं व्रजेत् । तेनैवोच्छिष्टसंस्पृष्टे त्रिरात्रेण विशुध्यति ॥
अंगिरा स्मृति १५८ – १६४
पराशर स्मृति
बान्धवानां सजातीनां दुर्वृत्तं कुरुते तु या । गर्भपातं च या कुर्यान्न तां संभाषयेत्क्वचित् ॥
यत्पापं ब्रह्महत्यायां द्विगुणं गर्भपातने । प्रायश्चित्तं न तस्याः स्यात्तस्यास्त्यागो विधीयते ॥
न कार्यं आवसथ्येन नाग्निहोत्रेण वा पुनः । स भवेत्कर्मचाण्डालो यस्तु धर्मपराङ्मुखः ॥
पराशर स्मृति ४/१९ – २१
ब्रह्मकूर्चोपवासेन द्विजातीनां तु निष्कृतिः । शूद्रस्य चोपवासेन तथा दानेन शक्तितः ॥ ६/३१
वेदवेदाङ्गविदुषां धर्मशास्त्रं विजानताम् । स्वकर्मरतविप्राणां स्वकं पापं निवेदयेत् ॥
सावित्र्याश्चापि गायत्र्याः संध्योपास्त्यग्निकार्ययोः । अज्ञानात्कृषिकर्तारो ब्राह्मणा नामधारकाः ॥
अव्रतानां अमन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् ।सहस्रशः समेतानां परिषत्त्वं न विद्यते ॥
यद्वदन्ति तमोमूढा मूर्खा धर्मं अतद्विदः । तत्पापं शतधा भूत्वा तद्वक्तॄनधिगच्छति ॥
अज्ञात्वा धर्मशास्त्राणि प्रायश्चित्तं ददाति यः । प्रायश्चित्ती भवेत्पूतः किल्बिषं पर्षदि व्रजेत् ॥
चत्वारो वा त्रयो वापि यं ब्रूयुर्वेदपारगाः । स धर्मेति विज्ञेयो नेतरैस्तु सहस्रशः ॥
प्रमाणमार्गं मार्गन्तो ये धर्मं प्रवदन्ति वै । तेषां उद्विजते पापं सद्भूतगुणवादिनाम् ॥
यथाश्मनि स्थितं तोयं मारुतार्केण शुध्यति । एवं परिषदादेशान्नाशयेत्तस्य दुष्कृतं ॥
नैव गच्छति कर्तारं नैव गच्छति पर्षदम् । मारुतार्कादिसम्योगात्पापं नश्यति तोयवत् ॥
चत्वारो वा त्रयो वापि वेदवन्तोऽग्निहोत्रिणः । ब्राह्मणानां समर्था ये परिषत्साभिधीयते ॥
अनाहिताग्नयो येऽन्ये वेदवेदाङ्गपारगाः । पञ्च त्रयो वा धर्मज्ञाः परिषत्सा प्रकीर्तिता ॥
मुनीनां आत्मविद्यानां द्विजानां यज्ञयाजिनाम् । वेदव्रतेषु स्नातानां एकोऽपि परिषद्भवेत् ॥
पञ्च पूर्वं मया प्रोक्तास्तेषां चासंभवे त्रयः । स्ववृत्तिपरितुष्टो ये परिषत्सा प्रकीर्तिता ॥
अत ऊर्ध्वं तु ये विप्राः केवलं नामधारकाः । परिषत्त्वं न तेष्वस्ति सहस्रगुणितेष्वपि ॥
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः । ब्राह्मणस्त्वनधीयानस्त्रयस्ते नामधारकाः ॥
ग्रामस्थानं यथा शून्यं यथा कूपस्तु निर्जलः । यथा हुतं अनग्नौ च अमन्त्रो ब्राह्मणस्तथा ॥
यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु यथा गौरूषराफला । यथा चाज्ञेऽफलं दानं तथा विप्रोऽनृचोऽफलः ॥
चित्रकर्म यथानेकैरङ्गैरुन्मील्यते शनैः । ब्राह्मण्यं अपि तद्वद्धि संस्कारैर्मन्त्रपुर्वकैः ॥
प्रायश्चित्तं प्रयच्छन्ति ये द्विजा नामधारकाः । ते द्विजा पापकर्माणः समेता नरकं ययुः ॥
ये पठन्ति द्विजा वेदं पञ्चयज्ञरताश्च ये । त्रैलोक्यं तारयन्त्येते पञ्चेन्द्रियरता अपि ॥
संप्रणीतः श्मशानेषु दीप्तोऽग्निः सर्वभक्षकः । एवं च वेदविद्विप्रः सर्वभक्षोऽपि दैवतं ॥
अमेध्यानि तु सर्वाणि प्रक्षिप्यन्ते यथोदके । तथैव किल्बिषं सर्वं प्रक्षिपेच्च द्विजानले ॥
गायत्रीरहितो विप्रः शूद्रादप्यशुचिर्भवेत् । गायत्रीब्रह्मतत्त्वज्ञाः संपूज्यन्ते जनैर्द्विजाः ॥
दुःशीलोऽपि द्विजः पूज्यो न तु शूद्रो जितेन्द्रियः । कः परित्यज्य गां दुष्टां दुहेच्छीलवतीं खरीं ॥
धर्मशास्त्ररथारूढा वेदखड्गधरा द्विजाः । क्रीडार्थं अपि यद्ब्रूयुः स धर्मः परमः स्मृतः ॥
चातुर्वेद्यो विकल्पी च अङ्गविद्धर्मपाठकः । त्रयश्च आश्रमो मुख्याः पर्षदेषा दशावरा ॥
राज्ञश्चानुमते स्थित्वा प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् । स्वयं एव न कर्तव्यं कर्तव्या स्वल्पनिष्कृतिः ॥
ब्राह्मणांस्तानतिक्रम्य राजा कर्तुं यदिच्छति । तत्पापं शतधा भूत्वा राजानं अनुगच्छति ॥
प्रायश्चित्तं सदा दद्याद्देवतायतनाग्रतः । आत्मकृच्छ्रं ततः कृत्वा जपेद्वै वेदमातरम् ॥
सशिखं वपनं कृत्वा त्रिसंध्यं अवगाहनम् । गवां मध्ये वसेद्रात्रौ दिवा गाश्चाप्यनुव्रजेत् ॥
उष्णे वर्षति शीते वा मारुते वाति वा भृशम् । न कुर्वीतात्मनस्त्राणं गोरकृत्वा तु शक्तितः ॥
आत्मनो यदि वान्येषां गृहे क्षेत्रे खलेऽथ वा । भक्षयन्तीं न कथयेत्पिबन्तं चैव वत्सकम् ॥
पिबन्तीषु पिबेत्तोयं संविशन्तीषु संविशेत् । पतितां पङ्कमग्नां वा सर्वप्राणैः समुद्धरेत् ॥
ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा यस्तु प्राणान्परित्यजेत् । मुच्यते ब्रह्महत्याया गोप्ता गोर्ब्राह्मणस्य च ॥
गोवधस्यानुरूपेण प्राजापत्यं विनिर्दिशेत् । प्राजापत्यं ततः कृच्छ्रं विभजेत्तच्चतुर्विधं ॥
एकाहं एकभक्ताशी एकाहं नक्तभोजनः । अयाचिताश्येकं अहरेकाहं मारुताशनः ॥
दिनद्वयं चैकभक्तो द्विदिनं चैकभोजनः । दिनद्वयं अयाची स्याद्द्विदिनं मारुताशनः ॥
त्रिदिनं चैकभक्ताशी त्रिदिनं नक्तभोजनः । दिनत्रयं अयाची स्यात्त्रिदिनं मारुताशनः ॥
चतुरहं चैकभक्ताशी चतुरहं नक्तभोजनः । चतुर्दिनं अयाची स्याच्चतुरहं मारुताशनः ॥
प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् । विप्राणां दक्षिणां दद्यात्पवित्राणि जपेद्द्विजः ॥
ब्राह्मणान्भोजयित्वा तु गोघ्नः शुद्धो न संशयः ॥
पराशर स्मृति ८/२ – ४२
अमेध्यरेतो गोमांसं चण्डालान्नमथापि वा । यदि भुक्तं तु विप्रेण कृच्छ्रं चान्द्रायणं चरेत् ॥
तथैव क्षत्रियो वैश्योऽप्यर्धं चान्द्रायणं चरेत् । शूद्रोऽप्येवं यदा भुङ्क्ते प्राजापत्यं समाचरेत् ॥
पञ्चगव्यं पिबेच्छूद्रो ब्रह्मकूर्चं पिबेद्द्विजः । एकद्वित्रिचतुर्गा वा दद्याद्विप्राद्यनुक्रमात् ॥
पराशर स्मृति ११/१ – ३
एकपङ्क्त्युपविष्टानां विप्राणां सह भोजने । यद्येकोऽपि त्यजेत्पात्रं शेषं अन्नं न भोजयेत् ॥
मोहाद्भुञ्जीत यस्तत्र पङ्क्तावुच्छिष्टभोजने । प्रायश्चित्तं चरेद्विप्रः कृच्छ्रं सांतपनं तथा ॥
पीयूषं श्वेतलशुनं वृन्ताकफलगृञ्जने । पलाण्डुवृक्षनिर्यास देवस्वकवकानि च ॥
उष्ट्रीक्षीरमविक्षीरं अज्ञानाद्भुञ्जते द्विजः । त्रिरात्रं उपवासेन पञ्चगव्येन शुध्यति ॥
मण्डूकं भक्षयित्वा तु मूषिकामांसं एव च । ज्ञात्वा विप्रस्त्वहोरात्रं यावकान्नेन शुध्यति ॥
क्षत्रियश्चापि वैश्यश्च क्रियावन्तौ शुचिव्रतौ । तद्गृहे तु द्विजैर्भोज्यं हव्यकव्येषु नित्यशः ॥
घृतं तैलं तथा क्षीरं भक्ष्यं स्नेहेन पाचितम् । गत्वा नदीतटे विप्रो भुञ्जीयाच्छूद्रभोजनं ॥
मद्यमांसरतं नित्यं नीचकर्मप्रवर्तकम् । तं शूद्रं वर्जयेद्विप्रः श्वपाकं इव दूरतः ॥
द्विजशुश्रूषणरतान्मद्यमांसविवर्जितान् । स्वकर्मणि रतान्नित्यं न तान्शूद्रान्त्यजेद्द्विजः ॥
अज्ञानाद्भुञ्जते विप्राः सूतके मृतकेऽपि वा । प्रायश्चित्तं कथं तेषां वर्णे वर्णे विनिर्दिशेत् ॥
गायत्र्यष्टसहस्रेण शुद्धिः स्याच्छूद्रसूतके । वैश्ये पञ्चसहस्रेण त्रिसहस्रेण क्षत्रिये ॥
ब्राह्मणस्य यदा भुङ्क्ते द्वे सहस्रे तु दापयेत् । अथवा वामदैव्येन साम्नैवैकेन शुध्यति ॥
शुष्कान्नं गोरसं स्नेहं शूद्रवेश्मन आगतम् । पक्वं विप्रगृहे भुक्तं भोज्यं तन्मनुरब्रवीत् ॥
आपत्कालेषु विप्रेण भुक्तं शूद्रगृहे यदि । मनस्तापेन शुध्येत द्रुपदां वा जपेच्छतम् ॥
पराशर स्मृति ११/७ – १९
अभोज्यान्नं तु भुक्तान्नं स्त्रीशूद्रोच्छिष्टमेव वा । जग्ध्वा मांसमभक्ष्यं तु सप्तरात्रं यवान्पिबेत् ॥
शुना चैव तु संस्पृष्टस्तस्य स्नानं विधीयते । तदुच्छिष्टं तु संप्राश्य षण्मासान्कृच्छ्रमाचरेत् ॥
अत्रि संहिता ७२ – ७३
एकैकं वर्धयेन्नित्यं शुक्ले कृष्णे च ह्रासयेत् । अमावारयां न भुञ्जीत एप चान्द्रायणो विधिः ॥
एकैकं ग्रासमश्नीयात्त्र्यहाणि त्रीणि पूर्ववत् । त्र्यहं परं च नाश्नीयादतिकृच्छ्रं तदुच्यते ॥
इत्येतत्कथितं पूर्वैर्महापातकनाशनम् ॥
अत्रि संहिता ११२ – ११४
वेदाभ्यासरतं क्षान्तं महायज्ञक्रियापरम् । न स्पृशन्तीह पापानि महापातकजान्यपि ॥
वायुभक्षो दिवा तिष्ठेद्रात्रिं चैवाप्सु सूर्यदृक् । जप्त्वा सहस्रं गायत्र्याः शुद्धिब्रह्मवधादृते ॥
पद्मोदुम्बरबिल्वैश्च कुशाश्वत्थपलाशयोः । एतेषामुदकं पीत्वा पर्णकृच्छ्रं तदुच्यते ॥
पञ्चगव्यं च गोक्षीरं दधिमूत्रशकृद्घृतम् । जग्ध्वा परेऽह्न्युपवसेदेष सांतपनो विधिः ॥
पृथक्सांतपनैर्द्रव्यैः षडहः सोपवासकः । सप्ताहेन तु कृच्छ्रोऽयं महासांतपनं स्मृतम् ॥
त्र्यहं सायं त्र्यहं प्रातस्त्र्यहं भुङ्क्ते त्वयाचितम् । त्र्यहं परं च नाश्नीयात्प्राजापत्यो विधिः स्मृतः ॥
सायं तु द्वादश ग्रासाः प्रातः पञ्चदश स्मृताः । अयाचिते चतुर्विंशः परेऽह्न्यनशनं स्मृतम् ॥
कुक्कुटाण्डप्रमाणं स्याद्यावद्वाऽस्य सुखं विशेत् । एतद्ग्रासं विजानीयाच्छुद्धयर्थं कायशोधनम् ॥
त्र्यहमुष्णं पिबेदापस्त्र्यहमुष्णं पिबेत्पयः । त्र्यहमुष्णं घृतं पीत्वा वायुभक्षो दिनत्रयम् ॥
षट्पलानि पिबेदापस्त्रिपलं तु पयः पिबेत् । पलमेकं तु वै सर्पिस्तप्तकृच्छ्रं विधीयते ॥
दध्ना च त्रिदिनं भुङ्क्ते त्र्यहं भुङ्क्ते च सर्पिषा । क्षीरेण तु त्र्यहं भुङ्क्ते वायुभक्षो दिनत्रयम् ॥
त्रिपलं दधि क्षीरेण पलमेकं तु सर्पिषा । एतदेव व्रतं पुण्यं वैदिकं कृच्छ्रमुच्यते ॥
एकभक्तेन नक्तेन तथैवायाचितेन च । उपवासेन चैकेन पादकृच्छ्रः प्रकीर्तितः ॥
कृच्छ्रातिकृच्छ्रः पयसा दिवसानेकविंशतिम् । द्वादशाहोपवासेन पराकः परिकीर्तितः ॥
पिण्याकधिसक्तूनां ग्रासश्च प्रतिवासरम् । एकैकमुपवासः स्यात्सौम्यकृच्छ्रः प्रकीर्तितः ॥
एषां त्रिरात्रमभ्यासादेकैकस्य यथाक्रमम् । तुलापुरुष इत्येष ज्ञेयः पञ्चदशाहिकः ॥
कपिलायास्तु दुग्धाया धारोष्णं यः पयः पिबेत् । एष व्यासकृतः कृच्छ्रः श्वपाकमपि शोधयेत् ॥
अत्रि संहिता ११४ – १३१
रजकः शैलुषश्चैव वेणुकर्मोपजीवनः । एतेषां यस्तु भुङ्क्ते वै द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥
सर्वान्त्यजानां गमने भोजने संप्रवेशने । पराकेण विशुद्धिः स्याद्भगवानत्रिरब्रवीत् ॥
चाण्डालभाण्डे यत्तोयं पीत्वा चैव द्विजोत्तमः । गोमूत्रयावकाहारः सप्तत्रिंशदहान्यपि ॥
संस्पृष्टं यस्तु पक्वान्नमन्त्यजैर्वाऽप्युदक्यया । अज्ञानाह्राह्मणोऽश्नीयात्प्राजापत्यार्धमाचरेत् ॥
चाण्डालान्नं यदा भुङ्क्ते चातुर्वर्ण्यस्य निष्कृतिः । चान्द्रायणं चरेद्विप्रः क्षत्रः सांतपनं चरेत् ॥
षड्रात्रमाचरेद्वैश्यः पञ्चगव्यं तथैव च । त्रिरात्रमाचरेच्छूद्रो दानं दत्त्वा विशुध्यति ॥
अत्रि संहिता १७२ – १७७
मद्यसंस्पृष्टकुम्भेषु यत्तोयं पिबति द्विजः । कृच्छ्रपादेन शुध्येत पुनः संस्कारमहति ॥
अन्त्यजस्य तु ये वृक्षा बहुपुष्पफलोपगाः । उपभोग्यास्तु ते सर्वे पुष्पेषु च फलेषु च ॥
चाण्डालेन तु संस्पृष्टं यत्तोयं पिवति द्विजः । कृच्छ्रपादेन शुध्येत आपस्तम्बोऽब्रवीन्मुनिः ॥
अत्रि संहिता २०४ – २०६
औषधं लवणं चैव स्नेहं पुष्ट्यर्थभोजनम् । प्राणिनां प्राणदृवृत्त्यर्थं प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥
आपस्तम्ब स्मृति १/११
बालो वृद्धस्तथा रोगी गर्भिणी वायुपीडिता । तेषां नक्तं प्रदातव्यं बालानां प्रहरद्वयम् ॥
अशीतिर्यस्य वर्षाणि बालो वाऽप्यूनषोडशः । प्रायश्चित्तार्धमर्हन्ति स्त्रियो व्याधित एव च ॥
न्यूनैकादशर्वर्षस्य पञ्चवर्षाधिकस्य च । चरेद्गुरुः सुहृद्वाऽपि प्रायश्चित्तं विशोधनम् ॥
अथ तैः क्रियमाणेषु येषामार्तिः प्रदृश्यते । शेषसंपादनाच्छुद्धिर्विपत्तिर्न भवेद्यथा ॥
क्षुधा व्याधितकायानां प्राणो येषां विपद्यते। ये न रक्षन्ति वक्तारस्तेषां तत्किल्बिषं भवेत् ॥
पूर्णेऽपि कालनियमो न शुद्धिर्ब्राह्मणैर्विना । अपूर्णेष्वपि कालेषु शोधयन्ति द्विजोत्तमाः ॥
आपस्तम्ब स्मृति ३/५ – १०
बहूनामेककार्याणां सर्वेषां शस्त्रधारिणां ।
यद्येको घातकस्तत्र सर्वे ते घातकाः स्मृताः ॥
आक्रोशितस्ताडितो वा धनैर्वा परिपीडितः ।
यमुद्दिश्य त्यजेत्प्राणांस्तमाहुर्ब्रह्मघातकं ॥
औषधाद्युपकारे तु न पापं स्यात्कृते मृते ।
पुत्रं शिष्यन्तथा भार्यां शासते न मृते ह्यघं ॥
देशं कालञ्च यः शक्तिं पापञ्चावेक्ष्य यत्नतः ।
प्रायश्चित्तं प्रकल्प्यं स्याद्यत्र चोक्ता न निष्कृतिः ॥
अग्निपुराण/१७३/३ – ६

उपानहावमेध्यं वा यस्य संस्पृशते मुखम् । मृत्तिकाशोधनं स्नानं पञ्चगव्यं विशोधनम् ॥
आपस्तम्ब स्मृति ९/१२
सायं प्रातस्त्वहोरात्रं पादं कृच्छ्रस्य तं विदुः । सायं प्रातस्तथैवैकं दिनद्वयमयाचितम् ॥
दिनद्वयं च नाश्नीयात्कृच्छ्रार्धं तद्विधीयते ॥
आपस्तम्ब स्मृति ९/४३ – ४४
रजकव्याधशैलूष वेणुचर्योपजीविनाम् । यो भुङ्क्ते भुक्तमेतेषां प्राजापत्यं समाचरेत् ॥
अगम्यागमनं कृत्वा अभक्ष्यस्य च भक्षणम् । शुद्धिश्चान्द्रायणं कृत्वा अथर्वोक्तं तथैव च ॥
आपस्तम्ब स्मृति १०/१३ – १४
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा । एतेषां तु हितार्थाय धर्मशास्त्रमकल्पयत् ॥२॥
जातमात्रः शिशुस्तावद्यावदष्टौ समा वयः । स हि गर्भसमो ज्ञेयो जातिमात्रप्रदर्शकः ॥३॥
भक्ष्याभक्ष्ये तथा पेये वाच्यावाच्ये तथाऽनृते । अस्मिन्बाले न दोषः स्यात्स यावन्नोपनीयते ॥४॥
उपनीते तु दोषोऽस्ति क्रियमाणैर्विगर्हितैः । अप्राप्तव्यवहारोऽसौ बालः षोडशवार्षिकः ॥५॥
स्वी करोति यदा वेदं धत्ते वेदव्रतानि च । ब्रह्मचारी भवेत्तावदूर्ध्वं स्नातो गृही भवेत् ॥६॥
द्विविधो ब्रह्मचारी स्यादाद्यो ह्युपकुर्वाणकः । द्वितीयो नैष्ठिकश्चैव तस्मिन्नेव व्रते स्थितः ॥७॥
त्रयाणामानुलोम्येन प्रातिलोम्येन वा पुनः । प्रतिलोमं व्रतं यस्य स भवेत्पापकृत्तमः ॥८॥
यो गृहाश्रममास्थाय ब्रह्मचारी भवेत्पुनः । न यतिर्न वनस्थश्च स सर्वाश्रमवर्जितः ॥९॥
अनाश्रमी न तिष्ठेच्च क्षणमेकमपि द्विजः । आश्रमेण विना तिष्ठन्प्रायश्चित्तीयते हि सः ॥१०॥
जपे होमे तथा दाने स्वाध्याये च रतः सदा । नासौ फलमवाप्नोति कुर्वाणोऽप्याश्रमाच्च्युतः ॥११॥
मेखलाजिनदण्डैश्च ब्रह्मचारीति लक्ष्यते । गृहस्थी यष्टिवेदाद्यैर्नखलोमैर्वनाश्रमी ॥१२॥
त्रिदण्डेन यतिश्चैवं लक्षणानि पृथक्पृथक् । यस्यैतल्लक्षणं नास्ति प्रायश्चित्ती न चाऽऽश्रमी ॥१३॥
दक्ष स्मृति १/२ – १३
स्वकं कर्म परित्यज्य यदन्यत्कुरुते द्विजः । अज्ञानादथ वा लोभात्स तेन पतितो भवेत् ॥
दक्ष स्मृति २/३
यो न संध्यामुपासीत ब्राह्मणो हि विशेषतः । स जीवन्नेव शूद्रस्तु मृतः श्वा चैव जायते ॥
संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु । यदन्यत्कुरुते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत् ॥
दक्ष स्मृति २/२६ – २७
नखलोमविहीनानां प्रायश्चित्तं प्रदापयेत् । चतुर्णामपि वर्णानामन्यथाऽशुद्धिरस्ति हि ॥
प्रायश्चित्तविहीनं तु यदा तेषां कलेवरम् । कर्तव्यस्तत्र संस्कारो मेखलादण्डवर्जितः ॥
देवल स्मृति १० – ११
प्रायश्चित्तं समारभ्य प्रायश्चित्तं तु कारयेत् । स्नानं त्रिकालं कुर्वीत धौतवासा जितेन्द्रियः ॥
कुशहस्तः सत्यवक्ता देवलेन ह्युदाहृतम् । वत्सरं वत्सरार्धं वा मासं मासार्धमेव वा ॥
देवल स्मृति २४ – २५
पादोनं क्षत्रियस्योक्तमर्धं वैश्यस्य दापयेत् । प्रायश्चित्तं द्विजस्योक्तं पादं शूद्रस्य दापयेत् ॥
प्रायश्चित्तावसाने तु दोग्ध्री गौर्दक्षिणा मता । तथाऽसौ तु कुटुंबान्ते गह्युपविष्टो न दुष्यति ॥
अशीतिर्यस्य वर्षाणि बालो वाऽप्यूनषोडशः । प्रायश्चित्तार्धमर्हन्ति स्त्रियो रोगिण एव च ॥
उनैकादशवर्षस्य पञ्चवर्षात्परस्य च । प्रायश्चित्तं चरेद्माता पिता वाऽन्योऽपि वर्धिता ॥
स्वयं व्रतं चरेत्सर्वमन्यथा नैव शुध्यति । तिलहोमं प्रकुर्वीत जपं कुर्यादतन्द्रितः ॥
संलापस्पर्शनिःश्वाससहयानासनाशनात् । याजनाध्यापनाद्यौनात्पापं संक्रमते नृणाम् ॥
याजनं योनिसंबन्धं स्वाध्यायं सहभोजनम् । कृत्वा सद्यः पतत्येव पतितेन न संशयः ॥
संवत्सरेण पतति पतितेन सहाऽऽचरन । याजनासनयज्ञादि कुर्वाणः सार्वकामिकम् ॥
देवल स्मृति २८ – ३५
ब्राह्मणी भोजयेन्म्लेच्छमभक्ष्यं भक्षयेद्यदि । पराकेण ततः शुद्धिः पादेनोत्तरतोत्तरान् ॥
न कृतं मैथुनं ताभिरभक्ष्यं नैव भक्षितम् । शुद्धिस्तदा त्रिरात्रेण म्लेच्छान्नेनैव भक्षिते ॥
देवल स्मृति ३८ – ३९
म्लेच्छान्नं म्लेच्छसंस्पर्शी म्लेच्छेन सह संस्थितिः । वत्सरं वत्सरादूर्ध्वं त्रिरात्रेण विशुध्यति ॥
म्लेच्छैहृतानां चौरैर्वा कान्तारेषु प्रवासिनाम् । भुक्त्वा भक्ष्यमभक्ष्यं वा क्षुधार्तेन भयेन वा ॥
पुनः प्राप्य स्वकं देशं चातुर्वर्ण्यस्य निष्कृतिः । कृच्छ्रमेकं चरेद्विप्रस्तदर्धं क्षत्रियश्चरेत् ॥
पादोनं च चरेद्वैश्यः शूद्रः पादेन शुध्यति ॥
गृहीता स्त्री बलादेव म्लेच्छैर्गुर्वीकृता यदि । गुर्वी न शुद्धिमाप्नोति त्रिरात्रैणेतरा शुचिः ॥
देवल स्मृति ४४ – ४७
प्रायश्चित्तं यथोक्तं तु दातव्यं ब्रह्मवादिभिः । अन्यथा दापयेद्यस्तु प्रायश्चित्ती भवेद्विजः ॥
देवल स्मृति ६७
पञ्चगव्यं च गोक्षीरं दधि मूत्रं घृतं पयः । प्राश्यापरेऽह्न्युपवसेत्कृच्छ्रं सांतपनं चरेत् ॥
पृथक्सांतपनं द्रव्यैः षडहः सोपवासकः । सप्ताहेन तु कृच्छ्रोऽयं महासांतपनः स्मृतः ॥
पर्णोदुम्बरराजीवबिल्वपत्रकुशोदकैः । प्रत्येकं प्रत्यहं पीतैः पर्णकृच्छ्र उदाहृतः ॥
तप्तक्षीरघृताम्बूनामेकैकं प्रत्यहं पिबेत् । एकरात्रोपवासश्च तप्तकृच्छ्रस्तु पावनः ॥
एकभक्तेन नक्तेन तथैवायाचितेन तु । उपवासेन चैकेन पादकृच्छ्र उदाहृतः ॥
कृच्छातिकृच्छ्रः पयसा दिवसानेकविंशतिम् । द्वादशाहोपवासेन पराकः परिकीर्तितः ॥
पिण्याकशाकतक्राम्बु सक्तूनां प्रतिवासरम् । एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रः सौम्यः प्रकीर्तितः ॥
एषां त्रिरात्रमभ्यासादेकैकस्य यथाक्रमम् । तुलापुरुष इत्येष ज्ञेयः पञ्चदशाहिकः ॥
तिथि वृद्धया चरेत्पिण्डाशुक्ले शिख्यण्डसंमितान् । एकैकं ह्रासयेत्पिण्डान्कृच्छ्रचान्द्रायणं चरेत् ॥
यथाकथंचित्पिण्डानां चत्वारिंशच्छतद्वयम् ॥
देवल स्मृति ८१ – ९०
जलाग्निबन्धनभ्रष्टाः प्रवज्यानाशकच्युताः । विषप्रपन्नगात्राश्च शस्त्राघातहताश्च ये ॥
नचैते प्रत्यवसिताः सर्वधर्मबहिष्कृताः । चान्द्रायणेन शुध्यन्ति तप्तकृच्छ्रद्वयेन च ॥
उभयावसिताः पापा ये शामशवलाच्युताः । इन्दुद्वयेन शुध्यन्ति दत्त्वा घेर्नु तथा वृषम् ॥
गोब्राह्मणहतं दग्धं मृतमुद्बन्धनेन तु । पाशं छित्त्वा ततस्तस्य तप्तकृच्छ्रद्वयं चरेत् ॥
कृमिभिर्ब्रह्मसंयुक्तं मक्षिकैश्चोपघातितम् । कृच्छ्रार्धं संप्रकुर्वीत शक्त्या दद्यात्तु दक्षिणाम् ॥
बृहद्यम स्मृति १/३ – ७
चाण्डालभाण्डसंस्पृष्टं पीत्वा भूमिगतं जलम् । गोमूत्रयावकाहारः षड्रात्रेण विशुध्यति ॥
चाण्डालघटभाण्डस्थं यस्तोयं पिबति द्विजः । तत्क्षणात्क्षिपते यस्तु प्राजापत्येन शुध्यति ॥
यदि न क्षिपते तोयं शरीरे यस्य जीर्यति । प्राजापत्यं न दातव्यं कृच्छ्रे सांतपनादिकम् ॥
बृहद्यम स्मृति १/८ – १०
चरेत्सांतपनं विप्रः प्राजापत्यं तु क्षत्रियः । तदर्धं तु चरेद्वैश्यः पादं शुद्रस्य दापयेत् ॥
चाण्डालान्नं भक्षयित्वा तद्वत्सलिलमेव च । मासं कृच्छ्रे चरेद्विप्रश्चान्द्रायणमथापि वा ॥
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् । एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रे सांतपनं स्मृतम् ॥
बृहद्यम स्मृति १/११ – १३
चाण्डालमूर्तिका ये च ये च संकीर्णयोनयः । तेषां दत्त्वा च भुक्त्वा च तप्तकृच्छ्रं समाचरेत् ॥
बृहद्यम स्मृति १/१४
चाण्डालिकासु नारीषु द्विजो मैथुनकारकः । कृत्वाऽघमर्षणं पक्षं शुध्यते च पयोव्रतात् ॥
बृहद्यम स्मृति १/१५
नटीं शैलूषिकां चैव रजकीं वेणुजीविनीम् । गत्वा चान्द्रायणं कुर्यात्तथा चर्मोपजीविनीम् ॥
कापालिकान्नभोक्तृणां तैनयागामिनां तथा । अज्ञानात्कृच्छ्रमुद्दिष्टं ज्ञात्वा चैव व्रतद्वयम् ॥
बृहद्यम स्मृति २/१ – २
सुरायाः संप्रपानेन गोमांसभक्षणे कृते । तप्तकृच्छ्रं चरेद्विप्रो मौञ्जीहोमेन शुध्यति ॥
गोक्षत्रियं तथा वैश्यं शूद्रं चाप्यनुलोमजम् । ज्ञात्वा विशेषेण ततश्चरे चान्द्रायणं व्रतम् ॥
बृहद्यम स्मृति २/३ – ४
कुक्कुटाण्डकमात्रं तु ग्रासं च परिकल्पयेत् । अन्यथाभावदोषेण नवमेऽति च शुध्यह्नि ॥
एकैकं वर्धयेद्ग्रासं शुक्ले कृष्णे च ह्रासयेत् । अमायां तु न भुञ्जीत एष चान्द्रायणो विधिः ॥
प्रायश्चित्तमुपक्रम्य कर्ता यदि विपद्यते । पूतस्तदहरेद्वाऽपि इह लोके परत्र च ॥
यावदेकः पृथग्भाव्यः प्रायश्चित्तं न सेवते । अप्रशस्ता न ते स्पृश्यास्ते सर्वेऽपि विगर्हिताः ॥
अभोज्याँश्चाप्रतिग्राह्या असंपङ्क्त्याविवाहिकाः । पूयन्ते तु व्रते चीर्णे सर्वे ते रिक्थभागिनः ॥
बृहद्यम स्मृति २/५ – ९
ऊनैकादशवर्षस्य पञ्चवर्षात्परस्य च । प्रायश्चित्तं चरेद्भ्राता पिता वाऽन्योऽपि बान्धवः ॥
अतो बालतरस्यापि नापराधो न पातकम् । राजदण्डो न तस्यास्ति प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥
अशीत्यधिकवर्षाणि बालो वाऽप्यूनषोडशः । प्रायश्चित्तार्धमर्हन्ति स्त्रियो व्याधित एव च ॥
पितृव्यभ्रातृभार्या च भगिनीं मातुरेव च । श्वश्रू पितृष्वसारं च तप्तकृच्छ्रे समाचरेत् ॥
बृहद्यम स्मृति ३/१ – ४
राज्ञीमाचार्याशिष्यां वा उपाध्यायस्य योषितः । एता गत्वा स्त्रियो मोहात्षण्मासं कृच्छ्रमाचरेत् ॥
द्वौ मासौ भक्ष्यभोज्यं च द्वौ मासौ यावकेन तु । द्वौ मासौ पञ्चगव्येन षण्मासं कृच्छ्रमाचरेत् ॥
मातरं गुरुपत्नीं च स्वसारं दुहितां तथा। गत्वा तु प्रविशेदग्निं नान्या शुद्धिर्विधीयते ॥
बृहद्यम स्मृति ३/६ – ७
आसने पादमारूढो वस्त्रस्यार्धमधः कृतम् । मुखेन धमितं भुङ्क्ते द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥
बृहद्यम स्मृति ३/३१
उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पृष्टः शुना शूद्रेण वा द्विजः । उपोष्य रजनीमेकां पञ्चगव्येन शुध्यति ॥
उच्छिष्टभाजनं येन विप्रेण चान्नवर्जितम् । स्पृष्टं तेन प्रमादाच्च प्राजापत्यं समाचरेत् ॥
उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पृष्टो ब्राह्मणो ब्राह्मणेन हि । दशरुद्रीं जपेत्पश्चागायत्र्या शोधनं परम् ॥
उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पृष्टः क्षत्रियो वैश्य एव च । प्रमादोच्छिष्टसंस्पृष्टः शूद्रेण तु यदा द्विजः ॥
उपोष्य रजनीमेकां पञ्चगव्येन शुध्यति । श्वानकुक्कुटमार्जाराः काको वा स्पृशते यदि ॥
उच्छिष्टं तं द्विजं यस्तु अहोरात्रेण शुध्यति । पञ्चगव्येन शुद्धिः स्यादित्याह भगवान्यमः ॥
रजस्वलां स्पृशेद्यस्तु त्रिरात्रं तत्र कारयेत् । उपोष्य द्विजसंस्कारं पञ्चगव्येन शुध्यति ॥
बृहद्यम स्मृति ३/४४
नारी वाऽपि कुमारो वा प्रायश्चित्ताद्विशुध्यति । पापी प्रख्यापयेत्पापं दत्त्वा घेनुं तथा वृषम् ॥
प्रच्छन्नपापिनो ये स्युः कृतघ्ना दुष्टचारिणः । नरकेषु च पच्यन्ते यावदाभूतसंप्लवम् ॥
तस्माच्च पापिना ग्राह्यं प्रायश्चित्तं यथा तथा । प्रमादाच्च हता येन कपिला वा तथेतरा ॥
यथा ब्रह्मवधे पापं कपिलाया वधे तथा । बलीवर्देऽपि च तथा प्रायश्चित्तं समं स्मृतम् ॥
बृहद्यम स्मृति ४/५ – ८
श्राद्धं दानं तपो यज्ञो देवताराधनं तथा । ब्रह्महा च सुरापश्च स्वर्णस्तेयी गुरुद्रुहः ॥
संसर्गी पञ्चमो ज्ञेयस्तत्समो नात्र संशयः । एतेषु द्वादशाब्दं च प्रायश्चित्तं विधीयते ॥
तथा पातकिनां चैव षडब्दं चैव संस्मृतम् । उपपातकिनां चैव त्रिपञ्चाब्दं विधीयते ॥
बृहद्यम स्मृति ४/२१ – २३
प्राजापत्यैस्त्रिभिः कृच्छ्रं कृच्छ्रं वै द्वादशाबंदिकम् । एकभक्तं तथा नक्तमुपवासमथापि वा ॥
एतद्दिनचतुष्केण पादकृच्छ्रश्च जायते । त्रिपादकृच्छ्रो विज्ञेयः पापक्षयकरः स्मृतः ॥
धर्मशास्त्रानुसारेण प्रायश्चित्तं मनीषिभिः । दातव्यं पापमुक्त्यर्थं प्राणिनां पापकारिणाम् ॥
नुतापापो यदा पुंसां भवेद्वै पापिनः किल । प्रायश्चित्तं तु तदा देयमित्याह भगवान्यमः ॥
अज्ञात्वा धर्मशास्त्राणि प्रायश्चित्तं ददाति यः । प्रायश्चित्ती भवेत्पूतस्तत्पापं पर्षदं व्रजेत् ॥
तस्माच्छास्त्रानुसारेण प्रायश्चित्तं विधीयते ॥
बृहद्यम स्मृति ४/२५-३०
पतितस्य च विप्रस्य अनुतापरतस्य च । पापाच्चैव निवृत्तस्य प्रायश्चित्ती भवेत्तदा ॥
तारतम्येन दातव्यं प्रायश्चित्तं यथाविधि । सकामो हि यदा विप्रः पापाचारपरो भवेत् ॥
दृष्ट्वा निवृत्तपापौघः प्रायश्चित्ती तदाऽर्हति । तथा क्षत्रियवैश्यौ वा शूद्रो वाऽपि यथाक्रमात् ॥
बृहद्यम स्मृति ४/४०-४२
मानसं वाचिकं चैव कायिकं पातकं स्मृतम् । तस्मात्पापाद्विशुद्ध्यर्थं प्रायश्चित्तं दिने दिने ॥
बृहद्यम स्मृति ४/४९
अशुभं कारिताः कर्म गवादिप्राणिहिंसनम् । प्रायश्चित्तं च दातव्यं तारतम्येन वा द्विजैः ॥
बृहद्यम स्मृति ५/६
जलाद्युद्बन्धनभ्रष्टाः प्रव्रज्यानाशकच्युताः । विषप्रपतनप्रायशस्त्रघातहताश्च ये ॥
नवैते प्रत्यवसिताः सर्वलोकबहिष्कृताः । चान्द्रायणेन शुध्यन्ति तप्तकृच्छ्रद्वयेन वा ॥
उभयावसितः पापः श्यामाच्छवलकाच्च्युतः । चान्द्रायणाभ्यां शुध्येत दत्त्वा धेनुं तथा वृषम् ॥
श्वश्रृगालप्लवङ्गाद्यैर्मानुषैश्च रतिं विना । दष्टः स्नात्वा शुचिः सद्यो दिवा संध्यासु रात्रिषु ॥
अज्ञानाद्ब्राह्मणो भुक्त्वा चण्डालान्नं कदाचन । गोमूत्रयावकाहारो मासार्धेन विशुध्यति ॥
गोब्राह्मणगृहं दग्धा मृतश्चोद्बन्धनादिना । पाशांश्छित्त्वा तथा तस्य कृच्छ्रमेकं चरेद्विजः ॥
चण्डालपुल्कसानां च भुक्त्वा गत्वा च योषितम् । कृच्छ्राब्दमाचरेज्ज्ञानादज्ञाना दैन्दवद्वयम् ॥
कापालिकान्नभोक्तृणां तन्नारीगामिणां तथा । कृच्छ्राब्दमाचरेज्ज्ञानादज्ञानादैन्दवद्वयम् ॥
अगम्यागमने विप्रो मद्यगोमांसभक्षणे । तप्तकृच्छ्र परिक्षिप्तो मौञ्जीहोमेन शुध्यति ॥
महापातककर्तारश्चत्वारोऽप्यविशेषतः । अग्निं प्रविश्य शुध्यन्ति स्थित्वा वा महति क्रतौ ॥
रहस्यकरणेऽप्येवं मासमभ्यस्य पूरुषः । अघमर्षणसूक्तं वा शुध्येदन्तर्जले स्थितः ॥
रजकश्चर्मकारश्च नटो बुरुड एव च । कैवर्तमेदभिल्लाश्च सप्तैते अन्त्यजाः स्मृताः ॥
भुक्त्वा चैषां स्त्रियो गत्वा पीत्वाऽपः प्रतिगृह्य च । कृच्छ्राब्दमाचरेज्ज्ञानादज्ञानादैन्दवद्वयम् ॥
मातरं गुरुपत्नीं च स्वसृदुहितरौ स्नुषाम् । गत्वैताः प्रविशेदग्निं नान्या शुद्धिर्विधीयते ॥
राज्ञीं प्रव्रजितां धात्रीं तथा वर्णोत्तमामपि । कृच्छ्रद्वयं प्रकुर्वीत सगोत्रामभिगम्य च ॥
अन्यासु पितृगोत्रासु मातृगोत्रगतास्वपि । परदारेषु सर्वेषु कृच्छ्रं सांतपनं चरेत् ॥
वेश्याभिगमने पापं व्यपोहन्ति द्विजातयः । पीत्वा सकृत्सुतप्तं च पञ्चरात्रं कुशोदकम् ॥
गुरुतल्पव्रतं केचित्केचिद्ब्रह्मणो व्रतम् । गोघ्नस्य केचिदिच्छन्ति केचिच्चैवावकीर्णिनः ॥
दण्डादूर्ध्वप्रहारेण यत्तु गां विनिपातयेत् । द्विगुणं गोव्रतं तस्य प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥
अङ्गुष्ठमात्रस्थूलस्तु बाहुमात्रप्रमाणकः । सार्द्रश्च सपलाशश्च गोदण्डः परिकीर्तितः ॥
गवां निपातने चैव गर्भोऽपि संपतेद्यदि । एकैकशश्चरेत्कृच्छ्रं यथापूर्वं तथा पुनः ॥
पादमुत्पन्नमात्रे तु द्वौ पादौ गाात्रसंभवे । पादोनं कृच्छ्रमाचष्टे हत्वा गर्भमचेतनम् ॥
अङ्गप्रत्यङ्गसंपूर्णे गर्भे रेतःसमन्विते । एकैकशश्चरेत्कृच्छ्रमेषा गोघ्नस्य निष्कृतिः ॥
बन्धने रोधने चैव पाषाणे वा गवां रुजा । संपद्यते चेन्मरणं निमित्ती नैत्र लिप्यते ॥
मूर्च्छितः पतितो वाऽपि दण्डेनाभिहतस्तथा । उत्थाय षट्पदं गच्छेत्सप्त पञ्च दशापि वा ॥
ग्रासं वा यदि गृह्णीयात्तोयं वाऽपि पिबेद्यदि । पूर्वव्याधिप्रनष्टानां प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥
काष्ठलोष्टाश्मभिर्गावः शस्त्रैर्वा निहता यदि । प्रायश्चित्तं कथं तत्र शास्त्रे शास्त्रे निगद्यते ॥
काष्ठे सांतपनं कुर्यात्प्राजापत्यं तु लोष्टके । तप्तकृच्छ्रं तु पाषाणे शस्त्रे चाप्यतिकृच्छ्रकम् ॥
औषधं स्नेहमाहारं ददद्गोब्राह्मणेषु तु । दीयमाने विपत्तिः स्यात्प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥
तैलमैर्षेज्यपाने च भेषजानां च भक्षणे । निःशल्यकरणे चैव प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥
वत्सानां कण्ठबन्धेन क्रियया भेषजेन तु । सायं संगोपनार्थं च न दोषो रोधबन्धयोः ॥
पादे चैवास्य रोमाणि द्विपादे श्मश्रु केवलम् । त्रिपादे तु शिखावर्जं मूले सर्वं समाचरेत् ॥
केशानां रक्षणार्थं च द्विगुणं व्रतमादिशेत् । द्विगुणे तु व्रते चीर्णे द्विगुणैव तु दक्षिणा ॥
द्विगुणं तेन दत्तं च केशांश्च परिरक्षयेत् । पापं न क्षीयते हन्तुर्दाता च नरकं व्रजेत् ॥
अश्रौतस्मार्तविहितं प्रायश्चित्तं वदन्ति ये । तान्धर्मविघ्नकर्तृश्च राजा दण्डेन पीडयेत् ॥
न चेत्तान्पीडयेद्राजा कथंचित्काममोहितः । तत्पापं शतधा भूत्वा तमेव परिसर्पति ॥
प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् । विंशतिं गा वृषं चैव दद्यात्तेषां च दक्षिणाम् ॥
कृमिभिर्व्रणसंभूतैर्मक्षिकाभिश्च पातितैः । कृच्छ्रार्धं संप्रकुर्वीत शक्त्या दद्याच्च दक्षिणाम् ॥
प्रायश्चित्तं च कृत्वा वै भोजयित्वा द्विजोत्तमान् । सुवर्णमाषकं दद्यात्ततः शुद्धिर्विधीयते ॥
यम स्मृति २२ – ६३
सुराम्बुघृतगोमूत्रपयसाम् अग्निसन्निभम्। सुरापोऽन्यतमं पीत्वा मरणाच्छुद्धिम् ऋच्छति॥
वालवासा जटी वापि ब्रह्महत्याव्रतं चरेत्। पिण्याकं वा कणान्वापि भक्षयेत् त्रिसमा निशि॥
अज्ञानात्तु सुरां पीत्वा रेतो विण्मूत्रमेव च। पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः॥
पतिलोकं न सा याति ब्राह्मणी या सुरां पिबेत्। इहैव सा शुनी गृध्री सूकरी चोपजायते॥
ब्राह्मणस्वर्णहारी तु राज्ञे मुसलमर्पयेत्। स्वकर्म व्याख्यायंस्तेन हतो मुक्तोऽपि वाशुचिः॥
अनिवेद्य नृपे शुध्येत्सुरापव्रतमाचरन्। आत्मतुल्यं सुवर्णं वा दद्याद्वा विप्रतुष्टिकृत्॥
तप्तेऽयःशयने सार्धमायस्या योषिता स्वपेत्। गृहीत्वोत्कृत्य वृषणौ नैर्ऋत्यां चोत्सृजेत्तनुम्॥
प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रं समा वा गुरुतल्पगः। चान्द्रायणं वा त्रीन् मासानभ्यसेद्वेदसंहिताम्॥
एभिस्तु संवसेद्यो वै वत्सरं सोऽपि तत्समः। कन्यां समुद्वहेदेषां सोपवासाम् अकिञ्चनाम्॥
चान्द्रायणं चरेत्सर्वानवकृष्टान्निहत्य तु। शूद्रोऽधिकारहीनोपि कालेनानेन शुध्यति॥
पञ्चगव्यं पिबेद्गोघ्नो मासमासीत संयतः। गोष्ठेशयो गोऽनुगामी गोप्रदानेन शुध्यति॥
कृच्छ्रं चैवातिकृच्छ्रं च चरेद्वापि समाहितः। दद्यात् त्रिरात्रं चोपोष्य वृषभैकादशास्तु गाः॥
उपपातकशुद्धिः स्यादेवं चान्द्रायणेन वा। पयसा वापि मासेन पराकेणाथ वा पुनः॥
ऋषभैकसहस्रा गा दद्यात् क्षत्रवधे पुमान्। ब्रह्महत्याव्रतं वापि वत्सरत्रितयं चरेत्॥
वैश्यहाब्दं चरेद् एतद् दद्याद् वैकशतं गवाम्। षण्मासाच्छूद्रहाप्येतद्धेनुर्दद्याद्दशाथ वा॥
दुर्वृत्तब्रह्मविट्क्षत्रशूद्रयोषाः प्रमाप्य तु। दृतिं धनुर्बस्तमविं क्रमाद्दद्याद्विशुद्धये॥
अप्रदुष्टां स्त्रियं हत्वा शूद्रहत्याव्रतं चरेत्। अस्थिमतां सहस्रं तु तथानस्थिमतामनः॥
मार्जारगोधानकुलमण्डूकांश्च पतत्रिणः। हत्वा त्र्यहं पिबेत्क्षीरं कृच्छ्रं वा पादिकं चरेत्॥
गजे नीलवृषाः पञ्च शुके वत्सो द्विहायनः। खराजमेषेषु वृषो देयः क्रौञ्चे त्रिहायनः॥
हंसश्येनकपिक्रव्याज्जलस्थलशिखण्डिनः। भासं च हत्वा दद्याद् गाम् अक्रव्यादस्तु वत्सिकाम्॥
उरगेष्वायसो दण्डः पण्डके त्रपु सीसकम्। कोले घृतघटो देय उष्ट्रे गुञ्जा हयेऽंशुकम्॥
तित्तिरौ तु तिलद्रोणं गजादीनाम् अशक्नुवन्। दानं दातुं चरेत्कृच्छ्रं एकैकस्य विशुद्धये॥
फलपुष्पान्नरसज सत्त्वघाते घृताशनम्। किञ्चित् सास्थिवधे देयं प्राणायामस्त्वनस्थिके॥
वृक्षगुल्मलतावीरुच्छेदने जप्यम् ऋक्शतम्। स्यादोषधिवृथाछेदे क्षीराशी गोऽनुगो दिनम्॥
पुंश्चलीवानरखरैर्दष्टश्वोष्ट्रादिवायसैः। प्राणायामं जले कृत्वा घृतं प्राश्य विशुध्यति॥
यन्मेऽद्य रेत इत्याभ्यां स्कन्नं रेतोऽभिमन्त्रयेत्। स्तनान्तरं भ्रुवोर्मध्यं तेनानामिकया स्पृशेत्॥
मयि तेज इति च्छायां स्वां दृष्ट्वाम्बुगतां जपेत्। सावित्रीमशुचौ दृष्टे चापल्ये चानृतेऽपि च॥
अवकीर्णी भवेद्गत्वा ब्रह्मचारी तु योषितम्। गर्दभं पशुमालभ्य नैर्ऋतं स विशुध्यति॥
भैक्षाग्निकार्ये त्यक्त्वा तु सप्तरात्रमनातुरः। कामावकीर्ण इत्याभ्यां जुहुयादाहुतिद्वयम्॥
उपस्थानं ततः कुर्यात्सं मा सिञ्चन्त्वनेन तु। मधुमांसाशने कार्यः कृच्छ्रः शेषव्रतानि च॥
प्रतिकूलं गुरोः कृत्वा प्रसाद्यैव विशुध्यति। कृच्छ्रत्रयं गुरुः कुर्यान्म्रियते प्रहितो यदि॥
क्रियमाणोपकारे तु मृते विप्रे न पातकम्। विपाके गोवृषाणां तु भेषजाग्निक्रियासु च॥
मिथ्याभिशंसिनो दोषो द्विः समो भूतवादिनः। मिथ्याभिशस्तदोषं च समादत्ते मृषा वदन्॥
महापापोपपापाभ्यां योऽभिशंसेन्मृषा परम्। अब्भक्षो मासमासीत स जापी नियतेन्द्रियः॥
अभिशस्तो मृषा कृच्छ्रं चरेदाग्नेयमेव वा। निर्वपेत्तु पुरोडाशं वायव्यं पशुमेव वा॥
अनियुक्तो भ्रातृजायां गच्छंश्चान्द्रायणं चरेत्। त्रिरात्रान्ते घृतं प्राश्य गत्वोदक्यां विशुध्यति॥
त्रीन्कृच्छ्रानाचरेद्व्रात्ययाजकोऽभिचरन्नपि। वेदप्लावी यवाश्यब्दं त्यक्त्वा च शरणागतम्॥
गोष्ठे वसन्ब्रह्मचारी मासमेकं पयोव्रतम्। गायत्रीजप्यनिरतः शुध्यतेऽसत्प्रतिग्रहात्॥
प्राणायामी जले स्नात्वा खरयानोष्ट्रयानगः। नग्नः स्नात्वा च भुक्त्वा च गत्वा चैव दिवा स्त्रियम्॥
गुरुं हुंकृत्य त्वंकृत्य विप्रं निर्जित्य वादतः। बद्ध्वा वा वाससा क्षिप्रं प्रसाद्योपवसेद्दिनम्॥
विप्रदण्डोद्यमे कृच्छ्रस्त्वतिकृच्छ्रो निपातने। कृच्छ्रातिकृच्छ्रोऽसृक्पाते कृच्छ्रोऽभ्यन्तरशोणिते॥
देशं कालं वयः शक्तिं पापं चावेक्ष्य यत्नतः। प्रायश्चित्तं प्रकल्प्यं स्याद्यत्र चोक्ता न निष्कृतिः॥
दाषीकुम्भं बहिर्ग्रामान्निनयेरन्स्वबान्धवाः। पतितस्य बहिः कुर्युः सर्वकार्येषु चैव तम्॥
चरितव्रत आयाते निनयेरन्नवं घटम्। जुगुप्सेरन्न चाप्येनं संवसेयुश्च सर्वशः॥
याज्ञवल्क्यस्मृतिः/प्रायश्चित्ताध्यायः(३)/२५३१ – २९५
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् । जग्ध्वा परेऽह्न्युपवसेत्कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ॥
पृथक्सान्तपनद्रव्यैः षडहः सोपवासकः । सप्ताहेन तु कृच्छ्रोऽयं महासान्तपनः स्मृतः ॥
पर्णोदुम्बरराजीव बिल्वपत्रकुशोदकैः । प्रत्येकं प्रत्यहं पीतैः पर्णकृच्छ्र उदाहृतः ॥
तप्तक्षीरघृताम्बूनां एकैकं प्रत्यहं पिबेत् । एकरात्रोपवासश्च तप्तकृच्छ्र उदाहृतः ॥
एकभक्तेन नक्तेन तथैवायाचितेन च । उपवासेन चैवायं पादकृच्छ्रः प्रकीर्तितः ॥
यथाकथंचित्त्रिगुणः प्राजापत्योऽयं उच्यते । अयं एवातिकृच्छ्रः स्यात्पाणिपूरान्नभोजनः ॥
कृच्छ्रातिकृच्छ्रः पयसा दिवसानेकविंशतिम् । द्वादशाहोपवासेन पराकः परिकीर्तितः ॥
पिण्याकाचामतक्राम्बु सक्तूनां प्रतिवासरम् । एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रः सौम्योऽयं उच्यते ॥
एषां त्रिरात्रं अभ्यासादेकैकस्य यथाक्रमम् । तुलापुरुष इत्येष ज्ञेयः पञ्चदशाहिकः ॥
तिथिवृद्ध्या चरेत्पिण्डान्शुक्ले शिख्यण्डसम्मितान् । एकैकं ह्रासयेत्कृष्ने पिण्डं चान्द्रायणं चरन् ॥
यथाकथंचित्पिण्डानां चत्वारिंशच्छतद्वयम् । मासेनैवोपभुञ्जीत चान्द्रायणं अथापरम् ॥
कुर्यात्त्रिषवणस्नायी कृच्छ्रं चान्द्रायणं तथा । पवित्राणि जपेत्पिण्डान्गायत्र्या चाभिमन्त्रयेत् ॥
अनादिष्टेषु पापेषु शुद्धिश्चान्द्रायणेन च । धर्मार्थं यश्चरेदेतच्चन्द्रस्यैति सलोकताम् ॥
याज्ञवल्क्यस्मृतिः/प्रायश्चित्ताध्यायः(३)/रहस्यप्रायश्चित्त/३१४ – ३२५
मार्जारगोधानकुलमण्डूकश्वपतत्रिणः। हत्वा त्र्यहं पिवेत्क्षीरं कृच्छ्रं चान्द्रायणं चरेत् ॥
व्रतं रहस्ये रहसि प्रकाशेऽपि प्रकाशकं। प्राणायामशतं कार्यं सर्वपापापनुत्तये ॥
पानकं द्राक्षमधुकं खार्जरन्तालमैक्षवं। मध्वीकं टङ्कमाध्वीकं मैरेयं नारिकेलजं ॥
न मद्यान्यपि मद्यानि पैष्टी मुख्या सुरा स्मृता। त्रैवर्णस्य निषिद्धानि पीत्वा तप्त्वाप्यपः शुचिः ॥
कणान् वा भक्षयेदब्दं पिण्याकं वा सकृन्निशि। सुरापाणापनुत्यर्थं बालवामा जटी ध्वजी ॥
अज्ञानात्प्राश्य विण्मूत्रं सुरासंस्पृष्टमेव च। पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः ॥
मद्यमाण्डस्थिता आपः पीत्वा सप्तदिनं व्रती। चाण्डालस्य तु पानीयं पीत्वा स्यात्षड्दिनं व्रती ॥
चण्डालकूपभाण्डेषु पीत्वा शान्तपनं चरेत्। पञ्चगव्यं त्रिरान्ते पीत्वा चान्त्यजलं द्विजः ॥
मत्स्यकण्टकशम्बूकशङ्खशुक्तिकपर्दकान्। पीत्वा नवोदकं चैव पञ्चगव्येन शुद्ध्यति ॥
शवकूपोदकं पीत्वा त्रिरात्रेण विशुद्ध्यति। अन्त्यावसायिनामन्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
आपत्काले शूद्रगृहे मनस्तापेन शुद्ध्यति। शूद्रभाजनभुक्विप्रः पञ्चगव्यादुपोषितः ॥
कन्दुपक्वं स्नेहपक्वं स्नेहं च दधिशक्तवः। शूद्रादनिन्द्यान्येतानि गुडक्षीररसादिकं ॥
अग्निपुराण/१७३/१९ – ३१
प्रायश्चित्तमकुर्वाणाः पश्चात्तापविवर्जिताः। नरकान्यान्ति पापा वै महारौरवरौरवान् ॥
तामिस्रं लोहशङ्कुं च पूतिगन्धसमाकुलम्। हंसाभं लोहितोदं च सञ्जीवननदीपथम् ॥
महानिलयकाकोलमन्धतामिस्रवापनम्। अविचीं कुम्भीपाकं च यान्ति पापा ह्यपुण्यतः ॥
ब्रह्महा मद्यपः स्तेयी संयोगी गुरुतल्पगः। गुरुनिन्दा वेदनिन्दा ब्रह्महत्यासमे ह्युभे ॥
निषिद्धभक्षणं जिह्मक्रियाचरणमेव च। रजस्वलामुखास्वादः सुरापानसमानि तु ॥
अश्वरत्नादिहरणं सुवर्णस्तेयसम्मितम्। सखिभार्याकुमारीषु स्वयोनिष्वन्त्यजासु च॥
सगोत्रासु तथा स्त्रीषु गुरुतल्पसमं स्मृतम्। पितुः स्वसारं मातुश्च मातुलानीं स्नुषामपि॥
मातुः सपत्नीं भगिनीमाचार्य्यतनयां तथा। आचार्य्यपत्नीं स्वसुतां गच्छंस्तु गुरुतल्पगः॥
छित्त्वा लिङ्गं वधस्तस्य सकामायाः स्त्रियास्तथा॥
गोवधो व्रात्यतास्तेयमृणानां च परिक्रिया। अनाहिताग्निताऽपण्यविक्रयः परिवेदनम् ॥
भृत्याचाध्ययनादानं भृतकाध्यापनमन्तथा। पारदार्य्यं पारिवित्त्यं वार्द्धुष्यं लवणक्रिया ॥
सच्छूद्रविट्क्षत्त्रबन्धोर्निन्दितार्थोपजीविता। नास्तिक्यं व्रतलोपश्च शूल्यं गोश्वेव विक्रयः ॥
पितृमातृसुहृत्त्यागस्तडागारामविक्रयः। कन्यायादूषण चैव परिविन्दकयाजनम् ॥
कन्याप्रदानं तस्यैव कौटिल्यं व्रतलोपनम्। आत्मनोऽर्थे क्रियारम्भो मद्यपस्त्रीनिषेवणम् ॥
स्वाध्यायाग्निसुतत्यागो बान्धवत्याग एव च। असच्छास्त्राभिगमनं भार्य्यात्मपरिविक्रयः ॥
उपपापानि चोक्तानि प्रायश्चित्तं निबोधत। शिरः कपालध्वजवान् भिक्षाशी कर्म वेदयन् ॥
ब्रह्महा द्वादश समा मितभुक्शुद्धिमाप्नुयात्। लोमभ्यः स्वाहेति च वा लोमप्रभृति वै तनुम् ॥
मज्जान्तां जुहुयाद्वापि स्वस्वमन्त्रैर्यथाक्रमम्। शुद्धिः स्याद्ब्राह्मणत्राणात्कृत्वैवं शुद्धिरेव च ॥
निरातङ्कं द्विजं गां च ब्राह्मणार्थे हतोऽपि वा। अरण्ये नियतो जुप्त्वा त्रिः कृत्वो वेदसंहिताम् ॥
सरस्वतीं वा संसेव्यं धनं पात्रे समर्पयेत्। यागस्थक्षत्त्रविड्घाते चरेद्ब्रह्महणो व्रतम् ॥
गर्भहा वा यथावर्णं तथात्रेयीनिषूदनम्। चरेद्व्ररतमहत्वापि घातनार्थमुपागतः ॥
द्विगुणं सवनस्थे तु ब्राह्मणे व्रतमाचरेत्। सुराम्बुघृतगोमूत्रं पीत्वा शुद्धिः सुरापिणः ॥
अग्निवर्णं घृतं वापि चीरवास जटी भवेत्। व्रतं ब्रह्महणः कुर्य्यात्पुनः संस्कारमर्हति ॥
रेतेविण्मूत्रपानाच्च सुरापा ब्राह्मणी तथा। पतिलोकपरिभ्रष्टा गृध्री स्यात्सूकरी शुनी ॥
स्वर्णहारी द्विजो राज्ञे दत्त्वा तु मुसलं तथा। कर्मणः ख्यापनं कृत्वा हतस्तेन भवेच्छुचिः ॥
आत्मतुल्यं सुवर्णं वा दत्त्वा शुद्धिमियाद्द्विजः। शयने सार्द्धमायस्यां योषिता निभृतं स्वपेत् ॥
उच्छेद्य लिङ्गं वृषणं नैर्ऋत्यामुत्सृजोद्दिशि। प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रं समा वा गुरुतल्पगः ॥
चान्द्रायणं वा त्रीन्मासनभ्यसेद्वेदसंहिताम्। पञ्चगव्यं पिबेद्गोघ्नो मासमासीत संयतः ॥
गोष्ठेशयो गोऽनुगामी गोप्रदानेन शुध्यति। उपपातकशुद्धिः स्याच्चान्द्रायणव्रतेन च ॥
पयसा वापि मासेन पराकेणापि वा पुनः। ऋषभैकं सहस्त्रं गा दद्यात्क्षत्त्रवधे पुमान् ॥
ब्रह्महत्याव्रतं वापि वत्सरत्रितयं चरेत्। वैश्यहाऽब्दांश्च रेदेतद्दद्याद्वैकशतं गवाम् ॥
षण्मासाच्छूद्रहा चैतद्दद्याद्वा धेनवो दश। अप्रदुष्टां स्त्रियं हत्वा शूद्रहत्याव्रतं चरेत् ॥
मार्जारगोधानकुलपशुमण्डूकघातनात्। पिबेत्क्षीरं त्र्यहं पापी कृच्छ्रं वाप्यधिकं चरेत् ॥
गजे नीलान्वृषान्पञ्च शुके वत्सं द्विहायनम्। खराजमेषेषु वृषो देयः क्रौञ्चे त्रिहायणः ॥
वृक्षगुल्मलतावीरुच्छेदने जप्यमृक्शतम्। अवकीर्णो भवेद्गत्त्वा ब्रह्मचारी च योषितम् ॥
गर्दभं पशुमालभ्य नैर्ऋतं च विशुध्यति। मधुमांसाशने कार्य्यं कृच्छ्रं शेषव्रतानि च ॥
कृच्छ्रत्रयं गुरुः कुर्य्यान्म्रियेत् प्रहितो यदि। प्रतिकूलं गुरोः कृत्वा प्रसाद्यैव विशुध्यति ॥
रिपून्धान्यप्रदानाद्यैः स्नेहाद्यैर्वाप्युपक्रमेत्। क्रियमाणोपकारे च मृते विप्रे न पातकम् ॥
महापापोपपापाभ्यां योभिशस्तो मृषा परम्। अब्भक्षो मासमासीत स जापी नियतन्द्रियः ॥
अनियुक्तो भ्रातृभार्य्यां गच्छंश्चान्द्रायणं चरेत्। त्रिरात्रान्ते घृतं प्राश्य गत्वोदक्यां शुचिर्भवेत् ॥
गोष्ठे वसन्ब्रह्मचारी मासमेकं पयोव्रती। गायत्त्रीजप्यनिरतो मुच्यतेऽसत्प्रतिग्रहात् ॥
त्रिः कृच्छ्रमाचरेद्व्रात्ययाजकोऽपि चरन्नपि। वेदप्लावी यवाश्यब्दं त्यक्त्वा च शरणागतान् ॥
प्राणायामत्रयं कुर्य्यात्खरयानोष्ट्रयानगः। नग्नः स्नात्वा च सुप्त्वा च गत्वा चैव दिवा स्त्रियम् ॥
गुरुंत्वं कृत्य हुंकृत्य विप्रं निर्जित्य वाद तः। प्रसाद्य तं च मुनयस्ततो ह्युपवसेद्दिनम् ॥
विप्रे दण्डोद्यमे कृच्छ्रमतिकृच्छ्रं निपातने। देशं कालं वयः शक्तिं पापं चावेक्ष्य यत्नतः ॥
प्रायश्चितं प्रकल्प्यं स्याद्यत्र योक्ता तु निष्कृतिः। गर्भत्यागो भर्त्तृनिन्दा स्त्रीणां पतनकारणम् ॥
गरुडपुराण/आचारकाण्डः/१०५/३ – ४९
अनादिष्टेषु पापेषु शुद्धिश्चान्द्रायणेन तु। धर्मार्थो यश्चरेदेतच्चन्द्रस्यैति सलोकताम् ॥
कृच्छ्रकृद्धर्मकामस्तु महतीं श्रियमश्नुते ॥
गरुडपुराण/आचारकाण्डः/१०५/७२ – ७३
एकभक्तेन नक्तेन तथैवायाचितेन च । उपवासेन चैकेन पादकृच्छ्रः प्रकीर्तितः ॥
वटोदुंबरराजीव बिल्वपत्रकुशोदकम् । प्रत्येकं प्रत्यहं पीतं पर्णकृच्छ्रः प्रकीर्तितः ॥
पिण्याकघृततक्रांबु सक्तूनां प्रतिवासरम् । एकैकमुपवासश्च कृच्छ्रः सौम्यः प्रकीर्तितः ॥
हविषा प्रातरश्नीत हविषा सायमेव च । हविषा याचितं त्रींस्तु सोपवासस्त्रयहं वसेत् ॥
एकैकग्रासमश्नीयादहानि त्रीणि पूर्ववत् । त्र्यहं चोपवसेदंत्यमतिकृच्छ्रं चरन्द्विजः ॥
कृच्छ्रातिकृच्छ्रं पयसा दिवसानेकविंशतिः । द्वादशाहोपवासेन पराकः परिकीर्तितः ॥
त्र्यहं प्रातस्त्रयहं सायं त्र्यहमद्यादयाचितम्। त्र्यहं चोपवसेदंत्यं प्राजापत्यं चरन्द्विजः ॥
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधिसर्पिः कुशोदकम्। एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रः सांतपनः स्मृतः ॥
पृथक्सांतपनद्रव्यैः षडहः सोपवासकः । सप्ताहेन तु कृच्छ्रोयं महासांतपनः स्मृतः ॥
तप्तकृच्छ्रं चरन्विप्रो जलक्षीरघृतानिलान् । एतांस्त्र्यहं पिबेदुष्णान्सकृत्स्नायी समाहितः ॥
त्र्यहमुष्णाः पिबेदापस्त्र्यहमुष्णं पयः पिबेत् । त्र्यहमुष्णघृतं प्राश्य वायुभक्षो दिनत्रयम् ॥
पलमेकं पयः पीत्वा सर्पिषश्च पलद्वयम् । पलमेकं तु तोयस्य तप्तकृच्छ्र उदाहृतः ॥
गोमूत्रेण समायुक्तं यावकं यः प्रयोजयेत् । कृच्छ्रमेकाह्न्किं प्रोक्तं शरीरस्य विशोधनम् ॥
हस्तावुत्तानतः कृत्वा दिवसं मारुताशनः । रात्रौ जले स्थितो व्युष्टः प्राजापत्येन तत्समम्॥
एकैकं ह्रासयेद्ग्रासं कृष्णे शुक्ले च वर्धयेत्। उपस्पृशं स्त्रिषवणमेतच्चांद्रायणं स्मृतम् ॥
एकैकं वर्धयेद्ग्रासं शुक्ले कृष्णे च ह्रासयेत् । भुंजीत दर्शे नो किंचिदेष चांद्रायणो विधिः ॥
चतुरः प्रातरश्नीयात्पिंडान्विप्रः समाहितः । चतुरोस्तमिते सूर्ये शिशुचांद्रायणं स्मृतम् ॥
अष्टावष्टौ समश्नीयात्पिंडान्मध्यंदिने स्थिते । नियतात्मा हविष्यस्य यतिचांद्रायणं स्मृतम् ॥
यथाकथंचित्पिंडानां तिस्रोशीतीः समाहितः । मासेनाश्नन्हविष्यस्य चंद्रस्यैति सलोकताम् ॥
अद्भिर्गात्राणि शुध्यंति मनः सत्येन शुद्ध्यति । विद्या तपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुद्ध्यति ॥
स्कन्दपुराण/४ (काशीखण्डः)/९६/५३ – ७२
प्रायश्चित्तविहीनैस्तु यत्कर्म क्रियते मुने । तत्सर्वं निष्फलं प्रोक्तं राक्षसैः परिसेवितम् ॥
कामक्रोधविहीनैश्च धर्मशास्त्रविशारदैः । प्रष्टव्या ब्राह्मणा धर्मं सर्वधर्मफलेच्छुभिः ॥
प्रायश्चित्तानि चीर्णानि नारायणपराङ्मुखैः । न निष्पुनंति विप्रेंद्र सुराभांडमिवापगाः ॥
ब्रह्महा च सुरापी च स्तेयी च गुरुतल्पगः । महापातकिननस्त्वेते तत्संसर्गी च पंचमः ॥
यस्तु संवत्सरं ह्यतैः शयनासनभोजनैः । संवसेत्सह तं विद्यात्पतितं सर्वकर्मसु ॥
अज्ञानाद्ब्राह्मणं हत्वा चीरवासा जटी भवेत् । स्वेनैव हतविप्रस्य कपालमपि धारयेत् ॥
तदभावे मुनिश्रेष्ठ कपालं वान्यमेव वा । तद्द्रव्यं ध्वजदंडे तु धृत्वा वनचरो भवेत् ॥
वन्याहारो वसेतत्र वारमेकं मिताशनः । सम्यक्संध्यामुपासीत त्रिकालं स्नानमाचरेत् ॥
अध्ययनाध्यापनादून्वर्जयेत्संस्मरेद्धरिम् । ब्रह्मचारी भवेन्नित्यं गंधमाल्यादि वर्जयेत् ॥
तीर्थान्यनुवसेच्चैव पुण्याश्चावाश्रमांस्तथा । यदि वन्यैर्न जीवेत ग्रामे भिक्षां समाचरेत् ॥
द्वादशाब्दं व्रतं कुर्यादेवं हरिपरायणः । ब्रह्महा शुद्धिमाप्नोति कर्मार्हश्चैव जायते ॥
व्रतमध्ये मृगैर्वापि रोगैर्वापि निषूदितः । गोनिमित्तं द्विजार्थं वा प्राणान्वापि परित्यजेत् ॥
यद्वा दद्याद्द्विजेंद्राणां गवामयुतमुत्तसम् । एतेष्वन्यतमं कृत्वा ब्रह्महा शुद्धिमान्पुयात् ॥
दीक्षितं क्षत्रियं हत्वा चरेद्धि ब्रह्महव्रतम् । अग्निप्रवेशनं वापि मरुत्प्रपतनं तथा ॥
दीक्षीतं ब्राह्मणं हत्वा द्विगुणं व्रतमाचरेत् । आचार्यादिवधे चैव व्रतमुक्तं चतुर्गुणम् ॥
हत्वा तु विप्रमात्रं च चरेत्संवत्सरं व्रतम् । एवं विप्रस्य गदितः प्रायश्चित्तविधिर्द्विज ॥
द्विगुणं क्षत्रियस्योक्तं त्रिगुणं तु विशः स्मृतम् । ब्राह्मणं हंति यः शूद्रस्तं मुशल्यं विर्दुर्बुधाः ॥
राज्ञैव शिक्षा कर्तव्या इति शास्त्रेषु निश्चयः । ब्राह्मणीनां वधे त्वर्द्धं पादः स्यात्कन्यकावधे ॥
हत्वा त्वनुपनीतांश्च तथा पादव्रतं चरेत् । हत्वा तु क्षत्रियं विप्रः षडब्दं कुच्छ्रमाचरेत् ॥
संवत्सरं त्रयं वेश्यं शूर्द्रं हत्वा तु वत्सरम् । दीक्षितस्य स्त्रियं हत्वा ब्राह्मणी चाष्टवत्सरान् ॥
ब्रह्महत्याव्रतं कृत्वा शुद्धो भवति निश्चितम् । प्रायश्चित्तं विधानं तु सर्वत्र मुनिसत्तम ॥
वृद्धातुरस्त्रीबालानामर्द्धमुक्तं मनीषिभिः । गौडी पैष्टी च माध्वी च विज्ञेया त्रिविधा सुरा ॥
चातुर्वर्ण्यारपेया स्यात्तथा स्त्रीभिश्च नारद । क्षीरं घृतं वा गोमूत्रमेतेष्वन्यतमं मुने ॥
स्नात्वर्द्रवासा नियतो नारायणमनुस्मरन् । पक्वायसनिभं कृत्वा पिबेज्चैवोदकं ततः ॥
तत्तु लौहेन पात्रेण ह्यायसेनाथवा पिबेत् । ताम्रेण वाथं पात्रेण तत्पीत्वा मरणं व्रजेत् ॥
सुरापी शुद्धिमाप्नोति नान्यथा शुद्धिरिष्यते । अज्ञानादात्मबुद्ध्या तु सुरां पीत्वा द्विजश्चरेत् ॥
ब्रह्महत्याव्रतं सम्यक्तच्चिह्नपरिवर्जितः । यदि रोगानिवृत्त्यर्थमौषधार्थं सुरां पिबेत् ॥
तस्योपनयनं भूयस्तथा चांद्रायणद्वयम् । सुरासंस्पृष्टपात्रं तु सुराभांडोदकं तथा ॥
सुरापानसमं प्राहुस्तथा चन्द्रस्य भक्षणम् । तालं च पानसं चैव द्राक्षं खार्जूरसंभवम् ॥
माधुक शैलमारिष्टं मैरेयं नालिकेरजम् । गौडी माध्वी सुरा मद्यमेवमेकादश स्मृताः ॥
एतेष्वन्यतमं विप्रो न पिबेद्वै कदाचन । एतेष्वन्यतमं यस्तु पिबेदज्ञानतो द्विजः ॥
तस्योपनयनं भूयस्तप्तकृच्छ्रं चरेत्तथा । समक्षं वा परोक्षं वा बलाच्चौर्येण वा तथा ॥
परस्वानामुपादानं स्तेयमित्युच्यते बुधैः । सुवर्णस्य प्रमाणं तु मन्वाद्यैः परिभाषितम् ॥
वक्ष्ये श्रृणुष्व विप्रेंद्र प्रायश्चित्तोक्तिसाधनम् । गवाक्षागतमार्तण्डरश्मिमध्ये प्रदृश्यते ॥
त्रसरेणुप्रमाणं तु रज इत्युच्यते बुधैः । त्रसरेण्वष्टकं निष्कस्तत्रयं राजसर्षपः ॥
गौरसर्षपस्तत्त्रयं स्यात्तत्षट्कं यव उच्यते । यवत्रयं कृष्णलः स्यान्माषस्तत्पंचकं स्मृतः ॥
माषषोडषमानं स्यात्सुवर्णमिति नारद । हत्वा ब्रह्मस्वमज्ञानाद्द्वादशाब्दं तु पूर्ववत् ॥
कपालध्वजहीनं तु ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् । गुरुणां यज्ञकतॄणां धार्मिष्ठानां तथैव च ॥
श्रोत्रियाणां द्विजानां तु हृत्वा हेमैवमाचरेत् । कृतानुतापो देहे च संपूर्णे लेपयेद्घृतम् ॥
करीषच्छादितो दग्धः स्तेयपापाद्विमुच्यते । ब्रह्मस्वं क्षत्रियो हृत्वा पश्चात्तापमवाप्य च ॥
पुनर्ददाति तत्रैव तद्विधानं श्रृणुष्व मे । तत्र सांतपनं कृत्वा द्वादशाहोपवासतः ॥
शुद्धिमाप्नोति देवर्षे ह्यन्यथा पतितो भवेत् । रत्नासनमनुष्यस्त्रीधेनुभूम्यादिकेषु च ॥
सुवर्णसहृशेष्वेषु प्रायश्चितार्द्धमुच्यते । त्रसरेणुसमं हेम हृत्वा कुर्यात्समाहितः ॥
प्राणायामद्वयं सम्यक्तेन शुद्धच्चति मानवः । प्राणायामत्रयं कुर्याद्धृत्वा निष्कप्रमाणकम् ॥
प्राणायामाश्च चत्वारो राजसर्षपमात्रके । गौरसर्षपमानं तु हृत्वा हेम विचक्षणः ॥
स्नात्वा च विधिवज्जप्याद्गायत्र्यष्टसहस्रकम् । यवमात्रसुवर्णस्य स्तेयाच्छुद्धो भवेद्दिजः ॥
आसायं प्रातरारभ्य जप्त्वा वै वेदमातरम् । हेम कृष्णलमात्रं तु हृत्वा सांतपनं चरेत् ॥
माषप्रमाणे हेम्नस्तु प्रायश्चित्तं निगद्यते । गोमूत्रपक्वयवभुग्वर्षेणैकेन शुद्ध्यति ॥
संपूर्णस्य सुवर्णस्य स्तेयं कृत्वा मुनीश्वर । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्द्वादशाब्दं समाहितः ॥
सुवर्णमानान्न्यूने तु रजतस्तेयकर्मणि । कुर्यात्सांतपनं सम्यगन्यथा पतितो भवेत् ॥
दशनिष्कांतपर्यंतमूर्द्ध्वं निष्कचतुष्टयात् । हत्वा च रजतं विद्वान्कुर्याच्चांद्रायणं मुने॥
दशादिशतिष्कांतं यः स्तेयी रजतस्य तु । चांद्रायणद्वयं तस्य प्रोक्तं पापविशोधकम् ॥
शतादूर्द्ध्वं सहस्रांतं प्रोक्तं चांद्रायणत्रयम् । सहस्रादधिकस्तेये ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् ॥
कांस्यपित्तलमुख्येषु ह्ययस्कांते तथैव च । सहस्रनिष्कमाने तु पराकं परिकीर्तितम् ॥
प्रायश्चित्तं तु रत्नानां स्तेये राजतवत्स्मृतम् । गुरुतल्पगतानां च प्रायश्चित्तमुदीर्यते ॥
अज्ञानान्मातरं गत्वा तत्सपत्नीमथापि वा । स्वयमेव स्वमुष्कं तु च्छिंद्यात्पापमुदीरयन् ॥
हस्ते गृहीत्वा मुष्कं तु गच्छंद्वै नैर्ऋतीं दिशम् । गच्छन्मार्गै सुखं दुःखं न कदाचिद्विचारयेत् ॥
अपश्यन्गच्छतो गच्छेत्प्राणान्तं यः स शुद्ध्यति । मरुत्प्रपतनं वापि कुर्यात्पापमुदाहरन् ॥
स्ववर्णोत्तमवर्णस्त्रीगमने त्वविचारतः । ब्राह्महत्याव्रतं कुर्याद्वादशाब्दं समाहितः ॥
अमत्याभ्यासतो गच्छेत्सवर्णां चोत्तमां तथा । कारीषवह्निना दग्धः शुद्धिं याति द्विजोत्तम ॥
रेतःसेकात्पूर्वमेव निवृत्तो यदि मातरि । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्रेतः सेकेऽग्निदाहनम् ॥
सवर्णोत्तमवर्णासु निवृत्तो वीर्यसेचनात् । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्यान्नवाब्दान्विष्णुतत्परः ॥
वैश्यायां पितृपत्न्यां तु षडब्दं व्रतमाचरेत् । गत्वा शूद्रां गुरोर्भार्यां त्रिवर्षं व्रतमाचरेत् ॥
मातृष्वसारं च पितृष्वसारमाचार्यभार्यां श्वशुरस्य पत्नीम् ।
पितृव्यभार्यामथ मातुलानीं पुत्रीं च गच्छेद्यदि काममुग्धः ॥
दिनद्वये ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्यथाविधि । एकस्मिन्नेव दिवसे बहुवारं त्रिवार्षिकम् ॥
एकवारं गते ह्यब्दंव्रतं कृत्वा विशुद्ध्यति । दिनत्रये गते वह्निर्दग्धः शुध्येत नान्यथा ॥
चांजालीं पुष्कसीं चैव स्नुषां च भगिनीं तथा । मित्रस्त्रियं शिष्यपत्नीं यस्तु वै कामतो व्रजेत् ॥
ब्रह्महत्याव्रतं कुर्यात्स षडब्दं मुनीश्वर । अकामतो व्रजेद्यस्तु सोऽब्दकृच्छ्रं समाचरेत् ॥
महापातकिसंसर्गे प्रायश्चित्तं निगद्यते । प्रायश्चित्तविशुद्धात्मा सर्वकर्मफलं लभेत् ॥
यस्य येन भवेत्संगो ब्रह्महादिचतुर्ष्वपि । तत्तद्व्रतं स निवृत्य शुद्धिमान्पोत्यसंशयम् ॥
अज्ञानात्पंचरात्रं तु संगमेभिः करोतियः । कायकृच्छ्रं चरेत्सम्यगन्यथा पतितो भवेत् ॥
द्वादशाहेतु संसर्गे महासांतपनं स्मृतम् । संगंकृत्वार्द्धमासं तु द्वादशाहमुपावसेत् ॥
पराको माससंसर्गे चांद्रमासत्रयेस्मृतम् । कृत्वा संगं तु षण्मासं चरेच्चांद्रायणद्वयम् ॥
किंचिन्न्यूनाब्दसंगे तु षण्मासव्रतमाचरेत् । एतच्च त्रिगुणं प्रोक्तं ज्ञानात्संगे यथाक्रमम् ॥
मंडूकं नकुलं काकं वराहं मूषकं तथा । मार्जाराजाविकं श्वानं हत्वा कुक्कुटकं तथा ॥
कृच्छ्रार्द्धमाचरेद्विप्रोऽतिकृच्छ्रं चाश्वह चरेत् । जतप्तकृच्छ्रं करिवधे पराकं गोवधे स्मृतम् ॥
कामतो गोवधे नैव शुद्धिर्द्दष्टा मनीषिभिः । पानशय्यासनाद्येषु पुष्पमूलफलेषु च ॥
भक्ष्यभोज्यापहारेषु पंचगव्यविशोधनम् । शुष्ककाष्ठतृणानां च द्रुमाणां च गुडस्य च ॥
चर्मवस्त्रामिषाणां च त्रिरात्रं स्यादभोजनम् । टिट्टिभं चक्रवाकं च हंसं कारंडवं तथा ॥
उलूकं सारसं चैव कपोतं जलपादकम् । शुकं चाषं बलाकं च शिशुमारं च कच्छपम् ॥
एतेष्वन्यतमं हत्वा द्वादशाहमभोजनम् । प्राजापत्यव्रतं कुर्याद्रेतोविण्मूत्रभोजने ॥
चांद्रायणत्रयं प्रोक्तं शूद्रोच्छिष्टस्य भोजने । रजस्वलां च चांडालं महापातकिनं तथा ॥
सूतिकां पतितं चैव उच्छिष्टं रजकादिकम् । स्पृष्ट्वा सचैलं स्नायीत घृतं संप्राशेयत्तथा ॥
गायत्रीं च विशुद्धात्मा जपेदष्टशतं द्विज । एतेष्वन्यतमं स्पृष्ट्वा अज्ञानाद्यदि भोजने ॥
त्रिरात्रो पोषणाच्छुद्ध्येत्पंचगव्याशनाद्विज । स्नानदानजपादौ च भोजनादौ च नारद ॥
एषामन्यतमस्यापि शब्दं यः श्रृणुयाद्वदेत् । उद्वमेद्भुक्तमंन्नतत्स्नात्वा चोपवसेत्तथा ॥
द्वितीयेऽह्नि घृतं प्राश्य शुद्धिमाप्नोति नारद । व्रतादिमध्ये यद्येषा श्रृणुयाद्धूनिमप्युत ॥
अष्टोत्तरसहस्रं तु जपेद्वै वेदमातरम् । पापानामधिकं पापं द्विजदैवतनिंदनम् ॥
न दृष्ट्वा निष्कृतिस्तस्य सर्वशास्त्रेषु नारद । महापातकतुल्यानि यानि प्रोक्तानि सूरिभिः ॥
प्रायश्चित्तं तु तेषां च कुर्यादेवं यथाविधि । प्रायश्चित्तानि यः कुर्यान्नारायणपरायणः ॥
तस्य पापानि नश्यंतिह्यन्यथा पतितो भवेत् । यस्तु रागादिनिर्मुक्तो ह्यनुतापसमन्वितः ॥
सर्वभूतदयायुक्तो विष्णुस्मरणतत्परः । महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः ॥
विमुक्त एव पापेभ्यो ज्ञेयो विष्णुपरो यतः । नारायणमनाद्यंतं विश्वाकारमनामयम् ॥
यस्तु संस्मरते मर्त्यः स मुक्तः पापकोटिभिः । स्मृतो वा पूजितो वापि ध्यातः प्रणमितोऽपि वा ॥
नाशयत्येव पापानि विष्णुर्हृद्गमनः सताम् । संपर्काद्यदि वा मोहाद्यस्तु पूजयते हरिम् ॥
सर्वपापविनिर्मुक्तः स प्रयाति हरेः पदम् । सकृत्संस्मरणाद्विष्णोर्नश्यंति क्लेशसंचयाः ॥
नारदपुराण/पूर्वार्ध/३०/२ – ९७
| विषय / पाप | स्मृति प्रमाण | प्रायश्चित्त विधान |
| अभक्ष्य भक्षण / अशुद्ध जल | अंगिरा / अत्रि | सांतपन कृच्छ्र, प्राजापत्य या पञ्चगव्य पान। |
| म्लेच्छ संसर्ग / म्लेच्छ अन्न | देवल स्मृति | पराक व्रत (१२ दिन उपवास) या चान्द्रायण। |
| नीली (नील) वस्त्र धारण | अंगिरा स्मृति | अहोरात्र उपवास और पञ्चगव्य से शुद्धि। |
| संध्यावंदन का लोप | दक्ष स्मृति | बिना संध्या के कर्म निष्फल; पुन: संस्कार आवश्यक। |
| अज्ञानवश किया पाप | पराशर / अंगिरा | पश्चाताप, गायत्री जप और विद्वत परिषद से मार्गदर्शन। |
पाप का प्रायश्चित्त
“पश्चाताप ही पाप की सर्वश्रेष्ठ अग्नि है।”
यह स्पष्ट हो जाता है कि हम सभी पापाचार में तो आकण्ठ डूबे हुये हैं और प्रायश्चित्त कर नहीं सकते। अब आत्मकल्याण का मार्ग कैसे खुले ?
यहीं पर हमें ईश्वरकृपा की आवश्यकता है, हम पापाचरण से विरक्त होकर ईश्वर से कृपा की याचना कर सकते हैं, प्रार्थना कर सकते हैं कि हमारे पापों का नाश करें। यहां आकर “कलयुग केवल नाम अधारा” का मार्ग शेष बचता है और फिर हमें नामजप से पापमुक्ति के प्रयास की प्रेरणा प्राप्त होती है किन्तु यह अनिवार्य है कि हम प्रथम पापाचरण से मुक्त हो जायें अन्यथा यह भी नामापराध की ही श्रेणी में सम्मिलित हो जायेगा। नाम माहात्म्य के ढेरो प्रमाण हैं जो भिन्न आलेख में प्रकाशित किये जायेंगे यहां कुछ प्रमुख श्लोक दिये जा रहे हैं :

श्रीशिवाय नमस्तुभ्यं मुखं व्याहरते यदा । तन्मुखं पावनं तीर्थं सर्वपापविनाशनम् ॥
शिवपुराणम्/संहिता १ (विश्वेश्वरसंहिता)/२३/७
शिवेति च शिवं नाम यस्य वाचि प्रवर्त्तते । कोटिजन्मार्जितं पापं तस्य नश्यति निश्चितम् ॥
ब्रह्मवैवर्तपुराण/खण्डः १ (ब्रह्मखण्डः)/६/५३
शिवेति मंगलं नाम यस्य वाचि प्रवर्तते । भस्मीभवंति तस्याशु महापातककोटयः ॥
पद्मपुराण/खण्डः ५ (पातालखण्डः)/१०९/७८
कृष्णेति मङ्गलं नाम यस्य वाचि प्रवर्तते । भस्मीभवन्ति सद्यस्तु महापातककोटयः ॥
ब्रह्मवैवर्तपुराण/खण्डः ४ (श्रीकृष्णजन्मखण्डः)/१११/३८
येन संकीर्तितं राजन्हरिरित्यक्षरद्वयम् । बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति ॥
विष्णुधर्मोत्तरपुराण/१/१५६/४४
सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्। बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति ।
गरुडपुराण/२/३८/७, १/११४/३, गर्गसंहिता/१०/६१/३९, पद्मपुराण/६/८०/१६१
स्कन्दपुराण/खण्डः २ (वैष्णवखण्डः)/मार्गशीर्षमासमाहात्म्यम्/१५/५२
लक्ष्मीनारायणसंहिता/खण्डः १ (कृतयुगसन्तानः)/५५०/९१, ३/५६/८६
“कलियुग में कठिन तप नहीं, अपितु ‘हरि नाम’ ही पाप-मुक्ति का आधार है।”
नाम जप से प्रायश्चित्त का तात्पर्य यह नहीं लेना चाहिये कि प्रायश्चित्त विधान का औचित्त्य ही नहीं है। मान लीजिये आपने आत्मकल्याण मार्ग पर चलना आरम्भ कर दिया, ईश्वर की कृपा हो गयी और सन्मार्ग पर आ गये तो क्या आगे पाप नहीं होंगे ? आगे भी पाप होंगे एवं फिर प्रायश्चित्त से कल्याण होगा। दूसरी बात यदि प्रायश्चित्त का ज्ञान नहीं होगा तो अपनी नारकीयता का बोध कैसे होगा, अहंकार कैसे मिटेगा, दीनता-हीनता का भाव कैसे आयेगा ? और यदि यह नहीं हो तो फिर ईश्वर की कृपा कैसे मिलेगी और यदि ईश्वर की कृपा प्राप्त न हो तो संत कैसे मिलेंगे और यदि संत नहीं मिलेंगे तो इसका क्या औचित्य रहेगा : “बड़े भाग पाइब सत्संगा, बिनहिं प्रयास होइ भवभंगा”
प्रायश्चित्त का ज्ञान होने पर ही असमर्थता, अक्षमता आदि का बोध होगा जिससे पश्चाताप, आत्मग्लानि होगी और ईश्वर की शरणागति कर सकेंगे, अन्यथा तो व्यापार मात्र कर रहे हैं।
निष्कर्ष : आत्मकल्याण का सप्त-पोषक मार्ग
“जैसे प्रज्वलित अग्नि गीली लकड़ियों को भी जला देती है, वैसे ही वेदज्ञ और नाम-जप करने वाला अपने कर्मजन्य दोषों को भस्म कर देता है।”
आलेख के अनुसार, कलयुग में शुद्धि का व्यावहारिक मार्ग इस प्रकार है:
- लक्ष्य निर्धारण: सांसारिक कामनाओं का परित्याग करके सांसारिक यशादि के स्थान पर आत्मकल्याण को प्रधानता।
- आत्म-समीक्षा: प्रतिदिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा देखना।
- पश्चाताप (Remorse): पाप की स्मृति होने पर मन में ग्लानि होना, जो शुद्धि की पहली सीढ़ी है।
- अहंकार निवृत्ति: यह समझना कि हम दोषों से भरे हैं, जिससे अहंकार स्वतः शांत होता है।
- दीनता का भाव: ईश्वर के सम्मुख अपनी असमर्थता स्वीकार करना।
- हरि कृपा की याचना: स्वयं के प्रयास जब थक जाएं, तब ईश्वर की शरण।
- सत्संग: वास्तविक संतों की पहचान और उनका सानिध्य।
यह आलेख यह सिद्ध करता है कि प्रायश्चित्त का मार्ग ‘भय’ का नहीं, बल्कि ‘सुधार’ का मार्ग है। वर्तमान युग में यदि हम शास्त्रोक्त कठोर तप नहीं कर सकते, तो कम से कम सत्य का आश्रय, पापों से विरक्ति और निरंतर भगवन्नाम जप के द्वारा अपनी आत्मा को पतित होने से बचा सकते हैं।
प्रायश्चित्त का मूल उद्देश्य दंड नहीं, बल्कि ‘चित्त-शुद्धि’ है। यद्यपि वर्तमान युग (कलयुग) में शास्त्रों में वर्णित कठिन तप और चान्द्रायण व्रत सामान्य मनुष्य के लिए दुष्कर हैं, तथापि पापों के प्रति ‘अनुताप’ (ग्लानि) और ‘स्वीकारोक्ति’ ही शुद्धि की पहली सीढ़ी है। यह आलेख सिद्ध करता है कि कर्मकांड की सफलता के लिए देह और अन्न की शुद्धि अनिवार्य है। जब शारीरिक प्रायश्चित्त असंभव प्रतीत हो, तब ‘दीनता’ का भाव और ‘भगवन्नाम संकीर्तन’ ही वह अमोघ औषधि है जो करोड़ों जन्मों के संचित पापों को भस्म करने की शक्ति रखती है।
F&Q :
FAQ
प्रश्न : प्रायश्चित्त क्या है?
उत्तर : पापों के निवारण और आत्म-शुद्धि के लिए शास्त्रों द्वारा बताए गए विधान।
प्रश्न : म्लेच्छ अन्न खाने पर क्या करें?
उत्तर : स्मृति के अनुसार चान्द्रायण या पराक व्रत का विधान है।
प्रश्न : अनजाने में हुए पाप का क्या दंड है?
उत्तर : अनुताप और प्रायश्चित्त का आधा भाग।
प्रश्न : म्लेच्छाचार क्या है?
उत्तर : शास्त्र-विरुद्ध आचरण, अभक्ष्य भक्षण और अमर्यादित जीवन।
प्रश्न : क्या प्रायश्चित्त का ज्ञान सबको होना चाहिए?
उत्तर : हाँ, ताकि अहंकार नष्ट हो और दीनता आए।
प्रश्न : आत्मग्लानि कैसे करें ?
उत्तर : आत्मग्लानि होने के लिये यह आवश्यक है कि अपने पापाचरण का स्मरण करके उनके प्रायश्चित्तों को जानें। इससे यह स्पष्ट हो जायेगा कि आजन्म नहीं कर सकते और स्वतः आत्मग्लानि होने लगेगी, स्वतः पश्चाताप करने लगेंगे। फिर अहंकार नष्ट होगा और दीनता-हीनता का भाव जगेगा जहां से आगे का मार्ग खुलेगा।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








