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क्या स्वतंत्रता असीमित है ?

क्या स्वतंत्रता असीमित है ? क्या स्वतंत्रता असीमित है ?

“परिवार और समाज बंधन नहीं, बल्कि व्यक्ति के अस्तित्व का सुरक्षा कवच हैं।”

संविधान, कानून आदि को लेकर स्वतंत्रता-स्वतंत्रता का राग इतना अलापा जाता है कि इस पर विचार करना आवश्यक है “क्या स्वतंत्रता असीमित है ?” क्योंकि कोई विवाह करने में स्वतंत्रता की ओट लेता है तो कोई दुराचार में और उसे न्यायपालिका उचित भी सिद्ध कर देती है इसलिये यह बहुत ही गंभीर विषय है। देश कहां जा रहा है, क्यों जा रहा है, क्या पायेगा आदि गंभीर प्रश्न उत्पन्न होते हैं।

क्या स्वतंत्रता असीमित है ?

“नदी की स्वतंत्रता उसके तटों में है, तट टूटते ही वह बाढ़ बनकर विनाश करती है।”

पूर्व पीढ़ी और वर्त्तमान में उपस्थित वृद्ध पीढ़ी ने भी कभी अपने परिवार-समाज को स्वतंत्रता रूपी चुनौती नहीं दिया था किन्तु संविधान में तो तब भी स्वतंत्रता लिखी थी, अभी भी लिखी है किन्तु नई पीढ़ी के वो विशेष बच्चे ही स्वतंत्रता-स्वतंत्रता चिल्लाते हैं जिनका पालन-पोषण नगरों में हुआ, किसी विशेष यूनिवर्सिटी में उच्च शिक्षा प्राप्त किये या अध्ययनरत हों।

सबसे बड़ा लक्षण यह है कि वो नास्तिक अथवा लगभग समकक्ष ही होते हैं और आधुनिकता, प्रगतिशीलता व वैज्ञानिकता का भी मनगढंत प्रदर्शन/पाखंड करते रहते हैं। गांव के भी बच्चे यदि उन्हीं संस्थानों में अध्ययन करने जाते हैं तो भी वो इस पाखंड को नहीं स्वीकारते, कुछ अपवादों को छोड़कर। किन्तु गांव के बच्चे भी शिखा-यज्ञोपवीत-चूड़ी-मंगलसूत्रादि का त्याग तो कर देते हैं शेष में शेष इतना रहता है कि पूर्व पीढ़ी के कारण पूर्ण स्वतंत्र (असीमित स्वतंत्र) नहीं होते और विवाहादि में परिवार का ही अनुकरण करते हैं।

स्वतंत्रता
स्वतंत्रता

एक सुनियोजित षड्यंत्र

समस्या भी यही है शासन तंत्र विदेशी प्रभाव के कारण सांस्कृतिक पहचान को मिटाने का प्रयास कर रहा है किन्तु यदि बच्चे परिवार-समाज का अनुकरण करते ही रहें तो ऐसा नहीं हो पाता। सांस्कृतिक पहचान मिटाने का तात्पर्य है वर्ण/जाति व्यवस्था को नष्ट करने का कुप्रयास करना। इन मूर्खों के मस्तिष्क में विदेशी विचारधारा ने अपना स्थान बना लिया है अथवा प्रलोभनादि से अपना कार्य करा रहे हैं और ये लोग कर रहे हैं।

जब ये धूर्त लोग यह कहते हैं कि भेद-भाव, जातिव्यवस्था था नहीं, अंग्रेजों का बनाया हुआ है तो भी ये अंग्रेजों का विरोध नहीं कर रहे होते हैं अपितु अपनी संस्कृति का ही अपमान कर रहे होते हैं। अरे जातिव्यवस्था रामायण काल में भी थी, महाभारत काल में भी थी तो अंग्रेजों ने कैसे बनाया ? जातिव्यवस्था शास्त्रों में भी वर्णित है, समाज में है भी तो अंग्रेजों ने कैसे बनाया ? अर्थात तुम्हारी ये पंक्तियां अंग्रेजों के विरुद्ध नहीं अपितु अपने ही शास्त्रों के विरुद्ध होती हैं, अपनी ही संस्कृति के विरुद्ध होती हैं।

जातिव्यवस्था मिटाने का इनको एक ही मार्ग मिला वो है अंतर्जातीय विवाह और ये शासनतंत्र में बैठे लोग कितने धूर्त हैं कि यदि धर्म-संस्कृति की बात करते भी हैं तो भी अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित कर रहे हैं अर्थात वर्णसंकरता को बढ़ा रहे हैं। जब ये वर्णसंकरता को बढ़ा रहे हैं तो किस धर्म और किस संस्कृति की बात करते हैं, यह समझ ही नहीं आता और एक बड़ा जनसमूह इन्हें धर्म के साथ कैसे समझ लेती है ?

अंतर्जातीय विवाह कौन करेगा ?
नई पीढ़ी के बच्चे।
कैसे करेगा ?
जब वह परिवार और समाज से स्वतंत्र हो जायेगा।
परिवार और समाज से स्वतंत्र कैसे होगा ?
जब उसे दुराचारी बनाकर अथवा प्रलोभनादि से दिग्भ्रमित कर देंगे।

सुनियोजित षड्यंत्र

अब देखिये वर्त्तमान पीढ़ी के कुछ बच्चे यदि स्वतंत्रता-स्वतंत्रता चिल्ला रहे हैं तो क्यों ? पूरा का पूरा सुनियोजित षड्यंत्र स्पष्ट हो रहा है और शासन तंत्र व राजनीति है कि इसको संरक्षित कर रही है, प्रोत्साहित कर रही है। आपने नई पीढ़ी के कुछ बच्चों के मुंह से अपने परिवार-समाज में सुना हो अथवा न सुना हो किन्तु समाचार और सोशल मीडिया के माध्यम से अवश्य ही सुना होगा :

  • संविधान हमें अपनी मर्जी से जीने की स्वतंत्रता प्रदान करता है, हमें क्या खाना है, क्या पहनना है, कैसे जीना है बताने वाले ये लोग (कथावाचक/समाज आदि) कौन होते हैं ?
  • संविधान हमें अपनी मर्जी से जीने की स्वतंत्रता प्रदान करता है, हम अपनी मर्जी से विवाह करेंगे। (अकथित घोषणा : परिवार-समाज आदि को कोई अधिकार नहीं है, और उनको कोई अधिकार नहीं है)
  • माय बॉडी माय च्वाइस तो एक नारा सा बनता जा रहा है। (अधिकांशतः लिवइन में रहने वाले दुराचारी जोड़े इस प्रकार का कुतर्क करते हैं)

मीडिया की भूमिका

यहां इन बच्चों का दोष कहीं से नहीं है तथापि ये सड़े फल के समान ही होते हैं जो अन्य फलों में भी सड़न उत्पन्न करने वाले होते हैं। मीडिया और सोशलमीडिया भी इसमें निर्दोष नहीं है अपितु इस षड्यंत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती है।

मीडिया उसे नहीं दिखायेगी जो धर्म/संस्कृति आदि के पालन की बात करता हो, मर्यादाओं के पालन की बात करता हो, अपितु मिडिया भी उसे ही प्रचारित-प्रसारित करती है जो सड़े फल के समान दुर्गन्ध प्रसारित कर रहे हैं। अर्थात राजनीति, शासन तंत्र, शिक्षण संस्थानों की तरह ही मीडिया भी इस सुनियोजित षडयंत्र में अपनी बड़ी भूमिका का दक्षतापूर्वक निर्वहन करती है।

इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति को सब मिलकर नष्ट-भ्रष्ट करने का कुचक्र करते हैं और धर्म-संस्कृति आदि चिल्लाकर जनमानस को मूर्ख भी बनाते हैं। वास्तव में ये सबके-सब भले ही कहने के लिये एक स्वतंत्र देश को चला रहे हैं किन्तु ये स्वयं ही मानसिक रूप से परतंत्र हैं और वही सब कार्य करते हैं जो औपनिवेशिक विचारधारा के लोग (वर्त्तमान में डीप स्टेट नाम से प्रचलित) चाहते हैं। इसके पीछे प्रलोभन होता है अथवा कुछ और यह तो जांच का विषय है। राज्य के तीनों अंग हों अथवा मीडिया हो, शिक्षण संस्थान हों अथवा व्यापार जगत सब मिलकर इस दिशा में ही देश को आगे ले जाने का प्रयास कर रहे हैं।

व्यापार जगत की भूमिका

व्यापार जगत की बात नहीं की गई है किन्तु व्यापार जगत की भूमिका इस प्रकार है कि यदि लोग सांस्कृतिक निष्ठा पूर्वक जीवनयापन करें तो व्यापार जगत भी मनमानी नहीं कर सकेगा क्योंकि लोग फैशन, सुविधाजनक जीवनशैली आदि का त्याग कर देंगे। लोग फैशन, सुविधाजनक जीवनशैली आदि से तभी जुड़ते हैं जब वो अपनी सांस्कृतिक निष्ठा से दूर होते हैं। यदि सांस्कृतिक निष्ठा हो तो जीवनशैली सात्विक होता है किन्तु व्यापार जगत तब फूलता-फलता है जब लोगों की जीवनशैली राजसी या तामसी हो। इस कारण व्यापार जगत भी लोगों का राजसी और तामसी जीवन ही चाहता है सात्विक नहीं।

एक धनाढ्य व्यक्ति मंदिर भी फूल-जल आदि लेकर नहीं जाता है भले ही बड़ी सुरक्षा लेकर जाता हो, शेष सभी व्यवस्था पैसों से हो जाती है। ये सुविधाभोगी बनना ही राजसी जीवन है और वहां उपलब्ध सामग्रियां अशुद्ध होती है यही तामसी है, भोजनादि में तामसी ही तामसी वस्तुयें उपलब्ध होते हैं। अरे पीने वाला पानी भी कहने के लिये तो परिष्कृत आदि हो सकता है किन्तु आध्यात्मिक विचार से वह भी तामसी होता है/अपेय होता है, अन्य खाद्य पदार्थों की तो बात ही क्या करें।

सूत्र को समझें : दुराचार बढ़ेगा तो सौंदर्य प्रसाधनों का अधिकाधिक प्रयोग होगा, गर्भनिरोधक का प्रयोग होगा, गर्भपात होगा, होटल, पर्यटन आदि का व्यापार बढ़ेगा, परिवार टूटेगा और गृहोपयोगी सामग्रियों का व्यापार बढ़ेगा, शादी-तलाक का खेल होगा तो उससे भी व्यापार बढ़ेगा एवं न्यायव्यवस्था से संबंधित लोगों की भी आय होगी व और भी बहुत कुछ मिलेगा आदि-इत्यादि।

उपभोक्तावाद का यह दुश्चक्र और फले-फूले इसके लिये यह आवश्यक है कि लोग अपनी संस्कृति से दूर होते जायें, भोगवादी बनते जायें, जिस दिन सांस्कृतिक जागरण हो जायेगा उस दिन व्यापार जगत में त्राहिमाम मच जायेगा।

किन्तु इतनी चर्चा के पश्चात् भी हम यह स्पष्ट कर दें कि आगे की चर्चा इनके शोधन की नहीं अपितु स्वतंत्रता के असीमित होने अथवा न होने वाले प्रश्न की है। शोधन तो लोकतंत्र समापन के बिना संभव नहीं है। लोकतंत्र का अंत और राजतंत्र की स्थापना सवर्णों का ही विचार हो सकता है और उसका मस्तिष्क ब्राह्मण है इस कारण देशभर में ब्राह्मणों का सुनियोजित विरोध किया जा रहा है। सवर्णों के अतिरिक्त अन्य जो भी है वो संविधान से आगे की सोच ही नहीं सकता।

किन्तु पूरा विश्व और डीप स्टेट भी यह समझ रहा है कि भारत में तो लोकतंत्र का समापन अवश्य ही होगा, राजतन्त्र की पुनर्स्थापना अवश्य होगी, यदि जातिव्यवस्था-आध्यात्मिक चेतना बची रहे। किन्तु आलेख की वो दिशा नहीं है अस्तु हम अपनी दिशा में ही आगे बढ़ते हैं।

स्वतंत्रता असीमित नहीं है

स्वतंत्रता असीमित नहीं है अपितु जनमानस को दिग्भ्रमित किया जा रहा है। ये स्वतंत्रता का राग अलापने वाले बौद्धिक रूप से जड़ हैं और इनका उपयोग सनातनद्रोही सफलतापूर्वक कर रहे हैं।

एक स्कूल का बच्चा स्वतंत्र नहीं होता, स्कूल ही निर्धारित करता है कब आना है, कब मध्यावकाश होगा, कब छुट्टी होगी, क्या पहनना है, क्या पढ़ना है, कैसे बात करनी है, वर्ग में कहां बैठना है, कब खड़ा होना है, कब बैठना है, कब पूछना है यहां तक कि कैसा दिखना है आदि।

इसी प्रकार कोई भी संस्था-संगठन हो उससे संबंधित सदस्य व सेवारत कर्मचारी भी स्वतंत्र नहीं होते अपितु अपने संस्थान/संगठन के अधीन होते हैं, अधीनता स्वीकार किये बिना वो जुड़ ही नहीं सकते, नौकरी कर ही नहीं सकते।

इसी प्रकार व्यापार करने वाले या छोटी से दुकान खोलने वाला भी स्वतंत्र नहीं होता उसे भी बाजार की अधीनता स्वीकार करनी ही होती है। किसी को कहीं भी स्वतंत्रता नहीं चाहिये केवल परिवार और समाज से स्वतंत्रता चाहिये।

सोचने का, चिंतन करने का विषय है अथवा नहीं कि आखिर परिवार/समाज से ही स्वतंत्रता क्यों चाहिये ?

संविधान स्वतंत्रता देती है तो स्कूल में विद्यार्थी और शिक्षक स्वतंत्र क्यों नहीं होते, स्वतंत्रता ही चाहिये तो छोटे-से-छोटा कर्मचारी से लेकर राष्ट्रपति तक क्यों स्वतंत्र नहीं होते हैं। राष्ट्रपति भी जब जो मन करे नहीं कर सकते, जहां मन करे नहीं जा सकते। अर्थात वो स्वतंत्रता जो नई पीढ़ी के बच्चे चिल्लाया करते हैं वो तो राष्ट्रपति को भी नहीं मिलती है।

क्या आपको लगता है कि राष्ट्रपति जो मन करे कपड़ा पहा सकते हैं ? नहीं पहन सकते यदि ऐसा हो तो जब बिना कपड़े के घूमने का मन हो तो वैसी भी स्वतंत्रता होगी क्या ये स्वतंत्रता हो सकती है।

क्या संविधान ये स्वतंत्रता देती है ?

वास्तविकता ये स्वतंत्रता और स्वेच्छाचारिता में अन्तर है और संविधान स्वतंत्रता प्रदान करती है किन्तु स्वेच्छाचारिता नहीं। स्वतंत्रता की भी सीमा वहां समाप्त हो जाती है जहां दूसरे की स्वतंत्रता आरंभ होती है। इसी प्रकार व्यक्ति की स्वतंत्रता भी वहां समाप्त हो जाती है जहां से परिवार और समाज की स्वतंत्रता आरंभ होती है किन्तु यहां पर स्वेच्छाचारिता चाहिये। परिवार/समाज रोक टोक न करे इसलिये स्वेच्छाचारिता को संविधानप्रदत्त स्वतंत्रता सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है।

जिस बच्चे को स्वतंत्रता और स्वेच्छाचारिता का यह भेद ज्ञात नहीं उसे तो और भी अल्प स्वतंत्रता मिलनी चाहिये अर्थात उसके ऊपर और अंकुश लगाया जाना चाहिये जबकि उसकी स्वेच्छाचारिता के पक्ष में पूरी व्यवस्था खड़ी हो जाती है; संसद, सरकार, न्यायपालिका, मीडिया सबके-सब।

व्यवस्था के लिये पाठ

संसद, सरकार, न्यायपालिका, मीडिया, व्यापार जगत सबको एक पाठ पढ़ाने की आवश्यकता है कि परिवार और समाज का भी अस्तित्व होता है और इसकी भी स्वतंत्रता सुनिश्चित की जानी चाहिये।

जब एक माता-पिता अपने दूधमुंहे बच्चे की अधीनता स्वीकारता है और एक रुदन पर सबकुछ छोड़कर दौड़ जाता है, अपने जीवन की कमाई बच्चे के लिये व्यय करता है, भूमि-घर बेचने की स्थिति बनने पर बेच तक देता है तो वह बच्चा बड़ा होकर स्वतंत्र कैसे हो सकता है, परिवार के विरुद्ध कैसे जा सकता है ? जो समाज उस बच्चे का सदैव साथ देता है, आवश्यकता पड़ने पर धनादि की भी व्यवस्था करता है (भले ही सरकार क्यों न धन प्रदान कर रही हो, वह समाज का प्रतिनिधित्व करते हुये ही देती है)

  • जैसे एक विद्यार्थी और शिक्षक दोनों ही स्कूल/कॉलेज के नियमों से बंधे होते हैं।
  • जैसे एक कर्मचारी अधिकारी तक अपनी संस्था/सरकार के नियमों से बंधा होता है।
  • जैसे एक नागरिक के रूप में व्यक्ति देश के कानून से बंधा होता है।
  • जैसे छोटे दुकानदार से लेकर बड़ी कंपनियां भी व्यापार जगत के नियमों से बंधा होता है।
  • वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार और समाज का भी अंग होता है एवं बंधा होता है, इसे किसी संवैधानिक मान्यता की आवश्यकता नहीं है और संवैधानिक मान्यता होने न होने से इसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

परिवार और समाज स्वयं में ही संप्रभु होता हैं एवं अपने मूल्यों के उल्लंघन पर दण्डित भी करता है। जब व्यक्ति का अपने परिवार से संघर्ष होता है तो उसे दण्डित किया जाता है। इसी प्रकार व्यक्ति और परिवार किसी का भी समाज से संघर्ष हो तो समाज भी दण्डित करने का अधिकारी होता है। गंभीर अपराधों के लिये जब परिवार और समाज दण्डित नहीं कर पाता तब राज्य दण्डित करता है।

झगड़े तो बच्चों में अधिक होते हैं, एक दिन में एक बच्चा ५ – १० बार भी झगड़ा करता है, उसके लिये कहां होता है कानून और राज्य ? फिर दो व्यक्ति के सामान्य झगड़ों में राज्य क्यों मुंह मारती है, इसलिये कि एक वयस्क व्यक्ति जीवन में १० – २० बार ही झगड़ा करता है और उसमें भी एकाध विवाद ही राज्य के पास जाता है, यदि हर दिन २ – ३ बार झगड़ा करने लगे और हर बार राज्य (न्यायपालिका) जाने लगे तो क्या होगा ?

यह समझना और समझाना आवश्यक है कि आपके पास गाड़ी हो सकती है, चलाने का अधिकार है किन्तु जहां मन करे, जब मन करे, जैसे मन करे वैसे नहीं चला सकते। गाड़ी चलाने के लिये जो भी नियम हैं उनका पालन करना ही होता है। इसके लिये राज्य नियम बनाता है, नियंत्रित करता तो है, किन्तु अधिकांशतः इसे भी समाज ही नियंत्रित करता ही करता है, क्योंकि यदि समाज नियंत्रित न करे तो राज्य नियंत्रित करने में सक्षम ही नहीं होती।

क्या साईकिल/रिक्से से होने वाली दुर्घटना राज्य के पास जाती है अथवा क्या सभी दुर्घटना या नियम का उल्लंघन राज्य ही देखती है ? उत्तर है नहीं। राज्य ने समाज की सीमा का अतिक्रमण किया तभी दुर्घटना में घायल व्यक्ति सड़क पर इसलिये मृत्यु को प्राप्त कर जाता है क्योंकि समाज उसे अस्पताल नहीं पहुंचाता, राज्य के भरोसे छोड़ देता है। यह स्थिति निःसंदेह चिंताजनक है और राज्य को अपने अधिकार का सीमांकन करना आवश्यक है।

इसी प्रकार किसी व्यक्ति को संवैधानिक स्वतंत्रता तो है किन्तु पारिवारिक और सामाजिक बंधन भी है। यदि वह बंधन को स्वीकार करेगा तभी लाभान्वित भी हो सकता है, संरक्षित भी हो सकता है।

जो व्यक्ति बंधन को अस्वीकार कर देता है वह संरक्षण का भी अधिकारी नहीं होता और ये एक अराजकता की स्थिति का संकेत है। व्यक्ति की जीवनशैली क्या होगी यह परिवार, कुल, समाज, संस्कृति के मूल्य ही निर्धारित करते हैं और इनका पालन करना संवैधानिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं है। समस्या यह है कि जो लोग देश को चला रहे हैं वो अंधे हैं और इन विषयों की गंभीरता को समझ ही नहीं रहे हैं।

संविधान जिस स्वतंत्रता की बात करता है, वह ‘अबाध’ (Absolute) नहीं है। कानून की भाषा में इसे ‘Reasonable Restrictions’ (उचित प्रतिबंध) कहा जाता है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब न्यायपालिका या आधुनिक समाज ‘व्यक्ति’ को ‘इकाई’ मानकर उसे परिवार और समाज से काटकर देखने लगता है।

इस विषय में अंततः एक पंक्ति में कहना चाहें तो इस प्रकार कहा जा सकता है कि “परिवार और समाज ही व्यक्ति का वास्तविक नियंत्रक है राज्य नियंत्रण कर ही नहीं सकता है, इसलिये राज्य स्वयं ही यह घोषित करे कि संवैधानिक स्वतंत्रता का तात्पर्य पारिवारिक-सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के उल्लंघन का अधिकार प्रदान नहीं करता है”

निष्कर्ष

निष्कर्षतः, स्वतंत्रता कभी भी ‘असीमित’ (Absolute) नहीं हो सकती। जिस प्रकार एक नदी अपनी मर्यादा (तटों) के भीतर रहकर ही जीवनदायिनी होती है और तटों को तोड़ते ही विनाशकारी ‘बाढ़’ बन जाती है, वही स्थिति मानवीय स्वतंत्रता की भी है। वर्तमान पीढ़ी जिसे ‘संवैधानिक स्वतंत्रता’ समझ रही है, वह वास्तव में उपभोक्तावाद और सांस्कृतिक पहचान को मिटाने का एक ‘सुनियोजित षड्यंत्र’ है।

परिवार और समाज व्यक्ति के विरोधी नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व के आधार और संरक्षक हैं। यदि राज्य अपनी शक्ति का उपयोग समाज की संप्रभुता और कुल-परंपराओं को तोड़ने के लिए करता है, तो वह ‘कल्याणकारी राज्य’ नहीं बल्कि ‘अराजकता का पोषक’ सिद्ध होगा। स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ ‘स्व-अनुशासन’ है, न कि अपने कुल और मर्यादाओं का परित्याग।

F&Q :

FAQ

प्रश्न: क्या संविधान वास्तव में असीमित स्वतंत्रता प्रदान करता है?

उत्तर: नहीं, संविधान ‘उचित प्रतिबंधों’ (Reasonable Restrictions) के साथ स्वतंत्रता देता है। स्वेच्छाचारिता और स्वतंत्रता में अंतर है।

प्रश्न: परिवार और समाज से स्वतंत्रता की मांग क्यों बढ़ रही है?

उत्तर: इसके पीछे विदेशी विचारधारा, दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली और उपभोक्तावाद का हाथ है जो व्यक्ति को परिवार से काटकर ‘अकेला ग्राहक’ बनाना चाहता है।

प्रश्न: ‘माय बॉडी माय च्वाइस’ जैसे नारों का समाज पर क्या प्रभाव है?

उत्तर: ये नारे कुल की मर्यादा और शुचिता को नष्ट कर व्यक्ति को केवल अपनी इंद्रियों का दास (स्वेच्छाचारी) बनाते हैं।

प्रश्न: क्या अंतर्जातीय विवाह सांस्कृतिक पहचान के लिए खतरा है?

उत्तर: हाँ, क्योंकि यह वर्ण-व्यवस्था और कुल-परंपरा के माध्यम से सुरक्षित ज्ञान के प्रवाह को खंडित कर ‘वर्णसंकरता’ को जन्म देता है।

प्रश्न: नई पीढ़ी को इस षड्यंत्र से कैसे बचाया जाए?

उत्तर: उन्हें ‘स्वतंत्रता’ और ‘स्वच्छंदता’ का अंतर बताकर, शास्त्रसम्मत जीवनशैली और कुल-मर्यादा के गौरव से परिचित कराकर।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

अस्वीकरण: यह आलेख सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक विश्लेषण पर आधारित है। यहाँ व्यक्त विचार वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में भारतीय समाज की जड़ों को बचाने के उद्देश्य से प्रस्तुत किए गए हैं। लेखक का उद्देश्य किसी संवैधानिक संस्था का अपमान करना नहीं, बल्कि ‘सामाजिक संप्रभुता’ और ‘पारिवारिक मूल्यों’ की महत्ता को पुनः स्थापित करना है। पाठक अपने विवेक और देश के कानूनों का सम्मान करते हुए इन विचारों का मनन करें।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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