Headlines

भविष्यपुराणोक्त सत्यनारायण व्रत पूजा कथा – Satyanarayan Vrat Puja Katha

भविष्यपुराणोक्त सत्यनारायण व्रत पूजा कथा - Satyanarayan Vrat Puja Katha भविष्यपुराणोक्त सत्यनारायण व्रत पूजा कथा - Satyanarayan Vrat Puja Katha

भविष्यपुराणोक्त सत्यनारायण व्रत पूजा कथा का तात्पर्य यह है कि यहां भविष्यपुराण में वर्णित विधि के अनुसार पूजा विधि और कथा प्रस्तुत है। सामान्य रूप से जो प्रयोग देखने को मिलता है वह स्कन्दपुराणोक्त है और भविष्यपुराणोक्त विधि का कहीं प्रयोग प्राप्त नहीं होने से यह विलुप्तप्राय प्रतीत होता है। यदि हम भविष्यपुराण के अनुसार विचार करें तो इसमें ५ कलश स्थापन का विधान कहा गया है और इस प्रकार अंतर स्पष्ट होता है। यहां भविष्यपुराणोक्त व्रत-पूजा विधि-कथा बताई गयी है।

श्रीसत्यनारायण पूजा सामग्री एवं नियम के लिये यहां क्लिक करें।

आरती एवं भजन के लिये यहां क्लिक करें।

भविष्यपुराणोक्त सत्यनारायण व्रत पूजा कथा – Satyanarayan Vrat Puja Katha

एक ही व्रत के लिये अनेकों पुराणों में विधि-विधान, कथा आदि प्राप्त होते हैं जिनमें से कोई एक पुराण की विधि अधिक प्रचलित होती है शेष विलुप्तप्राय होने लगता है जो उचित नहीं है। व्रतादि को देशभेद से ग्रहण करना उचित है किन्तु किसी एक ही पूजा-व्रत में एक पुराण के अतिरिक्त अन्य पुराणोक्त विधि कथा का लोप करना उचित नहीं प्रतीत नहीं होता। भविष्यपुराण के अनुसार पूजन विधि को समझने का प्रयास करें तो इन वचनों अवलोकन किया जा सकता है :

प्रातःस्नायी शुचिर्भूत्वा दंतधावनपूर्वकम् । तुलसीमञ्जरीं धृत्वा ध्यायेत्सत्यस्थितं हरिम् ॥

नारायणं सांद्रघनावदातं चतुर्भुजं पीतमहार्हवाससम् ।
प्रसन्नवक्त्रं नवकंजलोचनं सनन्दनाद्यैरुपसेवितं भजे ॥
करोमि ते व्रतं देव सायंकाले त्वदर्चनम् । श्रुत्वा गाथां त्वदीयां हि प्रसादं ते भजाम्यहम् ॥

इति संकल्प्य मनसा सायंकाले प्रपूजयेत् । पञ्चभिः कलशैर्जुष्टं कदलीतोरणान्वितम् ॥
शालग्रामं स्वर्णयुक्तं पूजयेदात्मसूक्तकैः । पञ्चामृतेन संस्नाप्य चन्दनादिभिरर्चयेत् ॥

ॐनमो भगवते नित्यं सत्यदेवाय धीमहि । चतुःपदार्थदात्रे च नमस्तुभ्यं नमोनमः ॥

जप्तव्यष्टोत्तरशतं जुहुयात्तद्दशांशकम् । तर्पणं मार्जनं कृत्वा कथां श्रुत्वा हरेरिमाम् ॥
षडध्यायीं सत्यमुख्यां तत्पश्चात्तत्प्रसादकम् । सम्यग्विभज्य तत्सर्वं दापयेच्छ्रोतृकाय च ॥
आचार्यायादिभागं च द्वितीयं स्वकुलाय सः । श्रोतृभ्यश्च तृतीयं च चतुर्थं चात्महेतवे ॥
विप्रेभ्यो भोजनं दद्यात्स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः । देवर्षेऽनेन विधिना सत्यनारायणार्चनम् ॥

इस वचन से ज्ञात होता है कि सत्यनारायण व्रत और पूजा विधि से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण विषय भी हैं जो चर्चा में नहीं आते। यथा सामान्य नियमानुसार व्रत के दिन दातुन का निषेध होता है किन्तु सत्यनारायण व्रत में दंतधावन का स्पष्ट विधान बताया गया है अतः इसमें प्रशस्त सिद्ध होता है “प्रातःस्नायी शुचिर्भूत्वा दंतधावनपूर्वकम्” । आगे स्नानोपरांत प्रातः काल ही ध्यान और मानसिक संकल्प का एक विधान प्राप्त होता है “इति संकल्प्य मनसा सायंकाले प्रपूजयेत्” । इसी प्रकार और भी कई महत्वपूर्ण तथ्य हैं जो इस प्रकार कहे जा सकते हैं :

  • पञ्चभिः कलशैर्जुष्टं – पंचकलशस्थापन करे।
  • कदलीतोरणान्वितम् – कदली वृक्ष से तोरणादि का निर्माण करे।
  • ॐ नमो भगवते नित्यं सत्यदेवाय धीमहि । चतुःपदार्थदात्रे च नमस्तुभ्यं नमोनमः ॥ इस मन्त्र को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि इसे सत्यनारायण गायत्री कहा जा सकता है किन्तु इस तथ्य को मैं पुष्ट नहीं कर सकता। पूजनोपरांत इस मन्त्र के अष्टोत्तरशत जप करके, दशांश होम, तर्पण, मार्जनादि करके तब कथा श्रवण कहा गया है।
  • कथाश्रवण के पश्चात् प्रसाद वितरण का भी विशेष नियम बताया गया है।
  • तत्पश्चात ब्राह्मण भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करे ऐसा बताया गया है।
सत्यनारायण व्रत
सत्यनारायण व्रत

इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि सत्यनारायण पूजन का विस्तृत विधान भी प्रकाशित होना चाहिये जिससे जो इच्छुक श्रद्धालु जन करना चाहें वो इस विधि के अनुसार भी कर सकें। एक अन्य तथ्य भी स्पष्ट होता है कि इस विधि के अनुसार सम्पादित पूजा में अधिक धन की आवश्यकता ज्ञात होती है किन्तु ऐसा भी नहीं कि दरिद्र व्यक्ति नहीं कर सकता अपितु ऐसा भाव ग्रहण करना चाहिए कि जो सामर्थ्यवान हों वो दरिद्रता प्रदर्शित न करें।

अधिक धन का भाव कहां से आया तो इसका उत्तर है शालिग्राम को स्वर्णयुक्त करने से “शालग्रामं स्वर्णयुक्तं पूजयेदात्मसूक्तकैः”, स्वर्ण आते ही धन की अधिकता का स्वतः बोध हो जाता है तथापि दरिद्रों के लिये बाध्यकारी भी नहीं है। स्वर्णयुक्त करने का तात्पर्य सामर्थ्य के अनुसार आसन, आभूषणादि रूप में स्वर्ण का प्रयोग करना है।

प्रातः विधान

जब यह स्पष्ट हो गया है कि सत्यनारायण पूजन में प्रातः विधान का भी वर्णन प्राप्त हो रहा है तो उसका अनुशीलन भी आवश्यक है इस कारण प्रातः विधान को यहां स्पष्ट किया जा रहा है। जिस दिन भगवान सत्यनारायण की पूजा करनी हो उस दिन प्रातः काल नित्यकर्म करके तुलसीमंजरी लेकर भगवान सत्यनारायण का ध्यान करते हुये मानसिक संकल्प करे।

  • दंतधावन : प्रस्तुत प्रमाण के अनुसार दातुन करना ही चाहिये यह मैं सिद्ध नहीं कर रहा हूँ अपितु विद्वानों के लिये चिंतन-मनन पूर्वक निर्णय देने के लिये प्रस्तावित कर रहा हूँ। व्रतादि में दातुन निषेध का स्पष्ट प्रमाण होने के कारण यहां दंतधावन के लिये विकल्प का प्रयोग ही ग्रहण करना चाहिये। यदि विद्वानों द्वारा यह सिद्ध कर दिया जाय कि दातुन प्रयोग की अनुमति है तो किया जा सकता है।
  • स्नान : स्नान में दो बार स्नान की सिद्धि होती है, प्रथम स्नान प्रातः काल भी अनिवार्य सिद्ध होता है। स्नान के साथ यहां दो अन्य तथ्य भी स्पष्ट करना आवश्यक है एक वस्त्रधारण और द्वितीय नित्यकर्म (सन्ध्यादि) ।
  • वस्त्रधारण : यदि यह स्पष्ट न किया जाय तो इसका अर्थ ऐसा लिया जायेगा कि प्रातः काल मानसिक संकल्प में धारण किया वस्त्र खोलकर पुनः सायंकाल में स्नान के पश्चात् धारण किया जा सकता है। किन्तु ऐसा नहीं किया जा सकता है, एक बार धारित वस्त्र प्रक्षालन के पश्चात् ही शुद्ध होता है और यदि एक ही वस्त्र दोनों बार धारण करना हो तो प्रातःकाल धारित वस्त्र का प्रक्षालन आवश्यक होगा अथवा दो भिन्न वस्त्र हो सकते हैं। वस्त्र में यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि वस्त्र का तात्पर्य धोती और गमछा है जिसका प्रमाण क्रमशः ७ – ८ हाथ और ४ हाथ होता है। वस्त्र को पिले रंग में रंगा भी जा सकता है।
  • नित्यकर्म (सन्ध्यादि) : वर्त्तमान काल में नित्यकर्मों का लोप हो चुका है और सामान्यतः जाने-अनजाने सभी पापाचार में ही लिप्त हैं इस तथ्य को अस्वीकार करना दिन को रात कहने के समान होगा। सत्यनारायण पूजा का माहात्म्य ही ऐसे व्यक्तियों के लिये विशेष रूप से पुराणों में प्रकट किया गया है, अस्तु हम नित्यकर्म विहीन ही मानकर चल रहे हैं (अपवादों के अतिरिक्त) । अस्तु जो अपवादस्वरूप नित्यकर्म करने वाले हैं वो कर लें किन्तु जो नहीं करते और न ही जानते हैं वो अन्य विधि का आश्रय ले सकते हैं। जैसे स्नानोपरांत भगवान सूर्य को गायत्री मन्त्र से अर्घ्य प्रदान करके न्यूनतम १० बार गायत्री मंत्र का जप (द्विजाति – पुरुषवर्ग) करें। तदन्तर प्रतिदिन करने वाली पूजा यथाविधि संपन्न करें।
  • मानसिक संकल्प : तदन्तर तुलसी मंजरी लेकर भगवान सत्यनारायण का ध्यान करते हुये हुये अगले मंत्रों को पढ़कर मानसिक संकल्प करें :

नारायणं सांद्रघनावदातं चतुर्भुजं पीतमहार्हवाससम् ।
प्रसन्नवक्त्रं नवकंजलोचनं सनन्दनाद्यैरुपसेवितं भजे ॥
करोमि ते व्रतं देव सायंकाले त्वदर्चनम् ।
श्रुत्वा गाथां त्वदीयां हि प्रसादं ते भजाम्यहम् ॥

तदनन्तर ध्यातव्य तथ्य : चूंकि व्रत में स्थित हो चुके हैं इसलिये सामान्य दिन किये जाने वाले व्यापारादि का निषेध हो जाता है एवं व्रत के नियमों का पालन करना आवश्यक सिद्ध होता है। सर्वाधिक आवश्यकता सत्य धारण की सिद्ध होती है क्योंकि व्रत का नाम ही सत्यनारायण व्रत है। अर्थात दिनभर घर में ही स्थित होकर ध्यान, जप, भजन आदि का आश्रय ग्रहण करें। पूजा से सम्बंधित विभिन्न व्यवस्था करें आदि।

पूजा की व्यवस्था

पूजा की व्यवस्था की बात करें तो सर्वप्रथम मण्डप की बात आती है और इसके लिए केले के ४ वृक्षों “पञ्चभिः कलशैर्जुष्टं कदलीतोरणान्वितम्का” स्तम्भवत प्रयोग करके वैकल्पिक छत के रूप में चांदनी लगाया जा सकता है। पुनः सुसज्जित करने में पुष्प-पत्रादि का प्रयोग करना चाहिए, कृत्रिम सजावट न करें।

मध्य में चौकी आदि पर मण्डल (अष्टदल) बनाकर कलश स्थापित करें एवं चारों कोने में चार कलश स्थापित करें। कलश स्थापना यदि विधिपूर्वक (मंत्रप्रयोगपूर्वक) करना हो तो दिन में (सूर्यास्त पूर्व) कर लें और संकल्प में “पूर्वांगीकृत कलशस्थापनपूर्वकं” पद प्रयुक्त करें । यदि दिन न किया गया हो तो रात्रि में बिना मंत्र के ही स्थापित करके तदनन्तर आवाहन-पूजन समंत्र करें ।

शालिग्राम स्पर्श : तदनन्तर अष्टदल में नवग्रहादिकों का पूजन करके मध्य कलश पर शालिग्राम को रखकर यथासंभव पंचोपचार/षोडशोपचार पूजन करें। शालिग्राम पूजन में यह ध्यातव्य है कि अनुपानीतों (स्त्री-शूद्र-बालक-म्लेच्छाचारी) को शालिग्राम स्पर्श का अधिकार नहीं होता, अर्थात यदि ऐसी संभावना हो और ये आकलन स्वयं ही करें कि स्पार्शधिकार है अथवा नहीं यदि न हो तो बिना स्पर्श के ही पूजन करें अथवा पुंगीफल, नारियल (कलश), तिलपुंज आदि पर ही करें।

ये कुकर्मी नेताओं का राजनीतिक प्रपंच है कि सभी ईश्वर के पुत्र हैं और समान हैं, भेदभाव नहीं होना चाहिये। सभी नागरिक पुलिस नहीं बन सकती, अधिकारी नहीं बन सकते, नेता नहीं बन सकते आदि। विशेष योग्यता होने के पश्चात् भी सुयोग्यों में भी श्रेष्ठ का ही चयन किया जाता है। भेदभाव तो संविधान, सरकार भी करती ही है केवल धर्म के नाम पर जनमानस को दिग्भ्रमित करती रहती है। अनुपनीतादि को स्पर्श का अधिकार नहीं है, वैकल्पिक अधिकार है, नामजप का अधिकार है।

स्पर्श के लिये योग्यता निर्धारित है और जो योग्य हो वह स्पर्शपूर्वक पूजन कर सकता है। इस प्रकार शालिग्राम के विषय में ये महत्वपूर्ण तथ्य है एवं यजमान स्वयं ही विचार करें कि उनके पास योग्यता है अथवा नहीं। वर्त्तमान में अधिकांशतः म्लेच्छाचारी बन चुके हैं और शालिग्राम स्पर्श के अधिकारी नहीं हैं। म्लेच्छाचारिता जाति आधारित नहीं है, सभी वर्णों के लोग म्लेछाचारी बनते ही जा रहे हैं, नई पीढ़ियों में तो ये लगभग शत-प्रतिशत का आंकड़ा आ रहा है।

तो यह आवश्यक हो जाता है कि स्वयं के म्लेच्छाचारों की पहचान करें, सत्य को स्वीकार करें। ये कार्य कठिन हो सकता है किन्तु सुगम मार्ग भी है, जितनी बार पूजा करें सत्य को अंगीकार करते हुये एक म्लेच्छाचार की पहचान करके उसका परित्याग परित्याग करते चलें; यथा :

  • असत्य का त्याग : असत्य वर्त्तमान जीवनशैली का अंग बन चुका है और सभी एक-दूसरे को असत्य की ही प्रेरणा देते मिलते हैं जैसे “वर्त्तमान काल में जीने के लिये यह सब करना ही होता है”, “पालन करना संभव ही नहीं”, अरे मूर्खों पूर्वयुगों में भी सत्य/धर्म का पालन करना कठिन ही था, सत्यवादी हरिश्चन्द्र को देखो, राजा दिलीप को देखो, भगवान श्रीराम को देखो, पांडवों को देखो। कभी भी सरल नहीं था तुम वर्त्तमान काल “कलयुग” की ओट क्यों लेते हो ? परीक्षा तो उसी की होगी न जो पढाई कर रहा है। तो प्रथम पूजा में असत्य का त्याग करें, स्वतः सत्य का वरण हो जायेगा। अथवा सत्य का वरण करें तो असत्य का त्याग हो जायेगा। और ये एक दिन के लिये नहीं आजीवन के लिये करें। कुछ विशेष परिस्थतियों में असत्य भी सत्य के ही समान होता है अथवा दोष रहित होता है यथा : विवाह, किसी की प्राणरक्षा, हास-परिहास आदि में। यहां असत्य सम्भाषण के पश्चात् अशुद्धि निवारण के लिये दाहिने कर्ण का स्पर्श करना चाहिये।
  • मदिरा का त्याग : जो लोग सेवन करते हैं वो त्याग और जो नहीं करते वो अन्य म्लेच्छाचारों का त्याग करें।
  • लहसुन-प्याज का त्याग : जो लोग सेवन करते हैं वो त्याग और जो नहीं करते वो अन्य म्लेच्छाचारों का त्याग करें।
  • मांस का त्याग : जो लोग सेवन करते हैं वो त्याग और जो नहीं करते वो अन्य म्लेच्छाचारों का त्याग करें।
  • घर से बाहर बने भोजन का त्याग : इसमें लगभग सभी लोग आ ही जायेंगे कुछ पुण्यात्माओं को छोड़कर। होटलों में बनी वस्तुयें हों अथवा पैकेट में बिकने वाले खाद्य पदार्थ सभी अभक्ष्य ही होते हैं। चूड़ा, भूजा, फल आदि दोषमुक्त होता है।
  • म्लेच्छ परिधान और भाषा का त्याग : आपका परिधान धोती-गमछा ही है, पूजा-पाठ से आरम्भ करें और सामान्य जीवन में भी धारण करें। घर से बाहर कुर्ते का भी प्रयोग किया जाता है। हां किसी ऐसे संस्थान में कार्यरत हैं जिसका अपना विशेष परिधान है तो कार्यदिवस (ड्यूटी आवर) में उसे धारण कर सकते हैं। इसी प्रकार कार्यक्षेत्र में यदि मलेछ्भाषा का ही प्रयोग करना निर्धारित हो तो वहां कर सकते हैं किन्तु सामान्य जीवन में म्लेच्छभाषा का भी परित्याग करें।
  • दुराचार-भ्रष्टाचार आदि का त्याग : जिस प्रकार असत्य के बारे में कहा जाता है कि वर्त्तमान युग में बोलना ही पड़ता है उसी प्रकार दुराचार-भ्रष्टाचार को भी जीवन का अभिन्न अंग सिद्ध किया जा रहा है। इसका भी त्याग करें।
  • शिखा-तिलक आदि धारण करना : यदि आपने शिखा का परित्याग किया था, और उपरोक्त मेलच्छाचार करते रहे हैं तो पुनः प्रायश्चित्त पूर्वक संस्कार की आवश्यकता होती है। पुनः संस्कार सुयोग्य विद्वान ब्राह्मण के निर्देश में करके शिखा आदि का धारण करें। नित्यकर्म आदि का विधान प्राप्त करके आरम्भ करें।
  • प्राण और धर्म में धर्म के वरण का संकल्प : ऐसा भी संकल्प आवश्यक है कि यदि प्राण कर धर्म में से किसी एक की ही रक्षा की जा सकती है तो धर्म की रक्षा का संकल्प लेना चाहिये, धर्म के लिये प्राण का त्याग करने के ढेरों उदाहरण हैं। धर्मरहित जीवन से उत्तम धर्मयुक्त मृत्यु होती है।
  • विधिपूर्वक हवन न करें : यह भी बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है उपरोक्त सुधार के पश्चात् इस तथ्य को भी स्वीकार करें कि जब कभी हवन करेंगे तो विधिपूर्वक करेंगे और यदि विधिपूर्वक हवन नहीं कर सकते तो अक्षमता में विकल्प का चयन करेंगे किन्तु विधिरहित हवन नहीं करेंगे।
  • मानवता-परोपकार आदि का ज्ञान : वर्त्तमान में मानवता, परोपकार आदि का राग अमानव म्लेच्छाचारी लगाते मिलते हैं। जिन्होंने मनुवादी शब्द गढ़ा, अपशब्द बोलते हैं, अपमान करते हैं वो मानव कहलाने के अधिकारी ही नहीं हैं। ऐसे अमानवों पर एक ही उपकार हो सकता है कि ये मानव बन जायें इसके अतिरिक्त कुछ और नहीं। ऐसे अमानवों को यदि दण्ड, तिरष्कार आदि से भी मानव बनाया जाय तो वो इसके ऊपर उपकार ही होगा। अर्थात मानवता-परोपकार आदि पर गंभीरता से चिंतन-मनन करें, समझने का प्रयास करें न कि दुनियां के बताये अनुसार समझें।
  • अधीनता स्वीकार करें : इसी प्रकार स्वतंत्रता की नौटंकी रची जाती है और इस पाखंड का भी परित्याग करें एवं अधीनता ही वास्तविकता हैं एवं इसे स्वीकार करें। अधीनता को स्वीकार करके ही धर्मपालन संभव है जिससे मुक्ति मिलती है। परिवार, समाज, राष्ट्र, प्रकृति, गुरु-ब्राह्मण, शास्त्र इन सबकी अधीनता स्वीकार करें। यहां अधीनता का तात्पर्य इन सबके प्रति दायित्व का बंधन है और दायित्वों का निर्वहन करना ही धर्म है। यदि स्वतंत्रता का दम्भ भरेंगे तो दायित्व का निर्वहन करने पर भी नहीं किये के ही समान होगा।

इस प्रकार और भी ढेरों नियम हैं जिनका ज्ञान कालक्रम से आगे होता चला जायेगा। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भगवान सत्यनारायण की पूजा करके भी यदि सत्य को स्वीकार नहीं कर रहे हैं तो वो पूजा निष्फल ही होगा। प्रथम पूजा से ही सत्य को एक-एक करके स्वीकारना आरंभ करें। एक बार में ही कायापलट संभव नहीं है किन्तु यदि शनैः शनैः करेंगे तो संभव है।

यह पूजा विधि इस मुख्य उद्देश्य के साथ संकलित की जा रही है कि धर्म की स्थापना हो और विधिपूर्वक पूजा करने वालों के मनोकामनाओं की पूर्ति हो यह ईश्वर अधीन ही रहता है। शास्त्रों के अनुसार ही उपरोक्त निर्देश भी उल्लिखित किये गए हैं और धर्ममार्ग पर चलने वालों की विजय होती है, विधिपूर्वक पूजा करने वालों के लिये यह मनोरथसिद्धि करने वाला हो।

धूप-दीप आदि की उचित्त व्यवस्था करें। प्रसाद में भी विशेष व्यवस्था कही गई है और स्कन्दपुराणोक्त कथा में न्यूनतम मात्रा सवा सेर करके मिलता है किन्तु भविष्यपुराणोक्त विधि में एक पाव, आधे सेर, सेर भर और अधिक सामर्थ्य में अधिक भी करने का वचन है – “गोधूमचूर्णं पादार्द्धं सेटकादिप्रमाणतः”। चूड़मा, पक्वान्न, मिष्टान्न, फल, शीतल प्रसाद आदि की सामर्थ्यानुसार व्यवस्था करें। दो दशकपूर्व कालक्रम से दो दोष जो उत्पन्न हुआ उसके कारण अब उचितकाल में होने वाली सत्यनारायण पूजा का ही विलोप होता जा रहा है जो कलयुग में कल्याण का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। दो दोष जो आ गए वो इस प्रकार हैं :

एक समस्या प्रसाद में अहंकार वाली आ गयी और पूजा का स्तर प्रसाद की मात्रा से निर्धारित किया जाने लगा, एवं पूजा करने वालों के मन में भी यही भाव भर दिया गया। प्रसाद की मात्रा पूर्णतः स्पष्ट है कि सामर्थ्य के अनुसार ही करे प्रदर्शन के भाव से अहंकार पूर्ति के लिये न करे और न ही परस्पर प्रतिस्पर्द्धा करे। यदि एक व्यक्ति का सामर्थ्य लाखों व्यय करने की हो तो करे किन्तु दूसरा व्यक्ति यदि कुछ शत-सहस्र का ही सामर्थ्य रखता है तो वो उतना ही करे, धनी से धन व्यय की प्रतिस्पर्द्धा न करे। साथ ही ये सामाजिक चर्चा का विषय भी नहीं बनाया जाना चाहिये।

दूसरा दोष कीर्तन से सम्बंधित आ गया वो इस प्रकार की भजन-कीर्तन पूजा में प्रशस्त तो है, विधान किया गया है किन्तु इसमें पहले स्वयं और आस-परोस की कीर्तनमंडली करते थे जिसमें अधिक धनव्यय नहीं होता था। कालक्रम से ये भी प्रदर्शन का विषय बन गया और अब कीर्तनमंडली नहीं मिलते गायक/आर्क्रेष्ट्रा वाले मिलते हैं जो अग्राह्य भी हैं किन्तु इनके लिये अधिक धन भी व्यय करना पड़ता है।

“देश-काल-परिस्थिति” का विचार करके यहां निर्णय लिया जायेगा कि क्या करें अग्राह्य को प्रशस्त करें अथवा अग्राह्य का परित्याग करना श्रेयस्कर है। इन लोगों का संसर्ग भी पाप देने वाला है फिर धर्म के उद्देश्य से आमंत्रित करके इनको अधिक धन भी प्रदान करना मूर्खता है। यदि ये लोग स्वयं भी कहें कि कीर्तन करने का अवसर दो तो इनके ऊपर दो-चार शर्तें लगाने की आवश्यकता है यथा सदा के लिये मदिरा, अश्लीलता, म्लेच्छाचार आदि का त्याग करोगे।

अर्थात यदि आप गांव में रहते हैं तो आपको ऐसी कीर्तन मंडली मिलेगी जो धन के लिये नहीं धर्म के लिये भगवान का भजन कीर्तन आज भी करते हों, सदाचारी हों। यदि मिलें तो पूजा के उपरांत भजन-कीर्तन करके रात्रि व्यतीत करें न कि पूजा में अवरोध उत्पन्न करने के लिये भजन-कीर्तन करें अर्थात पूजाकाल में न करें।

इसी प्रकार और भी ढेरों तथ्य हैं जिनमें से यथाकाल अनेकानेक तथ्य पूजा विधि के पश्चात् जोड़े जायेंगे, अर्थात यदि आपने इस पूजा विधि का अध्ययन किया है तो कुछ दिनों के पश्चात् अथवा अगली पूजा से पूर्व पुनरावलोकन की भी आवश्यकता होगी।

अगले पृष्ठ पर जायें : 12345

Leave a Reply