२७ गौरी शंकर (तत्पश्चात गौरीशङ्कर की पूजा करें) : ॐ भूर्भुवः स्वः गौरीशंकरौ इहागच्छतं इह तिष्ठतं । आवाहन करके सभी वस्तुओं से पूजा करें, पूजन मंत्र – ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीगौरीशंकराभ्यां नमः। एतानि पाद्यार्घाचमनीयस्नानीय,-पुनराचमनीयानि ०, इदमनुलेपनं ०, इदं अक्षतं०, इदं पुष्पं०, इदं बिल्वपत्रं०, एतानि गन्ध-पुष्प-धूप-दीप-ताम्बूल यथाभागं नैवेद्यं०, इदमाचमनीयं ०, इदं दक्षिणा-द्रव्यं०, एष पुष्पाञ्जलिः – ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीगौरीशंकराभ्यां नमः।
तत्पश्चात ब्रह्मा के निमित्त अर्घ्यपात्र में अक्षत-पुष्प-चंदन-जल आदि लेकर ॐ ब्रह्मणे नमः से भूमि पर ही एक बार अर्घ्य प्रदान करें।
तदनन्तर “ॐनमो भगवते नित्यं सत्यदेवाय धीमहि । चतुःपदार्थदात्रे च नमस्तुभ्यं नमोनमः ॥” इस मन्त्र का १०८ बार जप करें। जप के पश्चात् उपरोक्त विधि में हवन करने का निर्देश प्राप्त होता है और हवन के विषय में यह स्पष्ट है कि विधिपूर्वक ही करें। विधिपूर्वक हवन की सम्पूर्ण विधि यहां संलग्न है यदि अवलोकन करना चाहें तो कर सकते हैं : हवन विधि
तत्पश्चात कथा श्रवण करें। सम्पूर्ण श्रीसत्यनारायण व्रत कथा पृष्ठ पर जाने के लिये यहां क्लिक करें।
कथा श्रवण करने के पश्चात् पूर्णाहुति, आरती, पुष्पांजलि, प्रार्थना, प्रदक्षिणा, साष्टांग प्रणाम आदि करके विसर्जन करे और दक्षिणा करे।
आरती एवं भजन के लिये यहां क्लिक करें।
पुष्पांजलि
ॐ सत्यरूपं सत्यसंधं सत्यनारायणं हरिम् । यत्सत्यत्वेन जगतस्तं सत्यं त्वां नमाम्यहम् ॥
त्वन्मायामोहितात्मानो न पश्यंत्यात्मनः शुभम् । दुःखांभोधौ सदा मग्ना दुःखे च सुखमानिनः ॥
मूढोहं धनगर्वेण मदांधीकृतलोचनः । न जाने स्वात्मनः क्षेमं कथं पश्यामि मूढधीः ॥
क्षमस्व मम दौरात्म्यं तपो धाम्ने हरे नमः। आज्ञापयात्मदास्यं मे येन ते चरणौ स्मरे ॥
एष मंत्रपुष्पाञ्जलिः ॐ भूर्भुवः स्वः भगवते श्रीसत्यनारायणाय नमः ॥
प्रार्थना
प्रणमामि जगन्नाथ जगत्कारणकारकम् । अनाथनाथं शिवदं शरण्यमनघं शुचिम् ॥
अव्यक्तं व्यक्ततां यातं तापत्रयविमोचनम् ॥
नमः सत्यनारायणायास्य कर्त्रे नमः शुद्धसत्त्वाय विश्वस्यभर्त्रे ।
करालाय कालाय विश्वस्य हर्त्रे नमस्ते जगन्मङ्गलायात्ममूर्ते ॥
धन्योस्म्यद्य कृती धन्यो भवोद्य सफलो मम । वाङ्मनोगोचरो यस्त्वं मम प्रत्यक्षमागतः ॥
प्रदक्षिणा
यानि कानि च पापानि जन्मान्तर कृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिण पदे-पदे ॥
पदे पदे या परिपूजकेभ्यः सद्योऽश्वमेधादिफलं ददाति ।
तां सर्वपापक्षयहेतुभूतां प्रदक्षिणां ते परितः करोमि ॥
साष्टांग प्रणाम
पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पापसंभवः। त्राहिमां पुण्डरीकाक्षः सर्वपापहरो हरी॥
विसर्जन
- ॐ श्रीर्पूजितासि प्रसीद प्रसन्ना भव क्षमस्व ; मयि रमस्व ॥
- ॐ सरस्वती पूजितासि प्रसीद प्रसन्ना भव क्षमस्व ; मयि रमस्व ॥
- ॐ आवाहित सर्वे विसर्जनीयादेवताः पूजिताःस्थ प्रसीदत प्रसन्नाः भवत क्षमस्व ; स्व-स्व स्थानं गच्छ ॥
ॐ यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्। इष्टकामप्रसिद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च॥
ॐ भूर्भुवः स्वः भगवन् श्रीसत्यनारायण पूजितोसि प्रसीद प्रसन्नो भव क्षमस्व ; स्व स्थानं गच्छ ॥
दक्षिणा
ॐ अस्यां रात्रौ कृतैतत् श्रीसत्यनारायण पूजनकथाश्रवण प्रतिष्ठार्थं एतावद्द्रव्यमूल्यक (द्रव्याभाव में यद्दीयमानद्रव्यमूल्यक) हिरण्यं अग्निदैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय दक्षिणां दातुमहमुत्सृजे ॥
प्रायः दक्षिणा के विषय में विलम्ब देखने को मिलता है और मानसिक कल्पित दक्षिणा की जाती है। कई लोग तो ग्रहण से पूर्व देते ही नहीं हैं, जब ग्रहण लगे तब द्विगुणित होने के भय से दक्षिणा प्रदान करते हैं और इस कारण पुरोहितवर्ग में कुछ ब्राह्मण ग्रहण की प्रतीक्षा करते भी पाये जाते हैं कि यथाशीघ्र ग्रहण लगे ताकि दक्षिणा प्राप्त हो सके। यह अनुचित है दक्षिणा जिस काल में मन्त्रपूर्वक कर रहे हैं उस काल में द्रव्य भी लेकर ही करें, किञ्चित विलम्ब का भी कारण नहीं हो सकता यदि भोजन के पश्चात् भी देना ही हो तो, जो नहीं देने वाले हैं उनकी बात भिन्न होती है।

भोजन के पश्चात् भोजन की दक्षिणा अर्थात भोजनदक्षिणा दी जाती है न की पूजा की दक्षिणा। संभवतः विगत पीढ़ी के मन में एक भ्रम हो गया था कि तत्काल दक्षिणा देने पर पुरोहित वर्ग ग्रहण नहीं करते, कुशा को प्रदान कराते हैं किन्तु भोजन के पश्चात् देने पर हस्तग्रहण करते हैं और संभवतः इसी भाव के कारण दक्षिणा जिस समय मन्त्र पढ़ रहे होते हैं उस समय न देकर बाकी रखने की परम्परा सी बन गयी।
मुहूर्ते समतीते तु भवेच्छतगुणा च सा। त्रिरात्रे तद्दशगुणा सप्ताहे द्विगुणा मता ॥
मासे लक्षगुणा प्रोक्ता ब्राह्मणानां च वर्द्धते । संवत्सर व्यतीते तु त्रिकोटिगुणा भवेत् ॥
कर्म्मं तद्यजमानानां सर्वञ्च निष्फलं भवेत् । सब्रह्मस्वापहारी च न कर्मार्होऽशुचिर्नर: ॥
दक्षिणा देने में मुहूर्त मात्र (४८ मिनट) का विलम्ब करना भी अनुचित सिद्ध होता है क्योंकि इतने काल में ही दक्षिणा शतगुणित हो जाने का प्रमाण मिलता है “मुहूर्ते समतीते तु भवेच्छतगुणा” और अधिकतम वर्ष भर में तीन करोड़ गुणा और जो न प्रदान करे उसे ब्रह्मस्वहरण का दोष लगता है। संवत्सर पर्यन्त भी दक्षिणा न देने वाला व्यक्ति कर्माधिकार से भी वंचित हो जाता है, अशुद्ध ही रहता है “सब्रह्मस्वापहारी च न कर्मार्होऽशुचिर्नर:”
विलम्ब करने में दोष को इस प्रकार से भी समझना चाहिये कि यदि मुहूर्तभर का विलम्ब हो गया हो तो ११०० दक्षिणा के स्थान पर ११०००० दक्षिणा हो जाता है, यदि तीन दिन बीत जाये तप ११०००००, सप्ताह व्यतीत होने पर २२००००० और मास व्यतीत होने पर २२००००००००००० और यदि वर्ष भी व्यतीत हो जाये तो करोड़गुणा जो देना ही असंभव हो जाता है।
इस कारण दक्षिणा तुरंत ही दे भले ही वो अत्यल्प ही क्यों न हो। पर्याप्त न होने पर संकल्प में उसका प्रयोग न करे अपितु विचार करके बाद में और देने का वचन मात्र दे, संकल्पपूर्वक उतना ही करे जो तत्काल दे रहे हों क्योंकि मुहूर्त व्यतीत होने पर ही सौगुणा होने का भय उपस्थित हो जाता है और इसीलिये कहा जाता है “तुरंत दान महाकल्याण”
प्रसाद वितरण
भविष्यपुराणोक्त सत्यनारायण व्रत कथा में प्रसाद वितरण को भी स्पष्ट किया गया है सर्वप्रथम प्रसाद का ४ भाग कल्पित करे : “आचार्यायादिभागं च द्वितीयं स्वकुलाय सः । श्रोतृभ्यश्च तृतीयं च चतुर्थं चात्महेतवे ॥” चार भाग का तात्पर्य चारों समान हो यह नहीं है, जिस भाग में लोगों की संख्या अधिक हो उस तारतम्य से भाग करे।
प्रथमभाग आचार्य (ब्राह्मण) को प्रदान करे, द्वितीय भाग अपने कुल-परिवार के लिये करे, तृतीय भाव श्रोतावर्ग के लिये करे और चतुर्थभाग स्वयं के लिये। ये विभाग मुख्यरूप से वितरण हेतु अर्पित प्रसाद में कल्पित करके प्रथम भाग ब्राह्मण को दे, द्वितीय भाग कुल-परिवार के लोगों को, तृतीय भाग सामूहिक वितरण हेतु निर्मित शीतल प्रसाद आदि में मिश्रित कर दे, और चतुर्थ भाग स्वयं ग्रहण करे।
“सत्य ही प्रत्यक्ष ब्रह्म है, और कलियुग में सत्यनारायण ही प्रत्यक्ष फलदाता हैं।”
भविष्यपुराणोक्त विधि का सूक्ष्म अध्ययन यह सिद्ध करता है कि सत्यनारायण व्रत केवल एक कथा सुनना मात्र नहीं, बल्कि एक पूर्ण ‘अहोरात्र अनुष्ठान’ है। जहाँ स्कन्दपुराण की विधि सरल और जनसाधारण के लिए सुलभ है, वहीं भविष्यपुराण की विधि साधक से उच्च कोटि के अनुशासन, प्रातःकालीन संकल्प और ‘पञ्च-कलश’ जैसी विस्तृत वेदी रचना की अपेक्षा करती है। निष्कर्षतः, यह विलुप्तप्राय विधि उन श्रद्धालुओं के लिए संजीवनी है जो अपनी पूजा में पूर्ण शास्त्रीय गहराई और मर्यादा की पुनर्स्थापना करना चाहते हैं।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।


