ब्राह्मण माहात्म्य

ब्राह्मण माहात्म्य ब्राह्मण माहात्म्य

“ब्राह्मण है तो धर्म है और धर्म है तो ब्राह्मण है।”

जब हम धर्म और आत्मकल्याण की बात करते हैं तो इसका आधार शास्त्र सिद्ध होता है और जब शास्त्रों की बात करते हैं तो शास्त्र ब्राह्मण को आधार बताते हैं। धर्म की सत्ता का श्रोत स्वयं शास्त्र है और स्वयं शास्त्र ही यह सत्ता व्यावहारिक जगत में ब्राह्मण को प्रदान करता है। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि धर्म और ब्राह्मण के मध्य अन्योन्याश्रय संबंध है अर्थात धर्म है तो ब्राह्मण है और ब्राह्मण है तो धर्म है। तो मन में ब्राह्मणों के महत्व अर्थात ब्राह्मण माहात्म्य को जानने-समझने की इच्छा जागृत होती है और इसी कड़ी में यह आलेख शास्त्र प्रमाणों का संग्रह करता है।

ब्राह्मण माहात्म्य

हम सभी कलयुगी जीव हैं और कलयुग के झंझावातों को सहन करने में अक्षम हैं और जो सहनशक्ति प्रदायक और रक्षक अर्थात धर्म है उसी को दाव पर लगा देते हैं एवं डूबती नैया में सवार होकर “धर्मो रक्षति रक्षितः” चिल्लाते रहते हैं। धर्म रूपी पतवार का त्याग करके मंझधार में फंसे हुये हैं। आज धर्म की व्याख्या वो लोग नहीं कर रहे हैं जो शास्त्रज्ञ हैं अपितु वो लोग कर रहे हैं जो शास्त्रज्ञान से अभिज्ञ हैं। मूल प्रभाव तो कलयुग का ही कहा जायेगा, व्यावहारिक रूप से सोशलमीडिया और घृणित राजनीति का सम्मिश्रिकृत दुष्परिणाम है।

पूर्वकाल में शास्त्रज्ञान के आधार पर श्रेष्ठता निर्धारित होती थी और प्रसिद्धि (ख्याति) प्राप्त होता था। जो जितने प्रसिद्ध विद्वान होते थे उनका शास्त्रज्ञान भी उतना ही अधिक गहन, गंभीर, गूढ़ होता था जिसके फलस्वरूप समाज और राष्ट्र को उचित मार्गदर्शन मिलता था। वर्त्तमान में प्रसिद्धि अथवा ख्याति का आधार राजनीति के द्वार से होकर आगे बढ़ती है जिसमें धनरूप ईंधन की आवश्यकता होती है न कि शास्त्रज्ञान की और प्रमाणपत्र सोशलमीडिया प्रदान करता है न कि वास्तविक धरातल। वास्तविक धरातल पर सोशल मीडिया का आधिपत्य स्थापित हो गया है और यह परतंत्र हो चुकी है।

शास्त्रं ह्यबुद्ध्वा तत्त्वेन केचिद्वादबलाज्जनाः। कामद्वेषाभिभूतत्वादहंकारवशं गताः॥
याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः। ब्रह्मस्तेना निरारम्भा अपक्वमनसोऽशिवाः॥

महाभारत/शांतिपर्व (१२)/२७५/५२-५३

धरातल के लिये उसे स्वीकार करना एक प्रकार से बाध्यकारी है जो सोशलमीडिया घोषित करती है जिसके फलस्वरूप प्रसिद्ध होने के लिये न तो शास्त्रज्ञान रूपी ईंधन की आवश्यकता है न ही वास्तविक धरातल पर शास्त्रार्थ पूर्वक सिद्धि करने की। आज के युग में जितने भी प्रसिद्ध कथाकार/धर्मगुरु/जगद्गुरु हैं (कुछ अपवादों और प्रामाणिकों के अतिरिक्त) सबके-सब निरे मूर्ख हैं, शास्त्र का रत्तीभर ज्ञान नहीं है बस किसी प्रकार से तोड़-मड़ोर कर भागवत-रामायण आदि को प्रस्तुत करते हैं। मैंने प्रसिद्ध कथावाचकों को कहते सुना है :

धर्मो रक्षति रक्षितः
धर्मो रक्षति रक्षितः
  • रात में कोई कर्मकाण्ड नहीं होता है, हवन का निषेध है, वेदपाठ का निषेध है तो विवाह भी नहीं होना चाहिये। सभी कर्मकांड दिन में ही होते हैं विवाह भी दिन में ही होना चाहिये, वर्त्तमान में जो रात्रिविवाह का प्रचलन है वह पूर्वकाल में आक्रांताओं के भयवशात् आरम्भ हुयी परिपाटी है।
  • कौन कहता है कि बेटी के घर का नहीं खाना चाहिये ?
  • रजस्वला या मासिक शब्द के साथ धर्म शब्द भी जुड़ा हुआ है फिर इसे पाप/दोष/अशुद्धि क्यों माना जाता है।

आदि-इत्यादि और तो और अशौचावस्था में मंदिर जाकर देवदर्शन करते हैं, कथा कहते हैं। यदि प्रश्न किया जाय तो ऐसे ही किसी व्यक्ति द्वारा कहा जाता है कि भारत का संविधान अस्पृश्यता उन्मूलन की बात करता है, अस्पृश्यता को अपराध मानता है अतः ऐसा नहीं करना चाहिये। धूर्तता तो देखिये कर रहे हैं धर्माचरण और प्रमाण के लिये ओट संविधान की लेते हैं भले ही वो धर्माचरण शास्त्रविरुद्ध क्यों न हो।

देश की वर्त्तमान व्यवस्था और ब्राह्मण

“ब्राह्मणों की निंदा करने वाला स्वयं के विनाश का मार्ग प्रशस्त करता है।”

आगे बढ़ने से पूर्व यह भी आवश्यक है कि हम देश की वर्त्तमान व्यवस्था और ब्राह्मण की दशा को भी समझने का किंचित प्रयास करें। देश की वर्त्तमान व्यवस्था में ब्राह्मण को जन्मजात अपराधी (अघोषित किन्तु वैधानिक) सिद्ध कर दिया गया है और इसका कारण भी है । संविधान और विधान जो भी कहता है शास्त्रनिष्ठ ब्राह्मण वर्ग उसका विरोध ही करता है, उसके विरुद्ध ही वक्तव्य देता है। कुछ उदाहरण के माध्यम से इस तथ्य को समझा जा सकता है :

  • संविधान समानता की बात करता है और ब्राह्मण शास्त्र के अनुसार स्वयं ही ब्राह्मणों की श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं और इस आलेख में भी यही सिद्ध होगा।
  • संविधान और कानूनों वयस्क विवाह कहता है और बाल विवाह में दोष बताता है एवं उसे अपराध घोषित करता है, तो वहीं ब्राह्मण बाल विवाह को श्रेष्ठ कहता है एवं वयस्क विवाह में दोष बताता है।
  • संविधान और कानून अंतर्जातीय विवाह को प्रश्रय दे रहे हैं, प्रोत्साहित कर रहे हैं तो ब्राह्मण इसे पाप कहता है। अंतर्जातीय विवाह करने वालों को कुलघाती और उसके बच्चों को वर्णसंकर करता है।
  • संविधान अस्पृश्यता उन्मूलन की बात करता है तो ब्राह्मण अस्पृश्यता को सिद्ध करते हैं, उन नामधारक ब्राह्मणों को छोड़कर जो शास्त्रज्ञान से रहित हैं।
  • संविधान और कानून दुराचार, भ्रष्टाचार, कृतघ्नता आदि को मौलिक अधिकार की ओट में प्रश्रय प्रदान करता है तो ब्राह्मण इन सबको पाप सिद्ध करते हैं।
  • संविधान और कानून जातिव्यवस्था (वर्णाश्रम व्यवस्था) के उन्मूलन अथवा कर्मणा स्वीकार्य कहता है तो ब्राह्मण इसे स्थापित करते हैं एवं जन्मना ही सिद्ध करते हैं।
  • संविधान और कानून व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सिद्ध करता है तो ब्राह्मण सबको धर्म व शास्त्र के अधीन सिद्ध करते हैं एवं अंततः स्वयं के अधीन सिद्ध करते हैं। यथा संविधान और कानून वयस्कों को ही विवाह का अधिकार प्रदान करता है एवं स्वतंत्र (माता-पिता-परिवार-समाज सबसे) कहता है किन्तु ब्राह्मण सबके अधीन कहता है, इस प्रकार स्वतंत्रता का खंडन करता है।

इस प्रकार के ढेरों तथ्य हैं जो संविधान और विधान एवं ब्राह्मण अथवा शास्त्र को एक-दूसरे के विरुद्ध करते हैं। इसी कारण घृणित राजनीति करने वाले को सदैव ऐसा प्रश्न करते हुये देखा जाता है कि धर्म बड़ा या संविधान। ये प्रश्न ही सिद्ध करता है कि पृच्छक बहुत बड़ा धूर्त है और जिससे प्रश्न किया गया है वह राजदंड के भय से संविधान को बड़ा स्वीकारे, बताये।

प्रश्न करने का उद्देश्य यह होता है कि जहां संविधान और धर्म में विरोधाभास है वहां धर्म का परित्याग करके संविधान को स्वीकार किया जाय। और फिर कभी यही कुकर्मी “धर्मो रक्षति रक्षितः” भी बोलते भी दिख जाते हैं। अरे धूर्त जब तुमने संविधान की ओट लेकर धर्म का त्याग कर ही दिया फिर किस मुंह से “धर्मो रक्षति रक्षितः” कहते हो ?

धर्म की रक्षा कौन कर रहा है जो संविधान और धर्म में विरोधाभास होने पर संविधान का त्याग करके धर्म का चयन करता है वही न। जिसने धर्म का परित्याग करके संविधान को अंगीकार किया उसने किस धर्म की रक्षा करी ? अर्थात धर्म की रक्षा कुछ शास्त्रनिष्ठ ब्राह्मण ही कर रहे हैं और स्वाभाविक रूप से यहां संविधान और कानून का विरोध सिद्ध हो जाता है। इसी कारण आज देश में ब्राह्मणों को भगाने, मारने आदि की बात की जा रही है, जन्मजात अपराधी और अत्याचारी सिद्ध किया जा रहा है।

यतो धर्मस्ततो जयः
यतो धर्मस्ततो जयः

विरोध धर्म नहीं करता है अपितु संविधान ही धर्म का विरोध करता है। संविधान और कानून में ही भारतीय संस्कृति/धर्म/शास्त्र को आधार नहीं बनाया गया है (कुछ अपवाद वाले नियमों के अतिरिक्त) अपितु विदेशी कुसंस्कृति और उसके द्वारा निर्धारिक मानकों को आधार स्वीकार किया गया है।

ये व्यवस्थागत बौद्धिक जड़ता है जो अपनी मां को इस कारण प्रताड़ित कर रहा है क्योंकि उसे दूसरे की मां (विदेशी कुसंस्कृति) का सम्मान करना है। ये दूसरे की मां आदर और सम्मान से प्रसन्न ही नहीं होती अपितु इसको प्रसन्नता तब होती है जब अपनी मां (संस्कृति/शास्त्र/धर्म) को गाली दें, उत्पीड़ित करें। और जो लोग देश को चला रहे हैं, अर्थात व्यवस्था/तंत्र/शासन में हैं वो यही कुकर्म कर रहे हैं एवं इसका कारण उनकी बौद्धिक जड़ता है।

ये लोग बौद्धिक रूप से विकलांग हैं तभी तो स्वार्थलोलुप होकर अपनी मां अर्थात धर्म/संस्कृति/शास्त्र/ब्राह्मण का अपमान व तिरष्कार कर रहे हैं।

रूचि तिवारी (पत्रकार) के साथ जो हुआ, उसी घटना में एक बार मानसिक भाव से रूचि तिवारी के स्थान पर किसी दलित/वंचित/शोषित वर्ग को रखें तो अब तक सैकड़ों लोगों पर कानूनी कोड़ा चल गया होता, बड़े-से-बड़ा नेता चिल्ला रहा होता। किन्तु रूचि तिवारी उत्पीड़ित भी हुयी और ये पूरी व्यवस्था/तंत्र/शासन उत्पीड़क के साथ है उत्पीड़ित के साथ नहीं। रूचि तिवारी का दोष उसका जन्मजात ब्राह्मण होना है। रूचि तिवारी चूँकि जन्मजात ब्राह्मण है इसलिये अपराधिनी है, अत्यचारिणी है और इसको इसी प्रकार उत्पीड़न झेलना होगा। ये वर्त्तमान देश की वास्तविकता है।

यदि वही दलित आदि वर्ग की होती तो बड़े-बड़े नेता उसके चौखट पर नतमस्तक होते और अत्याचार, उत्पीड़न आदि चिल्ला रहे होते। ऐसे अनेकों प्रकरण देखने को मिले हैं कि यदि किसी घटना में दलित कन्या की मृत्यु हो गयी हो तो तुरंत ही गैंगरेप भी चिल्लाने लगते हैं भले ही वह सिद्ध न हो अर्थात असत्य हो। तुरंत ही वहां सवर्णों को अपराधी घोषित कर दिया जाता है भले ही हत्यारा अथवा उत्पीड़क भी उन्हीं वर्गों का क्यों न हो।

चौपट शासन व्यवस्था

“चौपट शासन व्यवस्था” अत्यंत गंभीर पद है जो शासन व्यवस्था में सम्मिलित लोगों के हृदय पर तीर की भांति आघात करने वाला है, किन्तु सत्य का यही लक्षण है। शासन व्यवस्था के चौपट होने का ही यह प्रमाण है कि वही लोग जो देश भर में उत्पात, उपद्रव, उत्पीड़न कर रहे हैं और स्वयं को उत्पीड़ित व प्रताड़ित घोषित करते हुये उत्पीड़ित वर्ग को ही अपराधी, उत्पीड़क भी घोषित कर रहे हैं एवं शासन व्यवस्था उस उत्पीड़क के ही साथ खड़ी हो जाती है।

देश के वर्त्तमान शासन व्यवस्था और संविधान-संविधान चिल्लाने वालों की यही वास्तविकता है। शासन व्यवस्था में सम्मिलित लोग जो स्वयं को संविधान में आस्था रखने वाला घोषित करते हैं, उन्होंने अपनी आँखों पर पट्टी बांध रखी है अर्थात अपने शास्त्रों का परित्याग कर चुके हैं, धर्म और संस्कृति का परित्याग कर चुके हैं।

  • शास्त्रों ने ब्राह्मण को देवता (भूसुर), विष्णुस्वरूप, शिवस्वरूप कहा है तो ये लोग समान (मानव-मानव एक समान) कहते हैं।
  • शास्त्रों ने ब्राह्मण को जन्मना गुरु (पूज्य/श्रेष्ठ) “जन्मना ब्राह्मणो गुरुः” कहा है तो ये लोग जन्मना अपराधी, उत्पीड़क, अत्याचारी घोषित करते हैं।
  • शास्त्रों ने धर्म का संरक्षक भी ब्राह्मण को घोषित किया है तो ये लोग संविधान को धर्म का संरक्षक घोषित करते हैं, संविधान से धर्म की सत्ता कहते हैं, संविधान को धर्म से ऊपर सिद्ध करते हैं।
जन्मना ब्राह्मणो गुरुः
जन्मना ब्राह्मणो गुरुः

अरे धूर्तों जब यह संविधान नहीं था तब भी धर्म था और जब यह संविधान नहीं रहेगा तब भी धर्म रहेगा तो ये संविधान धर्म का संरक्षक, धर्म से ऊपर कैसे हो सकता है ? ये तो तुम्हारी बौद्धिक जड़ता है अथवा धूर्तता है।

यतो धर्मस्ततो जयः

“ब्राह्मण धर्म का संरक्षक है, क्षत्रिय देश और समाज का संरक्षक है, वैश्य जीवन का संरक्षक है एवं शूद्र शुचिता का संरक्षक है।”

उपरोक्त विश्लेषण से अब तक जो स्पष्ट हुआ है वो इस प्रकार है :

  • आंखों पर पट्टी बांधकर संविधान और कानून इस प्रकार बनाया गया है कि शांतिप्रिय सामाजिक व्यक्ति/वर्ग को अपराधी घोषित किया जा सके और अराजक, दस्यु, उपद्रवी को पुष्पित-पल्लवित किया जा सके।
  • आज शासन व्यवस्था में इन्हीं अराजक, दस्यु, उपद्रवियों का आधिपत्य है इस कारण उत्पीड़ित व्यक्ति/वर्ग को ही उत्पीड़क कहकर पुनः वैधानिक उत्पीड़न भी किया जाता है।
  • संविधान लहराने वाले, संविधान और कानून व्यवस्था का राग अलापने वाले धर्म का परित्याग कर चुके हैं, स्वयं ही अराजकता प्रसारित कर रहे हैं, समाज में अशांति उत्पन्न कर रहे हैं।
  • देश की वर्त्तमान स्थिति यह सिद्ध कर रहा है कि देश में गृहयुद्ध (जातीय संघर्ष) की अग्नि प्रज्वलित की जा चुकी है।

किन्तु इन लोगों के लिये एक तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है और वो है “यतो धर्मस्ततो जयः”, जब तुमने धर्म का परित्याग कर ही दिया है तो उत्पात भले मचा लो, उत्पीड़न भले कर लो किन्तु तुम्हें विजय श्री अंगीकार नहीं करेगी। विजय तो धर्म की ही होगी और जो लोग धर्म के साथ हैं उन्हें इसी वचन का आश्रय है कि संघर्ष का अंतिम परिणाम उनके पक्ष में ही होगा।

किन्तु यहां पर उन लोगों के लिये जो आंशिक रूप से ही सही धर्म के साथ हैं और “धर्मो रक्षति रक्षितः”, “यतो धर्मस्ततो जयः” में विश्वास रखते हैं उनको अपना यह विश्वास और प्रबल करना होगा, धर्मनिष्ठा और शास्त्रनिष्ठा को और सुदृढ़ करना होगा। यदि शास्त्रों में निष्ठा है तो पूरी निष्ठा जागृत करनी होगी आंशिक निष्ठा अपर्याप्त है। धर्म और शास्त्र में निष्ठा का तात्पर्य है कि जो धर्म का स्थापक/संरक्षक है उसके प्रति प्राणपन से समर्पित होना होगा। धर्म का स्थापक/संरक्षक कौन है :

अविप्लुतब्रह्मचर्यैर्गृहस्थश्रममाश्रितैः। पञ्चयज्ञपरैर्धर्मः स्थाप्यते पृथिवीतले॥
महाभारत/आश्वमेधिकपर्व (१४)/९९/२२

भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ही स्वधर्म रत ब्राह्मण को पृथ्वी पर धर्म का स्थापक घोषित करते हैं। यद्यपि वर्त्तमान युग में स्वधर्मरत ब्राह्मणों का अभाव हो गया है और अराजकता का एक कारण स्वयं यही है।

तथापि इसी से यह भी स्पष्ट होता है कि धर्म की स्थापना के लिये ऐसे ब्राह्मणों की ही आवश्यकता है। एवं यदि देश और समाज में शांति-व्यवस्था चाहिये तो वो धर्म से ही संभव है, धर्म चाहिये तो वो ऐसे स्वधर्मरत ब्राह्मणों द्वारा स्थापित होगा और यदि ऐसे ब्राह्मणों को चाहें तो जनमानस को भी शास्त्रनिष्ठा बढाकर ब्राह्मणों का संरक्षण करना होगा ताकि वर्त्तमान पीढ़ी भले ही सुयोग्य न हो किन्तु भविष्य की पीढ़ी सुयोग्य हो। भविष्य की पीढ़ी का अस्तित्व तो वर्त्तमान पीढ़ी के संरक्षण में ही निहित है न।

अचीर्णिव्रतवेदा ये विकर्मफलमाश्रिताः। ब्राह्मणा नाममात्रेण तेऽपि पूज्या युधिष्ठिर॥
महाभारत/आश्वमेधिकपर्व (१४)/९९/२८

धर्म का स्थापक और संरक्षक ब्राह्मण होता है इस विषय को और गंभीरता से समझने के लिये शास्त्रों के अनेकानेक प्रमाणों की आवश्यकता है और इन्हीं प्रमाणों का यहां ब्राह्मण माहात्म्य नाम से संकलन किया गया है।

यहां मात्र प्रमाणों का विस्तृत संकलन किया गया है उसका विश्लेषण नहीं। उसके भावों को समझने के लिये भी यदि प्रयास करेंगे तो शास्त्रनिष्ठा की सुदृढ़ होगा, ब्राह्मणों के संरक्षण में और अंततः धर्म के संरक्षण में किया गया योगदान होगा, अतः जनसामान्यों को यहां प्रस्तुत प्रमाणों का भाव समझने के लिये यथोचित शास्त्रावलोकन, चिंतन-मनन, सत्संगति आदि करनी चाहिये आचार्यों की शरणागति ग्रहण करनी चाहिये।

महाभारत/आश्वमेधिकपर्व (१४)/९९/३८-६१

भागवानुवाच

यदि भारसहस्रं तु गुग्गुल्वादि प्रधूपयेत्। करोति चेन्नमस्कारमुपहारं च कारयेत्॥
स्तौति यः स्तुतिभिर्मां च ऋग्यजुस्सामभिः सदा। न तोषयति चेद्धिप्रान्नाहं तुष्यामि भारत॥
ब्राह्मणे पूजिते नित्यं पूजितोस्मि न संशयः। आक्रुष्टे चाहमाक्रुष्टो भवामि भरतर्षभ॥
परा मयि गतिस्तेषां पूजयन्ति द्विजं हि ये। यदहं द्विजरूपेण वसामि वसुधातले॥
यस्तान्पूजयति प्राज्ञो मद्गतेनान्तरात्मना। तमहं स्वेन रूपेण पश्यामि नरपुङ्गव॥

कुब्जाः काणा वामनाश्च दरिद्रा व्याधितास्तथा। नावमान्या द्विजाः प्राज्ञैर्मम रूपा हि ते द्विजाः॥
ये केचित्सागरान्तायां पृथिव्यां द्विजसत्तमाः। मम रूपं हि तेष्वेवमर्चितेष्वर्चितोऽस्म्यहम्॥
बहवस्तु न जानन्ति नरा ज्ञानबहिष्कृताः। यदहं द्विजरूपेण वसामि वसुधातले॥
अवमन्यन्ति ये विप्रान्स्वधर्मान्पातयन्ति ते। प्रेषणैः प्रेषयन्ते च शुश्रूषां कारयन्ति च॥
मृतांश्चात्र परत्रेमान्यमदूता महाबलाः। निकृन्तन्ति यथाकामं सूत्रमार्गेण शिल्पिनः॥

आक्रोशपरिवादाभ्यां ये रमन्ते द्विजातिषु। तान्मृतान्यमलोकस्थान्निपात्य पृथिवीतले॥
आक्रम्योरसि पादेन क्रूरः संरक्तलोचनः। अग्निवर्णैस्तु संदंशैर्यमो जिह्वां समुद्धरेत्॥
ये च विप्रान्निरीक्षन्ते पापाः पापेन चक्षुषा। अब्रह्मण्याः श्रुतेर्बाह्या नित्यं ब्रह्मद्विषो नराः॥
तेषां घोरा महाकाया वक्रतुण्डा महाबलाः। उद्धरन्ति मुहूर्तेन स्वगाश्चक्षुर्यमाज्ञया ॥
यः प्रहारं द्विजेन्द्राय दद्यात्कुर्याच्च शोणितम्। अस्थिभङ्गं च यः कुर्यात्प्राणैर्वा विप्रयोजयेत्॥

सोनुपूर्व्येण यातीमान्नरकानेकविंशतिम्। शूलमारोप्यते पश्चाज्ज्वलने परिपच्यते॥
बहुवर्षसहस्राणि पच्यमानस्त्ववाक्छिराः। नावमुच्येत दुर्मेदा न तस्य क्षीयते गतिः॥
ब्राह्मणान्वा विचार्यैव व्रजन्तै वधकाङ्क्षया। शतर्वषसहस्राणि तामिस्रे परिपच्यते॥
उत्पाद्य शोणितं गात्रात्संरंभमतिपूर्वकम्। सपर्ययेण यातीमान्नरकानेकविंशतिम्॥

तस्मान्नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कां गतिमीरयेत्। न ब्रूयात्परुषां वाणीं न चैवैनानतिक्रमेत्॥
ये विप्राञ्श्लक्ष्णया वाचा पूजयन्ति नरोत्तमाः। अर्चितश्च स्तुतश्चैव तैर्भवामि न संशयः॥
तर्जयन्ति च ये विप्रान्क्रोशयन्ति च भारत। आक्रुष्टस्तर्जितश्चाहं तैर्भवामि न संशयः॥

यश्चन्दनैश्चागरुधूपदीपैरभ्यर्चयेत्काष्ठमयीं ममार्चाम्।
तेनार्चितो नैव भवामि सम्यग्विप्रार्चनादस्मि समर्चितोऽहम्॥
विप्रप्रसादाद्धरणीधरोऽहं विप्रप्रसादादसुराञ्जयामि।
विप्रप्रसादाच्च सदक्षिणोऽहं विप्रप्रसादादजितोऽहमस्मि॥

महाभारत/आश्वमेधिकपर्व (१४)/९९/३८-६१

स्कन्दपुराण/(७) प्रभासखण्डः)/प्रभासक्षेत्र माहात्म्य/२२/६६ – १०२

ब्राह्मणाश्चैव देवाश्च तेज एकं द्विधा कृतम्। प्रत्यक्षं ब्राह्मणा देवाः परोक्षं दिवि देवताः॥
न विना ब्राह्मणा देवैर्न देवा ब्राह्मणैर्विना। एकत्र मन्त्रास्तिष्ठन्ति तेज एकत्र तिष्ठति॥
ब्राह्मणा देवता लोके ब्राह्मणा दिवि देवताः। त्रैलोक्ये ब्राह्मणाः श्रेष्ठा ब्राह्मणा एव कारणम् ॥

पितुर्नियुक्ताः पितरो भवंति क्रियासु दैवीषु भवंति देवाः।
द्विजोत्तमा हस्तनिषक्ततोयास्तेनैव देहेन भवंति देवाः ॥
षट्कर्मतत्त्वाभिरतेषु नित्यं विप्रेषु वेदार्थकुतूहलेषु।
न तेषु भक्त्या प्रविशंति घोरं महाभयं प्रेतभवं कदाचित् ॥
यद्ब्राह्मणाः स्तुत्यतमा वदन्ति तद्देवता कर्मभिराचरंति ।
तुष्टेषु तुष्टाः सततं भवन्ति प्रत्यक्षदेवेषु परोक्षदेवाः ॥

यथा रुद्रा यथा देवा मरुतो वसवोऽश्विनौ । ब्रह्मा च सोमसूर्यौ च तथा लोके द्विजोत्तमाः ॥
देवाधीनाः प्रजाः सर्वा यज्ञाधीनाश्च देवताः। ते यज्ञा ब्राह्मणाधीनास्तस्माद्देवा द्विजोत्तमाः ॥
ब्राह्मणानर्चयेन्नित्यं ब्राह्मणांस्तर्पयेत्सदा। ब्राह्मणास्तारका लोके ब्राह्मणात्स्वर्गमश्नुते ॥

अभेद्यमच्छेद्यमनादिमक्षयं विधिं पुराणं परिपालयन्ति ।
महामतिस्तानभिपूज्य वै द्विजान्भवेदजेयो दिवि देवराडिव ॥

शक्यं हि कवचं भेत्तुं नाराचेन शरेण वा। अपि वज्र सहस्रेण ब्राह्मणाशीः सुदुर्भिदा ॥
हुतेन शाम्यते पापं हुतमन्नेन शाम्यति। अन्नं हिरण्यदानेन हिरण्यं ब्राह्मणाशिषा ॥
य इच्छेन्नरकं गंतुं सपुत्रपशुबांधव। देवेष्वधिकृतं कुर्याद्ब्राह्मणेषु च गोषु च ॥

ब्राह्मणान्द्वेष्टि यो मोहाद्देवान्गाश्च मखान्यदि। नैव तस्य परो लोको नाऽयं लोको दुरात्मनः ॥
अनिन्द्या ब्राह्मणा गावः कांचनं सलिलं स्त्रियः। पृथिवी तु षडेतानि यो निन्दति स पातकी ॥
अग्रं धर्मस्य राजानो मूलं धर्मस्य ब्राह्मणाः। तस्मान्मूलं न हिंसीत मूले ह्यग्रं प्रतिष्ठितम् ॥
फलं धर्मस्य राजानः पुष्पं धर्मस्य ब्राह्मणाः। तस्मात्पुष्पं न हिंसीत पुष्पात्संजायते फलम् ॥

राजा वृक्षो ब्राह्मणास्तस्य मूलं पौराः पर्णं मन्त्रिणस्तस्य शाखाः।
तस्माद्राज्ञा ब्राह्मणा रक्षणीया मूले गुप्ते नास्ति वृक्षस्य नाशः ॥

आसन्नो हि दहत्यग्निर्दूराद्दहति ब्राह्मणः। प्ररोहत्यग्निना दग्धं ब्रह्मदग्धं न रोहति ॥
ब्राह्मणानां च शापेन सर्वभक्षो हुताशनः। समुद्रश्चाप्यपेयस्तु विफलश्च पुरंदरः ॥
त्वं चन्द्र राजयक्ष्मी च पृथिव्यामूषराणि च। सूर्याचन्द्रमसोः पातः पुनरुद्धरणं तयोः ॥
वनस्पतीनां निर्यासो दानवानां पराजयः। नागानां च वशीकारः क्षत्रस्योत्सादनं तथा ॥
देवोत्पत्ति विपर्यासो लोकानां च विपर्ययः । एवमादीनि तेजांसि ब्राह्मणानां महात्मनाम् ॥

तस्माद्विप्रेषु नृपतिः प्रणमेन्नित्यमेव च । परा मप्यापदं प्राप्तो ब्राह्मणान्न प्रकोपयेत् ॥
ते ह्येनं कुपिता हन्युः सद्यः सबलवाहनम् । प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत् ॥
एवं विद्वानविद्वान्वा ब्राह्मणो दैवतं महत् । श्मशानेष्वपि तेजस्वी पावको नैव दुष्यति ॥
हूयमानश्च यज्ञेषु भूय एवाभिवर्द्धते । एवं यद्यप्य निष्टेषु वर्त्तते सर्वकर्मसु ॥
सर्वेषां ब्राह्मणः पूज्यो दैवतं परमं महत् । क्षत्रस्यातिप्रवृद्धस्य ब्राह्मणानां प्रभावतः ॥

ब्राह्मं हि परमं पूज्यं क्षत्रं हि ब्रह्मसंभवम् । अद्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् ॥
तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति । यान्समाश्रित्य तिष्ठन्ति देवलोकाश्च सर्वदा ॥
ब्रह्मैव वचनं येषां को हिंस्यात्ताञ्जिजीविषुः । म्रियमाणोऽप्याददीत न राजा ब्राह्मणात्करम् ॥
न च क्षुधाऽस्य संसीदेद्ब्राह्मणो विषये वसन् ।यस्य राज्ञश्च विषये ब्राह्मणः सीदति क्षुधा ॥
तस्य तच्छतधा राष्ट्रमचिरादेव सीदति । यद्राजा कुरुते पापं प्रमादाद्यच्च विभ्रमात् ॥

वसन्तो ब्राह्मणा राष्ट्रे श्रोत्रियाः शमयन्ति तत् । पूर्वरात्रांतरात्रेषु द्विजैर्यस्य विधीयते ॥
स राजा सह राष्ट्रेण वर्धते ब्रह्मतेजसा । ब्राह्मणान्पूजयेन्नित्यं प्रातरुत्थाय भूमिपः ॥
ब्राह्मणानां प्रसादेन दीव्यन्ति दिवि देवताः । अथ किं बहुनोक्तेन ब्राह्मणा मामकी तनुः ॥
ये केचित्सागरांतायां पृथिव्यां कीर्तिता द्विजाः । तद्रूपं देवदेवस्य शिवस्य परमात्मनः ॥
एतान्द्विषंति ये मूढा ब्राह्मणान्संशितव्रतान् । ते मां द्विषंति वै नूनं पूजनात्पूजयन्ति माम्॥
न प्रद्वेषस्ततः कार्यो ब्राह्मणेषु विजानता । प्रद्वेषेणाशु नश्यन्ति ब्रह्मशापहता नराः ॥

स्कन्दपुराण/(७) प्रभासखण्डः)/प्रभासक्षेत्र माहात्म्य/२२/६६ – १०२

ब्राह्मण माहात्म्य में मुख्य रूप से महाभारत और स्कन्द पुराणों के इन्हीं प्रमाणों को ग्रहण किया गया है जो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण और भगवान शिव का ही वचन है। यह स्पष्ट है कि जो कोई भी ब्राह्मण का विरोधी है, जातिव्यवस्था और वर्णाश्रम व्यस्था का विरोधी है, अंतर्जातीय व्यवस्था का समर्थक/पोषक है वह वास्तव में धर्मद्रोही ही है भले ही वह “जय श्री राम” का नारा क्यों न लगा रहा हो। किन्तु इससे जो सहमत नहीं है अथवा जो इनके विरुद्ध है वो कहीं न कहीं धर्म के साथ है और ऐसे लोगों को धर्म में अपनी दृढ़ता और बढ़ाने की आवश्यकता है। दृढ़निश्चय करके उद्घोष करना होगा “ब्राह्मण है तो धर्म है”

वर्त्तमान में जो प्रत्यक्षतः जातीय संघर्ष उत्पन्न होता हुआ दिखाई पर रहा है वास्तव में यह धर्मयुद्ध का ही शंखनाद है, मुख्य पक्ष तो दो ही हैं धर्म और अधर्म किन्तु इसमें एक तृतीय पक्ष भी है जो धर्म का पक्षधर होते हुये भी मौन है, संघर्ष से बाहर रहना चाहता है जैसे अर्जुन युद्धभूमि में युद्ध से विरत हो रहा था।

  • धर्म के पक्ष में अत्यल्प संख्या है, जैसे पांडवों की संख्या कम थी।
  • अधर्म के पक्ष में अधिक संख्या है, जैसे कौरवों की संख्या अधिक थी।

मौन रहने वाला वास्तव में तृतीय पक्ष नहीं है अपितु अर्जुन की भांति संघर्ष से विरत होने का इच्छुक है। इसकी संख्या वास्तव में सर्वाधिक है। इस पक्ष की पहचान यह है कि यह व्यक्तिगत रूप से ब्राह्मणों को सम्मान देता है, श्रेष्ठ और पूज्य मानता है और यदि अधर्मी पक्ष के लिये ईर्ष्या और द्वेष का कारण है कि ये लोग निजी रूप से ब्राह्मणों को बाबा जी, महाराज जी, सरकार आदि क्यों कहते हैं, सम्मान क्यों देते हैं, नतमस्तक क्यों होते हैं ?

यह पक्ष व्यक्तिगत रूप से धर्म के साथ तो है किन्तु सार्वजनिक रूप से धर्म की रक्षा के लिये आगे नहीं आ रहा है और इसी कारण अधर्मियों को ऐसा लगता है कि वो धर्म पर विजय प्राप्त कर लेंगे क्योंकि वो संख्याबल में अधिक हैं। किन्तु वो यह भूल चुके हैं कि सिद्धांत “यतो धर्मस्ततो जयः” का ही है और यही अंतिम परिणाम प्राप्त होगा।

किन्तु जो मौन है वह भी इस सिद्धांत के प्रति, धर्मपालन, शास्त्र के प्रति दृढ आस्था नहीं रखता है। उसका धर्म मात्र इतना ही शेष है कि वो परम्परवश ब्राह्मणों के प्रति नतमस्तक होता है और वाचा सम्मान बाबा जी, महाराज जी, पंडित/पंडी/पंडा जी, सरकार आदि सम्बोधित करके व्यक्त करता है। यदि ये अपने मौन मात्र का परित्याग कर दे और स्पष्ट रूप से धर्म के पक्ष में दृढ़निश्चयी होकर खड़ा हो जाये तो अधर्म के पक्षधर तत्काल बिल में छुप जायेंगे।

ब्राह्मण है तो धर्म है

इस पक्ष को यह लगता है कि ये जिधर खड़ा होगा उधर विजय की प्राप्ति होगी किन्तु यही भ्रम है जैसे अर्जुन को भ्रम हो गया था। विजय धर्म की ही होगी उसका श्रेय लेना है अथवा नहीं अर्जुन को मात्र यह निर्णय लेने की आवश्यकता थी और भगवान श्रीकृष्ण ने यही समझाया कि अधर्म का नाश तो होगा ही होगा तुम युद्ध करो अथवा न करो। इस मौन धारण करने वाले समूह को यह निश्चय करने की आवश्यकता है कि धर्म का ही पक्ष दृढ़ता से धारणीय है।

ब्राह्मण माहात्म्य के लिये शास्त्रों में यत्र-तत्र और भी ढेरों श्लोक प्राप्त होते हैं। इन प्रमाणों से यह भी सिद्ध होगा कि “ब्राह्मण है तो धर्म है”, वर्णों में ही नहीं मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है क्योंकि वह पृथ्वी पर घूमने वाला देवता है, साक्षात विष्णुस्वरूप है, शिवस्वरूप है।

देवाः परोक्षदेवाः, प्रत्यक्षदेवा ब्राह्माणाः ॥
ब्राह्मणैर्लोका धार्यन्ते ॥
ब्राह्मणानां प्रसादेन दिवि तिष्ठन्ति देवताः ।
ब्राह्मणाभिहितं वाक्यं न मिथ्या जायते क्वचित् ॥
यद्ब्राह्मणास्तुष्टतमा वदन्ति तद्देवताः प्रत्यभिनन्दयन्ति ।
तुष्टेषु तुष्टाः सततं भवन्ति प्रत्यक्षदेवेषु परोक्षदेवाः ॥

विष्णु स्मृति १९/२०-२३

ब्राह्मणान्वेदविदुषः सर्वशास्त्रविशारदान् । तत्र वर्षति पर्जन्यो यत्रैतान्पूजयेन्नृपः ॥
त्रयो लोकास्त्रयो वेदा आश्रमाश्च त्रयोऽग्नयः । एतेषां रक्षणार्थाय संसृष्टा ब्राह्मणाः पुरा ॥

अत्रि संहिता २४-२५

जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संरकारैर्द्विज उच्यते । विद्यया याति विप्रत्वं श्रोत्रियस्त्रिभिरेव च ॥
वेदशास्त्राण्यधीते यः शास्त्रार्थ च निषेवते । तदाऽसौ वेदवित्योक्तो वचनं तस्य पावनम् ॥
एकोऽपि वेद‌विद्धर्मं यं व्यवस्येद्विजोत्तमः । स ज्ञेयः परमो धर्मो नाज्ञानामयुतायुतैः ॥

अत्रि संहिता १४१-१४४

ब्रह्मस्वे मा रतिं कुर्यात्प्राणैः कण्ठगतैरपि । अनौषधमभैषज्यं विषमेतद्धलाहलम् ॥
न विषं विषमित्याहुर्ब्रह्मस्वं विषमुच्यते । विषमेकाकिनं हन्ति ब्रह्मस्वं पुत्रपौत्रकम् ॥
लोहचूर्णाश्मचूर्णं च विषं च जरयेन्नरः । ब्रह्मस्वं त्रिषु लोकेषु कः पुमाञ्जरयिष्यति ॥

मन्युप्रहरणा विप्रा राजानः शस्त्रपाणयः । शस्त्रमेकाकिनं हन्ति विभमन्युः कुलत्रयम् ॥
मन्युप्रहरणा विप्राञ्चक्रप्रहरणो हरिः । चक्रात्तीव्रतरो मन्युस्तस्माद्विप्रं न कोपयेत् ॥
अग्निदग्धाः प्ररोहन्ति सूर्यदग्धास्तथैव च । मन्युदग्धस्य विप्राणामङ्कुरो न प्ररोहति ॥
अग्निर्दहति तेजसा सूर्यो दहति रश्मिभिः । राजा दहति दण्डेन विप्रो दहति मन्युना ॥

ब्रह्मस्वेन तु यत्सौख्यं देवरेन तु या रतिः । तद्धनं कुलनाशाय भवत्यात्मविनाशनम् ॥
बृहस्पति स्मृति ४५ – ५२

धर्मशास्त्रं समारूढो वेदखङ्गधरो द्विजः । विद्वान्स्वयं तु यद्ब्रूयात्स धर्मः परमः स्मृतः ॥
लघु शातातप स्मृति १७१ – १७२

धर्मशास्त्र रथारूढा वेदखङ्गधरा द्विजाः । क्रीडार्थमपि यद्ब्रूयुः स धर्मः परमः स्मृतः ॥
बौधायन स्मृति १/१/१४, स्कन्द पुराण ४/४०/३८, ५/२८/१०

प्रतिश्रयं पादशौचं ब्राह्मणानां च तर्पणम् । न पापं संस्पृशेत्तस्य बलिं भिक्षां ददाति यः ॥
पादोदकं पादघृतं दीपमन्नं प्रतिश्रयम् । यो ददाति ब्राह्मणेभ्यो नोपसर्पति तं यमः ॥
विप्रपादोदकक्लिन्ना यावत्तिष्ठति मेदिनी । तावत्पुष्करपात्रेषु पिबन्ति पितरो जलम् ॥
यत्फलं कपिलादाने कार्तिक्यां ज्येष्ठपुष्करे । तत्फलं पाण्डवश्रेष्ठविप्राणां पादशोधने ॥
स्वागतेनाग्नयः प्रीता आसनेन शतक्रतुः । पितरः पादशौचेन अन्नाद्येन प्रजापतिः ॥
मातापित्रोः परं तीर्थ गङ्गा गावो विशेषतः । ब्राह्मणात्परमं तीर्थ न भूतं न भविष्यति ॥

वेदव्यास स्मृति ४/७ – १२

अहन्यहनि दातव्यं ब्राह्मणेभ्यो युधिष्ठिर । आगमिष्यति यत्पात्रं तत्पात्रं तारयिष्यति ॥
किंचिद्वेदमयं पात्रं किंचित्पात्रं तपोमयम् । पात्राणामुत्तमं पात्रं शुद्गान्नं यस्य नोदरे ॥

वेदव्यास स्मृति ४/३२ – ३३

ब्राह्मणो येन जायेत नान्यो वर्णः कथंचन । ईदृशं रथमास्थाय कोऽन्यस्तं त्यक्तुमुत्सहेत् ॥
ब्राह्मणः स भवेच्चैव देवानामपि दैवतम् । प्रत्यक्षं चैव लोकस्य ब्रह्मतेजो हि कारणम् ॥
ब्राह्मणस्य मुखं क्षेत्रं निरूषरमकण्टकम् । वापयेत्तत्र बीजानि सा कृषिः सार्वकामिकी ॥
सुक्षेत्रे वापयेद्बीजं सुपात्रे दापयेद्धनम् । सुक्षेत्रे च सुपात्रे च क्षिप्तं नैव विनश्यति ॥
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गृहमागते । क्रीडन्त्योषधयः सर्वा यास्यामः परमां गतिम् ॥

वेदव्यास स्मृति ४/४८ – ५२

यस्य देहे सदाऽश्नन्ति हव्यानि त्रिदिवौकसः । कव्यानि चैव पितरः किं भूतमधिकं ततः ॥ वेदव्यास स्मृति ४/५६

पंक्तभेदी वृथापाकी नित्यं ब्राह्मणनिन्दकः । आदेशी वेदविक्रेता पञ्चैते ब्रह्मघातकाः॥ वेदव्यास स्मृति ४/७२

अग्रं वृक्षस्य राजानो मूलं वृक्षस्य ब्राह्मणाः । तस्मान्मूलं न हिंसीयान्मूलादग्रं प्ररोहति ॥
फलं वृक्षस्य राजानः पुष्पं वृक्षस्य ब्राह्मणाः । तस्मात्पुष्पं न हिंसीयात्पुष्पात्संजायते फलम् ॥
गावो भूमिः कलत्रं च ब्रह्मस्वहरणं तथा । यस्तु न त्रायते राजा तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥

शंखलिखित स्मृति २२ – २४

दहत्यग्निस्तेजसा च सूर्यो दहति रश्मिना । राजा दहति दण्डेन विप्रो दहति मन्युना ॥
मन्युप्रहरणा विप्राश्चक्रप्रहरणो हरिः । चक्रात्तीक्ष्णतरो मन्युस्तस्माद्विप्रान्न कोपयेत् ॥
अग्निदग्धं प्ररोहेत सूर्यदग्धं तथैव च । दण्डयस्तु संप्ररोहेत ब्रह्मशापहतो हतः ॥

शंखलिखित स्मृति ३० – ३२

दद्याद्व्रतानि नामानि तेभ्यः श्रद्धासमन्वितः । संतुष्टा ब्राह्मणा दद्युरनुज्ञां व्रतकारिणे ॥
जपच्छिद्रं तपश्छिद्रं यच्छिद्रं यज्ञकर्मणि । सर्वं भवति निश्छिद्रं यस्य चेच्छन्ति ब्राह्मणाः ॥
ब्राह्मणा यानि भाषन्ते मन्यन्ते तानि देवताः । सर्वदेवमया विप्रा न तद्वचनमन्यथा ॥
उपवासो व्रतं चैव स्नानं तीर्थफलं तपः । विप्रैः संपादितं यस्य संपन्नं तस्य तत्फलम् ॥
संपन्नमिति तद्वाक्यं वदन्ति ऋषिदेवताः । प्रणम्य शिरसा सार्धमग्निष्टोमफलं लभेत् ॥
ब्राह्मणा जङ्गमं तीर्थं निर्मलं सार्वकामिकम् । तेषां वाक्योदकेनैव शुध्यन्ति मलिनो जनाः ॥

शातातप स्मृति १/२९ – ३४

छागस्य दक्षिणे कर्णे पाणौ विप्रस्य दक्षिणे । अप्सु चैव कुशस्तम्बे पावकः परिपठ्यते ॥
बौधायन स्मृति १/४/२

त्रीणि देवाः पवित्राणि ब्राह्मणानामकल्पयन् । अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तं यच्च वाचा प्रशस्यते ॥
बौधायन स्मृति १/५/६४

मा देहीति च यो ब्रूयाद्गवाग्निब्राह्मणेषु च । तिर्यग्योनिशतं गत्वा चांडालेष्वभिजायते ॥
स्कंदपुराण ४/४०/१२०

ब्रह्मच्छिद्रं जपच्छिद्रं यच्छिद्रं यज्ञकर्मणि । अच्छिद्रं जायते सर्वं ब्राह्मणैरुपपादितम् ॥
अच्छिद्रमिति यद्वाक्यं वदंति क्षितिदेवताः । प्रणश्यत्यखिलं पापमग्निष्टोमफलं भवेत् ॥

स्कन्द पुराण ५/२८/११ – १२

ब्रह्मस्वे नो रतिं कुर्यात्प्राणैः कंठगतैरपि । अग्निदग्धाः प्ररोहंति ब्रह्मदग्धो न रोहति ॥
अग्निदग्धाः प्ररोहंति सूर्यदग्धास्तथैव च । राजदंडहताश्चैव ब्रह्मशापहता हताः ॥
ब्रह्मस्वेन च पुष्टानि अंगानि च मुहुर्महुः । कार्यकालेविशीर्यंते सिकताभि तपो यथा ॥
ब्रह्मस्वहरणं कुर्वन्नरो यातीह रौरवम् । न विषं विषमित्याहुर्ब्रह्मस्वं विषमुच्यते ॥
विषमेकाकिनं हन्ति ब्रह्मस्वं पुत्रपौत्रिकम् । लोहचूर्णं चाश्मचूर्णं विषं संजरयेन्नरः ॥

ब्रह्मस्वं त्रिषु लोकेषु कः पुमान्जरयिष्यति । ब्रह्मस्वेन तु यत्सौख्यं देवस्वेन तु या रतिः ॥
तद्धनं कुलनाशाय भवत्यात्मविनाशनम् । ब्रह्मस्वं ब्रह्महत्या च दरिद्रस्य तु यद्धनम् ॥
गुरुमित्रहिरण्यं च स्वर्गस्थमपि पीडयेत् ॥

पद्मपुराणम्/ ६ (उत्तरखण्डः)/३२/४२ – ४९

न विषं विषमित्याहुर्ब्रह्मस्वं विषमुच्यते ॥
विषमेकाकिनं हंति ब्रह्मस्वं पुत्रपौत्रकम्। ब्रह्मस्वेन च दग्धेषु पुत्रदारगृहादिषु ॥
न च तेऽपि तिष्ठंति ब्रह्मस्वेन विनाशिताः । न नाकं लभते सोऽथ सदा ब्रह्मस्वहारकः ॥
यदा वराटिकां चैव ब्राह्मणस्य हरंति ये । ततो जन्मत्रयाण्येव हर्त्ता निरयमाव्रजेत् ॥
पूर्वजा नोपभुंजंति तत्प्रदत्तं जलं क्वचित्। क्षयाहे नोपभुंजंति तस्य पिंडोदकक्रियाः ॥
संततिं नैव लभते लभ्यमाना न जीवति । यदि जीवति दैवाच्चेद्भ्रष्टाचारा भवेदिति ॥

स्कन्दपुराणम्/(३) (ब्रह्मखण्डः)/धर्मारण्य खण्डः/३९/१५ – २०

निष्कर्ष

उपरोक्त शास्त्रीय विवेचन से यह निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है कि ब्राह्मण केवल एक जाति नहीं, अपितु धर्म की साक्षात प्रतिमूर्ति और इस भूतल पर देवताओं के प्रतिनिधि हैं। जब हम “धर्मो रक्षति रक्षितः” कहते हैं, तो उस धर्म की व्यावहारिक रक्षा का दायित्व ब्राह्मणों पर ही है। वर्तमान कलिकाल में यदि समाज और राष्ट्र को अधर्म के गर्त से निकलना है, तो उसे पुनः शास्त्र और शास्त्र के संरक्षण ब्राह्मण की महत्ता को स्वीकार करना होगा।

बिना ब्राह्मणों के संरक्षण के धर्म की सत्ता निराधार है, और बिना धर्म के समाज का अस्तित्व संभव नहीं है। अतः प्रत्येक धर्मनिष्ठ व्यक्ति का यह परम कर्तव्य है कि वह ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धावान रहकर धर्म की रक्षा में अपना योगदान दे।

F&Q :

FAQ

प्रश्न : शास्त्रों में ब्राह्मण को ‘भूसुर’ क्यों कहा गया है?

उत्तर: ‘भूसुर’ का अर्थ है पृथ्वी पर देवता। ब्राह्मण अपनी तपस्या और शास्त्रज्ञान से समाज का मार्गदर्शन करते हैं, इसलिए उन्हें यह संज्ञा दी गई है।

प्रश्न: क्या ब्राह्मण का महत्व केवल जन्म से है?

उत्तर: शास्त्र “जन्मना ब्राह्मणो गुरुः” कहते हैं, किंतु संस्कार और विद्या उसे ‘द्विज’ और ‘विप्र’ बनाती है।

प्रश्न: क्या ब्राह्मण के बिना धर्म की रक्षा संभव है?

उत्तर: नहीं, क्योंकि शास्त्रों के व्याख्याता और यज्ञों के संचालक के रूप में ब्राह्मण ही धर्म के आधार हैं।

प्रश्न: क्या ब्राह्मण की निंदा करना पाप है?

उत्तर: हाँ, शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण की निंदा करने वाले का पुण्य क्षीण हो जाता है।

अस्वीकरण: इस आलेख में प्रस्तुत विचार पूर्णतः सनातन हिंदू शास्त्रों (पुराणों, स्मृतियों और महाभारत) के प्रमाणों पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी भी वर्ग या आधुनिक व्यवस्था का अपमान करना नहीं, अपितु शास्त्रों में वर्णित ‘ब्राह्मण माहात्म्य’ को मूल रूप में प्रस्तुत करना है। पाठक इन विचारों को शास्त्रीय और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ग्रहण करें।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

Leave a Reply