इस प्रकार वह रक्त जिसका संबंध वृत्रासुर के ब्रह्महत्या है जब दिखे तो स्त्री रजस्वला कहलाती है। इन्द्रस्य ब्रह्महत्यास्ति यस्मिन् तस्मिन्दिनत्रये। – गरुडपुराण
वृत्त (वृत्र) सिद्ध्यर्थ अङ्गिरा व आपस्तम्ब वचन – स्त्री को तब तक साध्वी नहीं बनना चाहिये जब तक रज की प्रवृत्ति रहे। रजोवृत्ति अथवा वृत्त (वृत्र संबंधी ब्रह्महत्या) का रज रहने तक गृहकर्म करते हुये इन्द्रिय संयम मात्र रखने से साध्वी होती है : साध्वाचारा न तावत्सा रजो यावत्प्रवर्तते । वृत्ते रजसि साध्वी स्याद्गृहकर्मणि चेन्द्रिये ॥
जिस तथ्य के शास्त्रों में प्रमाण हों उसे भी मिथक सिद्ध करने का एक षड्यंत्र नास्तिकों द्वारा किया जा रहा है। मिथक वो होता है जो मिथ्या या काल्पनिक मात्र हो, परन्तु जो वेद-पुराणों में वर्णित हैं वो मिथक नहीं कहे जा सकते क्योंकि वो प्रामाणिक मान्य होते हैं। नास्तिकों को न मानना हो तो न माने परन्तु आस्तिकों पर अत्याचार न करे। शास्त्रोक्त तथ्यों को मिथक सिद्ध करने का प्रयास नास्तिकों का आस्तिकों के ऊपर अत्याचार करना है।
यहां रजस्वला से सम्बंधित वो शास्त्रोक्त तथ्य दिये जा रहे हैं जिसे सभी भारतीय आस्तिक स्वीकारते हैं और चाहे वो वामपंथी हो या नास्तिक अपने पाजामे में ही अपना पैर रखे। जो तथ्य शास्त्र से प्रमाणित है उसे मिथक कहने की कुचेष्टा न करे। इस विषय में शासन को ऐसा विधान भी करना चाहिये की शास्त्र प्रमाणित तथ्यों को कोई नास्तिक/वामपंथी मिथक/परम्परा/मान्यता/प्रथा/कुप्रथा आदि कहने की चेष्टा न किया करे। जो शास्त्रों में उल्लिखित हो वह विहित-निषिद्ध, कर्तव्याकर्तव्य आदि होता है।
शास्त्रों में उल्लिखित है कि स्त्रियों का रजस्वला होना ब्रह्महत्या का भाग है तो इसमें कुछ भी मिथक (मिथ्या) नहीं है यह शास्त्र प्रमाणित है।
- रजस्वला के हाथ में रखने पर ताजा फूल भी शीघ्र मुरझाने लगता है।
- रजस्वला के निकट रहने वाला अथवा स्पर्श किया हुआ तुलसी आदि का पौधा शीघ्र सूख जाता है।
- शहरों में तो नहीं, किन्तु गावों में अभी भी आचार-निमकी आदि बनाकर (वर्ष भर के लिये) रखा जाता है, रजस्वला द्वारा स्पर्श किये गये पात्र के सारे आचार शीघ्र ही सड़ने लगते हैं।
- इस विषय में कई प्रकार के वैज्ञानिक शोध भी किये गये हैं और रजस्वला का नकारात्मक प्रभाव पाया गया है।
रजस्वला के अन्य पर्याय : रजस्वला के अन्य पर्यायवाची शब्द हैं – ऋतुमती, उदकी, पुष्पिणी, आत्रेयी, मलवद्वासा, रजकी, आर्तवी आदि।