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रजस्वला स्त्री का अर्थ | काल, नियम इत्यादि सम्पूर्ण जानकारी

रजस्वला स्त्री का अर्थ | काल, नियम इत्यादि सम्पूर्ण जानकारी रजस्वला स्त्री का अर्थ | काल, नियम इत्यादि सम्पूर्ण जानकारी

रजस्वला काल निर्णय

अष्टवर्षा भवेद्गौरी नववर्षा तु रोहिणी। दशवर्षा भवेत्कन्या अत ऊर्ध्वं रजस्वला॥ – पाराशर स्मृति; आठ वर्ष की गौरी, नव वर्ष की रोहिणी और दशवर्ष होने पर कन्या संज्ञा, तत्पश्चात रजस्वला। यहां रजस्वला का तात्पर्य नीयत काल में रजोदर्शन परक है न कि संज्ञापरक। अर्थात दशवर्ष के उपरान्त कन्या संज्ञक होने के असिद्धि का बोधक है।

रजस्वला काल निर्धारण में एक सामान्य सूत्र इस प्रकार है : रजस्वला त्रिरात्रमशुचिः स्यात्। चतुर्थेऽहनि स्नात्वा शुध्येत्। भर्तुः स्पृश्या स्यात्। दैवे पित्र्ये च कार्ये रजौनिवृत्तौ पञ्चमादिदिने शुद्धा॥ अर्थात तीन रात्रि तक रजस्वला अशुद्ध रहती है। चौथे दिन स्नान करके शुद्धि प्राप्त तो करती किन्तु पति के लिये ही स्पर्शयोग्य होती है। देव-पितृ कार्यों के लिये रजनिवृत्ति हो जाने पर पञ्चमादि दिन अर्थात यदि रजनिवृत्ति न हुई हो तो आगे भी अशुद्ध ही मान्य।

रजस्वला स्त्री का अर्थ
रजस्वला स्त्री का अर्थ

प्रथमेऽहनि चण्डाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी। तृतीये रजकी प्रोक्ता चतुर्थेऽहनि शुध्यति ॥ – पाराशर स्मृति

उपरोक्त श्लोक की प्राप्ति विभिन्न स्मृति-पुराणादि से होती है।  “चतुर्थेऽहनि शुद्ध्यति” का की बार अनुचित अर्थ भी ग्रहण कर लिया जाता है और वो यह कि जब शुद्धि हो गई तो पूर्ववत् कर्माधिकार भी प्राप्त हो गया। किन्तु कर्माधिकार के लिये भी शास्त्रों में प्रमाण उपलब्ध हैं। भर्तुः स्पृश्या चतुर्थेऽह्नि स्नानेन स्त्री रजस्वला। पञ्चमेऽहनि योग्या स्याद्दैवे पित्र्ये च कर्मणि ॥ – भारद्वाज के इस वचन को भी अन्य स्मृत्यादि में पाया जाता है कि चतुर्थ दिन स्नानोपरांत रजस्वला स्त्री पति स्पर्श की अधिकारिणी होती है, देव-पितृ कर्म के योग्य पांचवें दिन होती है।

पांचवें दिन में भी एक अन्य विशेषता है कि यदि रजनिवृत्ति हो गई हो उस स्थिति में पांचवें दिन अन्यथा पांचवें दिन के उपरांत रजनिवृत्ति हो तो तदनुसार योग्या होगी। कहीं-कहीं सात दिनों में भी शुद्धि का वचन प्राप्त होता है। सात दिनों में शुद्धि का तात्पर्य यही है कि यदि पंचम दिन रजस्राव बंद न हुआ हो तो आगे छठे दिन शुद्धि नहीं सातवें दिन माने अर्थात देव-पितृ कर्म की योग्यता की प्राप्ति उस स्थिति में सातवें दिन होगी।

व्रत मध्य में रजस्वला होने पर

प्रारब्धदीर्घतपसां नारीणां यद्रजो भवेत् । न तेन तद्व्रतं तासामुपहन्येत कर्हिचित् ॥ स्वभाव एष नारीणां ज्ञेयो मूत्रपुरीषवत्। अत ऊर्ध्वं न दुष्यन्ति चरेयुश्चैव तद्व्रतम् ॥ – अङ्गिरा, अत्रि के समान वचनों से यदि कोई नारी दीर्घ अर्थात् की दिनों तक चलने वाला तप (व्रतादि) में स्थित हो तो प्रारब्धवश प्राप्त रज से उस व्रत का नाश नहीं होता। उपरोक्त स्थिति में (दीर्घ तप) इस नारी स्वभाव (रजोवती होना) को मूत्र-पुरीष उत्सर्जन के समान ही होता है उससे अधिक दूषित करने वाला नहीं।

उपरोक्त वचन से ऐसा प्रतीत होता है कि नवरात्रा आदि में जो स्त्री स्थित हो जाये उसके लिये रजस्वला होने पर भी कोई विघ्न उपस्थित नहीं होगा अर्थात् सभी पूजा, जप आदि यथावत कर सकती है । ऐसा भी हो सकता है कि यहां से आगे का प्रमाण पढे बिना कोई ऊपर के प्रमाण का तदनुसार जो भाव व्यक्त हुआ उतना ही ग्रहण करे, स्वयं भी भ्रमित रहे अन्यों को भी करे ।

अङ्गिरास्मृति में ही पुनः आगे कहा गया है – नियमस्था यदा नारी प्रपश्येदन्तरा रजः । उपोष्यैव तु ता रात्रीः शेषं स्नात्वा चरेद्व्रतम् ॥ अर्थात् नियम में स्थित स्त्री यदि रजस्वला हो जाये तो उक्त रात्रि की उपासना कर ले, और शेष व्रत जो स्नान के उपरांत करे।

यह वचन अङ्गिरा के ही पूर्वोक्त वचन के विरुद्ध प्रतीत होता है। अब क्या हो ? दो अलग ऋषियों के वचन में विरोधाभास होना सामान्य बात है यहां तो एक ही ऋषि के दो वचनों में विरोधाभास होने लगा।

  1. वास्तव में प्रथम वचन यह स्पष्ट करता है कि व्रत में स्थित होने पर रजस्वला हो जाने से व्रतभंग नहीं होगा ।
  2. द्वितीय वचन में यह स्पष्ट किया गया है कि व्रत भंग तो नहीं होगा किन्तु उपासना (पूजा आदि) मात्र उसी रात की पूर्ण करे जिस दिन रजोदर्शन हुई हो ।
  3. आगे स्नान का तात्पर्य रजस्वला स्नान है, अर्थात् शेष क्रियायें रजस्वला स्नानोपरांत करे।
  4. अर्थात व्रत तो भंग नहीं होगा किन्तु पूजा आदि करने के लिये प्रतिनिधि (अन्य कथन) का विकल्प ग्रहण करे। स्वयं रजस्वला संज्ञक स्नान के उपरांत आगे की क्रिया करे अर्थात व्रतस्थिता स्त्री के लिये पांचवें, सातवें आदि दिन नहीं रजस्वला संज्ञक स्नान से ही शुद्धि होती है।

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