भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व है और मुख्य रूप से घर में मिट्टी का शिवलिंग निर्माण करके पार्थिव पूजन किया जाता है। यहां शिव पूजा अनुष्ठान करने के लिए एक विस्तृत और व्यापक मार्गदर्शिका प्रस्तुत की गई है। प्रत्येक चरण को स्पष्ट और विस्तार से समझाया गया है, जो पार्थिव पूजा विधि को समझने और सीखने के लिये विशेष महत्वपूर्ण है।
शिव पूजा चरण-दर-चरण मार्गदर्शिका – Shiva Puja Rituals: A Step-by-Step Guide
भगवान शिव की महिमा का वर्णन कर पाना संभव ही नहीं है तथापि गुणगान करते रहना कल्याणकारी होता है और करते रहना चाहिये। भगवान शिव का एक नाम आशुतोष है और आशुतोष का तात्पर्य शीघ्रप्रसन्न हो जाते हैं। भगवान शिव प्रारब्ध को भी बदल देते हैं – “भाविहुँ मेंट सकहिं त्रिपुरारि” और सबसे बड़े उदाहरण मार्कण्डेय हैं।
तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर। यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः ॥
परिचय: शिव पूजा की शक्ति का अनावरण
शिव का अर्थ ही कल्याणकारी होता है और सबको कल्याण की इच्छा होती है और इसलिये शिवपूजा में सबका अधिकार भी है। आत्मकल्याण के अधिकार से किसी को भी वंचित नहीं किया गया है और हर कोई भगवान शिव की उपासना कर सकता है, पुराणों में अनेकों असुरों के भी प्रसंग मिलते हैं और अधिकांश असुर भी भगवान शिव की पूजा करके कल्याण के भाजन बने।
भगवान शिव की कृपा से सद्गति की प्राप्ति तो होती ही है सांसारिक दुःखों का भी अंत होता है, मनोकामनाओं की पूर्ति भी होती है और सांसारिक सुख भी प्राप्त होते हैं। हमारे हृदय में प्रथमतया सांसारिक लाभ के लिये ही भगवान की भक्ति का उदय होता है जो कालक्रम से पारमार्थिक उद्देश्य का भी उदय होता है।
चारों वर्णों का शिव पूजन में अधिकार है किन्तु कुछ विशेष नियम भी है, यथा :
- स्त्री-शूद्रों-पतित को मंदिरों में प्रतिष्ठित शिवलिंग का स्पर्श नहीं करना चाहिये।
- घर में जो शिवलिंग हो, गुरु से प्राप्त हो उसके स्पर्श का स्त्री-शूद्र-पतित को भी अधिकार होता है।
- पार्थिव शिवलिंग में भी सबको स्पर्श का अधिकार है।
- जो श्रोत्रिय होते हैं उनको वैदिक विधि और मंत्रों से ही शिवपूजा करनी चाहिये, अन्य विधि मंत्रों से नहीं।
पूजा सामग्री
पूजा में मुख्य भाव ही होता है सामग्रियां गौण होती हैं, किन्तु भाव होने पर सामर्थ्यानुसार आवश्यक सामग्रियों का भी प्रबंध किया जाता है भले ही वो सबरी के बैर ही क्यों न हों, सुदामा के तण्डुल ही क्यों न हो। भाव पूर्वक सामर्थ्यानुसार उपलब्ध एक सामग्री भी भगवान भाव से ही ग्रहण कर लेते हैं किन्तु अहंकार पूर्वक, प्रदर्शन करने वालों आदि के सर्वस्व समर्पण को भी स्वीकार न करें। किन्तु ध्यातव्य यह है कि जिसके पास अधिक सामर्थ्य न हो वो अधिकाधिक प्रयास करता है किन्तु जिसके पास सामर्थ्य हो वो कृपणता का आश्रय लेते हुये “भाव प्रधान” की बात करता है अथवा प्रदर्शन करके आडम्बर करता है, भाव का महत्व ही नहीं समझता।
इसलिये पूजा करनी तो चाहिये भाव से ही किन्तु पूजा में अर्पित होने वाली सामग्रियां भी सामर्थ्यानुसार उपलब्ध करने का प्रयास करना चाहिये। जब भाव की प्रबलता होती है तो जो सामग्रियां सबके लिये उपलब्ध न हो वो भी सहजता से उपलब्ध हो जाती है। पूजा सामग्रियों को हम इस प्रकार से समझ सकते हैं :
- पवित्र जल: अनुष्ठान सामग्रियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण और आवश्यक पवित्र जल होता है जिसमें गंगाजल का सर्वोच्च स्थान है। भगवान शिव के विषय में तो जल की अनिवार्यता होती है – “जलधारा शिवप्रियः”
- पंचामृत: दूध, दही, घी, शहद और शर्करा का मिश्रण, जो पाँच तत्वों का प्रतीक है। रुद्राभिषेक में भी इन द्रव्यों का कामना के अनुसार आवश्यकतानुसार प्रयोग होता है। यदि अन्य द्रव्य से भी अभिषेक करना हो तो भी पूजा में स्नान के निमित्त पंचामृत का विशेष उपयोग होता ही है।
- बिल्व पत्र: शिव के प्रिय अर्पण का प्रतीक, जो अपनी शुभता के लिए जाने जाते हैं। बिल्वपत्र का शिवपूजा में विशेष उपयोग होता है और बिल्वपत्र के बिना शिवपूजा सोचना भी नहीं चाहिये। बिल्वपत्र के अभाव में उसका विकल्प भी होता है और विकल्प के अनुसार अंततः चढ़ाया गया बिल्वपत्र भी धोकर पुनः चढ़ाया जा सकता है अथवा सूखे बेलपत्र के चूर्ण भी अर्पित किये जा सकते हैं।
- फूल और माला: सुगंधित और जीवंत अर्पण, जो भक्ति और सौंदर्य का प्रतीक हैं। पूजा में फूल और माला का भी प्रयोग आवश्यक होता है और देवताओं के अनुसार कुछ विशेष पुष्प भी होते हैं। भगवान शिव की पूजा में अकान, धतूर के पुष्पों का विशेष महत्व कहा गया है।
- भस्म: भगवान शिव की पूजा में भस्म भी एक आवश्यक सामग्री होती है। भगवान शिव को तो अर्पित किया ही जाता है साथ ही अर्चक के लिये भी भस्म धारण अनिवार्य होता है।
- अभिषेक द्रव्य: कामना के अनुसार अभिषेक द्रव्य का निश्चय करके उसकी पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है। कोई विशेष द्रव्य न हो तो जल से ही अभिषेक किया जा सकता है।
- अन्य सामग्री: इसके अतिरिक्त पूजा में चंदन, वस्त्र, यज्ञोपवीत, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, भांग, इत्यादि अन्य सामग्रियों का भी प्रयोग होता है। यदि शुद्ध व्यवस्था कर सकें तो तेल, गुलाबजल, इत्र, अबीर, उबटन आदि भी अर्पित किये जाते हैं। इसके साथ ही अनुष्ठानों में कलश पूजन, हवन आदि भी किया जाता है तो उसकी सामग्रियां भी हो सकती हैं।
पूजा की तैयारी
- विशेष पूजा करने के लिये पूर्व दिन विशेष नियमों को ग्रहण करें जिसकी जानकारी विद्वान ब्राह्मणों से लें। यदि उपनीत हों तो नूतन यज्ञोपवीत धारण कर लें।
- पूजा के दिन नित्यकर्म, कुलदेवता, इष्टदेवता का पूजन करके पूजा स्थान को गाय के गोबर से लीपें, यदि पक्का मकान हो तो जल से ही साफ कर लें, पंचगव्य निर्माण करके प्राशन, प्रोक्षण आदि करें।
- पार्थिव शिवलिंग निर्माण करना हो तो धूप-दीप जलाकर पार्थिव निर्माण करें, यदि ब्राह्मणों द्वारा निर्माण कराना हो तो ब्राह्मणों से ही करायें।
- पूजा स्थान के मध्य भाग में हवन वेदी बनायें, हवन न करना हो तो न बनायें।
- ईशान कोण में कलश स्थापन के लिये अष्टदल का निर्माण करके अन्य व्यस्था करें।
- पूर्व भाग में सुंदर पीठ, पात्र आदि में पार्थिव शिवलिंग को स्थापित करें, यदि चतुर्लिंगतो भद्र आदि निर्माण करना हो तो मंडल निर्माण करके उसी पर स्थापित करें।
- पूजा की अन्य व्यस्था करके पूजा आरम्भ करें।
विशेष : पूजा-अनुष्ठान यदि दिन भर का हो तो फलाहार कर लें। फलाहार के पश्चात् स्नान अनिवार्य नहीं होता है, किन्तु यदि स्नान करना चाहें तो कर सकते हैं निषेध भी नहीं होता है। यदि लघुशंका करनी हो तो धारित वस्त्र को खोले बिना ही करें और लघुशंका करके विधिपूर्वक शुद्ध होवें। यदि शंका (मलोत्सर्जन) हो तो स्नान भी करें और धारित वस्त्र को खोला भी गया हो तो पुनः धारण न करें, अन्य वस्त्र धारण करें।
पूजा के चरण – The Ritual Steps: A Guided Practice
- सपत्नीक ग्रन्थिबन्धन करके ईशानकोण में कलश स्थापन के स्थान पर आसन लगाकर बैठें।
- पवित्रीकरण, भस्म-रुद्राक्ष धारण आदि करके स्वस्तिवाचन, गणेशाम्बिका पूजन, संकल्प, ब्राह्मण वरण, दिग्रक्षण आदि करें।
- हवन वेदी के पश्चिम भाग में बैठकर विधि पूर्वक अग्निस्थापन करें और भोग लगाने और चरु होम के लिये स्थापित अग्नि पर पायस निर्माण करें। सामान्यतः पूजा की पुस्तकें मात्र पूजा से सम्बंधित होती हैं, इसलिये हवन संबंधी चर्चा उसमें नहीं मिलती किन्तु पूजा अनुष्ठानों का यही क्रम होता है। परन्तु व्यवहार में पूजा करके अंत में विधिरहित हवन देखने को मिलता है जिसका कोई महत्व ही नहीं होता।
- अग्नि में पर्याप्त ईंधन देकर पुनः ईशानकोण में कलशस्थापन-पूजन करें। यदि हवन न करनी हो तो बिना अग्निस्थापन के ही कलशस्थापन-पूजन करें।
- तदनन्तर नवग्रह, दशदिक्पाल आदि का पूजन करें।
- फिर भगवान शिव की पूजा के लिये पूर्व भाग में उत्तराभिमुख होकर बैठें और पूजा विधि के अनुसार आवाहन, ध्यान, न्यास, पूजन, जप आदि करें।
- रुद्राभिषेक करना हो तो पूजा के उपरांत रुद्राभिषेक करें।
- रुद्राभिषेक के उपरांत पुनः उत्तर पूजन करें।
- तदनंतर हवन विधि के अनुसार हवन, बलिदान, तर्पण, मार्जन आदि करके आरती करें।
- प्रदक्षिणा, क्षमा प्रार्थना, साष्टांग प्रणाम आदि करके विसर्जन करें।
- ब्राह्मणों को दक्षिणा प्रदान करके, प्रसाद आदि ग्रहण करें।
- ब्राह्मण भोजन कराकर स्वयं भी सपरिवार, अतिथि-कुटुम्बादि आदि के साथ भोजन करें।
ध्यातव्य : पूजा में अर्पित की गयी सामग्री के साथ-साथ शेष बची सामग्री पर भी आचार्य (ब्राह्मण) का अधिकार होता है। आचार्य (ब्राह्मण) जो भी प्रदान करें वह प्रसाद होता है, ब्राह्मणों से प्रसाद ग्रहण करें न की वस्तु भाव रखकर नारियल, विशेष फल, विशेष मिष्टान्न आदि की याचना करें। प्रसाद वितरण के पश्चात् शेष सभी उपयोगी सामग्रियां आचार्य (ब्राह्मण) को ही अर्पित कर दें। आचार्य (ब्राह्मण) यदि चाहें तो कलश (धातु कलश), हवनपात्र आदि छोड़ भी सकते हैं जो अन्य पूजाओं में पुनः उपयोगी हो सकता है, किन्तु उसके लिये भी कुछ निष्क्रय अवश्य प्रदान करें।
लाभ और निष्कर्ष
- शिवपूजन लौकिक व पारलौकिक कल्याण प्रदायक होता है। मनोकामनाओं के अनुसार कुछ विशेष विधान भी होते हैं; यथा पार्थिव शिवलिंग की संख्या, रुद्राभिषेक के द्रव्य। मनोकामनाओं की पूर्ति के लिये इसको सही से समझकर तदनुसार पूजा करनी चाहिये।
- पूजा में सामग्री से अधिक महत्व भाव का होता है। श्रद्धा-विश्वास के साथ भक्ति-भाव पूर्वक पूजा करें।
- नित्य पूजा में उपरोक्त सभी विधियां अनिवार्य नहीं होती अपितु नित्य पूजन अल्प सामग्रियों से ही स्वयं कर सकते हैं।
- यदि प्रतिदिन पूजा करनी हो तो उसकी सामान्य विधि आचार्य से ज्ञात करके, विधि-मंत्रों को लिखकर समझ लें और तदनुसार करें।
इस प्रकार से भगवान शिव की पूजा का कलयुग में विशेष महत्व है और शीघ्र कल्याणकारी, मनोरथ पूर्ण करने वाला है। भगवान शिव की अराधना कोई भी कर सकता है किन्तु स्वयं की योग्यता-अधिकार आदि का ध्यान रखते हुये करने से ही कल्याण प्राप्त कर सकता है, विधान का उल्लंघन करके की गयी पूजा भी विपरीत फलदायक हो सकता है।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।