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मोदी की विदाई 2026 में आई: छद्म हिंदुत्व का अनावरण

मोदी की विदाई 2026 में आई: छद्म हिंदुत्व का अनावरण मोदी की विदाई 2026 में आई: छद्म हिंदुत्व का अनावरण

“बिना वर्ण व्यवस्था के हिंदू धर्म की कल्पना करना, बिना नींव के भवन बनाने जैसा है।”

प्रस्तुत आलेख समकालीन भारतीय राजनीति के उस अंतर्विरोध को रेखांकित करता है, जहाँ सत्ता पक्ष ‘हिंदुत्व’ के नाम पर सनातन धर्म की मूल मर्यादाओं—वर्णाश्रम धर्म और शास्त्र सम्मत परंपराओं—का क्षरण कर रहा है। यह विश्लेषण इस विचार को पुष्ट करता है कि यदि विपक्ष शास्त्रोक्त मर्यादाओं के संरक्षण का संकल्प ले, तो राजनीतिक समीकरण २०२९ से पूर्व ही परिवर्तित हो सकते हैं। वर्तमान भारत में हिंदुत्व का जो स्वरूप सत्ता द्वारा प्रस्तुत किया जा रहा है, वह शास्त्रों के मर्म से शून्य है।

भारत का सामान्य वर्ग, जो सनातन का वास्तविक संवाहक है, आज अपनी ही चुनी हुई सरकार के वैधानिक अत्याचारों का शिकार है। यह आलेख उन कारकों को उजागर करता है जो २०२६ में सत्ता परिवर्तन के निमित्त बनेंगे।

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मोदी की विदाई 2026 में आई: छद्म हिंदुत्व का अनावरण

“हिंदू राष्ट्र का नारा तब तक छल है, जब तक शास्त्रों को सर्वोच्चता प्राप्त न हो।”

‘यतो धर्मस्ततो जयः’ के सिद्धांत पर आधारित यह विवेचना सिद्ध करती है कि जब शासक वर्ण-धर्म की मर्यादा भंग करता है, तो प्रकृति स्वयं विकल्प निर्मित कर उसका पतन सुनिश्चित कर देती है। भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में ‘हिंदुत्व’ एक राजनीतिक उपकरण बन चुका है, जिसका आध्यात्मिक अधिष्ठान से विच्छेद स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। सनातन धर्म की आधारशिला वर्णाश्रम व्यवस्था है। जैसा कि भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में उद्घोष किया है:

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
अर्थात्, चार वर्णों की सृष्टि स्वयं भगवान ने गुण और कर्म के विभाग पूर्वक की है। किंतु वर्तमान सत्ता इस दैवीय व्यवस्था को समूल नष्ट करने हेतु ‘सामाजिक समरसता’ के नाम पर ‘वर्ण-संकरता’ को प्रोत्साहन दे रही है।

यह व्यवस्था कोई सामाजिक बुराई नहीं, अपितु सृष्टि के संचालन का ईश्वरीय विधान है। किंतु वर्तमान भाजपा सरकार ‘हिंदू एकता’ के नाम पर ‘वर्ण-संकरता’ (Inter-mixing of duties) को बढ़ावा दे रही है। शास्त्रों के अनुसार वर्ण-संकरता राष्ट्र के विनाश का कारण बनती है:

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः। स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः॥
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
(गीता)

२०१९ से २०२६ के कालखंड में भाजपा ने जिस ‘हिंदुत्व’ का प्रदर्शन किया, वह वास्तविकता में सनातन की जड़ों को काटने वाला एक ‘छद्म आवरण’ सिद्ध हुआ है। भाजपा का ‘हिंदू राष्ट्र’ केवल एक नारा है क्योंकि हिंदू तब तक जीवित है जब तक शास्त्र जीवित हैं, और शास्त्र तब तक जीवित हैं जब तक ब्राह्मण सुरक्षित है। जब सत्ता ‘जय भीम’ के नारों के नीचे ब्राह्मणों के स्वाभिमान को कुचलती है, तो वह म्लेच्छ सत्ता के समान व्यवहार करती है।

भाजपा ने आर्थिक लाभ के उद्देश्य से सनातन के बाह्य स्वरूप (मंदिर निर्माण) को तो साधा, किंतु उसकी अंतरात्मा (शास्त्र और वर्ण) पर प्रहार किया। यदि विपक्षी दल ‘सनातनी सिद्धांतों’ को अपनी राजनीति का केंद्र बनाते हैं, तो वे न केवल भाजपा के सवर्ण वोट बैंक को अपनी ओर खींच लेंगे, बल्कि २०२९ से पहले ही एक नई धार्मिक व्यवस्था का उदय होगा। समाज अब जागृत हो चुका है। ‘जय श्री राम’ के नारों की आड़ में ‘यूजीसी २०२६’ जैसे विषैले कानूनों को स्वीकार नहीं किया जाएगा। २०२६ भारतीय राजनीति का वह संधिकाल है जहाँ छद्म हिंदुत्व का अंत और वास्तविक सनातन का सूर्योदय होगा।

मोदी की विदाई 2026 में आई: छद्म हिंदुत्व का अनावरण

भाग १: वर्णव्यवस्था का विनाश और सत्ता का अधर्म (विश्लेषण)

सनातन धर्म की आत्मा वर्णाश्रम व्यवस्था है। महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है:

मर्यादायां स्थितो धर्मः स च वर्णैः प्रतिष्ठितः। वर्णाश्चाश्रमधर्मेण रक्ष्यन्ते नृपसत्तम॥
(अर्थात्: धर्म मर्यादा में स्थित है और वह वर्णों से प्रतिष्ठित है। वर्णों की रक्षा आश्रम धर्म और न्यायप्रिय राजा द्वारा होती है।)

वर्तमान भाजपा सरकार ‘सबका साथ-सबका विकास’ के छद्म आवरण में इसी मर्यादा का विनाश कर रही है।

१. वर्णाश्रम पर प्रहार: म्लेच्छ राष्ट्र की दिशा में अग्रसर

भाजपा एक ऐसे भारत का निर्माण कर रही है जहाँ केवल ‘हिंदू’ नाम का लेबुल हो, किंतु भीतर की सामग्री पूर्णतः मैकाले और पश्चिमी उदारवाद से दूषित हो। यदि वर्णव्यवस्था नहीं रहेगी, तो ब्राह्मण का अस्तित्व नहीं रहेगा, और ब्राह्मण के बिना शास्त्रों की रक्षा संभव नहीं। मनुस्मृति स्पष्ट कहती है:

सर्वस्वं ब्राह्मणस्येदं यत्किञ्चिज्जगतीगतम्। श्रैष्ठ्येनाभिजनेनेदं सर्वं वै ब्राह्मणोऽर्हति॥ (मनु. १.१००)

मध्यप्रदेश में अधिवक्ता अनिल मिश्रा पर की गई कार्रवाई यह सिद्ध करती है कि भाजपा के लिए ‘हिंदुत्व’ केवल वोट है, हिंदू नहीं। एक अधिवक्ता जो शास्त्रों की रक्षा हेतु स्वर उठाता है, उसे प्रशासन द्वारा इसलिये प्रताड़ित किया जाना क्योंकि वह ब्राह्मण है; इस बात का संकेत है कि भाजपा अब उन आक्रांताओं की भूमिका में है जिन्होंने पूर्व में गुरुकुलों और विद्वानों को नष्ट किया था।

जब सत्ता ही ब्राह्मणों को ‘जय भीम’ के नारों के नीचे दबाने का प्रयास करे, तो वह सत्ता ‘धर्म-द्रोही’ की श्रेणी में आती है। मध्यप्रदेश में अधिवक्ता अनिल मिश्रा पर की गई द्वेषपूर्ण कार्रवाई इसी द्रोह का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

२. यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन २०२६: सामान्य वर्ग का ‘वैधानिक जातीय संहार’

यह प्रावधान सनातन के रक्षक वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) को शिक्षा और समाज से बहिष्कृत करने का षड्यंत्र है। यह ‘इक्विटी’ नहीं, अपितु उन बच्चों का मानसिक उत्पीड़न है जो अपने पूर्वजों की परंपराओं का पालन करना चाहते हैं। शास्त्रों में राजा का कर्तव्य बताया गया है:

वर्णाश्रमव्यवस्थायां यः सक्तो न्यायमार्गवित्। स राजा पूजितो लोके प्रेत्य स्वर्गे महीयते॥

किंतु वर्तमान सरकार न्यायमार्ग को त्यागकर ‘वोट-बैंक’ हेतु शास्त्र-विरुद्ध नीतियां बना रही है। यह २०२६ का रेगुलेशन सामान्य वर्ग के स्वाभिमान की अंत्येष्टि का प्रयास है।

‘यूजीसी इक्विटी प्रमोशन रेगुलेशंस २०२६’ केवल एक नीति नहीं, अपितु सामान्य वर्ग (सनातनी वर्ण व्यवस्था के धारकों) के विरुद्ध एक घोषित युद्ध है। यह प्रावधान शिक्षण संस्थानों में एक ऐसा वातावरण निर्मित करेगा जहाँ योग्य सामान्य वर्ग का छात्र निरंतर मानसिक और वैधानिक दबाव में रहेगा। यदि वह अपने स्वाभिमान की रक्षा हेतु प्रतिकार करेगा, तो उसे दंडित किया जाएगा। यह नीति मैकाले की उस शिक्षा पद्धति का ही आधुनिक संस्करण है, जिसका उद्देश्य हिंदुओं को आत्म-ग्लानि से भर देना है।

यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन २०२६: सामान्य वर्ग का 'वैधानिक जातीय संहार'

यह विनियम (Regulation) सामान्य वर्ग के विरुद्ध भाजपा का सबसे घातक शस्त्र है। इसके माध्यम से शिक्षण संस्थानों में ‘आरक्षण के भीतर अत्याचार’ की एक नई विधा विकसित की गई है। इसके अंतर्गत:

  • सामान्य वर्ग का छात्र यदि किसी आरक्षित वर्ग के छात्र की अयोग्यता पर प्रश्न उठाता है, तो उसे ‘वैधानिक अपराधी’ घोषित कर दिया जाएगा।
  • यह प्रावधान सनातनी परिवारों के बच्चों को मानसिक दासता की ओर धकेलता है।
  • शास्त्रों में राजा का कर्तव्य है: ‘अदण्ड्यान्दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन्’ (मनुस्मृति ९.२४९) — जो दंड के पात्र नहीं उन्हें दंड देना और जो पात्र हैं उन्हें छोड़ देना, राजा के पतन का कारण बनता है।

३. प्रतीकों का छल: कालनेमि की राजनीति

रामायण में कालनेमि ने भगवा वस्त्र धारण कर हनुमान जी को छलने का प्रयास किया था। आज की सत्ता भी वही कर रही है। मुख में राम का नाम है, किंतु आचरण में उन ग्रंथों का अपमान है जिन्हें राम ने स्वयं माना। ‘जय श्री राम’ के स्थान पर ‘जय भीम’ का उद्घोष यह दर्शाता है कि सत्ता अब उस विचारधारा के समक्ष नतमस्तक है जो मनुस्मृति को जलाना अपना परम धर्म मानती है।

भाजपा ने ‘जय श्री राम’ को केवल सत्ता की सीढ़ी बनाया। आज सत्ता के गलियारों में ‘जय भीम’ और ‘नमो बुद्धाय’ के नारे सनातन परंपराओं को विस्थापित करने के लिए लगाए जा रहे हैं। भगवान राम की मर्यादा को त्याग कर बुद्ध के उस स्वरूप को महिमामंडित किया जा रहा है, जिसे ऐतिहासिक रूप से वैदिक कर्मकांडों के विरोध में खड़ा किया गया। यह ‘कालनेमि’ प्रवृत्ति का परिचायक है, जो मुख में राम का नाम रखती है किंतु कर्म में धर्म का विनाश करती है।

प्रतीकों का छल: कालनेमि की राजनीति

भाजपा ने स्वयं को सनातन का रक्षक घोषित किया, किंतु उसका आचरण रामायण के कालनेमि जैसा है। कालनेमि ने भगवा पहनकर हनुमान जी को मार्गभ्रमित करने का प्रयास किया था।

आक्रांताओं और अंग्रेजों ने भारतीय शिक्षा पद्धति को नष्ट करने का प्रयास किया, किंतु भाजपा सरकार ने ‘यूजीसी २०२६’ के माध्यम से उसे वैधानिक जामा पहना दिया है। यह नीति स्पष्ट करती है कि भाजपा के लिए सनातन केवल चुनाव जीतने का एक साधन है। जब ब्राह्मणों और सामान्य वर्ग के हितों की बलि चढ़ाकर ‘नमो बुद्धाय’ और ‘जय भीम’ का मार्ग प्रशस्त किया जाता है, तो वह म्लेच्छ सत्ता का परिचायक है।

यह तुलनात्मक सारणी भाजपा की उन नीतियों का विश्लेषण करती है जो ऊपरी तौर पर तो भारतीय दिखती हैं, किन्तु उनके परिणाम मैकाले की सांस्कृतिक विजय और आक्रांताओं के ‘भेदभाव पूर्ण’ शासन से भी अधिक घातक सिद्ध हो रहे हैं। भाजपा “आक्रांताओं और मैकाले की भी बाप” क्यों है :

तुलना का आधारमैकाले / आक्रांताओं की नीतिभाजपा सरकार की वर्त्तमान नीति (कालनेमि नीति)शास्त्रीय/सनातनी दृष्टिकोण
लक्ष्यभारतीय गुरुकुलों और शिक्षा को समाप्त कर ‘क्लर्क’ पैदा करना।यूजीसी रेगुलेशन 2026 द्वारा सवर्ण छात्रों को वैधानिक रूप से प्रताड़ित कर उन्हें ‘हीनता’ का बोध कराना।“विद्या ददाति विनयं” – शिक्षा का उद्देश्य वर्णानुसार धर्म का पालन और मेधा का संवर्धन होना चाहिए।
सामाजिक संरचना‘बाँटो और राज करो’ (Divide and Rule) द्वारा फूट डालना।‘सबका साथ-सबका विकास’ के नाम पर सवर्णों के अधिकारों का बलि देकर ‘वर्ण-संकरता’ को वैधानिक संरक्षण देना।“चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं” – वर्ण व्यवस्था समाज के संतुलन और गुण-कर्म की शुचिता का आधार है।
विधिक न्यायजजिया कर और भेदभावपूर्ण कानून लागू करना।SC/ST एक्ट का दुरुपयोग और नए रेगुलेशंस द्वारा ‘सामान्य वर्ग’ को द्वितीय श्रेणी का नागरिक बनाना।“समानो मन्त्रः समितिः समानी” – न्याय अपराध के आधार पर होना चाहिए, जन्म या राजनीतिक लाभ के आधार पर नहीं।
धार्मिक नेतृत्वमंदिरों को नष्ट करना और पुजारियों को मारना।मंदिरों का सरकारीकरण करना और शंकराचार्य जी जैसे धर्म-स्तम्भों का सार्वजनिक अपमान/उपेक्षा करना।“विप्रमूला हि वेदाः” – धर्म की रक्षा हेतु ब्राह्मण और संन्यासियों का सर्वोच्च सम्मान अनिवार्य है।
सांस्कृतिक आवरणभारतीयता का खुला विरोध और अंग्रेजी का थोपा जाना।‘जय श्री राम’ का नारा लगाकर कार्य ‘मैकाले’ और ‘अम्बेडकरवाद’ की तुष्टि वाले करना।“तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते” – कथनी और करनी दोनों ही शास्त्र सम्मत होनी चाहिए, अन्यथा वह ‘छल’ है।
ब्राह्मणों की स्थितिबौद्धिक वर्ग को आर्थिक रूप से पंगु बनाना।अनिल मिश्रा प्रकरण जैसे उदाहरणों द्वारा ब्राह्मणों को विधिक भय में रखना और उन्हें ‘जातिवाद’ के नाम पर अपमानित करना।“ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्” – ब्राह्मण समाज का मुख (ज्ञान) है, उसे प्रताड़ित करना समाज का वध करना है।

शास्त्रीय प्रमाण और सत्ता परिवर्तन की अनिवार्यता

धर्म की हानि होने पर प्रजा का कर्तव्य है कि वह धर्म-रक्षक विकल्प को चुने। शुक्राचार्य नीति में कहा गया है:

धर्मनीतिपरित्यागी ह्यधर्मनिरतः सदा। प्रजापीडाकरो राजा त्याज्य एव न संशयः॥
(अर्थात्: जो राजा धर्म-नीति का त्यागी, अधर्म में रत और प्रजा को पीड़ा देने वाला हो, उसका परित्याग कर देना चाहिए।)

१. ब्राह्मण और संत अपमान: विनाश काले विपरीत बुद्धि

शंकराचार्य जी का अपमान और माघ स्नान के समय उनके क्षत्र का भंग होना साधारण घटना नहीं है। माघ स्नान के पावन अवसर पर पूज्य शंकराचार्य जी का अपमान और उनके ‘क्षत्र’ को भंग करना, इस सरकार के अहंकार की पराकाष्ठा है। माघ स्नान में शंकराचार्य जी का अपमान, उनके क्षत्र का भंग किया जाना और कथित अंबेडकरवादियों द्वारा ब्राह्मणों को भारत छोड़ने की धमकी पर सरकार का मौन यह सिद्ध करता है कि यह ‘मौन समर्थन’ अधर्म का पोषण है। महाभारत के अनुसार:

शास्त्रीय प्रमाण और सत्ता परिवर्तन की अनिवार्यता

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः, न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम्।
नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति, न तत्सत्यं यच्छलेनाभ्युपेतम्॥

जहाँ धर्म की मर्यादा भंग हो, वह सभा और वह राजा त्यागने योग्य हैं।

विप्रमूला हि वेदाः स्युर्वेदमूला हि धर्माः।
धर्ममूलं तपः प्रोक्तं तस्मात् विप्रं प्रपूजयेत्॥

यह ईश्वरीय संकेत है कि सत्ता का मद अब अपनी सीमा पार कर चुका है। स्कंद पुराण के अनुसार:

यत्कुले ब्राह्मणो नास्ति वेदशास्त्रविशारदः। तच्छ्मशानसमं विद्धि न तत्र वसति हरिः॥

जिस राज्य में शास्त्रवेत्ता ब्राह्मण का सम्मान नहीं होता, वह राज्य श्मशान के समान है। भाजपा समर्थित ‘भगवाधारी’ आज वर्णव्यवस्था के विरुद्ध बोल रहे हैं, जो सीधे तौर पर शास्त्रों के साथ विश्वासघात है। बिना ब्राह्मण के शास्त्र और धर्म की सत्ता सुरक्षित नहीं रह सकती। वर्तमान सरकार कथित अंबेडकरवादियों की उस भीड़ को मौन समर्थन दे रही है जो सार्वजनिक मंचों से ब्राह्मणों को देश छोड़ने की धमकी देते हैं और मनुस्मृति को जलाने का कुकृत्य करते हैं।

प्रभेदेन पाखण्डानां च वर्धनात्। राजानं नाशयन्त्येते प्रजापीडाकरास्तथा॥ (ब्रह्म पुराण)

ब्रह्मस्वं हिनस्ति यः कश्चिद्ब्राह्मणं वावमन्यते। तस्य वंशो विनश्यति स चौरः कीर्त्यते बुधैः॥ (पराशर स्मृति)

यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च। हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः॥ (महाभारत)

भाजपा के सवर्ण सांसद आज घुटन महसूस कर रहे हैं। जिस दिन विपक्ष ने ‘शास्त्र-सम्मत’ व्यवस्था का आश्वासन दिया, उसी दिन भाजपा के भीतर का यह असंतोष विस्फोट बनकर उभरेगा। भाजपा एक ‘कालनेमि’ है जो भगवा ओढ़कर सनातनी जड़ों को काट रही है। जब वर्ण और जाति व्यवस्था ही समाप्त हो जाएगी, तो सनातनी संस्कृति का आधार ही ढह जाएगा। भाजपा का ‘छद्म हिंदुत्व’ शास्त्रों की परीक्षा में विफल रहा है। वर्णाश्रम के विरुद्ध युद्ध छेड़कर उसने अपने विनाश का मार्ग स्वयं चुना है।

२. विपक्ष के लिए संजीवनी: शास्त्रों की शरण

“न्याय सबके लिए, तुष्टीकरण किसी का नहीं।”

इन सभी तथ्यों का सार यही है कि ये भाजपा सरकार के मुखौटा को उतारकर फेंक चुकी है समस्या मात्र यह है कि विकल्प ही नहीं है। यदि विकल्प उपलब्ध हो जाये तो ये सरकार 2026 में ही विदा हो जायेगी। किन्तु वो विकल्प कैसे बन सकते हैं जो मनुस्मृति का विरोध पहले से कर रहे हैं, “तिलक तराजू और तलवार – इनको मारो जूते चार” आदि का नारा लगाते रहे हैं। राजनीति में ‘विकल्पहीनता’ ही भाजपा की सबसे बड़ी शक्ति रही है। किंतु यदि विपक्षी दल ‘सनातनी मूल’ की रक्षा का दायित्व स्वीकार करें, तो २०२६ में ही सत्ता का तख्तापलट संभव है।

विपक्ष के लिए संजीवनी: शास्त्रों की शरण

हां वही विपक्षी दल यदि सनातन के मूल सिद्धांतों जो शास्त्रों में वर्णित है और परंपरागत रूप से विद्यमान भी है उसके संरक्षण की प्रतिज्ञा करेंगे तो 2029 के चुनाव तक भी सत्ता परिवर्तन की प्रतीक्षा देश नहीं करेगा। भाजपा के ही सवर्ण सांसद भाजपा की सरकार को गिरा देंगे क्योंकि अब मुखौटा उतर चुका है। किन्तु विपक्षी दलों को कुछ महत्वपूर्ण प्रतिज्ञा तो करनी ही होगी जो इस प्रकार कहे जा सकते हैं :

  • वर्ण और जातिव्यवस्था भारतीय संस्कृति और सनातन शास्त्रों के मूल में है एवं इसका संरक्षण किया जायेगा। 
  • किसी भी वर्ण-जाति के प्रति अपराध होता है तो उसको समान न्याय दिया जायेगा अर्थात भेदभाव के नाम पर किया जाने वाला वैधानिक भेदभाव समाप्त किया जायेगा, जिसमें आरक्षण, SC/ST एक्ट और नया रेगुलेशन आदि भी आता है। 
  • शास्त्र, देवी-देवताओं, तीर्थ और ब्राह्मणों-संतों-सन्यासियों को भी सनातन धर्म में पूज्य कहा गया है और इनको पूज्य ही रखा जायेगा।
  • शास्त्र ब्राह्मणों-संतों-सन्यासियों को देवी-देवताओं के समान नहीं अपितु अधिक महत्वपूर्ण बताते हैं। शास्त्र और धर्म की सत्ता के लिये ब्राह्मण का अस्तित्व अनिवार्य है क्योंकि शास्त्रों ने स्वयं ब्राह्मण को ही संरक्षक बनाया है। यदि ब्राह्मण का ही अस्तित्व नहीं होगा तो शास्त्र और धर्म की सत्ता भी नहीं होगी। 

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
अर्थात्, मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश करता है और रक्षित धर्म रक्षा करने वाले की रक्षा करता है। आज सत्ता धर्म का नाश कर रही है, अतः उसका पतन अवश्यम्भावी है।

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ (गीता)

यदि विपक्ष इस सत्य को आत्मसात कर ले कि “भारत का कल्याण वर्णव्यवस्था, शास्त्र और धर्म की रक्षा में है”, तो भाजपा के सवर्ण सांसद अपनी अंतरात्मा की पुकार पर सरकार को २०२६ में ही गिरा देंगे।

निष्कर्ष: शास्त्र-सम्मत दृष्टिकोण की अनिवार्यता

“भाजपा ‘कालनेमि’ की भांति भगवा पहनकर सनातनी जड़ों को काट रही है।”

निष्कर्षतः, २०२६ में मोदी सरकार की विदाई केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, अपितु सनातन धर्म की आत्मरक्षा का परिणाम होगी। विकल्प की अनुपस्थिति ही भाजपा की संजीवनी है। यदि विपक्ष अपनी वैचारिक जड़ता त्याग कर शास्त्रों के प्रति निष्ठा और सवर्णों के प्रति न्याय का मार्ग अपनाता है, तो देश २०२९ की प्रतीक्षा नहीं करेगा।

सत्ता का अहंकार तब टूटता है जब ब्राह्मण और शास्त्र संगठित होकर अपनी शक्ति का साक्षात्कार कराते हैं। भारत का भविष्य ‘सेक्युलर हिंदुत्व’ में नहीं, अपितु ‘वैदिक वर्णाश्रम’ में है। जो दल इस सत्य को पहले स्वीकार करेगा, वही २०२६ के बाद भारत का भाग्य विधाता बनेगा।

॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

यह विश्लेषण किसी दल का प्रचार नहीं, अपितु ‘धर्म-नीति’ का मार्ग प्रशस्त करने हेतु है।

यह आलेख पूर्णतः स्वतंत्र राजनैतिक और धार्मिक विश्लेषण है। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति की मानहानि करना नहीं है। आलेख में दिए गए श्लोक और व्याख्याएं स्मृतियों और पुराणों के परंपरागत अर्थों अर्थात मूल भावना पर आधारित हैं। आलेख का उद्देश्य वर्त्तमान नीतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण करना है, यह किसी विशिष्ट पार्टी के प्रचार का माध्यम नहीं है।

“संबंधित प्रश्न” (FAQ)

FAQs

प्रश्न १. क्या २०२६ में सरकार गिरना संवैधानिक रूप से संभव है?

उत्तर : हाँ, यदि भाजपा के सवर्ण सांसद अपनी पार्टी की सवर्ण-विरोधी नीतियों के कारण सामूहिक त्यागपत्र दें या समर्थन वापस लें, तो सरकार अल्पमत में आकर गिर सकती है।

प्रश्न २. ‘यूजीसी इक्विटी प्रमोशन रेगुलेशंस २०२६’ क्या है?

उत्तर : यह एक प्रस्तावित विधिक ढांचा है जो शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्गों के हितों के नाम पर सामान्य वर्ग के विरुद्ध विधिक कार्रवाई को सुगम बनाता है, जिससे सामान्य वर्ग का उत्पीड़न संभव है। यह एक वैधानिक षड्यंत्र है जो सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को शैक्षणिक संस्थानों में प्रताड़ित करने और उन्हें अपने वर्ण-धर्म का त्याग करने पर विवश करने हेतु लाया गया है।

प्रश्न ३. ब्राह्मणों का अस्तित्व सनातन के लिए क्यों अनिवार्य है?

उत्तर : शास्त्रों के अनुसार, ब्राह्मण ही वेदों के संरक्षक हैं। यदि शास्त्रों के ज्ञाता और रक्षक नहीं रहेंगे, तो सनातन परंपराएं केवल प्रदर्शन की वस्तु बनकर रह जाएंगी।

प्रश्न: भाजपा को ‘मैकाले का बाप’ क्यों कहा गया है?

उत्तर: क्योंकि भाजपा वे कार्य कर रही है जो अंग्रेज भी नहीं कर सके—हिंदुओं के भीतर से वर्णव्यवस्था का बोध मिटाना।

प्रश्न: यूजीसी रेगुलेशन २०२६ से सवर्णों को क्या हानि है?

उत्तर: यह सामान्य वर्ग के छात्रों को वैधानिक रूप से द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना देगा।

प्रश्न: ‘कालनेमि’ का उल्लेख यहाँ क्यों है?

उत्तर: जैसे कालनेमि ने राम-नाम जपते हुए हनुमान को मारने का प्रयास किया, वैसे ही सत्ता राम-नाम की आड़ में सनातनी व्यवस्था को नष्ट कर रही है।

प्रश्न: क्या ब्राह्मणों के बिना हिंदू धर्म बच सकता है?

उत्तर: कदापि नहीं। ब्राह्मण ‘शास्त्रों के देह’ हैं, उनके बिना धर्म निराधार है।

प्रश्न: अनिल मिश्रा कांड क्या है?

उत्तर: यह सत्ता द्वारा एक सवर्ण के विरुद्ध द्वेषपूर्ण कार्रवाई का प्रतीक है।

प्रश्न: क्या विपक्ष मनुस्मृति स्वीकार करेगा?

उत्तर: यदि उन्हें सत्ता चाहिए, तो उन्हें कम से कम उसके द्वारा रक्षित ‘वर्ण-व्यवस्था’, ‘धार्मिक मर्यादा’, ‘शास्त्र की सर्वोच्चता’ आदि को स्वीकार करना ही होगा।

प्रश्न: हिन्दूराष्ट्र और म्लेच्छराष्ट्र में क्या अंतर है?

उत्तर: हिन्दूराष्ट्र शास्त्रों (वर्ण-आश्रम) पर चलता है, जबकि भाजपा का प्रस्तावित राष्ट्र केवल नारों पर आधारित एक म्लेच्छ व्यवस्था है।

प्रश्न: यूजीसी रेगुलेशन २०२६ कैसे रुकेगा?

उत्तर: नई सरकार के प्रथम अध्यादेश द्वारा इसे निरस्त किया जा सकता है।

प्रश्न: भाजपा को ‘मैकाले का बाप’ क्यों कहा गया?

उत्तर: क्योंकि भाजपा ने मैकाले की शिक्षा नीति को ‘विधिक उत्पीड़न’ के साथ जोड़कर और अधिक घातक बना दिया है।

प्रश्न: ‘जय भीम’ के नारे से समस्या क्या है?

उत्तर: समस्या नारे से नहीं, बल्कि उस नारे की आड़ में शास्त्रों और ब्राह्मणों को दी जाने वाली गालियों और सरकारी निष्क्रियता से है।

प्रश्न: ‘म्लेच्छ राष्ट्र’ का क्या अर्थ है?

उत्तर: वह राष्ट्र जो अपनी सांस्कृतिक और शास्त्रीय जड़ों (वर्ण-धर्म) को काटकर केवल भौतिकवाद और वोट बैंक पर टिका हो।

प्रश्न: क्या २०२९ तक रुकना संभव नहीं है?

उत्तर: नहीं, क्योंकि २०२६ के कानून सनातनी समाज की अगली पीढ़ी को तब तक अपंग बना देंगे। अन्याय को सहना भी अपराध ही कहा गया है। यहां वैधानिक अन्याय हो रहा है तो उसका तात्पर्य यह नहीं कि उसको सहने के लिये बाध्य हैं।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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