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प्रायश्चित्तापन्न अनुग्रह विधान – प्रमाण संकलन

प्रायश्चित्तापन्न अनुग्रह विधान - प्रमाण संकलन

वर्त्तमान युग में सामान्य जनजीवन से प्रायश्चित्त का पूर्णतः लोप हो चुका है और जब सनातन-सनातन शब्द सुनाई देता है तो मन में यही विचार आता है कि ये लोग किस सनातन की बात कर रहे हैं। और तदनन्तर गंभीर मनन के पश्चात् यह निष्कर्ष ज्ञात होता है कि वर्त्तमान काल में जो भी धर्म-सनातन आदि की बात करते हैं वो मनमुखी व्याख्या करते हैं शास्त्रसम्मत नहीं। यद्यपि प्रायश्चित्त विषयक महत्वपूर्ण संग्रह पूर्वप्रकाशित है किन्तु उसके पश्चात् भी कुछ शेष है जो वैकल्पिक मार्ग है और वो है अनुग्रह प्राप्ति जिसमें ब्रह्मकूर्च विधान भी मिलता है।

यहां इस विषय के ढेरों प्रमाण संग्रहित किये गए हैं जो वर्त्तमान में भी धर्म के प्रति आस्थावानों हेतु उपयोगी है और भविष्यवर्ती पीढ़ियां भी जब धर्म पालन के विचार से प्रेरित होंगी तो उनके लिये भी।

प्रायश्चित्तापन्न अनुग्रह विधान – प्रमाण संकलन

इस विषय को लेकर कोई संदेह नहीं कि वर्त्तमान में जो सामान्य जनजीवन है वो धर्ममार्ग से पूर्णतः भ्रष्ट है। ये धर्म, सनातन, हिन्दू, हिंदुत्व जितना चिल्लाती हो किन्तु आत्मकल्याण का मार्ग है क्या, धर्म पालन कैसे होता है, पाप क्या है, पाप हो जाये तो क्या करें, यदि प्रायश्चित्त न कर पायें तो विकल्प क्या है, आदि किसी विषय को नहीं समझते।

वर्त्तमान काल में सनातन धर्म का जो स्वरूप देखा जा रहा है वो है तीर्थों में डुबकी लगा लो, मंदिरों में पंक्तिबद्ध हो जाओ, थोड़ा-बहुत कुछ भी पूजा-पाठ घर में कर लिया करो और हो गया। शिखा धारण, आहार-व्यवहार शुद्धि, भाव शुद्धि, धनशुद्धि आदि शुद्धि विषयक शून्य ज्ञान रखते हैं, यदि कुछ ज्ञान हो भी तो पालन नहीं करते हैं।

ये इतना भी नहीं जानते कि धर्म के लिये न्यायोपार्जित धन का ही प्रयोग करना चाहिये, तभी तो भ्रष्टाचार चरम पर है, व्यापार में भी लूट मची है, हर कोई जहां अवसर प्राप्त होता है अन्याय से धनार्जन कर रहा है। अन्यायोपार्जित धन से किया गया धर्म-कर्मकांड भी निष्फल ही होता है यह ज्ञात ही नहीं है।

द्रव्येणान्यायलब्धेन यः करोत्यूर्ध्वदैहिकम् । नासौ फलमवामोति तस्यार्थस्य दुरागमात् ॥
वृद्धशातातप स्मृति ६२

बड़े-बड़े कुख्यात नटों (कथित कथावक्ताओं) जो कि अनुयायियों की भीड़ का दम्भ भी रखते हैं, ने अपने अनुयायियों को तो पापाचरण की छूट भी दे रखी है, बस धनार्जन करो और उनके NGO, संस्थाओं में देते रहो।

जो नाम, मन्त्र आदि बता रहे हैं उसे गाते रहो बाकि कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। एक प्रकार से यहां ऐसा सिद्ध किया जाता है कि शास्त्रों ने पापाचरण की छूट दे रखी है।

न वेदबलमाश्रित्य पापकर्मरतिर्भवेत् । अज्ञानाच्च प्रमादाच्च दह्यते कर्म नेतरत् ॥
वशिष्ठ स्मृति २७/४

जबकि ऐसा कुछ है ही नहीं, वेदबल/देवबल के कारण पाप में रति का निषेध किया गया है। एक बार भगन्नाम का सम्यक उच्चारण जितने पापों का नाश कर सकता है बड़े से बड़ा पातकी आजन्म उतना पाप कर ही नहीं सकता। किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हम इसलिये आजन्म पाप करते रहें कि एक बार क्या अनेकों बार भगवन्नाम का उच्चारण करते हैं, हमारे सभी पाप नष्ट हो ही जायेंगे अस्तु पिछले पाप नष्ट हो चुके हैं अब आगे जो पाप होंगे उसी को नष्ट करना पड़ेगा।

पापाचरण की कोई छूट नहीं

उन धूर्तों को यह समझना आवश्यक है कि नामजप, भजन-कीर्तन, भक्ति आदि आत्मकल्याण के मार्ग तो हैं किन्तु पापाचरण की छूट प्रदान नहीं करते हैं। भले ही पूर्वकृत कर्मों का प्रायश्चित्त न किया गया हो किन्तु आगे पापाचरण से विरक्त होना अनिवार्य तो होता ही है।

स्वाभिप्रायकृतं कर्म यत्किञ्चिज्ज्ञानवर्जितम् । क्रीडाधर्मेण बालानां तत्सर्वं निष्प्रयोजनम् ॥
वृद्धशातातप स्मृति २८

वर्त्तमान काल में सब कुछ प्रदर्शन का ही विषय बनता जा रहा है चाहे संस्कार हो अथवा गृहप्रवेश, पूजा हो अथवा हवन, दान हो अथवा श्राद्ध संभव है आपको ये कथन अतिशयोक्तिपूर्ण लगे किन्तु कैमरे वाले अथवा मोबाईल से जो फोटो-वीडियो बनाते रहते हैं वही मात्र सिद्ध कर देता है कि प्रदर्शन कर रहे हैं। बस फोटो सेशन और अहंकार प्रदर्शन। ऐसे सभी कर्म जो ज्ञानरहित होकर किये जाते हैं, (किसी भी कर्म को फोटो सेशन बनाना अथवा अहंकार प्रदर्शन का माध्यम बनाना ज्ञानरहित होने का प्रमाण है) निष्फल होते हैं, यह धर्म नहीं बालकों के निष्प्रयोजन खेल जैसा होता है।

ऐसे लोगों का तो प्रायश्चित्त में भी अधिकार नहीं होता अनुग्रह की तो बात ही दूर की कौड़ी है। प्रायश्चित्त में असमर्थ हेतु अनुग्रह मार्ग है और प्रायश्चित्त में किसी का भी जन्मसिद्ध अधिकार नहीं होता अपितु प्राप्त करना पड़ता है। प्रायश्चित्त जब विद्वान और योग्य ब्राह्मण से प्राप्त होता है (आज्ञात्मक) तभी उसमें अधिकार सिद्ध होता है जिससे वह पापों का निवारण करता है। अनिधिकृत रूप से यदि आजीवन भी प्रायश्चित्त करते रहें जैसे पुस्तकों में पढ़कर तो उससे पापों का नाश नहीं हो सकता।

अब यहां प्रथम में प्रयश्चित्त के अधिकारी को समझना होगा तदुपरांत अनुग्रह के अधिकारी को समझा जा सकता है। यह समझना इसलिये आवश्यक है ताकि आप इन प्रमाणों के आधार पर स्वयं ही स्वयं पर अनुग्रह करने की अथवा अनधिकृत अनुग्रह करने की भूल न करें।

प्रायश्चित्त के अधिकारी की अर्हता

प्रायश्चित्त के अधिकारी की अर्हता जो यहां बताई जा रही है वो वर्त्तमान काल के अनुसार समझने के उद्देश्य से है, शास्त्रों में यथावत प्रमाण नहीं मिलेगा किन्तु यह शास्त्रसम्मत ही है शब्दावली समझने वाली है । वो व्यक्ति प्रायश्चित्त का अधिकारी होता है जो इन शर्तों को पूरा करता हो :

  • अन्यायपूर्वक धनार्जन न करता हो।
  • सेवावृत्ति का आश्रय नहीं लेता हो।
  • धर्म में आस्थावान हो, शास्त्रों में निष्ठा रखता हो।
  • आत्मकल्याण चाहता हो।
  • स्वस्थ हो और बालक अथवा वृद्ध न हो।
  • वर्णाश्रम धर्म का पालन करता हो।
  • राजनीति न करता हो।
  • आहार-व्यवहार शुद्धि का पालन करता हो।
  • गो-ब्राह्मण भक्त हो।

इन अर्हताओं का निरिक्षण प्रायश्चित्त प्रदाता ब्राह्मण ही करेंगे इसलिये प्रायश्चित्त प्रदाता ब्राह्मण के लिये तो और भी बड़ी अर्हतायें हैं, जो कोई भी कर्मकांडी प्रायश्चित्त प्रदान नहीं कर सकता और यदि कर भी दे तो प्रायश्चित्ति के साथ वह स्वयं भी नारकीय हो जाता है।

“योग्य ब्राह्मण वह है जिसका ज्ञान विश्वविद्यालयों (आधुनिक) से नहीं, गुरु-परंपरा से आया हो।”

ब्राह्मण के लिये तीन अर्हतायें निर्धारित की गयी हैं :

जन्म : वह जन्मना ब्राह्मण हो और जन्मना का तात्पर्य जातिमात्र ब्राह्मण होना नहीं है। वर्त्तमान में तो जन्मना का तात्पर्य वो लोग भी ग्रहण कर लेंगे जिनके माता-पिता नौकरी करते थे, वर्णसंकर हो अर्थात माता-पिता के भिन्न वर्ण हों, मात्र पिता ही ब्राह्मण हो तो वो व्यक्ति भी स्वयं को वर्तमान में ब्राह्मण ही कहेगा जबकि वह वर्णसंकर है। जन्मना ब्राह्मण में कुलीन ब्राह्मण भी समाहित है अर्थात पिता भी योग्य ब्राहण रहे हों एवं माता भी ब्राह्मणी ही हो न कि किसी अन्य वर्ण की, साथ ही उनका विवाह भी ब्राह्म विधि से हुआ हो न कि “लव मैरिज” अथवा भागकर स्वेच्छाचार पूर्वक। अर्थात वही ब्राह्मण प्रायश्चित्त देने के अधिकारी हो सकते हैं जिनके पिता भी अधिकार रहे हों।

जन्म में ही संस्कार भी आ जाते हैं मुख्य रूप से उपनयन संस्कार। उपनयन यथाकाल विधिपूर्वक हुआ हो यह भी आवश्यक है। व्रात्य/शाखारण्डादि दोषों से रहित हों यह भी आवश्यक है। कुछ अंशों में वो तथ्य गौण हो जायेंगे जो विधिविरुद्ध उपनयन का है क्योंकि वह तो सर्वत्र ही देखा जा रहा है।

इसी प्रकार विधिपूर्वक विवाह संस्कार अर्थात ब्राह्मणी के साथ ही ब्राह्म विवाह भी किये हों यह भी आवश्यक है। यदि स्वयं ही अविवाहित हो अथवा अब्राह्मणी से विवाह किया हो अथवा “लव मैरिज” किया हो ऐसे ब्राह्मण भी अयोग्य ही होते हैं। विवाह विषयक ढेरों विचारणीय विषय होते हैं जैसे वृषली, पुनर्भू आदि इसमें से एक मात्र वृषली दोष से मुक्त (कानून) होने के कारण कहा जा सकता है शेष दोषों से नहीं अर्थात यदि विधवा से विवाह किया हो तो वह अयोग्य हो जायेगा क्योंकि वह स्वयं ही पातकी सिद्ध होता है।

पर्षद के योग्य ब्राह्मण

ज्ञान : वेदज्ञ हों, शास्त्रज्ञ हों और यह ज्ञान पिता से प्राप्त हुआ हो अथवा गुरुकुल में प्राप्त हुआ हो न कि महाविद्यालय, विश्वविद्यालय (वर्त्तमानकालीन) में। वर्त्तमानकालिक महाविद्यालय/विश्वविद्यालय गुरुकुल नहीं हैं, सरकारी संस्थान हैं जो जहां गुरु जी, उपाध्याय आदि नहीं होते सरकारी सेवक होते हैं अथवा इसी को दूसरे शब्दों में कहें तो पब्लिक सर्वेंट होते हैं। ये संस्थान जो प्रमाणपत्र प्रदान करते हैं उसकी उपयोगिता सरकारी कार्यों के लिये होती है, नौकरी आदि प्राप्त करने के लिये होती है, धर्म और कर्मकांड के लिये नहीं।

योग्य ब्राह्मण बनने के लिये जिस ज्ञान की आवश्यकता होती है वह या तो पिता/पितामहादि से प्राप्त होता है या गुरुकुल में। यजमान के लिये वह प्रमाणपत्र जो वर्त्तमानकालीन विश्वविद्यालयों से मिलता है एक कागज का ऐसा टुकड़ा है जिसका कोई औचित्य ही नहीं है। इस कागज के टुकड़े के लिये आपने प्रयास ही इस कारण किया था कि आपको भी नौकरी आदि ही करनी थी, असफल होने पर यजमान को भी बताने लगते हैं। वर्त्तमान में ढेरों ऐसे कर्मकांडी हैं जो या तो नौकरी प्राप्त करने में असफल रहे हैं, अथवा सेवानिवृत्त हो चुके हैं, अथवा सेवारत ही हैं। ऐसे भी बहुत सारे कर्मकांडी हैं जो बाद में सेवारत हो गये।

तप : ब्राह्मणत्व के लिये तीसरी अर्हता तप है, वृत्ति नहीं अर्थात जो वृत्तिवशात् कर्मकांडी हैं वो तप भी करते हैं ऐसा नहीं है। तप के विषय में जो ध्यातव्य है वो यह कि सद्गृहस्थ हों, ऋतुकालगामी हों, पंचयज्ञ करते हों, षट्कर्म रत हों, सदाचारी हों, आहार-व्यवहार आदि के शुद्धिविधान का पालन करते हों। यदि ऋतुकालगामी की बात करें तो यह भी दूर की कौड़ी लगती है, पंचयज्ञ तो नष्टप्राय है संध्यामात्र भी शेष नहीं है, षट्कर्म में प्रतिग्रह और याजन शेष है।

आहार-व्यवहार शुद्धि की बात करें तो दुष्प्राप्य ही हैं। मैंने स्वयं ही बड़े-बड़े कर्मकांडी को बुफे सिस्टम में खड़े-खड़े, पादुका धारण किये हुये शिखाग्रंथि युक्त भोजन करते देखा है। अभक्ष्य-अपेय का तो कोई विचार ही नहीं करते हैं, बस मांस-मछली को अभक्ष्य सिद्ध करते रहते हैं, रात्र में दही भी निषिद्ध है इतना ज्ञान नहीं रखते। अशेष भोजन नहीं किया जा सकता यह भी ज्ञान नहीं रखते थाली/पत्तल को चाट लेते हैं और इसको ही उचित्त सिद्ध करते हैं यह कहकर कि अन्न की बर्बादी नहीं होनी चाहिये।

इसी प्रकार तप में पुत्र को भी योग्य ब्राह्मण बनाना समाहित किया जायेगा अर्थात पुत्र का यथाकाल विधि पूर्वक उपनयनादि करके ज्ञान प्रदान करते हों, न कि पुत्र को नौकरी के लिये पागल बना दिये हों। मैं यह भी नहीं कह रहा कि योग्य ब्राह्मण का पूर्णतः अभाव है किन्तु अधिकांश अयोग्य ही हैं। किन्तु वर्त्तमान काल में योग्य ब्राह्मण को ढूंढना भी एक कठिन कार्य ही है।

किन्तु यदि आप ढूंढेगे तो अवश्य ही मिलेंगे नहीं मिलने की बात मैं नहीं कर रहा हूँ किन्तु यह स्पष्ट अवश्य कर रहा हूँ यदि दृष्टि नहीं है तो ठग ही मिलेंगे और छल ही करेंगे। अर्थात सर्वप्रथम स्वयं की योग्यता आवश्यक है, शास्त्रज्ञान अनिवार्य है तभी योग्य ब्राह्मण को पहचान सकेंगे अन्यथा नहीं।

मैं यहां यह भी स्पष्ट करना अनिवार्य समझता हूँ कि भले ही उपरोक्त तथ्यों के आधार पर मेरे ज्ञान का आकलन किया जा सकता है किन्तु मैं स्वयं भी अयोग्य की ही श्रेणी में आता हूँ। ये भिन्न विषय है कि जहां मुझसे भी बड़े अयोग्य हैं वहां मेरी ही श्रेष्ठता सिद्ध हो जायेगी।

अर्थात वर्त्तमान काल में योग्यता संबंधी विचार न करके अयोग्यता की कमी का विचार करना ही संभव है और यही शास्त्रज्ञा भी है अन्यथा कर्मलोप हो जायेगा। अयोग्यता की कमी का तात्पर्य यह है कि जिसमें जितना कम दोष हो उसे उतना अधिक योग्य समझना चाहिये। यहां यजमानवर्ग में ब्राह्मण निंदा संबंधी भाव भी प्रकट हो सकता है, यदि ये कर्मकांडियों की वास्तविकता है तो यजमान में कई गुणा अधिक है। अर्थात अयोग्य यजमान का यजन भी अयोग्य ब्राह्मण ही करा सकते हैं योग्य ब्राह्मण नहीं, यदि यदि यजमान स्वयं ही अयोग्य तो जो ब्राह्मण उसका यजन करा रहे हैं वो भी निःसंदेह अयोग्य ही हैं क्योंकि योग्य ब्राह्मण करायेंगे ही नहीं। अयाज्य-याजक भी निन्दित/अयोग्य ही कहे गए हैं।

असमर्थों के लिये प्रायश्चित्त का विकल्प अनुग्रह प्राप्ति

अब जाकर यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रायश्चित्त के अधिकारी का भी पूर्णतः अभाव सिद्ध हो रहा है एवं प्रायश्चित्त प्रदाता ब्राह्मण का भी अभाव सिद्ध हो रहा है किन्तु अशेष रूप से नहीं। इस कारण प्रायश्चित्त विधान समाप्त हो चुका है एकमात्र अवसर पर जब गाय की मृत्यु हो जाये तो लोग प्रायश्चित्त ढूंढने निकलते हैं इतना शेष है।

दिनरात अभक्ष्यभक्षण कर रहे हैं और छोड़ नहीं सकते, अन्यायपूर्वक धनार्जन कर रहे हैं और करेंगे, आत्मकल्याण के पथ से पूर्णतः विचलित हैं तो प्रायश्चित्त किसलिये। प्रायश्चित्त तो उसके लिये ही है जो धर्म का पालन करते हैं और कदाचित कोई पाप हो जाये तो उसका निवारण हो किया जा सके, अहर्निश पापाचारियों के लिये नहीं है। ऐसे लोगों के लिये वही धूर्त/ठग सही हैं जो नाच-गाकर धन ठगते हैं।

अनुग्रह का विचार आगे जाकर तब किया जाता है जब योग्य व्यक्ति तो हो किन्तु प्रायश्चित्त करने में असमर्थ हो। जब योग्य व्यक्ति उपस्थित हों किन्तु प्रायचित्त करने में सक्षम न हो तो उसके ऊपर योग्य ब्राह्मण अनुग्रह कर सकते हैं और सामान्य उपाय बता सकते हैं। इसमें ब्रह्मकूर्च विधान आता है, शिशुकृच्छ्र आता है अथवा विहित प्रायश्चित्त को ही न्यून किया जा सकता है। अर्थात यदि अनुग्रह प्राप्त करना चाहें तो योग्य ब्राह्मण मिलने पर भी योग्यता का निर्धारण वही करेंगे न कि स्वयं प्रायश्चित्ति करेगा। अनुग्रह प्राप्ति के लिये प्रायश्चित्ति विषयक अर्हतायें इस प्रकार स्पष्ट होते हैं जो आगे प्रमाणों से भी स्पष्ट होगा :

  • वह बालक, वृद्ध, दुर्बल अथवा अस्वस्थ हो।
  • वह न तो प्रलोभन दे रहा हो और न ही भयाक्रांत कर रहा हो।
  • शेष प्रायश्चित्त की शर्तों के अनुसार विचारणीय।

स्नेह, लोभ, भय, प्रमाद आदि विषय यहां सामान्य रूप से देखा जा सकता है और इस कारण परिचित योग्य ब्राह्मण भी स्वयं ही अनुग्रह न करें तो इस दोष का निवारण हो सकता है। इसके निवारण के लिये पर्षद; जिसमें योग्य ब्राह्मण ही हों, लोभी आदि न हों बनाया जा सकता है। अब यदि पर्षद ही लोभी-अज्ञानियों का बना लें तो पुनः कुछ कहना ही कठिन है। पर्षद के लिये ब्राह्मणों को प्रायचित्ति ही आमंत्रित करे और इसका विचार अवश्य करे कि वो सब एक-दूसरे के पूर्वपरिचित न हों किन्तु योग्य हों।

इस प्रकार से करने पर ही सही पर्षद संभव है अन्यथा यदि ब्राह्मण स्वयं ही पर्षद बनायें तो अपने परिचितों को ही आमंत्रित करेंगे और उसमें भी ऐसे को जो समर्थन ही करे। जैसे मान लीजिये मेरे ऊपर पर्षद गठन का कार्य आता है तो मैं अपने परिचित ब्राह्मण को ही आमंत्रित कर सकता हूँ और वो मेरा समर्थन ही समर्थन करेंगे भले ही मैं शास्त्रविरुद्ध भी क्यों न बोलूं, लोभग्रस्त होकर ही क्यों न बोलूं।

मैं अपनी अयोग्यता स्वीकार चुका हूँ तथापि मात्र उदाहरण हेतु चर्चा ही यह चर्चा कर रहा हूँ कि यदि मैं पर्षद में होऊं। यहां उदाहरण का तात्पर्य मेरी योग्यता न समझें। यह उदाहरण मात्र के लिये ही है कि मान लीजिये किसी पर्षद में मैं हूँ तो शेष ब्राह्मण मेरे द्वारा आमंत्रित नहीं होने चाहिये अथवा मैं भी किसी ब्राह्मण (पर्षद में सम्मिलित) द्वारा आमंत्रित न होऊं और यथासंभव ऐसा प्रयास होना चाहिये कि शेष ब्राह्मण मेरे पूर्वपरिचित भी न हों। इस प्रकार से गठित पर्षद किसी योग्य प्रायश्चित्ति हेतु अनुग्रह करे तो वह पापनिवारण करने वाला होगा।

अयोग्यता में हीनता वाले तथ्य को इस प्रकार से ग्रहण किया जा सकता है और यहां भी मैं अपना ही उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ। मैं यज्ञ-हवन आदि में ब्रह्मा बनने के योग्य नहीं हूँ, किन्तु उपस्थित ब्राह्मणों को जहां पंचभूसंस्कार से अधिक कुशकण्डिका का रत्तीभर ज्ञान भी न हो और वहां मैं भी उपस्थित होऊं तो मैं ब्रह्मा बनने के योग्य मात्र वहीं के लिये ही सिद्ध किया जा सकता हूँ। यह उदाहरण इस कारण दे रहा हूँ कि वर्त्तमान में तो ९९.९९% कर्मकांडियों को हवन विधि का ज्ञान नहीं है।

अनुग्रह विधान

आगे अनुग्रह विधान को समझने के लिये शास्त्रों के प्रमाण प्रस्तुत किये गए हैं किन्तु समझने के लिये भी योग्यता अनिवार्य है इसलिये विश्लेषण नहीं कर रहा हूँ अन्यथा अनुग्रह के नाम पर भी ठगी होने की संभावना ही बनेगी। यह इसलिये कह रहा हूँ ताकि ब्राह्मण वर्ग स्वयं पाप से बचने का प्रयास आरम्भ करें।

एक तो ज्ञान का अभाव, दूसरा धन का लोभ ये तो दोनों ही आंखों से हीन होने जैसा है। ऐसे व्यक्ति को यदि अनुग्रह विधान प्राप्त हो जाये तो वो इसका प्रयोग भी धन ऐंठने के लिये ही करेंगे। दूसरे व्यक्ति के लिये आत्मकल्याण का मार्ग आप तभी प्रशस्त कर सकते हैं जब स्वयं आत्मकल्याण के पथ पर चलते हों, अन्यथा नहीं। जो कोई भी चाहे अनुग्रह कर सके ऐसा नहीं है, जैसे कि मैं स्वयं।

ब्रह्मकूर्चं प्रवक्ष्यामि सर्वपापप्रणाशनम् । अनादिष्टेषु सर्वेषु ब्रह्मकूर्चं विधीयते ॥
नदीप्रस्रवणे तीर्थे ह्रदे चान्तर्जलेऽपि वा । धौतवासा विशुद्धात्मा जपेच्चैव जितेन्द्रियः ॥
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् । निर्दिष्टं पञ्चगव्यं च पवित्रं कायशोधनम् ॥
गोमूत्रैकपलं दद्यादर्धाङ्गुष्ठेन गोमयम् । क्षीरं सप्तपलं दद्यात्पलमेकं कुशोदकम् ॥
गायत्र्याऽऽगृह्य गोमूत्रं गंन्धद्वारेति गोमयम् । आप्यायस्वेति च क्षीरं द्रधिक्राव्णेति वै दधि ॥
तेजोऽसि शुक्रमित्याज्यं देवस्य त्वा कुशोदकम् । ब्रह्मकूर्चं भवेदेवमापो हिष्ठेति ऋग्जपेत् ॥

मध्यमेन पलाशेन पद्मपत्रेण वा पिबेत् । अथ वा ताम्रपात्रेण ब्रह्मपात्रेण वा द्विजः ॥
अग्नये स्वाहा। सोमाय स्वाहा । इरावती । इदं विष्णुः । मा नस्तोके । गायत्रीं च जुहुयात् ॥
प्रजापते न त्वदेतान्यन्य इत्यालोडय प्रणवेन पिबेत् ॥
आहृत्य प्रणवेनैव उद्धृत्य प्रणवेन च । आलोड्य प्रणवेनैव पिबेच्च प्रणवेन च ॥

एत‌द्विजनिमित्तं हि सर्वपापप्रणाशनम् । मलं कोष्ठगतं सर्वं दहत्त्यग्निरिवेन्धनम् ॥
दुर्बलेऽनुग्रहः प्रोक्तस्तथैव बालवृद्धयोः । अतोऽन्यथा भवेद्दोषस्तस्मान्माऽनुग्रहः स्मृतः ॥
स्नेहाद्वा यदि वा मोहाद्भयादज्ञानतोऽपि वा । कुर्वन्त्यनुग्रहं ये तु तत्पापं तेषु गच्छति ॥
शरीरस्यात्यये कार्यः सदैव नियमो द्विजैः । महत्कार्योपचारे च न च स्वस्थैः कदाचन ॥
स्वस्थः संकुरुते मूढो व्रतनियमौ यो द्विजः । तद्वशात्ते तु कर्तारः पतन्ति नरकेषु वै ॥

लघु शातातप स्मृति १५६ – १७०

स्नेहाद्वा यदि वा लोभाद्भयादज्ञानतोऽपि वा । कुर्वन्त्यनुग्रहं ये तु तत्पापं तेषु गच्छति ॥
लिखित स्मृति ७७

यत्र यत्र च संकीर्णमात्मानं मन्यते द्विजः । तत्र तत्र तिलैर्होमो गायत्र्यष्ट शतं जपेत् ॥
लिखित स्मृति ९६

चत्वारोऽपि त्रयो वापि यद्ब्रूयुर्वेदपारगाः । स धर्म इति विज्ञेयो नेतरेषां सहस्रशः ॥६॥
अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् । सहस्रशः समेतानां परिषत्त्वं न विद्यते ॥ ७ ॥
यद्वदन्ति तमोमूढा मूर्खा धर्ममतन्द्रियम्। तत्पापं शतधा भूत्वा तद्वैक्तृनधिगच्छति ॥

वशिष्ठ स्मृति ३/६ – ८

चातुर्विधं विकल्पी च अङ्गविद्धर्मपाठकः । आश्रमस्थास्त्रयो मुख्याः परिषत्स्याद्दशावरा ॥
वशिष्ठ स्मृति ३/२३

अथापरः कृच्छ्रविधिः साधारणो व्यूढः ॥
अहः प्रातहर्नक्तमहरेकमयाचितम् । अहः पराकं तत्रैकमेवं चतुरहौ परौ ॥
अनुग्रहार्थं विप्राणां मनुर्धर्मभृतां वरः । बालवृद्धातुरेष्वेवं शिशुकृच्छ्रमुवाच ह ॥

वशिष्ठ स्मृति २३/३६ – ३८

व्याधिव्यसनिनिःश्रान्ते दुर्भिक्षे डामरे तथा । उपवासो व्रतं होमो द्विजसंपादितानि वै ॥
अथवा ब्राह्मणास्तुष्टाः सर्वं कुर्वन्त्यनुग्रहं । सर्वान्कामानवाप्नोति द्विजसंपादितैरिह ॥
दुर्बलेऽनुग्रहः प्रोक्तस्तथा वै बालवृद्धयोः । अतोऽन्यथा भवेद्दोषस्तस्मान्नानुग्रहः स्मृतः ॥
स्नेहाद्वा यदि वा लोभाद्भयादज्ञानतोऽपि वा । कुर्वन्त्यनुग्रहं ये तु तत्पापं तेषु गच्छति ॥

शरीरस्यात्यये प्राप्ते वदन्ति नियमं तु ये । महत्कार्योपरोधेन न स्वस्थस्य कदाचन ॥
स्वस्थस्य मूढाः कुर्वन्ति वदन्त्यनियमं तु ये । ते तस्य विघ्नकर्तारः पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥
स्वयं एव व्रतं कृत्वा ब्राह्मणं योऽवमन्यते । वृथा तस्योपवासः स्यान्न स पुण्येन युज्यते ॥
स एव नियमो ग्राह्यो यद्येकोऽपि वदेद्द्विजः । कुर्याद्वाक्यंद्विजानां तु अन्यथा भ्रूणहा भवेत् ॥

ब्राह्मणा जङ्गमंतीर्थं तीर्थभूता हि साधवः। तेषां वाक्योदकेनैव शुध्यन्ति मलिना जनाः ॥
ब्राह्मणा यानि भाषन्ते मन्यन्ते तानि देवताः । सर्वदेवमयो विप्रो न तद्वचनं अन्यथा ॥
उपवासो व्रतं चैव स्नानं तीर्थं जपस्तपः । विप्रसंपादितं यस्य संपूर्णं तस्य तत्फलम् ॥

पराशरस्मृति/६/५३ – ६४

गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् । निर्दिष्टं पञ्चगव्यं तु पवित्रं पापशोधनं ॥
गोमूत्रं कृष्णवर्णायाः श्वेतायाश्चैव गोमयम् । पयश्च ताम्रवर्णाया रक्ताया गृह्यते दधि ॥
कपिलाया घृतं ग्राह्यं सर्वं कापिलं एव वा । मूत्रं एकपलं दद्यादङ्गुष्ठार्धं तु गोमयं ॥
क्षीरं सप्तपलं दद्याद्दधि त्रिपलं उच्यते । घृतं एकपलं दद्यात्पलं एकं कुशोदकम् ॥

गायत्र्यादाय गोमूत्रं गन्धद्वारेति गोमयम् । आप्यायस्वेति च क्षीरं दधिक्राव्णस्तथा दधि ॥
तेजोऽसि शुक्रं इत्याज्यं देवस्य त्वा कुशोदकम् । पञ्चगव्यं ऋचा पूतं स्थापयेदग्निसंनिधौ ॥
आपोहिष्ठेति चालोड्य मानस्तोकेति मन्त्रयेत् । सप्तावरास्तु ये दर्भा अछिन्नाग्राः शुकत्विषः ॥
एतैरुद्धृत्य होतव्यं पञ्चगव्यं यथाविधि । इरावती इदं विष्णुर्मानस्तोकेति शंवती ॥

एताभिश्चैव होतव्यं हुतशेषं पिबेद्द्विजः । आलोड्य प्रणवेनैव निर्मन्थ्य प्रणवेन तु ॥
उद्धृत्य प्रणवेनैव पिबेच्च प्रणवेन तु । यत्त्वस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति देहिनाम् ॥
ब्रह्मकूर्चो दहेत्सर्वं प्रदीप्ताग्निरिवेन्धनम् । पवित्रं त्रिषु लोकेषु देवताभिरधिष्ठितं ॥
वरुणश्चैव गोमूत्रे गोमये हव्यवाहनः । दध्नि वायुः समुद्दिष्टः सोमः क्षीरे घृते रविः ॥

पराशरस्मृतिः/११/२८ – ३९

नदीतीरेषु गोष्ठेषु पुण्येष्वायतनेषु च । तत्र गत्वा शुचौ देशे ब्रह्मकूर्चं समाचरेत् ॥
पालाशं पद्मपत्रं वा ताम्र वाऽथ हिरण्मयम् । तत्र भुङ्क्ते व्रती नित्यं तत्पात्रं समुदाहृतम् ॥
गायत्र्या चैव गोमूत्रं गन्धद्वारेति गोमयम् । आप्यायस्वेति च क्षीरं दधिक्राव्णेति वै दधि ॥
तेजोऽसि शुक्रमित्याज्यं देवस्य त्वा कुशोदकम् । चतुर्दशीमुपोष्यैवं योऽमावस्यां समाचरेत् ॥

गोमूत्रकं पलं दद्यादङ्गुष्ठार्धं तु गोमयम् । क्षीरं सप्तपलं दद्याद्दध्नास्त्रिपलमेव च ॥
आज्यमेक पलं प्रोक्तं पलमेकं कुशोदकम् । एवं क्रमेण कर्तव्यं पञ्चगव्यं यथाविधि ॥
सप्तपर्णाः शुभा दर्भा अच्छिन्नाग्राः समायताः । तैः समुद्धृतैर्होतव्य देवताभ्यो यथाविधि ॥
अग्नये सोमायेति इरावतीदं विष्णुरिति । विष्णोर्नुकं सुमित्रियान सुजानातकस्तथा ॥

एतासां देवताहुतीनां हुतशेषं तु यः पिबेत् । आलोड्य प्रणवेनैव निर्मथ्य प्रणवेन तु ॥
उद्धृत्य प्रणवेनैव पिबेच्च प्रणवेन तु । एवं कुर्वन्ब्रह्मकूर्चं मासे मासे च वै द्विजः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा जायते नात्र संशयः ॥
यत्त्वगस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति देहिनाम् । ब्रह्मकूर्चो दहेत्पापं प्रदीप्ताग्निरिबेन्धनम् ॥

वृद्धशातातप स्मृति २ – १२

यथैवानलसंसर्गान्मलं त्यजति काञ्चनम् । तथैव गुरुसम्पर्कात्पापं त्यजति सेवकः ॥
यथा वह्निसमीपस्थो घृतकुम्भो विलीयते । तथा पापं विलीयेत गुरोर्देवस्य सन्निधौ ॥
यथा प्रज्वलितो वह्निः कच्चरादि विनिर्दहेत् । गुरुः प्रसेवितस्तद्वत्पापं दहति सर्वथा ॥
ब्रह्मा हरिश्च शंभुश्च देवा देव्यो महर्षयः । कुर्वन्त्यनुग्रहं तुष्टा गुरौ तुष्टे सुखप्रदाः ॥

लक्ष्मीनारायणसंहिता/खण्डः ४ (तिष्यसन्तानः)/८२/३२ – ३५

कपिलागोः पलं मूत्रं अर्धाङ्गुष्ठञ्च गोमयं । क्षीरं सप्तपलन्दद्यात्दध्नश्चैव पलद्वयं ॥
घृतमेकपलन्दद्यात्पलमेकं कुशोदकं । गायत्र्या गृह्य गोमूत्रं गन्धद्वारेति गोमयं ॥
आप्यायस्वेति च क्षीरं दधिक्राव्णेति वै दधि । तेजोऽसीति तथा चाज्यं देवस्येति कुशोदकं ॥
ब्रह्मकूर्चो भवत्येवं आपो हिष्ठेत्यृचं जपेत् । अघमर्षणसूक्तेन संयोज्य प्रणवेन वा ॥
पीत्वा सर्वाघनिर्मुक्तो विष्णुलोकी ह्युपोषितः ॥

अग्निपुराण/१७५/२४ – २८

कलिकाल में मार्ग

“बिना ज्ञान के किया गया कर्म बच्चों के खेल जैसा निष्प्रयोजन है।”

अब आगे कलिकाल में मार्ग को जानने समझने की है। घोर कलिकाल में सबके-सब (कुछ धर्मनिष्ठ ब्राह्मणों के अतिरिक्त) प्रायचित्ति ही हैं जैसे कि मैं स्वयं भी और विडम्बना यह भी है कि यदि एक बार को कठोरतम प्रायश्चित्त कर भी लें तो कुछ होने वाला नहीं है क्योंकि आगे पुनः सभी पापों से बचकर रहें किन्तु जीवनशैली ही ऐसी है कि रजस्वला दोष से तो नहीं बच सकते। भोजन काल में रजस्वला के शब्द सुनाई देना भी दोष उत्पन्न करता है और वह भोजन भी अभक्ष्य हो जाता है, रजस्वला स्पर्श, रजस्वला निर्मित भोजन करना आदि तो प्रायचित्ति बनाता ही है।

आप सभी पापों से बचने का प्रयास तो कर सकते हैं किन्तु इसका क्या। ये तो तब है जब सभी प्रकार के पापों से बचने का प्रयास करें, किन्तु यदि यजन भी करा रहे हैं तो अधिकांशतः अयाज्य ही है फिर क्या करें ? अयाज्ययाजन दोष भी प्राप्त होगा ही होगा तो करें क्या। ये तो वर्त्तमान में है आगे तो ढेरों और विषय होंगे जैसे घर में कुलघाती होना (वर्णसंकर उत्पन्न करने वाला कुलघाती ही कहा गया है), घर में ही पापियों-दुराचारियों का होना, पापियों का संसर्ग भी पाप का भागी बनाता है।

कलिकाल में मार्ग

घोर कलिकाल में मार्ग को इस प्रकार से क्रमबद्ध रूप से समझा जा सकता है :

  • सर्वप्रथम आत्मकल्याण के विचार को जाग्रत करें, इस तथ्य का गांठ बांधे की मानव शरीर मोक्ष प्राप्ति के लिये प्राप्त हुआ है न कि भोग के लिये तभी आगे का कोई भी प्रयास कर सकते हैं इसके बिना नहीं।
  • शास्त्रों का अध्ययन आरम्भ करें, कथित/प्रचारित कथावक्ताओं/धर्मगुरुओं पर विश्वास न करें ये लोग शास्त्र विरुद्ध बातें रात-दिन करते ही रहते हैं और इनकी वास्तविकता तभी ज्ञात होगी जब स्वयं शास्त्र अध्ययन आरम्भ करेंगे। कथा सुननी हो तो निकटतम विद्वान ब्राह्मण को ही आमंत्रित करें, इन नटों को नहीं।
  • दूरदर्शन, पत्र-पत्रिकाओं से ज्ञान प्राप्त न करें। अपितु शास्त्रों के अध्ययन से जो ज्ञात हो रहा है उसे परिचित विद्वानों से समझने का प्रयास करें। बाद में भले ही आप उन्हें दक्षिणादि प्रदान करें किन्तु वो आपके संहेद का निवारण और ज्ञान की वृद्धि लोभवश न करें यह अनिवार्य है।
  • इस प्रकार क्रमशः आपको धर्ममार्ग का ज्ञान होता जायेगा और यह भी ज्ञात होता जायेगा कि कितने बड़े पापी हैं, जैसे मुझे ज्ञात हो रहा है।
  • आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर होने के लिये जो सबसे बड़ी शर्त है वो है न्यायपूर्वक धर्नार्जन करना और इस विषय के लिये शस्त्रान्वेषण करें।
  • कर्तव्याकर्तव्य निर्धारण के लिये भी शास्त्रज्ञान प्राप्त करें क्योंकि जब आपको शास्त्रज्ञान नहीं होता तो आपके समक्ष विद्वान व्यक्ति उचित बताये तो भी उसका पालन नहीं करते स्वेच्छाचार ही करते हैं। जैसे यदि आपको यह ज्ञात नहीं कि त्रयोदशाह (तेरहा) को वर्षी (सांवत्सरिक श्राद्ध) नहीं किया जा सकता तो विद्वान व्यक्ति यदि कहे भी तो उसका पालन ही नहीं करेंगे, घर-परिवार, समाज सबके-सब बलपूर्वक करने के लिये ही प्रेरित करेंगे। किन्तु अगले वर्षों से वर्षी का लोप कर देंगे, भले ही विद्वान ब्राह्मण करने के लिये क्यों न कहें। इसी प्रकार अन्यान्य विषयों में भी मात्र स्वेच्छाचार ही होता है और इसका कारण शास्त्रज्ञान का अभाव है। इस विषय में “संपूर्ण कर्मकांड विधि” अर्थात यह ब्लॉग आपका पर्याप्त मार्गदर्शन कर सकता है।
  • संतानों को बाल्यकाल से ही धर्म का भी ज्ञान प्रदान करें, माता-पिता का यह दायित्व होता है। समय पर संस्कार करें और इतना योग्य अवश्य बनायें कि वो आपके श्राद्ध की योग्यता रखे और जो करे वह आपको प्राप्त हो सके। वर्त्तमान काल में फिल्म, सीरियल, समाचार आदि के माध्यम के भी धर्म कहकर शास्त्रविरुद्ध बातें जनमानस को बताई सिखाई जाती है। संघ भी स्वयं को धर्म का ठेकेदार सिद्ध करने का प्रयास करता है और उसी पण्डे-पुजारी वर्ग को जो कि शास्त्रज्ञान से रहित है अपनी बातें सीखाता है और जनमानस को समझाने के लिये प्रेरित भी करता है। बड़े-बड़े कथावक्ताओं को किस प्रकार से अपनी बात कहने के लिये मना लेता है यह अन्वेषण का विषय है, एक मुख्य कारण धनलोलुपता कही जा सकती है। यदि आप स्वयं अपनी संतान को धर्म का ज्ञान नहीं देंगे तो दुनियां धर्म कहकर भी शास्त्रविरुद्ध बातें मस्तिष्क में भर देगी।
  • भगवन्नाम का आश्रय तो अनिवार्य है ही किन्तु इसका भी ध्यान रखें कि यह पाप की छूट प्रदान नहीं करता इसलिये भगवान से पापाचरण से बचाव की भी प्रार्थना करें अर्थात मात्र पापनिवारण के लिये ही प्राथना न करें अपितु पाप से बचने के लिये भी करें और कालविशेष में अनुग्रह प्राप्ति हो ऐसी भी प्रार्थना करें।
  • पाप से बचते हुये धर्माचरण ही करें। चतुर्दिक पापी ही हैं किन्तु सबसे बड़ा पापी हम स्वयं ही हैं ऐसा भाव रखते हुये भगवान से कृपा की याचना करें। सभी ऐसा ही दिखाते रहते हैं कि दुनियां में सभी पाप कर रहे हैं किन्तु मैं नहीं करता यह अनुचित है, सबसे बड़ा पापी मैं ही हूँ यह भाव होना चाहिये और इस भाव को जगाने में बिन्दु जी के कुछ भजनों का अवलम्ब ले सकते हैं, जैसे “मुझ से अधम अधीन…”, “यदि नाथ का नाम दयानिधि…”आदि।
  • वर्तमान युग में सामान्य लोग प्रायश्चित्त नहीं कर सकते इसके दो कारण मुख्य हैं, प्रथम यह कि ज्ञान ही नहीं है और द्वितीय यह भी कि अपात्रता है क्योंकि आज प्रायश्चित्त कर लें और कल से पुनः पाप करते ही रहें तो उस प्रायश्चित्त का कोई औचित्य नहीं साथ ही हर कोई अन्याय से ही धन उपार्जन कर रहा है।
  • स्वयं ही धर्माचरण का पालन न करें या परिवार मात्र को ही प्रेरित न करें अपितु समाज को भी प्रेरित करें। इसके साथ ही पुरोहित/महापात्र आदि को भी प्रेरित करें कि आपका महत्व तब है जब आप योग्य हों, अयोग्यता में मैं किसी भी योग्य का चयन करने का अधिकार रखता हूँ। और पुरोहित/महापात्र आदि के बंधन का भी त्याग करें, यदि वह अयोग्य है तो कोई बंधन नहीं है, बंधन तभी है जब वो योग्य हों।
  • तीर्थों, मंदिरों में जो पण्डे-पुजारी होते हैं इनका महत्व मात्र वहां के कर्मकांड तक ही सीमित है, ज्ञान देने के अधिकारी नहीं होते हैं और इनसे ज्ञान प्राप्त न करें। एक उदाहरण भी देता हूँ गया के पण्डे सबको यही ज्ञान देते हैं कि अब गया श्राद्ध के पश्चात् किसी भी श्राद्ध की आवश्यकता नहीं है मात्र ब्राह्मणभोजन (महालय में) करा दें। इन मूर्खों को इतना भी ज्ञात नहीं कि श्राद्ध के स्थान पर जहां ब्राह्मणभोजन का विकल्प दिया गया है उसका तात्पर्य भी वहां पिंडरहित श्राद्ध ही होता है। ऐसे मूर्ख तीर्थक्षेत्र में तो वहां के कर्मकांड हेतु अधिकारी होते हैं किन्तु ज्ञान देने के अधिकारी नहीं, अतः तीर्थों/मंदिरों के पण्डे-पुजारियों से ज्ञान प्राप्त न करें।
  • आतुरकाल में प्रायश्चित्त का विधान गरुडपुराण से मिलता है जिसका प्रमाण आगे दिया गया है। आतुरकाल में भी आप तभी अनुग्रह प्राप्त कर सकेंगे जब आपकी संतान योग्य हो अन्यथा नहीं। क्योंकि आतुरकाल में अनुग्रह प्राप्ति का जो मार्ग है उसमें पुत्रादि की सम्मति अनिवार्य है और पुत्रादि तभी सहयोग करेगा जब आप उसे धर्म का ज्ञान प्रदान करेंगे अन्यथा नहीं। आतुरकाल में पुत्रादि की सम्मति होने पर भी अनुग्रह प्राप्त नहीं कर सकेंगे क्योंकि दान में पुत्रादि की सहमति अनिवार्य है, प्रमाण आगे दिया गया है।
  • स्त्रियां रजस्वला होने पर होने वाले स्पर्शपर्श दोष का निवारण प्रतिवर्ष ऋषिपंचमी को कर सकती हैं। दुराचार आदि अन्यान्य पापों के लिये तो भगवान से यही प्रार्थना करें कि आतुरकाल में अनुग्रह की प्राप्ति हो वर्त्तमान जीवनशैली में और कोई मार्ग शेष नहीं। ये ढोंगी नट जो “एक घड़ी आधी घड़ी” वाला पाठ पढ़ाते रहते हैं बस धन ऐंठने के लिये पढ़ाते हैं। नाम का प्रभाव यह सिद्धांत स्थापित नहीं करता कि पाप करने की छूट है।
  • आतुरकाल में अनुग्रह लाभ प्राप्त हो इसके लिये यह भी आवश्यक है कि प्रारंभ से ही शरीर शुद्धि, द्रव्यादि शुद्धि, आहार शुद्धि, भाव शुद्धि, द्रव्य शुद्धि आदि करें, सदाचारी बनें। नेता आदि से दूरी बनाकर रखें, न ही सम्मान लें और न ही दें, कार्य विशेष हेतु यदि संसर्ग हो तो मात्र उतने काल तक ही करें न कि संपर्क बढ़ायें। सबसे बड़ा पापी मैं ही हूँ यह भगवान से प्रार्थना करने के समय का भाव होना चाहिये और नेताओं से संसर्ग होने पर सबसे बड़ा पापी यही है ऐसा भाव हो तभी उससे दूरी बना सकेंगे।
  • अंतकाल में भगवन्नाम का आश्रय ग्रहण करें, यदि पुत्रादि योग्य हों तो उससे ही रामायण, गीता, पुराणादि श्रवण करें। यदि न कर सके तो ब्राह्मणों से श्रवण करें। अंतकाल में मूल पाठ श्रवण का ही प्रयास करें न कि धूर्त नटों के आडम्बर का आयोजन करें। इस अवसर पर अनुष्ठानात्मक आयोजन की आवश्यकता न होकर मूल श्रवण मात्र की आवश्यकता होती है।

ज्ञानतोऽज्ञानतो वापियन्नरैः कलुषं कृतम् । तस्य पापस्य शुद्ध्यर्थं विधेया निष्कृतिर्नरैः ॥
भस्मादिस्नानदशकमादौ कुर्याद्विचक्षणः । यथाशक्ति षडब्दादिप्रत्याम्नायाच्चरेदपि ॥
तदर्धं वा तदर्धं वा तदर्धार्धमथापि वा । यथाशक्त्या ततः कुर्याद्दश दानानि वै शृणु ॥

गरुडपुराण/प्रेतकाण्डः (धर्मकाण्डः)/१ – ३

सुकृती वार्धके दृष्ट्वा शरीरं व्याधिसंयुतम्। प्रतिकूलान्ग्रहांश्चैव प्राणघोषस्य चाश्रुतिं ॥
तदा स्वमरणं ज्ञात्वा निर्भयः स्यादतन्द्रितः। अज्ञातज्ञात पापानां प्रायश्चित्तं समाचरेत् ॥

गरुडपुराण (षोडषाध्यायी)/८/३ – ४

अन्ते जनो यद्ददाति स्वल्पं वा यदि वा बहु। तदक्षयं भवेत्तार्क्ष्य यत्पुत्रश्चानुमोदते ॥
गरुडपुराण (षोडषाध्यायी)/८/२८

इसके साथ ही षोडषाध्यायी गरुडपुराण के आठवें अध्याय में आतुरकालिक बहुत ही विधान प्राप्त होता है जिसमें सर्वप्रथम प्रायश्चित्त ही कहा गया है। यहां प्रायश्चित्त का तात्पर्य अनुग्रह परक ही है क्योंकि वह मरणासन्न व्यक्ति तो प्रायश्चित्त करने असमर्थ होता है और वृद्धावस्था के कारण भी प्रायश्चित्त से परे हो जाता है। प्रायश्चित्त के पश्चात् पूजा, जप, दान, हवनादि का वर्णन किया गया है। इसके साथ ही सन्यास, अनशन आदि की बात भी कही गयी है जिसका अध्ययन करना महत्वपूर्ण है।

आत्मकल्याणेच्छुओं हेतु षोडषाध्यायी गरुडपुराण का बारम्बार अध्ययन-श्रवण-मनन अनिवार्य है। इसी प्रकार विभिन्न स्मृतियों का बारम्बार अवलोकन करना आवश्यक है। शास्त्र अध्ययन कथन का मूल तात्पर्य स्मृति अध्ययन ही ग्रहण करना चाहिये तत्पश्चात यदि समयाभाव न हो तो रामायण, महाभारत, पुराण आदि का भी करना चाहिये।

मार्ग

यहां वर्त्तमान काल में उस मार्ग को समझने का प्रयास किया गया है जो शास्त्र-सम्मत है। सभी मार्ग अवरुद्ध नहीं हो सकते और यदि अवरुद्ध हो जायें तो अनर्थ होता है। उदाहरण के लिये आप SC/ST एक्ट जैसे कानूनों का ग्रहण कर सकते हैं, यह कानून सामान्य वर्ग के लिये बचाव का मार्ग ही अवरुद्ध कर देता है और इसका दुष्परिणाम भयावह हो सकता है।

कुछ लोग उस मार्ग का अवलंबन लेने भी लगे हैं और वो है यदि जेल जाना ही है तो हत्या करके जाना। हम यहां हत्या को उचित तो नहीं कह सकते और अनुचित ही कहेंगे किन्तु यह मार्ग अवरुद्ध होने का दुष्परिणाम है।

इसी प्रकार हमारी चर्चा का जो विषय है उसमें भी यदि मार्ग अवरुद्ध हो जाये जैसा कि सामान्य लोगों ने मान भी लिया है तो अनर्थ ही होगा और इसी कारण अनर्थ हो रहा है, सभी पापाचरण में आकण्ठ डूबे हुये हैं। इसका यही कारण है कि सबने समझ लिया कि मार्ग ही अवरुद्ध है। इसलिये यह आलेख उन लोगों के लिये अत्यंत उपयोगी और चिंतन-मनन का विषय है जो आत्मकल्याण की इच्छा रखते हैं। मार्ग पूर्णतः अवरुद्ध नहीं है और यदि हम चाहें तो शास्त्र से ही मार्ग प्राप्त हो रहा है।

वर्त्तमान काल की विपरीत धारा के लिये एक व्यंगात्मक वचन इस प्रकार कहा-सुना जाता है :

यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः, स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः।
स एव वक्ता स च दर्शनीयः, सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति॥

यह वचन यथार्थ को स्पष्ट नहीं करता है अपितु विपरीत होने के कारण उसके प्रति कटाक्ष है और कटाक्षवत ही प्रयोग भी किया जाता है। आत्मकल्याण चाहने वालों को इसका विपरीत भाव लेना होगा क्योंकि इसमें “सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति” का भी विपरीत भाव ही होगा और वो गुण के स्थान पर दुर्गुण/दोष परक है।

किन्तु ऐसा भाव न लेकर सभी धर्मविमुख होकर स्वेच्छाचार रत हैं इसी कारण समाज और राष्ट्र में अशांति/भ्रष्टाचार/दुराचारादि हो रहे हैं। यदि सरकार असामाजिक कुकर्मों/अपराधों पर भी अंकुश लगाना चाहे तो उसके पास एक मात्र विकल्प धर्म का मार्ग ही है। जब तक धर्म के विरुद्ध शासनव्यवस्था कार्य करेगी तब तक अपराध को नियंत्रित किया ही नहीं जा सकता है।

हम इसी कारण चोरी नहीं करेंगे कि वह पाप है, यदि हम पाप न माने तो कानून से बचकर चोरी करने का रास्ता ढूंढ ही लेंगे और यही हो रहा है। पुलिस (शासन) का संपर्क सामान्य जनता से नहीं होता है, अपराधियों से ही होता है और वो उसी का संरक्षण करते भी हैं। इसका कारण यही है कि अपराधी का तो धर्म से लेना-देना थोड़ा हो भी सकता है किन्तु पुलिस का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।

निष्कर्ष

वर्तमान काल में ‘सनातन’ शब्द का प्रयोग एक फैशन बन गया है, जबकि इसके मूल तत्व ‘शुद्धि और प्रायश्चित्त’ को विस्मृत कर दिया गया है। आलेख का निष्कर्ष यह है कि कलयुग में कठिन शारीरिक प्रायश्चित्त भले ही दुष्कर हों, किन्तु ‘अनुग्रह विधान’ और ‘ब्रह्मकूर्च’ जैसे विकल्प अभी भी जीवित हैं। आत्मकल्याण के लिए प्रदर्शन और भीड़ का हिस्सा बनने के बजाय, न्यायोपार्जित धन, आहार-व्यवहार शुद्धि और योग्य ब्राह्मण के सानिध्य में ‘दीनता’ के भाव से ईश्वर की शरण में जाना ही एकमात्र शेष मार्ग है। शास्त्रज्ञान के बिना किया गया कोई भी अनुष्ठान बालकों के निष्प्रयोजन खेल के समान है।

वर्त्तमान युग में ढेरों भगवाधारी भी शास्त्रविरुद्ध तथ्य जो मनगढंत होते हैं प्रस्तुत करते रहते हैं “जैसे ईश्वर और भक्त के बीच में किसी तीसरे का कोई काम नहीं हो सकता”, ऐसे वाक्य आप सुनते होंगे। वास्तव में ऐसा बोलने वाले यदि भगवा धारण किये हुये है तो उसे निश्चित ही कालनेमी का वंशज समझा जाना चाहिये। यह पंक्ति पूर्णतः शास्त्रविरुद्ध है और जिस व्यक्ति को शास्त्रज्ञान नहीं है वह धर्मविषयक परिचर्चा के अयोग्य है किन्तु दुर्भाग्य से आज की जनमानस दूरदर्शन, सोशल मीडिया, पत्र-पत्रिकाओं में ज्ञान ढूंढती है किन्तु यहां शास्त्रविरुद्ध तथ्य ही उपलब्ध किये जाते हैं।

यदि धर्म का ज्ञान चाहिये तो शास्त्रों का ही अध्ययन, चिंतन-मनन करना होगा उसका प्रत्यक्ष विद्वानों से अर्थ समझना होगा। हम स्वयं ही पापी हैं और पाप से मुक्ति का प्रयास हमें स्वयं करना ही होगा तभी हमारे लिये कोई मार्ग निकल सकता है। यदि हम स्वयं प्रयास नहीं करते तो सारे मार्ग अवरुद्ध हैं।

F&Q :

FAQ

प्रश्न : ब्रह्मकूर्च क्या है?

उत्तर : पञ्चगव्य और कुश जल का वह सम्मिश्रण जो आंतरिक शुद्धि करता है।

प्रश्न : कलयुग में प्रायश्चित्त क्यों संभव नहीं?

उत्तर : क्योंकि जीवनशैली पूर्णतः शास्त्र-विरुद्ध हो चुकी है।

प्रश्न : योग्य ब्राह्मण की पहचान क्या है?

उत्तर : जो जन्मना कुलीन हो, वेदज्ञ हो और तपस्वी हो।

प्रश्न : अन्यायोपार्जित धन क्या है?

उत्तर : सूद, घूस, चोरी, छल आदि से या किसी को कष्ट देकर कमाया गया धन।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

यह आलेख शास्त्रीय प्रमाणों और स्मृतियों पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार धर्म की रक्षा और आत्मकल्याण हेतु शास्त्रसम्मत दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। किसी भी प्रायश्चित्त या अनुग्रह विधान को स्वयं करने के बजाय योग्य, कुलनिष्ठ और शास्त्रज्ञ ब्राह्मण के मार्गदर्शन में ही संपन्न करें। लेखक किसी भी प्रकार के ‘स्व-घोषित’ उपचार का समर्थन नहीं करता।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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