“मिथिला के शिष्ट-विज्ञ जनों का व्यवहार ही धर्म का वास्तविक निर्णय है, अल्पज्ञ स्वेच्छाचारियों का नहीं।”
वर्त्तमान काल में श्राद्ध का स्वरूप अत्यधिक विकृत हो गया है और पूर्वाचार्यों का अनुकरण करते हुये ही पुनः संशोधन की आवश्यकता को देखते हुये “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” नाम से संशोधित अपात्रक श्राद्ध विधि संपादन में है। इस पुनीत कार्य दायित्व मुझे मिला यह मेरा सौभाग्य है। संशोधित अपात्रक एकादशाह, मासिक, सपिंडीकरण, सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट आदि सम्पादित किया जा चुका है एवं अस्थिसंचय व वृषोत्सर्ग का संपादन शेष है।
अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि मैं जो यह कह रहा हूँ कि वर्त्तमान में संशोधन का कार्य मैं कर रहा हूँ तो यहां प्रश्न उत्पन्न होगा अधिकार सिद्धि का। क्या मैं इस कार्य का अधिकारी हूँ ? यद्यपि किसी अन्य ने नहीं किया है न ही कर रहे हैं और न ही उन्हें तनिक भान है किन्तु मेरे अधिकारी होने में शंका करने का अधिकार तो होगा और इसके लिये मुझे यह सिद्ध करना होगा कि वर्त्तमान में मैं ही अधिकारी हूँ। इस विषय की सिद्धि हेतु मैंने दो प्रश्नों को स्वयं ही ग्रहण किया है जो प्रश्न सामान्य पंडितों के मन में आता होगा :
- अपात्रक श्राद्ध का आरंभ कब हुआ?
- मासिक श्राद्ध का अपकर्षण कब हुआ अर्थात द्वादशाह को ही मासिक और सपिंडीकरण श्राद्ध कबसे आरम्भ हुआ ?
अपात्रक श्राद्ध का आरंभ कब हुआ?
इन प्रश्नों का उत्तर मैंने अन्यान्य लोगों से ज्ञात करने का प्रयास किया किन्तु कुछ भी उत्तर नहीं मिला एवं अंतर्जाल पर भी ऐसा कोई उत्तर नहीं है। इसी प्रकार श्राद्ध महापात्र का कर्म है तो पुरोहित को भी दान क्यों दिया जाता है यह भी एक गंभीर प्रश्न है और इसका प्रामाणिक उत्तर पूर्व में ही प्रस्तुत किया गया है। यहां हम उपरोक्त दोनों ही प्रश्नों का ऐतिहासिक प्रमाण सिद्ध उत्तर देंगे और इन दोनों प्रश्नों का उत्तर ही वर्त्तमान में मुझे संशोधन का अधिकारी सिद्ध करेगा एवं इसकी भी सिद्धि होगी कि संशोधन किया जा सकता है।
ऐसा इस कारण से कहना पड़ रहा है कि वर्त्तमान में अधिकांश लोग स्वयं असमर्थ हैं किन्तु दूसरे समर्थ को भी ये कहकर मौन रखते हैं कि बाप-दादा जो करते आये/देशाचार/कुलाचार/महाजनो येन गतः स पन्थाः आदि। यदि आपके मन में भी ऐसा विचार हो तो सर्वप्रथम उस दुराग्रह का परित्याग करना होगा उसके लिये इस विषय को भी समझना होगा। यदि आप बाप-दादा/देशाचार/कुलाचार/महाजनो येन गतः स पन्थाः आदि विषयक दुराग्रह से युक्त हैं तो लिंक संलग्न है, इस आलेख का अवलोकन कर सकते हैं। यदि आलेख का अवलोकन करने के पश्चात् भी आपका दुराग्रह समाप्त नहीं हुआ है तो आपके लिये एक प्रश्न है और इसका उत्तर ढूंढे : यदि बाप-दादा चोरी करते आये तो क्या ?
सपात्रक और अपात्रक श्राद्ध
“पात्रता समाप्त होने पर पात्ररहित (ब्राह्मण में देव-पितृ-प्रेत का आवाहन किए बिना) जो श्राद्ध हुआ, वही अपात्रक है।”
अब आइये सर्वप्रथम अपात्रक श्राद्ध को समझते हैं अपात्रक श्राद्ध को समझने से पूर्व हमें (सपात्रक) श्राद्ध को समझना होगा। श्राद्ध का मूल तात्पर्य सपात्रक श्राद्ध ही है और इसमें पृथक से सपात्रक शब्द जोड़ने की आवश्यकता नहीं है केवल समझने की सुगमता के लिये जोड़ा गया है। सपात्रक श्राद्ध का तात्पर्य है :
प्रेत-पितृ-देव का किसी पात्र (ब्राह्मण के शरीर) में आवाहन करके उनको जल-अन्नादि वस्तुयें प्रदान करना। इसका एक अन्य भाव ऐसा भी है कि वह पात्र जिसमें प्रेत-पितर-देव के निमित्त उपभोग की वस्तुओं का संग्रह किया जा सके। महापात्र में पात्र शब्द ही है और ये पूर्वकाल में प्रेत के निमित्त पात्रत्व का निर्वहन करते थे। इसी प्रकार देव और पितर के निमित्त पात्र का कार्य पुरोहित वर्ग के ब्राह्मण किया करते थे। पुरोहित वर्ग ने अपने पात्रत्व का बहुत ही पूर्व त्याग कर दिया था जो ज्ञात नहीं, किन्तु महापात्र आगे चैदहवीं शताब्दी तक भी पात्रत्व का निर्वहन करते रहे।

अपात्रक श्राद्ध का तात्पर्य है जहां पात्र ब्राह्मण न हो अपितु पात्रत्वाभाववश ब्राह्मण के स्थान कुशाब्राह्मण का प्रयोग किया जाय जैसे वर्त्तमान काल में दान-दक्षिणा आदि के समय पुरोहित ग्रहण नहीं करते अपितु कुशा का प्रयोग किया जाता है एवं श्राद्ध में भी आसन पर कुशाब्राह्मण (दर्भबटु) का प्रयोग होता है। वर्त्तमान में किसी भी श्राद्ध में किसी महापात्र में न तो प्रेत का आवाहन किया जाता है और न ही किसी पुरोहित में देव-पितर का। अर्थात पात्र (ब्राह्मण) का अभाव रहता है, पात्ररहित श्राद्ध किया जाता है, यही अपात्रक श्राद्ध है।
पूर्वकाल में ब्राह्मण ज्ञान और तप से युक्त होते थे एवं उनमें प्रेत-पितर-देव का आवाहन किया जाता था रामायण की एक कथा आप सुनते रहे होंगे कि जब राम जी श्राद्ध कर रहे थे तो सीता को ब्राह्मणों में दशरथ महाराज दिखाई दे रहे थे। अर्थात वो ब्राह्मण योग्य पात्र होते थे और उनके शरीर में आवाहन करने पर प्रेत-देव-पितर वायु रूप से स्थित होकर अन्न-जल-अर्चनादि प्राप्त करते थे। किन्तु कालक्रम से इस पात्रता का ह्रास होता गया एवं कलयुग में समाप्त ही हो गया। और जब कलयुग में पात्रता समाप्त हो गयी तो पात्र रहित अर्थात ब्राह्मण में आवाहन किये बिना श्राद्ध किया जाने लगा आलेख का मूल प्रश्न यही है कि अपात्रक श्राद्ध का आरम्भ कब हुआ ?
कलयुग में केवल एक संशोधन ही नहीं हुआ अपितु एक दूसरा संशोधन भी हुआ और वो यह कि पूर्वकाल में वर्ष पर्यन्त षोडश श्राद्ध किया जाता था और आप सभी अवगत होंगे किन्तु वर्त्तमान में षोडश श्राद्ध एकादशाह और द्वादशाह को दो दिन में ही हो जाता है। प्रश्न यही है कि ऐसा कब से आरम्भ हुआ ? शास्त्रों में मासिक श्राद्ध के अपकर्षण का विधान है और उस विधान के अनुसार संशोधन करके विद्वानों ने ऐसा किया यह तो सभी जानते हैं किन्तु कब से प्रश्न यह है।

दोनों ही प्रश्न महत्वपूर्ण हैं मैंने अंतर्जाल पर भी बहुत ढूंढा अनेकों विद्वानों का व्हाट्सप समूह भी है एवं वहां भी सर्वत्र पूछा। मैं किसी की अवज्ञा या अपमान नहीं कर रहा किन्तु सत्य यही है कि कहीं भी मुझे उत्तर प्राप्त नहीं हुआ अपितु एक समूह में तो एक मूर्खाधिराज ने धुंधकारी की कथा का अवलोकन करने के लिये कह दिया। अब सोचिये कि कितने बड़े ज्ञानी दुनियां में ज्ञान बांटते फिर रहे हैं कि प्रश्न भी समझ नहीं आता किन्तु उत्तर दे देते हैं।
यह आलेख उस व्यक्ति तक भी पहुंचेगा तब उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी यह भी देखने का विषय है संभावना तो नहीं है कि ग्लानि हो अपितु आग-बबूला होने की ही संभावना है। मैं ऐसे सभी लोगों से भी कहना चाहता हूँ कि यदि कोई प्रश्न करता हूँ तो वह सरल नहीं होता है और शास्त्रज्ञों को भी समय की आवश्यकता होती है, मूर्खाधिराजों की शोभा मौन रहने में ही होती है।
ऐसा नहीं कि मैं तत्काल ही सभी प्रश्नों का उत्तर दे देता हूँ, अर्थात प्रश्न का उत्तर ज्ञात न होने पर मैं भी समय लेता हूँ किन्तु यथाकाल उसका प्रामाणिक उत्तर प्रस्तुत करता हूँ और जो देखना चाहे वो “संपूर्ण कर्मकांड विधि” पर ऐसे ढेरों गंभीर प्रश्नों और उनके प्रामाणिक उत्तरों का अवलोकन कर सकता है। मुझे संशोधन का अधिकारी होना सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है तथापि पुनः स्वेच्छापूर्वक मैंने दो गंभीर प्रश्नों का चयन किया जो विषय से संबंधित है एवं संशोधित श्राद्ध विधि “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” का अधिकारी सिद्ध करेगा।
मूल प्रश्न और उसके प्रामाणिक (ऐतिहासिक) उत्तर
अब आलेख के मूल प्रश्न और उसके प्रामाणिक उत्तर को जानते हैं, प्रामाणिक उत्तर का तात्पर्य यह नहीं है कि शास्त्रों में इसका प्रमाण मिलेगा क्योंकि ये तो ६ – ७ सौ वर्ष पूर्व आरम्भ हुआ तो फिर इस विषय का प्रमाण शास्त्रों में कहां से लिखा मिलेगा अर्थात नहीं मिलेगा। इसके ऐतिहासिक प्रमाण ही मिलेंगे और हम उन ऐतिहासिक प्रमाणों से ही इसका उत्तर प्राप्त करेंगे। दोनों मूल प्रश्न है :
- अपात्रक श्राद्ध का आरंभ कब हुआ?
- मासिक श्राद्ध का अपकर्षण कब हुआ अर्थात द्वादशाह को ही मासिक श्राद्ध और सपिण्डीकरण श्राद्ध कबसे आरम्भ हुआ ?
कर्मकांड के विषय में मिथिला के दो महान विभूतियों के नाम से आप अवगत होंगे – महामहोपाध्याय पंडित रुद्रधर झा श्राद्ध विवेक, वर्षकृत्य इन्हीं की कृति है वो वर्षकृत्य नहीं जो आज आप प्रयोग कर रहे हैं वो तो इसकी प्रतिलिपि है; एक दूसरा नाम है वाचस्पति मिश्र। आज श्राद्ध की किसी पद्धति (मिथिलादेशीय) का आप प्रयोग कर रहे हैं तो उसकी गंगोत्री वाचस्पति मिश्र कृत श्राद्ध पद्धति ही है। वाचस्पति मिश्र की भी अनेकों कृतियां हैं जिसे चोरों ने अपने नाम कर लिया है।

आज वाचस्पति मिश्र की पुस्तकें आपको सरलता से नहीं प्राप्त होंगी सोचिये वर्त्तमान सभी मिथिलादेशीय पद्धतियां जहां से निःसृत हुई हैं वह कितना महत्वपूर्ण होगा ? इसमें मूल कारण दो हैं एक तो यह कि वाचस्पति मिश्र की पुस्तकों में उनके नाम स्पष्टः अंकित हों अथवा न हों किन्तु ढेरों चोरों के नाम अच्छी प्रकार से अंकित हैं अर्थात चोरी की गयी है और लोगों की आपत्तियां होने के कारण भी साथ ही अन्य पद्धतियां बिकें इसके कारण भी अनुपलब्ध हैं। एक बड़ी समस्या यह भी है कि यदि आज वाचस्पति मिश्र की श्राद्ध पद्धति उपलब्ध (सुलभता से) हो जाये तो जो पद्धतियां प्रचलित हैं वो कूड़े में फेंक दिये जायेंगे।
मैंने जो ऐसा बार-बार कहा है कि श्राद्धकर्म को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया है उसमें एक मूल कारण वाचस्पति मिश्रकृत श्राद्ध पद्धति को दुर्लभ बनाकर अन्यान्य पद्धतियों को सर्वसुलभ बना देना है। सभी पंडित और पुरोहित वर्ग जानते ही रहे हैं कि किसी विशेष पंचांग की उपलब्धता श्रावण मास आरम्भ होने के पश्चात् (कुछ वर्षों में) हुई थी और ऐसे संभावना प्रत्येक वर्ष बनी ही रहती है एवं इसका कारण भी सबको ज्ञात है। वाचस्पति मिश्र कृत श्राद्ध पद्धति के विषय में भी ठीक यही हुआ। यदि वाचस्पति मिश्र कृत श्राद्ध पद्धति बाजार में उपलब्ध होती तो कोई भी विद्वान आज जो पद्धति रखते हैं नहीं रखते।
महामहोपाध्याय रुद्रधर झा चण्डेश्वर के शिष्य बताये गये हैं एवं इनका काल १४ वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध माना गया है अर्थात पंद्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भी। सामान्य रूप से कहें तो अनुमानतः १३५० – १४५० ई० के मध्य। यदि वाचस्पति मिश्र की बात करें तो १४२० – १४९० ई० उनकी पुस्तकों में अंकित है। इस प्रकार रुद्रधर जी वाचस्पति के पूर्ववर्ती थे एवं दोनों की श्राद्ध पद्धतियों में ५० – १०० वर्षों का अंतर संभव है। हम इन वर्षों के अंतर को अधिक नहीं समझने जा रहे सामान्य रूप से रुद्रधर को १४वीं शताब्दी का माने और वाचस्पति मिश्र तो पूर्णतः १५वीं शताब्दी में ही थे।

जब हम रुद्रधरीय पद्धति “श्राद्ध विवेक” का अवलोकन करते हैं तो हमें दो चार महत्वपूर्ण तथ्य ज्ञात होते हैं :
- उस काल में आद्यश्राद्ध सपात्रक होता था क्योंकि उनकी पद्धति में सपात्रक आद्यश्राद्ध विधि है।
- मासिक श्राद्ध सामान्य रूप से अपात्रक होता था ऐसा उन्होंने स्वीकार किया और अपनी पद्धति में अपात्रक मासिक श्राद्ध विधि भी दिया है, एकोद्दिष्ट आदि भी।
- सपिंडीकरण श्राद्ध में दोनों ही विधि होता था जो अवलोकन करने पर ज्ञात हो जायेगा एवं उन्होंने ऐसा कहा भी है : चार (देव-पितृ) अपात्रक विधि से एवं प्रेत सपात्रक विधि से होता था।
- श्राद्ध का अपकर्षण नहीं हुआ था ये भी रुद्रधरीय पद्धति से स्पष्ट होता है : “त्रिपक्षश्राद्धमपि कर्तव्यम् । तच्च मासिकवत्। “
इस प्रकार रुद्रधरीय श्राद्ध विवेक के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि १४वीं शताब्दी के लगभग अंत तक भी पूर्णतः अपात्रक श्राद्ध आरंभ नहीं हो पाया था आंशिक रूप से अथवा मिश्रित रूप से आरम्भ हो चुका था किन्तु मासिक श्राद्ध का अपकर्षण नहीं हुआ था।
तथ्यों की रुद्रधरीय श्राद्ध विवेक से सिद्धि
उपरोक्त तथ्यों की रुद्रधरीय श्राद्ध विवेक से सिद्धि होती है :

“प्रायेणाऽपात्रकमेव मासिकश्राद्धं कुर्वन्तीत्यत्रापात्रकप्रयोगो लिखितः ।” यह वचन सिद्ध करता है कि प्रायः मासिक श्राद्ध अपात्रक होने लगे थे इस कारण पुस्तक में अपात्रक मासिक श्राद्ध विधि दी गयी। आगे यह भी कहा गया है कि यदि सपात्रक करना चाहे तो आद्यश्राद्ध का अनुसरण करते हुये कुछ विशिष्ट निर्देशों का अनुपालन करे अर्थात सपात्रक श्राद्ध भी प्रचलन में था, लुप्त नहीं हुआ था। “त्रिपक्षश्राद्धमपि कर्तव्यम् । तच्च मासिकवत्। ” से यह भी सिद्ध होता है कि मासिक श्राद्ध यथाकाल किये जाते थे अर्थात अपकर्षण नहीं हुआ था।
आगे पुनः सपिण्डन प्रयोग के आरम्भ में ही कहते हैं : “अथ सपिण्डनश्राद्धप्रयोगः। तत्रचाधुनिकाः प्रेतश्राद्धातिरिक्तश्राद्ध चतुष्टयमपात्रक्रमेव कुर्वन्तीति तथैव लिख्यते ।” प्रेत श्राद्ध के अतिरिक्त अन्य श्राद्धचतुष्टय अपात्रक क्रम से किया जाता है और वही विधि लिखी जा रही है अर्थात यह सिद्ध होता है कि सपात्रक और अपात्रक दोनों ही विधियां प्रचलित थी, सपात्रक का समापन भी नहीं हुआ था और पूर्णरूपेण अपात्रक विधि भी प्रचलित नहीं हुई थी।
आगे पुनः सपिण्डन प्रयोग में ही कहते हैं : “यद्यविघ्नेन रजनी यास्यति तदा सर्वमेतत्करिष्यामीति तत्प्रतिवचनम् । ततोऽग्रिमदिने प्रातः श्वेतवस्त्रयुग्मेन स्नात्वा मध्यन्दिने पुनः स्नात्त्वा कृतनित्यक्रियः श्राद्धकर्ता श्राद्ध निषिद्धेतरवेलायां भूमौ कृतपाकस्थाने तिलान्विकीर्य परितश्छागान्बन्धयित्वा सपिण्डद्वारा नूतन भाण्डैः स्वयं वा पाकमारभेत ।” यहां कह रहे हैं कि पूर्वदिन ब्राह्मण को निमंत्रण देते समय यह कहे कि यदि रात्रि निर्विघ्न समाप्त होगी तो अगले दिन सपिंडीकरण श्राद्ध करूंगा।

अगले दिन श्राद्ध निषिद्ध वेला का त्याग करके मध्यदिन (मध्याह्न में) पुनः स्नान करके पाकस्थान पर तिलादि विकरित करके पाकारम्भ करे। मध्याह्न वेला में स्नान करके करे से सिद्ध होता है कि द्वादशाह से भिन्न किसी (विहित) दिन संवत्सरांत तक सपिण्डी किया जाता था, अर्थात अपकर्षण नहीं हुआ था।
यहां “श्राद्ध निषिद्ध वेला का त्याग करके मध्यदिन” पर एक बार पुनः ध्यानाकर्षण करना चाहता हूँ, उक्त काल में उचित काल की मर्यादा का भी पालन किया जाता था और मैं भी “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” में काल मर्यादा के पालन की बात कर रहा हूँ। यदि कालमर्यादा का पालन किया जाये तो द्वादशाह को एक-एक करके मासिक श्राद्ध करना संभव ही नहीं है क्योंकि आगे पुनः सपिंडीकरण भी सुनिश्चित है।
अब महामहोपाध्यायसन्मिश्रवाचस्पति कृत श्राद्ध विधि की बात करें जिनका काल १५वीं शताब्दी (१४२० – १४९० ई०) है ने पूर्णतः अपात्रक श्राद्ध विधि प्रदान किया है। प्रेत श्राद्ध की दक्षिणा भी “यथानामगोत्राय” से दिया है जिसका परवर्ती पद्धतिकारों ने पालन नहीं किया और वर्त्तमान में विकृति आ गयी है। वाचस्पति मिश्र ने भूस्वामी भाग संकल्प के उपरांत ही उत्सर्ग करने का निर्देश दिया था जिसका परवर्ती पद्धतिकालों ने पालन नहीं किया और न ही खंडन करके भोजनपूर्व सिद्ध किया।
वाचस्पति मिश्र सपिंडीकरण के अंत में लिखते हैं “सपिण्डीकरणन्तु साग्निनाऽव्यवहितदर्शे कर्त्तव्यम् । तेन तद्दिन एव मासिकानि विधाय दर्शस्य मध्याह्ने सपिण्डीकरणं कृत्वा अपराह्ने पिण्डपितृयज्ञः करणीय इति ।” इस वचन से यह सिद्ध होता है कि उनके काल में अग्निहोत्री भी विद्यमान थे और पूर्व में निराग्निकों के श्राद्ध का अपकर्षण पूर्वक विधान करके साग्निकों के लिये भी मासिकश्राद्ध और सपिंडीकरण का भी अव्यवहित दर्श (अमावास्या) अपकर्षण का विधान किया। साग्निकों हेतु उस अव्यवहित दर्श (अमावास्या) को एक ही दिन में मासिकानि (तंत्र से एक बार में मासिक श्राद्ध) करके सपिंडीकरण अपराह्न में पितृयज्ञ (अग्निहोत्रियों के अनुसार) करने का विधान किया।

यहां मैंने अनधिकारियों से महामहोपाध्यायसन्मिश्रवाचस्पति कृत श्राद्ध विधि का मूल नाम छिपाया है यह भी स्पष्ट कर रहा हूँ। अधिकारी हेतु पुस्तक का वास्तविक नाम उपलब्धि का मार्ग भी बता सकता हूँ। इसको अब यथावत समझना कठिन है कि मासिक और सपिण्डी को ही पिण्डपितृयज्ञ कहा गया अथवा कोई भिन्न कर्म था। किन्तु काल की मर्यादा का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। यदि मध्याह्न में ही सपिंडीकरण कहा गया है तो उससे पूर्व किस प्रकार तंत्र से सभी मासिक श्राद्ध किया जा सकता है केवल तंत्र से।
यही सिद्धांत तो मैं दे रहा हूँ कि अभी जो सबके-सब पृथक-पृथक मासिक श्राद्ध करके सपिण्डिकरण करते हो वो कालमर्यादा का स्पष्ट उल्लंघन है क्योंकि पूर्वाह्ण से रात्रि पर्यन्त करते हो जबकि श्राद्ध का काल मध्याह्न से अपराह्न पर्यन्त है। रुद्रधरीय में भी निषिद्धवेला का त्याग करने के लिये स्पष्टरूप से कहा गया है।
अब बाप-दादा चिल्लाने वालों से प्रश्न करना चाहता हूँ क्या रुद्रधर-वाचस्पति बाप-दादा नहीं थे, अरे दादा दे दादा के दादा के दादा के भी दादा थे या उससे भी ऊपर थे, मध्यवर्तियों ने उस वृक्ष की शाखा-प्रशाखाओं को छिन्न-भिन्न कर दिया जिस वृक्ष को रुद्रधर कर वाचस्पति ने सींचकर पुनः हरा-भरा किया था।
आज ६०० वर्षों बाद उसी वृक्ष की जिसकी शाखायें मध्यवर्तियों ने छिन्न-भिन्न कर दिया मैं पुनः सींचकर हरा-भरा करना चाहता हूँ और तुम चोर-उचक्कों को बाप-दादा कहकर गौरवान्वित होना चाहते हो। अरे त्रुटियां सबसे होती है और बाप-दादा से भी होती ही रही हैं, बाप-दादा की त्रुटियों को ग्रहण नहीं करना चाहिये अपितु उसे सीख समझनी चाहिये।
मैं उन त्रुटियों का मार्जन कर रहा हूँ जो मध्यवर्तियों में ६ शताब्दियों में मुख्य रूप से पिछली शताब्दी में किया था। ये तुम्हारे भी बाप-दादा थे और मेरे भी हैं, तुम इनकी त्रुटियों को समझ भी नहीं पा रहे हो और मैं उन त्रुटियों को भलीभांति समझकर उसका सम्मार्जन करना चाहता हूँ।
आज की पद्धतियों में “अमुक गोत्राय अमुक शर्मणे ब्राह्मणाय” कहां से आ गया जबकि ६०० वर्ष पूर्व ही समाप्त हो गया था। यदि “अमुक गोत्राय अमुक शर्मणे ब्राह्मणाय” करके प्रेतश्राद्ध की दक्षिणा कर रहे हो तो ये अपात्रक कैसे है ? और यदि सपात्रक कर रहे हो तो इसके अतिरिक्त और कुछ क्यों नहीं करते ? ये विकृति कहाँ से आई सीधी बात है मध्यवर्तियों ने उत्पन्न किया। जैसे ६०० वर्ष पूर्व वाचस्पति ने श्राद्धकर्म को संशोधित किया था वैसे आज भी यदि विकृति है तो संशोधित किया जाना चाहिये और उन्हीं का अनुकरण करते हुये अर्थात बाप-दादा का ही अनुकरण करते हुये मैं अगले चरण में पुनः संशोधित कर रहा हूँ।

हमारा प्रश्न था : अपात्रक श्राद्ध कब आरम्भ हुआ ?
उत्तर है : १४वीं शताब्दि में (रुद्रधरीय से) आरम्भ तो हुआ किन्तु आंशिकरूपेण, मिश्रित था जिसे १५वीं शताब्दि में वाचस्पति ने पूर्णरूपेण स्थापित किया।
दूसरा प्रश्न था : मासिक श्राद्ध का अपकर्षण कब हुआ ?
इसका उत्तर है : रुद्रधरीय से १४वीं शताब्दि में वर्षपर्यंत श्राद्ध की प्राचीन विधि सिद्ध होती है अर्थात अपकर्षण नहीं हुआ था, वाचस्पतीय से यह सिद्ध होता है कि १५वीं शताब्दि में मासिक श्राद्ध का अपकर्षण हो गया था क्योंकि उनका कालखंड १५वीं शताब्दि ही है।
अब मूर्खाचार्यों से पूछना चाहूंगा कुछ पल्ले पड़ा क्या ? अरे नहीं पड़ेगा “भैंस के आगे बीन बजाओ भैंस रही पगुराय” कैसे पड़ेगा, बस पांडित्य का दम्भ भरते हो, अगला प्रश्न करूँ ? अरे यदि विश्वविद्यालय में गंभीरता से कर्मकांड पढ़ाया जाय तो यह आलेख आचार्य-महामहोपाध्याय करने वालों को पढ़ाया जायेगा और उन्हीं की समझ में आयेगा।
जब यह बात आ ही गयी है तो यहां मैं यह भी विश्वविद्यालयों के प्रति स्पष्ट करना आवश्यक समझता हूँ कि मेरी अनुमति के बिना इस विषय को नहीं लिया जा सकता क्योंकि ये मेरी कॉपीराइट (बौद्धिक संपदा) के अधीन है एवं अनुमति भी शास्त्री तक के लिये नहीं दी जायेगी, आचार्य के लिये ही दी जायेगी।
“अंधानुकरण करने वालों से प्रतिप्रश्न है: यदि बाप-दादा चोरी करते आए हों, तो आगे क्या?”
अप्रिय सत्यं न ब्रूयात् : एक सामान्य नियम है जिसका पालन करना लाभकारी होता इसको सदाचार ही माना गया है और नीतिवचन/सुभाषित रूप में प्राप्त होता है किन्तु वास्तव में शास्त्र की ही आज्ञा है अर्थात शास्त्र का वचन ही है। विष्णुपुराण, गरुडपुराण, स्कंदपुराण, विष्णुधर्मोत्तर आदि अनेकों पुराणों में मिलता है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र का मात्र प्रचारित इस लिये किया गया कि धर्मनिरपेक्षता सिद्ध करना है और इसका आश्रय लेकर असत्यप्रेम जागृत करना था।
ये सामान्य जीवनचर्या का सामान्य नियम है इसमें प्रिय-असत्य बोलने की आज्ञा भी नहीं दी गयी है मात्र अप्रिय-सत्य न बोलना कहा गया है। इस शोधपत्र में यदि सत्य का आश्रय ग्रहण न किया जाता तो यहां दोष उत्पन्न होता, क्योंकि ये सर्वत्र और सर्वकालिक नियम नहीं है। परिस्थिति विशेष का भिन्न नियम भी है “सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः। अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः॥” – वाल्मीकि रामायण वक्ता और श्रोता हेतु यह विशेष नियम ही श्रेयस्कर है। इस विशेष नियम का यदि वक्ता-श्रोता पालन न करे तो दोष उत्पन्न होता है, हानि होती है।
विद्या ददाति विनयं : यह भी एक सामान्य नियम है जिसमें विनम्रता को ही विद्वान का लक्षण कहा गया है। अर्थात मेरे आलेखों में जिन कटुशब्दों का प्रयोग किया जाता है वो अविद्वत्ता सिद्ध करने वाला है और जब सारे मार्ग अवरुद्ध हो जायेंगे तो मेरे विरोध का यही एक मार्ग शेष बचेगा। किन्तु यह भी सामान्य नियम ही है “विनय न मानत जलधि जड़” सर्वत्र और सबके लिये विनय ही प्रदर्शित नहीं किया जा सकता।
आज की परिस्थति में जड़ ही भरे-परे हैं कुछ भी शास्त्रसम्मत कहने पर सीधे बाप-दादा चिल्लाने लगते हैं, उद्देश्य शास्त्र का त्याग करना ही होता है अर्थात बाप-दादा कहकर शास्त्राज्ञा का उल्लंघन करना उचित है ऐसा सिद्ध करते हैं। किन्तु प्रतिप्रश्न “बाप-दादा यदि चोर हों तो आगे क्या” इसका उत्तर तो नहीं दे सकते।
ऐसे लोगों के प्रति विनय का प्रदर्शन करना निरर्थक है और मैं चतुर्दिक देखता हूँ ९९ प्रतिशत ऐसे ही हैं जो एक ओर जहां शास्त्रविधान की बात आये तो “बाप-दादा” चिल्लाते हैं और जहां स्वेच्छाचार की बात आये वहां बाप-दादा का परित्याग कर देते हैं, बाप-दादा बिना भोग लगाए भोजन नहीं करते थे, बाप-दादा धोती ही पहनते थे, बाप-दादा आहार शुद्धि का पालन करते थे, बाप-दादा शिखा-तिलक आदि धारण करते थे और भी ढेरों बातें हैं जहां कभी बाप-दादा नहीं याद आते केवल धर्म के नाम पर शास्त्रविरुद्ध स्वेच्छाचार करने के लिये बाप-दादा याद आते हैं। ऐसे लोगों के प्रति विनय का प्रदर्शन औचित्यहीन है, अनधिकारी हैं।
मेरा कटुवचन स्वेच्छाचारियों के प्रति है जो रात-दिन स्वेच्छाचार करते रहते हैं, कर्मकांड जाने-सीखे बिना पाण्डित्य का दम्भ पालते हैं, विद्वानों के प्रति नहीं। विद्वानों से विनम्रतापूर्वक सुझाव-प्रामाणिक खंडन की मांग ही की जाती है और ऐसे कटुशब्दों को विद्वान स्वयं के प्रति ग्रहण न करें। ये उन स्वेच्छाचारियों के लिये है यदि विधिपूर्वक हवन करने की चुनौती दी जाय तो एक भी आगे न आयेगा।
पार्थिवपूजन, रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जप आदि में भी जो बिना सोचे-समझे वेदियों की भरमार कर देते हैं। मातृका वेदी, वास्तुमंडल का क्या प्रयोजन है इससे आगे की तो कहने की आवश्यकता ही नहीं। जो ऐसा करते हैं वो मातृका वेदी, वास्तु मंडल का सर्वत्र प्रयोजन स्थापित करके दिखायें। ऐसा करने वाले दुत्कारने योग्य ही हैं।
अंत में शोध के विषय में कहना चाहूंगा कि किसी भी काल में उपस्थित सभी विद्वद्जन एक ही कार्य नहीं करते अपितु यह सौभाग्य कुछ कृपाप्राप्त को ही मिलता है। कृपाप्राप्त को ही दायित्व प्रदान किया जाता है और वर्त्तमान काल में यह दायित्व मैंने (मिथिला हेतु) ग्रहण किया है, मैथिलेत्तरों हेतु तो मिथिला के शिष्टविद्वद्जनों का व्यवहार ही निर्णय कहा गया है। अस्तु हमने श्राद्धकर्म को संशोधित करने का दायित्व ग्रहण किया। नीचे लिंक संलग्न है :
निष्कर्ष

इस शोधपरक भूमिका का मूल निष्कर्ष यह है कि कर्मकांड कोई जड़ परंपरा नहीं है, अपितु यह कालानुकूल आवश्यकतानुसार शास्त्रीय मर्यादाओं का पालन करते हुये परिष्कृत होने वाला शास्त्रीय विज्ञान है। महामहोपाध्याय रुद्रधर झा (१४वीं शताब्दी) की कृति ‘श्राद्ध विवेक’ और महामहोपाध्याय वाचस्पति मिश्र (१५वीं शताब्दी) की श्राद्ध पद्धति के ऐतिहासिक साक्ष्य यह अकाट्य रूप से सिद्ध करते हैं कि कलयुग में पात्रता के ह्रास के कारण ही आंशिक से पूर्ण ‘अपात्रक श्राद्ध’ और काल-मर्यादा की रक्षा हेतु ‘मासिक श्राद्धों के अपकर्षण’ की परंपरा का उदय हुआ।
वर्तमान काल में ६०० वर्षों के मध्यवर्ती कालखंड में जो तात्विक विसंगतियाँ/विकृतियां उत्पन्न हो गई हैं, उनका परिष्करण करना “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” के माध्यम से लेखक का शास्त्रीय उत्तरदायित्व है जिसका निर्वहन भी किया जा रहा है। यह परिष्करण शास्त्रीय दृष्टिकोण और परम्परा दोनों ही प्रकार से उचित सिद्ध होता है। क्योंकि यदि ६०० वर्षपूर्व संशोधन हुआ तो वर्त्तमान में भी किया जा सकता एवं भविष्य में भी होगा।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: इस आलेख में और “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” संबंधित सभी आलेखों में प्रयुक्त तीखे शब्द (जैसे मूर्खाधिराज, शास्त्रदस्यु, स्वेच्छाचारी आदि) किसी व्यक्ति विशेष के प्रति व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित नहीं हैं, बल्कि महाभारत के शांतिपर्व की मर्यादा के अनुसार शास्त्रों की अवहेलना करने वाली प्रवृत्तियों के प्रति एक ‘तिक्त ओषधि’ (कड़वी दवा) हैं। इस शोध पत्र का ऐतिहासिक और शास्त्रीय विश्लेषण लेखक की मौलिक बौद्धिक संपदा (कॉपीराइट) है; बिना अनुमति इसके व्यावसायिक या शैक्षणिक उपयोग पर वैधानिक प्रतिबंध है।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।