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बाप दादा जो करते आये वो गलत थे क्या ?

बाप दादा जो करते आये वो गलत थे क्या ? बाप दादा जो करते आये वो गलत थे क्या ?

“ब्राह्मण का तेज उसके शास्त्र ज्ञान में है, न कि उसकी सामाजिक ‘पूछ’ में।”

यदि आप “संपूर्ण कर्मकाण्ड विधि” के आलेखों का अवलोकन करते हैं तो आप इस तथ्य को समझते होंगे कि यहां कर्मकांड का ज्ञान देने के साथ-साथ व्यावहारिक समस्या पर भी ध्यानाकर्षण किया जाता है और उसके समाधान का भी प्रयास किया जाता है। इसी कड़ी में एक बड़ा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि “बाप दादा जो करते आये वो गलत थे क्या ?” इस आलेख में हम इस पंक्ति के उत्पन्न होने की परिस्थिति को भी समझेंगे और इसका उत्तर भी समझेंगे। यदि आपको भी ऐसा सुनने को मिले तो आपको क्या उत्तर देना चाहिये यह भी स्पष्ट किया जायेगा।

बाप दादा जो करते आये वो गलत थे क्या ?

“अपण्डितों को प्रतिष्ठा देने का तात्पर्य होता है शास्त्र को अप्रतिष्ठित करना”

सर्वप्रथम विचारणीय तथ्य जो है वो यह है कि अपण्डितों को प्रतिष्ठा नहीं पचती और वो शास्त्र को ही अप्रतिष्ठित करने लगते हैं और अपण्डितों को प्रतिष्ठा देने वाला भी शास्त्र की अप्रतिष्ठा (अपमान) करने का दोषी माना जायेगा इसलिये यदि आप यजमान पक्ष हैं तो भी यह आपके लिये महत्वपूर्ण हो जाता है कि अपण्डितों को प्रतिष्ठा न दें। क्योंकि जब आप अपण्डितों को प्रतिष्ठा देते हैं तो वो उसके लिये विष के समान हो जाता है।

ऐसी एक घटना अथवा दुर्घटना भी कह सकते हैं हमारे साथ ही घटित हुई और वो भी पूर्व आलेख के इस विषय को लेकर कि एक बार में ही १४/१५ मासिकश्राद्ध होने चाहिये। यदि इस विषय को समझना चाहते हैं तो उस आलेख का अवलोकन कर सकते हैं : “एक-एक करके नहीं एक बार में तंत्र से ही १४/१५ मासिक श्राद्ध होना चाहिए”

इस आलेख में भली-भांति प्रमाणों सहित यह स्पष्ट किया गया है कि क्यों एक बार में ही मासिक श्राद्ध होने चाहिये और पृथक-पृथक करना ही गलत कैसे है ?

अपण्डित सदैव अपनी उस प्रतिष्ठा की रक्षा हेतु शास्त्र की प्रतिष्ठा को भी समाप्त करने से नहीं चूकते और भांति-भांति के कुतर्क भी रचते हैं। अपण्डितों के मुख से एक और पंक्ति आपको सुनने को मिलती रहती है “जो कह दिया सो कह दिया” अर्थात एक बार जो कह दिया वो शास्त्र विरुद्ध सिद्ध भी हो जाये तो भी नहीं पलटूंगा अर्थात उसी पक्ष में खड़ा रहूंगा भले ही वो गलत क्यों न हो।

जब अपण्डितों को प्रतिष्ठा मिलती है वो सम्मानित हो जाते हैं तो प्रतिष्ठा के अनधिकारी होने के कारण वो उसके संरक्षण हेतु ही व्यग्र रहते हैं। उन्हें यह भी ज्ञात नहीं होता कि शास्त्र के कारण ही वो मूर्ख होते हुये भी प्रतिष्ठिा प्राप्त कर लेते हैं और वही अपनी प्रतिष्ठा को शास्त्र की प्रतिष्ठा से भी ऊपर समझते हैं।

कई बार ऐसा भी कहते मिलते हैं कि पंडित वही है जो अपनी और दूसरों की प्रतिष्ठा बचाकर निकले, किन्तु यह पंक्ति अधूरी है इसमें प्रछन्न भाव यह ही है कि धर्म-शास्त्र की प्रतिष्ठा को दाव पर लगाकर भी पंडित को अपनी प्रतिष्ठा का ही संरक्षण करना चाहिये और यही त्रुटि है एवं नारकीय प्राणी तो बनाता ही है साथ ही शास्त्र अपनी प्रतिष्ठा की चिंता नहीं करता अपितु शास्त्र से ही ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा होती है एवं शास्त्र को अप्रतिष्ठित करके अपनी प्रतिष्ठा लाभ लेने वाला पंडित होगा ऐसी सोच रखना पंडित शब्द पर भी प्रहार है, व उसकी प्रतिष्ठा बची नहीं रह सकती, अपितु मरणतुल्य कष्टकारी होती है।

इस कारण यदि आपको शास्त्रज्ञान न होने के पर भी यदि प्रतिष्ठा प्राप्त हो गयी हो तो आपको शास्त्रों का अध्ययन बढ़ा देनी चाहिये, स्वाध्याय पूर्वक ही सही ज्ञानवर्द्धन करना अनिवार्य है अन्यथा नरक अवश्यम्भावी है एवं जीवन में भी नारकीय कष्ट भोगने होंगे।

“प्रतिष्ठा विष के समान है यदि वह शास्त्र ज्ञान के बिना प्राप्त हुई हो।”

घटना अथवा दुर्घटना

“पंडित वह नहीं जो अपनी बात मनवा ले, पंडित वह है जिसकी बात शास्त्र मान ले अर्थात शास्त्रोचित हो।”

आगे बढ़ने से पूर्व उस घटना कहें अथवा दुर्घटना जो मेरे साथ ही घटित हुई उसकी चर्चा अपेक्षित है किन्तु इसमें उस गांव, व्यक्ति आदि को प्रकट नहीं किया जायेगा। घटना संपन्न ब्राह्मणों के गांव की ही है जहां सरस्वती का भी वास प्रतीत होता था अर्थात मुझे यह भ्रम था कि उस गांव में आज भी सामान्य रूप से अधिक विद्वान ब्राह्मण हैं। विद्वान पंडित के रूप में प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा ही एक श्राद्ध कराने का आमंत्रण मिला जिसे हमने स्वीकार किया। एकादशाह को कोई समस्या थी ही नहीं।

द्वादशाह के दिन आमंत्रित करने वाले विद्वान किसी कार्यवश गांव से बाहर चले गये। श्राद्ध में उपस्थित महापात्र भी स्वयं श्राद्ध करा सकता है ऐसा दम्भ रखने वाला था जिसे बाद में यजमान और अन्य उपस्थित लोगों ने भी यह समझा दिया कि आपको श्राद्ध कराना नहीं आता है और आपको नहीं कराना चाहिये क्योंकि विवाद के कारण हमने वहां श्राद्ध कराया ही नहीं और महापात्र के दम्भ में लोग उस समय आ गए।

करने वाले व्यक्ति का कोई दोष नहीं था ऐसा तो नहीं कह सकते क्योंकि एक सामान्य नियम भी है कि जिसे आमंत्रित किया गया है वही जैसे करायें वैसे किया जायेगा, उन्हीं की बात अंतिम मानी जायेगी। यदि इस सामान्य नियम को समाप्त कर दिया जाय तो सर्वत्र सभी कर्मकांड में विघ्न ही होते रहेंगे और कोई निष्कर्ष ही नहीं निकल सकेगा, विवाद बड़ा होगा किन्तु समाधान नहीं होगा। अंतिम समाधान भी यही है कि जो कोई भी कोई कर्मकांड/अनुष्ठान आदि कराने आया है उसी की बात मान्य होगी और यही रहना चाहिये।

एवं मैं ऐसा ही दूसरे के प्रति करता हूँ, भले ही कराने वाला त्रुटिपूर्ण बोल दे जिसका शास्त्र से खण्डन करता हूँ और वो स्वीकार भी करते हैं किन्तु यह विघ्न रूप में नहीं करता हूँ, जिस समय कर्मकांडी निर्णय दे देते हैं उस समय मेरा कथन होता है कि जो निर्णय कर्मकांडी ब्राह्मण का है वही अंतिम है और उसी में कर्म की सिद्धि होगी। यही शास्त्रसम्मत मार्ग है क्योंकि यदि उपस्थित कर्मकाण्डी ब्राह्मण को ही कर्मकाण्ड के मध्य में अल्पज्ञ, गलत सिद्ध कर दें तो यजमान का कर्म ही असिद्ध हो जायेगा।

कोई भी कर्म करें उसमें ढेरों त्रुटियों सबसे होती ही है और अंत में उन त्रुटियों के लिये क्षमाप्रार्थना आदि भी किया जाता है, कर्म की पूर्णता के लिये भगवान विष्णु का स्मरण भी किया जाता है और जिस कर्म में ब्राह्मण उपस्थित हों उनके वचन की आवश्यकता भी होती है कि सम्पूर्ण हुआ। ये वचन स्थानीय शब्दों में भिन्न-भिन्न प्रकार से बोले जाते हैं, जैसे यजमान ने पूछा “हो गया” तो ब्राह्मण ने कहा “हाँ हो गया” अथवा बिना पूछे भी बोले “पूजा हो गई” आदि। अर्थात अल्पज्ञ से अल्पज्ञ ब्राह्मण को भी जिस कर्म में आमंत्रित किया गया है उस कर्म की पूर्णता उसीके अधिकार क्षेत्र में आती है।

इस नियम का भंग एक अवस्था में हो जायेगा जब अतिक्रमण हुआ हो शास्त्रों में अतिक्रमण करना स्वयं ही दोषपूर्ण है। अर्थात यदि निकटतम विद्वान ब्राह्मण की किसी ईर्ष्या आदि भाव से अवज्ञा करके दूरस्थ अल्पज्ञ को आमंत्रित किया जाता है तो यह अतिक्रमण दोष है।

ऐसी अवस्था में कर्म कराने पर भी दोषपूर्ण ही रहता है एवं विद्वान ब्राह्मण का अधिकार शेष रहता ही है कि वो उचित को उचित और अनुचित को अनुचित कहें, दोष हुआ तो दोष को दोष कहें एवं उनका ऐसा निर्णय ही मान्य होगा, उस मूर्ख का नहीं जो अतिक्रमण पूर्वक आमंत्रित किया गया। इस कारण इस विषय का भी लोगों को गंभीरता से ध्यान रखना चाहिये कि हम यदि किसी दूरस्थ ब्राह्मण को आमंत्रित करें तो उनसे निकट और उससे अधिक विद्वान ब्राह्मण नहीं होने चाहिये यह अनिवार्य शर्त है।

इस अतिक्रमण/व्यतिक्रम दोष के अभाव में जो आमंत्रित ब्राह्मण हैं कर्म की पूर्णता उन्हीं के अधीन होती है, सारा निर्णय उन्हीं का मान्य होता है। एवं यदि किसी पक्ष में ब्राह्मण व यजमान का ही मतभेद हो जाये तो यजमान ब्राह्मण की बात मानने हेतु बाध्य होता है अन्यथा कर्म की सिद्धि संभव नहीं हो सकती। यदि यजमान ने ब्राह्मण की एक आज्ञा का भी उल्लंघन कर दिया, एक निर्णय को भी अस्वीकार कर दिया तो वहीं पर वह कर्म निष्फल/निरर्थक हो जाता है।

दुर्घटना यह है कि एक बार में १५ मासिक करने की व्यवस्था संपन्न हुई, किन्तु उसी समय एक मूर्खाधिराज उपस्थित हुआ अथवा किसी अन्य प्रेतकंटक ने जो स्वयं विघ्न का दोषी बनना नहीं चाहा उसे बुलावा लिया। बाद में अन्य सभी लोगों ने उसके बारे में मूर्खाधिराज होना ही बताया, पापी होना ही कहा। उस मूर्खाधिराज ने अपनी मूर्खता का परिचय दिया और विरोध किया जबकि ग्रन्थ और शास्त्र के नाम पर वो पंचांग मात्र की बात कर रहा था कि पंचांग में ऐसा कहां लिखा है। अब आप लोग भी यह समझ सकते हैं कि वो मूर्खाधिराज था अथवा नहीं।

समस्या समाज की भी थी उसी क्षण उस मूर्खाधिराज को भागना आवश्यक था एक एक ही पंक्ति शेष बचती है “जो आमंत्रित हैं उन्हीं का निर्णय मान्य होगा और उसमें भी तब जब शास्त्र के प्रमाणों से सिद्ध करने वाले हैं”, किन्तु अपण्डितों का लक्षण प्रकट किया गया कि ऐसा मूर्खाधिराज हमारा नेतृत्व करता है अर्थात हम सब इसके समर्थन में भी हैं।

मात्र एक व्यक्ति था जो (पण्डित के रूप में नहीं जाना जाता है) कह रहा था कि उचित-अनुचित का निर्णय कर लीजिये और समाज के उन लोगों को बुलाया कि यदि ये शास्त्रसिद्धि हेतु तैयार है तो शास्त्र के अनुसार जो उचित हों वो कीजिये। शेष जो पंडित के रूप में जाने जाते हैं आने के बाद कुछ देखने के लिये ही तैयार नहीं हुये अर्थात अपण्डितों को मिली प्रतिष्ठा अपच होती है वो शास्त्र की प्रतिष्ठा का भी हनन करने से पीछे नहीं हटते।

किन्तु किसी भी प्रकार जब यह स्पष्ट हो गया है पृथक-पृथक करना ही गलत है और एक साथ तंत्र से ही होना चाहिये तब अनेकानेक कुतर्क आने लगे जिसमें से दो बड़े बिंदु हैं :

  • आज तक बाप-दादा जो करते आये वो गलत थे क्या ?
  • यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धं, नाचरणीयं नाचरणीयं

मूर्खों इन पंक्तियों को रामबाण समझने की भी एक और मूर्खता करते हैं। इसे हम आगे समझेंगे और यह पंक्ति उसने भी कहा जो उचित करने की बात कर रहा था, शेष जो आये वो किस्सों के माध्यम से ऐसा प्रयास कर रहे थे कि उचित हो अथवा अनुचित जो कहा जा रहा है आप वो करा दीजिये स्पष्ट हो गया कि अपण्डित थे, यदि यजमान भाई-बहन का विवाह कराने के लिये कहे तो क्या कर्मकांडी वो भी करा दे ? यजमान कराने के लिये ही किसी भी ब्राह्मण को बुलाता है और ब्राह्मण द्वारा जो कहा जायेगा यजमान को वही करना होगा।

इसका तात्पर्य मूर्खों द्वारा कहा नहीं समझा जाना चाहिये ब्राह्मण का तात्पर्य ही विद्वान हों, शास्त्र के दृष्टिकोण से उचित बोलते हों, वो ब्राह्मण होता है। भाई-बहन के विवाह न कराने का भी एक किस्सा उसी में से एक व्यक्ति ने सुनाया भी कि मैंने नहीं कराया। अर्थात ब्राह्मण स्वविवेक, शास्त्रोचित ही करायेगा, कहेगा यह भी कह रहा था और मेरे ऊपर दबाव भी बना रहा था कि आपको हम सब जिस प्रकार कह रहे हैं अर्थात एक-एक करके करायें, मेरे निर्णय को आप स्वीकारें, आपके निर्णय को मैं नहीं स्वीकार करता हूँ।

आमन्त्रक से भी मोबाईल पर बात हुई और वो भी इसी पक्ष में रहे कि जो अन्य लोग कह रहे हैं वही कराकर अपनी प्रतिष्ठा का संरक्षण करते हुये निकल जाना पंडिताई है। प्रमाण को स्वीकारने से वो भी पीछे हट गये और कुतर्क पर आ गए एवं अनुचित प्रमाण का भी आधार लिया “पूर्वाह्णे मातृकं श्राद्धमपराह्ने तु पैतृकं” एक पंक्ति बोले और इस पर मैं भी भ्रमित हुआ यह मेरे स्मरण में नहीं आया और मैंने इसे नान्दीमुख श्राद्ध से सम्बंधित कहा; जो कि मेरी त्रुटि थी यहां मातृकं से विद्वानों ने अन्वष्टका को ग्रहण किया है और यह बाद में स्मरण हुआ एवं उन्होंने मातृकं श्राद्ध को माता-चाची आदि का श्राद्ध बताया जो मैंने अस्वीकार कर दिया।

तो उन्होंने पूछा कि फिर द्वादशाह का कहीं वर्णन है क्या इस पर मैंने कहा कि द्वादशाह करके ढूंढने पर नहीं मिलेगा किन्तु द्वादशाह में कौन सा श्राद्ध करते हैं उसे ढूंढेंगे तो मिलेगा। द्वादशाह में मासिक श्राद्ध करते हैं जो एकोद्दिष्ट है एवं एकोद्दिष्ट विधान से होगा व सपिण्डी करण पार्वण विधान से, यद्यपि सपिंडीकरण का पृथकविधान भी है अर्थात पार्वण विधान होगा किन्तु जो अन्य पृथक बातें सपिण्डीकरण विषयक हैं उनका भी पालन होगा।

एवं यह भी उसी श्लोक में है जिसकी एक पंक्ति बोली गयी “एकोद्दिष्टं तु मध्याह्ने प्रातर्वृद्धिनिमित्तकं”; इस प्रकार मासिक श्राद्ध एकोद्दिष्ट है और एकोद्दिष्ट मध्याह्न में ही होगा, विलंब होना भिन्न विषय है किन्तु जानबूझकर कालातिक्रमण नहीं हो सकता। इसी प्रकार पैतृकं हेतु अपराह्न है और सपिण्डीकरण पैतृक श्राद्ध है एवं अपराह्न तक की ही आज्ञा है, सायाह्न का निषेध है।

किन्तु बात वहीं पर रही कि जो कहा जा रहा है वो करा दीजिये। मेरा अंतिम निष्कर्ष था कि मैं स्वविवेक से शास्त्राज्ञा का पालन करते हुये कराऊंगा, अन्यथा नहीं कराऊंगा। अंत में महापात्र ने ही कराया और मैंने नहीं कराया। महापात्र तो कराने के लिये व्यग्र था ही सो उसने तबतक आरम्भ कर दिया था। सबने यह जानते हुये भी कि महापात्र को श्राद्ध कराना नहीं आता है उससे कराया।

बाद में ऐसे भी पंडित आये जो मेरे प्रति आस्था रखने वाले थे, परिचय पूर्व ही उनलोगों ने त्रुटिपूर्ण सिद्ध किया एवं मेरे अपमान में जो दो मुख्य सहयोगी थे उनमें से एक को त्रुटि का आभास हुआ व परोक्ष भाव से उन्होंने स्वीकार भाव का प्रदर्शन किया। दूसरे व्यक्ति दृष्टि में आने से बचते रहे।

अंत में श्राद्धकर्ता व परिवार को मैं यह कहकर विदा हुआ कि जो हुआ उसमें आप मुख्य दोषी नहीं थे, न तो आपने मुझे आमंत्रित किया था और न ही समाज के विरुद्ध अड़ सकते थे, यदि स्वयं आमंत्रित करते तब तो अड़ सकते थे। इसलिये आपका दोष नहीं मानता किन्तु जिन लोगों ने विघ्न किया अपमान किया, शास्त्र को अस्वीकार किया वो लोग दोषी हैं और इस दोष का फल शास्त्र निर्धारित करेगा, आपको निर्दोष घोषित करता हूँ।

अपनी प्रतिष्ठा व शास्त्र की प्रतिष्ठा

“धर्म की रक्षा के लिए यदि अपमान भी मिले, तो वह करोड़ों सम्मानों से श्रेष्ठ है।”

अब विषय की चर्चा पर आता हूँ जो इस घटना अथवा दुर्घटना से निकलता है। अपण्डितों का वह नियम कि अपनी प्रतिष्ठा बचाकर निकल जाओ यथावत ही रहेगा किन्तु इस शब्द को गंभीरता से समझना आवश्यक है कि अपण्डितों का। पण्डितों की प्रतिष्ठा का आधार ही शास्त्र होता है और अपनी प्रतिष्ठा व शास्त्र की प्रतिष्ठा दोनों में विरोध है ही नहीं।

जब शास्त्र की प्रतिष्ठा होगी तभी पंडितों की प्रतिष्ठा होगी, यदि शास्त्र की प्रतिष्ठा ही न हो तो पंडित को अपनी प्रतिष्ठा बचाने की आवश्यकता नहीं होती। पंडित का कार्य शास्त्र प्रतिष्ठा ही है, धर्म स्थापना ही है। अपण्डितों का लक्ष्य धन होता है और धन के साथ आत्मसम्मान या प्रतिष्ठा होती ही नहीं है अपितु एक भ्रम होता है।

ब्राह्मण का अपमान करना मृत्युतुल्य कहा गया है और अश्वत्थामा वध में यही विकल्प भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था। किन्तु यह विषय अपमानकर्ता के लिये है जिसका अपमान हुआ उसके लिये नहीं, हां जो अपण्डित होते हैं उनके लिये मृत्युतुल्य कष्टकर होता है। यहां मेरा अपमान था ही नहीं, मेरी अप्रतिष्ठा थी ही नहीं, मेरा अपमान या मेरी अप्रतिष्ठा तब हो न जब मैं मौखिक कुतर्क का आश्रय ग्रहण करूँ शास्त्र का आश्रय ही न लूँ।

यदि मैं शास्त्र का आश्रय ग्रहण कर रहा हूँ और शास्त्रोचित हेतु तत्पर हूँ तो वहाँ मेरे अपमान का तात्पर्य भी शास्त्र का ही अपमान होगा, यहां तो स्पष्टतः शास्त्र के पक्ष को ही अस्वीकार कर दिया गया अर्थात शास्त्र की ही प्रतिष्ठा का हनन किया गया इसलिये मेरा न कराना उचित था और नहीं कराया। प्राणभय में शास्त्र प्राणरक्षा हेतु युक्ति लगाने की आज्ञा प्रदान करता है किन्तु अधर्म का नहीं क्योंकि धर्म हेतु प्राण का उत्सर्ग सौभाग्य की बात होती है।

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥
श्रीमद्भगद्गीता

यह निश्चित ही चर्चा का एक बड़ा विषय बनेगा और जो मूर्ख हैं अथवा अपण्डित हैं वो मेरा अपमान समझकर ताली बजायेंगे अर्थात हर्षित होकर प्रचारित करेंगे और इस दोष के भागी भी बनेंगे किन्तु ये इतने अल्पज्ञ हैं की शास्त्रान्वेषण नहीं करेंगे कि उचित और अनुचित क्या है। ये अपण्डित इस पक्ष को सिद्ध करने के लिये प्रमाणों को भी नहीं ढूंढेगे की एक-एक करके करना चाहिये और न ही मेरे द्वारा प्रस्तुत प्रमाणों के विरुद्ध कोई प्रमाण भी ढूंढने का प्रयास करेंगे।

कुछ लोग मेरे निर्णय को स्वीकार तो करेंगे किन्तु व्यावहारिक समस्या (अपमान भय, अप्रतिष्ठा भय) के कारण प्रयोग नहीं कर पायेंगे और कुछ लोग ऐसा भी कहेंगे कि जो कहा गया वो प्रामाणिक है एवं अस्वीकार करने वाले मूर्ख थे दोषी बने। जिसे अपण्डित कह रहा हूँ उसके पीछे का कारण यही है कि शास्त्र से उचित-अनुचित का विचार करना चाहिये इतना विवेक भी उनके पास नहीं होता।

जिनको अपमान भय हो, अप्रतिष्ठा का भय हो उनके लिये कुछ स्पष्ट करना आवश्यक है कि यदि शास्त्र के पक्ष में रहने से अपमान हो तो उसे सहर्ष स्वीकारना ही बुद्धिमत्ता है और पंडिताई है। क्योंकि जो लोग अपनी प्रतिष्ठा बचाने को पंडिताई सिद्ध करते रहते हैं उसका खण्डन आवश्यक है और इस विषय को भी मैं शास्त्र के प्रमाण से ही सिद्ध करूँगा।

अपमानात्तपोवृद्धिः संमानाच्च तपःक्षयः। अर्चितः पूजितो विप्रो दुग्धा गौरिव गच्छति ॥
पुनराप्यायते धेनुः सतृणैः सलिलैर्यथा। एवं जपैश्च होमैश्च पुनराप्यायते द्विजः ॥

पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्ड)/१९/३२०-३२१, आपस्तम्ब स्मृति/१०/९ – १०

अपमान सहन करने से ब्राह्मण के तप की वृद्धि होती है और सम्मान प्राप्त करने से तप का क्षय होता है। किन्तु वह क्षय की पुनः धर्मपालन से पूर्ति हो जाती है जैसे गोदोहन के पश्चात् पुनः तृण-जलादि से गाय का दूध पूर्ण हो जाता है। अपमान सहन करने का तात्पर्य यह है कि अपमान होने पर क्रोध न करना। यद्यपि मैं तपस्वी ब्राह्मण नहीं हूँ तथापि यदि आप तपस्वी ब्राह्मण हैं तो आपकी परीक्षा इसी प्रकार होगी।

अपमान होगा तभी तो यह ज्ञात होगा कि अपने क्रोध करके श्राप, अमंगलकारी वचन आदि का प्रयोग किया अथवा नहीं। यदि अपमान होने पर आपने क्रोध न किया, श्राप-अमंगल कामना आदि करके अपने तप का नाश नहीं किया तो वहां आपके तप की और वृद्धि होगी अन्यथा तप का नाश ही होगा। श्रापादि करने पर वह आपके तप के प्रभाव से ही घटित होगा और उससे आपके तप का नाश होगा ही होगा। ये विश्वामित्र के ब्रह्मर्षि बनने वाली तपस्या प्रकरण में स्पष्ट हो जायेगा।

अपनी प्रतिष्ठा, सम्मान का त्याग करके शास्त्र की प्रतिष्ठा, धर्म की स्थापना के पक्ष में रहने वाले भी सदैव रहते हैं किन्तु इक्के-दुक्के ही होते हैं। पूर्व काल में भी थे, वर्त्तमान में भी हैं और भविष्य में भी होंगे ही। ये उचित होते हैं ऐसा भी वो अपण्डितवर्ग (बहुसंख्यक) स्वयं ही घोषित करते रहते हैं किन्तु मूर्ख सिद्ध करने के लिये परस्पर वार्तालाप करते हैं। अमुक पंडित शास्त्रज्ञ तो हैं, उचित तो कहते हैं किन्तु व्यावहारिक नहीं होने के कारण पूछ नहीं है।

अपनी प्रतिष्ठा व शास्त्र की प्रतिष्ठा

अर्थात ये अपण्डित वर्ग अपनी व्यावहारिकता को उचित से, धर्म से, शास्त्र से ऊपर रखते हैं और प्रतिष्ठा, पूछ, सम्मान के भ्रम में भ्रमित रहते हैं। इन अपण्डितों हेतु एक वाक्य अवश्य कहा जायेगा कि यदि तुम उचित, शास्त्र, धर्म के पक्ष में ही नहीं हो, धन, सम्मान के पक्ष में रहते हुये अधर्म, अशास्त्रीय अथवा शास्त्रविरुद्ध स्वेच्छाचार का आश्रय लेते हो तो तुम स्वयं को ब्राह्मण किस मुँह से कह सकते हो।

इसलिये अपण्डितों के प्रति यही कहना चाहूंगा की विवेकचक्षु खोलो और प्रतिष्ठा, सम्मान के भ्रम से बाहर हो जाओ। शास्त्र का आश्रय ग्रहण करो तो यह ज्ञात हो जायेगा। मैं यह भ्रम नहीं पालता इस कारण शास्त्र के ही पक्ष में रहता हूँ। कई लोगों को तो मैं सम्मिलित होने से मना कर देता हूँ जहां मुझे पूर्वाभास होता है कि शास्त्र में निष्ठा नहीं है।

इस दुर्घटना में मुझे भ्रम हो गया था कि ब्राह्मणों का गांव है और अभी भी सरस्वती की, शास्त्र की प्रतिष्ठा है। इसी कारण यह दुर्घटना घटित हुयी किन्तु फिर भी मैं आशान्वित हूँ कि इससे यह विषय चर्चित तो होगा ही और कुछ न कुछ पंडित विचार-विमर्श अवश्य करेंगे ही, उचित-अनुचित का अन्वेषण करेंगे ही।

महत्वपूर्ण बिन्दु

अब बात उन दोनों महत्वपूर्ण बिन्दुओं की है जो शास्त्रसिद्धि नहीं करने पर कही जाती है अथवा शास्त्रविरुद्ध तथ्य को उचित सिद्ध करने के लिये बोला जाता है। दोनों ही कुतर्क है और दोनों का ही तर्कपूर्ण उत्तर भी है। संभव है आप भी शास्त्र से कुछ सिद्ध करें किन्तु अगला व्यक्ति अपण्डित हो तो ऐसा ही कुछ कुतर्क करके उसे खण्डित करने का प्रयास करता हो, अथवा ऐसे पंक्तियों को सुनकर आप मौन हो जाते हों तो अब मौन रहने की आवश्यकता नहीं रहेगी क्योंकि इसका उत्तर जान लेंगे।

आज तक बाप-दादा जो करते आये वो गलत थे क्या ?

यह प्रथम पंक्ति है तो जहां-तहां सुनने को मिलता है भले ही आप शास्त्र से उस विधि का खंडन कर दें, अगला व्यक्ति किसी प्रकार से सिद्धि न कर पाए तो यही बोलेगा कि “आज तक बाप-दादा जो करते आये वो गलत थे क्या ?” ये स्वयं में अस्थापित हो चुका है इसका कहीं कोई निर्वहन नहीं कर रहा है बस शास्त्र सिद्ध विषय को खण्डित करने के लिये बोला जाता है अर्थात अधर्म हेतु है। तुम्हारे बाप दादा :

  • नौकरी को निकृष्ट कहते थे, तुम कहते हो क्या, अरे लंगोट खोले रहते हो, जनेऊ खोलकर फेंक देते हो, शिखा वपन कर देते हो, चूड़ी-सिंदूर-मंगलसूत्र का त्याग कर देते हो, और न जाने क्या-क्या करते हो।
  • धोती धारण करते थे, पैंट-सर्ट आदि को मरते दम तक नहीं पहने, तुमने क्या किया ?
  • आहार शुद्धि रखते थे, तुम क्या कर रहे हो ?
  • विवाह में मेंहदी रस्म, हल्दी रस्म, जयमाला आदि नहीं करते थे, तुमने क्यों आरम्भ कर दिया ?
  • खड़े-खड़े, जूता-चप्पल पहने बुफे सिस्टम में नहीं खाते थे, तुम क्यों खा रहे हो ?
  • गंगा स्नान, तीर्थाटन आदि के लिये नंगे पांव पैदल जाते थे, तुम जूता-चप्पल पहनकर वाहन से क्यों जाते हो ?
  • पाप से बचके चलते थे, तुम क्यों करते हो ?
  • विधवा विवाह, तलाक आदि नहीं करते थे, तुम क्यों कर रहे हो ?
  • बेटी-बहू को घर के भीतर रखते थे, आज बाजार में क्यों नचा रहे हो ?
  • घर आये ब्राह्मण, साधु-संतों का सत्कार करते थे, भोजन कराकर विदा करते थे, तुम करते हो क्या ?

ऐसे ढेरों तथ्य हैं जो जूते की तरह बरसाये जा सकते हैं यदि कोई यह कहे कि “आज तक बाप-दादा जो करते आये वो गलत थे क्या ?” जूते की तरह इसलिये बरसाने की आवश्यकता है क्योंकि इसका भी दुरुपयोग ही करते हैं, शास्त्रविरुद्ध व्यवहार का खंडन करने के लिये तो नहीं करते किन्तु शास्त्रोचित विषय का खंडन हेतु बोलते हैं। आगे और भी विषय हैं जैसे यदि किसी का बाप-दादा नंगा रहता था, तो उसके वंशज आज कपडे पहन ही क्यों रहे हैं ?

आज तक बाप-दादा जो करते आये वो गलत थे क्या ?

यदि किसी के बाप-दादा को वस्त्राभाव के कारण आधी धोती में ही पूजा आदि कराया जाता था और आज उसे पूरी धोती होने पर पहनने के लिये कहा जाय तो इसमें बाप-दादा को लपेटने की क्या आवश्यकता है ? इस पंक्ति का प्रयोग करने वाले उस बन्दर के समान हैं जो मक्खी मारने के लिये राजा पर तलवार से प्रहार कर देता है। इसका उपयोग कहां-कैसे करना है यह ज्ञात ही नहीं तो दुरुपयोग ही करेगा और यजमान का ही अहित करेगा अर्थात नरकगामी बनाएगा।

यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धं, नाचरणीयं नाचरणीयं

अब बात लोक विरुद्धं की है और इसके लिये भी पृथक आलेख प्रकाशित है। लोकविरुद्धं का तात्पर्य लोक में हानि की संभावना से है, यदि शास्त्रोचित नियम है तो शुद्ध है, कर्तव्य है किन्तु उससे संसार में स्वयं की अथवा किसी और की क्षति हो रही हो अथवा शासन द्वारा बाधित हो तो वह लोकविरुद्ध है। यदि एक बार में तंत्र से १४/१५ मासिक किये जायेंगे तो इससे लोक में क्या हानि संभावित है अथवा किसी शासन विधान का उल्लंघन हो रहा है? कुछ भी नहीं तो लोकविरुद्धं कैसे हुआ ?

अपण्डितों को लोकविरुद्धं का भी अनर्थ ही समझ आता है कि जो करते आये हैं उसके विरुद्ध करना लोकविरुद्धं है। अरे धूर्तों यदि ऐसा अर्थ लिया जाता तो वर्षपर्यन्त का श्राद्ध दो दिन में कैसे आरम्भ हुआ ? विद्वान लोकविरुद्धं का अर्थ लोक में हानि अथवा शासन विधान से बाधित ही ग्रहण करते हैं किन्तु अपण्डित इसका अर्थ नंगे सोते थे तो नंगे ही सोयेंगे, बिना स्नान के ही भोजन करते थे तो स्नान पूर्व ही भोजन करेंगे भले ही शास्त्र से गलत क्यों न सिद्ध हो जाये ऐसा लगाते हैं।

यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धम्। सही-सही कैसे समझें ?

लोकविरुद्धं का तात्पर्य है कि यदि स्नान करने से हमारा स्वास्थ्य बिगड़ जाये तो बिना स्नान के भी रह सकते हैं क्योंकि स्नान से हानि संभावित है। यदि व्रत में उपवास करने से ही समस्या होती है तो फलाहार आदि कर सकते हैं, क्योंकि लोक में हानि संभावित है और इस कारण लोकविरुद्ध है। यदि वृषोत्सर्ग के वृष की हत्या कर दी जाएगी तो वृषोत्सर्ग करना शुद्ध होते हुये भी लोकविरुद्ध है। यदि बाल विवाह शासन विधान से बाधित है तो लोकविरुद्ध है क्योंकि कारागार भी जाना पड़ सकता है।

इतने सरल शब्दों में समझाने पर भी अपण्डितों को ये तथ्य समझ नहीं आ सकते और उनके लिये जूते (शब्दात्मक) का प्रयोग ही उचित है। यदि अपण्डित अपने कुतर्क को आन की बात बना सकता है तो शास्त्रसिद्ध तथ्य को विद्वान ब्राह्मण डंके की चोट पर क्यों नहीं कह सकते जबकि यहां तो शास्त्ररक्षा अर्थात धर्म रक्षा का भी प्रश्न है, यही दायित्व है।

“लंगूर के हाथ में अंगूर” होने के समान ही अपण्डितों के लिये ये तथ्य हैं। अपण्डितों का लक्ष्य ही धन होता है, वास्तव में उनकी प्रतिष्ठा है ही नहीं, बस एक दूसरे से अधिक आडम्बर के कारण पूछ हो जाती है और इसे वो प्रतिष्ठा समझ लेते हैं और इस प्रतिष्ठा की रक्षा के लिये शास्त्र की प्रतिष्ठा का भी हनन कर देते हैं।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः यही कहा जायेगा कि यदि आप शास्त्रनिष्ठा रखते हैं तो उचित हैं किन्तु संघर्ष हेतु तत्पर रहना चाहिये। आपको भी ऐसे कुतर्क सुनने को मिल सकते हैं यदि आप किसी विषय की शास्त्रसिद्धि करें किन्तु आपके सामने अपण्डित हो तो। अपण्डितों के ऐसे कुतर्क पर यदि प्रतिष्ठा की बात सोचकर मौन रहें तो वो अपनी विजय सिद्ध करता है किन्तु यदि वह कुतर्क का आश्रय लेकर शास्त्र विरोध कर सकता है तो आप शास्त्रोचित विषय के लिये क्यों नहीं डट सकते अर्थात डटना होगा और कुतर्क का तर्कपूर्ण उत्तर भी ऊपर दिया गया है। विद्वान/पण्डित का ध्येय धन मात्र नहीं धर्म मात्र ही होना चाहिये।

॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

“संबंधित प्रश्न” (FAQ)

FAQs

प्रश्न: क्या पुराने रीति-रिवाज गलत हो सकते हैं?

उत्तर: हाँ, यदि वे शास्त्र के मूल सिद्धांतों के विपरीत हों।

प्रश्न: बाप-दादा के नाम पर कुतर्क का जवाब कैसे दें?

उत्तर: उन्हें उनके द्वारा छोड़े गए अन्य प्राचीन नियमों की याद दिलाएं।

प्रश्न: लोकविरुद्धं (Lok-viruddham) का सही अर्थ क्या है?

उत्तर: ऐसी क्रिया जिससे समाज की वास्तविक हानि या शासन का उल्लंघन हो।

प्रश्न: श्राद्ध में ‘तंत्र’ विधि का क्या अर्थ है?

उत्तर: मुख्य विधि का विस्तार न करके कई कार्यों को एक साथ संपन्न करना।

प्रश्न: अतिक्रमण दोष क्या है?

उत्तर: निकटतम विद्वान की उपेक्षा कर ईर्ष्यावश किसी बाहरी अल्पज्ञ को बुलाना।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

अस्वीकरण: इस आलेख में वर्णित घटनाएँ और विचार शास्त्रीय मर्यादाओं की रक्षा हेतु प्रस्तुत किए गए हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, विशेष गांव या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि शास्त्रों की श्रेष्ठता को पुनर्स्थापित करना है। लेखक का मत विशुद्ध रूप से शास्त्र सम्मत प्रमाणों और उचित तर्कों पर आधारित है, जिसका उद्देश्य जिज्ञासा और धर्म-सुधार है। आलेख में व्यक्ति-गांव आदि किसी की भी गोपनीयता को भंग नहीं किया गया है।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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