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क्या कलयुग में यज्ञ आवश्यक है? “कलौ केशव कीर्तनात्” और “दानमेकं कलौ युगे” का शास्त्रीय विश्लेषण

क्या कलयुग में यज्ञ आवश्यक है? "कलौ केशव कीर्तनात्" और "दानमेकं कलौ युगे" का शास्त्रीय विश्लेषण क्या कलयुग में यज्ञ आवश्यक है? "कलौ केशव कीर्तनात्" और "दानमेकं कलौ युगे" का शास्त्रीय विश्लेषण

“यज्ञ प्रकृति का ऋण उतारने का माध्यम है, दान वैराग्य का आधार है, और संकीर्तन परमात्मा से प्रेम है, मिलन की तीव्र लालसा है।”

आपके मन में भी यह प्रश्न अवश्य ही आता रहा होगा कि जब “कलौ केशव कीर्तनात्” से कलयुग में एकमात्र भगवान कृष्ण के कीर्तन को आत्मकल्याण का साधन बताया गया है अथवा “दानमेकं कलौ युगे” के द्वारा दान को ही एकमात्र साधन बताया गया है तो फिर यज्ञ आदि विस्तृत कर्मकांडों की क्या आवश्यकता है ? यदि आप आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर हैं तो ऐसे संशय स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते रहेंगे और उसमें भी तब जबकि भ्रामक जानकारियां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो। आज हम इसी विषय को गंभीरता से समझने का प्रयास करेंगे और हमारे विश्लेषण का आधार शास्त्र और शास्त्रीय प्रमाण होगा न कि कुतर्क।

क्या कलयुग में यज्ञ आवश्यक है? “कलौ केशव कीर्तनात्” और “दानमेकं कलौ युगे” का शास्त्रीय विश्लेषण

जब शास्त्र स्वयं “कलौ केशव कीर्तनात्” (कलयुग में केवल कीर्तन से कल्याण) या “दानमेकं कलौ युगे” (दान ही मुख्य साधन है) की घोषणा करते हैं, तो फिर जटिल वैदिक यज्ञों और कर्मकांडों की प्रासंगिकता क्या रह जाती है? दार्शनिक दृष्टिकोण से इसका विश्लेषण जिस प्रकार किया जा सकता है वह दार्शनिकों का विषय है और हम शास्त्र के धरातल पर इसका विश्लेषण करेंगे तो कृपया यह दुराग्रह न पालें कि ये विश्लेषण दार्शनिकों की शैली में ही हो।

क्योंकि दर्शन पूर्णतः एक स्वतंत्र दृष्टिकोण से विचार करता है और उन तथ्यों को प्रकाशित करता है जिसे सामान्य दृष्टिकोण से देखा भी नहीं जा सकता। यद्यपि दार्शनिक विश्लेषण का भी स्वयं में विशेष महत्व होता है।

कलौ केशव कीर्तनात् – kalo keshav kirtanat

“कलौ केशव कीर्तनात्” – यदि सम्पूर्ण श्लोक की बात करें; जो सबसे मुख्य श्लोक है; तो इस प्रकार से मिलता है :

यत्फलं नास्ति तपसा न योगेन समाधिना । तत्फलं लभते सम्यक् कलौ केशवकीर्तनात् ॥ पद्म और ब्रह्म पुराण

अर्थ: जो फल, (जितना पुण्य) तपस्या करने में नहीं होता, योग करने पर भी नहीं मिलता और समाधि लगाने से भी नहीं मिलता कलयुग में मात्र भगवान केशव का सम्यकरूपेण कीतर्न करने से ही मिल जाता है। अर्थात कलयुग में कीर्तन सर्वोपरि स्थान रखता है। यहां पर एक बात ध्यातव्य है कि नाम के विषय में कोई यह दुराग्रह न बना ले कि बस “केशव“; जिसे ऐसा दुराग्रह हो वो आगे और अवलोकन कर सकते हैं :

  • कलौ शंकर कीर्तनात्।
  • कलौ चण्डी कीर्तनात्।

अर्थात जिसने जिस देवता का नाम ग्रहण किया, जिससे प्रीति करके संकीर्तन मार्ग का अवलम्बन लिया उन सबका कल्याण होगा और इसमें किसी प्रकार का भेद नहीं करना चाहिये। जैसे केशव नाम का आश्रय ग्रहण करने वाला शिव या दुर्गा नाम को कम न समझे, अथवा शिव नाम का कीर्तन करने वाला अन्य नामों को कम न समझे, तिरष्कार न करे। जैसे यदि आप राम नाम संकीर्तन करते हैं और पड़ोसी ने शिव नाम संकीर्तन का आयोजन किया है और यदि आप वहां जाकर यदि शिव नाम का संकीर्तन करते हैं तो वही भाव रखें।

कलौ केशव कीर्तनात्
कलौ केशव कीर्तनात्

नाम संकीर्तन के संबंध में बहुशः प्रमाण हैं किन्तु इस संदर्भ में जो प्रमुख प्रमाण हैं वो इस प्रकार हैं :

  • यत्फलं नास्ति तपसा न योगेन च केशव। तत्फलं लभते सर्वं कलौ नामानुकीर्तनात् ॥ नरसिंह पुराण (54.51)
  • यत्फलं नास्ति तपसा न दानेन न चेज्यया। तत्फलं लभते सम्यक् कलौ केशवकीर्तनात् ॥ पद्म पुराण
  • कलौ केशव कीर्तनात् सर्वपाप प्रणाशनम्। विष्णुलोकं अवाप्नोति नरो नास्त्यत्र संशयः ॥ बृहन्नारदीय पुराण
  • यत्फलं नास्त्यसंदेहं सहस्रैर्वाजपेयजैः। तत्फलं लभते शीघ्रं कलौ केशवकीर्तनात् ॥ पद्म पुराण
  • कलेर्दोषनिधे राजनस्ति ह्येको महान्गुणः । कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत् ॥ श्रीमद्भागवतम् – १२.३.५१
  • ध्यायन्कृते यजन्यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्। यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम् ॥ श्री विष्णु पुराण’ (6.2.17)
  • यत्फलं तपसा योगैः समाधिभिरवाप्यते । तत्फलं लभते शीघ्रं कलौ शम्भोः(शंकर)कीर्तनात् ॥ शिव पुराण और स्कन्द पुराण

ध्यातव्य : संशयापन्नों के लिये नाम संकीर्तन में भी संशय उत्पन्न होने का स्थान रिक्त है कि किस नाम का संकीर्तन करें ? आप शिव करेंगे तो दुर्गा और केशव देखने पर संशय उत्पन्न होगा, दुर्गा का करेंगे तो केशव और शिव मिलने से एवं केशव का करेंगे तो दुर्गा और शिव मिलने से। एक वैष्णव प्रसिद्ध कथाकार भी दस निष्ठ शैवों के मध्य निवास करने लगे तो उसे लगेगा कि वह तो भ्रमित था और वह भी शैव बन जायेगा।

दानमेकं कलौ युगे

आगे दान विषयक चर्चा से पूर्व यह स्पष्ट कर दूँ कि यहां प्रवचनपरक विश्लेषण नहीं किया जा रहा है अपितु संशय निवारण हेतु शास्त्रवचनों में मिलने वाले विरोधाभास को केन्द्रबिन्दु में रखा गया है और जिसकी दृष्टि विरोधाभास पर जाकर समाप्त हो जाती है उसके लिये तो नाम संकीर्तन में भी विरोधाभाष उत्पन्न हो जाता है कि किसका नाम संकीर्तन करें : केशव, शम्भू या चण्डी? जबकी राम नाम की चर्चा तो करी ही नहीं गयी है ।

किन्तु यदि आप भगवान राम की कथा और राम-नाम माहात्म्य श्रवण करेंगे तो प्रतीत होगा कि ये चर्चा भी सारहीन ही है, क्योंकि राम नाम की तो चर्चा ही नहीं किया गया। हम यहां नाम चर्चा कर ही नहीं रहे हैं मात्र एक ही निष्कर्ष है कि आपने जिस नाम को ग्रहण किया है वही सर्वोपरि है, उसी में सम्पूर्ण फल है। राम नाम का आश्रय ग्रहण करके किसी को जिस परमपद की प्राप्ति होगी वही परमपद शिव, केशव, कृष्ण, गोविंद, दुर्गा, काली सभी नामों के आश्रय ग्रहण करने वाले को भी प्राप्त होगा।

दान के विषय में आते हैं और सबसे पहले “दानमेकं कलौ युगे” मूल श्लोक का अवलोकन करते हैं :

तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते । द्वापरे यज्ञमित्याहुर्दानमेकं कलौ युगे ॥ मनुस्मृति १.८६

अर्थ : युगों के अनुसार आत्मकल्याण के साधन – कृतयुग (सतयुग) में तपस्या, त्रेता युग में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ और कलयुग में दान ये आत्मकल्याण का मुख्य साधन है, सर्वोपरि स्थान रखता है। अर्थात सतयुग में जो महत्व तपस्या का था त्रेता में वही महत्व ज्ञान का था, द्वापर में यज्ञ का था और कलयुग में दान का है।

किञ्चित अंतरों के साथ यह श्लोक भी अनेकों स्थान पर मिलते हैं अर्थात मात्र एक स्थान पर नहीं है जिससे “नाम संकीर्तन और दान” के बीच उत्पन्न होने वाले विरोधाभास में “नाम संकीर्तन” को ग्रहण करें और दान का त्याग कर दें अर्थात यह कहें कि दान के विषय में अल्प वचन हैं अर्थात “नाम संकीर्तन” का पक्ष विजयी हुआ। यज्ञ के विषय में विरोधाभाष होना तो अगले चरण में आता है, जो “नाम संकीर्तन”, “दान” और “यज्ञ” को लेकर संशय ग्रस्त होने वाले हैं, विरोधाभास समझते हैं उनको तो यहां भी उतना ही विरोधाभास दिखेगा अर्थात “नाम संकीर्तन” का आश्रय लें या “दान” का, दोनों में कौन श्रेष्ठ है ?

दानमेकं कलौ युगे
दानमेकं कलौ युगे

तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते । द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे ॥
पराशर स्मृति १.२२, महाभारत शांति पर्व २३२-२८, ब्रह्माण्ड पुराण १-२-३१-२९, कूर्म पुराण १-२८-१७

कृते तपः प्रशंसन्ति त्रेतायां ज्ञानसाधनम् । द्वापरे यज्ञदाने च दानमेकं कलौ युगे ॥२-३४-२॥ गरुडपुराण

महाभारत, मार्कण्डेय पुराण, स्कन्द पुराण आदि में कुछ और भी कहा गया है :

अन्यायोर्जित वित्तेन यत्किंचिद्धर्ममुच्यते । न तत्फलमवाप्नोति प्रेत्य चेह च मानवः ॥५७॥
दानं कलियुगे धर्मो दानं हि सकलार्थदम् । कलौ दानं प्रशंसन्ति दानं सर्वसुखावहम् ॥५८॥

:~ स्कन्द पुराण, प्रभास खण्ड, अध्याय: १८

अन्याय से अर्जित धन के द्वारा जो कुछ भी धर्माचरण किया जाता है उसका न तो इहलोक में कोई फल मिलता है और न ही परलोक में, और इसके आगे कहा जा रहा है कि कलयुग में दान ही धर्म है जो सकलार्थ (पुरषार्थसिद्धि) प्रदायक है, कलयुग में दान ही प्रशंसनीय है और दान ही सभी सुखों को प्रदान करने वाला है।

आसक्ति के रहते मुक्ति संभव नहीं, आसक्ति निवारण के लिये वैराग्य चाहिये और वैराग्य के लिये दान।

विरोधाभास

कलयुग में दान की महत्ता कहें वह तो सीधी बात समझ में आती है और “नाम संकीर्तन” से विरोधभास भी प्रतीत होता है। नाम संकीर्तन वाले प्रमाण में नाम संकीर्तन को दान से ऊपर “न दानेन” रखा गया है जो विरोधाभास का निवारक है। दान संबंधी वचनों में ऐसा प्राप्त नहीं होता जो दान को “नाम संकीर्तन” से श्रेष्ठ कहता हो और यह सबसे बड़ा कारण है कि यज्ञ पर जाने से पूर्व तो दान की आवश्यकता है अथवा नहीं यह समझना ही आवश्यक सिद्ध कर देता है।

यदि हम “कलौ केशव कीर्तनात्” और “दानमेकं कलौ युगे” इतने भाग को ग्रहण करें तो दोनों में विरोधाभास है किन्तु यदि पूर्ण श्लोकों का अवलोकन करने पर विरोधाभास का निवारण हो जाता है। किन्तु

  • क्या दोनों में से कहीं भी दूसरे का निषेध किया गया है ? अथवा
  • क्या कृतयुग से द्वापर दोनों का तक निषेध था ? अर्थात यदि कृतयुग में तपस्या वरीय था तो क्या योग, यज्ञ, दान, ज्ञान, नाम संकीर्तन आदि निषिद्ध था ? इसी प्रकार अन्य युगों के विषय में भी विचारणीय।

“कलौ केशव कीर्तनात्” अथवा “दानमेकं कलौ युगे” से इनकी श्रेष्ठता के स्थान पर यदि हम यज्ञादि के निषेध का भाव ग्रहण कर रहे हैं तो यह अविवेक है। निषेधात्मक भाव तो कहीं मिल ही नहीं रहा है किन्तु कलयुग प्रभाव के कारण हमारा विवेक क्षीण हो गया है और हम निषेधात्मक भाव ग्रहण कर लेते हैं। जैसे यदि किसी को मकर संक्रांति की शीतलहरी में स्नान न करना हो तो वह कह देता है “मन चंगा कठौती में गंगा”, उसी प्रकार जिसे यज्ञ करने की इच्छा न हो तो वह इन श्लोकों का प्रयोग करके यज्ञ की अनावश्यकता स्थापित करने का प्रयास करता है।

यदि हम मतिभ्रमता से पीड़ित हो जायेंगे और नाम संकीर्तन की वरीयता ग्रहण करने के स्थान पर अन्य कर्मों के लिये निषेधात्मक भाव लेते हैं तो मात्र यज्ञ ही अनावश्यक कैसे होगा फिर तो और भी बहुत कुछ है :

  • सत्य
  • अहिंसा
  • व्रत
  • तीर्थाटन
  • भक्ति
  • ज्ञान
संकीर्तन की वरीयता
संकीर्तन की वरीयता

इसके साथ ही और भी बहुत कुछ है; निषेधात्मक भाव ग्रहण करने पर जिसका बाध हो जायेगा, नित्य, नैमित्तिक और काम्य तीनों प्रकार के कर्मों का भी बाध होगा या नहीं ? यदि नाम संकीर्तन करने वाले के लिये अन्य सभी कर्म निषिद्ध जाते हैं इसका तो कहीं कोई प्रमाण नहीं मिलता है। हां यह अवश्य मिलता है कि और कुछ यदि न भी करे (निषेधात्मक नहीं असमर्थता) तो भी वह कल्याण का भाजन होता ही है।

अर्थात यदि सामर्थ्यहीन हो तो दान, यज्ञ, तप, व्रत, तीर्थ आदि की अनिवार्यता नहीं सिद्ध होती। जहां कहीं भी कर्तव्य कर्म व्रतादि का विधान प्राप्त होता है वहीं यह भी वचन मिलताहै कि बाल, वृद्ध आतुर आदि को छोड़कर अर्थात असामर्थ्यों को छोड़कर। “बालवृद्धातुरैः क्षीणैः शश्वन्मर्त्यैस्तथा नरैः। उपवासो न कर्तव्यो नरैः श्रद्धासमन्वितैः॥”

अथवा नाम संकीर्तन की अनिवार्यता भी तो सिद्ध नहीं होती है। असमर्थता में जैसे मूक हो, वाणी ही अवरुद्ध हो जाये तो वहां नाम संकीर्तन का भी स्वतः अभाव हो जायेगा।

इस प्रकार सर्वप्रथम तो यह सिद्ध हो जाता है कि “कलौ केशव कीर्तनात्” नाम संकीर्तन की वरीयता को सिद्ध करता है न कि अन्यान्य कर्मों का निषेध, “दानमेकं कलौ युगे” दान की वरीयता को सिद्ध करता है न कि अन्यान्य कर्मों का निषेध। नाम संकीर्तन की एक विशेषता है कि जहां अन्यान्य कर्मों का निषेध भी हो जाता है जैसे सूतकादि में वहां भी नाम संकीर्तन का निषेध नहीं होता।

यज्ञ

सृष्टि के लिये यज्ञ की अनिवार्यता गीता के इस वचन से सिद्ध होता है :

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ श्रीमद्भगवद्गीता (3.14)

  • अन्नाद्भवन्ति भूतानि : समस्त प्राणी ‘अन्न’ से उत्पन्न होते हैं और अन्न से ही जीवित रहते हैं।
  • पर्जन्यादन्नसंभवः : अन्न की उत्पत्ति ‘पर्जन्य’ (वर्षा/बादल) से होती है। बिना वर्षा के वनस्पति और अन्न संभव नहीं है।
  • यज्ञाद्भवति पर्जन्यो : वर्षा ‘यज्ञ’ से होती है।
  • यज्ञः कर्मसमुद्भवः : यज्ञ की सिद्धि ‘कर्म’ से होती है।
यज्ञ

कलयुग में यज्ञ का निषेध अथवा और अधिक आवश्यकता

अस्थिस्थाः प्राणिनां प्राणाः कृतयुगे स्थिताः। त्रेतायां मांसमाश्रित्य द्वापरे रुधिरं ययुः।
कलौ तु प्राणिनः प्राणाः भवन्त्यन्नगताः सदा॥
– वायु पुराण

अर्थ: सतयुग में प्राणियों के प्राण हड्डियों में स्थित थे, त्रेता में वे मांस के आश्रित हुए, द्वापर में रक्त में समा गए, और कलियुग में तो प्राणियों के प्राण सदैव अन्न में ही बसे रहते हैं।

“कलावन्नगताः प्राणाः लोकाः स्वाल्पायुषस्तथा” – स्कंदपुराण, कूर्म पुराण

अर्थ: कलयुग में प्राण अन्नगत होता है अर्थात जीवन अन्न पर ही निर्भर होता है।

विचारणीय : अन्यान्य युगों में जब अन्न की उतनी आवश्यकता नहीं थी क्योंकि प्राण अन्नमय नहीं था तो भी यज्ञ की आवश्यकता थी, कलयुग में तो प्राण ही अन्नमय है अर्थात जीवन के लिये अन्न की ही सर्वाधिक आवश्यकता है तो वर्षा भी अनिवार्यतः चाहिये और वर्षा के लिये यज्ञ भी अनिवार्य ही नहीं पूर्व युगों की अपेक्षा अधिक करने की आवश्यकता है, क्योंकि पूर्व के युगों में प्राण अन्नमय नहीं था।

यज्ञ के प्रकार :

  • नित्य यज्ञ : जो प्रतिदिन किए जाते हैं (जैसे अग्निहोत्र आदि पञ्चमहायज्ञ)।
  • नैमित्तिक यज्ञ : जो विशेष अवसरों पर किए जाते हैं (जैसे पुत्रेष्टि यज्ञ, विवाह यज्ञ)।
  • काम्य यज्ञ : किसी विशेष कामना की पूर्ति के लिए (जैसे वर्षा के लिए कारीरी यज्ञ)।

नित्य यज्ञ के तो नाम से ही सिद्ध हो जाता है कि इसका त्याग नहीं करना चाहिये, इसका बाध हो ही नहीं सकता। इसी प्रकार नैमित्तिक यज्ञ का भी बाध नहीं हो सकता क्योंकि निमित्त के कारण वहां वह भी अनिवार्य ही होता है।

काम्य यज्ञों की तो अनिवार्यता ही नहीं है यदि कामना है तो कामना के लिये काम्य यज्ञ करे और कामना नहीं है तो उसकी आवश्यकता भी नहीं है तथापि यदि कोई काम्य यज्ञ ही कर रहा हो और उसमें सहयोग का आकांक्षी हो तो उसका बाध नहीं होता अर्थात सहयोग तो करना ही चाहिये।

कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम् । यज्ञैः सङ्कीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥ (श्रीमद्भागवतम् ११.५.३२)

अर्थ: कलयुग में सुमेधस (बुद्धिमान) लोग भगवान कृष्ण के ‘संकीर्तन यज्ञ’ के माध्यम से ही उनकी आराधना “यज्ञैः सङ्कीर्तनप्रायैर्यजन्ति” करते हैं।

श्रीमद्भागवत महापुराण में तो संकीर्तन को भी यज्ञ की ही श्रेणी में रखा गया है। अब जबकि संकीर्तन स्वयं भी यज्ञ की श्रेणी में ही आ जाता है तो यज्ञ का निषेध कैसे हो सकता है ?

  • “यज्ञो वै विष्णुः” शतपथ ब्राह्मण (1.1.2.13) यज्ञ स्वयं परमात्मा का स्वरूप है, अतः इसका त्याग कभी संभव नहीं, केवल स्वरूप बदलता है।
  • “यज्ञो वै विष्णुः स देवान् अभवत्” तैत्तिरीय संहिता (1.7.4) – यज्ञ ही विष्णु हैं, वे ही देवताओं के रूप में प्रकट हुए ।
  • “अहं क्रतुरहं यज्ञः…” श्रीमद्भगवद्गीता (9.16) : मैं ही क्रतु हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ।

यज्ञ स्वयं ही भगवान हैं, और नामसंकीर्तन अथवा नाम जप भी यज्ञ की ही श्रेणी में आता है तो यज्ञ का बाध कैसे हो सकता है ?

निष्कर्ष: भ्रम में न पड़ें

शास्त्रों में कोई विरोधाभास नहीं है, केवल हमारे दृष्टिकोण की सीमाएँ हैं। “कलौ केशव कीर्तनात्” हमें अधिकार देता है कि हम अभाव में भी पार उतर सकें, और “यज्ञ-दान” हमें कर्तव्य सिखाते हैं कि हम सामर्थ्य होने पर सृष्टि के ऋण से मुक्त हो सकें। अतः, जो सामर्थ्यवान हैं वे यज्ञ-दान का आश्रय लेते हुये नाम संकीर्तन भी करें, और जो असमर्थ हैं वे अनन्य भाव से नाम-कीर्तन में डूब जाएँ, किन्तु यदि सामर्थ्य हो तो नाम संकीर्तन की वरीयता को निषेधात्मक सिद्ध करते हुये कृपणता न दिखायें।

“यज्ञो हि सृष्टि-पोषणं, दानं च शुद्ध-जीवनम्। कीर्तनं प्रेम-लक्षणं, त्रिवेणी कलयुगे शुभम् ॥”

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

FAQ

प्रश्न 1: जब कीर्तन से ही मोक्ष संभव है, तो यज्ञ पर धन और समय क्यों व्यय करें?

उत्तर: कीर्तन व्यक्तिगत आत्मकल्याण का साधन है, जबकि यज्ञ ‘समष्टि’ (ब्रह्मांड) के कल्याण का। यज्ञ वर्षा, अन्न और प्रकृति की शक्तियों को पुष्ट करता है। कीर्तन आत्मा को शुद्ध करता है, यज्ञ वातावरण को।

प्रश्न 2: क्या ‘दानमेकं कलौ युगे’ का अर्थ है कि केवल दान ही पर्याप्त है?

उत्तर: यह वचन दान की ‘प्रधानता’ को दर्शाता है। कलयुग में मनुष्य की आसक्ति धन में अधिक है, इसलिए दान के माध्यम से त्याग का अभ्यास कराया जाता है। यह अन्य साधनाओं का विकल्प नहीं, वैराग्य का उत्पन्न करने का मूल साधन है। वैराग्य के बिना आत्मकल्याण संभव नहीं क्योंकि आसक्ति तो स्वयं ही बंधन है।

प्रश्न 3: कलयुग में यज्ञ का सबसे उपयुक्त स्वरूप क्या है?

उत्तर: शास्त्रों के अनुसार कलयुग में ‘द्रव्य यज्ञ’ (सामग्री वाला यज्ञ) कठिन है, इसलिए ‘जप यज्ञ’ और ‘संकीर्तन यज्ञ’ को सबसे श्रेष्ठ यज्ञ माना गया है। जैसा कि गीता में भगवान ने कहा— “यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि” (यज्ञों में मैं जप यज्ञ हूँ)।

प्रश्न 4: क्या बिना कर्मकांड के कीर्तन सफल हो सकता है?

उत्तर: हाँ, नाम संकीर्तन स्वतंत्र साधन है, यद्यपि भक्ति के अंतर्गत मुख्य है। किंतु कर्मकांड (नियम, संयम, शुद्धि) कीर्तन के लिए भूमि तैयार करते हैं। बिना चित्त शुद्धि के नाम में मन नहीं लगता, और चित्त शुद्धि के लिए निष्काम कर्म (यज्ञ-दान) आवश्यक है।

॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

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कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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