“हम सभी अपने पितरों के ऋणी होते हैं और श्राद्ध के माध्यम से पितरों को तृप्त करना हमारा दायित्व होता है”
श्राद्ध भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म और कर्मकांड का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है जो मृतक पितरों के निमित्त उनके उत्तराधिकारी द्वारा किया जाता है। आधुनिक विचारधारा के अनुसार शब्दों (Meaning of Shradh) में व्यक्त करें तो “यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता (Gratitude) प्रकट करने का एक आध्यात्मिक मार्ग है।”
श्राद्ध का वास्तविक स्वरूप और विधि समझने के उद्देश्य से यहां श्राद्ध रत्नाकर (Shraddh Ratnakar) प्रकल्प आरम्भ किया गया है जो क्रमशः कई खंडों में प्रकाशित किये जायेंगे। हमारा उद्देश्य श्राद्ध के बारे में विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करना है जो कर्मकांडी और सभी जनों के लिये विशेष उपयोगी सिद्ध हो।
श्राद्ध किसे कहते हैं? शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ श्राद्ध की परिभाषा और अर्थ – Meaning of Shradh
“न च श्राद्धात् परं श्रेय:” अर्थात श्राद्ध से बढ़कर कल्याणकारी दूसरा कोई मार्ग नहीं है”
श्राद्ध के विषय में ज्ञान कल्प, स्मृति, पुराण आदि ग्रंथों से प्राप्त होता है जो बिखड़े हुये पुष्पों की भांति यत्र-तत्र मिलते हैं और उनका अनेकों विद्वानों द्वारा संकलन करके माल्यवत अनेकों ग्रन्थ भी प्रकाशित किये गए हैं यथा : श्राद्ध कल्पलता, श्राद्ध कल्पतरु, श्राद्ध चन्द्रिका आदि। स्मृतियों के श्राद्ध “Shradh Vidhi” संबंधी भाग का संकलन जहाँ प्राप्त होता है उस पुस्तक का नाम है स्मृति चन्द्रिका श्राद्ध कांड।
इसी प्रकार निर्णय सिंधु, धर्म सिंधु, कृत्यसार समुच्चय आदि ग्रंथों में भी श्राद्ध विषयक विस्तृत चर्चा मिलती है। इन संकलनों के आधार पर सामान्य भाषा में कर्मकांडी और सामान्य जनों के लिये विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करना हमारा उद्देश्य है जो श्राद्ध के विषय में अति-उपयोगी सिद्ध हो।
वर्त्तमान काल में गीता प्रेस द्वारा भी एक विशेष पुस्तक प्रकाशित किया गया है जिसका नाम है “अन्त्य कर्म श्राद्ध प्रकाश” और इसमें भी श्राद्ध विषयक विस्तृत चर्चा मिलती है। यहां श्राद्ध रत्नाकर में जो चर्चा की जायेगी वह एक पुस्तक के कलेवर में प्रस्तुत की जा सके इसका भी ध्यान रखा जायेगा और eBook प्रकाशित किया जायेगा। साथ ही यदि कोई प्रकाशक पुस्तक का प्रकाशन करना चाहें तो वो सादर आमंत्रित हैं।

अनेकों श्राद्ध की विधि और मन्त्र से संबंधित आलेख पूर्व में ही प्रकाशित किये गए हैं एवं वहां भी विस्तृत चर्चा की गयी है तथापि लघु हैं और यहां और विस्तार दिया जायेगा। किन्तु किसी विशेष श्राद्ध के मन्त्र-विधि आदि की पुनरावृत्ति नहीं की जाएगी क्योंकि यह पूर्व ही किया जा चुका है। यहां हम श्राद्ध की परिभाषा को समझेंगे।
श्राद्ध की परिभाषा – अर्थात श्राद्ध के बारे में जानकारी
“श्राद्ध” शब्द की उत्पत्ति ‘श्रद्धा’ शब्द से हुई है। शास्त्रीय दृष्टि से, पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले त्याग (दान-तर्पण) को श्राद्ध कहा जाता है।
“श्राद्ध” शब्द की उत्पत्ति “श्रद्धा” से हुई है और इसकी परिभाषा इस प्रकार बताई गयी है “श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्” – अर्थात जो कार्य (दानादि) पूरी श्रद्धा के साथ पितरों के निमित्त किया जाए, वह श्राद्ध है। श्राद्ध की एक विशेष श्लोकात्मक परिभाषा ब्रह्म पुराण में मिलती है जो इस प्रकार है :
देशे काले च पात्रे च श्रद्धया विधिना च यत्। पितृनुद्दिश्य विप्रैस्तु दत्तं श्राद्धमुदाहृतम्॥
अर्थ: उचित स्थान (देश), उचित समय (काल), और योग्य व्यक्ति (पात्र) को ध्यान में रखते हुए, विधिपूर्वक अर्थात शास्त्रों में बताई गयी विधि के अनुसार; पितरों के निमित्त जो दान श्रद्धापूर्वक दिया जाता है, उसे श्राद्ध कहते हैं।
भविष्य पुराण के अनुसार – भविष्य पुराण में श्राद्ध के मूल तत्व ‘श्रद्धा’ पर बल दिया गया है: “श्रद्धया दीयते यस्मात् श्राद्धं तेन निगद्यते।”
अर्थ: क्योंकि यह कर्म पूरी तरह से श्रद्धा के साथ किया जाता है, इसीलिए इसे ‘श्राद्ध’ कहा जाता है।
कल्पतरु के अनुसार : श्राद्ध की वैज्ञानिक परिभाषा देते हुए कल्पतरु ग्रंथ में कहा गया है: पितृनुद्दिश्य द्रव्यत्यागो ब्राह्मणस्वीकारपर्यन्तं श्राद्धम्।
अर्थ: पितरों को लक्ष्य करके, किसी द्रव्य (भोजन, धन, वस्त्र) का इस प्रकार त्याग करना कि वह ब्राह्मण द्वारा स्वीकार किया जाए, श्राद्ध कहलाता है।
हेमाद्रि में इस प्रकार श्लोक मिलता है : होमश्च पिण्डदानश्च तथा ब्राह्मणभोजनम् । श्राद्ध शब्दाभिधेयं स्यादेकस्मिन्नौपचारिके ॥
अर्थ : होम, पिण्ड दान और ब्राह्मण भोजन औपचारिक रूप ये तीनों क्रियायें जब पितृरों के निमित्त किये जायें तो उसे श्राद्ध कहा जाता है।
पितृनुद्दिश्य विप्रेभ्यो दत्तं श्राद्धमुदाहृतम् ॥ – ब्रह्माण्ड पुराण के इस वचन से भी यही स्पष्ट होता है कि पितरों को निमित्त करके ब्राह्मणों को जो अन्न-वस्तु आदि श्रद्धापूर्वक दी जाती है उसी को श्राद्ध कहते हैं।
होमश्च पिण्डदानश्च तथा ब्राह्मण भोजनम् – इस पद से श्राद्ध के तीन मुख्य अङ्ग सिद्ध होते हैं – होम, पिण्डदान और ब्राह्मण भोजन। किन्तु ऐसा नहीं कि सर्वत्र अनिवार्य ही हैं और इनमें से कोई एक अंग न किया जाय तो उसे श्राद्ध नहीं कह सकते। ब्राह्मण भोजन और पिण्डदान दोनों स्वतंत्र रूप से भी परिस्थिति विशेष में किये जा सकते हैं। जब पिण्डदान का निषेध हो तो मात्र ब्राह्मणभोजन ही श्राद्ध के रूप में किया जा सकता है। अर्थात ये तीनों अंग सम्मिश्रित रूप से ही श्राद्ध होते ऐसा नहीं अपितु स्वतंत्र रूप से भी श्राद्ध ही कहलाते हैं।

श्राद्ध का अर्थ : श्राद्ध का अर्थ श्रद्धा पूर्वक देना या श्रद्धा पूर्वक किया गया कर्म होता है।
श्राद्ध के मुख्य तत्व
“शास्त्रों में श्राद्ध को किस प्रकार परिभाषित किया गया है? ‘संपूर्ण कर्मकांड विधि’ के इस लेख में पढ़ें ब्रह्म पुराण, भविष्य पुराण और मिताक्षरा के अनुसार श्राद्ध की प्रामाणिक परिभाषा। जानें श्रद्धा और श्राद्ध के बीच का गहरा आध्यात्मिक संबंध और पितृ कार्य का मूल अर्थ।”
उपरोक्त प्रमाणों के आधार पर श्राद्ध के चार मुख्य छः सिद्ध होते हैं, जिन्हें यदि षडङ्ग कहा जाय तो अतिशयोक्ति न होगी किन्तु शास्त्रों में ऐसा को प्रयोग नहीं मिलता है अर्थात प्रामाणिक रूप से हम इन्हें श्राद्ध के षडङ्ग घोषित नहीं कर सकते :
- देश : श्राद्ध के लिये उचित स्थान का चयन अथवा श्राद्ध के उचित स्थान की प्राप्ति होना जैसे तीर्थ।
- काल : श्राद्ध के लिये उचित काल जो शास्त्रों में वर्णित है उसका विचार करना।
- श्रद्धा: कर्ता के मन में पितरों के प्रति पूर्ण श्रद्धा और सम्मान।
- द्रव्य: हविष्यान्न, जल, तिल, कुशा और पुष्प आदि।
- पात्र: विद्वान और सदाचारी ब्राह्मण (जो जन्मना ब्राह्मण भी हो)।
- विधि: शास्त्रों (जैसे गृह्यसूत्र, स्मृति, पुराण) में वर्णित पद्धति।
श्राद्ध के मुख्य अंग
होमश्च पिण्डदानश्च तथा ब्राह्मण भोजनम् – अर्थात होम, पिण्डदान और ब्राह्मण भोजन ये तीन श्राद्ध के मुख्य अंग होते हैं। एकोद्दिष्ट में होम तो नहीं होता किन्तु पिण्डदान और ब्राह्मण भोजन होते हैं। पार्वण श्राद्ध में होम, ब्राह्मण भोजन और पिण्डदान तीनों होते हैं। इन विषयों की पृथक विस्तृत चर्चा की गयी है।
श्राद्ध में सर्वाधिक आवश्यक तत्व
हम श्राद्ध विषयक जितने भी अध्ययन करें हमें श्राद्ध में विषय में एक तत्व जो सर्वाधिक आवश्यक है वह “श्रद्धा” है यही ज्ञात होता है। शास्त्रानुसार, श्रद्धाहीन व्यक्ति द्वारा किया गया तर्पण या दान पितरों तक नहीं पहुँचता। यदि कर्मकांड और भोज का बहुत विस्तृत आयोजन करें किन्तु वह श्रद्धा से रहित हो तो श्राद्धसंज्ञक नहीं कहलायेगा। अतः श्राद्ध के विषय में जानने का जो सबसे बड़ा विषय है वह है “श्रद्धा” क्योंकि इसी से श्राद्ध शब्द बनता है।

श्राद्ध महिमा – प्रमाण संकलन
विद्वानों के निमित्त अब श्राद्ध महिमा को व्यक्त करने वाले जो परिभाषा अर्थात श्राद्ध के बारे में भी ज्ञानवर्द्धक हैं उन शास्त्रोक्त प्रमाणों को यहां संकलित किया जा रहा है जो इस परिभाषा प्रकरण के लिये अति-उपयोगी सिद्ध होगा और श्राद्ध के विषय में विस्तृत जानकारी प्रदान करने वाला है :
श्राद्धात्परतरं नान्यच्छ्रेयस्वरमुदाहृतम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं कुर्याद्रिचक्षणः ॥ – सुमन्तु
अरोगः प्रकृतिस्थश्च चिरायुः पुत्रपौत्रवान् । अर्थवानर्थकामी च श्राद्धकामो भवेदिह ॥ परत्र च परां तुाष्टं लोकांश्च विविधान् शुभान् । श्राद्धकृत्समवाप्नोति यशश्च विपुलं नरः ॥ – देवल
आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्षं सुखानि च । प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीता नृणां पितामहाः ॥ – याज्ञवल्क्य
ये यजन्ति पितॄन् देवान् ब्राह्मणान् सहुताशनान् । सर्वभूतान्तरात्मानं विष्णुमेव यजन्ति ते ॥
आयुः पुत्रान् यशस्स्वर्ग कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम् । पशून् सुखं धनं धान्यं प्राप्नुयात्पितृपूजनात् ॥ – यम
मार्कण्डेय पुराण से
पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः । पिण्डसम्बन्धिनो होते विज्ञेयाः पुरुषास्त्रयः ॥
लेपसम्बन्धिनस्त्वन्ये पितामहपितामहात् । प्रभृत्युक्तास्त्रयस्तेषां यजमानश्च सप्तमः ॥
तथाऽन्ये पूर्वजास्स्वर्गे येचान्ये नरकौकसः । ये च तिर्यक्त्वमापन्ना ये च भूतादिसंस्थिताः ॥
तांत्सर्वान्यजमानो वै श्राद्धं कुर्वन्यथाविधि । समाप्याययते वत्स येन येन शृणुष्व तत् ॥
अन्नप्रकिरणं यत्तु मनुष्यैः क्रियते भुवि । तेन तुष्टिमुपायान्ति ये पिशाचत्वमागताः ॥
यदम्बु स्नानवस्त्रोत्थं भूमौ पतति पुत्रक । तेन ये तरुतां प्राप्तास्तेषां तृप्तिः प्रजायते ॥
यास्तु गन्धाम्बुकणिकाः पतन्ति धरणीतले । ताभिराप्यायनं तेषां ये देवत्वं कुले गताः ॥
उद्धृतेषु तु पिण्डेषु याश्चात्र कणिका भुवि । ताभिराप्यायनं तेषां ये तिर्यक्त्वं कुळे गताः ॥
ये चादन्ताः कुले बालाः क्रियायोग्या ह्यसंस्कृताः । विपन्नास्ते तु विकिरसंमार्जनजलाशिनः ॥
भुक्त्वा चाचमतां यच्च जलं यच्चाङ्गिसेचने । ब्राह्मणानां तथैवान्ये तेन तृप्तिं प्रयान्ति वै ॥
तेनानेककुले तत्र तत्तद्योन्यन्तरं गताः । प्रयान्त्याप्यायनं वत्स सम्यक् श्राद्धक्रियावताम् ॥
य एवं वेत्ति मतिमांस्तस्य श्राद्धफलं भवेत् । उपदेष्टाऽनुमन्ता च लोके तुल्यफलौ स्मृतौ ॥
इमं श्राद्धविधि पुण्यं कुर्याद्वाऽपि पठेत्तु यः । सर्वकामैस्स बन्नाति ह्यमृतत्वं च विन्दति ॥
:- बृहस्पति
श्राद्धात्परतरनास्ति श्रेयस्कर मुदाहृतम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन आङ्कुर्याद्विचक्षणः ॥ – कूर्म पुराण
योऽनेन विधिना श्राद्धं कुर्याद् वै शान्तमानसः । व्यपेतकल्मषो नित्यं याति नावर्तते पुनः ॥ – कूर्मपुराण
निष्कर्ष: पितृ-ऋण से मुक्ति का मार्ग
“पितृनुदेशेन श्रद्धया त्यक्तस्य द्रव्यस्य ब्राह्मणैर्यत्स्वीकरण तच्छ्राद्धम्”

उपरोक्त शास्त्रोक्त प्रमाणों से यह स्पष्ट है कि श्राद्ध केवल एक बाह्य कर्मकांड या औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का एक सूक्ष्म विज्ञान है और श्राद्ध करके पितरों को तृप्त करना हमारा दायित्व होता है। जब हम श्रद्धापूर्वक शास्त्रों में वर्णित विधि से अन्न और जल का त्याग करते हैं, तो वह ‘कव्य’ (पितरों का आहार) बनकर उन्हें तृप्ति प्रदान करता है।
श्राद्ध केवल मृत व्यक्ति की स्मृति में किया गया भोज नहीं है, अपितु उनके प्रति श्रद्धा रखते हुये अपने दायित्व का निर्वहन करना है। यह स्वीकारोक्ति है कि हमारा अस्तित्व हमारे पूर्वजों के कारण है। अतः प्रत्येक सनातनी को अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार शास्त्रोक्त विधि से श्राद्ध कर्म अवश्य करना चाहिए।
॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
“संबंधित प्रश्न” (FAQ)
प्रश्न: क्या बिना मंत्रों के श्राद्ध संभव है?
उत्तर: शास्त्र कहते हैं कि यदि सामर्थ्य न हो, तो केवल निर्जन स्थान में जाकर श्रद्धापूर्वक दक्षिण दिशा की ओर हाथ उठाकर पितरों का स्मरण करने से भी वे तृप्त हो जाते हैं, किन्तु मन्त्र की आवश्यकता यहां भी होती है। सामर्थ्य होने पर तो विधि विधान का पालन अनिवार्य है ही। अर्थात बिना मंत्रों के श्राद्ध नहीं हो सकता किन्तु आभासी जगत में तो स्वेच्छाचारी वर्ग ही अधिक ज्ञान बांट रहा है और वो शास्त्रविरुद्ध कुतर्क मात्र का आश्रय लेकर जनमानस को इन विषयों में दिग्भ्रमित कर रहे हैं और जनमानस को इसके लिये सावधान रहने की आवश्यकता है।
प्रश्न: श्राद्ध का असली मतलब क्या है?
उत्तर : शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध का वास्तविक तात्पर्य पितरों के निमित्त किया गया कर्म है जिसके तीन मुख्य अंग हैं – होम, पिण्डदान और ब्राह्मण भोजन – “होमश्च पिण्डदानश्च तथा ब्राह्मण भोजनम्“।
प्रश्न: क्या केवल गया जी जाने से श्राद्ध की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है?
उत्तर : नहीं, गया जी जाना और वहां पिण्डदान करना तो तीर्थश्राद्ध का एक प्रकार है जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसका तात्पर्य अन्य प्रकार के श्राद्धों का समाप्त होना नहीं है जैसे वार्षिक श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध, महालय श्राद्ध, नान्दी श्राद्ध आदि।
प्रश्न: क्या केवल पुत्र ही श्राद्ध करने का अधिकारी है?
उत्तर: प्रधानता पुत्र की है, किंतु पुत्र के अभाव में शास्त्रीय व्यवस्था अनुसार पत्नी, भाई, भतीजा, नाती (दौहित्र) या कुल का कोई भी पुरुष सदस्य श्राद्ध कर सकता है। धर्मसिन्धु के अनुसार, यदि कोई भी पुरुष उपलब्ध न हो, तो पुत्री या पुत्रवधू भी पितरों की सद्गति के लिए पूर्ण श्रद्धा के साथ श्राद्ध कर्म संपन्न कर सकती है।
प्रश्न: क्या महिलाएं श्राद्ध कर सकती हैं?
उत्तर : हां स्त्रियां भी श्राद्ध कर सकती हैं अपितु पत्नी के बिना तो पति भी श्राद्ध नहीं कर सकता अथवा यदि अनिवार्य हो तो आम श्राद्ध कर सकता है अथवा विकल्प में कुशा की वेणी बनाकर पत्नी का प्रतीक धारण करके कर सकता है। स्त्रियों के लिये श्राद्ध की विधि में किञ्चित अंतर होता है कि वो वेद मंत्र, प्रणव, स्वधा का प्रयोग नहीं कर सकती। किन्तु स्त्रियां श्राद्ध कर सकती हैं शास्त्रों में ऐसा ही वर्णन है।
प्रश्न: यदि पितर पुनर्जन्म लेकर मनुष्य या पशु बन चुके हैं, तो श्राद्ध का अन्न उन तक कैसे पहुँचता है?
उत्तर: मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, जिस प्रकार गाय का बछड़ा अपनी माँ को झुंड में भी ढूंढ लेता है, उसी प्रकार श्राद्ध के समय बोले गए नाम और गोत्र के मंत्र उस आहुति को ऊर्जा (Energy) में बदल देते हैं। हमारे द्वारा दिया गया भोजन ‘विश्वदेव’ और ‘अग्निष्वात्त’ नामक दिव्य पितरों के माध्यम से आपके पितर जिस भी योनि में हैं, उन्हें उसी योनि के अनुकूल भोजन (अमृत, तृण या अन्न) के रूप में प्राप्त होता है।
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कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








