कर्मकांड में पूजा, पाठ, जप, हवन, अनुष्ठान, यज्ञ, प्राण प्रतिष्ठा, नित्यकर्म, नैमित्तिक कर्म, शांति कर्म, श्राद्ध किसी भी प्रकार का कोई भी कर्म हो कर्म से पूर्व उस कर्म का संकल्प करना आवश्यक होता है। संकल्परहित कर्म का औचित्य ही नहीं होता। संकल्प हेतु हेमाद्रि संकल्प जैसे विस्तृत संकल्प से लेकर अत्यंत लघु संकल्प का भी विधान पाया जाता है और कर्म-काल आदि के अनुसार विवेकानुसार संकल्प का प्रयोग किया जाता है। इस आलेख में लघु संकल्प मंत्र, सरल संकल्प मंत्र और विस्तृत संकल्प मंत्र दिया गया है।
संकल्प विधि और मंत्र
संकल्प का अर्थ
संकल्प : “सं” अर्थात सम्यक रूप से, उत्तम प्रकार से, उत्तम विधि, उच्चतम आदर्श पालन पूर्वक आदि। “कल्प” – अर्थात विशेष कालखण्ड के लिये किसी विशेष विधि-नियम-अनुष्ठान आदि को धारण करने की कल्पना करना, चिंतन करना, प्रतिज्ञा करना आदि। कल्प एक ब्रह्मा की आयु अर्थात 1000 चतुर्युगी का भी मान कहलाता है। यहां भी एक विशेष कालखण्ड ही आशय है। इस प्रकार अर्थानुसार संकल्प को परिभाषित किया जा सकता है।
संकल्प की परिभाषा
एक विशेष शुभ कालखण्ड की कल्पना करते हुये, उत्तम या कल्याणकारी विधि-नियम-आदर्श-अनुष्ठान आदि को धारण करने की प्रतिज्ञा करना, संकल्प कहलाता है।
संकल्प मंत्र
संकल्प करते समय मन को शान्त रखना चहिये एवं भाव करना चहिये कि इस कर्म के द्वारा इच्छित फ़ल कि प्राप्ति होगी। दाहिने हाथ में पान-सुपाड़ी-तिल-जल-चन्दन-फल-फूल-तुलसी-द्रव्य आदि लेकर बांयें हाथ से दाहिने हाथ की कलाई को पकड़ कर संकल्प करना चाहिए।
यहाँ हम ३ प्रकार के संकल्प वाक्य दे रहे हैं। पहला प्रकार लघु संकल्प स्वयं भी आसानी से कर सकते हैं, दूसरे प्रकार के सामान्य संकल्प के लिए थोड़ी जानकारी रखनी पड़ेगी, तीसरा विशेष संकल्प प्रकार कर्मकांडी ब्राह्मणों के लिए है जो विशेष अनुष्ठान में किये जाते हैं और चौथा महा संकल्प यज्ञादि में किये जाते हैं।
लघु संकल्प मंत्र
“ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्यैतस्य (रात में : अस्यां रात्र्यां कहे) मासोत्तमे मासे ………. २ मासे ………… ३ पक्षे ………… ४ तिथौ …………५ वासरे ………… ६ गोत्रोत्पन्नः ………… ७ शर्माऽहं (वर्माऽहं/गुप्तोऽहं) ममात्मनः सर्वारिष्ट निरसन पूर्वक सर्वपाप क्षयार्थं, दीर्घायु शरीरारोग्य कामनया धन-धान्य-बल-पुष्टि-कीर्ति-यश लाभार्थं, श्रुति स्मृति पुराणतन्त्रोक्त फल प्राप्तयर्थं, सकल मनोरथ सिध्यर्थं …………… ८ करिष्ये।”
सरल संकल्प मंत्र
“ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरूषस्य, विष्णोराज्ञया प्रवर्त्तमानस्य अद्य (रात में : अस्यां रात्र्यां कहे) ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीये परार्द्धे श्रीश्वेत वाराहकल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भारतवर्षे भरतखण्डे जम्बूद्वीपे आर्यावर्तैक देशान्तर्गते ……… १ संवतसरे महांमागल्यप्रद मासोतमे मासे ……. २ मासे ……… ३ पक्षे ……… ४ तिथौ ………५ वासरे ……… ६ गोत्रोत्पन्नः ……… ७ शर्माऽहं (वर्माऽहं/गुप्तोऽहं) ममात्मनः श्रुति स्मृति पुराणतन्त्रोक्त फलप्राप्तये ग्रहदोष, दैहिक, दैविक, भौतिक – त्रिविध ताप निवार्णार्थं सर्वारिष्ट निरसन पूर्वक सर्वपाप क्षयार्थं मनसेप्सित फल प्राप्ति पूर्वक, दीर्घायु शरीरारोग्य कामनया धन-धान्य-बल-पुष्टि-कीर्ति-यश लाभार्थं, सकल आधि, व्याधि, दोष परिहार्थं सकल मनोरथ सिध्यर्थं …………… ८ करिष्ये।”
(१ संवत्सर का नाम, २ महीने का नाम, ३ पक्ष का नाम, ४ तिथि का नाम, ५ दिन का नाम, ६ अपने गोत्र का नाम, ७ ब्राह्मण शर्माऽहं, क्षत्रिय वर्माऽहं, वैश्य गुप्तोऽहं और शूद्र दासोऽहं कहें, ८ जो कर्म पूजा/जपादि करना हो उसका उच्चारण करे।)
यदि और दृढ़ या बृहद् संकल्प करना हो तो आगे बृहद् संकल्प भी दिया गया है। यदि स्वयं संकल्प करना हो तो सरल संकल्पादि का ही ग्रहण करे क्योंकि बृहद् संकल्प में त्रुटि आदि होने की संभावना होगी। ब्राह्मण जब संकल्प करा रहे हों तो बृहद् संकल्प भी विवेकानुसार कराते हैं।
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