“तुमने अपना सवर्णत्व उसी दिन खो दिया था, जिस दिन तुमने संस्कारों का त्याग किया था।”
देश की वर्त्तमान परिस्थिति का यदि अवलोकन करते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि सवर्णों का अस्तित्व ही संकट में है। पीड़ित, दलित, शोषित, वंचित और न जाने क्या-क्या शब्द गढ़ लिये गए और इसके पीछे का उद्देश्य सवर्णों का वैधानिक उत्पीड़न करना था जो कि किया जा रहा है। न ही योग्यता का सम्मान है, न ही धर्म और धार्मिक आस्था का, न तो रोटी का अधिकार है और न ही बेटी का। सरकारें और शासन व्यवस्था हर प्रकार से सवर्णों की रोटी-बेटी वैधानिक रूप से हड़प कर सार्वजनिक वितरण की व्यवस्था कर रही है।
कारण की बात करें तो यह लोकतांत्रिक सिद्धांत और सत्ता का दुरुपयोग ज्ञात होता है किन्तु यह वास्तविकता नहीं है। वास्तविक कारण कुछ और है और उसका आधार शास्त्र में निहित है एवं शास्त्रीय दृष्टिकोण से इस विषय का कारण ढूंढना आवश्यक है क्योंकि यदि रोग ज्ञात न हो तो उचित चिकित्सा भी नहीं की जा सकती। उचित चिकित्सा तभी संभव है जब व्याधि की वास्तविकता ज्ञात हो जाये। इसी कारण यह चर्चा बहुत ही महत्वपूर्ण है और उन सभी सवर्णों के लिये ऑंखें खोलने वाली है जो स्वयं को वैधानिक रूप से उत्पीड़ित अनुभव कर रहे हैं।
सवर्णों का अस्तित्व संकट में – क्यों ?
“जिस धर्म की तुमने कभी रक्षा नहीं की, आज उसकी दुहाई किस मुँह से दे रहे हो?”
सर्वप्रथम तो एक भ्रम को दूर कर लेना अनिवार्य है कि विश्व का कोई भी कोना हो यह भेद सर्वत्र दिखेगा और इसको मिटाया नहीं जा सकता क्योंकि ये स्वाभाविक है एवं रहेगा ही रहेगा किन्तु इसको मिटाने के नाम पर बहुत बड़ी राजनीति की जाती है ये है भेदभाव या असमानता का निस्तारण। किसी भी प्रकार का भेदभाव कहें, असमानता कहें ये व्यवस्था के व्यवस्थित रूप से चलने की अनिवार्यता है। यदि सर्वविध समानता हो जाये, भेदभाव का निस्तारण हो जाये तो व्यवस्था ही चौपट हो जाये। कुछ उदाहरण :
यदि सभी स्त्री अथवा सभी पुरुष हो जायें और भेद भाव, असमानता मिट जाये तो आगे की व्यवस्था क्या होगी सोचिये। अरे सृष्टि ही समाप्त हो जायेगी, स्त्री-पुरुष दोनों के भेदभाव, असमानता के कारण ही सृष्टि चलता है।
यदि राजा-रंक का भेद समाप्त हो जाये अथवा उच्च, मध्यम और निम्न वर्ग सभी में एक बार से सम्पूर्ण संपत्ति का समान विभाजन कर दिया जाये तो क्या होगा ?
- अरे व्यवस्था ही चौपट हो जायेगी, हर व्यक्ति काम करने वाले को ढूंढेगा किन्तु कहीं कोई काम करने वाला नहीं बचेगा, सभी भोग में लिप्त हो जायेंगे।
- न तो किसी को दाने-दाने के लाले पड़ जायेंगे, घर गिर जायेगा किन्तु कोई ठीक करने वाला नहीं मिलेगा।
- सभी अस्वस्थ हो जायेंगे किन्तु कोई चिकित्सा करने वाला नहीं मिलेगा।
- कहोगे सारे काम मशीनों से कर लेंगे अरे मशीनों को बनाने के लिये, ठीक करने के लिये तो श्रमिक चाहिये न।
- अपना हेलीकॉप्टर तो ले लोगे लेकिन चलाने वाला पायलट नहीं मिलेगा और सोचो यदि सबने स्वयं ही हेलीकॉप्टर चलाना सीख लिया तो ही क्या सब हेलीकॉप्टर लेकर आकाश में टकराने नहीं लगेंगे।
- पैसे तो होंगे किन्तु सड़कें बनाने वाले नहीं होंगे, पैदल ही चलना होगा।
यदि कहो कि अपना हाथ जगन्नाथ, सब अपना-अपना काम स्वयं करेंगे, अरे कौन-कौन से काम सीखोगे और कितना काम कर लोगे ?
- गाड़ी चलाना तो सीख लोगे किन्तु सड़कें भी बना लोगे क्या ?
- चापाकल, पम्प लगाना और ठीक कर लोगे क्या ?
- बिजली के उपकरणों को बनाना और ठीक कर लोगे क्या ?
- कृषि-पशुपालन से लेकर भोजन बनाने तक का सभी कार्य भी कर लोगे क्या ?
- वाहनों का बनाकर ठीक भी कर लोगे क्या ?
- घर भी स्वयं ही बना लोगे क्या ?
अरे बहुत सारे काम तो होंगे यदि सीखकर करने की बात भी करो तो कितना काम कर लोगे और दिन भर मशीन की तरह काम ही करते रहे तो फिर उस संपत्ति का क्या लाभ जो तुम्हें मिला ?
अब दूसरी बात आती है की चलो नये स्तर से समान वितरण हो गया तो क्या आगे फिर इस समानता को बनाये रख लोगे ? दो भाइयों में संपत्ति का तो समान वितरण ही होता है किन्तु आगे जाकर दोनों की संपत्ति समान रहती है क्या ? अपने आस-पास भी ढेरों उदाहरण मिलेंगे थोड़ा देखो और राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा उदाहरण है अंबानी बंधू देख लो।
अंततः उपरोक्त तथ्यों का निचोड़ यह है कि भेदभाव, असमानता आदि की राजनीति करते हुये समानता का जो राग अलापा जाता है वह जनसामान्य को मूर्ख बनाया जाता है।
यदि एक बार को सभी पक्ष समानता के लिये तैयार हो जायें और सर्वप्रकारेण समान वितरण हो जाये “जिसकी जीतनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी” ही नहीं देश की सभी सम्पत्तियों का भी समान वितरण कर दिया जाये तो भी ये समानता क्षणभंगुर होगी और कुछ ही दिनों में पूरी अर्थव्यवस्था ही चौपट हो जायेगी। ये नेताओं की धूर्तता है जो जनमानस को समानता का झूठा पाठ पढ़ा रहे हैं।
यहां हमारा उद्देश्य मात्र यह है कि आलेख का जो मूल विषय है उसे समझने के लिये सर्वप्रथम इस भ्रम का त्याग करना आवश्यक है। इसी प्रकार से वर्णव्यस्था को भी भेदभाव सिद्ध किया जा रहा है और यह भी स्वयं में भ्रामक है बस घृणित राजनीति है और कुछ नहीं। इसका कारण स्वयं लोकतंत्र है और यह लोकतंत्र का दुर्गुण है कि विश्वभर में गृहयुद्ध होगा एवं भारत संभवतः गृहयुद्ध में प्रविष्ट हो चुका है; वर्त्तमान की घटनायें कुछ यही संकेत कर रहे हैं।

सीमांकन
“अपनी सीमा को जानो और सीमा में रहो यही लाभकारी है“
वर्णव्यवस्था अनादि काल से चली आ रही है और ऐसा कुछ नहीं हो गया है कि वर्त्तमान में इसकी आवश्यकता नहीं है अथवा यदि आगे बढकर कहें तो यह निर्णय करने का ही किसी को अधिकार नहीं है कि वर्णव्यवस्था की आवश्यकता है अथवा नहीं, वर्णव्यवस्था को समाप्त कर देना चाहिये आदि क्योंकि तुमने बनाया ही नहीं हैं, यह ईश्वरकृत व्यवस्था है। अर्थात जो कोई भी वर्ण और जाति व्यवस्था को नष्ट करने की बात करता है वह ईश्वरीय व्यवस्था का विरोधी है, सनातन धर्म का शत्रु है।
जिस प्रकार तुम पंचभूतों को नष्ट नहीं कर सकते हो भले ही प्रदूषित कितना भी कर दो, उसी प्रकार तुम वर्णव्यवस्था को भी नष्ट नहीं कर सकते हो हां वर्णसंकर जितने उत्पन्न कर दो। जिस प्रकार प्रदूषण का दंश भी तुम्हीं को झेलना पड़ रहा है उसी प्रकार वर्णसंकरों का दंश भी झेलना होगा, धार्मिक प्रदूषण का दंश भी झेलना होगा।
प्रत्येक वस्तु, व्यवस्था आदि की एक सीमा होती है और उस सीमा में रहना उसके स्वयं के लिये अपरिहार्य होता है। यदि मछली अपनी सीमा जल से बाहर निकले तो उसके लिये ही घातक है, हिंसक पशु गांव-शहर में प्रवेश कर जायें तो उसके लिये ही घातक सिद्ध होता है, सर्प यदि लोगों के घर में प्रवेश करते हैं तो उनके लिये ही घातक होता है। चोर की भी सीमा होती है कि चोरी से चोरी करे, दिखा कर न करे और यदि दिखाकर करे तो संकट में फंस जाता है। भोजन की भी सीमा है और उस सीमा का अतिक्रमण करने पर अस्वस्थ हो जाते हैं।
इसी प्रकार दस्युओं की भी सीमा थी और आज वो अपनी सीमा का अतिक्रमण करके शासन व्यवस्था में प्रविष्ट हो गए हैं। स्पष्ट है जैसे हिंसक पशु गांव-नगर में आ जाये, सर्प लोगों के घर में आ जाये तो कुछ हानि पहुंचाता ही है किन्तु अंततः उसका अंत हो ही जाता है। उसे मिला क्या, भोजन आदि तो जहां रहता था वहां अच्छे से प्राप्त कर ही रहा था न।
यदि हिंसक पशु गांव-नगर में आकर दो-चार लोगों का शिकार कर ही लेते हैं तो उन्हें क्या मिला “भोजन” ही मिला न किन्तु इसके पश्चात मृत्यु मिलती है, वर्त्तमान में व्यवस्थागत रूप से कुछ अन्य व्यवस्था है किन्तु ये को सार्वभौमिक और सार्वकालिक व्यवस्था नहीं है जो हमें दूरदर्शन पर दिखाया जाता है। इसी पर तो एक मुहावरा प्रसिद्ध है “जब गीदर की मौत आती है तो शहर की ओर भागता है” और यही सार्वभौमिक व सार्वकालिक व्यवस्था है।

“जब गीदर की मौत आती है तो शहर की ओर भागता है” इस नियम में थोड़ा सा परिवर्तन कर लें और गीदर के स्थान पर दस्यु कर दें तो क्या हो जाता है : “जब दस्यु की मौत आती है तो शहर की ओर भागता है”, एक गीदर की तुलना में दस्यु अधिक घातक होता है।
वास्तविकता यही है, कटुसत्य यही है और यही होगा किन्तु इसके लिये तो देश में गृहयुद्ध होगा न। कुछ हानि सवर्णों की भी होगी ही न (सवर्ण का तात्पर्य चारों वर्ण है – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र), सामान्य लोगों/नागरिकों की भी होगी ही न किन्तु अंत किसका होगा जिसने सीमा का अतिक्रमण किया है उसका होगा।
दस्यु स्पष्टीकरण :
“जब गीदड़ की मौत आती है, तो वह शहर की ओर भागता है; जब दस्यु की मौत आती है, तो वह शासन की ओर भागता है।”
दस्यु का तात्पर्य किसी वर्ण-जाति-सम्प्रदाय आदि से नहीं है अपितु एक ऐसे आपराधिक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति/समूह आदि से है जो अराजकतावादी होते हैं। प्राचीन काल में ऐसे लोगों को समाज और राज्य से बहिष्कृत कर दिया जाता था। ऐसे दण्डित व्यक्तियों का समूह जंगल आदि में भी अराजकता ही उत्पन्न करता था। वर्त्तमान में हम देख रहे हैं कि ऐसे ही लोग शासन व्यवस्था तक पहुंच बना चुके हैं।
भारत में सनातन, ब्राह्मण, देवी-देवताओं, शास्त्रों आदि के प्रति अभद्र वक्तव्यादि आये दिन सुनने को मिलते रहते हैं। मनुवादी, ब्राह्मणवाद, तिलक-तराजू और तलवार जैसे शब्द भी सुनने को मिलते हैं। ये वास्तव में वो लोग ही कर रहे हैं जो स्वयं को भारतीय संस्कृति का अंग नहीं मानते चाहे भौतिक धरातल पर हो अथवा वैचारिक धरातल पर।
अपनी स्वाभाविक अराजक प्रवृत्ति के कारण ही ये लोग वर्णव्यवस्था, धर्म, शास्त्र, ब्राह्मण आदि के विरुद्ध बकवास करते रहते हैं और शासन में पहुंच बना चुके हैं इस कारण सरकारें इनको किसी प्रकार से रोकने का प्रयास नहीं करती अपितु प्रोत्साहित और संरक्षित करने का ही प्रयास करती है।
वर्णव्यवस्था और परस्पर द्वेष के कारण
ये दस्यु देश भर में दस्युराज की स्थापना चाहते हैं और इस कारण जो मूल बाधा है सामान्य लोग अर्थात सवर्ण वर्ग उसे अपने रास्ते का पत्थर समझते हैं। यहां सवर्ण के विषय में भी एक तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है कि सवर्ण का तात्पर्य द्विजाति नहीं है अर्थात शूद्र वर्ण रहित त्रिवर्ण नहीं। द्विजाति का तात्पर्य भिन्न होता है और सवर्ण का तात्पर्य भिन्न है।
सवर्ण में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्ण आते हैं अर्थात शूद्र भी सवर्ण ही होता है किन्तु इन अराजकतावादियों ने शूद्र वर्ण को दिग्भ्रमित कर दिया कि वो सवर्ण नहीं है और सवर्ण का एक मनगढंत अर्थ समझा दिया कि वो वर्ग जो संभ्रांत है, संपन्न है, धर्म में विशेष आस्था रखता है। शूद्र के लिये जो शास्त्रविहित है उसकी चर्चा तो नहीं करता, जो विशेषाधिकार है उसकी चर्चा तो नहीं करता किन्तु जो प्रतिषिद्ध है दिग्भ्रमित करने के उद्देश्य से उसकी चर्चा करता है और उत्पीड़न आदि सिद्ध करता है।

चिंतन का विषय है कि चार वर्ण हैं और कुछ दशक पूर्व तक किसी वर्ण में परस्पर द्वेष नहीं था, द्विजाति (त्रिवर्ण) में आज भी वर्णपरक द्वेष नहीं है, क्षत्रिय और वैश्य स्वयं ही ब्राह्मणों को आज भी श्रेष्ठ स्वीकारते हैं, पूजा करते हैं। फिर ऐसा क्या हो गया कि सवर्ण में से एक शूद्र वर्ण ब्राह्मण से द्वेष करने लगा। वास्तव में यह राजनीति प्रेरित है और अब गांवों में भी प्रवेश कर रहा है एवं इसका मूल वही दस्यु वर्ग का शासन में पैठ कर जाना है।
सवर्णों का अस्तित्व
“रोटी-बेटी की सुरक्षा कानून से नहीं, कुल-धर्म और संस्कार के पालन से होती है।”
अब आगे बात सवर्णों के अस्तित्व की आती है और यहां पर दो प्रश्न उत्पन्न होता है कि यह व्यवस्था ईश्वरीय है अथवा नहीं और क्या इसका अंत संभव है ? इसके पश्चात् यह प्रश्न आता है जो कि गंभीर है और चतुर्दिक हो रहा है “क्या सवर्णों का अस्तित्व संकट में है?”
सबसे प्रथम प्रश्न का स्पष्ट उत्तर शास्त्रों में मिलता है कि हाँ यह ईश्वरीय व्यवस्था है “चतुवर्ण्यं मया सृष्टं” आगे इस व्यवस्था के संबंध में यह भी प्रश्न होगा कि ये तो गीता में कहा गया है क्या वेदों में है तो हां वर्णव्यवस्था का वर्णन वेदों में भी मिलता है। एक ऋचा “ब्राह्मणोस्य मुखमासित्” (पुरुषसूक्त में) है ही सभी कहते सुनते रहते हैं और दूसरी ऋचा जो नहीं जानते वो भी कर्मकांड में व्यापक रूप से प्रयोग होता है :
आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् । आ राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽति व्याधी महारथो जायताम् ।
दोग्ध्री धेनुर्वोढाऽनड्वानाशुः सप्तिः पुरन्धिर्योषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम् ॥
इसमें भी वर्णव्यवस्था का वर्णन है और इसी प्रकार और भी ऋचायें हैं जो सिद्ध करते हैं कि वर्णव्यवस्था भी अर्वाचीन काल से चली आ रही है एवं ईश्वरीय व्यवस्था है क्योंकि गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं घोषणा भी करते हैं एवं वेदों में भी वर्णन मिलता है।
अब दूसरा प्रश्न कि वर्णव्यवस्था का अंत संभव है अथवा नहीं ? सीधा सा उत्तर है नहीं। यह ईश्वर की व्यवस्था है और इसका अंत मनुष्य नहीं कर सकता है। मनुष्य किसी भी ईश्वरीय तत्व को नष्ट कर ही नहीं सकता हां रूपांतरित अवश्य कर सकता है किन्तु किसी भी तत्व को सम्पूर्णरूपेण रूपांतरित करके भी नष्ट नहीं कर सकता है यथा पंचतत्व जो मुख्य तत्व हैं।
मनुष्य परमाणु बम के माध्यम से पृथ्वी को भी नष्ट करने की बात तो कर रहा है किन्तु वो ये नहीं समझ रहा है कि पंचतत्व को नष्ट नहीं कर सकता। अनंत ब्रह्माण्ड में इस पृथ्वी की सत्ता भी एक सूक्ष्मातिसूक्ष्म कण के समान है।
हमारे शास्त्र बताते हैं कि सृष्टि-स्थिति-विनाश (प्रलय) आदि भी अनादि काल से होते ही रहे हैं एवं इसी प्रकार चलते रहेंगे। जब ईश्वर प्रलय की इच्छा करेगा तो मनुष्य उसमें निमित्त मात्र भूमिका का निर्वहन करेगा। चतुर्युग व्यवस्था चलती आ रही है प्रलय होता ही रहा है और आगे भी होगा ही, किन्तु यह ईश्वर के अधीन है।
इसमें एक बात और है जो शास्त्रों से ही ज्ञात होता है वो यह कि कलयुग में वर्णाश्रम-व्यवस्था दूषित हो जायेगा, सभी म्लेच्छाचारी हो जायेगें और यदि ऐसा हो रहा है एवं चतुर्दिक स्पष्ट दिख रहा है तो यही सिद्ध होता है कि शास्त्र सत्य हैं। हां सभी म्लेच्छाचारी हो जायेंगे ऐसा कथन है किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि हमें म्लेच्छाचारी बनने का अधिकार प्राप्त हो गया और म्लेच्छाचार करके भी हम सद्गति के अधिकारी होंगे।

ऐसा होगा किन्तु धर्म भी शत-प्रतिशत नष्ट नहीं होगा क्योंकि धर्म भी अनंत है, सनातन है। सदैव ही ईश्वर अवतरित होकर धर्म की स्थापना करते हैं एवं कालक्रम से पुनः धर्म की हानि व अधर्म की वृद्धि होती है एवं एक सीमा के पश्चात् भक्तों के आर्तनाद को सुनकर भगवान प्रकट होते हैं, अवतरित होते हैं व पुनः धर्म की स्थापना करते हैं। इस क्रम में अधर्मियों/असुरों का संहार करते हैं एवं धर्म व धर्म में स्थित वर्ग का संरक्षण भी करते हैं और यही है “धर्मो रक्षति रक्षितः”
क्या सवर्णों का अस्तित्व संकट में है?
यह प्रश्न वास्तव में गंभीर है और कुछ दशकों के घटनाक्रम को देखते हुये ऐसा प्रतीत होता है कि सवर्णों का अस्तित्व ही संकट में है क्योंकि शासन तंत्र ही सवर्णों के अस्तित्व को मिटाने चाहता है, अथक प्रयास कर भी रहा है। कानून बनाकर वैधानिक रूप से उत्पीड़न कर भी रहा है और इसी कारण उन सवर्णों को जो कि शास्त्रज्ञान से रहित हैं ऐसा प्रतीत होता है कि सवर्णों का अस्तित्व संकट में है।
इसको यदि दूसरे शब्दों में कहें तो म्लेच्छाचारियों को जिसने स्वयं ही अपना वर्णधर्म त्याग दिया है ऐसा लगता है और वो इसी प्रकार की राजनीति करना चाहते हैं। इस कारण सवर्णों को रोटी-बेटी की सुरक्षा का संकट दिखाई दे रहा है क्योंकि देश का शासन तंत्र वैधानिक रूप से यह कुकर्म कर रहा है।
आरक्षण के नाम पर सवर्णों की रोटी दशकों से छीन रहा है, अस्पृश्यता उन्मूलन, जातिवाद समापन, समता आदि के नाम पर सवर्णों की बेटियां छीनने का भी कुत्सित प्रयास कर रहा है और SC/ST एक्ट आदि के माध्यम से सवर्णों का वैधानिक उत्पीड़न भी कर रहा है। इसका मूल यही है कि दस्यु वर्ग सवर्णों की रोटी-बेटी छीनेंगे और यदि प्रतिरोध किया तो वैधानिक रूप से उत्पीड़न भी करेंगे।
सवर्णों के अस्तित्व का यह संकट भी मात्र उन्हीं को दिखाई दे रहा है जिन्हें अपनी बेटियों की सुरक्षा चाहिये। नगरों में तो सवर्णों के एक बड़ा वर्ग ऐसा भी तैयार हो गया है जो स्वयं ही ५६ इंच की छाती करके कहता है मैं जातिवाद नहीं मानता, मैं अस्पृश्यता नहीं मानता आदि-इत्यादि। ये वो वर्ग है जो वास्तव में धर्म को ही नहीं मानता है और धर्म-धर्म चिल्लाता भी है।
- जब तुम कहते हो मैं जातिवाद अर्थात जातिव्यवस्था को नहीं मानता तो उसका तात्पर्य भी यही होता है कि तुम शास्त्र को नहीं मानते अर्थात धर्म को भी नहीं मानते।
- जब तुम कहते हो कि मैं अस्पृश्यता को नहीं मानता तो उसका तात्पर्य भी वास्तव में यही होता है कि तुम शास्त्र को नहीं मानते और अंततः धर्म को भी नहीं मानते।
किन्तु विडम्बना देखिये ये लोग भी फिर धर्म-सनातन आदि चिल्लाते रहते हैं, देश को नई दिशा दिखाने का कार्य करते रहते हैं। UGC रेगुलेशन 2026 आने के पश्चात् सवर्णों को यह बोध हुआ कि ये तो वैधानिक उत्पीड़न की भी पराकाष्ठा हो रही है और इसके विरुद्ध एक स्वर उत्पन्न होने लगा क्योंकि इससे सवर्णों को ऐसा प्रतीत हुआ कि ये तो हमारे अस्तित्व के ही समापन का कुप्रयास है। किन्तु अभी भी उन वर्गों को ये समझना ही होगा कि :

- तुमने अपना सवर्णत्व तो उसी दिन समाप्त कर दिया था जिस दिन तुमने जातिवाद को अस्वीकार कर दिया था।
- तुमने अपना स्वर्णत्व उसी दिन समाप्त कर लिया था जब तुमने अस्पृश्यता का परित्याग कर दिया था।
- तुमने अपने सवर्णत्व का त्याग उसी दिन कर दिया था जब संस्कारों का त्याग किया था ? यदि स्मरण न हों तो स्वयं के संस्कारों की गिनती करो, बच्चों को कितने संस्कार दिये एक बार गिनती करो। जो संस्कार (अपवादस्वरूप) दिया भी था उसकी विधि, काल आदि का स्मरण करो कि क्या सही था ?
- तुमने अपने सवर्णत्व का त्याग उसी दिन कर दिया था जब होटलों में खाना खाने लगे थे, ऑनलाइन बुकिंग करके होम-डिलीवरी के खाना की तो बात ही मत करना। तुमने अपने सवर्णत्व का त्याग उसी दिन कर दिया था जब बस-ट्रेन आदि से चारधाम यात्रा, तीर्थ आदि करने चले थे।
पैसे की भूख
अब बात आती है कि क्या सवर्णों का अस्तित्व वास्तव में संकट में है ? तो इसका उत्तर यह है कि हां संकट में है किन्तु ये आज से नहीं है और किसी दूसरे के कारण, या अत्याचारी सरकार के कारण नहीं है। ये संकट स्वयं सवर्णों की अज्ञानता के कारण है और अज्ञानता का भी कारण है पैसों की भूख।
पैसों की भूख वो चश्मा है जिसे पहनने के पश्चात् अन्य आवश्यकतायें दिखाई ही नहीं पड़ती, बस पैसा और पैसा बस। स्वयं भी पैसे के पीछे भाग रहे हैं, बच्चों को भी पैसे के पीछे भागना सीखा रहे हैं तभी तो एक परिवार के पति-पत्नी दोनों ही पैसे कमा रहे हैं अर्थात पैसा है कि और दूर होता चला जा रहा है यदि हमने पैसे को प्राप्त किया होता तो हमारी पत्नी को भी पैसे के पीछे भागने की आवश्यकता नहीं होती किन्तु अब तो पत्नियां भी पैसे के पीछे भाग रही है।
इसका तात्पर्य तो यह है कि पति जितना पैसा कमा रहा है वह अपर्याप्त है और पत्नी को भी पैसे कमाने की आवश्यकता है। जब पैसे की भूख इतनी अधिक हो तो दुराचार से भी पैसे कमाने में आपत्ति नहीं हो सकती क्योंकि दुराचार से शीघ्र और बिना परिश्रम के ही प्राप्ति दिखती है। पैसे की भूख ही तो है जो सभी असत्य सम्भाषण, छल-प्रपञ्चादि को योग्यता/होशियारी/बुद्धिमत्ता समझने लगे हैं।
अब जबकि पैसों की भूख ने प्रतीकात्मक सवर्णत्व के अस्तित्व को भी संकट में डाल दिया है तो ज्ञात हो रहा है कि सवर्ण संकट में है। अरे अब तुम सवर्ण हो ही कहां जो संकट दिखा रहे हो ? ये तो लोकतंत्र का नग्न-नृत्य है, घृणित राजनीति है जो तुमसे ऐसा करा रही है। आज भी तुम्हें पैसा ही दिखाई दे रहा है जो तुमसे छीना जा रहा है और उसी के लिये तुम सवर्णत्व, धर्म/सनातन आदि की बातें कर रहे हो।
अभी भी तुम धर्म के साथ कहीं से नहीं दिख रहे हो क्योंकि तुम्हें बेटियों की सुरक्षा नहीं नौकरी चाहिये, पत्नियों की नौकरी चाहिये, वो भले ही दुराचार करके पैसे क्यों न लाये तुमको बस पैसे ही दिखाई देंगे और बात यहां पैसों की ही है कि अब दुराचार के अतिरिक्त और को मार्ग ही नहीं छोड़ा जायेगा।
कॉलेजों में पढ़ना है तो दुराचार करना होगा, नौकरी चाहिये तो दुराचार करना होगा, पदोन्नति चाहिये तो दुराचार करना होगा और तुम्हारा सवर्णत्व इतना शेष है कि प्रत्येक अवस्था में एक मात्र दुराचार ही साधन न रहे और भी साधन बचें। धर्म रक्षा, सनातन-सनातन चिल्लाना बस स्वयं के साथ छल ही सिद्ध होता है क्योंकि जिस सनातन, धर्म की तुमने कभी रक्षा ही नहीं किया आज तुम उसकी दुहाई किस मुंह से दे सकते हो ?
धर्मो रक्षति रक्षितः : सोचो धर्म की रक्षा कब किया ?
आज यदि तुम धर्म की रक्षा करने की बात करते हो अथवा यदि धर्म से अपनी रक्षित होने के लिये “धर्मो रक्षति रक्षितः” की दुहाई देते हो तो इससे पूर्व तुमको यह स्मरण करना आवश्यक है कि अब तक तुमने धर्म की कितनी रक्षा करी और आगे कितनी करोगे ? क्योंकि यदि तुमने धर्म की रक्षा न की और न करोगे तो तुम स्वयं को सवर्ण किस आधार से कह सकते हो ? तुम तो धर्मपथ से भ्रष्ट हो चुके हो और भ्रष्ट ही रहना चाहते हो, मात्र रोटी-बेटी को बचाने के उद्देश्य से धर्म-धर्म चिल्ला रहे हो। सोचो तुमने धर्म की रक्षा वास्तव में कब-कब किया था :

- जब तुमने १० या और भी अधिक संस्कारों का परित्याग कर दिया ?
- जब अपने बच्चों को संस्कार नहीं दिया ?
- जब वेद का त्याग किया था ? उपनयन के पश्चात् वेदारंभ होता है और ब्रह्मचारी को वेदाध्ययन करना होता है ? तुमने कितना वेदाध्ययन किया स्मरण करो ?
- जब शिक्षा के नाम पर स्कूल-कॉलेजों में शिखा-सूत्र-तिलक आदि का परित्याग कर चुके थे ?
- जब कैंटीन-होटलों में अभक्ष्य भक्षण कर रहे थे ?
- जब फलों का रस कहकर मदिरा सेवन कर रहे थे ?
- जब कदाचार, दुराचार, भ्रष्टाचार आदि कर रहे थे ?
- जब असत्य सम्भाषण को वर्त्तमान जीवनशैली का अंग स्वीकार कर चुके थे ?
- जब संध्या-तर्पणादि नित्यकर्म का परित्याग किया था ?
- जब सांकेतिक पूजा-पाठ आदि में अपद्रव्यों का प्रयोग कर रहे थे ?
- जब तीर्थों में पर्यटन करने गए थे और तीर्थ यात्रा के किसी भी विधान का पालन नहीं किया ?
- जब आहार-व्यवहार-परिधान-भाषा आदि से म्लेच्छाचार कर रहे थे ?
ऐसे और भी ढेरों प्रश्न हो सकते हैं जो आपको यह ज्ञात करायेंगे कि न तो कभी पीछे धर्म की रक्षा किया और न ही आगे करेंगे ? और जब आप धर्म की रक्षा न ही करते हैं और न ही करेंगे तो धर्म आपकी रक्षा क्यों करेगा ? गंभीरता से सोचो तो सही “धर्मो रक्षति रक्षितः” की दुहाई देने का अधिकार भी तुम्हारे पास है क्या ?
समाधान की प्रथम शर्त्त : सच्चाई को स्वीकारना
यह तो स्पष्ट हो रहा है कि समस्या वास्तव में है किन्तु जो समस्या दिखाई दे रही है वो है ही नहीं, पत्ते तो सूखेंगे और पुनः नये पत्ते आयेंगे, फूल-फल भी प्रतिवर्ष आयेंगे-जायेंगे इससे वृक्ष के अस्तित्व पर संकट नहीं सिद्ध किया जा सकता। वृक्ष का संकट उसके मूल का नष्ट होना ही सिद्ध होता है और यदि वृक्ष का मूल नष्ट कर दें तो पत्ते झड़ गये, डालियां सूख गयी आदि कुछ भी नहीं कहा जा सकता। वृक्ष की रक्षा करने के लिये यह आवश्यक है कि सर्वप्रथम उसके मूल की रक्षा करें तदुपरांत पत्र-शाखा आदि की भी करें।
अभी जो कुछ भी किया जा रहा है वह मूल के लिये नहीं, डाली के लिये भी नहीं, पत्ते के लिये भी नहीं, क्रीत फल के लिये किया जा रहा है। यदि मूल की रक्षा नहीं कर पाये और डाली एवं पत्तों के रक्षण मात्र तक सीमित रहे तो वृक्ष सुरक्षित नहीं हो सकता। हां छोटे वृक्षों के लिये पत्ते आदि की अधिक रक्षा भी विशेष महत्वपूर्ण होता है किन्तु सनातन धर्म इतना विशाल और अनंत वृक्ष है कि यह नष्ट होता ही नहीं है मात्र पतझड़ आते-जाते हैं और वसंत भी आता ही रहता है।
वर्त्तमान युग की समीक्षा करने पर यह ज्ञात होता है कि ये पतझड़ के ही समान है। इन विषयों की चिंता करना ही व्यर्थ और बौद्धिक जड़ता है :
- सनातन धर्म का अस्तित्व रहेगा अथवा नष्ट हो जायेगा ?
- वर्णाश्रम व्यवस्था व जातिव्यवस्था रहेगा अथवा नष्ट हो जायेगा ?
विमर्श और चिंता आदि का विषय मात्र यह होना चाहिये कि हमनें धर्म का कितना आश्रय ले रखा है और कितना संरक्षण कर रहे हैं? हमारे वंश/कुल का क्या होगा ? क्या भविष्य में (मृत्यु के उपरांत) हमारे लिये जलादि अर्पण करने वाले भी रहेंगे अथवा नहीं ?
प्रश्न उनके अस्तित्व का नहीं उनके कर्म के में आस्था और धर्मपालन का है कि करेंगे अथवा नहीं और इसका सरल उत्तर है कि यदि वर्त्तमान में आपने ९९% त्याग कर दिया है तो शेष १% का त्याग भविष्यवर्ती पीढ़ियां क्यों नहीं करेगी अर्थात निःसंदेह करेगी ही करेगी।
समाधान : विकल्प और आगे का मार्ग
“वृक्ष के पत्ते सूखें तो चिंता मत करो, बस यह देखो कि कहीं जड़ तो नहीं सूख रही।”
समाधान का मार्ग यहीं से प्राप्त होता है, न की किसी प्रकार की राजनीति अथवा आंदोलन आदि से। सोचो आपके पितामहादि के पितामह धर्म के लिये प्राणों का उत्सर्ग करने को भी तत्पर रहते थे तभी तो जनेऊ तौला जाता था। आपने धर्म की ही आहुति दे दिया है तो फिर बचा क्या ?
यदि आप आज के वर्त्तमान स्थिति को भयावह मानते हैं तो उसका मूल कारण धर्म का त्याग करना ही है। धर्म त्याग के कारण ही आप संवैधानिक उत्पीड़न के पात्र बन चुके हैं। यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से ऐसा नहीं प्रतीत होता है और ये भी मात्र एक भ्रम ही है। आप स्वयं ही “धर्मो रक्षति रक्षितः” का राग अलापते हैं और फिर इस सत्य को भी स्वीकारने में कतराते हैं यह तो विडम्बना ही है। आवश्यकता सत्य को स्वीकारने की है, त्रुटि क्या कर रहे हैं उसको जानने की है और उसके निवारण का प्रयास अपेक्षित है।

निष्कर्ष
“वृक्ष की रक्षा केवल पत्तों को सींचने से नहीं, बल्कि मूल (जड़) को सुरक्षित करने से होती है।”
आलेख का सार यह है कि सवर्णों पर आया वर्तमान संकट बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है। जब हमने स्वयं अपने ‘सवर्णत्व’ (संस्कार, संध्या, तर्पण, वेदाध्ययन) का त्याग कर केवल भौतिक धन को ही जीवन का एकमात्र ध्येय बना लिया, तभी से हमारे अस्तित्व का क्षरण आरम्भ हो गया। लोकतंत्र का ‘नग्न-नृत्य’ और वैधानिक उत्पीड़न मात्र उस अधर्म का परिणाम है जिसे हमने स्वीकार कर लिया है। समाधान किसी राजनीतिक आंदोलन में नहीं, बल्कि ‘स्वधर्म’ की ओर लौटने में है। यदि मूल (धर्म) सुरक्षित रहेगा, तो शाखाएं (रोटी-बेटी) स्वतः सुरक्षित हो जाएंगी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
FAQ
प्रश्न 1: सवर्ण का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर : सवर्ण में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्ण आते हैं।
प्रश्न 2: समानता का सिद्धांत भ्रामक क्यों है?
उत्तर : क्योंकि प्रकृति में सर्वत्र भेद (स्त्री-पुरुष, राजा-रंक) है; पूर्ण समानता व्यवस्था को चौपट कर देती है।
प्रश्न 3: दस्यु किसे कहा गया है?
उत्तर : अराजक और आपराधिक प्रवृत्ति वाले लोग जो अपनी शास्त्रीय सीमा का उल्लंघन कर शासन में प्रविष्ट हो गए हैं।
प्रश्न 4: क्या वर्णव्यवस्था को नष्ट किया जा सकता है?
उत्तर : नहीं, यह ईश्वरकृत व्यवस्था है; इसे केवल प्रदूषित (वर्णसंकर) किया जा सकता है, नष्ट नहीं।
प्रश्न 5: सवर्णों के संकट का मूल कारण क्या है?
उत्तर : धर्म का परित्याग और केवल ‘पैसों की भूख’ के पीछे भागना।
प्रश्न 6: UGC रेगुलेशन 2026 क्या संकेत देता है?
उत्तर : यह सवर्णों के वैधानिक उत्पीड़न की पराकाष्ठा और अस्तित्व मिटाने का कुप्रयास है।
प्रश्न 7: म्लेच्छाचार का क्या तात्पर्य है?
उत्तर : शास्त्रविहित आहार, विहार, परिधान और भाषा का त्याग कर अधर्मी आचरण करना।
प्रश्न 8:गृहयुद्ध की संभावना क्यों है?
उत्तर : क्योंकि जब दस्यु तत्व सीमा का अतिक्रमण कर सवर्णों की रोटी-बेटी पर प्रहार करते हैं, तो टकराव अवश्यम्भावी है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
प्रस्तुत आलेख पूर्णतः लेखक के व्यक्तिगत शास्त्रीय शोध, पौराणिक मान्यताओं और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों के विश्लेषण पर आधारित है। इसमें प्रयुक्त शब्द जैसे ‘दस्यु’, ‘म्लेच्छाचारी’ और ‘सवर्ण’ शास्त्रीय परिभाषाओं के संदर्भ में हैं। इसका उद्देश्य किसी समुदाय की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ के सिद्धांत पर आत्म-मंथन के लिए प्रेरित करना है। पाठक स्वविवेक का प्रयोग करें।
शान्तिरस्तु शिवं चास्तु लोकाः सन्तु निरामयाः ।
गोब्राह्मणेभ्यः स्वस्त्यस्तु धर्मं धर्मात्मजाश्रयः ॥
स्कन्दपुराणम्/खण्डः ५ (अवन्तीखण्डः)/रेवा खण्डम्/२२९/२७
॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
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