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सविधि षोडश श्राद्ध कैसे करें – Shodasha shraddh

सविधि षोडश श्राद्ध कैसे करें - Shodasha shraddh

“श्रद्धा से श्राद्ध होता है किन्तु विधि का ज्ञान भी अनिवार्य है, यदि विधि का ज्ञान न हो तो श्रद्धा, सामग्री आदि निष्फल होता है”

किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् सर्वप्रथम उसका षोडश श्राद्ध ही किया जाता है। मिथिला में षोडशत्रयी नहीं होता है किन्तु अन्यत्र कुछ क्षेत्रों में षोडशत्रयी भी होता है। मलिन षोडशी, मध्यम षोडशी और उत्तम षोडशी तीन षोडशी होते हैं। यहां षोडश श्राद्ध संबंधी चर्चा में उत्तमषोडशी विधि की चर्चा की जा रही है जो सर्वत्र (द्विजाति) में प्रचलित है।

इसके साथ ही यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि कुछ लोग अधिक प्रज्ञावान होते हैं और संक्षेप में ही समझ जाते हैं किन्तु यहां अल्पज्ञों हेतु विस्तृत चर्चा की गयी है यदि आप विस्तृत आलेख का अवलोकन नहीं कर सकते तो यह आलेख आपके लिये नहीं है। किन्तु यदि आपके पास पर्याप्त समय है और गंभीरता से समझना चाहते हैं तो यह आलेख आपके लिये अत्यधिक उपयोगी है क्योंकि श्राद्धकर्म में अनेकों विसंगतियां देखने को मिलती है एवं इसके लिये यह आवश्यक है कि उनको चिह्नित किया जाय और शोधन किया जाय।

सविधि षोडश श्राद्ध कैसे करें – Shodasha shraddh

श्राद्ध की विधि का जो तात्पर्य है सर्वप्रथम उसको समझना आवश्यक है क्योंकि बहुत लोग श्राद्ध की विधि का भी गलत अर्थ ही लगाते हैं और हमारे क्षेत्र में तो यह अर्थ ही लगाया जाता है कि द्वादशाह को एक-एक करके १४ मासिक किया जाना विधिपूर्वक श्राद्ध है, प्रातःकाल से आरम्भ करके सायंकाल तक ९ – १० घंटे तक करना विधिपूर्वक श्राद्ध है।

सर्वप्रथम इसी भ्रम का उन्मूलन करना आवश्यक है कि ये मूर्खों का मनगढंत विचार है। विधिपूर्वक श्राद्ध का तात्पर्य आगे विस्तार से समझाया जायेगा किन्तु उसे समझने के लिये इस दुराग्रह का परित्याग आवश्यक है अथवा इसका प्रमाण ढूंढकर इसीको पुष्ट करें।

किन्तु यदि इसका कोई प्रमाण अप्राप्य है तो इस बात की गांठ बांधना दुराग्रह मात्र ही है जो मूर्खों द्वारा प्रचारित किया गया है।

सविधि षोडश श्राद्ध कैसे करें - Shodasha shraddh

विधिपूर्वक श्राद्ध का तात्पर्य

“जहाँ विधि नहीं, वहाँ केवल औपचारिकता है, आध्यात्मिक लाभ नहीं।”

वास्तव में विधिपूर्वक श्राद्ध का तात्पर्य श्राद्ध विषयक जो देश, काल, अधिकारी, सामग्री, शुद्धता, विहित-निषिद्ध आदि प्रकरण हैं उनका पालन करते हुए श्राद्ध क्रिया के मंत्रादि का उचित प्रयोग करते हुये पितरों के निमित्त उत्सर्ग-दानादि करना है।

किन्तु वर्तमान में हमें जो दिखता है उसमें न तो देश का विचार मिलता है न ही काल निर्धारण, अधिकारी विषयक विसंगतियां भी दिखने लगी हैं, सामग्री और शुद्धता समाप्त हो चुकी है, विहित-निषिद्ध का कुछ अंश है, मंत्रप्रयोग में मात्र व्याकरण-व्याकरण सुनने को मिलता है और वैयाकरण ऐसे उद्दण्ड हो गये कि वेदमंत्र प्रयोग का ककहरा भी नहीं जानते एवं शब्दों का उच्चारण करते-कराते हैं उसमें भी कहीं उचित संधि विच्छेद पूर्वक तो कहीं अनुचित इसका ज्वलंत उदाहरण आपको भी देखने-सुनने को मिलता ही होगा “मुतोषसो” विवाद। अरे धूर्तों मुतोषसो है ही नहीं “मधुनक्तमुतोषसो” है।

जो मधुनक्त ; मुतोषसो पढ़ाते हैं अथवा जो मधुनक्तं ; उतोषसो पढ़ाते हैं दोनों ही प्रज्ञाविहीन हैं किन्तु विवाद यही देखने को मिलता है।

इसी प्रकार तीन बार पितृगायत्री के स्थान पर एक बार और नौ बार के स्थान पर तीन बार पढ़ाते हैं अर्थात एक तिहाई पढ़ाते हैं और दो-तिहाई निगल जाते हैं। इसी प्रकार मधुमती ऋचा का मात्र एक अथवा दो बार पाठ करते हैं, आचमन विलुप्त है अर्थात् शुद्धि समाप्त, स्वंय और अपसव्य के स्थान पर निवीति कर देते हैं क्योंकि ज्ञात ही नहीं। किन्तु इतनी त्रुटियों के साथ मात्र एक विषय कि एक-एक मासिक करके किया तो विधिपूर्वक किया का दम्भ भरते हैं, अरे धूर्तों ऐसा विधान है ही नहीं और जिसे लगता हो वो इसका प्रमाण प्रस्तुत करें ।

इस प्रकार हम यदि श्राद्ध विधि को समझना चाहें तो हमें इन विषयों को समझना होगा :

  • श्राद्धदेश (स्थान)
  • श्राद्ध काल
  • श्राद्ध का अधिकार
  • श्राद्धकर्ता के लिये नियम
  • द्रव्य और शुद्धि
  • पात्र विचार
  • क्रिया और मंत्रादि प्रयोग
  • उत्सर्ग सामग्री पर अधिकार
  • भोज का विचार

देशकालोचितश्रद्धा द्रव्यपात्रार्हणानि च । सम्यग्भवन्ति नैतानि विस्तरात् स्वजनार्पणात् ॥
श्रीमद्भागवत महापुराण/७/१५/४

उपरोक्त तथ्य की पुष्टि शास्त्रों से भी होती है अर्थात प्रामाणिक तथ्य हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण में विधिपूर्वक को सम्यक् कथन से स्पष्ट किया गया है एवं विस्तार (भोजादि का) करना निषिद्ध बताया गया है। हम यहां क्रमशः सभी विषयों को संक्षेप में यहां समझने का प्रयास करेंगे। विस्तृत विचार तो पृथक-पृथक आलेखों में बहुशः प्रमाणों के साथ किये जायेंगे अस्तु यहां प्रमाण भी अल्प मात्रा में ही प्रस्तुत करेंगे। इनमें से यहां “क्रिया और मंत्रादि प्रयोग” भाग की चर्चा अधिक करेंगे।

श्राद्धदेश (स्थान)

श्राद्ध देश का तात्पर्य है कि श्राद्ध करने योग्य स्थल, तीर्थ आदि का विचार एवं निषिद्ध स्थान का ज्ञान। चूंकि हम षोडश श्राद्ध विषयक चर्चा करने जा रहे हैं तो इसमें भी अनेक विषय विचारणीय है : यथा स्वयं की भूमि में श्राद्ध करना, भूमि पर ही श्राद्ध करना, शांत स्थान में श्राद्ध करना, वृक्ष-जलाशयादि का विचार करना, गोपनीयता का ध्यान रखना आदि।

अन्य के भूमि-घर में श्राद्ध का निषेध है किन्तु वर्त्तमान काल में सबके पास श्राद्ध हेतु अपनी भूमि उपलब्ध नहीं है किन्तु किसी वंश-कुल के लिये सामूहिक रूप से भूमि निर्धारित किया जाता है। यहां विसंगति यह आ जाती है कि वो स्थान (निजी) जिस कुल के लोगों ने निर्धारित किया अन्यान्य कुल-जाति के व्यक्ति भी उसे अपने लिये उचित समझ लेते हैं, अभाव में तो किया जा सकता है किन्तु यदि अभाव न हो तो न ही करें।

अभाव में करने पर भूस्वामि पितरों के भाग का निर्धारण किया जाता है, किन्तु अब यह सामान्य व्यवस्था सी हो गयी है यदि अपनी भूमि पर भी करते हैं तो भूस्वामि भाग निर्धारित कर देते हैं। श्राद्धभूमि दक्षिणप्लव हो यह भी आवश्यक कहा गया है, किन्तु इसका तनिक भी विचार व्यवहार में करते नहीं मिलते, उत्तरप्लव (विपरीत) में भी करते दिखते हैं।

पुनः श्राद्ध के लिये भूमि पर ही हो यह ध्यान रखना भी आवश्यक है ताकि मंडल आदि किया जा सके। शांत स्थान का तात्पर्य है कि एकांत भी हो जो कि लोग भूलते जा रहे हैं अब प्रदर्शन का भाव बढ़ता जा रहा है और सड़कों के निकट जहां तनिक भी शांति नहीं होती श्राद्ध करते हैं। श्राद्ध हेतु जलाशय के निकट अनेकों वृक्षादि का वर्णन प्राप्त होता है। यहां यह भी पुनः ध्यान रखना आवश्यक है कि वृक्ष के मूल में तो चबूतरा बना दिया जाता है तो श्राद्ध चबूतरे पर न करके भूमि पर ही करें।

श्राद्ध देश

तीर्थादि में एकांतादि विषयक अन्यान्य नियमों का अभाव हो जाता है अर्थात विचार करने की आवश्यकता नहीं होती।

श्राद्ध में गोपनीयता बहुत ही आवश्यक है और इस कारण भी एकांत स्थान होना चाहिये। बहुत सारे लोग तो मंडप बनाते भी नहीं और यदि बनाते भी हैं तो इतना संकीर्ण कि उसमें कठिनाई से सपिंडीकरण हो पाता है, मासिक श्राद्ध तो संभव ही नहीं होता अर्थात मंडप से बाहर ही किया जाता है। श्राद्धस्थला में भी म्लेच्छ, चाण्डाल, पतितादि का आगमन भी निषिद्ध है।

ऐसे में उतने भाग को साइडर आदि द्वारा घेरा जाना चाहिये क्योंकि श्राद्ध के पाक पर श्वान, पतितादि की दृष्टि भी नहीं पड़नी चाहिये। इसी प्रकार एक नया दोष सोशल मीडिया पर प्रदर्शन का बढ़ता जा रहा है जो किसी भी प्रकार उचित नहीं है एवं गोपनीयता भंग करने वाला है; इस कारण इससे बचना चाहिये।

धातृबिल्ववटाऽश्वत्थ मुनि चैत्य गजान्विताः। श्राद्धं छायासु कर्तव्यं प्रसादादौ महावने॥ प्रजापति

गोमयेनानुलिप्ते तु दक्षिणाप्लवनस्थले। श्राद्धं समारभेद्भक्त्या गोष्ठे वा जलसन्निधौ॥
पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/९/८७

अटव्यः पर्व्वताः पुण्यास्तीर्थान्यायतनानि च । सर्व्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न हि तेषु परिग्रहः ॥
तस्मात् श्राद्धानि देयानि पुण्येष्वायतनेषु च । नदीतीरेषु तीर्थेषु स्वभूमौ तु प्रयत्नतः ॥
उपह्वरनितम्बेषु तथा पर्वतसानुषु । गोमयेनोपलिप्तेषु विविक्तेषु गृहेषु च ॥

दक्षिणाप्रवणे देशे तीर्थादौ वा गृहेऽथवा | भूसंस्कारादिसंयुके श्राद्धं कुर्यात्प्रयत्नतः ॥
गोगजाश्वादिपृष्ठेषु कृत्रिमायां तथा भुवि । न कुर्याच्छ्राद्धमेतेषु परक्यासु च भूमिषु ॥

श्राद्ध काल

श्राद्ध काल की बात करें तो इसमें दो प्रकार से विचार होता है एक तो विविध तिथि, नक्षत्र, ग्रहणादि अवसर संबंधी जिसकी चर्चा यहां नहीं करेंगे एवं द्वितीय श्राद्ध के दिन किस समय करें अर्थात दिन के किस भाग में करें।

अनेकानेक श्राद्धों के लिये अनेक विधान है जैसे नान्दी श्राद्ध के लिये पूर्वाह्न, एकोद्दिष्ट के लिये मध्याह्न, पार्वण के लिये अपराह्ण इस प्रकार से निर्धारण किया गया है। इसी विषय में कुतप काल को भी विशेष महत्व प्रदान किया गया है जो कि दिवस का अष्टम मुहूर्त होता है। इस विषय को समझने हेतु प्रथम तो दिन के भागों को जानना-समझना आवश्यक हो जाता है एवं यह अतिमहत्वपूर्ण है क्योंकि अधिकांशतः श्राद्ध में काल का उल्लंघन ही देखने को मिलता है।

मुहूर्तत्रितयं प्रातः तावानेव च सङ्गवः। मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तस्स्यादपराह्णोपि तादृशः ॥
सायाह्नस्त्रिमुहूर्तस्तु सर्वकर्म बहिष्कृतः ॥

अह्नो मुहूर्ता विख्याता दशपञ्च च सर्वदा। तत्राष्टमो मुहूर्तो यः स कालः कुतपस्मृतः ॥
प्रारभ्यकुरुते श्राद्धं कुर्यादारौहिणं बुधः। विधिज्ञोविधिमास्थाय रौहिणं न तु लङ्घयेत् ॥
ऊर्ध्वं मुहूर्तं कुतुपाद्यन्मुहूर्तचतुष्टयं। मुहूर्त पञ्चकं ह्येतत्स्वधाभवनमिष्यते ॥

आमश्राद्धं तु पूर्वाह्णे एकोद्दिष्टं तु मध्यमे। पार्वणंचापराह्णे तु प्रातर्वृद्धि निमित्तकं ॥

नान्दीमुख श्राद्ध के अतिरिक्त अन्यान्य श्राद्धों के लिये जो विधान है वो दिन के अष्टम मुहूर्त (कुतप) से लेकर अगले चार मुहूर्तों तक अर्थात बारहवें मुहूर्त तक के मुहूर्त पञ्चक को स्वधाभवन कहा गया है और दिन में कुल १५ मुहूर्त होते हैं अर्थात उसके पश्चात् के तीन मुहूर्त जो कि सायाह्न होते हैं उसका निषेध किया गया है एवं सूर्योदय से ७ मुहूर्त तक के भाग का भी निषेध है जिसमें विशेष रूप से प्रातः का निषेध है अर्थात ३ मुहूर्त तो पूर्णतः निषिद्ध है।

उसमें से भी एकोद्दिष्ट हेतु अष्टम कुतप और नवम रौहिण का ही विशेष महत्व है। इस प्रकार एकादशाह और द्वादशाह में जो षोडश श्राद्ध किया जाता है उसके उचित काल का निर्धारण करें तो इन बिंदुओं में स्पष्ट होता है :

  • एकादशाह को आद्य श्राद्ध अर्थात एकोद्दिष्ट होता है और एकोद्दिष्ट का उचित काल अष्टम और नवम मुहूर्त है, विशेष परिस्थिति में अथवा बिलम्ब होने पर द्वादश मुहूर्त तक किया जा सकता है।
  • द्वादशाह को १४/१५ मासिक और सपिंडीकरण श्राद्ध होते हैं जिसके लिये अधिकतम समय की आवश्यकता होगी अर्थात मुहूर्त पञ्चक को ग्रहण किया जायेगा। पांच मुहूर्त का तात्पर्य लगभग ४ घंटे होते हैं अर्थात ४ घंटों में ही होना चाहिये।
  • द्वादशाह हेतु ४ घंटा भी अल्प ही प्रतीत होता है किन्तु यह अल्पज्ञों की सोच है, तथापि इसमें सप्तम मुहूर्त को भी ग्रहण किया जा सकता है जिस कारण 48 मिनट लगभग और बढ़ जायेंगे अर्थात लगभग पौने पांच घंटे। इतने काल में भलीभांति द्वादशाह का श्राद्ध भी विधिवत संपन्न हो सकता है यदि मूर्ख व्यक्ति न करा रहा हो तो। लगभग एक-डेढ़ घंटे में मासिक श्राद्ध, आधे घंटे में स्नानादि व सपिण्डीव्यवस्थापन, पुनः लगभग २ घंटे में सपिण्डीकरण श्राद्ध।

यहां अब व्यवहार की दो चुनौतियों को समझना अपेक्षित है वो यह कि एकादशाह के दिन आद्यश्राद्ध भी जहां एकोद्दिष्ट मात्र करना है वो लगभग सायाह्न में किया जाता है अर्थात निषिद्ध काल में किया जाता है। श्राद्ध के काल में मात्र उत्सर्गादि का आरम्भ किया जाता है जबकि उत्सर्ग पूर्व ही कर लेना चाहिये। एकादशाह का एकोद्दिष्ट मध्याह्न काल में ही होना विधिपूर्वक कहलायेगा, सायाह्न में होना नहीं। इसी प्रकार द्वादशाह को एक-एक करके १४/१५ मासिक श्राद्ध करना आवश्यक नहीं है और ऐसा करने से कलविधान का पालन नहीं होता अपितु पूर्वाह्ण में आरम्भ करके सायाह्न तक करते रहते हैं जो विधि का उल्लंघन है, विधि का पालन नहीं।

यदि विधिपूर्वक करना चाहें तो उचित काल में ही करना होगा और इस प्रकार एक-एक करके करना संभव नहीं अर्थात तंत्र से एक ही बार में सभी (१४/१५) मासिक श्राद्ध करे तदनंतर सपिण्डीकरण करे। एक-एक मासिक करके श्राद्ध करना अपण्डितों का विचार है, क्योंकि एक-एक मासिक करने पर ढेरों विधियों का उल्लंघन ही किया जाता है, जिसमें से एक तो यहां स्पष्ट हो गया है शेष आगे स्पष्ट होंगे।

श्राद्ध का अधिकार

यदि अधिकार की बात करें तो इसमें भी दो विषय समाहित हैं प्रथम तो मृतक के श्राद्ध का अधिकारी अर्थात जिसे करना चाहिये और द्वितीय यह कि जो श्राद्ध करना चाहे उसे श्राद्ध का अधिकार अर्थात कर्माधिकार है अथवा नहीं ? कर्माधिकार संबंधी चर्चा तो पीछे अनेकों आलेखों में कर चुके हैं यहां श्राद्ध के अधिकारी को ही संक्षेप में समझते हैं।

पुत्त्रः पौत्त्रः प्रपौत्त्रो वा भ्राता वा भ्रातृसन्ततिः । सपिण्डसन्ततिर्वापि क्रियार्हा नृप जायते ॥
तेषामभावे सर्व्वेषां समानोदकसन्ततिः । मातृपक्षस्य पिण्डेन सम्बद्धा ये जलेन वा ॥
कुलद्वयेऽपि चोत्सन्ने स्त्रीभिः कार्य्या क्रिया नृप । संघातान्तर्गतैर्व्वापि कार्य्याः प्रेतस्य याः क्रियाः ॥
पितृमातृसपिण्डैस्तु समानसलिलैस्तथा संघातान्तर्गतैश्चैव राज्ञा वा धनहारिणा
पूर्व्वाः क्रियास्तु कर्त्तव्याः पुत्त्राद्यैरेव चोत्तराः । दौहित्रैर्व्वा नरश्रेष्ठ कार्य्यास्तत्तनयैस्तथा ॥

पुत्रः पौत्रश्च तज्जश्च पुत्रिकापुत्र एव च। पत्नी भ्राता च तज्जश्च पिता माता स्नुषा तथा ॥
भगिनी भागिनेयश्च सपिण्डो धनहार्यपि। पूर्वपूर्वविनाशे स्युरुत्तरोत्तर पिंडदाः ॥

यहां एक अधिकारी के विषय में एक तथ्य को ही स्पष्ट करना अधिक महत्वपूर्ण है और वो है दौहित्र एवं भ्राता अथवा भ्रातृज्य के मध्य का अधिकार संबंधी विवाद। पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र आदि के होने पर तो जो जीवित हो उसीका उत्तरोत्तर अधिकार होता है। किन्तु इनका अभाव होने पर दौहित्र व भ्राता-भ्रातृज्य, सपिण्ड, सगोत्र आदि का उत्तरोत्तर अधिकार संबंधि विवाद उत्पन्न होता है। उक्त विषय में पुत्रिकापुत्र (दौहित्र) पूर्वाधिकारी होता है, तदन्तर भ्राता-भ्रातृज्य आदि का अधिकार होता है।

श्राद्ध का अधिकार

औरसः क्षेत्रजश्चैव पुत्रिकापुत्र एव च । कानीनश्च सहोढश्च गूढोत्पन्नस्तथैव च ॥
पौनर्भवोऽपविद्धश्च लब्धः क्रीतः कृतस्तथा । स्वयं चोपगतः पुत्रा द्वादशैते उदाहृताः ॥
तेषां षड्बन्धुदायादाः षडदायादबान्धवाः । पूर्वः पूर्वः स्मृतः श्रेयाज्जघन्यो यो य उत्तरः ॥
क्रमाद्ध्येते प्रपद्येरन्मृते पितरि तद्धनम् । ज्यायसो ज्यायसोऽभावे जघन्यस्तदवाप्नुयात् ॥
पुत्राभावे तु दुहिता तुल्यसंतानदर्शनात् । पुत्रश्च दुहिता चोक्तौ पितुः संतानकारकौ ॥
अभावे तु दुहितॄणां सकुल्या बान्धवास्ततः । ततः सजात्याः सर्वेषां अभावे राजगामि तत् ॥

नारदस्मृतिः/व्यवहारपदानि/दायभागः(१३)/४३ – ४८

उपरोक्त के अभाव में भी बहन, भागिनेय का अधिकार प्रथम होता है और सपिण्ड का उत्तर और उसके अभाव में भी धनहारी का अधिकार होता है।

श्राद्धकर्ता के लिये नियम

यद्यपि श्राद्धकर्ता हेतु ही नहीं श्राद्धभोक्ता हेतु भी ढेरों नियम कहे गए हैं किन्तु यहां हम श्राद्धकर्त्ता हेतु कुछ महत्वपूर्ण नियमों को समझने का प्रयास करेंगे :

श्राद्धकर्त्ता और भोक्ता दोनों के लिये ही कुछ विशेष निषेध प्राप्त होता है : पुनर्भोजन अर्थात दुबारा भोजन करना और यह दोष ब्राह्मणों में अधिक देखने को मिलता है एक बार ब्राह्मण भोजन में सम्मिलत हो जाते हैं और दूसरी बार पुनः घर में बना विशेष भोजन करते हैं। यान पर चढ़ना, यात्रा करना, भार वहन करना और परिश्रम करना, कलह करना, मैथुन, हिंसा, दिन में शयन आदि।

पुनर्भोजनमध्वानं यानमायासमैथुनम्। श्राद्धकृच्छ्राद्धभुग्यो वा सर्वमेतद्विवर्जयेत्।
स्वाध्यायं कलहं चैव दिवास्वापं च सर्वदा ॥

पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/९/११९-१२०

श्राद्ध में निमंत्रित ब्राह्मणों का यथान्याय पूजन सत्कार न करना भी पाप कहा गया है। ब्राह्मणों के साथ अन्यान्य व्यक्तियों को भोजन कराना ब्राह्मण की अवज्ञा है और ऐसे पाप हेतु अतिकृच्छ्र प्रायश्चित्त भी कहा गया है। ब्राह्मणों के साथ यदि हम किसी अन्य को भोजन कराते हैं तो इसका तात्पर्य यह है कि ब्राह्मणभोजन का महत्व नहीं समझते और अवज्ञा कर रहे हैं।

श्राद्ध कर्ता हेतु जो सबसे बड़ा तथ्य भोजन विषय है और विसंगति देखने को मिलती है वो यह कि अपात्रक श्राद्ध होने के कारण ब्राह्मण भोजन श्राद्ध के पश्चात् होता है एवं घर में कलश पूजन के पश्चात् पुरोहित वर्ग के ब्राह्मण का। तो वहां पर श्राद्ध कर्ता और नापित-मालाकार आदि भी ब्राह्मण के साथ ही भोजन करते हैं जो अनुचित है कई स्थानों पर कुछ पुजारी-महंथ आदि को भी ब्राह्मण के साथ भोजन कराया जाता है और यह भी अनुचित है। श्राद्धकर्त्ता तो ब्राह्मण भोजन कराकर उन्हें विदा करके तब भोजन करेगा ऐसा स्पष्ट विधान है न कि ब्राह्मण के साथ।

इसी कड़ी में ब्राह्मण भोजन में ब्राह्मणों में भी अपांक्तेय की व्यवस्था है कि जो ब्राह्मण नीचकर्मा, पापाचारी आदि हो वह अपांक्तेय होता है अर्थात भोजन कराने का अधिकारी नहीं होता और यदि कराया भी जाय तो मुख्य ब्राह्मण भोजन में न कराकर पृथक से कराये। फिर यहां नापित-मालाकार आदि को ब्राह्मण के साथ भोजन कराना शास्त्राज्ञा का उल्लंघन है। घर में शूद्रों को भोजन कराने का ही निषेध है उसमें भी ब्राह्मण के साथ निसंदेह दोषदायक है।

रही बात कुछ पुजारी-महंथ आदि को भोजन कराने की तो ये संत-साधु आदि की श्रेणी में आते हैं और ब्राह्मणभोजन में इनके भोजन की गणना नहीं होती है। यद्यपि इनके भोजन का भी महत्व है किन्तु ब्राह्मणभोजन में सम्मिलित नहीं किये जा सकते। इसी प्रकार नाती, भांजे, जामाता, बहनोई आदि। इनमें दौहित्र (नाती) का विशेष महत्व है विशेषरूप से श्राद्ध में किन्तु स्वतंत्र रूप से है और इनके साथ श्राद्धकर्त्ता भोजन करेगा न कि ब्राह्मणों के साथ इन सबका भोजन होगा। कुल मिलाकर ब्राह्मणभोजन में केवल और केवल ब्राह्मणों का ही भोजन हो सकता है।

द्रव्य और शुद्धि

द्रव्यशुद्धि कहने से दो भाव प्रकट होते हैं एक तो धन जो प्रयुक्त होगा उसकी शुद्धि और द्वितीय श्राद्ध में प्रयुक्त होने वाली सामग्रियों की शुद्धि और दोनों ही महत्वपूर्ण है। किसी भी धर्माचरण में द्रव्यशुद्धि अनिवार्य है अर्थात न्यायोपार्जित धन से ही धर्मकृत्य करे यह आवश्यक है। एवं इसके साथ ही किसी भी धर्मकृत्य में प्रयुक्त होने वाली सामग्री भी शुद्ध हो यह भी अनिवार्य है।

द्रव्य शुद्धि में जो भी द्रव्य प्रयोग किये जाते हैं सबकी शुद्धि आती है और शुद्धि का तात्पर्य मात्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण से शुद्धि नहीं है। यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से शुद्धि मात्र को पर्याप्त माना जाय तो पिण्ड हेतु जिस भात की आवश्यकता होती है वह कर्त्ता/पाचक को स्वयं बनाने की आवश्यकता ही नहीं होगी। भात ही चाहिये न होटल से भी मंगाया जा सकता है जैसे दही-घी आदि मंगाते हैं। भात ही नहीं दूध, दही, घी आदि भी डेयरी आदि से क्रय किया हुआ नहीं होना चाहिये अपितु शुद्ध है यह परीक्षित होना चाहिये। यदि घर का दूध है तो घी भी घर का ही हो, दूध घर का नहीं है तो भी दही घर में ही जमाना चाहिये।

वर्त्तमान में तो बेंती आदि का निर्माण भी हलवाई से कराया जाने लगा है जो अनुचित है। भात में तो चाण्डाल, श्वान आदि की दृष्टि भी नहीं पड़नी चाहिये। इसी प्रकार द्रव्यशुद्धि में शास्त्रान्वेषण करके उसका पालन करना चाहिये।

जब हम धर्माचरण की बात करते हैं तो इसमें जो शुद्धि विधान है वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कई गुणा अधिक सूक्ष्म है। यदि हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार करने लगें तो उसका ह्रास हो जायेगा। यह चर्चा इस लिये आवश्यक है क्योंकि वर्त्तमान काल में वैज्ञानिकता का एक अंधकारमय आवरण चढ़ाया जा रहा है। ध्यान रखें धर्म और धर्माचरण, कर्मकांड आदि का निर्णय शास्त्र से होता है साइंस से नहीं। इसलिये द्रव्य, शुद्धि आदि विषयों में तो रत्तीभर भी वैज्ञानिक सोच का स्थान नहीं है क्योंकि ये उसका विषय ही नहीं है।

द्रव्य और शुद्धि

सोचिये वैज्ञानिक सोच के अनुसार बोतल का पानी सही है किन्तु शास्त्रीय दृष्टिकोण से नदी, तालाब, कुंआ आदि का जल शुद्ध है न कि बोतल का। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ब्रांडेड कंपनियों के घी, तेल, मधु आदि शुद्ध हैं किन्तु शास्त्रीय दृष्टिकोण से अशुद्ध हैं।

पात्र विचार

पात्र विचार में भी दो विषय होते हैं एक तो द्रव्यों का पात्र जिसमें मुख्य रूप से अर्घ्यपात्र आता है एवं द्वितीय महापात्र (ब्राह्मण) संबंधी विचार। इस विषय को भी सामान्य नहीं समझा जाना चाहिये क्योंकि अर्घ्यपात्र विषयक चर्चा भी विस्तृत है एवं ग्राह्यग्राह्य ब्राह्मण (पात्र) विषयक चर्चा भी बहुत ही विस्तृत है। अर्घ्य पात्र हेतु तो सामान्यतः पत्रों का ही प्रयोग सामान्यजनों के लिये उचित है जिसमें ढेरों पत्रों का प्रयोग कहा गया है और विहित पत्रों में से किसी भी पत्र का प्रयोग जिस क्षेत्र में किया जाता है वही उपर्युक्त है किन्तु यहां एक अन्य तथ्य भी है वो है अतिलघु भोजन पात्र, लोहे अथवा प्लास्टिक आदि के गिलास का प्रयोग, जलपात्र में अताम्र पात्र आदि का प्रयोग। इनसे बचना चाहिये :

  • भोजन पात्र अत्यंत लघु न हो कि उसपर श्राद्ध की क्रियायें भी सही से न की जा सके, किञ्चित अन्न परोसने पर भी गिर जाये।
  • यदि दुग्धधारा आदि भी प्रदान कर रहे हैं तो उसमें भी विहित पत्रों का ही प्रयोग करें न कि लोहे-प्लास्टिक आदि के गिलास का।
  • आचमन आदि के लिये जिस जलपात्र का प्रयोग करते हैं वह ताम्र का ही प्रशस्त होता है।

इसी प्रकार यदि ग्राह्यग्राह्य ब्राह्मण (पात्र) का विचार करें तो उसके लिये पृथक से प्रमाणों का संग्रह किया गया है। वर्त्तमान काल में पात्र की अनुपलब्धता के कारण ही अपात्रक श्राद्ध किया जाता है किन्तु जो उपस्थित होते हैं उनको भी अयोग्यता की सभी सीमाओं का अतिक्रमण करते देखा जाता है यथा : तिलकविहीनता, म्लेच्छ स्वरूप (वस्त्रादि से), शिखा विहीनता, सेवकत्व की प्रवृत्ति, मन्त्र पाठ में अक्षमता, लोभाधिक्यता आदि।

एकादशाह के दिन सायाह्न में एकोद्दिष्ट होने का एक कारण यह भी है कि मतिपूर्वक विलम्ब किया जाता है जिससे सायंकाल अथवा रात्रि में भोजन करें, यदि मध्याह्न में ही एकोद्दिष्ट हो जाये तो उसी समय भोजन भी करना होगा और पुनर्भोजन निषिद्ध होने से क्षुधाबाधा न हो। पात्र में सेवकत्व की प्रवृत्ति ही यजमान को प्रसन्न करने वाली होती है जबकि पात्र पूज्य होते हैं, स्थिति तो यहां तक हो गयी है कि बहुत जगह यजमान का आसन भी पात्र ही लगाते दिखते हैं। लोभाधिक्यता का ही दुष्परिणाम है कि श्राद्ध में प्रयुक्त सामग्री अग्राह्यों को भी प्राप्त होता है अर्थात प्रत्यक्ष हानि भी होती है।

श्राद्ध में प्रेत का सम्पूर्ण भाग पात्र (महापात्र) का होता है अर्थात आद्यश्राद्ध से लेकर सपिण्डीकरण में प्रेतश्राद्ध तक का और विश्वेदेव व त्रिक (पितरों) का भाग पुरोहित का होता है। किन्तु विवाद ऐसा होता है कि बंदरबांट किया जाता है एवं यह नापित-मालाकार आदि भी हड़प लेता है जो अशास्त्रीय है। इस बंदरबांट को तो सभी समस्या समझते हैं किन्तु स्वभाग का ज्ञान न होने से विवाद भी स्वयं ही करते हैं।

पुरोहित को प्रेतभाग नहीं ग्रहण करना चाहिये किन्तु ग्रहण करते हैं यही विवाद का कारण है, यदि पुरोहित विवाद करते हैं तो नापित-मालाकार आदि भी साथ में आ जाता है और वह भी अनधिकृत रूप से एक बड़ा भाग ले जाता है जिसकी पूर्ति हेतु पुनः पंचदेवता, विष्णु, तर्पण आदि में एकोद्दिष्ट की भांति ही सामग्री प्रयुक्त किया जाने लगा है जिससे की क्षतिपूर्ति हो जाये। इस भाग को इस प्रकार समझा जाना चाहिये :

  • पात्र (महापात्र) का भाग : आद्यश्राद्ध, मासिक श्राद्ध, सपिण्डीकरण में प्रेतश्राद्ध का भाग व सपिंडीकरण के पश्चात् में कथावाचक हेतु किया जाने वाला दान।
  • पुरोहित : विश्वेदेव और पितर (त्रिक) का भाग व आद्यश्राद्ध में प्रेतोद्देशित दान।
  • नापित व मालाकार : कर्त्ता का धारण किया वस्त्रादि। इसके अतिरिक्त पारिश्रमिक ग्रहण करते ही हैं, श्राद्ध में किसी भी सामग्री अथवा दान सामग्री पर नापित, मालाकार का कोई भी अधिकार नहीं होता है। यदि यजमान देना चाहे तो बिना मंत्रप्रयोग के, बिना उत्सर्ग के जितना देना चाहे दे सकता है अर्थात श्राद्ध में अथवा दान में सभी वस्तुओं हेतु मन्त्र का प्रयोग होता है और वो सभी ब्राह्मण के ही अधिकार में होता है।
  • पंचदेवता, विष्णु, तर्पण आदि भाग : ये अविहित है, इसमें सामान्य रूप से ही सामग्रियों का प्रयोग होना चाहिये क्योंकि ये नित्यकर्म हैं। अर्थात विशेष सामग्री के रूप में कुछ होना ही नहीं चाहिये जिसपर अधिकार की बात हो अथवा पुरोहित या महापात्र कोई भी अधिकार स्थापित करने की चेष्टा करें।

क्रिया और मंत्रादि प्रयोग

क्रिया और मंत्रादि प्रयोग वह भाग है जो कर्त्ता श्राद्ध में कर्म करता है अर्थात यह मुख्य भाग है। इसे मुख्य भाग स्वीकार करते हुये भी वर्त्तमान कालीन अर्थातुर अपण्डितों (कथित पण्डित) ने छिन्न-भिन्न कर रखा है और ये विभिन्न क्रियाओं की चर्चा से पूर्णतः सिद्ध हो जायेगा।

पाकारम्भ : काल, देश, अधिकारी आदि की चर्चा तो की जा चुकी है अब श्राद्ध के मुख्य भाग में पाक क्रिया से आरम्भ होता है। श्राद्ध मध्याह्न से अपराह्न अथवा स्वधाभवन (कुतुप से अगले पांच मुहूर्तों तक होना चाहिये। श्राद्ध का आरम्भ पाक से ही होता है इसका तात्पर्य यह भी हो सकता है कि पाक भी उसी कालखण्ड में किया जाय किन्तु ऐसा नहीं है। पाकक्रिया पूर्व में कर सकते हैं मुख्य काल में श्राद्ध ही होना चाहिये।

सव्यापसव्य : सर्वप्रथम सव्यापसव्य क्रिया का विषय है जिसमें सूक्तादि पाठ, आचमन आदि सव्य होकर ही कर्तव्य होते हैं एवं शेष अपसव्य होकर। किन्तु सव्यापसव्य विधान विलुप्त होता जा रहा है और निवीति (कण्ठीवत जनेऊ) होकर कराया जाता है एवं यह तर्क दिया जाता है कि इस प्रकार से सव्य और अपसव्य दोनों का ही यथायोग्य विधान हो जाता है जबकि इसका तात्पर्य यह है कि न ही सव्य है न ही अपसव्य। ऐसा करने का कारण सव्यापसव्य का ज्ञान न होना है अर्थात अयोग्यता है। यदि सव्यापसव्य का ज्ञान पंडित को हो तो कराने में कोई समस्या नहीं है अपनी अयोग्यता को आवरण देने के लिये निवीति कराते हैं।

क्रिया और मंत्रादि प्रयोग
क्रिया और मंत्रादि प्रयोग

पितृगायत्री : पितृगायत्री श्राद्ध में तीन स्थानों पढ़ जपने के लिये कहा गया है और प्रत्येक स्थान पर ३ – ३ बार। प्रथम स्थान आरम्भ है अर्थात संकल्प के पश्चात्, द्वितीय स्थान मध्य है जो अंगारभ्रमण के पश्चात् अत्रावन से पूर्व होगा एवं अंत में अर्थात दक्षिणा के पश्चात्। तीनों स्थानों पर प्रयोग तो होता है किन्तु एक बार यह त्रुटि है। ३ बार का तात्पर्य ३ बार है एक बार पाठ करके दो बार नमो नमः अथवा भवन्त्विति (अंतिम शब्द) बोलने से तीन बार नहीं होता है। यथा यदि एक माला गायत्री मन्त्र का जप करना है तो प्रथम बार पूरा गायत्री मंत्र पढ़कर तत्पश्चात प्रचोदयात् – प्रचोदयात् मात्र करना अमान्य होगा अर्थात इस प्रकार से एक माला जप की मान्यता नहीं होगी।

देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव भवन्त्विति॥
आद्यावसाने श्राद्धस्य त्रिरावृत्त्या जपेत्तदा। पिण्डनिर्वपणे वाऽपि जपेदेवं समाहितः॥
क्षिप्रमायान्ति पितरो राक्षसाः प्रद्रवन्ति च। प्रीयन्ते त्रिषु लोकेषु मन्त्रोऽयं तारयत्युत॥

ब्रह्मपुराण/२२०/१४३ – १४५

मधुमती ऋचा : श्राद्ध में न्यूनतम ४ और अधिकतम ५ बार मधुमती ऋचा (मधुव्वाता) का प्रयोग है। प्रथम तो भोजन में तदनन्तर अन्नहीनं से पूर्व पुनः सूक्तपाठ से पूर्व, तदनन्तर विकिरदान से पूर्व और पर। किन्तु एक बार प्रयोग करके अन्यत्र मधु मधु मधु करके काम चलाया जाता है यह भी लोप ही सिद्ध होता है ।

आचमन : यदि हम आचमन की बात करें तो ६ स्थानों पर आचमन का विधान है आरम्भ और समापन, पादशौच (अपात्रक में नहीं होता), विकिरदान, पिण्डदान और अर्चन के पश्चात्। किन्तु व्यवहार में आरम्भ के पश्चात् अन्यान्य सभी आचमनों का लोप किया जाता है जो लोप है अर्थात विधि का उल्लंघन है।

तन्त्रनिषेध : एक विषय तंत्रनिषिद्ध क्रियाओं का भी आता है अर्थात श्राद्ध तंत्र से कर सकते हैं किन्तु कुछ विशेष क्रियाओं में तंत्र का निषेध है। जो इस प्रकार हैं : अर्घ्य, अवनेजन (अत्रावन और प्रत्यवन), पिण्ड, अक्षय्योदक और स्वधावाचन (स्वधावाचन अपात्रक श्राद्ध में नहीं होता है); इन ६ क्रियाओं में तंत्र का निषेध है अर्थात इन ६ क्रियाओं के अतिरिक्त अन्य सभी क्रियायें एक साथ कर सकते हैं जैसे सपिण्डीकरण श्राद्ध (व्यवहार) में देखने को मिलता है।

अर्घेऽक्षय्योदके चैव पिण्डदानेऽवनेजने । तन्त्रस्य तु निवृत्तिः स्यात्स्वधावाचन एव च ॥
गोभिल स्मृति/३/७४

इसके साथ एक अन्य तथ्य भी है कि पृथक-पृथक श्राद्ध हेतु पाक भी पृथक-पृथक होना चाहिये। इस प्रकार यहां भी स्पष्ट होता है कि मासिक श्राद्ध एक बार में ही होना चाहिये न कि एक-एक करके।

पिंड निर्माण : पिंड का निर्माण जब उत्सर्ग करना हो तभी करना चाहिये और भोजन से पूर्व नहीं किया जा सकता अन्यथा शेष अन्न पिण्डशेषान्न हो जाता है, किन्तु व्यवहार में जो दिखता है वो श्राद्ध आरम्भ से पूर्व ही निर्माण करते दिखता है यह विधि का उल्लंघन है। अपण्डितों को जब सामान्य बातें समझ नहीं आती तो ये सूक्ष्म ज्ञान होना संभव ही नहीं है। किन्तु पंडित होने के अहंकार में चूर रहते हैं एवं कुतर्क से ही सब कुछ सिद्ध करते रहते हैं।

ऊह : वेद मंत्रों में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है किन्तु ये व्याकरण-व्याकरण चिल्लाते हुये वेदमंत्रों में भी परिवर्तन कर देते हैं। परिवर्तन होते ही वह वेद से बाहर का हो जाता है और मन्त्र संज्ञक नहीं रहता है।

उदाहरण : आयन्तु नः पितरः में पितरः का परिवर्तन, पितृभ्यः स्थानमसि में पितृभ्यः का परिवर्तन, मधुमती में पिता का परिवर्तन, इहलोकं परित्यज्य गतोसि में गतासि परिवर्तन, अत्र पितरो में पितरो का परिवर्तन, पितृन् अहम् आवाहयिष्ये में पितृन् का परिवर्तन, पितृन् हविषे अत्तवे में पुनः पितृन् का परिवर्तन, अमीमदन्त पितरो में पुनः, एतद्वः पितरोवासः में पितरो का परिवर्तन, तर्पयत में पितृन् में पुनः पितृन् का परिवर्तन करना अनुचित है।

सीधा तात्पर्य यह है कि जैसे ही हम वेद मंत्र में किञ्चित भी परिवर्तन करते हैं वह वेद का भाग नहीं रहता अर्थात वेदमंत्र नहीं रहता। इस कारण वेदमंत्रों में ऊह नहीं करना चाहिये हाँ जिन शाखाओं में ऊह की आज्ञा हो वो कर सकते हैं किन्तु इसका प्रमाण तो चाहिये न कि हमारी शाखा में ऊह करने की आज्ञा है।

सूक्त पाठ : रक्षोघ्नादि सूक्त पाठ हेतु पृथक वैदिक रहते हैं यद्यपि वेदज्ञ को ही श्राद्ध कराना भी चाहिये किन्तु अवैदिक (मात्र व्याकरण को प्रधान सिद्ध करते हुये) श्राद्ध कराते हैं और सूक्त पाठ अन्य वैदिकों के द्वारा कराते हैं। यहां अन्य ब्राह्मण के पाठ से कोई व्यतिक्रम नहीं है समस्या यह है कि वो कर्त्ता श्रवण भी नहीं कर पाता है जब तक वैदिक रुची-रुची रुचिः करते हैं तब तक कर्ता दक्षिणा करने पहुंच जाता है अर्थात श्राद्ध कराने वाले श्रवण नहीं करने देते हैं श्राद्ध कराते रहते हैं।

ये पाठ भी कर्त्ता का ही कार्य है यदि स्वयं न पढ़ सके तो श्रवण करे यही विकल्प है किन्तु इसके लिये तो वहां कर्म को रोकना होगा न, यदि कर्त्ता आगे की क्रिया कर रहा है तो वह सूक्त कैसे श्रवण कर रहा है ?

वेदमंत्र पढ़ाना : वर्त्तमान में सामान्य उत्सर्गादि वाक्यों के अनुसार ही वेद मन्त्र भी पदच्छेदपूर्वक पूर्वक पढ़ाये जाते हैं और इसी कारण “मुतोषसो” वाला विवाद भी उत्पन्न होता है। वेदमंत्र को स्वरपूर्वक पाठ करना चाहिये जैसे रक्षोघ्नादि सूक्त पाठ करते हैं न कि पदच्छेद पूर्वक पढ़ाना चाहिये। ऐसा करने से भी विसंगति आती है और वेदमंत्र का प्रभाव विलुप्त हो जाता है। यदि रक्षोघ्न सूक्तादि का श्रवण फलदायी है तो क्या अन्य वेदमंत्रों का श्रवण फलदायी नहीं होगा ? कर्त्ता को मात्र उत्सर्गादि वाक्य ही पढ़ाना चाहिये वेदमंत्र नहीं। यदि कर्त्ता को भी मन्त्र आता हो तो वो साथ-साथ ही पढ़ सकता है अन्यथा श्रवण मात्र करे।

उत्सर्ग सामग्री पर अधिकार

यदि हम श्राद्ध में उत्सर्ग सामग्रियों पर अधिकार की बात करें तो यह पूर्णरूपेण ब्राह्मण का ही है एवं ब्राह्मणेत्तर किसी का भी नहीं है। इसमें भी विभाग किया गया है जो केवल प्रेत कर्म में सम्मिलित होते हैं उन्हें महापात्र कहा जाता है और जो प्रेतकर्म के अतिरिक्त शेष कर्मों में सम्मिलित होते हैं वो पुरोहित कहलाते हैं। प्रेत के निमित्त जितने भी श्राद्ध किये गये अर्थात आद्य श्राद्ध, १४/१५ मासिक और सपिण्डीकरण के प्रेत श्राद्ध में प्रयुक्त/उत्सर्ग किये सभी सामग्रियों पर महापात्र का अधिकार होता है। इसी प्रकार एकादशाह को प्रेत के निमित्त किये जाने वाले दान पर भी महापात्र का ही अधिकार होता है।

सपिण्डीकरण में विश्वेदेव व तीन पितरों के श्राद्ध की सामग्री पर पुरोहित का अधिकार होता है साथ ही गरुडपुराण वाचक के निमित्त भी श्राद्ध की भांति ही सम्पूर्ण दान करना चाहिये जो द्वादशाह को करे और इसपर भी प्रथम अधिकार पुरोहित का ही होता है। इसी प्रकार कुटुम्बादि द्वारा भी दान किये जाते हैं उसपर भी पुरोहित का ही अधिकार होता है और किसी भी ब्राह्मणेत्तर का कोई भाग शास्त्रसिद्ध नहीं होता है। यजमान यदि सम्पूर्ण सामग्री भी ब्राह्मणेत्तर को देना चाहे तो दे सकता है किन्तु वहां ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं होगी अर्थात मन्त्र प्रयोग ही नहीं होगा, कोई विधान ही नहीं होगा।

स्पष्ट है विधि और मन्त्र प्रयोग पूर्वक ब्राह्मण हेतु जो कुछ भी “ब्राह्मणाय” पद से दान दिया गया उसपर ब्राह्मण का ही होगा किसी ब्राह्मणेत्तर का नहीं होगा। हां यदि ब्राह्मणेत्तर को ही देना हो तो मन्त्र और विधान का प्रयोग किये बिना दिया जा सकता है, अर्थात वहां ब्राह्मण की आवश्यकता ही नहीं होगी।

कुछ स्थानों पर बकवास करने वाले बकवादी ब्राह्मणेत्तर “ब्राह्मणाय” को ब्राह्मनाय सिद्ध करते हुये ब्राह्म से ब्राह्मण और नाय से नाइ सिद्ध करते दिखते हैं, उन धूर्तों को यह समझ नहीं है कि नाइ के जो शब्द है वह नापित है नाय नहीं। एवं ब्राह्मणाय में जो णाय है यह तो कृष्णाय में भी है वहां क्या किया जायेगा। जब हम भगवान कृष्ण की पूजा करेंगे तो क्या भगवान कृष्ण के साथ नापित को भी बैठाकर अथवा उसकी प्रतिमा बनाकर पूजा करेंगे ?

ब्राह्मणाय के णाय का जो अर्थ लगाकर बहस किया जाता है वह असंस्कृत होने के कारण किया जाता है और यह मूढ़ता की पराकाष्ठा है।

भोज का विचार

“भोज का विस्तार करना पितृ-कार्य को गौण और सामाजिक अहंकार को प्रधान बनाना है।”

भोज का विचार तो विशेष महत्वपूर्ण है क्योंकि भोज वाली व्यवस्था ने तो श्राद्ध को ही पूर्णतः विधिहीन कर दिया है। जितना बड़ा भोज होता है श्राद्ध का विधान उतना ही छोटा हो जाता है, सामग्रियों की मात्रा भले बढ़ जाती हो। यद्यपि यदि हम प्रमाणों के अनुसार विचार करें तो श्राद्ध में भोज के विस्तार का पूर्णतः निषेध किया गया है जो आगे अनेकों वचन से स्पष्ट हो जायेगा किन्तु शास्त्रविरोधी प्रवृत्ति और प्रदर्शन की भावना के कारण ही विस्तार दिया जाता है किन्तु कोई भी उसका निषेध नहीं करता।

अब तो जिला और राज्य स्तरीय भोज का भी आयोजन होने लगा है और जनसामान्य श्राद्ध का तात्पर्य भोज वाली व्यवस्था ही समझता है यदि वह प्रदर्शन न करना चाहे तब भी।

सर्वप्रथम देवश्राद्ध में दो ब्राह्मण और पितृश्राद्ध में तीन ब्राह्मण की बात कही गयी है, किन्तु अभाव होने पर अथवा असमर्थता में एक-एक की भी व्यवस्था दी गयी। यहीं एक वचन पुनः न्यूनतम १० ब्राह्मण का भी वचन प्राप्त होता है और उसके पश्चात् एकादशाह में ११ ब्राह्मण का नियम मिलता है। द्वादशाह के लिये यदि २ और तीन के पक्ष से विचार करें तो २ विश्वेदेव के निमित्त, ३ पितरों के निमित्त ९, एवं प्रेत के निमित्त ४५ हो सकते हैं कुल ५९ ज्ञात होते हैं अथवा १ – १ करने पर १९ ब्राह्मण होते हैं।

अब एक बात आती है कि भोजन हेतु ब्राह्मणों की संख्या के बारे में इतना विचार क्यों करें ? तो इसका विचार इस कारण कि अनेकानेक ग्राह्यग्राह्य विषयक तथ्य का त्याग करके भी एक विशेष विषय और है – पिता-पुत्र, दो भ्राता इनको एक साथ भोजन न कराने का अर्थात एक परिवार से एक भी ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिये क्योंकि उसके पुत्र और भाई का निषेध हो जाता है। हां यहां पर भोजन करने वाले ब्राह्मण के पूरे परिवार का भोजन भी प्रदान करें तो करें।

अब जाति, कुटुम्बादि के भोजन की बात आती है तो यहां पर एक अन्य तथ्य भी श्राद्धकर्त्ता ब्राह्मण को विदा करके बान्धवादि के साथ शांतिपूर्वक भोजन करे ऐसा होने से भोज के विस्तार की सिद्धि नहीं होती है, क्योंकि भोज के विस्तार का निषेध मिलता है। रही बात जाति आदि के भोजन सम्बन्धी महत्व का तो उसके लिये प्रथम, तृतीय, सप्तम और दशम का विधान शास्त्र से प्राप्त होता है क्योंकि इससे मृतक को अधिक तृप्ति होती है।

अथवा अन्यत्र विस्तार वाली व्यवस्था हेतु पूर्व-पर दिन का मार्गदर्शन भी किया गया है कि विस्तार करना भी हो तो श्राद्ध के दिन विस्तार न करे क्योंकि उससे श्राद्ध में ही विघ्न होता है।

एकादशेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो दद्याद्देकादशेऽहनि। भोजनं तत्र वै कस्मै ब्राह्मणाय महात्मने॥ भविष्यपुराण
प्रथमेऽह्नि तृतीये च सप्तमे दशमे तथा। ज्ञातिभिः सह भोक्तव्यमेतत् प्रेतेषु दुर्लभं ॥ मरीचि

आसुरं तद्भवेच्छ्राद्धं दश यत्र न भुञ्जते ॥

द्वौ दैवे पितृकृत्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा। भोजयेत् सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्येत विस्तरे ॥
श्रीमद्भागवत महापुराण/७/१५/३, पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/९/१३५

द्वौ दैवे पितृकृत्ये त्रीनेकैकं चोभयत्र वा। भोजयेदीश्वरोपीह न कुर्याद्विस्तरं बुधः ॥
पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/९/९६

एकैकमपि भोजनीयाश्च दैवे पित्र्ये च भोजयेत्। पुष्कलं फलमाप्नोति नाऽमन्त्रज्ञान् बहूनपि ॥ शंख

निष्कर्ष

श्राद्ध का अर्थ केवल पिण्डदान या ब्राह्मण भोजन नहीं, बल्कि ‘विधि’ और ‘श्रद्धा’ का संतुलित समन्वय है। आलेख का निष्कर्ष यह है कि वर्तमान में श्राद्ध काल (कुतप काल), मंत्रोच्चार की शुद्धता और अधिकारी के चयन में भारी त्रुटियां हो रही हैं। विशेषकर ‘षोडश श्राद्ध’ को समय के अभाव में संकुचित करना या मंत्रों में मनमाना ‘ऊह’ (परिवर्तन) करना पितरों की अतृप्ति का कारण बनता है। आत्मकल्याण और पितृ-प्रसन्नता के लिए प्रदर्शन (भोज का विस्तार) त्यागकर शास्त्रोक्त विधि (मन्त्र, पात्र और काल) को अपनाना ही एकमात्र मार्ग है।

आलेख का मूल निष्कर्ष यह है कि श्राद्ध केवल ‘भोज’ या ‘पिण्डदान’ का नाम नहीं, बल्कि ‘काल, पात्र और मन्त्र’ के त्रिवेणी संगम का नाम है। वर्तमान में ‘एक-एक मासिक’ करने के नाम पर जो समय का अपव्यय और निषिद्ध काल (सायाह्न) में श्राद्ध किया जा रहा है, वह शास्त्र विरुद्ध है। पितरों की अक्षय तृप्ति के लिए कुतप काल की मर्यादा, मन्त्रों का अविकृत पाठ और न्यायोपार्जित द्रव्य की शुद्धि अनिवार्य है। यदि विधि दूषित है, तो भारी सामग्री और श्रद्धा भी निष्फल हो जाती है।

॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

“संबंधित प्रश्न” (FAQ)

FAQs

प्रश्न: क्या एक दिन में सभी मासिक श्राद्ध हो सकते हैं?

उत्तर: हाँ, द्वादशाह को ‘तंत्र’ विधि से एक साथ विधान किया जा सकता है।

प्रश्न: ब्राह्मण भोजन में कितने ब्राह्मण होने चाहिए?

उत्तर: देव कार्य में २ और पितृ कार्य में ३ (अभाव में १-१)।

प्रश्न: षोडश श्राद्ध कब किया जाता है?

उत्तर: मृत्यु के ११वें और १२वें दिन (एकादशाह-द्वादशाह)।

प्रश्न: क्या ब्राह्मण के साथ कर्ता भोजन कर सकता है?

उत्तर: नहीं, ब्राह्मण विसर्जन के उपरांत ही भोजन का विधान है।

प्रश्न: ब्राह्मण भोजन में विस्तार का निषेध क्यों है?

उत्तर: क्योंकि अधिक विस्तार से विधि और शुद्धि प्रभावित होती है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

अस्वीकरण: यह आलेख पूर्णतः शास्त्रीय शोध, मिथिला की प्राचीन परंपराओं और धर्मशास्त्रों के विश्लेषण पर आधारित है। यहाँ व्यक्त विचार कर्मकाण्ड की सूक्ष्मताओं को समझने हेतु शैक्षिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के उद्देश्य से प्रस्तुत किए गए हैं। किसी भी क्षेत्र विशेष की परंपरा (देशाचार) में परिवर्तन करने से पूर्व स्थानीय विद्वानों और आचार्यों से परामर्श अवश्य लें। लेखक का उद्देश्य किसी भी वर्ग या व्यक्ति विशेष की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि शास्त्रीय मर्यादा के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना है।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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