“जन्म, ज्ञान और तप—ये तीन मिलकर ही पूर्ण ब्राह्मणत्व का निर्माण करते हैं।”
योग्य कर्मकांडी का चयन करना एक जटिल विषय हो गया है और नगरों में तो कर ही नहीं सकते। यदि करेंगे भी तो गांवों अथवा छोटे शहरों में ही कर सकते हैं। चर्चा की आवश्यकता इसलिये है कि वास्तव में लोगों की इच्छा योग्य कर्मकांडी की ही होती है जो विधिपूर्वक कोई भी कर्म कराते हों, शास्त्रज्ञ हों। किन्तु धूर्तों ने ऐसा आडम्बर रचा है एवं कलयुग का प्रभाव है अयोग्यों को ही योग्य समझ लिया जाता है। इसलिये वर्त्तमान युग में लक्षणों के आधार पर योग्य ब्राह्मण को कैसे चुना जाये इसको समझना आवश्यक है और इस आलेख में यही बताया गया है।
लक्षणों के आधार पर योग्य ब्राह्मण कैसे चुने ?
लक्षणों के आधार पर योग्य ब्राह्मण चुनने का तात्पर्य यह है कि ज्ञान का आकलन करना लगभग असंभव हो गया है और इसका कारण यह है कि यजमान पक्ष शास्त्रज्ञान में शून्य है फिर वो किसी भी ब्राह्मण के ज्ञान का आकलन कर ही नहीं सकता। यदि करने में सक्षम होता तो ढेरों मूर्ख लोग पंडित के रूप में नहीं जाने जाते।
अधिकांश मूर्ख ही पंडित के रूप में जाने जाते हैं यद्यपि पंडित स्वयं को भी स्थापित कर ही लेते हैं किन्तु सभी स्थापित पंडित नहीं होते हैं अर्थात विद्वान नहीं होते हैं। अधिकांशतः तो शिक्षक वर्ग के सरकारी सेवक होते हैं जिनको जनसामान्य विद्वान समझ लेता है किन्तु उनमें से अधिकांशतः व्याकरण अथवा साहित्य के ज्ञाता होते हैं, धर्मशास्त्र के ज्ञाता नहीं अर्थात धर्म और कर्मकांड के विषय में अल्पज्ञ ही होते हैं। यदि ज्ञानी अथवा तपस्वी होते तो वो सेवावृत्ति ही नहीं ग्रहण करते, भले भूखे रहते।
ब्राह्मण की योग्यता
जब हम ब्राह्मण की योग्यता की बात करते हैं तो प्रथम यह स्पष्ट होना चाहिये कि योग्यता का निर्धारण कैसे होगा ? क्या अपने मन से कल्पना करके स्थापित कर सकते हैं अथवा शास्त्रों के अनुसार विचार करेंगे ? एक त्रुटि यह भी है कि हम कल्पना को ही स्थापित करते हैं अथवा कहीं किसी ने भ्रमित कर दिया और तदनुसार कल्पित कर लेते हैं। शास्त्रों के अनुसार वास्तविक अर्हता क्या है उसे नहीं जानते और योग्य ब्राह्मण को पहचान भी नहीं पाते अपितु योग्य ही अयोग्य प्रतीत होते हैं और अयोग्य को ही योग्य समझ लेते हैं। शास्त्रों में ब्राह्मण के लिये तीन अर्हता बताई गयी है :

- जन्म
- ज्ञान
- तप
तपः श्रुतं च योनिश्चाप्येतद्ब्राह्मण्यकारणम्। त्रिभिर्गुणैः समुदितः स्नातो भवति वै द्विजः॥
महाभारत/१३-अनुशासनपर्व/१८३/७
पुनः
तपः श्रुतं च योनिश्चेत्येतद् ब्राह्मणकारकम्। तपःश्रुताभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव सः ॥
तप प्रथम स्थान पर है, ज्ञान द्वितीय स्थान पर है और जन्म तृतीय स्थान पर है किन्तु जन्म अनिवार्य है और जन्म का दो तात्पर्य है, जन्मना व द्वितीय जन्म संस्कार। अनिवार्यता ऐसे सिद्ध होती है कि तप और श्रुति (ज्ञान) से रहित होने पर जातिमात्र अथवा नामधारक ब्राह्मण कहा गया है अर्थात जन्मना ब्राह्मण में ही दो अर्हता का और विचार करना चाहिये और वो दोनों है तप एवं ज्ञान।
अब इसको इस प्रकार समझा जा सकता है कि एक ब्राह्मण तप और ज्ञान दोनों से रहित है और केवल जन्मना है एवं दूसरा शास्त्रज्ञ भी है तो दूसरा योग्य होगा। इसी प्रकार यदि तृतीय ब्राह्मण भी हों और वो जन्म से भी हों, शास्त्रज्ञ भी हों एवं तप भी करते हों तो वो दोनों से अधिक योग्य होंगे। तृतीय एवं द्वितीय के अभाव में प्रथम अर्थात जन्मना ब्राह्मण भी ग्राह्य होंगे किन्तु उपस्थिति में नहीं। तृतीय की उपस्थिति हो तो दोनों से योग्य होंगे, यदि तृतीय उपस्थित न हों तो द्वितीय ही ग्राह्य होंगे और तृतीय व द्वितीय दोनों के अभाव में ही प्रथम ग्राह्य होंगे।
“तप और ज्ञान से रहित ब्राह्मण केवल जातिमात्र या नामधारक विप्र है।”
जन्म
जन्मना की अनिवार्यता का तात्पर्य यह है कि उसके माता और पिता दोनों ही ब्राह्मण वर्ण के हों एवं विधिपूर्वक विवाह संस्कार हुआ हो। लव-मैरिज या कोर्ट मैरिज का महत्व नहीं होगा अथवा यदि विधिपूर्वक ही विवाह किये हों किन्तु अंतर्जातीय विवाह किये हों तो भी मान्यता नहीं होगी।
पुनः उसके संस्कार भी यथोचित काल में हुये हों, अधिकांशतः संस्कार विलुप्त हो चुके हैं ५ – ६ ही शेष हैं तो चूडाकरण, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन, विवाह ये संस्कार हुये हों, दाह संस्कार तो मृत्यु के उपरांत ही होगा अर्थात दाह संस्कार के पश्चात् उपलब्ध ही नहीं होंगे।
स्वयं के साथ-साथ उन्होंने स्वयं किसे जन्म दिया है इसका भी विचार होगा। यदि उन्होंने भी ब्राह्मण को जन्म दिया है तो उचित अन्यथा वर्णसंकर आदि को जन्म देने पर अनुचित। अर्थात उन्होंने स्वयं भी ब्राह्मण कन्या से ही विधिपूर्वक विवाह किया हो यह भी आवश्यक है एवं शास्त्रानुसार सगोत्रादि का परित्याग करके किया हो यह भी आवश्यक है। यदि सगोत्रादि से विवाह कर लिया हो अथवा अंतर्जातीय विवाह किया हो अथवा विधिपूर्वक विवाह न किया हो और उससे संतान भी उत्पन्न कर चुका हो तो वह अयोग्य में गण्य होगा।
वर्त्तमान में तो ढेरों धर्मद्रोही जन्मना सिद्धांत को ही अस्वीकार करने लगे हैं और कर्मणा-कर्मणा का अधर्म कर रहे हैं। श्रीराम जन्म से ही क्षत्रिय थे और रावण जन्म से ही ब्राह्मण था। श्रीकृष्ण जन्म से ही क्षत्रिय थे और सुदामा जन्म से ही ब्राह्मण। लव-कुश भी जन्म से ही क्षत्रिय था अन्यथा उसे तो ब्राह्मण हो जाना चाहिये था। दोणाचार्य, अश्वत्थामा आदि की गणना ब्राह्मण में ही होती है न कि क्षत्रिय में।
सर्पों की विभिन्न प्रजातियां जन्म से ही गुणों को धारण करती हैं एवं जन्म के अनुसार ही विष होगा अथवा नहीं, विष होगा तो कितना घातक होगा आदि सुनिश्चित होता है, आकार, रंग-रूप आदि भी जन्म से ही निर्धारित होते हैं। इसी प्रकार यदि गाय को ही लें तो ढेरों प्रजातियां हैं एवं जन्म से ही निर्धारित होता है कि उसका आकार क्या होगा, दुग्ध की मात्रा गुणवत्ता आदि भी निर्धारित होता है। यदि संकर हो जाये तो भी उसमें अंतर आ जाता है और इसका कारण भी जन्म ही है।
तात्पर्य यह है कि जन्म एक अनिवार्य अर्हता है यदि जन्म से ब्राह्मण न हो तो तप और ज्ञान से ब्राह्मणत्व प्राप्त नहीं किया जा सकता। किन्तु तप और ज्ञान दोनों से रहित होने पर भी जन्मना ब्राह्मण ही कहा जायेगा जिसे जातिमात्र अथवा नामधारक ब्राह्मण कहा गया है। कर्मणा-कर्मणा चिल्लाने वाले वास्तव में धर्मद्रोही हैं और धर्म का क्षरण कर रहे हैं हां दिखावा में कुछ धार्मिक कार्य और चर्चा भले करते दिखें। कालनेमि कहना भी अनुचित नहीं होगा।
ज्ञान
ज्ञान का मुख्य तात्पर्य गुरुमुखी होकर वेदज्ञान प्राप्त करना है, व्यापक तात्पर्य में सम्पूर्ण शास्त्र ज्ञान प्राप्त करना है और सामान्य तात्पर्य में कर्मकांड की आवश्यकता के अनुसार वेदज्ञान एवं अन्यान्य धर्मशास्त्रों का विशेष ज्ञान प्राप्त करना है। सामान्य जीवन में वेद मंत्रों के प्रयोग से अधिक उसके विधि-विधान आदि का ज्ञान होना अधिक आवश्यक है।
जैसे महामृत्युंजय जप करना है तो मन्त्र तो एक ही है किन्तु उसके पुरश्चरण का विधान जो अन्यान्य शास्त्रों में है वो बहुत विस्तृत है। हवन हेतु भी वेदमन्त्र तो २५ – ५० ही हैं किन्तु हवन विधान बहुत विस्तृत व जटिल है जो अन्य शास्त्रों में वर्णित है। यद्यपि इसे वेद से भिन्न भी नहीं कहा जा सकता वेदांग में ही समाहित हो भी जाता है तो वहां दो भागों में समझा जा सकता है।
अब यहां पर एक और वर्गीकरण की आवश्यकता होगी और वो कर्म के आधार पर होगा कि किस कर्म हेतु आवश्यकता है ? यदि श्रुतिप्रतिपादित कर्म करेंगे तो श्रोत्रिय ब्राह्मण की ही आवश्यकता होगी और यदि सामान्य ग़ृहस्थाचरण करते हुये विभिन्न संस्कार, पूजा आदि करने के लिये ब्राह्मण चाहिये तो वो नामधारक श्रोत्रिय होते हुये भी यदि शास्त्रज्ञ (स्मृति-पुराण, अन्यान्य धर्मशास्त्र और विधि-विधान के ज्ञाता) हैं तो उनकी आवश्यकता होगी किन्तु पुनः भोजन, दान आदि में श्रोत्रिय का महत्व अधिक होगा।

अर्थात कर्म कराने के लिये विधि-विधान के अधिक ज्ञाता की आवश्यकता होगी और नामधारक श्रोत्रिय का तात्पर्य नामधारक ब्राह्मण के अनुसार ही समझना चाहिये अर्थात जिसके पिता ने उपनयन, वेदारम्भ तो किया किन्तु वेदज्ञान नहीं दिया और अन्यत्र से भी वेदज्ञान प्राप्त नहीं किया।
वर्त्तमान कालीन विभिन्न सरकारी विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय में वेदज्ञान प्राप्त करने वाले भी नामधारक श्रोत्रिय की श्रेणी में कहे जायेंगे। नामधारक श्रोत्रिय शब्द नामधारक ब्राह्मण के आधार पर कल्पित है। अर्थात जो वर्त्तमान कालीन सरकारी विद्यालय, विश्वविद्यालय में वेद का अध्ययन करते हैं वो श्रोत्रिय नहीं होंगे और उनकी तुलना में तो वही श्रेष्ठ ब्राह्मण होंगे जिन्होंने घर में पिता-पितामहादि से थोड़ा भी वेदज्ञान प्राप्त किया हो।
तप
तप का तात्पर्य प्राप्त ज्ञान के अनुसार अपने विहित और निषिद्ध कर्म का ज्ञान होना और उसका पालन करना अर्थात व्यावहारिक प्रयोग करना है। जैसे नित्यकर्म का ज्ञान हो गया उसके बाद उसे संपन्न करना है। भक्ष्याभक्ष्य का ज्ञान तो प्राप्त कर लिया अब उसका निर्वहन करना तप है।
प्रायश्चित्त सम्बन्धी ज्ञान तो प्राप्त कर लिया अब पाप होने पर प्रायश्चित्त लेकर करना व्यवहार है एवं अन्य को प्रायश्चित्त देने से पूर्व शास्त्र के अनुसार विचार करना और फिर देना, लोभवश नहीं देना आदि तप है। अर्थात शास्त्रप्रतिपादित विहित कर्म करना और निषिद्ध कर्म न करना तप है। सत्य बोलना और असत्य न बोलना भी तप है, यदि सत्य बोलने का ज्ञान है किन्तु बोलते नहीं है तो ज्ञान युक्त व तपरहित कहे जायेंगे।
इसका भी विश्लेषण इसलिये आवश्यक था कि तप का तात्पर्य यहां वन में जाकर, पर्वत पर जाकर अथवा जल में स्थिर होकर तपस्या करना नहीं है। वह भी तपस्या है और सामान्य लोग तपस्या का यही अर्थ ग्रहण करते हैं किन्तु ब्राह्मण विषयक चर्चा में यहां तप का आश्रय गृहस्थ ब्राह्मण से संबंधित है जो समाज में उपस्थित हैं और लोगों का कर्मकांड कराते हैं। इनके लिये तप का ऐसा ही अर्थ है कि शास्त्र की मर्यादा में रहते हुये गार्हस्थ जीवन जीते हैं, शास्त्रोचित में प्रवृत्त और शास्त्रनिषिद्ध से निवृत्त रहते हैं।
अब ज्ञान और तप का यदि तुलनात्मक अध्ययन करें तो ज्ञान होने पर ही तप संभव है जो यहां ग्रहण किया गया है। ज्ञान के अभाव में तप नहीं हो सकता। अर्थात शास्त्रज्ञ तो तपस्वी हो सकते हैं किन्तु शास्त्रज्ञ न हो तो तपस्वी भी नहीं होंगे यह सिद्ध होता है।
जिसे नित्यकर्म का ज्ञान ही नहीं हो वह नित्यकर्म करेगा कैसे और इस अवस्था में दोनों से रहित कहे जायेंगे। हाँ नित्यकर्म का ज्ञान होने पर भी नित्यकर्म न करे ऐसा भी हो सकता है और इस अवस्था में शास्त्रज्ञ तो कहे जायेंगे किन्तु तपस्वी नहीं। तप यदि अल्पज्ञान प्राप्त करके कर भी लें तो भी कर्मकांड सम्पन्न कराने के लिये तो शास्त्रज्ञान की अनिवार्यता है हां भोजन, दान आदि ग्रहण करने के लिये तप (अल्पज्ञान) में भी अधिकार हो जायेगा।
इस प्रकार यहां यह सिद्ध हो रहा है कि कर्मकांडी के लिये शास्त्रज्ञान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है और जन्म तो अनिवार्य है ही एवं यदि तप से भी युक्त हों तो सोने में सुहागा।
यहां यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि तप से युक्त न होना एक विषय है और शास्त्रविरुद्ध आचरण करना, पापी होना दूसरा विषय है। तप से युक्त न होने का तात्पर्य प्रत्यवाय दोष युक्त होना है और पापाचारी होने का तात्पर्य पापकर्मों में लिप्त होना है। इतना स्पष्ट करना इस कारण आवश्यक हो जाता है कि सामान्यतः लोग मुख्य भाव को ग्रहण न करके अनर्थ करने का ही प्रयास करते हैं।
सदाचार
“सदाचार ही वह आधार है जो अल्पज्ञ ब्राह्मण को भी पूजनीय बनाता है।”
अब आगे एक अन्य तथ्य भी आता है और वो है सदाचार। सदाचारी ब्राह्मण को भी उत्तम कहा गया है। सदाचार का तात्पर्य है विद्वान हो अथवा न हो, तपस्वी हो अथवा न हो किन्तु येन-केन प्रकारेण पापकर्मों को जानता और समझता है एवं उससे विमुख भी रहता है साथ ही सामान्य धर्म को भी जानता है एवं उसका पालन करता है। शास्त्रज्ञ होने का तात्पर्य सदाचारी होना नहीं होगा और सदाचारी होने का तात्पर्य भी शास्त्रज्ञ होना नहीं होगा। सदाचार भी तप की श्रेणी में ही आएगा अर्थात तप का विकल्प भी कहा जा सकता है।

शास्त्रज्ञ यदि दुराचारी हो एवं सदाचारी यदि शास्त्रज्ञ न हो तो वहां भी भोजन-दान आदि के लिये सदाचारी ही ग्राह्य होगा किन्तु कर्मकांड संपन्न कराने के लिये सदाचारी उस अवस्था में अयोग्य होगा यदि उसे शास्त्र विधि का ज्ञान नहीं है किन्तु शास्त्रज्ञ भी अयोग्य होगा यदि वह दुराचारी है। किन्तु यदि सदाचारी शास्त्रज्ञ अनुपलब्ध हों तो दुराचारी शास्त्रज्ञ भी ग्राह्य होंगे।
यस्मिन् देशे य आचारः पारम्पर्यक्रमागतः । वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ॥
भविष्यपुराण/१/७/६१
आचारः परमो धर्मः सर्वेषामिति निश्चयः। हीनाचारपरीतात्मा प्रेत्य चेह च नश्यति ॥
नैनं तपांसि न ब्रह्म नाग्निहोत्रं न दक्षिणाः। हीनाचारमितो भ्रष्टं तारयन्ति कथंचन ॥
आचारहीनं न पुनन्ति वेदा यद्यप्यधीताः सह षड्भिरङ्गैः।
छन्दंस्येनं मृत्युकाले त्यजन्ति नीडं शकुन्ता इव जातपक्षाः ॥
आचारहीनस्य तु ब्राह्मणस्य वेदाः षडङ्गास्त्वखिलाः सयज्ञाः।
कां प्रीतिमुत्पादयितुं समर्था अन्धस्य दारा इव दर्शनीयाः ॥
नैनं छन्दांसि वृजिनात्तारयन्ति मायाविनं मायया वर्तमानम्।
द्वेऽप्यक्षरे सम्यगधीयमाने पुनाति तद्ब्रह्म यथा इषेऽब्दाः ॥
दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः। दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ॥
आचारात्फलते धर्म आचारात्फलते धनम्। आचाराच्छ्रियमाप्नोति आचारो हन्त्यलक्षणम् ॥
सर्वलक्षणहीनोऽपि यः सदाचारवान्नरः। श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥
वशिष्ठ स्मृति/६/१ – ८
आचारः परमो धर्मः श्रुत्युक्तः स्मार्त एव च । तस्मादस्मिन्सदा युक्तो नित्यं स्यादात्मवान्द्विजः ॥
आचाराद्विच्युतो विप्रो न वेदफलमश्नुते । आचारेण तु संयुक्तः सम्पूर्णफलभाग्भवेत् ॥
एवं आचारतो दृष्ट्वा धर्मस्य मुनयो गतिम् । सर्वस्य तपसो मूलमाचारं जगृहुः परम् ॥
मनु स्मृति/१/१०८ – ११०
अब यहां सदाचार की विशेष चर्चा तो नहीं की जा सकती किन्तु इतना अवश्य ही स्पष्ट किया जायेगा कि देशाचार के नाम पर अपण्डित जन दुराचार को भी देशाचार-लोकाचार आदि सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। क्या उचित और क्या अनुचित इसका शास्त्रोचित निर्णय विद्वान ही कर सकते हैं। विद्या आयु के बंधन से बंधी भी नहीं होती अर्थात १०० वर्ष का वयोवृद्ध भी मूर्ख हो सकता है एवं अल्पवयस्क भी विद्वान हो सकता है।
एक अपण्डित बिल्ली बांधने को देशाचार कह सकता है किन्तु एक विद्वान नहीं। विद्वान लाजा बनाने के भिन्न-भिन्न व्यावहार को देशाचार कहेंगे। विवाह होम में लाजा की आवश्यकता होती है और इसके लिये भिन्न-भिन्न देशों में भिन्न-भिन्न समय, व्यक्ति आदि का चयन करने की परम्परा हो सकती है। कहीं चूल्हा बनाकर भी किया जा सकता है तो कहीं ईंट से घेरकर तो कहीं सीधे आग जोड़कर।
लाजा होम न करके अग्निप्रदक्षिणा करते हुये चारों ओर फेंक देना सदाचार/देशाचार नहीं कहा जा सकता, होम करना ही सदाचार कहा जा सकता है और फेंक देना अनाचार। धोती पहनकर विवाह करना ही सदाचार कहा जा सकता है पैंट पहनकर विवाह करना अनाचार ही कहा जायेगा।
अपण्डितों ने पैंट-पैजामे में भी विवाह कराना आरम्भ कर दिया आगे उसे ही देशाचार/लोकाचार भी सिद्ध करेंगे और यदि कोई एक विद्वान उसका खण्डन करें भी तो मूर्खतंत्र के मूर्खों की टोली देशाचार/लोकाचार ही सिद्ध करने का प्रयास करेगी।
वह आचरण जो सत्पुरुषों द्वारा किया गया और देखने से ज्ञात हुआ किन्तु विद्वानों ने शास्त्रविरुद्ध नहीं सिद्ध किया भले ही शास्त्रसिद्ध भी न हो वही सदाचार कहा जा सकता है। वैसे मूल रूप से सदाचार का तात्पर्य विद्वान का शास्त्रसम्मत आचार ही है, अर्थात वह ज्ञान जो शास्त्र से प्राप्त न होकर विद्वानों के आचरण से अर्थात उनको करते देखा और ज्ञात हुआ सदाचार है। जैसे किसी को ये ज्ञान शास्त्र से प्राप्त नहीं हुआ :
- दंतधावन कैसे करना चाहिये।
- स्नान कैसे करें।
- भोजन कैसे करें।
किंतु विद्वानों/सत्पुरुषों को जैसे करते देखा उसे उचित स्वीकार किया और वो शास्त्रोचित था तो वही सदाचार होगा।
लक्षण
अब हम उन लक्षणों को समझने का प्रयास करेंगे जिससे यह ज्ञात होगा कि कोई ब्राह्मण योग्य हैं अथवा नहीं किन्तु इसमें दो विषय हैं यह स्पष्ट है। प्रथम विषय यह है कि भोजन-दान आदि के लिये योग्य ब्राह्मण और द्वितीय विषय है कर्मकाण्ड संपन्न कराने वाले योग्य कर्मकांडी। योग्य ब्राह्मण ही योग्य कर्मकांडी हों ऐसा भी आवश्यक नहीं है एवं योग्य कर्मकांडी ही योग्य ब्राह्मण भी हों यह भी आवश्यक नहीं है। योग्य ब्राह्मण में तप-सदाचार की प्रधानता होगी किन्तु वो ज्ञानाभाव के कारण योग्य कर्मकांडी नहीं हो सकते एवं ज्ञान की अधिकता से योग्य कर्मकांडी जो होंगे वो तप-सदाचार की न्यूनता के कारण योग्य ब्राह्मण नहीं हो सकते।
योग्य कर्मकांडी
- शास्त्रों के प्रमाण द्वारा किसी विषय को उचित अथवा अनुचित सिद्ध करते हों।
- किसी भी कर्मकांड के विधि-विधानों को शास्त्रों के अनुसार प्रामाणिक रूप से बताते हों; यथा : उचित काल, कर्त्ता के नियम, कर्म के नियम आदि।
- सत्य बोलते हों, और जो शास्त्र विरुद्ध अर्थात अनुचित कहा वो लोभादि से भी न करते हों।
- कर्मकांड में अनिवार्यतः धोती धारण कराते हों और कुर्ते भी पहनने न देते हों।
- गायत्री मन्त्र और प्रजापतये स्वाहा का उच्चारण न करते हों।
- हवन में स्त्री-कन्या-अनुपनीत आदि को आहुति न देने देते हों।
- प्रेतांश ग्रहण न करते हों अर्थात सपिंडीकरण से पूर्व श्राद्ध में कुछ भी न लेते हों, जिसके घर में श्राद्ध हो उसका चाय तक भी न पीते हों।
- कर्मकांड के अतिरिक्त अर्थात कभी भी पैंट-पजामा आदि पहनकर न घूमते हों, घर में विश्रामकाल को छोड़कर।
- प्लास्टिक आदि की कुर्सी पर बैठकर कर्मकांड न कराते हों, काष्ठ की बड़ी कुर्सी जिसपर पालथी लग सके उसके अतिरिक्त अर्थात पालथी लगाकर ही बैठते हों।
- बुफे सिस्टम में भोजन न करते हों, खड़े-खड़े चाय-पानी भी न पीते हों।
- चाय-पानी भी दांये हाथ से पूर्व-उत्तर मुख ही पीते हों।
- भोजन में अलग से नमक न लेते हों अथवा आवश्यकता में लेते भी हों तो सब्जी आदि में मिला देते हों।
- शिखा इतनी बड़ी हो कि ग्रंथि लग सके और कर्मकांड आदि में ग्रंथि हो।
- इस विषय को स्पष्ट कहते हों कि जैसे मैंने कहा वैसे ही होगा, अर्थात जो कहा वही कराते हों, यजमान के कहे अनुसार नहीं।
- पायस से स्विष्टकृद्धोम करना हो तो हवन की अग्नि में ही पकाते हों। पायस होम ही करना हो तो हवन की अग्नि पर ही पकाते हों।
- पूजा आदि सम्पन्न होने के पश्चात् सभी शेष सामग्री भी ब्राह्मण का ही होगा ऐसा कहकर सहमति से लेते हों।
- स्टेज आदि पर खड़े-खड़े वेदपाठ न करते हों।
- यजमान को अप्रिय लगेगा ऐसा न सोचकर उचित निर्णय-निर्देश देते हों।
- स्पष्ट निर्णय-निर्देश देते हों।
- किसी भी प्रकार का दुराचार वर्त्तमान में ज्ञात न हो।
- माता-पिता का परित्याग न किये हों।
अयोग्य कर्मकांडी
- बात-बात में देशाचार/कुलाचार का राग अलापते हों।
- अधिकांशतः अमुक ने ऐसा किया था, वहां ऐसा देखा था, उन्होंने ऐसा कहा था इसी प्रकार से वर्णन करते हों।
- यजमान भी जिसका झूठ पकड़ लेता हो अर्थात यजमान के समक्ष भी झूठ बोलते हों।
- पैंट-पैजामे में भी सभी पूजा-पाठ करा देते हों।
- गायत्री मन्त्र और प्रजापतये स्वाहा का भी उच्चारण करते हों।
- स्त्री-कन्या-अनुपनीत बालक से भी होम कराते हों।
- प्रेतांश ग्रहण करते हों जैसे सपिण्डीकरण से पूर्व दान, भोजन, वरण, भोजन आदि।
- कर्मकांड में न होने पर पैंट-पजामा पहनकर भी घूमते हों।
- भाड़े की कुर्सी पर ही नहीं खड़े-खड़े भी कर्मकांड कराते हों।
- बुफे सिस्टम में जूते-चप्पल पहनकर, शिखा बांधे चलते-फिरते भी भोजन कर लेते हों।
- चाय-पानी बांये हाथ से भी पीते हों, दक्षिणमुख भी पीते हों।
- अलग से नमक लेकर सब्जी आदि में मिलाये बिना भी जैसे सलाद, फल आदि से सटाकर खाते हों जिसमें नमक दिखता भी हो।
- शिखा इतनी अल्प कि ग्रंथि भी न लग सके अथवा बड़ी होने पर भी ग्रंथि न लगाते हों।
- यजमान के कहे अनुसार कराते हों अर्थात यजमान को निर्णय देते न हों अपितु इतने अल्पज्ञ हों कि यजमान किसी दूसरे की बात करके कुछ कहे तो वही करा दें जैसे सिर पर रुमाल रखना, पगड़ी पहनना आदि।
- घर में बने पायस व अन्यान्य पूड़ी, हलवे आदि से भी स्विष्टकृद्धोम करा देते हों। अथवा घर में बने पायस की भी आहुति दिलाते हों।
- पूजा आदि संपन्न होने के पश्चात् शेष सामग्री में से कुछ छोड़ते हों और कुछ चोरी-छिपे लेते हों।
- गुटका सेवी, मद्यप आदि हों।
- मैले-कुचैले, जले-फटे कपड़े भी पहनते हों।
- मेक-अप करते हों, बाल रंगते हों आदि।
- जूते-चप्पल पहनकर भी मन्त्र-स्तोत्रादि का पाठ करते हों।
- यजमान को अप्रिय न लगे ऐसा सोचकर मीठी वाणी बोलते हों, चिकनी-चुपड़ी बातें करते हों।
- दुविधापूर्ण निर्णय-निर्देश करते हों और यजमान के प्रश्न करने पर तुरंत पलट भी जाते हों।
- वर्त्तमान में भी दुराचार करते हैं ऐसा ज्ञात हो।
- माता-पिता का परित्याग किये हों।
इसी प्रकार और भी बहुत सारे लक्षणों को चिह्नित किया जा सकता है किन्तु ऊपर जो महत्वपूर्ण लक्षण-आचरण बताये गए हैं उसके आधार पर भी पूर्णरूपेण नहीं अधिकांश का विचार किया जाना चाहिये। पूर्णरूपेण विचार करने पर कोई भी योग्य नहीं मिलेंगे सभी अयोग्य ही सिद्ध होंगे जैसे मैं भी। जिसमें जितना अधिक योग्यता का लक्षण और जितना काम अयोग्यता का लक्षण मिले उसे उतना अधिक श्रेष्ठ/योग्य कर्मकांडी समझना चाहिये।

न्यूनतम का भी आधार नहीं हो सकता यदि योग्यता का एक भी लक्षण किसी एक में दिखे और दूसरे में न दिखे तो एक लक्षण वाला ही श्रेष्ठ होगा, ग्राह्य होगा। यदि किसी में एक भी न दिखे और अन्य में भी न दिखे तो समान ही होंगे और उपरोक्त में से एक भी लक्षण न मिलने पर और लक्षणों से विचार करना होगा, किन्तु जन्मना भी ग्राह्य हों यह अनिवार्य होगा।
\ऐसा नहीं कि सुयोग्य ब्राह्मणों का पूर्णतः अभाव ही है किन्तु सामान्य जीवन में अभाव है और शहरों में पूर्णतः अभाव है। यजमान सुयोग्य ब्राह्मण तो चाहता है किन्तु स्वयं की अर्हता से मुक्त भी है। जो यजमान ही अयोग्य है, अनर्ह है, कर्माधिकार से च्युत है उसके लिये सुयोग्य ब्राह्मण उपलब्ध हो ही नहीं सकते, यदि उपलब्ध हो भी जायें तो यजन स्वीकार नहीं करेंगे। अर्थात सामान्य जीवन में अनर्ह यजमानों को जो मिल जायें वही योग्य हैं। मैं स्वयं भी सुयोग्य नहीं हूँ किन्तु ढेरों यजमानों का त्याग करता हूँ।
निष्कर्ष
आलेख का निष्कर्ष यह है कि ब्राह्मण की वास्तविक शक्ति उसकी ‘सामाजिक पूछ’ में नहीं, बल्कि उसके ‘तप और शास्त्रज्ञान’ में निहित है। वर्तमान में ‘श्रेष्ठ’ का मिलना कठिन है, अतः ‘न्यूनतम अयोग्य’ का चयन ही एकमात्र विकल्प शेष है। ब्राह्मण का पतन तब हुआ जब उसने ‘स्वधर्म’ को त्यागकर केवल ‘वृत्ति’ (आजीविका) को प्रधानता दी। अंततः, यजमान को केवल मीठी वाणी पर नहीं, बल्कि ब्राह्मण के आचरण-व्यवहार, आहार की शुद्धि और शास्त्र-निष्ठा के आधार पर ही चयन करना चाहिए।
॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
“संबंधित प्रश्न” (FAQ)
FAQs
प्रश्न: ब्राह्मण होने की अनिवार्य शर्तें क्या हैं?
उत्तर: जन्म (कुल), ज्ञान (श्रुति) और तप (आचरण)।
प्रश्न: क्या केवल जन्म से कोई ब्राह्मण होता है?
उत्तर: हाँ, वह ‘जातिमात्र’ ब्राह्मण है, पर कर्मकाण्ड हेतु ज्ञान और तप आवश्यक हैं।
प्रश्न: बुफे सिस्टम में भोजन करने का क्या परिणाम है?
उत्तर: खड़ा होकर, जूता-चप्पल पहनकर भोजन करना शास्त्रविरुद्ध है।
प्रश्न: दुराचारी शास्त्रज्ञ और सदाचारी अल्पज्ञ में कौन श्रेष्ठ है?
उत्तर: भोजन-दान हेतु सदाचारी श्रेष्ठ है, कर्मकांड हेतु शास्त्रज्ञ श्रेष्ठ है।
प्रश्न: क्या ‘कर्मणा ब्राह्मण’ का सिद्धांत सही है?
उत्तर: नहीं, सनातन धर्म में वर्ण का आधार जन्म है, कर्म उसकी शुद्धि का साधन है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: इस आलेख में व्यक्त विचार विशुद्ध रूप से व्यक्तिगत शास्त्रीय शोध और स्मृतियों के प्रमाणों पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि धर्म-संरक्षण हेतु ब्राह्मण समाज को उसकी खोई हुई मर्यादा और ज्ञान-परंपरा के प्रति जाग्रत करना है। लेखक द्वारा प्रस्तुत लक्षणों का आधार शास्त्रों के निम्नतम मानकों पर आधारित विश्लेषण है।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।









