आपको यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि अच्छे भली सोच रखते हुये भी आपकी दैनिक पूजा में छोटी-छोटी गलतियाँ हो सकती हैं। अधिकांश लोग घर पर प्रतिदिन किसी न किसी प्रकार से पूजा करते हैं और उसे नित्यकर्म समझते हैं अथवा दैनिक पूजा नामक शब्द प्रयोग करते हैं। किन्तु शास्त्रज्ञान के अभाव में छोटी-छोटी गलतियाँ हो सकती हैं। यह आलेख घर पर की जाने वाली दैनिक पूजा में होने वाली कुछ आम त्रुटियों पर प्रकाश डालता है और यह सुनिश्चित करने के लिए व्यावहारिक सुझाव देता है कि आपकी पूजा सार्थक और प्रभावी दोनों हो।
घर में दैनिक पूजा में होने वाली सामान्य गलतियाँ – Common mistakes in daily pooja at home
“क्या आप अपनी दैनिक पूजा में ये सामान्य गलतियाँ कर रहे हैं? इन व्यावहारिक सुझावों से जानें कि कैसे सुनिश्चित करें कि आपकी साधना सार्थक और प्रभावी हो।”
घर में दैनिक पूजा क्यों महत्वपूर्ण है
सोचिये ये पंक्ति ही स्वयं में क्षरण की सूचक है कि नित्य कर्म के स्थान पर हम दैनिक पूजा, घर में दैनिक पूजा आदि शब्दावलियों का प्रयोग करते हैं और नित्यकर्म का के विषय में कुछ भी नहीं जानते। सबसे बड़ी गलती तो यही है कि हम इतने अज्ञानी हो गये हैं।
जब हम दैनिक पूजा शब्द का प्रयोग करते हैं तब भी वास्तविक भाव नित्यकर्म ही होता है, किन्तु हम स्वेच्छाचार अर्थ ग्रहण करते हैं अर्थात जिस प्रकार से जो पूजा करनी हो वो कर लेंगे। एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा कि हम प्रतिदिन अनेकानेक पाप जाने-अनजाने करते ही रहते हैं इसका शमन किस प्रकार होगा। गुरुजी ने कहा कि नित्यकर्म करने वाले का सामान्य जीवनचर्या में होने वाला पाप भी नित्य नष्ट हो जाता है। इस प्रकार नित्य कर्म सभी के लिये आवश्यक है भले ही हम उसे दैनिक पूजा क्यों न कहें।
गृहस्थों के लिये ईश्वर की अराधना का सबसे प्रमुख उपाय है नित्यकर्म करना। जो नित्यकर्म नहीं करता उसके अन्यान्य सभी कर्म निरर्थक होते हैं। नित्यकर्म से रहित व्यक्ति को तो भोजन का भी अधिकार नहीं होता। यदि हम ईश्वर की अराधना करना चाहते हैं, ईश्वर की कृपा चाहते हैं तो अन्यान्य विशेष पूजा जो भिन्न-भिन्न अवसरों पर करते हैं उन सबसे अधिक महत्वपूर्ण नित्यकर्म है।
नित्यकर्म की बात करें तो इसका मूल तात्पर्य शौच, संध्या और पञ्चमहायज्ञ होता है जो इस प्रकार हैं : देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ, मनुष्य यज्ञ और ब्रह्मयज्ञ – अथ पञ्चमहायज्ञानि ॥१॥ तान्येव महासत्राणि ॥२॥ देवयज्ञः पितृयज्ञो भूतयज्ञो मनुष्ययज्ञो ब्रह्मयज्ञ इति ॥३॥ – बौधायन स्मृति ॥२॥६॥१ – ३॥ सामान्य लोगों ने इनमें से सब कुछ त्याग दिया है, शौच विधान भी स्वेच्छाचार से करते हैं और कुछ पूजा करके निपट लेते हैं। क्योंकि यदि देवयज्ञ मात्र की भी बात करें तो इसमें पंचदेवता पूजा का विधान है न कि किसी भी देवता की। यहां हम नित्यकर्म में से एक देवयज्ञ विषयक चर्चा करेंगे किन्तु इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं समझना चाहिये कि यही नित्यकर्म है।
पूजा गृह का निर्माण
नित्य देवपूजन के लिये सर्वप्रथम एक पूजागृह की आवश्यकता होती है। जिसका स्वयं का घर हो वह तो पूजा गृह बनाता है और कुलदेवता की भी स्थापना करता है किन्तु नगरों में किराये के घर में रहने वाले कुलदेवता की स्थापना नहीं कर सकते, तथापि दैनिक पूजा के लिये फ्लैट लेने से पूर्व पूजा घर को सुनिश्चित तो कर ही सकते हैं।
- पूजा घर के लिये पूर्व दिशा, ईशान कोण, उत्तर दिशा उत्तम होता है।
- पूजा गृह की स्वछता, गोपनीयता आदि का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिये।
- गोपनीयता का तात्पर्य है कि यदि कोई बाहरी व्यक्ति घर में आये तो उसकी दृष्टि में पूजा गृह के देवता न आयें।
देवयज्ञ में मुख्य रूप से शास्त्रों में पंचदेवता पूजा का विधान प्राप्त होता है। पंचदेवता के पंचायतन होते हैं और वो क्षेत्रभेद से भिन्न-भिन्न होते हैं एवं इसका ज्ञान स्थानीय विद्वान ब्राह्मण से प्राप्त करके उनके दिशा-निर्देश में पंचायतन स्थापित करें। यदि स्वयं का घर है तो कुलदेवता भी होंगे और यदि स्थापित न किये गए हों तो शीघ्रता पूर्वक शुभ मुहूर्त में कुलदेवता स्थापना करें। किराये के घरों में कुलदेवता की स्थापना न हो सकती अतः मानसिक रूप से कल्पित करें, इसे उदासी पूजा भी कहा जाता है।
एक और भी त्रुटि जो विकराल रूप धारण करते जा रही है वो है ढेरों देवताओं की प्रतिमा/चित्रादि रखना। ध्यान रखें यह नित्यपूजा का भाग नहीं है, किसी विशेष अवसर पर यदि हम उनके देवता का आवाहन-पूजन करते हैं तो उनका विसर्जन भी किया जाता है; यथा लक्ष्मी पूजा में लक्ष्मी की, सरस्वती पूजा में सरस्वती की, रामनवमी में भगवान श्री राम का, जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण का, शिवरात्रि में भगवान शंकर का इत्यादि। ये दैनिक पूजा (पंचदेवता पूजा) से पृथक पूजा है एवं इनका विसर्जन भी होता है।
इसके अतिरिक्त हम कई बार उन लोगों की प्रतिमा/चित्र आदि भी रखते हैं जो देवता नहीं हैं, शास्त्रों में वर्णित नहीं हैं, यथा साईं। गुरुपादुका, चित्र आदि रख सकते हैं, किन्तु इससे पृथक किसी भी मृतक का कोई चित्रादि नहीं रखें, माता-पिता की भी नहीं। पितरों की पूजा चित्र में नहीं होती अपितु उनके लिये श्राद्ध-तर्पण का विधान है।
पूजा में किन-किन पात्रों का प्रयोग किया जाता है इसका भी अन्वेषण करें और उन सभी पात्रों का प्रयोग करें। अर्घ्यपात्र, थाली, कलश के साथ-साथ शंख और घंटी का भी प्रयोग होता है।
जप के लिये किस माला का प्रयोग करें यह भी गुरु/विद्वान ब्राह्मणों से ज्ञात करें।
अनुकूल वातावरण बनाएँ
- पूजा गृह में शांति रहे इसकी व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी चाहिये क्योंकि पूजा करते समय पूरी तरह से शांत वातावरण का होना आवश्यक होता है। इसके लिये अब साउंडप्रूफ कमरा बनाने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं दिखता है।
- पूजा गृह में पवित्रता का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिये। सामान्यतः नगरीय जीवन में पवित्रता का पूर्ण अभाव देखा जाता है और यह गांवों में भी प्रवेश करता जा रहा है। इस स्थिति में भी पूजा गृह की पवित्रता का विशेष ध्यान रखना अनिवार्य होता है।
- पूजा गृह में अत्यधिक प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती किन्तु अंधेरा भी नहीं हो यह सुनिश्चित करना चाहिये। इतना प्रकाश तो अवश्य ही होना चाहिये जिससे सभी वस्तुयें स्पष्ट दिखें, कोई त्रुटि न हो।
- पूजा के नाम पर वर्त्तमान युग में संगीत का आश्रय साउंड आदि के माध्यम से लिया जाता है। किन्तु ध्यान रखें यह व्यवस्था पूजा के लिये नहीं पूजा के पश्चात् होनी चाहिये। पूजा काल में जितनी शांति सम्भव हो उतना प्रयास करना चाहिये। मंत्र, स्तोत्र आदि का स्वयं पाठ करना चाहिये न कि साउंड आदि बजाकर।
पूजा हो या कोई अन्य कर्म आसन का अपना विशेष विधान और महत्व है। बिना आसन के पूजा नहीं होती अतः आसन अवश्य रखें और आसन पर बैठकर ही पूजा-पाठ-जप आदि करें।
आसन के संबंध में भी अनेकों विधान हैं और उसका भी ज्ञान रखें; यथा आसन का लंघन न करना, आसन को पैरों से न खिंसकाना, आसन किसी अन्य को उपयोग न करने देना आदि। यहां
पूजा सामग्री अर्पण में होने वाली सामान्य त्रुटियां
- गंगाजल/तीर्थजल के अतिरिक्त अन्य जल पर्युषित (बासी) हो जाता है। अतः यदि गंगाजल से भिन्न जल का प्रयोग करते हैं तो यह सुनिश्चित करें कि वह बासी न हो और न ही अपवित्र हो अथवा अपवित्र व्यक्ति द्वारा लाया गया हो।
- पुष्प भी पर्युषित होता है अतः पुष्प उसी दिन ग्रहण करे जिस दिन पूजा करनी हो। क्रीत पुष्प भी पूजा के योग्य नहीं होता अतः स्वयं अथवा मालाकार आदि के माध्यम से पुष्प माला की व्यवस्था करनी चाहिये।
- कमल पुष्प पांच रात्रि में, बिल्वपत्र दस रात्रि में और तुलसी पत्र ग्यारह रात्रि में पर्युषित होता है।
- पूजा की अन्यान्य सामग्रियां भी शुद्ध हों इसका विशेष ध्यान रखना चाहिये।
- पूजा के लिये शीघ्रता नहीं करनी चाहिये। पूजा करते समय ध्यान ध्यान भी पूजा में ही हो ऐसा सुनिश्चित करें।
- चन्दन के स्थान पर लोग प्रायः कुंकुम का प्रयोग करने लगे हैं। चन्दन के लिये चंदन की लकड़ी को चंडौता (सिलबट्टा/पत्थर) पर घिसकर प्रयोग करें।
- इसी प्रकार धूप के स्थान पर लोग अगरबत्ती का प्रयोग करने लगे हैं जो अनुचित है। पूजा में आग की आवश्यकता होती है और आग में धूप अवश्य जलायें।
- भोग लगाने की बात जब आती है तो घर में सात्विक भोजन बनाना चाहिये और वो दैनिक पूजा में भोग भी लगायें। यह बहुत ही महत्वपूर्ण है किन्तु इस तथ्य को लोग भूलते जा रहे हैं।
- प्रदोष काल में दिन के चढ़ाये पुष्पादि हटा देने चाहिये।
निषिद्ध द्रव्य अर्पित न करें
नाक्षतैरर्चयेद्विष्णुं न तुलस्या गणाधिपम्। न दूर्वयायजेत् दुर्गां बिल्वपत्रैश्च भास्करम्॥
अक्षत से विष्णु की, तुलसी से गणेश की, दूब से दुर्गा की और बेलपत्र से सूर्य की पूजा नहीं करनी चाहिए। इसी प्रकार अन्य पत्र-पुष्पादि के संबंध में विस्तृत निषेध शास्त्रों में वर्णित है जिसका सम्पूर्ण विश्लेषण यहां नहीं किया जा सकता।
इसी प्रकार से शंख से भगवान शिव और सूर्य को जल अर्पित न करे, शंख से अभिषेक न करे :
महाभिषेकं सर्वत्र शंखेनैव प्रकल्पयेत्। सर्वत्रैव प्रशस्तोऽब्जः शिवसूर्यार्चनं विना॥ – तिथ्यादितत्त्वम्
सभी देवताओं का अभिषेक शंख के जल से ही होता है, परंतु सूर्य और शिवजी को छोड़कर।
पवित्रता और भाव का महत्व
- पूजा में शारीरिक पवित्रता, मानसिक पवित्रता, वस्तुओं की पवित्रता, पूजा स्थल की पवित्रता इन सबका विशेष रूप से ध्यान रखें। पवित्रता के अभाव में पूजा संभव नहीं है।
- पूजा के समय में ध्यान पूजा मात्र अर्थात देवता की अरधाना में ही लगे यह आवश्यक है। भाव की बड़ी महत्ता शास्त्रों में बताई गयी है और भगवान को भाव का भूखा कहा गया है अर्थात भगवान को यदि वास्तव में कुछ अर्पित करना चाहते हैं तो भाव पूर्वक ही अर्पित करें – न काष्ठे विद्यते देवो न शिलायां कदाचन । भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावं समाचरेत् ॥
- हमने मानव तन प्राप्त किया है इसमें भी ईश्वर की कृपा है, हमारे जीवन के लिये सभी व्यवस्थायें ईश्वर द्वारा की गयी हैं, हम तो मात्र उसे ग्रहण करते हैं। ईश्वर के प्रति ऐसा ही भाव रखते हुये कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिये, प्रार्थना आदि करनी चाहिये।
मंत्र प्रयोग संबंधी सावधानी
- किन-किन मंत्रों का प्रयोग करना है यह निर्धारण विद्वान ब्राह्मणों द्वारा करायें। क्योंकि मंत्रों से पूजा करने में बहुत सारे मंत्र मिलेंगे किन्तु हम सभी मंत्रों को पढ़ें ऐसा संभव नहीं है फिर यदि कुछ मंत्र ग्रहण करते हैं तो उसका आधार होना चाहिये। कहीं से पढ़ लिया, दूरदर्शन, सोशलमीडिया आदि पर देख लिया और मंत्र का प्रयोग करने लगे यह अनुचित है। मंत्रप्रयोग के संबंध में ब्राह्मण/गुरु की अनुमति अनिवार्य है।
- जो भी मंत्र पूजा में प्रयोग कर रहे हों उसपर ध्यान केंद्रित रखना चाहिये।
- गुरुमंत्र आदि का जप करना हो तो वो भी मंत्र और उसके अर्थ को समझते हुये करें।
- मंत्रों का अशुद्ध उच्चारण, एकाग्रता की कमी और ध्यान भटकाने वाले परिवेश आदि सामान्य त्रुटियां हैं और इनसे बचें।
- मंत्रों का अशुद्ध उच्चारण का एक मुख्य कारण है स्वयं देख-सुनकर ग्रहण कर लेना। मंत्रों के संबंध में विद्वान ब्राह्मण से ही दिशा-निर्देश प्राप्त करें और उसका शुद्ध उच्चारण करना भी सीखें।
सही तरीके से पूजा करने के लाभ
पूजा करने की शास्त्रोक्त विधि को जाने और उसका पालन करें, क्योंकि विधि के अनुसार किया गया कर्म ही फलदायी होता है, विधि का उल्लंघन करके किया गया कर्म निरर्थक होता है।
पूजा-पाठ आदि में एक नया व्यवहार जो कि शास्त्र विरुद्ध है उसका प्रचलन बढ़ता जा रहा है और वो है सिर को वस्त्र/रुमाल आदि से ढँक लेना। ध्यान रखें ये सनातन शास्त्रों का विधान नहीं है और इससे बचना चाहिये। अन्यान्य पंथों का अनुयायी बनकर हम अपनी शास्त्राज्ञा का उल्लंघन करते हैं तो यह दोष हो जाता है।
शास्त्रों में पूजा-जप आदि करते समय को वस्त्रादि से ढंकने का स्पष्ट निर्देश किया गया है।
धर्माचरण, कर्मकांड जो भी करें उसमें शास्त्राज्ञा का पालन करना अनिवार्य होता है। और जब हम शास्त्राज्ञा का पालन करते हैं तभी शास्त्रोक्त कर्मों की सिद्धि होती है और वह फलदायी होता है।
कौन सी क्रिया बैठकर करनी चाहिये और कौन-कौन सी क्रिया खड़े होकर करनी चाहिये इसका भी विशेष रूप से अन्वेषण करें, विद्वान ब्राह्मणों से परामर्श लें। क्योंकि जो बैठकर की जाने वाली क्रिया है वह खड़े होकर करना विधि का उल्लंघन होता है और इसी प्रकार खड़ा होकर जो करना चाहिये यदि बैठे-बैठे करें तो यह भी विधान का उल्लंघन होता है। यथा कुछ क्रियायें जो खड़े होकर करने की आज्ञा है : समिधाहुति, पूर्णाहुति, वसोर्द्धारा, सूर्यार्घ्य दान आदि। अन्यान्य सभी कर्म जिसके लिये यदि खड़ा होने का विधान न हो तो वह बैठकर ही करना चाहिये।
धर्माचरण, कर्मकांड जो भी करें उसमें शास्त्राज्ञा का पालन करना अनिवार्य होता है। और जब हम शास्त्राज्ञा का पालन करते हैं तभी शास्त्रोक्त कर्मों की सिद्धि होती है और वह फलदायी होता है।
सायंकाल निर्माल्य (चढ़ाये गये पत्र-पुष्पादि) हटाकर दीपदान अवश्य करें।
पूजा में कब-कब घंटा बजायें ?
पूजा के समय घंटा बजाना भी पूजा का ही अंग होता है और इसका शास्त्रोक्त प्रमाण भी है। इस तथ्य को सप्रमाण समझना आवश्यक है कि कब-कब घंटा बजायें :
स्नाने धूपे तथा दीपे नैवेद्ये भूषणे तथा। घंटा नादं प्रकुर्वीत तथा नीराजनेऽपि च॥
कालिकापुराण में कहा गया है कि देवताओं को स्नान कराते समय, धूप में , दीप में , नैवेद्य/भोग लगाते समय, आभूषण अर्पित करते समय तथा निराजन/आरती करते समय घंटा नाद अवश्य करना चाहिए।
- देवपूजनमें घंटेको अपनी बायीं और स्थापित करना चाहिए
- बाएं हाथ से ही घंटे को बजाना चाहिए; परंतु
- घंटा का पूजन दाएं हाथ से ही करना चाहिए
उत्तोल्य दृष्टिपर्यन्तं घण्टां वामदिशि स्थिताम्। वादयन्वामहस्तेन दक्षहस्तेन चार्चयेत्॥ (गौतमीये)
लक्ष्मी मंदिर में और लक्ष्मी की पूजा में घंटा नहीं बजाना चाहिये :
गीतवादित्रनिर्घोषं देवस्याग्रे च कारयेत्। विरिञ्चेश्च गृहे ढक्कां घण्टां लक्ष्मीगृहे त्यजेत्॥ – मत्स्यपुराणे
गीतों का गाना तथा वाद्यों को बजाना देवताओं के अर्चाविग्रहों के सामने करना चाहिए, परंतु –
- ब्रह्माजी के मंदिर में ढाक (नगाड़ा) अथवा डमरुको नहीं बजाना चाहिए, और
- लक्ष्मीजी के मंदिर में घंटा नहीं बजाना चाहिए।
आशीर्वाद प्राप्ति: आरती की कला
- पूजा में आरती का विशेष महत्व होता है, सम्पूर्ण पूजा की त्रुटियां हो, पूजा में जो कमी हो उनका आरती से निराकरण होता है। सम्पूर्ण पूजा यदि न भी कर सकें हो तो भी आरती से पूजा का फल प्राप्त हो सकता है। इसलिये दैनिक पूजा में आरती भी अवश्य ही करें।
- आरती में कर्पूर का विशेष महत्व होता है अतः कर्पूर का अवश्य ही प्रयोग करें और उसकी शुद्धता भी निर्धारित करें । आरती में दीप का भी प्रयोग कर सकते हैं।
- आरती के पश्चात् जल अवश्य अर्पित करें और क्षमा प्रार्थना आदि करके क्षमा याचना करें। प्रदक्षिणा, साष्टांग प्रणाम करें एवं नैवेद्यादि को ग्रहण करें।
क्या आप भी अपनी दैनिक पूजा में ये सामान्य गलतियाँ कर रहे हैं?
- क्या पूजा गृह में ढेरों देवी-देवताओं की प्रतिमा चित्र आदि बैठा रखें हैं ?
- क्या मृतकों के चित्र भी लगा रखे हैं ?
- क्या पूजा में धोती धारण नहीं करते हैं और सिले वस्त्र पैंट पहनकर करते हैं ?
- क्या सिर ढंककर पूजा करते हैं ?
- क्या अपने मन से देखे-सुने-पढ़े मंत्रों का ही प्रयोग करते हैं ?
- क्या बिना आसन के ही खड़े-खड़े पूजा कर लेते हैं ?
- निषिद्ध द्रव्य अर्पित करते हैं ?
- क्या चंदन के स्थान पर कुंकुम अर्पित करते हैं ?
- क्या धूप के स्थान पर अगरबत्ती जलाते हैं ?
- क्या नैवेद्य में पका सात्विक भोजन अर्पित नहीं करते हैं ?
- क्या निर्माल्य नहीं हटाते हैं ?
“क्या आप अपनी दैनिक पूजा में ये सामान्य गलतियाँ कर रहे हैं? इन व्यावहारिक सुझावों से जानें कि कैसे सुनिश्चित करें कि आपकी साधना सार्थक और प्रभावी हो।”
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।