सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं – siddham susiddham shraddham

सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं - siddham susiddham shraddham सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं - siddham susiddham shraddham

“मिथिला के शिष्ट-विज्ञ जनों का व्यवहार ही धर्म का वास्तविक निर्णय है।”

वर्त्तमान काल में श्राद्ध का स्वरूप अत्यधिक विकृत हो गया है और पूर्वाचार्यों का अनुकरण करते हुये ही पुनः संशोधन की आवश्यकता को देखते हुये “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” नाम से संशोधित अपात्रक श्राद्ध विधि संपादन में है। इस पुनीत कार्य दायित्व मुझे मिला यह मेरा सौभाग्य है। संशोधित अपात्रक एकादशाह, मासिक, सपिंडीकरण, सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट आदि सम्पादित किया जा चुका है एवं अस्थिसंचय व वृषोत्सर्ग का संपादन शेष है। इस आलेख में “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” पुस्तक की ही प्रस्तावना-भूमिका आदि प्रस्तुत किया जा रहा है।

सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं – siddham susiddham shraddham

“यदि पूर्वाचार्यों ने कालानुसार प्रयास किया था, तो वह मार्ग अवरुद्ध न होकर वर्तमान में भी खुला है।”

प्रस्तावना

मैंने पूर्व में “सुगम श्राद्ध विधि” सम्पादित किया था और वो पुस्तक पूर्व प्रकाशित है। जहां १५ वर्ष पूर्व गिने-चुने श्राद्ध कराने वाले कर्मकांडी मिलते थे, पुरोहित वर्ग श्राद्ध करा ही नहीं पाते थे और रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जपादि करने वाले पंडित यह कहने के लिये विवश होते थे कि मैं इस कर्म में रूचि नहीं रखता, दूर ही रहता हूँ और भागवत-वेद आदि का पाठ करने के लिये जाते भी थे। यह तो विरोधाभास ही था कि प्रेत कर्म में सम्मिलित हो भी रहे थे और दूर रहता हूँ ऐसा भी कहते थे।

किन्तु सुगम श्राद्ध विधि की यही उपयोगिता सिद्ध हुई कि ऐसे सभी पंडित और पुरोहित भी वर्त्तमान में श्राद्ध कराने लगे हैं। इस पुस्तक का उद्देश्य ही यही था कि सामान्य विवेक से युक्त ब्राह्मण भी श्राद्ध कराना सीख सकें कर इसमें सफलता भी मिली। इसे अपना सौभाग्य मानता हूँ कि ईश्वर ने इसके लिये मेरा चयन किया। इसी क्रम में अब आगे और भी बड़ा दायित्व मिला और वो दायित्व मिथिला गौरव के अनुकूल है।

मिथिला व्यवहार को ही धर्म का निर्णय जानना चाहिये यह भी शास्त्र ही कहता है और इसका तात्पर्य शिष्ट-विज्ञ जनों के व्यवहार से है न कि अल्पज्ञ-स्वेछाचारियों के व्यवहार से। मिथिला के शिष्ट-विज्ञ जनों का व्यवहार ही धर्म का निर्णय इस कारण सिद्ध किया गया है कि मिथिला सदैव से मनीषियों की उद्गमस्थली रही है। मिथिला क्षेत्र में प्रज्ञा-विवेक के लिये जो उर्वर शक्ति है वो अन्यत्र नहीं मिलती। अस्तु “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” पुस्तक मूलतः मिथिलादेशीय ही है किन्तु यह अन्य क्षेत्रों के लिये भी शास्त्रविहित व निषिद्ध अथवा निष्कर्ष प्राप्त न होने की अवस्था में उपयोगी सिद्ध होगा और मार्ग प्रदान करेगा।

मिथिला व्यवहार
मिथिला व्यवहार

“सुगम श्राद्ध विधि” अपने उद्देश्य में सफल रही किन्तु इसका संपादन ही व्यावहारिक दृष्टिकोण से किया गया था एवं जो श्राद्ध कर्म में विशेषज्ञता चाहेंगे उनके लिये भी प्रारंभिक ज्ञान का स्रोत सिद्ध होगा ही तथापि व्यावहारिक दृष्टिकोणवशात् इसमें अनेकानेक विसंगतियां समाहित हैं एवं कुछ भी शास्त्र-सम्मत करने का प्रयास नहीं किया गया। जो श्राद्ध कर्म के विशेषज्ञ बनना चाहेंगे उनके लिये “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” सर्वोपयोगी पुस्तक सिद्ध हो ऐसा प्रयास किया गया है। आवश्यकता तो वर्त्तमान काल में जो श्राद्ध में अनेकानेक विसंगतियां उत्पन्न हो चुकी हैं जिनमें से कुछ कलयुग प्रभाव के कारण भी हैं उनका निस्तारण करना भी है और इस दिशा में सार्थक प्रयास भी किया गया है।

कुल मिलाकर यह पुस्तक एक ओर एक कर्मकांडी को श्राद्ध कर्म का विशेषज्ञ बना सकता है तो दूसरी ओर श्राद्ध कर्म में व्याप्त विसंगतियों का भी निस्तारण करेगा।

भूमिका

“शास्त्र को यथार्थ रूप से न समझकर केवल वाद-विवाद करने वाले ही वास्तव में ‘शास्त्रदस्यु’ हैं।”

भूमिका में सर्वप्रथम विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज जो कि अनुज भ्राता के समान हैं का साधुवाद अनिवार्य है क्योंकि इस विषय के प्रस्तावक एवं संशोधन में अनेकानेक नहीं अपितु सर्वत्र सभी विषयों पर शास्त्रीय चिंतन करके भी सहयोग प्रदान किया। “अपात्रक श्राद्ध क्या है और क्या वर्त्तमान श्राद्ध अपात्रक है क्योंकि दक्षिणा तो कुशोदक पूर्वक दी जाती है” यही वो मूल प्रश्न गिरधारी जी का था जिसने मुझे इस विषय में चिंतन-मनन को बाध्य किया एवं “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” की पृष्ठभूमि बना।

यद्यपि कई वर्षों से हम दोनों में मनभेद था किन्तु यह ईश्वरीय कृपा ही थी कि मनभेद समाप्त हो गया और इस पुनीत कार्य के प्रेरक भी वही बने एवं पग-पग पर सहयोग भी किया। मेरे लिये अकेले यह कार्य संभव नहीं था ऐसा मेरा स्वयं का मानना है इस कारण एक बार पुनः विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज का साधुवाद, स्नेह, “विजयी भव” शुभाशीर्वाद।

अब श्राद्ध में व्याप्त विसंगतियों-विकृतियों को संक्षेप में समझते हैं क्योंकि पुस्तक की उपयोगिता इसी से सिद्ध होती है :

वाचस्पतिमिश्र ने अपात्रक श्राद्ध में प्रेत दक्षिणा हेतु यथानामगोत्राय को ही अंगीकार किया था किन्तु वर्त्तमान में उपलब्ध पद्धतियां आधार तो बताती हैं किन्तु इस विषय का खंडन किये बिना त्याग कर देती है। अपात्रक श्राद्ध तो किये जा रहे हैं किन्तु प्रेत श्राद्ध की दक्षिणा कुशोदक पूर्वक महापात्र को प्रदान किया जा रहा है जो अपात्रकत्व को खंडित करता है एवं सपात्रक भी नहीं है अस्तु यह एक बड़ी विकृति है। या तो सपात्रक श्राद्ध किये जायें अथवा अपात्रक विधि से जिसमें ऐसी मिश्रित विधि न हो जो विकृति सिद्ध हो।

वाचस्पतिमिश्र द्वारा परकीयभूमि में श्राद्ध होने पर भूस्वामि के अग्रभाग प्रारम्भ में ही त्याग स्वीकारा गया किन्तु विद्यमान श्राद्ध पद्धतियां में भोजन पूर्व इस प्रकार से प्रस्तुत कर दी गयी जिससे यह श्राद्ध का अंग बन गया। यह न ही श्राद्ध का अंग है और न ही स्वभूमि पर श्राद्ध होने में आवश्यक किन्तु श्राद्धांग स्वरूपवश घर में सांवत्सरिक श्राद्ध करने वाले भी भोजन से पूर्व भूस्वामि भाग प्रदान करते हैं। यह भी एक बड़ी विकृति है और सामान्य कर्मकांडी को भी इस विषय में चर्चा करते देखा जाता है किन्तु इसका निस्तारण कैसे होगा, मार्ग ही नहीं मिलता। होगा संशोधित श्राद्ध पद्धति से निस्तारण होगा, वास्तविकता को स्पष्ट करके विधि में शोधन किया जायेगा।

पूर्व काल में पात्रत्वाभाववश श्राद्ध को अपात्रक किया गया था, किन्तु प्रतिग्रहाधिकार सिद्ध होने के कारण उसका परिहार न करके ग्रहण किया गया था। साथ ही आद्यश्राद्ध के मध्य में छत्रउपानद् दान ग्रहण किया गया और व्यावहारिक रूप से गोदान भी प्रचलित है यद्यपि पद्धतियों में ग्रहण नहीं किया गया है। यह सपात्रक श्राद्ध विधान था और अपात्रक श्राद्ध में इसकी सिद्धि नहीं होती।

वृषोत्सर्ग एकादशाह के दिन अनिवार्य है यदि ऐसा कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी; असमर्थों को छोड़कर। किन्तु वर्त्तमान काल में वृष का उत्सर्ग करना लोकविरुद्ध सिद्ध होता है अस्तु वैकल्पिक मार्ग की आवश्यकता है। अर्थात जो समर्थ हैं उनके लिये तो वैकल्पिक मार्ग चाहिये ही अस्तु वृषोत्सर्ग का शास्त्र में जो वैकल्पिक मार्ग है वो भी संशोधन पूर्वक श्राद्धपद्धति का भाग बनना अनिवार्य है ताकि समर्थों को उचित मार्ग प्राप्त हो।

वेदमंत्रों में ऊह संबंधी विकृति पद्धतियों में भी द्रष्टव्य है। एक ओर तो ऊहपूर्वक मंत्र दिया भी गया है एवं दूसरी ओर टिप्पणि में ऊह का निषेध भी किया गया है, यदि निषिद्ध है तो ऐसा किये क्यों और यदि विहित है तो ऐसी टिप्पणी क्यों ?

सांवत्सरिक श्राद्ध पितृ कर्म है, प्रेतकर्म नहीं किन्तु विशेष रूप से ब्राह्मणों के यहां इसमें महापात्र को ही आमंत्रित करते देखा जाता है। यह विकृति है श्राद्ध का तात्पर्य प्रेतकर्म नहीं होता। ये वास्तव में एक गंभीर व्यावहारिक विकृति है एवं इसके साथ ही और भी अनेकानेक व्यावहारिक विकार परिलक्षित होते हैं :

एकादशाह को देव-पितृ संबंधी ब्राह्मण श्राद्ध में कर्मकाण्ड, वेद, भागवत आदि कार्यों के लिये नियुक्त तो होते हैं किन्तु भोजन नहीं करते जो दोषपूर्ण है।

कई स्थानों पर अनावश्यक होने पर भी महापात्र को क्षौरार्थ बाध्य किया जाता है तो अधिकतम स्थानों पर आवश्यक होते हुए भी नहीं किया जाता, सर्ट-पैंट पहनकर भी कुशोदक ग्रहण करते देखने को मिलते हैं यहां तक भी देखा जाता है कि वस्त्र में भी म्लेच्छ वस्त्र मांगकर लेते हैं।

कोई भी श्राद्ध विहित काल में नहीं किया जाता, आद्यश्राद्ध तो सायाह्न में होता तो मासिक श्राद्ध पूर्वाह्ण में ही आरम्भ कर दिया जाता है और सपिण्डीकरण तो सायाह्न में ही किया जाता है। ये व्यावहारिक विकृतियां हैं व निस्तारण का प्रयास अपेक्षित है। यदि पूर्वाचार्यों के संशोधित होने पर भी कुछ विषय छूट गया तो उसका संशोधन ही नहीं हो सकता यह भ्रम है। यदि पूर्वाचार्यों ने कालानुसार प्रयास किया था तो वह मार्ग अवरुद्व न होकर वर्तमान में भी खुला है।

श्राद्ध में प्रयुक्त पाक ही हलवाई आदि से नहीं बनवाया जा रहा यही बड़ी बात है इसके अतिरिक्त सभी भोज्य द्रव्य हलवाई द्वारा बनाना आरंभ नहीं प्रचलन बन गया है चाहे बेंती हो, व्यंजन हो या पूड़ी आदि । अधिकांशतः अग्राह्य दूध-दही-घृत का ही प्रयोग किया जाता है।

सपिण्डीकरण में आसन को लेकर विवाद बना ही रहता है और कई स्थानों पर प्रेत को मध्य में रखा जाता है। इसी प्रकार सपिण्डीकरण में एक ही वेदी बनाई जाती है जबकि प्रेत वेदी पृथक होना आवश्यक है। महापात्र को प्रेतोत्सर्जित भोजन आंशिक रूप से ग्रहण करने के लिये बाध्य किया जाता है जबकि श्राद्ध अपात्रक (नाम से) है। भोजन में परोसे जाने वाले अन्न का उष्ण होना अनिवार्य है कितने मूर्खाचार्य इसका उल्लंघन नहीं करते ?

यावदूष्मा भवत्यन्ने यावदश्नन्ति वाग्यताः । तावदश्नन्ति पितरो यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥
विष्णुस्मृति/८१/२१, विष्णुधर्मोत्तरपुराण/१/१४०/४५

यावन्त्यन्नानि पूतानि यावदुष्णं न मुञ्चति। तावदश्नन्ति पितरो यावदश्नन्ति वाग्यताः ॥ – वायुपुराण/उत्तरार्द्ध/१७/८७
यावन्न श्रपितं चान्नं यावतौष्ण्यं न मुञ्चति। तावदश्नन्ति पितरो यावदश्नन्ति वाग्यताः ॥
– ब्रह्माण्डपुराण/मध्यभाग/१५/५९

श्राद्ध में उत्सर्जित द्रव्य और दान सामग्री का विवाद तो बड़ी समस्या बनती जा रही है, महापात्र से पुरोहित हरण कर रहे हैं तो पुरोहित से नापितादि । इसी प्रकार और भी अनेकानेक विकृति विद्यमान है एवं सुधार की दिशा में प्रयास अपेक्षित है परिणाम (फल) में तो अधिकार ही नहीं होता वो दैवाधीन ही रहता है ।

वर्तमान काल में लोगों की सोच भी विकृत हो गई है वो फल (परिणाम) में तो अधिकार स्थापित करना चाहते हैं किन्तु दायित्व निर्वहन से मुक्तिपूर्वक इसी कारण अधिकांश विकारों की चर्चा सामान्यतः सर्वत्र होती ही रहती है किन्तु प्रयास कोई नहीं करते। यदि समस्या है और विदित भी है तो उसके निवारण का मार्ग भी ढूंढना चाहिए एवं प्रयास भी करना चाहिए, इस अपेक्षा का परित्याग करके कि फल प्राप्त होगा ही । मनुष्य को स्वयं के दायित्व का ही निर्वहन करना चाहिए न कि दैव को दायित्व का स्मरण।

विकृति का मूल

एक बड़ी समस्या जो कि सबसे बड़ी है वो यह कि समस्यायें जानते भी हैं, समाधान चाहते भी हैं, हम समर्थ नहीं यह भी ज्ञात रहता है अर्थात् हम नहीं कर सकते जानते हुए भी किसी दूसरे को भी करने नहीं देंगे क्योंकि श्रेय तो उसी का हो जाएगा। दूसरे को श्रेय प्राप्त न हो जाय ऐसी मानसिकता स्वयं ही एक बड़ी समस्या है जो समाधान के मार्ग को अवरूद्ध करती है।

यह मेरा अनुभव है यद्यपि संवाद करने वालों को यह विदित होता है कि मेरा शास्त्रज्ञान उससे कई गुणा अधिक है किन्तु जब कोई विषय उठे तो बकवास करने की भी व्यग्रता रहती है ऐसा एक बार भी नहीं सोच पाते कि तनिक धैर्य से श्रवण करने पर अनेकानेक रहस्योद्घाटन होंने लगेगा, ज्ञान की वृद्धि ही होगी । किसी को धनमद तो किसी को पद (मास्टर/प्रतिष्ठित आदि होने का), तो किसी को वयाधिक्यता का भी अहंकार रहता है । यह समझ ही नहीं पाते कि इसका कोई औचित्य नहीं है वास्तविक औचित्य ज्ञान ही रखता है।

उदाहरण स्वरूप इस पुनीत कार्य में सहयोगी गिरधारी जी द्वारा उक्त प्रश्न दो बार आया, यदि हम अहंकार और दुराग्रह पूर्वक प्रश्न को खंडित करते तो आज यह अमृत ही प्राप्त नहीं होता इसलिए सभी पंडित को श्रवणीय शक्ति का विकास करना चाहिए एवं वाचालत्व का परित्याग।

अनिन्द्या ब्राह्मणा गावः कांचनं सलिलं स्त्रियः। पृथिवी तु षडेतानि यो निन्दति स पातकी ॥
स्कन्दपुराण/(७) प्रभासखण्डः)/प्रभासक्षेत्र माहात्म्य/२२/८०

यदि कोई श्रेष्ठ ज्ञाता मिलें तो प्रश्नमात्र करके मौन धारण करना अनिवार्य होता है। यह तथ्य अहंकार प्रदर्शन करने वाला भी प्रतीत होता है किन्तु यह व्यावहारिक समस्या पहचान करने के लिये अनुभव सिद्ध तथ्य है और यही कारण है कि ऐसे लोगों को बारम्बार धिक्कारा-दुत्कारा गया है, अपण्डित-मूर्खाचार्य-धूर्ताचार्य-मूढ इत्यादि शब्दों के प्रयोग में किंचित भी विचार नहीं किया गया निःसंकोच होकर कहा गया है। यद्यपि यह पुस्तक रूप में तत्काल प्रकाशित नहीं होने जा रहा है तथापि हमारी इच्छा तो यही है कि जो पुस्तक प्रकाशित हो तो उसमें से दुत्कारों-धिक्कारों को हटा दें किन्तु इसकी सिद्धि होने पर कि सुधार आरम्भ कर दिया गया।

इस प्रकार से मुर्खाचार्यादि शब्दों से दुत्कारना-धिक्कारना मुझे दोषपूर्ण भी प्रतीत होता है किन्तु विचार करने पर ज्ञात होता है कि यह द्वेष भाव से नहीं किया जा रहा है अपितु उपकार भाव से ही किया जा रहा है। साथ ही शास्त्र ही ऐसों को शास्त्रदस्यु कहते हैं ये तथ्य समझा रहा हूँ कि शास्त्रदस्यु क्यों बन रहे हो। सुधार हो इस विषय को ध्यान में रखकर तिक्त ओषधि का प्रयोग किया गया है निंदा भी नहीं की गयी है और न ही द्वेषपूर्वक किया गया है। तथापि स्वस्थ हो जायें तो इसकी आवश्यकता ही न रहे और पुस्तक में ऐसे शब्द न अंकित करना पड़े मेरी इच्छा है किन्तु स्वस्थ हों जाये तो।

शास्त्रदस्यु
शास्त्रदस्यु

शास्त्रं ह्यबुद्ध्वा तत्त्वेन केचिद्वादबलाज्जनाः। कामद्वेषाभिभूतत्वादहंकारवशं गताः॥
यथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः। ब्रह्मस्तेना निरारम्भा अपक्वमनसोऽशिवाः॥

महाभारत/शांतिपर्व (१२)/२७५/५२-५३

इस प्रकार यह निंदा न होकर शिक्षा है और रूचि के अभाव का निवारण करने के लिये कटुशब्दों का प्रयोग किया गया है, परवर्तियों को शास्त्रदस्यु बनने से रोकने का प्रयास है।

मूर्खाचार्य सिद्धि : इनका मूर्खाचार्य होना सिद्ध करने का भी विषय है जो इनके व्यवहार से ही सिद्ध होता है और उनको उद्धृत करना आवश्यक है। मैथिल परम्परा में “इहागच्छ इहतिष्ठ” का प्रयोग स्वीकारा गया है यह भी प्रामाणिक है। यही मैथिलेत्तरों हेतु अनुकरणीय का उत्तम उदाहरण है कि धर्म का निर्णय मिथिला के व्यवहार को देखकर करो, “आवाहयामि-स्थापयामि-पूजयामि” भी प्रामाणिक ही है किन्तु मिथिला के मनीषियों ने “इहागच्छ इहतिष्ठ” को अंगीकार किया तो यही उचित निर्णय है। मिथिला ने “न मम” को भी नहीं स्वीकारा है इसके पीछे भी सूक्ष्म विवेक है कि “न मम” जिसके लिये कह रहे हैं उसके अतिरिक्त तो “मम” सिद्ध हो जाता है।

इसी प्रकार मिथिला में मुख्य विषय को ग्रहण करने की शक्ति अर्थात “नीर-क्षीर विवेक” रही है एवं अनावश्यक विस्तार की परंपरा नहीं रही है जैसे ढेरों वेदियां बना लेना, मुख्य कर्म से पूर्व अंगभूत कर्मों में ही अधिक काल नष्ट करना आदि। किन्तु मूर्खाचार्यों में ये सभी दोष विद्यमान हैं कर और यत्र-तत्र दृष्ट हैं।

ज्ञान तो प्राप्त नहीं किया किसी प्रकार रुद्री पाठ करना, महामृत्युंजय जप करना सीख लिया और धीरे-धीरे अक्षत-फूल चढ़ाना सीख लिया अज्ञानवश “इहागच्छ इहतिष्ठ” के स्थान पर “आवाहयामि-स्थापयामि-पूजयामि” का प्रयोग कर रहे हैं, “न मम” का भी प्रयोग कर रहे हैं, कर्मकांड के आरम्भ में ही समय नष्ट कर देते हैं एवं मुख्य भाग अभिषेक को २५ – ३० मिनट में संपन्न कर देते हैं भजन जितना अधिक कर लें।

वेदियों के विषय में कोई ज्ञान ही नहीं कब-कहां-कौन वेदी बनाई जाय या नहीं, रुद्राभिषेक और पार्थिव पूजन में भी मातृका वेदी सहित अन्यान्य ढेरों वेदियां बनाकर पांडित्य के अहंकार से मदमस्त हो रहे हैं। विचारणीय विषय का ज्ञान तक नहीं है, किसी अन्य से ज्ञात होने पर भी अस्वीकार करने की प्रवृत्ति बन चुकी है और “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” के विषय में भी ऐसा ही संभावित है एवं इसी कारण ऐसे लोगों की ही भर्त्सना मूर्खाचार्य कहकर की गई है।

आग्रह तो विद्वज्जनों से ही किया जायेगा कि प्रस्तुत स्वरूप में (यद्यपि कुछ विसंगतियां मतिपूर्वक भी छोड़ी गई हैं) जो कुछ भी त्रुटि-विसंगति है उसके प्रति ध्यानाकर्षण करें । जो शास्त्रविरुद्ध हो उसका प्रामाणिक खंडन करें स्वगतोत्सुक हूं और शास्त्रसम्मत तथ्य को उनके नाम, छवि आदि सहित आदरपूर्वक स्थान दिया जाएगा । जो अल्पज्ञ पांडित्यमद धारण करने वाले हैं उनको यही कहूंगा कि सुधार करें और पुस्तक में (जब प्रकाशित हो) मूर्खाचार्यादि न रहे ऐसा प्रयास करें।

अर्थात् यदि खंडन नहीं कर सकते तो जो शास्त्र से सिद्ध किया गया है वह स्वीकार्य ही होता है, प्रामाणिक रूप से आप खंडन करने का सामर्थ्य ही नहीं रखते और स्वीकारने में अहंकार रोकता है तो तीसरा मार्ग कर्मकाण्ड का ही त्याग बचता है। विकृतियां इस प्रकार व्याप्त हैं कि यदि स्पष्ट संदेश न दिया जाए तो कोई गंभीरता से लें भी न बस बकवाद करें । बकवाद का अवसर ही नहीं दिया जा रहा है सामर्थ्य है तो प्रामाणिक रूप से खंडन करें यदि प्रामाणिक रूप से प्रतिखंडित नहीं होगा तो स्वीकार किया जायेगा।

यदि मैं इस प्रकार शास्त्र सिद्ध को स्वीकारने की घोषणा करता हूं अर्थात् बाध्यता से भिज्ञ हूं तो आपको भी वो बाध्यता विदित हो कि आप भी शास्त्र के प्रति बाध्य हैं । सामान्य पुरोहित वर्ग और जो सामान्य ज्ञान रखने वाले निरहंकारी हैं उनको बस खंडन-मंडन पर ध्यान केंद्रित करने के लिये कहूंगा । यदि कोई इस प्रकार स्पष्टरूप से खंडन की मांग करने पर भी खंडित नहीं करते तो स्वतः ही शास्त्रसम्मत सिद्ध हो जायेगा, किसी के मान्यता, मंडन आदि की अपेक्षा ही नहीं है। जब खंडन न हो तो आपके लिए स्वीकार्य होगा, आप अपनी शंका-प्रश्न निःसंकोच होकर व्यक्त करें शंका समाधान का भी हर संभव प्रयास किया जायेगा।

किन्तु जो गाल बजाने वाले मूर्खाचार्य बकवास करें तो उससे स्पष्ट कहें सामर्थ्य है तो प्रामाणिक रूप से खंडन करके संदेश भेज दो। निश्चित रूप से स्वीकार होगा अथवा प्रतिखंडन होगा, मूर्खाचार्य मत बनो । यदि खंडन नहीं कर सकते हो तो सही है और स्वीकार्य है। धर्म का ज्ञान शास्त्र से ही होता है धर्म उसी की रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म की रक्षा के लिये उससे पूर्व शास्त्र की रक्षा अनिवार्य है। रक्षा का तात्पर्य धर्म या शास्त्र का अस्तित्व संकट में है इस भाव से न होकर स्वयं के लिये बचाये रखना होता है।

प्रत्येक गांव में तो नहीं कहा जा सकता किन्तु हर क्षेत्र में विद्वान भी होते हैं, सामान्य ज्ञान रखने वाले भी होते हैं और ऐसे बकवादी मूर्खाचार्य भी होते हैं। विद्वानों की शास्त्र में निष्ठा होती, सामान्य ज्ञान रखने वालों की विद्वानों में किन्तु विद्वानों में श्रद्धा का ही अनुचित लाभ ये बकवादी मूर्खाचार्य भी उठाते रहते हैं। विद्वानों से भी यही निवेदन है कि ऐसे बकवादी मूर्खाचार्यों को उनकी वास्तविकता समझा दें अर्थात् प्रामाणिक खंडन करने के लिये कहें अथवा स्वीकार करने को प्रेरित करें ।

अविद्वांश्चैव विद्वांश्च ब्राह्मणो दैवतं महत् । प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत् ॥
मनु स्मृति/९/३१७

देश भर में जो ब्राह्मणों के विरुद्ध वातावरण निर्मित हो रहा है उसके एक प्रमुख कारक ऐसे मूर्खाचार्य भी हैं । विद्वान ब्राह्मण ही नहीं अल्पज्ञ में भी आमजन श्रद्धा रखता है ये मूर्खाचार्य ही उसकी श्रद्धा का अनुचित लाभ लेकर हनन करते हैं, ये दुत्कार के ही अधिकारी हैं । इनके कारण समस्या बढ़ती जा रही है और पीड़ित सामान्य ज्ञान रखने वाले होते हैं एवं ठगा यजमान जाता है। सम्मान के अधिकारी ज्ञानी होते हैं ऐसे मूर्खाचार्य नहीं।

संशोधन-परिष्करण

अंत में यह संशोधन श्राद्ध की विकृतियों का निवारण करने के उद्देश्य से किया गया है और इसपर ©कॉपीराइट अधिकार भी बनेगा किन्तु मंत्रों और विधियों पर नहीं अपितु विश्लेषण पर क्योंकि ऐसा विश्लेषण अनुपलब्ध है एवं इस विश्लेषण से संगत पद्धति का भी अभाव है। अस्तु चोरी करने का प्रयास कॉपीराइट का उल्लंघन ही मान्य होगा।

निष्कर्ष

“सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” पुस्तक की यह प्रस्तावना और भूमिका यह स्पष्ट करती है कि समय के साथ कर्मकांड में समाहित हुए दोषों का परिष्करण करना प्रत्येक काल के शास्त्रनिष्ठ मनीषियों का पुनीत दायित्व है। १५ वर्ष पूर्व प्रकाशित “सुगम श्राद्ध विधि” ने जहाँ सामान्य पुरोहित वर्ग को श्राद्ध कर्म की ओर प्रवृत्त करने का व्यावहारिक उद्देश्य पूर्ण किया, वहीं वर्तमान ग्रंथ “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” श्राद्ध विज्ञान को उसकी पूर्ण शास्त्रीय शुद्धता और ‘अपात्रक मर्यादा’ प्रदान करने के लिए कटिबद्ध है।

विद्यागौरव गिरिधारी मिश्र जी के शास्त्रोक्त प्रश्नों से जनित यह शोधन-अन्वेषण, मिथिला की ‘नीर-क्षीर विवेकी’ प्रज्ञा के सर्वथा अनुकूल है। यह भूमिका अज्ञानता और पाण्डित्यमद में डूबे ‘मूर्खाचार्यों’ को चुनौती देते हुए विवेकवान विद्वानों को शास्त्र-रक्षा के इस महायज्ञ में प्रामाणिक सहयोग हेतु आमंत्रित करती है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

अस्वीकरण: इस प्रस्तावना और भूमिका में प्रयुक्त कटु शब्द (जैसे मूर्खाचार्य, धूर्ताचार्य, शास्त्रदस्यु) किसी व्यक्ति विशेष के प्रति द्वेषवश नहीं, अपितु शास्त्रों की मर्यादा नष्ट करने वाले आचरण के प्रति ‘तिक्त ओषधि’ (कड़वी दवा) के रूप में प्रयुक्त हुए हैं, उद्देश्य केवल शुद्धि और परिष्करण है। इस ग्रंथ के शास्त्रीय निष्कर्षों पर प्रामाणिक और शास्त्रसम्मत खंडन का सदैव स्वागत है। इस आलेख के विश्लेषण और मौलिक संयोजन पर लेखक का वैधानिक बौद्धिक संपदा (कॉपीराइट) अधिकार सुरक्षित है।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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