इस आलेख में अर्क विवाह क्या है, अर्क विवाह की आवश्यकता क्या है आदि विषयों पर प्रामाणिक विमर्श के साथ अर्कविवाह की विधि और मंत्र समाहित किया गया है। अर्कविवाह के सम्बन्ध में कुछ धनलोलुपों द्वारा ये भ्रम भी फैलाया गया है कि वर के माङ्गलिक दोष का निवारक है इसका खंडन किया गया है और साथ ही डाउनलोड करने के लिये अर्क विवाह पद्धति का pdf भी दिया गया है।
अर्क विवाह विधि । जानिये अर्क विवाह क्या होता है ? अर्क विवाह पद्धति pdf के साथ
प्राचीन काल में बहुविवाह प्रथा का प्रचलन था और पुरुष कई विवाह किया करते थे। शास्त्रों में पुरुष का तृतीय विवाह उस मानुषी कन्या के जीवन के लिये जीवन हानिकारक बताया गया है और इस कारण तृतीय विवाह मानुषी से न करके अर्क से करने की आज्ञा दी गयी है तत्पश्चात अगला विवाह मानुषी से करने पर उसका तृतीय गणना न होकर चतुर्थ की गणना हो जाती है।
अर्क विवाह क्या होता है
अर्क अकान के वृक्ष का नाम है। तृतीय मानुषी विवाह पुरुष के लिये निषिद्ध है जिसका निवारण करने के लिये पुरुष का तीसरा विवाह अमानुषी अर्थात अर्कवृक्ष से करना अर्कविवाह कहलाता है।
तृतीया मानुषीकन्या नोद्वाह्या म्रियते हि सा। विधवा वा भवेत्तस्मा त्तृतीयेर्कं समुद्वहेत्॥ – धर्माब्धौ
यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि तृतीय मानुषी कन्या से विवाह नहीं करना चाहिये यदि ऐसा करते हैं तो उसकी मृत्यु हो सकती है अथवा विधवा हो सकती है अर्थात पुरुष की मृत्यु हो सकती है। इसकी शांति के लिये तृतीय विवाह यदि अर्क से करे तो उस कन्या से बाद में विवाह करने पर चतुर्थ विवाह माना जायेगा और तृतीय विवाह दोष भंग हो जायेगा।
अर्कविवाह और मांगलिक दोष
कुछ लोगों द्वारा जनमानस में वर के मांगलिक दोष निवारण का उपाय अर्कविवाह होने का भ्रम फैला दिया है। लेकिन वास्तविकता यही है कि अर्कविवाह और मांगलिक दोष शांति में कोई सम्बन्ध नहीं है।
- वर के प्रथम विवाह में अर्कविवाह का कोई प्रयोजन नहीं होता।
- वर के द्वितीय विवाह में भी अर्कविवाह का कोई प्रयोजन नहीं होता।
- लेकिन पुरुष मंगली हो या नहीं हो तृतीय विवाह से न्यूनतम पांच दिन पहले दोष निवारण करने के लिये अर्कविवाह आवश्यक होता है।
अर्क विवाह कब करना चाहिए
बहु विवाह की प्रथा प्राचीन काल में थी वर्तमान काल में नहीं है। लेकिन कदाचित यदि तीसरा विवाह करना हो तो तीसरा विवाह किसी मानुषी से नहीं करना चाहिये तीसरा विवाह अर्कवृक्ष से करना चाहिये।
बहुत वर के माङ्गलिक दोष निवारण हेतु अर्कविवाह करने का निर्देश करते पाये जाते हैं। परन्तु यह अप्रमाणिक है, जो लोग वर के माङ्गलिक दोष का निवारण अर्क विवाह बताते हैं उनको इसका शास्त्रोक्त प्रमाण भी प्रस्तुत करना चाहिये।
डॉक्टर ऑपरेशन करने के लिये किसी के शरीर पर चाकू चलाता है इसका यह अर्थ नहीं होता कि हर कोई किसी के शरीर पर चाकू चला सकता है। इसी प्रकार तृतीय विवाह के लिये अमानुषी विधि अर्क विवाह बताया गया है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं होता कि माङ्गलिक दोष निवारण के लिये भी अर्क विवाह ही करना चाहिये।
- अर्कविवाह शुभ मुहूर्त बनाकर करना चाहिये।
- अर्कविवाह के लिये दो दिन का विशेष रूप से महत्व है – रविवार और शनिवार।
- अर्कविवाह के लिये जिस नक्षत्र का विशेष महत्व है वो है – हस्त।
- अर्कविवाह के लिये एक विशेष नियम यह भी है कि तृतीय विवाह के दिन से न्यूनतम 5 दिन से अधिक पहले करे।
अर्क विवाह कैसे करे
- अर्कविवाह गांव से पूर्व या उत्तर दिशा में किसी निर्जन स्थान पर करे।
- इसका यह भी अर्थ होता है कि अर्कविवाह घर या मंदिर आदि में न करे।
- अर्कविवाह तभी करे जब तीसरा विवाह करना हो।
- मंगली दोषनिवारण के लिये अर्कविवाह का विधान नहीं बताया गया है।
- बहुत लोग मङ्गलीदोष निवारक समझकर मंदिरों में भी करते हैं जो शास्त्राज्ञा के विरुद्ध है अर्थात मङ्गलीदोष का निवारण तो नहीं होता किन्तु शास्त्राज्ञा उल्लंघन रूपी दोष का भागी बनाता है।
- अर्कविवाह में कन्यादान करने के लिये ब्राह्मण को आचार्य बनाये। अर्थात अर्क रूपी कन्यादान करने के लिये ब्राह्मण का वरण करे।
- कन्यादान करने के लिये जिस आचार्य का वरण किया गया हो वो विवाह में वरार्चन विधि के अनुसार वर का अर्चन करे।