यज्ञ मंडप पूजन विधि
यज्ञ-प्राणप्रतिष्ठा आदि में मंडप पूजन की विशेष विधि बताई गयी है। यहाँ आपकी सुविधा के लिये सम्पूर्ण मंडप पूजन विधि उपलब्ध किया गया है।
यज्ञ-प्राणप्रतिष्ठा आदि में मंडप पूजन की विशेष विधि बताई गयी है। यहाँ आपकी सुविधा के लिये सम्पूर्ण मंडप पूजन विधि उपलब्ध किया गया है।
संकल्प मंत्र : ॐ अद्यादि ……………………… प्रतिष्ठाङ्गगत्वेन प्रतिमासंशुद्ध्यर्थं ममगृहे प्रचुरधान्यपुत्र-पौत्रादिसुखसम्पत्यादि अभिवृद्धयर्थं पुष्पाधिवासं करिष्ये ॥
प्राण प्रतिष्ठा विधि में एक क्रिया नेत्रोन्मीलन है। नेत्रोन्मीलन में एक परंपरा चल पड़ी है देवता के सामने शीशा/कांच रखने की और टूटने की। वैदिक विधि से प्राण प्रतिष्ठा में इसका क्या महत्व है हम इसे समझने का प्रयास करेंगे।
यहाँ सनातन धर्म और इस्लाम पंथ के दो ऐसे ऐतिहासिक उदाहरण को प्रस्तुत किया गया है जिसके द्वारा बिना कुछ कहे भी सनातन धर्म और इस्लाम पंथ का अंतर भलीभांति समझा जा सकता है।
इस आलेख में हम चर्चा करेंगे की सनातन धर्म और इस्लाम में मुख्य अंतर क्या है। दोनों के बीच बहुत सारे बाह्य अंतर भी हैं लेकिन मुख्य अंतर जो कि आंतरिक है, विचार या सोच का है हम उसे ऐतिहासिक उदहारण से समझने का प्रयास करेंगे।
धान्याधिवास के उपरांत क्रमशः जो भी अन्य अधिवास करना हो करके स्नपन करे।
स्नपन के बाद पुरुष सुक्तादि से स्तुति करे।
सजाया हुआ रथ तैयार करे इन मंत्रों से प्रतिमाओं को उठाये :
सर्वप्रथम बाबरी विध्वंस का सही तात्पर्य समझना होगा। अभी तक जो तात्पर्य समझा-समझाया जाता है वह है बाबरी ढांचे का गिरना। लेकिन यह अर्थ सही नहीं लगता है।
श्री अयोध्या पुरी को शकों ने उजाड़ दिया था। अन्य मंदिरों के साथ-साथ श्री राम का प्राचीन मंदिर भी विध्वंस कर दिया था और विध्वंस ऐसा था कि उस स्थान का पता करना भी असंभव कार्य था।
पंडित देवीदीन पांडे एक शूरवीर ब्राह्मण थे, जिन्होंने मुग़ल सेना के विरुद्ध रणभूमि में वीरगति प्राप्त किया था। उनकी वीरता का इतिहास गोपनीय रहा पर उन्होंने भारतीय धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए अपना जीवन न्योछावर किया। उनका और राम मंदिर के नाम सदैव जुड़ा रहेगा।
नारायण सूक्त में ब्रह्मज्ञान विषयक गूढ़ार्थ सन्निहित है।
इसे पुरुष सूक्त का परभाग भी कहा जा सकता है।
यह ब्रह्म ज्ञान के महत्व को भी बताता है।
देवता ब्रह्मज्ञानियों के वश में होते हैं इसमें ऐसा भी बताया गया है।
इसमें परमात्मा के विषय में यह बताया गया है की वह सर्वव्यापी तो है ही अर्थात उसे बाहर भी देखा जा सकता है किन्तु वह सबके भीतर भी है और उसे भीतर भी पाया या जाना जा सकता है।
इसमें यह भी बताया गया है कि परमात्मा को जाने बिना कल्याण अर्थात मोक्ष का कोई अन्य उपाय नहीं है।