राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) राजनीतिक संगठन है या धार्मिक
जब नये धर्म-शास्त्रों का निर्माण करना चाहते हैं या धर्म-शास्त्रों में परिवर्तन करना चाहते हैं तो जनता को जो-जो शंकायें हों उन शंकाओं का निवारण भी तो करना होगा।
जब नये धर्म-शास्त्रों का निर्माण करना चाहते हैं या धर्म-शास्त्रों में परिवर्तन करना चाहते हैं तो जनता को जो-जो शंकायें हों उन शंकाओं का निवारण भी तो करना होगा।
स्वस्तिवाचन – चारों वेदों का – swastiwachan mantra : इस प्रकार यहां सम्पूर्ण स्वस्तिवाचन मंत्र (यजुर्वेदीय) के साथ-साथ ऋग्वेद स्वस्तिवाचन, सामवेद का स्वस्तिवाचन और अथर्ववेद का स्वस्तिवाचन भी संकलित किया गया जो बहुत सारे लोगों के लिये उपयोगी सिद्ध होगा।
शास्त्रों द्वारा स्त्री को पति के द्वारा किये गये हवन में ही फल का भागी बताया गया है तो अलग से हवन करने की आवश्यकता ही सिद्ध नहीं होती और पतिहीन (विधवा) के लिये आचार्य का वरण करके हवन का नियम ज्ञात होता है।
सत्तालोलुप समूह, षड्यंत्रकारी आदि अपने ही कुतर्कों के जाल में किस प्रकार फंसते हैं इसे इस प्रकार से समझा जा सकता है : आज के समय में वर्णव्यवस्था का महत्व नहीं है ।
एक गंभीर प्रश्न है कि जब सत्ता एवं विपक्ष की राजनीतिक लड़ाई चल रही हो और संविधान का संरक्षक मूकदर्शक बन जाये तो खतड़े में पड़ी राष्टीय सुरक्षा व आम नागरिकों के मौलिक अधिकार को कौन बचायेगा ?
हवन विधि – महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर : प्रथम भाग में वो प्रश्न लिये गये हैं जो इंटरनेट पर अधिकतर पूछे जाते हैं और द्वितीय भाग में वो प्रश्न लिये गये हैं जो इंटरनेट पर तो नहीं पूछे जाते एवं श्रद्धालुओं के मन में होते हैं एवं जिनका उत्तर भी इंटरनेट पर लगभग नहीं मिलता है। इस कारण हवन को समझने के लिये यह आलेख विशेष महत्वपूर्ण है।
अचला सप्तमी – अचला सप्तमी कब है – अचला का अर्थ – अचला सप्तमी 2025 : माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को अचला सप्तमी कहा जाता है।
इसका एक अन्य नाम रथ सप्तमी भी है।
शास्त्रों के नियमानुसार इस दिन किया गया प्रत्येक कर्म चाहे पुण्य कर्म हो या पाप कर्म अनन्त काल तक फलित होता है।
छन्दोग हवन विधि में पञ्चभूसंस्कार के समय बांयां हाथ भूमि पर रखने का विधान है अतः पञ्चभूसंस्कार के समय अग्निस्थापन तक बांयां हाथ भूमि पर रखे और सभी क्रियायें एक ही हाथ से करें; अङ्गिरा – सव्यं भूमौ प्रतिष्ठाप्य प्रोल्लिखेद्दक्षिणेन तु । तावन्नोस्थापयेत्पाणिं यावदग्निं निधापयेत् ॥
वैदिक हवन विधि में संपूर्ण हवन विधि को तीन भागों में बांटा गया है :
पूर्वाङ्ग – पवित्रीकरणादि के उपरान्त पञ्चभूसंस्कार से पञ्चमहावारुणी होम तक की सभी क्रियायें पूर्वाङ्ग कहलाती है। सभी प्रकार के हवनों में पूर्वाङ्ग समान ही रहता है।
मध्याङ्ग – पूजित देवी-देवता सहित मुख्य देवता का हवन मुख्य अंग होता है; जिसे समझने में सुविधा के लिये यहां मध्याङ्ग भी कहा गया है, जिसकी विधि, हविर्द्रव्य, मंत्र परिवर्तित होते रहते हैं।
उत्तराङ्ग – मध्याङ्ग अर्थात मुख्य देवता का होम करने के बाद की शेष क्रियायें उत्तराङ्ग कहलाती है। सभी प्रकार के वैदिक हवन विधि में उत्तराङ्ग भी समान रहता है।
मुख्य रूप से आपस्तम्बकृत पारस्करगृह्यसूत्र के हवन सूत्रानुसार हवन विधान पर विमर्श करते हैं। इस विमर्श का तात्पर्य यह है कि हवन विधि को सरलतापूर्वक समझा जा सके। सरल हवन पद्धति का तात्पर्य यही होता है कि शास्त्रोक्त हवन विधि को सरलता पूर्वक जिस पद्धति में समझाया गया हो।