देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् – देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र

देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् – देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र

देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र में ही बताया गया है कि स्तोत्रकाल में रचयिता शंकराचार्य की आयु 85 वर्ष थी। ऐसा कहा-सुना भी जाता है कि शंकराचार्य ब्रह्म को स्वीकारते थे शक्ति को नहीं। शक्तिहीन होने पर जब उन्हें शक्ति का महत्व ज्ञात हुआ तब उन्होंने देवी से क्षमायाचना किया जिसका नाम “देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र” है। यहाँ देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र हिंदी में अर्थ सहित दिया गया है। साथ ही अभ्यास हेतु विडियो भी दिया गया है।

देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् – देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र

देव्यपराध क्षमापन स्तोत्र आदि शंकराचार्य के द्वारा रचित स्तोत्र है जो भगवती को समर्पित है। इस स्तोत्र में आदि शंकराचार्य देवी से अपने पापों के लिए क्षमा याचना करते हैं। इसका प्रार्थना का भाव इतना गंभीर है कि कुटिल जीव का भी हृदय द्रवित हो जाये। फिर जो माता स्वभावतः भक्तों के ऊपर दया करने को आतुर रहती है उनके लिये तो कहना ही क्या ?

अर्थ – हे माते मैं तुम्हारा मन्त्र, यंत्र, स्तुति, आवाहन, ध्यान, स्तुतिकथा, मुद्रा तथा विलाप कुछ भी नहीं जानता, परन्तु सब प्रकार के क्लेशों को दूर करने वाला आपका अनुसरण करना ही जानता हूँ।

देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्
देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्

अर्थ – सबका उद्धार करने वाली हे करुणामयी माते ! तुम्हारी पूजा की विधि न जानने के कारण, धन के आभाव में, आलस्य से और उन विधियों को अच्छी तरह न कर सकने के कारण, तुम्हारे चरणों की सेवा करने में जो भूल हुई हो उसे क्षमा करो, क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कभी कुमाता नहीं होती।

अर्थ – हे माँ; भूमण्डल में तुम्हारे सरल पुत्र अनेकों है पर उनमें एक मैं विरला ही बड़ा चंचल हूँ, तो भी हे शिवे ! मुझे त्याग देना तुम्हारे लिये उचित नहीं, क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कभी कुमाता नहीं होती।

अर्थ – हे जगदम्ब; हे माते ! मैंने तुम्हारे चरणों की सेवा नहीं की अथवा तुम्हारे लिए प्रचुर धन भी समर्पण नहीं किया तो भी मेरे ऊपर यदि तुम ऐसा अनुपम स्नेह रखती हो तो यह सच ही है की क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कभी कुमाता नहीं होती।

अर्थ – हे गणेश जननी मैंने अपनी पचासी वर्ष से अधिक आयु बीत जाने के कारण विविध विधियों द्वारा पूजा करने की विधि से घबड़ा कर सभी देवताओं को छोड़ दिया है, यदि इस समय तुम्हारी कृपा न हो तो मैं निराधार होकर किस की शरण में जाऊंगा?

अर्थ – हे माता अपर्णे ! यदि तुम्हारे मंत्राक्षरों के कान में पड़ते ही चांडाल भी मधु के समान सुमधुरवाणी से युक्त बड़ा भारी वक्ता बन जाता है और महादरिद्र भी नृपति (राजा) बन कर चिरकाल तक निर्भय विचरता है तो उसके जप का अनुष्ठान करने पर जपने से जो फल होता है, उसे कौन जान सकता है?

अर्थ – जो चिता का भस्म रमाये रहते हैं, विष पान करने वाले हैं, नंगे रहते है, जटाजूट बांधे है, गले में सर्पमाला पहनते हैं, हाथ में खप्पर लिए हैं, पशुपति और भूतों के स्वामी हैं, ऐसे शिवजी ने भी जो एकमात्र जगदीश्वर की पदवी प्राप्त की है, वह हे भवानि ! तुम्हारे साथ विवाह होने का ही फल है।

अर्थ – हे चंद्रमुखी माते ! मुझे मोक्ष की इच्छा नहीं है, सांसारिक वैभव की भी लालसा नहीं है, विज्ञान तथा चंद्रमुखी पत्नीसुख की भी अभिलाषा नहीं है, इसलिए मैं तुमसे यही मांगता हूँ कि मेरी सम्पूर्ण आयु मृडानी, रुद्राणी, शिव-शिव, भवानी आदि नामो के जपते-जपते ही बीते।

अर्थ – हे श्यामे ! मैंने अनेको उपचारों से तुम्हारी सेवा नहीं कि (यही नहीं, इसके विपरीत) अनिष्ट चिंतन में तत्पर अपने वचनों से मैंने क्या-क्या नहीं किया? फिर भी मुझ अनाथ पर यदि तुम कुछ कृपा रखती हो तो यह तुम्हें बहुत ही उचित है, क्योंकि तुम मेरी माता हो।

अर्थ – हे दुर्गे हे दयासागर माहेश्वरी जब मैं किसी विपत्ति में पड़ता हूँ तो तुम्हारा ही स्मरण करता हूँ, इसे तुम मेरी धृष्टता या दुष्टता मत समझना, क्योंकि भूखे-प्यासे बालक सदा अपनी माँ को ही याद किया करते हैं।

अर्थ – हे जगज्जननी मुझ पर तुम्हारी पूर्ण कृपा है, इसमें आश्चर्य ही क्या है? क्योंकि अनेक अपराधों से युक्त पुत्र को भी माता नहीं त्यागती।

अर्थ – हे महादेवी मेरे समान कोई पापी नहीं है और तुम्हारे समान कोई पाप नाश करने वाली नहीं है, यह जानकार जैसा उचित समझो, वैसा करो।

देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र
देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र

देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी :

  • भगवती को प्रसन्न करने के लिये ये स्तोत्र बहुत महत्वपूर्ण है।
  • जहां कहीं भी माता दुर्गा की पूजा की जाती है यह स्तोत्र अवश्य ही सुनाया जाता है।
  • इस स्तोत्र को बहुत ही सुंदर तरीके से संगीतबद्ध करके गाया जाता है।
  • ये स्तोत्र मात्र ब्राह्मणों को ही याद नहीं होता, बहुत सारे यजमान भी याद करते हैं।
  • इस स्तोत्र का उच्चारण करना भी अधिक क्लिष्ट नहीं है, लेकिन बहुत सरल भी नहीं है।
  • ये स्तोत्र बताता है कि शंकराचार्य भले ही ज्ञानमार्गी थे किन्तु अंत में उन्होंने भी भक्तिमार्ग का आश्रय लिया ही था।
देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् संस्कृत
देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् संस्कृत

॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः सुशांतिर्भवतु सर्वारिष्ट शान्तिर्भवतु

आगे सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती के अनुगमन कड़ी दिये गये हैं जहां से अनुसरण पूर्वक कोई भी अध्याय पढ़ सकते है :

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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