स्वतंत्र भारत में एक ऐसे वर्ग को जिसके विचार सनातन द्रोही हो बुद्धिजीवी घोषित किया गया, सम्मनित और प्रचारित करके समाज और राज्य में भ्रम का प्रवाह किया गया और उनको आशातीत पुष्पित-पल्ल्वित किया गया जिसके कारण सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण मात्र ही नहीं हुआ अपितु उत्पीड़िन भी किया जा रहा है। बाल-विवाह (रोकथाम) अधिनियम से छोटे किसान उत्पीड़न का शिकार हो रहे हैं और पापलिप्त होने भावना से ग्लानिग्रस्त भी।
उचित और अनुचित का निर्णय तो तभी किया जा सकता है जब दो विकल्प हों और दोनों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाय। चलो अब दो पक्ष हैं बाल-विवाह और वयस्क विवाह, दोनों का तुलनात्मक अध्ययन करो तभी सही का चयन संभव हो सकता है। यदि एकाङ्गी विचार थोपा गया हो तो उसे उचित कैसे कहा जा सकता है। यदि थोपा हुआ एकांगी एकाङ्गी विचार जो संस्कृति के भी विरुद्ध हो, सामाजिक स्वरूप को भी नष्ट करता हो पुनर्विचार तो करना ही चाहिये।
कम-से-कम उस वर्ग/समाज को तो बलपूर्वक बाध्य नहीं करना चाहिये जिसे क्षति समझ आती हो। दोनों पक्षों को स्वतंत्रता देनी चाहिये जिसे वयस्क विवाह उचित लगता है वह वयस्क विवाह ही करे और जिसे बाल-विवाह ही उचित लगता हो वह बाल-विवाह करे।
चलो मान लिया की दशकों तक ऐसे लोग विधि-विधाता बने बैठे थे जिनको भारतीय संस्कृति का नहीं विदेशी संस्कृति का ज्ञान था और प्रेम भी विदेशी संस्कृति से ही था। अब तो परिवर्तन हो गया है न। क्या वर्त्तमान में भी विधि-के-विधाता जो बने हुये हैं भारतीय संस्कृति से उसे भी प्रेम नहीं है ? क्या वर्त्तमान विधि-निर्माता भी धर्म-शास्त्रों में अविश्वास ही रखते हैं ? क्या वर्त्तमान विधि-निर्माताओं को भी भारतीय संस्कृति से अधिक विदेशी संस्कृति से ही प्रेम है ?
बाल-विवाह रोकथाम अधिनियम को अभी भी समाज के वो वर्ग जो पीड़ित हो रहे हैं अंगीकार करने को तैयार नहीं है और संभवतः आगे भी अंगीकार नहीं कर सकती। क्योंकि वो विधान ही अनुचित सिद्ध होता है जिससे समाज/परिवार को क्षति पहुँचता हो।
वर्त्तमान सरकार को इस विषय में व्यापक अध्ययन करना चाहिये और परिवर्तन संभावित होता हो तो उस वयस्क विवाह के पक्षधार को भी बाल-विवाह के लिये बाध्य नहीं करना चाहिये किन्तु बाल-विवाह के पक्षधर के ऊपर जो बाध्यकारी निषेध थोपा गया है उससे मुक्त कर देना चाहिये। शिक्षा-नीति में परिवर्तन, स्वास्थ्य सुविधाओं की वृद्धि आदि प्रयास में वृद्धि करना चाहिये न कि निषेध को बाध्यकारी बनाये रखना चाहिये।
स्त्रीणां द्विगुण आहारो लज्जा चापि चतुर्गुणा । साहसं षड्गुणं चैव कामश्चाष्टगुणः स्मृतः ॥ – चाणक्यनीति में कहा गया है कि पुरुष की तुलना में स्त्रियों को आहार द्विगुणित अर्थात दोगुनी, लज्जा चतुर्गुणित अर्थात चारगुनी, सहस षड्गुणित छः गुनी और काम भावना अष्टगुणित अर्थात आठ गुनी होती है।
एक बार अपने आठगुनी कामभावना के कारण स्त्रियां देवराज इंद्र के शरण में जाकर अपना मनोभाव व्यक्त करने लगी तो इंद्र ने कहा आप लोगों की कामभावना का निरादर करने वाला पुरुष पातकी होगा – “भवतीनां कामविहन्ता पातकी स्यात्॥”
कामभावना उत्पन्न कब होती है
सभी जीवों में एक सुनिश्चित आयु के उपरांत रजस्वला होने पर काम भावना उत्पन्न होती है और कुछ दिन ऋतुकाल कहा जाता है। काम की आवश्यकता भी उपर्युक्त काल में ही होती है और गर्भधारण की योग्यता का भी सूचक होता है। उपर्युक्त काल में उपेक्षा करने पर अर्थात ऋतुगमन नहीं करने पर पति भी पाप का भागी होता है। यदि ऋतुमती कन्या का विवाह न किया गया हो तो पिता, भ्राता आदि पाप के भागी होते हैं।
अब प्रश्न यह है कि सरकार ने (जिस सरकार का बल ही पाप था) ऐसा विधान बना दिया जो इस शास्त्रोक्त विधि का उल्लंघन करता है तो पाप का अधिकारी कौन होगा इसे भी सुनिश्चित करना चाहिये। ये कौन कहे कि इसका निर्धारण करने का अधिकार ही सरकार (राज्य के तीनों अंगों) को नहीं है, ये धर्मशास्त्रों में पूर्व निर्धारित कर रखा है।
लेकिन कुछ महान व्यक्ति थे जो शाशन हाथ में आने के बाद स्वयं को धर्म-शास्त्रों से ऊपर समझ बैठे और वास्तव में उनका बल ही पाप था, भारतीय संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं था और जान-बूझकर षड्यंत्र से लोगों को भ्रमित करके अपने मन के अनुसार व्यभिचारी समाज (जो की विदेशों में होता है) निर्माण करने के लिये तदनुसार विधान कर दिया।
मनमर्जी से आधे फटे कपड़े पहनने का अधिकार है, शिक्षा का अधिकार है, लेकिन यथाकाल कामभावना की पूर्ति का अधिकार नहीं है, यथाकाल मातृत्व का अधिकार नहीं है। यथाकाल वर्षा (5 – 10 वर्ष पश्चात् हो) न हो, यथाकाल दिन न हो, यथाकाल रात न हो तो दुष्परिणाम होंगे। उसी प्रकार यथाकाल विवाह न होने के भी दुष्परिणाम ही होते हैं सुपरिणाम नहीं।
यथाकाल विवाह न होने के दुष्परिणाम :
- एक व्यभिचारी समाज का निर्माण : सरकार विधि से निषेध करके भोजन को निषेध कर सकती है किन्तु उसका प्रतिफल ये होगा की सभी चोरी से भोजन करेंगे और सब चोर कहलायेंगे। यथाकाल कामभावना (भूख) उत्पन्न होती है किन्तु सरकार (विधायिका) ने विधि द्वारा निषेध कर दिया है विवाह नहीं किया जा सकता अतः इस विषय में एक व्यभिचारी समाज का निर्माण कर रही है।
- मातृत्व व पितृत्व भावना की समाप्ति : यथाकाल मातृत्व और पितृत्व प्राप्त न होने से ठीक उसी प्रकार जैसे यथाकाल (भूख लगने पर) भोजन न करने से क्षुधा ही निवृत्त हो जाती है और स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या प्रकट होने लगती है, मातृत्व और पितृत्व भाव की निवृत्ति हो जाती है, गर्भधारण में समस्या आती है और जन्म लेने वाले बच्चे को माता-पिता का अपेक्षित प्रेम प्राप्त नहीं हो पाता।
- बलात्कार की घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि : कामातुर को न भय होता है न लज्जा होती है – “कामातुराणां न भयं न लज्जा” । विधि से बाल-विवाह निषिद्ध होने पर भी कामभावना प्रभावित नहीं होती मात्र विवाह प्रभावित होता है। कुछ दिनों तक तो दबी रह सकती है किन्तु कभी न कभी उद्वेग बढ़ता ही है जिससे भय व लज्जा की निवृत्ति हो जाती है एवं बलात्कार की घटनायें बढती जा रही है। बलात्कार की घटनाओं को कठोर दण्ड का प्रावधान करके नहीं रोका जा सकता। इसके लिये यथाकाल आवश्यकतापूर्ति की अपेक्षा है।
- लव-जिहाद का शिकार बनना : संभवतः इस विषय पर किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि वयस्क-विवाह के कारण लव-जिहादियों को लव-जिहाद करने का भरपूर अवसर प्राप्त होता है। एक कालखण्ड वो था जब म्लेच्छ आक्रांताओं से बचाव के कारण हिन्दू महिलायें अपने सौंदर्य की बलि दे देती थी और स्वयं को गोधना आदि के द्वारा कुरूप कर लेती थी। आज स्वतंत्र भारत में उन्हें इस प्रकार बाध्य कर दिया गया है कि अपनी बेटियों की लव-जिहाद से भी रक्षा नहीं कर पा रहे हैं।
इसके उपरान्त एक कुतर्क गढ़ा गया असमय गर्भधारण करने का। जब प्रकृति गर्भधारण का सही समय निर्धारित करती है तो किसी राज्य को ये निर्धारण करने का अधिकार ही सिद्ध नहीं होता। दूसरी बात 8 – 9 वर्ष को वास्तव में गर्भधारण के उपर्युक्त नहीं कहा जा सकता और इसका निर्धारण परिवार करता था कि कन्या क्षेत्र बनी या नहीं क्षेत्र में बीजारोपण हो।
आश्रम रहित होना भी निषिद्ध किया गया है अतः समावर्तन के उपरांत विवाह आवश्यक होता है अनाश्रमी रहना निषिद्ध होता है। किन्तु विवाहोपरांत द्विरागमन में आवश्यकतानुसार 1 – 3 – 5 वर्ष का विलम्ब किया जाता था जो नहीं जानते वो इस बात को भी जान लें और द्विरागमन पूर्व गर्भधारण भी निन्दित होता था। इसके पश्चात भी परिवार के लोग असमय (यथाकाल अनुपलब्ध होना) पति-पत्नी के मिलन को प्रतिबंधित रखते थे। वासना विधर्मियों में ही देखा जाता था हिन्दुओं में नहीं।