“जिज्ञासा भूमि है, प्रश्न बीज है और उत्तर वह विशाल वृक्ष है जिसकी छाया में ज्ञान फलता है।”
मैथिलेत्तरों के विषय में तो हमें ज्ञात नहीं किन्तु अनुमान है कि वो नाम-गोत्र का उच्चारण करके ही दान-दक्षिणा आदि ग्रहण करते हैं। किन्तु यदि मिथिला के पुरोहित वर्ग की बात करें तो नाम-गोत्र का उच्चारण नहीं करते हैं और यह आपको कर्मकाण्ड की पुस्तकों में लिखित रूप से भी देखने को मिलता है यदि न ज्ञात हो तो मैथिल वर्षकृत्य का अवलोकन कर सकते हैं। मिथिला में पुरोहित वर्ग को दिया जाने वाला दान-दक्षिणा “यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय” कहकर दिया जाता है।
यहीं पर एक प्रश्न उत्पन्न होता है क्यों, इसका कारण क्या है ? चूंकि प्रश्न उत्पन्न होता है एवं भविष्य के कर्मकांडियों को भी इस प्रश्न से दो-चार होना ही होगा तो उसका प्रामाणिक उत्तर समझना भी आवश्यक है।
यथानामगोत्रायब्राह्मणाय का रहस्य : पुरोहित अपने नाम और गोत्र का उच्चारण करके दान-दक्षिणा क्यों नहीं लेते ?
“यदि तुम जिज्ञासु नहीं हो तो कर्मकाण्ड में तुम्हारा कोई अधिकार भी शेष नहीं है”
यदि आप एक कर्मकाण्डी अथवा कथावाचक हैं और किसी न किसी प्रकार से शास्त्र विषयक कर्म-परिचर्चा आदि से संबंधित हैं तो आपके लिये यह आवश्यक होता है कि एक छोटे से छोटे प्रश्न की भी अनदेखी न करें और उसका प्रामाणिक उत्तर प्राप्त करने, देने का प्रयास करें। ज्ञान का द्वार ही जिज्ञासा है जिसका मूर्त्तरूप प्रश्नोत्तर होता है।
जिसे हम एक छोटा सा प्रश्न समझ रहे होते हैं उत्तर ज्ञात होने पर जानते हैं कि इसमें तो बड़ा ही रहस्य था इसलिये किसी भी प्रश्न की कभी अनदेखी नहीं करनी चाहिये, उसका प्रामाणिक उत्तर ढूंढना ही चाहिये किन्तु यह दुर्भाग्य है कि वर्त्तमान में जिज्ञासा ही जरावस्था को प्राप्त हो चुकी है। किसी को यदि उत्तर जानना भी है तो हाँ या न में, यदि मनोनुकूल हो तो ठीक अथवा मन के प्रतिकूल हो तो कुतर्कों पर आधारित वाद-विवाद का उद्गम।
विद्वान वही होते हैं जो अंतिम श्वास में भी किसी प्रश्न का उत्तर जान रहे हों अथवा दे रहे हों, जिज्ञासा को शांत कर रहे हों। लाक्षणिक धरातल पर ब्राह्मण का तात्पर्य ही है अनन्त चिंतन-मनन, समस्या और समाधान, प्रश्न और उत्तर। विद्वत्ता का प्राकट्य प्रश्नों के प्रामाणिक उत्तर देने से ही होता है मात्र कर्मकांड कराने या कथा आदि कहने से अथवा तार्किक उत्तर देने से भी नहीं। वर्त्तमान काल में प्रामाणिक उत्तर प्रस्तुत करना विलुप्त होता जा रहा है और यदि उत्तर दिये भी जाते हैं तो मात्र तार्किक जो अविद्वत्ता का परिचायक है।

आज हम जिस प्रश्न पर विमर्श करने जा रहे हैं क्या आपने कभी पूर्व यह प्रश्न कहा-सुना है अथवा नहीं; अर्थात यदि आप नये-नये कर्मकाण्डी बने हैं तभी नहीं सुने होंगे किन्तु यदि एक-दो दशक से कर्मकाण्ड कर रहे हैं तो निश्चितरूपेण सुनते रहे होंगे किन्तु क्या इसका प्रामाणिक उत्तर प्राप्त हुआ है ? उत्तर नहीं मिला होगा और उत्तर में जो मिला होगा वो इस प्रकार से मिला होगा जैसे रात्रि में विवाह को मुगलकालीन अत्याचार से जोड़ दिया जाता है।
किन्तु आप सभी को ज्ञात है कि “संपूर्ण कर्मकाण्ड विधि” पर मात्र तार्किक विमर्श नहीं किया जाता है और कदाचित कोई तार्किक विमर्श हो भी तो उसमें भी प्रमाणपुष्टि की ही जाती है, कुछ अपवाद ही हो सकते हैं जब “संपूर्ण कर्मकांड विधि” पर यह कहा जाता है कि इसका तार्किक उत्तर ही संभव है, प्रामाणिक उत्तर नहीं मिलेगा। इस प्रश्न का भी हम प्रामाणिक उत्तर ही ढूंढेंगे किन्तु इसी कड़ी में हमारा यह प्रयास भी निरंतर रहता है कि आपकी जिज्ञासा को भी पल्लवित-पुष्पित करते हैं और ये आपको यहां सभी आलेखों में देखने को मिलेगा, यदि आप प्रथम बार पधारे हैं तो कुछ अन्य आलेखों का अवलोकन करके अनुभव कर सकते हैं।
यहां प्रामाणिक उत्तर के विषय में भी एक बात को समझ लेना आवश्यक है कि एक प्रमाण के स्पष्ट उत्तर भले ही एक हों किन्तु प्रच्छन्न उत्तर अनेकों हो सकते हैं और वो भी प्रामाणिक ही कहे जाते हैं, अर्थात प्रामाणिक उत्तर का तात्पर्य यह नहीं होता कि स्पष्ट उत्तर वाला ही प्रमाण हो। इसको उदाहरण से इस प्रकार समझा जा सकता है :
“भद्रायां द्वे न कर्त्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा” इस प्रमाण का स्पष्ट उत्तर जो ज्ञात होता है वो है कि भद्रा में दो कार्य न करे एक श्रावणी (रक्षाबंधन) और फाल्गुनी (होलिका दहन), किन्तु इसके अतिरिक्त भी प्रच्छन्न उत्तर प्राप्त होता है और वो यह कि
- अन्य सभी कार्यों के लिये भद्रा का निषेध नहीं है, अथवा भद्रा परिहार होने पर कर सकते हैं।
- श्रावणी और फाल्गुनी का विशेष वर्णन होने के कारण इसमें परिहार का विचार ही नहीं कर सकते अथवा भद्रा परिहार होने पर भी नहीं कर सकते हैं।
इस प्रकार उदाहरण सहित समझाने का उद्देश्य यह है कि आज के विमर्श में हम प्रमाणों का उपयोग तो करेंगे अर्थात प्रामाणिक विमर्श तो करेंगे किन्तु प्रमाणों के प्रच्छन्न निष्कर्ष से उत्तर प्राप्त होगा, स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता है। क्योंकि यदि स्पष्ट प्रमाण होता तो मात्र मैथिलों के व्यवहार में ऐसा नहीं होता, सभी क्षेत्रों में यही नियम होता। और यही कारण है कि मिथिला के व्यवहार को भी धर्म के विषय में निर्णय के समान ग्राह्य कहा गया है।
मिथिला के व्यवहार को धर्म निर्णय का प्रमाण कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि प्रत्येक व्यवहार निर्णय और धर्म सम्मत हो क्योंकि वर्त्तमान में तो मिथिला का व्यवहार भी भ्रष्ट हो ही रहा है, मिथिला में भी वर कोर्ट-पैंट या कुर्ता-पैजामा पहनकर विवाह कर ही रहे हैं तो क्या भविष्य के लिये यह व्यवहार भी धर्म निर्णय का आधार हो जायेगा ? उत्तर है नहीं और इसी प्रकार सभी मिथिला के भी सभी परम्परा या व्यवहार प्रामाणिक नहीं कहे जा सकते।
व्यवहार के प्रामाणिकता का भी तात्पर्य यह है कि उसको आचार्यों ने अंगीकार किया हो, मान्यता दिया हो और इसी का एक सटीक उदाहरण है “यथानामगोत्रायब्राह्मणाय” का प्रयोग करना। इसे आचार्यों ने स्वीकारा है और इस कारण कर्मकाण्ड के पुस्तकों में इसका प्रयोग भी किया गया है। अर्थात एक और तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि वर्त्तमान में जो व्यावहारिक प्रदूषण प्रसारित हो रहा है वो सभी मिथिला व्यवहार नहीं कहला सकते जैसे :
- पूर्वाह्न में श्राद्ध (द्वादशाह) आरम्भ करना।
- अपराह्न में उपनयन करना।
- विवाह और अन्य कर्मकांड भी बिना धोती धारण किये करना।
- चूडाकरण में शिखा मुंडन कर देना।
- उपनयन में चतुर्थी करना। (उपनयन में चतुर्थी का वास्तविक तात्पर्य कुछ और ही है अज्ञता के कारण उसे चतुर्थी समझा जाने लगा है)
इसी प्रकार और भी ढेरों उदाहरण हैं जो मिथिला व्यवहार नहीं कहे जा सकते और ये रहस्य परम्परा/व्यवहार चिल्लाने वालों को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है। मिथिला व्यवहार में “न मम” का प्रयोग नहीं होता यह तो समाहित किया जा सकता है, किन्तु एकादशाह के दिन पुरोहित वर्ग के ब्राह्मणों का वरण, भोजन आदि समाहित नहीं हो सकता। मासिक श्राद्ध का महापात्र, पुरोहित, नापित और मालाकार आदि में विभाजन होना मिथिला व्यवहार नहीं स्वीकार किया जा सकता क्योंकि किसी पुस्तकों में आचार्यों का ऐसा निर्देश नहीं है।

अर्थात मिथिला व्यवहार का भी तात्पर्य यही है कि आचार्यों द्वारा विकल्पात्मक अथवा प्रतीकात्मक रूप से जो व्यवहार ग्रहण किया गया है वही मिथिला व्यवहार कहा जा सकता है, स्वेछाचारियों द्वारा किया जाने वाला व्यवहार नहीं।
मूल प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर भूमिका को इतना विस्तार देने का उद्देश्य यह है कि आपकी जिज्ञासा जाग्रत हो। आइये अब मूल प्रश्न को हल करते हैं।
मिथिला व्यवहार
अब तक यह स्पष्ट हो चुका है कि “यथानामगोत्रायब्राह्मणाय” जो कि पुरोहित वर्ग के लिये प्रयुक्त होता है (महापात्र के लिये नहीं), यह मिथिला व्यवहार है कारण यह कि आचार्यों ने स्वीकार किया है और पुस्तकों में ऐसा ही प्रयोग किया है।
इसको यदि हम और स्पष्ट करें तो इस प्रकार से कहा जा सकता है कि “यथानामगोत्रायब्राह्मणाय” शास्त्र द्वारा स्पष्ट प्रमाणित विषय नहीं है अपितु मैथिल आचार्यों द्वारा ग्रहण किया गया मार्ग है जो शास्त्रसम्मत है और ऐसा श्रेष्ठतम मार्ग है जिसपर अनुगमन करने से पुरोहित वर्ग दोषरहित भी रहता है और समाज में कर्मकाण्ड का संपादन भी करता है। यह विषय अन्यान्य प्रमाणों के माध्यम से यहां इसी प्रकार सिद्ध होगा अर्थात प्रामाणिक विमर्श का तात्पर्य यह नहीं है कि “यथानामगोत्रायब्राह्मणाय” का स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत करते हुये उचित सिद्ध किया जायेगा अपितु यह तात्पर्य है कि ऐसा क्यों करते हैं ?
मिथिला व्यवहार की चर्चा में यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि वर्त्तमान कालीन आचार्य यदि किसी विषय को मान्यता दे दें तो वो मिथिला व्यवहार मान्य नहीं होगा क्योंकि वर्त्तमान काल में अयोग्यता स्पष्टतः देखने को मिलती है। अभी के समय में किसी प्रकार रुद्री, सप्तशती पाठ करना सीख लिये और यजमान बुलाने लगा, सम्पर्क जाल विस्तार की कला में पारंगत हो गए तो पंडित बन गये। शास्त्रज्ञान का पूर्णतः अभाव ही प्रकट होता है। शास्त्र अपना रहस्य स्वयं भी प्रकट करते हैं किन्तु इसके लिये शास्त्र की सेवा करने की आवश्यकता होती है।
किन्तु वर्त्तमान कालीन पंडित प्रत्येक विषय में मात्र कुतर्काधारित पूर्वाग्रह से ग्रसित रहते हैं और चिंताजनक यह है कि जो विषय शास्त्र से सिद्ध हो निर्लज्जतापूर्वक कुतर्कों से उसका भी खंडन करते रहते हैं। उन्हें इतना भी ज्ञान नहीं कि यदि अगला व्यक्ति एक प्रमाण प्रस्तुत कर रहा है तो खंडन के लिये भी प्रमाण ही प्रस्तुत करना चाहिये तर्क-कुतर्क नहीं। जैसे यहां की चर्चा कुछ प्रमाणों के आधार पर ही होगी तो इसका खंडन तर्क-कुतर्क से हो ही नहीं सकता, खंडन करने के लिये भी प्रमाण की ही आवश्यकता होगी।
मिथिला व्यवहार भी प्रमाण के ही समकक्ष होता है किन्तु क्या मिथिला व्यवहार है और क्या नहीं यह भी समझने का विवेक न हो तो विवाह में पैंट पहनने को भी भविष्यवर्ती मूढ़ मिथिला व्यवहार घोषित करने लगेंगे, क्योंकि वो तो जन्म से ही ऐसा देखेंगे, भले ही वर्त्तमान पीढ़ी ने धोती पहनते भी देखा हो। इसलिये मिथिला व्यवहार/परम्परा/देशाचार आदि शब्दों के प्रयोग में भी कर्मकांडी को अत्यधिक सावधान रहना चाहिये।
पुरोहित वर्ग और समाज की समस्या
मिथिला व्यवहार भी प्रमाण के ही समकक्ष होता है किन्तु क्या मिथिला व्यवहार है और क्या नहीं यह भी समझने का विवेक न हो तो विवाह में पैंट पहनने को भी भविष्यवर्ती मूढ़ मिथिला व्यवहार घोषित करने लगेंगे, क्योंकि वो तो जन्म से ही ऐसा देखेंगे, भले ही वर्त्तमान पीढ़ी ने धोती पहनते भी देखा हो। इसलिये मिथिला व्यवहार/परम्परा/देशाचार आदि शब्दों के प्रयोग में भी कर्मकांडी को अत्यधिक सावधान रहना चाहिये।
इस विषय को समझने के लिये सर्वप्रथम हमें पुरोहित वर्ग और समाज की समस्या को समझना होगा। सबसे पहली समस्या तो यह है कि पुरोहितों की संख्या कम होती है जो वर्त्तमान में भी देखने को मिलता है। समाज को वास्तव में जितने पुरोहितों की आवश्यकता होती है उतनी संख्या में वो होते नहीं हैं और यही कारण है कि एक दिन में एक पुरोहित किसी यजमान का सत्यनारायण पूजा भी करता है तो किसी यजमान का श्राद्ध भी और किसी का विवाह भी।

शास्त्रानुसार जो ब्राह्मण श्राद्ध में प्रयुक्त हुआ कम-से-कम उस दिन तो वह पूजा, विवाह आदि में सम्मिलित होने के योग्य नहीं रहता। यदि उपस्थित न होय तो अगले यजमान का कर्म अवरुद्ध हो जाता है इसलिये समाज से कर्मलोप न हो, इसका मार्ग ढूंढना आवश्यक है। यहां हमने श्राद्ध का उदाहरण दिया है किन्तु प्रतिग्रह दोष को अल्प नहीं समझना चाहिये, प्रतिग्रह में भी बहुत बड़ा दोष होता है और सर्वाधिक दोष गोदान में होता है।
प्रतिग्रहाच्छ्रुध्यति जाप्यहोमं न याजनं कर्म पुनन्ति वेदाः ॥ गरुडपुराण २/४२/२१
प्रतिग्रहेण ब्राह्मणानां ब्राह्मं तेजः प्रणश्यति ॥ विष्णु स्मृति ५७/७
प्रतिग्रहेण विप्राणां ब्राह्म्यं तेजो हि शाम्यति॥
स्कन्दपुराणम्/खण्डः १ (माहेश्वरखण्डः)/कौमारिकाखण्डः/६/७२
प्रतिग्रहेण तेजो हि विप्राणा शाम्यतेऽनघ। प्रतिग्रहं ये नेच्छेयुस्तेऽपि रक्ष्यास्त्वया नृप॥
महाभारतम/अनुशासनपर्व-१३/७०/२५
वेदविच्चापि विप्रोऽस्य लोभात्कृत्वा प्रतिग्रहम् । विनाशं व्रजति क्षिप्रमामपात्रमिवाम्भसि ॥
मनुस्मृति/३/१७९
वर्त्तमान काल में अज्ञता के कारण प्रतिग्रह दोष नहीं दिखता और शास्त्र अवलोकन करते नहीं की ज्ञात हो क्योंकि समयाभाव है, किसी से पूछते भी नहीं क्योंकि अहंकार है और कदाचित ऐसे आलेख मिल भी जायें तो पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं, प्रतिग्रह दोष निवारण का प्रयास ही नहीं करना चाहते किन्तु प्रतिग्रह से मुक्त भी नहीं होना चाहते। इसके कारण शास्त्र की भी अवज्ञा करते रहते हैं अन्यथा जो विषय प्रमाण से सिद्ध हो जाये कुतर्कों द्वारा उसे अस्वीकारने का अवकाश ही कहां है।
कुतर्कों से प्रमाणसिद्ध तथ्य के खंडन का तात्पर्य ही है शस्त्रखंडन करना और वर्त्तमान में ऐसे ढेरों कर्मकांडी मिलते हैं। आप स्वयं भी यहां प्रकाशित अनेकों प्रामाणिक तथ्यों से कर्मकांडियों को अवगत करते होंगे और वो कुतर्क करके खंडन करते होंगे, कोई प्रमाण भी नहीं दे सकते और स्वीकार भी नहीं कर सकते।
प्रतिग्रहणसमर्थोऽपि प्रसंगं तत्र वर्जयेत् । प्रतिग्रहेण विप्राणां ब्राह्मं तेजो विनश्यति ॥
न च द्रव्यमविज्ञाय विधिं धर्म्यं प्रतिग्रहे । प्राज्ञः प्रतिग्रहं कुर्यादवसीदन्नपि क्षुधा ॥
अतपास्त्वनधीयानः प्रतिग्रहरुचिर्द्विजः । अम्भस्य संप्लवेनैव सह तैनैव मज्जति ॥
तस्मान्न विद्वान्गृह्णीयाद्यस्मात्तस्मात्प्रतिग्रहम् । अल्पकेनाप्यविद्वांस्तु पङ्के गौरिव सीदति ॥
विष्णुधर्मोत्तरपुराण/३/२३३/१८७ – १९०
प्रतिग्रहसमर्थोऽपि प्रसङ्गं तत्र वर्जयेत् । प्रतिग्रहेण ह्यस्याशु ब्राह्मं तेजः प्रशाम्यति ॥
न द्रव्याणां अविज्ञाय विधिं धर्म्यं प्रतिग्रहे । प्राज्ञः प्रतिग्रहं कुर्यादवसीदन्नपि क्षुधा ॥
हिरण्यं भूमिं अश्वं गां अन्नं वासस्तिलान्घृतम् । प्रतिगृह्णन्नविद्वांस्तु भस्मीभवति दारुवत् ॥
हिरण्यं आयुरन्नं च भूर्गौश्चाप्योषतस्तनुम् । अश्वश्चक्षुस्त्वचं वासो घृतं तेजस्तिलाः प्रजाः ॥
अतपास्त्वनधीयानः प्रतिग्रहरुचिर्द्विजः । अम्भस्यश्मप्लवेनेव सह तेनैव मज्जति ॥
तस्मादविद्वान्बिभियाद्यस्मात्तस्मात्प्रतिग्रहात् । स्वल्पकेनाप्यविद्वान्हि पङ्के गौरिव सीदति ॥
मनु स्मृति/४/१८६ – १९१
ऋषयस्तु तदा प्राहुर्नगृह्णीमः प्रतिग्रहम् । राज्यद्रव्यं महादोषयुक्तं गृह्णीम एव न ॥
दशसूनासमश्चक्री दशचक्रिसमो ध्वजी । दशध्वजिसमा वेश्या दशवेश्यासमो नृपः ॥
राज्ञो दानं महाघोरं पाचयितुं न शक्यते । अन्येभ्यो दीयतां राजन् कुशलं तेऽस्तु सर्वथा ॥
लक्ष्मीनारायणसंहिता/१ (कृतयुगसन्तानः)/५४०/७७ – ७९
आज के पंडितों की दुर्दशा देखिये नेताओं, धनाढ्यों की चाकरी से भी पीछे नहीं हटते, आपने कई बार देखा होगा गंगा आरती आदि में कैसे करबद्ध रहते हैं, जबकि इनका प्रतिग्रह उन राजाओं से भी सैकड़ों गुना अधिक दोषद होता है क्योंकि वो राजा लोग तो धर्ममार्ग पर चलते थे, आज के नेता लोग तो अधर्म और अनीति मार्ग पर ही चलते हैं। सर्वाधिक दोष राजद्रव्य में ही कहा गया है :
ऋषयस्तु तदा प्राहुर्नगृह्णीमः प्रतिग्रहम् । राज्यद्रव्यं महादोषयुक्तं गृह्णीम एव न ॥
दशसूनासमश्चक्री दशचक्रिसमो ध्वजी । दशध्वजिसमा वेश्या दशवेश्यासमो नृपः ॥
राज्ञो दानं महाघोरं पाचयितुं न शक्यते । अन्येभ्यो दीयतां राजन् कुशलं तेऽस्तु सर्वथा ॥
लक्ष्मीनारायणसंहिता/१ (कृतयुगसन्तानः)/५४०/७७ – ७९
यहां एक तथ्य तो स्पष्ट होता है कि योग्य ब्राह्मण का प्रतिग्रह दोष उसके ज्ञान और तप से नष्ट हो जाता है किन्तु यदि ज्ञान और तप का अभाव हो तो क्या होगा अर्थात दोषयुक्त ही रहेंगे, दोष का निवारण नहीं होगा। प्रतिग्रह न लें तो यजमान का कर्मलोप और लें तो स्वयं नरकगामी बने। दोनों की ही रक्षा हो इसका कोई मध्यम मार्ग मिथिला में आज नहीं ढूंढा जा रहा है अपितु यह शोध का विषय है कि कब ऐसा निर्णय लिया गया था, मुझे यह ज्ञात नहीं है।

किन्तु ऐसा निर्णय लेने वाले कितने बड़े विद्वान रहे होंगे ये कल्पना से परे है, और इतने बड़े विद्वान मिथिला में ही होते थे इसी कारण मिथिला का व्यवहार भी प्रमाणतुल्य ही घोषित किया गया है। ये मिथिला का ही निर्णय और व्यवहार है ऐसा इसलिये कहा जा रहा है कि मिथिलादेशीय कर्मकांड की पुस्तकों में ही ऐसा मिलता है अन्यदेशीय पुस्तकों में “अमुक गोत्राय अमुक शर्मणे ब्राह्मणाय” ही देखने को मिलता है।
अर्थात मैथिलेत्तरों ने संभवतः अहंकारवश मिथिला के इस निर्णय को अंगीकार नहीं किया अथवा जिन्होंने स्वीकार किया होगा उनके पुस्तकों में ऐसा मिलता भी होगा। मेरे द्वारा सभी क्षेत्रों की सभी पुस्तकें देखी नहीं जा चुकी हैं जिससे मैं यह घोषणा कर दूँ कि अन्यत्र कहीं ऐसा नहीं है। इसमें यह भी स्पष्ट है कि मिथिला के ब्राह्मणों में भी पुरोहित वर्ग ने ही इस पक्ष को ग्रहण किया है।
यहां मेरा यह भी उद्देश्य है कि जो कर्मकाण्डी मेरे आलेखों को पढ़कर सीखने-समझने का प्रयास करते हैं वो सूक्ष्मता और गंभीरता से जानने-समझने के पश्चात् भी कभी अहंकारी न बने, यदि आप “संपूर्ण कर्मकांड विधि” से ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं तो यह हमारा दायित्व बनता है कि आपको इस प्रकार से ज्ञान दिया जाय कि वो आपके भीतर के उपस्थित अहंकार को भी नष्ट करे और वृद्धि न करे। यहां इस विषय में देखिये कि मिथिला के वो प्राचीन विद्वान जो वास्तव में विद्वान थे किन्तु अहंकाररहित होकर अयोग्यता को स्वीकार कर चुके थे।
मैं अपनी भी बात करूँ तो यही वास्तविकता है कि मैं योग्य नहीं सिद्ध होता हूँ और यह कई बार स्वीकार चुका हूँ, मात्र “येषु देशेषु ये द्विजाः” का आधार और “मंत्रहीनं क्रियाहीनं विधिहीनं ……. प्रसीद परमेश्वरि”, “करचरणकृतं वा …… श्री महादेवशम्भो”, “न मन्त्रं नो यन्त्रं….”, “त्वामाश्रिताह्याश्रयतां प्रयान्ति” का आश्रय रहता है, और यदि अहंकार हो जाये तो यह अवलंब भी शेष नहीं रहता, ये अवलंब तभी प्राप्त हो सकता है जब अहंकार न हो, ये तो विद्वानों को भी अहंकारशून्य होना अनिवार्य करता है फिर हमारे जैसों की तो गणना ही क्या और जो हमारे जैसों से सीखते-समझते हैं वो स्वयं ही आकलन कर सकते हैं।
यद्यपि ऐसा प्रयास ही करता हूँ, ऐसे ही भाव रखता हूँ यह उद्घोषित नहीं कर सकता क्योंकि यदि ऐसा हो तो फिर विपन्नता क्यों “त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां”, किन्तु संभव है कि मैं विपन्नता का अर्थ भी मात्र धन-संपत्ति परक ग्रहण कर रहा हूँ अन्यथा मेरे पास विपन्नता तो है नहीं क्योंकि शास्त्र स्वयं ही अपना रहस्य बारम्बार प्रकट करते रहते हैं और वही रहस्य मैं सरल शब्दों में आपके समक्ष प्रस्तुत करता रहता हूँ। यहां इस आलेख में भी तो शास्त्र स्वयं ही अपना रहस्य प्रकट कर रहे हैं, किसी व्यक्ति ने यह नहीं बताया है।
यहां मैं यह सिद्ध करने का प्रयास कर रहा हूँ कि हमारे पूर्ववर्ती आचार्यों ने स्वयं की अयोग्यता को स्वीकार किया था और परवर्तियों की अयोग्यता का सटीक अनुमान भी कर लिया था और इस कारण “यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय” का विकल्प प्रदान किया जिससे कर्मलोप भी न हो और हमसब नरकगामी भी न बने। उपरोक्त प्रतिग्रह दोष तो उनके लिये है जो दोष निवारण में भी सक्षम होते हैं और ऐसे ब्राह्मणों का पूर्णतः अभाव (अपवादातिरिक्त) है। क्योंकि प्रतिग्रह के अधिकारी ब्राह्मण को ही दानादि देने का शास्त्रोक्त विधान है और अयोग्य को दान देने का निषेध भी है :
नापात्रे विदुषा किञ्चिदात्मनः श्रेय इच्छता । अपात्रे जातु गौर्दत्ता दातारं नरकं नयेत् ॥
कुलैकविंशतियुतं ग्रहीतारं च पातयेत् । देहान्तरं परिप्राप्य स्वहस्तेन कृतं च यत् ॥
गरुडपुराणम्/प्रेतकाण्डः (धर्मकाण्डः)/१४/६ – ७
पात्रे दानं प्रदातव्यं कृत्वा यज्ञवरं द्विजाः । नापात्रे दीयते किंचिद्दत्तं न तु सुखावहम् ॥
स्कन्दपुराण/खण्डः ३ (ब्रह्मखण्डः)/धर्मारण्य खण्डः/३३/२
गोभूतिलहिरण्यादि पात्रे दातव्यमर्चितम् । नापात्रे विदुषा किंचिदात्मनः श्रेय इच्छता ॥
विद्यातपोभ्यां हीनेन नतु ग्राह्यः प्रतिग्रहः । गृह्णन्प्रदातारमधो नयत्यात्मानमेव च ॥
याज्ञवल्क्य स्मृति/दान प्रकरण/२०१ – २०२
इसी प्रकार अपात्र को दान देने का सर्वत्र निषेध प्राप्त होता है और यदि हम अपात्र हैं तो प्रतिग्रह दाता-प्रतिग्रहीता दोनों के लिये ही अनिष्टकारी कहा गया है। इस अनिष्ट से बचने का मार्ग यदि न मिले तो दान भी कल्याणकारी न होगा, धर्म भी कल्याणकारी न होगा। इस कारण हमारे पूर्ववर्ती आचार्यों ने ऐसा मार्ग बनाया जिससे अपात्रता होते हुये भी न तो कर्मलोप हो और न ही अनिष्टकर हो।
अस्तु “यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय” का मूल कारण अपात्रता/अयोग्यता है।
जब ये अपात्रता/अयोग्यता सिद्ध हो जाता है तो उस वचन का भी कोई लाभ नहीं जहां ब्राह्मणों के बारम्बार उपयोगिता सिद्ध की गयी है, क्योंकि इसका लाभ तो तब प्राप्त होगा न जब योग्यता/पात्रता हो :
विप्रा मन्त्राः कुशा वह्निस्तुलसी च खगेश्वर । नैते निर्माल्यतां यान्ति क्रियमाणाः पुनः पुनः ॥
कुशाः पिण्डेषु निर्माल्याः ब्राह्मणाः प्रेतभोजने । मन्त्राः शूद्रेषु पतिताश्चितायाश्च हुताशनः ॥
गरुडपुराणम्/प्रेतकाण्डः (धर्मकाण्डः)/२९/२१ – २२
इस वचन का लाभ अपात्र ब्राह्मण नहीं प्राप्त कर सकता है, इसका लाभार्थी भी सुपात्र ही हो सकता है। और सुपात्र ब्राह्मण भी प्रेतभोजन करने से निर्माल्य हो जाता है यहां यह भी स्पष्ट हो रहा है अर्थात महापात्र की निर्माल्यता भी यह सिद्ध कर रहा है और पुरोहित वर्ग की आवश्यकता को भी। इससे यह भी सिद्ध हो रहा है कि यजमान स्वयं ही पुरोहित वर्ग को सपिण्डीकरण पूर्व भोजनादि न करायें क्योंकि इससे आपके पुरोहित ही निर्माल्य हो जाते हैं और आगे “येषु देशेषु ये द्विजाः” का मार्ग भी अवरुद्ध हो जाता है और वर्त्तमान काल में एक मात्र यही मार्ग शेष है। क्योंकि प्रतिग्रह दोष निवारण की जो योग्यता है वह इस प्रकार है :
सदा जापी सदा होमी परपाकविवर्जितः । रत्नपूर्णामपि महीं प्रतिगृह्णन्न लिप्यते ॥
गरुडपुराणम्/प्रेतकाण्डः (धर्मकाण्डः)/४२/२२
यह पूर्व ही स्पष्ट कर चुका हूँ कि अपात्रता/अयोग्यता स्वीकार करने पर तो विकल्प (मार्ग) की प्राप्ति संभव है किन्तु अपात्र होते हुये भी स्वीकार्यता के अभाव का कारण अहंकार होता है और वह अपात्र स्वयं तो नरकगामी होता ही है, डाता को भी नरक का भागी बनाता है।
कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः कुलाचारहीनः कदाचारलीनः।
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं॥
ये मात्र स्तुति करने समय पढ़ लेने वाली पंक्ति नहीं है, यही वास्तविकता है और स्वीकार करने पर ही विकल्प का द्वार खुलता है।
इसका तात्पर्य यह है कि यदि मैं अपनी अपात्रता/अयोग्यता स्वीकार कर रहा हूँ तो मेरे पास विकल्प का आश्रय है, ईश्वरकृपा का भाजन बन सकता हूँ, किन्तु यदि अहंकारवश इसे अस्वीकार कर दूँ अर्थात स्वयं को योग्य/सुपात्र समझूँ तो न ही विकल्प का मार्ग और न ही ईश्वर की कृपा प्राप्त होने की कोई संभावना शेष रहती है। और जो भी “संपूर्ण कर्मकांड विधि” से जानने-समझने का प्रयास करते हैं
उनको यह गांठ बांधने के लिये कह रहा हूँ कि अपनी अपात्रता/अयोग्यता को स्वीकार करें तभी आप वैकल्पिक पात्र भी बन सकते हैं। जब मैं यहां सार्वजानिक रूप से स्वयं की अपात्रता/अयोग्यता उद्घोषित कर रहा हूँ तो मेरे से जानने-समझने वाले कितने बड़े सुपात्र हो सकते हैं ये तो स्वयं ही आकलन कर सकते हैं।
अपात्रता तो सिद्ध हो चुका है किन्तु पुरोहित वर्ग के लिये, अभी महापात्र को लगता होगा कि वो तो पात्र हैं किन्तु मिथिला में महापात्र को भी अपात्र सिद्ध किया जा चुका है और इसका प्रमाण है “अपात्रक श्राद्ध” अर्थात “पात्ररहित श्राद्ध”, मिथिला की सभी श्राद्धपद्धतियां अब अपात्रक ही हैं और सभी श्राद्ध अपात्रक ही होते हैं अतः महापात्र होने का भ्रम न पालें। महापात्र कोई जाति है ही नहीं अपितु पात्रता/योग्यता की श्रेष्ठता/महानता का नाम है। पात्रता क्या है : “सदा जापी सदा होमी परपाकविवर्जितः । रत्नपूर्णामपि महीं प्रतिगृह्णन्न लिप्यते ॥”
अपात्रता/अयोग्यता और वैकल्पिक पात्र
“अक्षमता को स्वीकार करने पर ही विकल्प का मार्ग प्राप्त होता है”
महापात्र का तात्पर्य है प्रतिग्रह का सर्वश्रेष्ठ अधिकारी, जाति कहें अथवा वर्ण वो तो ब्राह्मण ही है। पुरोहित भी ब्राह्मण हैं और महापात्र भी ब्राह्मण ही हैं। पात्रता की श्रेष्ठता के आधार पर जिन्हें श्राद्ध में नियुक्त किया जाता था वो महापात्र सिद्ध होते थे, अब तो पैंट पहनकर, बिना तिलक आदि के, एक मन्त्र पढ़ाने के लिये कहा जाता है और वो भी नहीं पढ़ा पाते, फिर पात्रता का विचार क्या करें, महापात्र की तो बात ही भिन्न है अर्थात महापात्र नहीं हैं।
ये सांसारिक विभाजन के आधार पर पूर्वकालिक महापात्रों के वंशज होने से आज भी श्राद्ध में उपस्थित होते हैं किन्तु इतना ज्ञान नहीं होता कि एक श्राद्ध में भोजन करने के पश्चात् घर में भी पुनर्भोजन नहीं कर सकते, किन्तु दूसरे यजमान के यहां भी श्राद्ध का ही भोजन करते हैं। किसी भी विषय के कुछ अपवाद होते ही हैं अर्थात इस तथ्य के भी कुछ अपवाद होंगे वो स्वयं के विषय में न ग्रहण करें।
यदि आप महापात्र होते तो श्राद्ध में नियुक्त होते, अपात्रक श्राद्ध नहीं होता। पात्रता क्या तो पात्रता में तीन अर्हता कही गयी है : जन्म, विद्या और तप। अभी विद्या और तप दोनों का अभाव है, मात्र जन्मजात हैं अर्थात नामधारक हैं, वृत्तिमात्र का अधिकार रखते हैं पात्रता नहीं। अपात्रक श्राद्ध यही सिद्ध करता है कि वर्त्तमान युग में पात्रता का अभाव हो गया है, कलयुग में सपात्रक श्राद्ध का निषेध नहीं है अपितु पात्र के अभाव में अपात्रक का विधान है।
अब प्रश्न है कि अपात्रक में क्या विधान है : “ब्राह्मणाभावे विधीयमाने दर्भबटु“
निधाय वा दर्भबटुनासनेषु समाहितः । मैषासुप्रैषसंयुक्तं विधानं प्रतिपादयेत् ॥
देवल
ब्राह्मणानामसंपत्तौ कृत्वा दर्भमयान्द्विजान्। श्राद्धं कृत्वा विधानेन पश्चाद्विप्रे प्रदापयेत् ॥
नवभिः सप्तभिर्वापि कुशपत्रैर्विनिर्मितः । सावित्र्यावर्त्तितग्रन्थिः कुशब्राह्मण उच्यते ॥
ॐकारेण तु बध्न्नीयाद्द्विजः कुर्यात्कुशद्विजम् ॥ छन्दोगपरिशिष्टे ॥
मिथिला में अपात्रक श्राद्ध ही किया जाता है और ब्राह्मण के स्थान पर दर्भबटु (कुशब्राह्मण) का ही प्रयोग होता है। व्यावहारिक रूप कुश के रूप में त्रिकुशा का प्रयोग किया जाता है। तथापि श्राद्ध में दर्भबटु का भी प्रयोग नहीं करते हैं अपितु पुरोहित वर्ग मात्र ही ऐसा करते हैं।
मिथिला में अपात्रक श्राद्ध ही किया जाता है और ब्राह्मण के स्थान पर दर्भबटु (कुशब्राह्मण) का ही प्रयोग होता है। व्यावहारिक रूप कुश के रूप में त्रिकुशा का प्रयोग किया जाता है किन्तु वो पुरोहितवर्ग करते हैं श्राद्ध में महापात्र नहीं। श्राद्ध में कुछ अन्य प्रामाणिक विकल्प हैं उसको ग्रहण किया गया है किन्तु चर्चा को उस दिशा में नहीं ले जा रहे हैं अपितु चर्चा को दर्भबटु (कुशब्राह्मण) पर ला रहे हैं।
मिथिला के पुरोहित वर्ग तो “ब्राह्मण पूजन” में त्रिकुशा अर्थात दर्भबटु (कुशब्राह्मण) का प्रयोग करते हैं और दान एवं दक्षिणा भी उन्हीं को प्रदान करते हैं, स्वयं की अपात्रता स्वीकार करते हुये हस्तोदक ग्रहण नहीं करते।
अब जाकर आलेख के प्रश्न “यथानामगोत्रायब्राह्मणाय” के प्रयोग का उत्तर प्राप्त हो जाता है कि ऐसा क्यों करते हैं। यदि सुपात्र ब्राह्मण प्रत्यक्ष रूप दान-दक्षिणा आदि स्वीकार करें तो ही “अमुक गोत्राय अमुक शर्मणे ब्राह्मणाय” का प्रयोग हो सकता है। किन्तु जब दर्भबटु का प्रयोग करते हैं और अपनी अपात्रता को स्वीकार करते हुये (भले ही इस विषय को भी नहीं समझ पा रहे हों) हस्तोदक नहीं ग्रहण करते तो वहां “अमुक गोत्राय अमुक शर्मणे ब्राह्मणाय” का प्रयोग नहीं किया जा सकता और इसी कारण “यथानामगोत्रायब्राह्मणाय” का प्रयोग किया जाता है।

यह विधान शास्त्रोक्त ही है कि ब्राह्मणाभाव में कुशब्राह्मण (दर्भबटु) का आश्रय लेना चाहिये और दी गयी दान-दक्षिणा आदि उपस्थित ब्राह्मण को दे दी जाय। ब्राह्मणाभाव का तात्पर्य देह से अभाव मात्र नहीं है अपितु पात्रता का भी अभाव है। इस आलेख में जो अपात्रता संबंधी तथ्य कहे गए हैं वो मूढ़ अहंकारियों को ही कटु लग सकते हैं, विद्वानों को नहीं। विद्वद्जन इस वास्तविकता से अवगत हैं।
यह ‘मिथिला व्यवहार’ वास्तव में ब्राह्मणों के आत्म-सम्मान और यजमान के धर्म-फल की रक्षा का एक आध्यात्मिक सुरक्षा कवच (Spiritual Shield) है। “यथानामगोत्रायब्राह्मणाय” का प्रयोग इस सत्य की उद्घोषणा है कि हम भले ही आज के युग में ‘सुयोग्य पात्र’ नहीं रहे, किन्तु हम धर्म की मर्यादा को नष्ट होने से बचाने के लिए ‘वैकल्पिक किन्तु शास्त्र सम्मत मार्ग’ का आश्रय ले रहे हैं।
यद्यपि यह आलेख परवर्ती आचार्यों के लिये अन्वेषण, विश्लेषण, विमर्श का विषय होगा तदपि पाठकों से मेरा यह प्रश्न है कि मैं किस बात का अहंकार करूँ “अपनी अपात्रता/अयोग्यता का ? और ये प्रश्न सभी आचार्य भी स्वयं से करें। यहां मैं आपको प्रेरित कर रहा हूँ कि भले ही सार्वजनिक रूप से स्वयं की अपात्रता/अयोग्यता स्वीकारने में अहंकार बाधा बने, किन्तु जब मैं सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर सकता हूँ तो आपलोग अंतर्मन में तो स्वीकार करें ही करें, यही कल्याण का मार्ग है।
निष्कर्ष: शास्त्र-सम्मत दृष्टिकोण की अनिवार्यता
निष्कर्षतः, “यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय” का प्रयोग मिथिला के प्राचीन आचार्यों की उस विनम्रता और दूरदर्शिता का परिचायक है, जिसमें उन्होंने कलयुगी ब्राह्मणों की अपात्रता को स्वीकार किया। जब ब्राह्मण स्वयं को दान का ‘सुपात्र’ नहीं मानता, तब वह ‘दर्भबटु’ (कुश ब्राह्मण) को प्रत्यक्ष पात्र मानकर दान उत्सर्ग करवाता है और स्वयं केवल उसका प्रतिनिधि बनकर सामग्री ग्रहण करता है। यह पद्धति दानदाता (यजमान) को अपात्र को दान देने के दोष से बचाती है और प्रतिग्रहीता (पुरोहित) को नरकगामी होने से सुरक्षित रखती है। यह ‘मिथिला व्यवहार’ शास्त्र और लोक-कल्याण का एक अद्भुत समन्वय है।
॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
“संबंधित प्रश्न” (FAQ)
FAQs
प्रश्न: मिथिला में पुरोहित “यथानामगोत्राय” क्यों कहते हैं?
उत्तर: अपनी अपात्रता को स्वीकार करते हुए, प्रतिग्रह दोष से बचने के लिए दर्भबटु (कुश ब्राह्मण) को मुख्य पात्र मानकर ऐसा कहा जाता है।
प्रश्न: ‘दर्भबटु’ या ‘कुश ब्राह्मण’ का प्रयोग कब किया जाता है?
उत्तर: जब शास्त्रीय विधि से सुपात्र ब्राह्मण उपलब्ध न हो, तब कुश से निर्मित ब्राह्मण को आसन पर बैठाकर पूजा और दान किया जाता है।
प्रश्न: क्या अन्य क्षेत्रों में भी यह नियम लागू होना चाहिए?
उत्तर: शास्त्रानुसार पात्रता का नियम सार्वभौमिक है, किंतु मिथिला के आचार्यों ने इसे ‘व्यवहार’ में उतारकर सुरक्षित कर दिया है।
प्रश्न: “यथानामगोत्राय” कहने से यजमान का संकल्प पूरा होता है?
उत्तर: हाँ, क्योंकि संकल्प कुश ब्राह्मण के प्रति होता है जो कि निर्दोष और देव-स्वरूप माना गया है।
प्रश्न: क्या पुरोहित का हस्तोदक (हाथ में जल) लेना अनिवार्य है?
उत्तर: यदि पुरोहित स्वयं को सुपात्र मानता है तो ले सकता है, अन्यथा अयोग्यता की स्थिति में हस्तोदक नहीं लेना ही श्रेष्ठ है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: यह आलेख पूर्णतः शास्त्रीय शोध, मिथिला की प्राचीन परंपराओं और धर्मशास्त्रों के विश्लेषण पर आधारित है। यहाँ व्यक्त विचार कर्मकाण्ड की सूक्ष्मताओं को समझने हेतु शैक्षिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के उद्देश्य से प्रस्तुत किए गए हैं। किसी भी क्षेत्र विशेष की परंपरा (देशाचार) में परिवर्तन करने से पूर्व स्थानीय विद्वानों और आचार्यों से परामर्श अवश्य लें। लेखक का उद्देश्य किसी भी वर्ग या व्यक्ति विशेष की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि शास्त्रीय मर्यादा के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना है।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








