“शास्त्रज्ञ के त्रुटिपूर्ण निर्णय को भी दैव मान्यता देते हैं, किन्तु अज्ञानी का उचित निर्णय भी अमान्य है।”
धर्म निर्णय के विषय में एक आलेख पूर्व प्रकाशित है और यह आलेख उसका प्रामाणिक विस्तार है। वर्त्तमान काल में जो हम देखते हैं कि जहां जिसका मन करता है वही धर्म का निर्णय करने लगता है; जैसे : मीडिया में बैठे बकवास करने वाले बकवादी और पत्रकार, सोशल मीडिया पर अधिवक्ता आदि, कथित भगवाधारी धर्मगुरु (अज्ञात वर्णाश्रमी), नेता, शिक्षक आदि कोई भी। यहां यह तो स्पष्ट किया ही जायेगा कि धर्म विषयक निर्णय कौन कर सकते हैं साथ ही यह भी स्पष्ट किया जायेगा कि कौन-कौन नहीं कर सकते और यदि करते हैं तो उचित या अनुचित।
धर्म निर्णय और पर्षद – प्रमाण संकलन
हम कई बार धर्म के विषय में न्यायपालिका को भी निर्णय देते हुये देखते हैं किन्तु न्यायपालिका धर्म के विषय में किसी प्रकार का निर्णय देने का अधिकार नहीं रखती एवं यदि देती भी है तो वह अमान्य है। न्यायपालिका में बैठने वाले वेतनभोगी होते हैं अर्थात राजकर्मचारी से अधिक नहीं होते यदि जन्मना ब्राह्मण हों तो भी और उनके कुकर्मों के वीडियो भी समय-समय पर वायरल होते रहते हैं।
उनके पास शास्त्रज्ञान नहीं होता हां विदेशी विचारधाराओं का ज्ञान भले हो और भारतीय संस्कृति को भी एक विचारधारा तक कह देते हैं दक्षिणपंथी विचारधारा। अधिवक्ता आदि तो किसी भी प्रकार से धर्म के विषय में कोई निर्णय कर ही नहीं सकते क्योंकि वो लोग तो जानते हुये भी अपराधी को बचाने का प्रयास करते ही रहते हैं। जब किसी अपराधी का वाद लड़ते हैं तो उस अपराधी को बचाने का ही प्रयास करते हैं न।
इसके साथ ही इन लोगों के समोसे आदि वाली बातें लोकविदित है। एप्सटीन फाइल ने तो बहुत कुछ उद्भेदन भी किया है कि ये लोग कितने बड़े कुकर्मी होते हैं। इसी प्रकार मीडिया और मीडिया में बैठने वाले भी धर्म का त्याग करके ही वहां तक पहुंचते हैं चाहे वो ज्योतिषी हो अथवा उसके सामने धर्मगुरु लिखा हुआ हो। यदि इससे भिन्न कुछ लिखा है उसकी तो चर्चा ही नहीं की जा सकती।
अब रही बात संत-महंथ-महात्मा आदि की तो धर्म का निर्णय वो भी नहीं कर सकते। क्योंकि आगे प्रमाणों के आधार पर सिद्ध होगा कि धर्म का निर्णय ब्राह्मण (विद्वान) ही कर सकते हैं और पूर्व आलेख में भी सिद्ध हुआ है। यदि संत की बात करें तो वो श्रेष्ठ होते हैं, पूज्य होते हैं आदि सत्य है किन्तु धर्म का निर्णय नहीं कर सकते क्योंकि धर्म का निर्णय वही कर सकते हैं जो इनको भी संत की मान्यता प्रदान करने के अधिकारी हैं अर्थात विद्वान ब्राह्मण।
हां आपने सही पढ़ा संत को भी ब्राह्मण ही मान्यता प्रदान कर सकते हैं मीडिया वाले या राजनीति करने वाले नहीं, कोई संगठन या संस्था नहीं। गोस्वामी जी की एक चौपाई का अंश है जो यह सिद्ध करता है कि किसी का संत होना भी ब्राह्मण ही सिद्ध कर सकते हैं :
सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता ॥
इसमें एक सरल अर्थ है जो सामान्यतः कही-सुनी जाती है लेकिन यहां इसमें यह विशेष भाव भी स्पष्ट किया जा रहा है कि किसी को संत की मान्यता विप्र (विद्वान ब्राह्मण) ही प्रदान करते हैं। कोई व्यक्ति संत है अथवा नहीं इसकी सिद्धि एक विशेष उपाय से होती है वो है विप्र (विद्वान ब्राह्मण) द्वारा उसकी परीक्षा लेना जो प्रथम भाग में है :
“सापत ताड़त परुष कहंता” – चाहे शाप दे रहे हों या ताडना कर रहे हों अथवा कटुवचन कह रहे हों, संत वही होता है जो ऐसा करते हुये ब्राह्मण के भी चरणों को पकड़े, पूजा ही करे जो दूसरे भाग में स्पष्ट होता है –
“बिप्र पूज्य अस गावहिं संता” अर्थात इस प्रकार से उत्पीड़ित होते हुये भी जो ब्राह्मण को पूज्य ही कहता रहे, वंदना ही करता रहे वह संत होता है।
इस प्रकार यहां स्पष्ट होता है कि संत की परीक्षा भी ब्राह्मण ही ले सकते हैं और यदि वो फिर भी सरल, विनम्र रहे, चरणों में पड़ा रहे, वंदना ही करे तो उसे संत की मान्यता दे सकते हैं। यदि हम मीडिया में बैठने वाले संत/धर्मगुरु आदि को समझने के लिये उद्धृत करें तो वो क्या करते हैं – गाय के लिये चिल्लाते हैं किन्तु ब्राह्मण शब्द भी एक बार नहीं बोल पाते हैं यदि बोलते भी हैं तो निंदा करने के लिये; तिरष्कार करने के लिये। ऐसे व्यक्ति को संत/धर्मगुरु नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह स्वार्थलोलुप व्यक्ति शास्त्रहंता है।

धर्म के दो आधार गाय और ब्राह्मण में से गाय-गाय तो चिल्लाते हैं किन्तु ब्राह्मण के सम्मान में एक पंक्ति भी नहीं बोल पाते। जबकि वास्तविकता यह है कि गाय और ब्राह्मण दोनों ही धर्म के आधार हैं एवं किसी एक का तिरष्कार नहीं किया जा सकता :
नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च। जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥
गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिधुंसुता प्रिय कंता ॥
जब दो की बात आये तो गाय और ब्राह्मण की बात आती है और जब बात इनमें से किसी एक की हो तो ब्राह्मण आते हैं :
“भगवान ब्राह्मणप्रियः”
गाय पशु नहीं है, गाय में सभी देवताओं का वास है, गाय से ही धर्माचरण किया जा सकता है गाय के बिना नहीं और गो (वृष) धर्म का ही स्वरूप है। इसलिये यदि गाय-गाय चिल्लाते हैं तो उसे अनुचित नहीं कहा जा सकता किन्तु कितना सही और कितना गलत यह तो आकलन करना ही होगा न। गाय के साथ नष्टप्राय गो (वृष) की एक बार भी कोई चर्चा करता है ? नहीं न ! इसका सीधा तात्पर्य है कि वह कालनेमी है और जनमानस के साथ प्रपञ्च कर रहा है। गोशाला का धंधा करने वालों से यह भी पूछना आरम्भ करो कि वृष (धर्म) कहां है।
वृषरहित केवल गाय को पाल रहे हो तो इसमें तुम्हारा स्वार्थ है, तुम व्यवसायी हो, धर्म के नाम पर लोगों को ठग रहे हो। अब यहीं पर वो बड़े-बड़े प्रसिद्ध कथावाचक भी कालनेमी सिद्ध हो जाते हैं जो गोशाला का व्यवसाय कर रहे हैं और गोशाला के नाम पर धन की ठगी कर रहे हैं। उनके गोशाला में भी जाकर देखें मात्र दर्शन के लिये ही एकाध वृष (धर्म) मिलेगा अधिक नहीं। प्रश्न यह है कि क्या वत्स का जन्म ही नहीं होता तो उत्तर मिलेगा कि हां होता है। तो फिर मिलते क्यों नहीं ? यहीं पर सारा प्रपञ्च स्पष्ट हो जाता है कि वत्स का क्या किया जाता है।
गाय के बाद ब्राह्मण की बात जब की जाती है तो ब्राह्मण को मनुष्य नहीं, धरती पर घूमते देवता कहा गया है, भगवान विष्णु/शिव का प्रत्यक्ष स्वरूप जिनका दर्शन-पूजन आदि किया जा सकता है ऐसा कहा गया है। ब्राह्मण को मनुष्य समझना भी पाप कहा गया है :
देवाः परोक्षदेवाः, प्रत्यक्षदेवा ब्राह्माणाः ॥
ब्राह्मणैर्लोका धार्यन्ते ॥
ब्राह्मणानां प्रसादेन दिवि तिष्ठन्ति देवताः ।
ब्राह्मणाभिहितं वाक्यं न मिथ्या जायते क्वचित् ॥
यद्ब्राह्मणास्तुष्टतमा वदन्ति तद्देवताः प्रत्यभिनन्दयन्ति ।
तुष्टेषु तुष्टाः सततं भवन्ति प्रत्यक्षदेवेषु परोक्षदेवाः ॥
विष्णु स्मृति १९/२०-२३

ब्राह्मणे पूजिते नित्यं पूजितोस्मि न संशयः। आक्रुष्टे चाहमाक्रुष्टो भवामि भरतर्षभ॥
परा मयि गतिस्तेषां पूजयन्ति द्विजं हि ये। यदहं द्विजरूपेण वसामि वसुधातले॥
यस्तान्पूजयति प्राज्ञो मद्गतेनान्तरात्मना। तमहं स्वेन रूपेण पश्यामि नरपुङ्गव॥
महाभारत
केचित्सागरान्तायां पृथिव्यां द्विजसत्तमाः। मम रूपं हि तेष्वेवमर्चितेष्वर्चितोऽस्म्यहम्॥
बहवस्तु न जानन्ति नरा ज्ञानबहिष्कृताः। यदहं द्विजरूपेण वसामि वसुधातले॥
महाभारत
यश्चन्दनैश्चागरुधूपदीपैरभ्यर्चयेत्काष्ठमयीं ममार्चाम्।
तेनार्चितो नैव भवामि सम्यग्विप्रार्चनादस्मि समर्चितोऽहम्॥
विप्रप्रसादाद्धरणीधरोऽहं विप्रप्रसादादसुराञ्जयामि।
विप्रप्रसादाच्च सदक्षिणोऽहं विप्रप्रसादादजितोऽहमस्मि॥
महाभारत
ब्राह्मणाश्चैव देवाश्च तेजमेकं द्विधा कृतम्। प्रत्यक्षं ब्राह्मणा देवाः परोक्षं दिवि देवताः॥
न विना ब्राह्मणा देवैर्न देवा ब्राह्मणैर्विना। एकत्र मन्त्रास्तिष्ठन्ति तेज एकत्र तिष्ठति॥
ब्राह्मणा देवता लोके ब्राह्मणा दिवि देवताः। त्रैलोक्ये ब्राह्मणाः श्रेष्ठा ब्राह्मणा एव कारणम् ॥
पितुर्नियुक्ताः पितरो भवंति क्रियासु दैवीषु भवंति देवाः।
द्विजोत्तमा हस्तनिषक्ततोयास्तेनैव देहेन भवंति देवाः ॥
स्कन्दपुराण
ब्राह्मणान्पूजयेन्नित्यं प्रातरुत्थाय भूमिपः ॥
ब्राह्मणानां प्रसादेन दीव्यन्ति दिवि देवताः । अथ किं बहुनोक्तेन ब्राह्मणा मामकी तनुः ॥
स्कन्दपुराण
ब्राह्मण माहात्म्य विषयक विस्तृत प्रमाण संकलन पृथक आलेख में किया गया है यदि अवलोकन करना चाहें तो यहां क्लिक करें । इस चर्चा में उन सभी प्रमाणों को उद्धृत करना अपेक्षित नहीं है मात्र कुछ प्रमुख अंश ही पर्याप्त है।
यहां इस प्रसंग में जो मुख्य विषय है वो यह कि प्रसिद्धि प्राप्त धर्मगुरु/संत/महंत/कथावाचक जो भी भगवाधारी यत्र-तत्र दिखाई पड़ते हैं उनमें से कोई भी ब्राह्मण का सम्मान नहीं करता है। ऐसे कई मेरे गांव में भी आते-जाते हैं और ये मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ। ये जो भी सार्वजानिक रूप से दिखाते हैं वो बस एक प्रदर्शन मात्र होता है क्या कभी आपने इनमें से किसी को ब्राह्मणों के चरणों में गिरते देखा है ?
इनमें से जो गृहस्थ हैं उनके अतिरिक्त अन्य किसी का आश्रम (ब्रह्मचारी है अथवा सन्यासी) भी ज्ञात नहीं होता। वर्ण-जाति की तो बात ही न करें केवल जिसका ब्राह्मण वर्ण ज्ञात है वही ब्राह्मण हैं शेष अज्ञात रखने वाले निस्संदेह ब्राह्मणेत्तर ही हैं। जो अपने वर्णाश्रम तक को छिपाने का प्रयास कर रहा है वह भगवा धारण कर लेने से धर्मगुरु हो जायेगा ?
इनका ये धर्मगुरु शब्द भी कहां से आया ज्ञात नहीं संभव है कहीं शास्त्रों में पृथक से धर्मगुरु शब्द का प्रयोग हो। अरे गुरु शब्द मात्र पर्याप्त है उसमें धर्म जोड़ने की आवश्यकता ही नहीं है बस आगे “जी” लगाया जाता है। गुरु और ब्राह्मण शब्द एक दूसरे के पर्यायवाची भी होते हैं, ब्राह्मणेत्तर के लिये गुरु शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता है। सम्मानार्थ श्रेष्ठत्व सिद्धि हेतु प्रयोग करना भिन्न विषय होता है। ब्राह्मण जन्मना ही सभी वर्णों के लिये गुरु होते हैं और धर्म से ही गुरु होते हैं, शास्त्र से ही गुरु होते हैं।
इन धूर्तों में धर्म विषयक चर्चा प्रपंच करने वालों के लिये धर्मगुरु शब्द गढ़ लिया ऐसा प्रतीत होता है।
आइये चर्चा पर आते हैं कि जब ये लोग भी धर्म विषयक किसी निर्णय के अधिकारी नहीं हैं तो शेष अन्यान्य न्यायाधीश/अधिवक्ता/पत्रकार/नेता/विश्लेषक/वैज्ञानिक/प्रोफेसर आदि का स्तर ही क्या है अर्थात कोई स्तर ही नहीं है भले ही वो जन्मना ब्राह्मण भी क्यों न हो यदि कर्म से भ्रष्ट हो चुका है तो अधिकार नहीं रखता और कर्म से भ्रष्ट है अथवा नहीं ये तो इन सबके वेश-भूषा से ही ज्ञात हो जाता है।
पर्षद विधान के प्रमाण
“जैसे सूर्य के प्रकाश में अंधकार नहीं टिकता, वैसे ही परिषद के आदेश से पाप नष्ट हो जाता है।”
उपरोक्त परुषवचनों के विषय में यह स्पष्ट कर दूं कि ये मैंने इसलिए किया है कि संत आकृष्ट हों, कदाचित कोई संत हमारे गांव आ जायें। अरे मान्यता तो वही देगा न जिसे ज्ञात हो कि वो मान्यता प्रदान कर सकता है, जिसे इतना ज्ञात भी नहीं कि वो संत को मान्यता प्रदान करने का अधिकार रखता है वो क्या मान्यता देगा ?
आगे सर्वप्रथम राजा (प्रतिष्ठित) के विषय में सप्रमाण स्पष्ट कर दूँ कि वो भी धर्म विषयक निर्णय का अधिकारी नहीं होता है। उसके लिये भी धर्मविषयक निर्णय विद्वान ब्राह्मणों से ही कराने का विधान है। अनेकानेक कथाओं से भी यह स्पष्ट होता है और स्पष्ट प्रमाण भी है जिनमें से एक को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है :
यस्मिन्देशे निषीदन्ति विप्रा वेदविदस्त्रयः । राज्ञश्चाधिकृतो विद्वान्ब्रह्मणस्तां सभां विदुः ॥
मनु स्मृति/८/११
ऐसे और भी बहुशः प्रमाण हैं और राजा (प्रतिष्ठित) हेतु भी यही निर्देश है कि जब विषय धर्म से सम्बंधित हो तो वो स्वयं निर्णय न ले अपितु विद्वानों की सभा से ले। फिर आज की न्यायपालिका/विधायिका/कार्यपालिका आदि की बात ही क्या करें। यदि न्यायपालिका धर्म के विषय में कोई निर्णय स्वतंत्र रूप से करती है अथवा विधायिका नीति बनाती है तो वह धर्म और शास्त्र के आधार पर मान्य ही नहीं है। वह निर्णय विद्वान ब्राह्मणों की सभा/परिषद द्वारा किया होना अनिवार्य है, न्यायपलिका आदि मात्र उसके समर्थन का अधिकार रखती है।
यहां हम संविधान के अनुसार बात नहीं कर रहे हैं शास्त्र के अनुसार चर्चा कर रहे हैं क्योंकि यह शास्त्र का विषय है संविधान का नहीं। संविधान-संविधान चिल्लाने वाले कितने मूर्ख हैं इसको एक ही पंक्ति से समझा जा सकता है कि कुछ अधिवक्ता संविधान को समविधान घोषित करते हैं या व्याख्या करने में सम और विधान शब्द का प्रयोग करते हैं जबकि सं+विधान का अर्थ भिन्न होगा और सम+विधान का अर्थ भिन्न होगा। ये मूर्ख जो संविधान का भी अर्थ नहीं कर सकते वो निर्लज्जतापूर्वक धर्म का निर्णय किस मुंह से करने लगते हैं यह गंभीर प्रश्न है।
वर्त्तमान में भी न्यायपालिका धर्म से संबंधित कुछ प्रश्नों पर विचार कर रही है और उनके प्रति यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि न्यायपालिका को धर्म संबंधी किसी भी प्रकार के निर्णय का अधिकार ही नहीं है। न्यायपालिका में बहस करने वालों का बौद्धिक स्तर (धर्म और शास्त्र विषयक) स्पष्ट किया जा चुका है एवं अनाधिकार भी स्पष्ट है। अस्तु न्यायपालिका इस विषय में विद्वानों (शास्त्रज्ञ ब्राह्मणों) की सभा/परिषद गठित कर सकती है और उसके निर्णय का अनुमोदन कर सकती है स्वयं निर्णय नहीं दे सकती।
पर्षद या परिषद् अथवा सभा या धर्मसभा के विषय में बहुत सारे प्रमाण हैं। यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि निर्णय के विषय सामान्य और गंभीर दो प्रकार के होते हैं और गंभीर विषयों के निर्णय में सभा की आवश्यकता होती है जिससे त्रुटि न हो।
अनाम्नातेषु धर्मेषु कथं स्यादिति चेद्भवेत् । यं शिष्टा ब्राह्मणा ब्रूयुः स धर्मः स्यादशङ्कितः ॥
धर्मेणाधिगतो यैस्तु वेदः सपरिबृंहणः । ते शिष्टा ब्राह्मणा ज्ञेयाः श्रुतिप्रत्यक्षहेतवः ॥
दशावरा वा परिषद्यं धर्मं परिकल्पयेत् । त्र्यवरा वापि वृत्तस्था तं धर्मं न विचालयेत् ॥
त्रैविद्यो हेतुकस्तर्की नैरुक्तो धर्मपाठकः । त्रयश्चाश्रमिणः पूर्वे परिषत्स्याद्दशावरा ॥
ऋग्वेदविद्यजुर्विच्च सामवेदविदेव च । त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया धर्मसंशयनिर्णये ॥
एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद्द्विजोत्तमः । स विज्ञेयः परो धर्मो नाज्ञानामुदितोऽयुतैः ॥
अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् । सहस्रशः समेतानां परिषत्त्वं न विद्यते ॥
यं वदन्ति तमोभूता मूर्खा धर्मंमतद्विदः । तत्पापं शतधा भूत्वा तद्वक्तॄननुगच्छति ॥
मनुस्मृति/१२/१०८ – ११५
चत्वारोऽपि त्रयो वापि यद्ब्रूयुर्वेदपारगाः । स धर्म इति विज्ञेयो नेतरेषां सहस्रशः ॥
अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् । सहस्रशः समेतानां परिषत्त्वं न विद्यते ॥
यद्वदन्ति तमोमूढा मूर्खा धर्ममतन्द्रियम्। तत्पापं शतधा भूत्वा तद्वैक्तृनधिगच्छति ॥
वशिष्ठ स्मृति ३/६ – ८
चातुर्विधं विकल्पो च अङ्गविद्धर्मपाठकः । आश्रमस्थास्त्रयो मुख्याः परिषत्स्याद्दशावरा ॥
वशिष्ठ स्मृति ३/२३
ब्राह्मणा जङ्गमंतीर्थं तीर्थभूता हि साधवः। तेषां वाक्योदकेनैव शुध्यन्ति मलिना जनाः ॥
ब्राह्मणा यानि भाषन्ते मन्यन्ते तानि देवताः । सर्वदेवमयो विप्रो न तद्वचनं अन्यथा ॥
उपवासो व्रतं चैव स्नानं तीर्थं जपस्तपः । विप्रसंपादितं यस्य संपूर्णं तस्य तत्फलम् ॥
पराशरस्मृति/६/६२ – ६४
अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् । सहस्रशः समेतानां परिषत्त्वं न विद्यते ॥
यद्वदन्ति तमोमूढा मूर्खा धर्ममतद्विजः । तत्पापं शतधा भूत्वा तद्वक्तॄनधिगच्छति ॥
अज्ञात्वा धर्मशास्त्राणि प्रायश्चित्तं ददाति यः । प्रायश्चित्ती भवेत्पूतः किल्बिषं पर्षदि व्रजेत् ॥
चत्वारो वा त्रयो वापि यं ब्रूयुर्वेदपारगाः । स धर्मेति विज्ञेयो नेतरैस्तु सहस्रशः ॥
प्रमाणमार्गं मार्गन्तो ये धर्मं प्रवदन्ति वै । तेषामुद्विजते पापं सद्भूतगुणवादिनाम् ॥
यथाश्मनि स्थितं तोयं मारुतार्केण शुध्यति । एवं परिषदादेशान्नाशयेत्तस्य दुष्कृतं ॥
नैव गच्छति कर्तारं नैव गच्छति पर्षदम् । मारुतार्कादिसम्योगात्पापं नश्यति तोयवत् ॥
चत्वारो वा त्रयो वापि वेदवन्तोऽग्निहोत्रिणः । ब्राह्मणानां समर्था ये परिषत्साभिधीयते ॥
अनाहिताग्नयो येऽन्ये वेदवेदाङ्गपारगाः । पञ्च त्रयो वा धर्मज्ञाः परिषत्सा प्रकीर्तिता ॥
मुनीनां आत्मविद्यानां द्विजानां यज्ञयाजिनाम् । वेदव्रतेषु स्नातानां एकोऽपि परिषद्भवेत् ॥
पञ्च पूर्वं मया प्रोक्तास्तेषां चासंभवे त्रयः । स्ववृत्तिपरितुष्टो ये परिषत्सा प्रकीर्तिता ॥
अत ऊर्ध्वं तु ये विप्राः केवलं नामधारकाः । परिषत्त्वं न तेष्वस्ति सहस्रगुणितेष्वपि ॥
पाराशर स्मृति/८/४ – १५
चातुर्वेद्यो विकल्पी च अङ्गविद्धर्मपाठकः । त्रयश्च आश्रमो मुख्याः पर्षदेषा दशावरा ॥
पाराशर स्मृति/८/२७
शिष्टाः खलु विगतमत्सरा निरहंकाराः कुम्भीधान्या अलोलुपा दम्भदर्पलोभमोहक्रोधविवर्जिताः ॥
घर्मेणाधिगतो येषां वेदः सपरिबृंहणः । शिष्टास्तदनुमानज्ञाः श्रुतिप्रत्यक्षहेतवः, इति ॥
तदभावे दशावरा परिषत् ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥
चातुर्वैद्यं विकल्पी च अङ्गविद्धर्मपाठकः । आश्रमस्थास्त्रयो विप्राः पर्षदेषा दशावरा ॥
पञ्च वा स्युस्त्रयो वा स्युरेको वा स्यादनिन्दितः । प्रतिवक्ता तु धर्मस्य नेतरे तु सहस्रशः ॥
यथा दारुमयी हस्ती यथा चर्ममयो मृगः । ब्राह्मणश्चानधीयानस्त्रयस्ते नामधारकाः ॥
यद्वदन्ति तमोमूढा मूर्खा धर्ममजानतः । तत्पापं शतधा भूत्वा वक्तृन्समधिगच्छति ॥
बहुद्वारस्य धर्मस्य सूक्ष्मा दुरनुगा गतिः । तस्मान्न वाच्यो ह्येकेन बहुङ्गेनापि संशये ॥
धर्मशास्त्ररथारूढा वेदखड्गधरा द्विजाः । क्रीडार्थमपि यद्ब्रूयुः स धर्मः परमः स्मृतः ॥
यथाऽश्मनि स्थितं तोयं मारुतोऽर्कश्च नाशयेत् । तद्वत्कर्तरि यत्पापं जलवत्संप्रतीयते ॥
शरीरं बलमायुश्च वयः कालं च कर्म च । समीक्ष्य धर्मविद्बुद्ध्या प्रायश्चित्तानि निर्दिशेत् ॥
अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनां । सहस्रशः समेतानां परिषत्वं न विद्यते, इति ॥
बौधायन स्मृति/१/१/१७
यः समर्घमृणं गृह्य महार्घं संप्रयोजयेत् । स वै वार्धुषिको नाम सर्वधर्मेषु गर्हितः ॥
वृद्धिं च भ्रूणहत्यां च तुलया समैतोलयत् । अतिष्ठद्भ्रूणहा कोट्यां वार्धुषिः समकम्पत, इति ॥
गोरक्षकान्वाणिजकांस्तथा कारुकुशीलवान् । प्रेष्यान्वार्थुषिकांश्चैव विप्रास्शूद्रवदाचरेत् ॥
कामं तु परिलुप्तकृत्याय कदर्याय नास्तिकाय पापीयसे पूर्वौ दद्याताम् ॥
अयज्ञेनाविवाहेन वेदस्योत्सादनेन च । कुलान्यकुलतां यान्ति ब्राह्मणातिक्रमेण च ॥
ब्राह्मणातिक्रमो नास्ति मूर्खे मन्त्रविवर्जिते । ज्वलन्तमग्निमुत्सृज्य न हि भस्मनि हूयते ॥
गोभिरश्वैश्च यानैश्च कृष्या राजोपसेवया । कुलान्यकुलतां यान्ति यानि हीनानि मन्त्रतः ॥
मन्त्रतस्तु समृद्धानि कुलान्यल्पधनान्यपि । कुलसंख्यां च गच्छन्ति कर्षन्ति च महद्यशः ॥
वेदः कृषिविनाशाय कृषिर्वेदविनाशिनी । शक्तिमानुभयं कुर्यादशक्तस्तु कृषिं त्यजेत् ॥
न वै देवान्पीवरोऽसंयतात्मा रोरूयमाणः ककुदी समश्नुते ।
चलत्तुन्दी रभसः कामवादी कृशास इत्यणवस्तत्र यान्ति ॥
यद्यौवने चरति विभ्रमेण सद्वाऽसद्वा यादृशं वा यदा वा ।
उत्तरे चेद्वयसि साधुवृत्तस्तदेवास्य भवति नेत्तराणि ॥
शोचेत मनसा नित्यं दुष्कृतान्यनुचिन्तयन् । तपस्वी चाप्रमादी च ततः पापात्प्रमुच्यते ॥
स्पृशन्ति विन्दवः पादौ य आचामयतः परान् । न तैरुच्छिष्टभावः स्यात्तुल्यास्ते भूमिगैः सहेति ॥
बौधायन स्मृति/१/५/९३ – १०५
श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । सम्यक्संकल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम् ॥
इज्याचारदमाहिंसा दानस्वाध्यायकर्मणाम् । अयं तु परमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम् ॥
चत्वारो वेदधर्मज्ञाः पर्षत्त्रैविद्यमेव वा । सा ब्रूते यं स धर्मस्यादेकोऽप्यध्यात्मवित्तमः ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति/१/७ – ९
धर्मशास्त्रार्थशास्त्राभ्यामविरोधेन मार्गतः । समीक्षमाणो निपुणं व्यवहारगतिं नयेत् ॥
नारद स्मृति/मातृका/१/३१
यत्र विप्रतिपत्तिः स्याद्धर्मशास्त्रार्थशास्त्रयोः । अर्थशास्त्रोक्तमुत्सृज्य धर्मशास्त्रोक्तमाचारेत् ॥
धर्मशास्त्रविरोधे तु युक्तियुक्तोऽपि धर्मतः । व्यवहारो हि बलवान्धर्मस्तेनावहीयते ॥
सूक्ष्मो हि भगवान्धर्मः परोक्षो दुर्विचारणः । अतः प्रत्यक्षमार्गेण व्यवहारगतिं नयेत् ॥
यात्यचौरोऽपि चौरत्वं चौरश्चायात्यचौरताम् । अचौरश्चौरतां प्राप्तो माण्डव्यो व्यवहारतः ॥
नारद स्मृति/मातृका/१/३३ – ३६
यथा पक्वेषु धान्येषु निष्फलाः प्रावृषो गुणाः । निर्णिक्तव्यवहाराणां प्रमाणमफलं तथा ॥
नारद स्मृति/मातृका/१/५४
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम् ।
नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति न तत्सत्यं यच्छलेनानुविद्धम् ॥
नारद स्मृति/मातृका/२/१७
प्रमाणानि प्रमाणस्थैः परिपाल्यानि यत्नतः । सीदन्ति हि प्रमाणानि प्रमाणैरव्यवस्थितैः ॥
नारद स्मृति/व्यवहारपदानि/१/६४
चत्वारश्चतुर्णां पारगा वेदानां, प्रागुत्तमास्त्रय आश्रमिणः,
पृथग्धर्म्मविदस्त्रय, एतान्दशवरान् परिषदित्याचक्षते ।
असम्भवे त्वतेषाम्श्रोत्रियो देवविच्छिष्टा विप्रतिपत्तौ यदाह,
यतोऽयमप्रभवो भूतानां हिंसानुग्रहयोगेषु ।
धर्म्मिणां विशेषेण स्वर्गं लोकं धर्म्मविदाप्नोति ज्ञानाभिनिवेशाभ्यामिति धर्म्मो धर्म्मः ॥
गौतम स्मृति/२९
गंभीर निर्णय में एक प्रायश्चित्त आता है और मुख्य रूप से प्रायश्चित्त विषयक निर्णय में पर्षद या परिषद् की आवश्यकता होती है। उपरोक्त प्रमाणों से यह भी स्पष्ट होता है कि प्रायश्चित्त के निर्णय में एक व्यक्ति से त्रुटि की संभावना सदैव बनी रहेगी और उस स्थिति में वह पाप उस निर्णेता के ऊपर चला जायेगा न कि नष्ट होता। इस कारण अनेक विद्वान ब्राह्मणों की पर्षद निर्णय करे जिससे किसी प्रकार की त्रुटि न हो और निर्णेता पाप का भागी न बने।
प्रायश्चित्त के विषय में विशेष सावधानी आवश्यक
“लोकाचार का अर्थ शास्त्र-विरोध नहीं, बल्कि शास्त्र-सम्मत विकल्पों का चयन है।”
निर्णय में प्रायश्चित्त विषयक निर्णय करना सर्वाधिक जटिल होता है और इसमें पर्याप्त सावधानी अपेक्षित है। शास्त्रों में प्रायश्चित्त विषयक निर्णय हेतु और भी बहुत सारे तथ्य स्पष्ट किये गए हैं जो आगे के प्रमाणों से स्पष्ट होता है।
आलोक्य सर्व्वशास्त्राणि समेत्य ब्राह्मणैः सह । प्रायश्चित्तं द्विजो दद्यात् स्वेच्छया न कदाचन ॥
शंख स्मृति/१७/६२
शास्त्रों के अनुसार गंभीर चिंतन करके प्रायश्चित्त प्रदान करे न कि शास्त्रों का विचार किये बिना स्वेच्छा से ।
अज्ञात्वा धर्मशास्त्राणि प्रायश्चित्तं ददाति यः। प्रायश्चित्ती भवेत्पूतस्तत्पापं पर्षदं व्रजेत् ॥
बृहद्यम स्मृति/४/२९
शास्त्रज्ञान के बिना अर्थात यदि शास्त्रों के अनुसार उचित प्रायश्चित्त न दिया गया, स्वेच्छा से तर्क आदि से दिया गया, लोभ-राग आदि से दिया गया तो वह पाप निर्णेता व्यक्तियों के ऊपर जाता है अर्थात निर्णेता या निर्णेताओं के समूह उस पाप के भागी बनते हैं।
एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद्विजोत्तमः । स ज्ञेयः परमो धर्मो नाज्ञानामयुतायुतैः ॥
अत्रि संहिता/१४४
आगे शास्त्रोचित निर्णय लेने में सक्षम एक विद्वान ब्राह्मण का निर्णय भी परम धर्म होता है ऐसा कहा गया है। पर्षद हेतु ब्राह्मण की योग्यता के विषय में बहुत कुछ तथ्य उद्धृत प्रमाणों से स्पष्ट हो चुके हैं किन्तु यदि उपरोक्त आधार पर योग्य ब्राह्मण न मिलें तो क्या होगा यह भी प्रश्न है। उक्त स्थिति में उत्तरोत्तर श्रेष्ठता का क्रम समझना होगा। यदि सर्वश्रेष्ठ अनुपलब्ध हों तो उनसे अल्प श्रेष्ठ फिर उनसे अल्प आदि ग्रहण किये जा सकते हैं क्योंकि निर्णय ही न हो ऐसा नहीं हो सकता।
निर्णय होना ही चाहिये और यदि वर्त्तमान काल में कोई भी उतने गुणी-सदाचारी-विद्वान उपलब्ध होना असंभव है तो कौन करेंगे इसका भी निर्धारण शास्त्र ही करता है और श्रेष्ठ के अभाव में उनसे अवर ही ग्राह्य होंगे किन्तु निर्णय वही करेंगे, निर्णय बाधित नहीं हो सकता। मान लीजिये आज किसी को प्रायश्चित्त करना है अथवा धर्म विषयक कोई निर्णय चाहिये और उतने विद्वान-गुणी उपलब्ध ही नहीं हैं तो क्या निर्णय ही नहीं हो फिर प्रायश्चित्ति के पाप का नाश कैसे होगा ? धर्म का निर्णय कैसे प्राप्त होगा कि क्या करें ? बिना निर्णय के करने पर तो वह उचित होते हुये भी अमान्य ही होगा न।
अज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठा ग्रन्थिभ्यो धारिणो वराः । धारिभ्यो ज्ञानिनः श्रेष्ठा ज्ञानिभ्यो व्यवसायिनः ॥
तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं परम् । तपसा किल्बिषं हन्ति विद्ययामृतमश्नुते ॥
मनुस्मृति/१२/१०३ – १०४
इसमें एक तथ्य और स्पष्ट करना आवश्यक है कि वर्त्तमान में व्याकरण/ज्योतिष/साहित्य/पुराण (कथावाचक) आदि किसी एक विषय के अलपज्ञ को भी विद्वान ही कहा जाता है किन्तु इनमें से कोई भी धर्म निर्णय के अधिकारी नहीं होते। धर्मनिर्णेता यदि वेदज्ञ न हों तो शास्त्रज्ञ अवश्य ही हों शास्त्रज्ञ का तात्पर्य स्मृति के ज्ञाता। स्मृति के साथ पुराणों को भी जोड़ा जा सकता है किन्तु पुराणों के ज्ञाता भी अधिकारी नहीं होंगे यदि वो स्मृति मात्र के भी ज्ञाता नहीं हैं। न्यूनतम स्मृति का ज्ञान तो अनिवार्य ही है।
श्रुतिः स्मृतिश्च विप्राणां नयने द्वे प्रकीर्तिते । काणः स्यादेकहीनोऽपि द्वाभ्यामन्धः प्रकीर्तितः॥
अत्रि संहिता/३५१
श्रुतिस्मृति तु विप्राणां चक्षुषी द्वे विनिर्मिते। काणस्तत्रैकया हीनो द्वाभ्यामन्धः प्रकीर्तितः॥
बृहस्पति, पाराशर
श्रुतिस्मृती उभे नेत्रे ब्राह्मणस्य प्रकीर्त्तिते। एकया रहित: काणो द्वाभ्यामंध उदाहृत:॥
हारीत
श्रुतिस्मृती हि विप्राणां लोचने कर्मदर्शने ॥ ~ गरुडपुराण
यदि श्रुति (वेद) और स्मृति दोनों के ही ज्ञाता हों तो अतिउत्तम, यदि वेद के भी ज्ञाता है तो भी उत्तम और यदि केवल स्मृति के भी ज्ञाता हैं तो भी ग्राह्य। वर्त्तमान जीवन शैली में वेद-व्यवहार लुप्त है और वेदानुकूल निर्णय यदि विद्वान दें भी तो लोगों को चाहिये ही नहीं, धर्म-धर्म चिल्लाना एक भिन्न विषय है वास्तव में जनसामान्य अपना वेदाधिकार ही नष्ट कर चुकी है। जनसामान्य हेतु स्मृति मार्ग का ही आधार शेष है और उसमें भी वह जिसके लिये वेदाधिकार अनिवार्य न हो।
इस कारण जनसामान्य हेतु धर्म निर्णय के लिये स्मृतिज्ञाता विद्वानों की आवश्यकता है। स्मृतियों के साथ भी अधिक स्पष्टता हेतु पुराणों का ज्ञान भी होना भी आवश्यक है। पुराण का तात्पर्य स्मृति रहित पुराण नहीं है अपितु सहयोगी रूप में है एवं स्मृति का तात्पर्य वेद का त्याग नहीं है अपितु ज्ञान और अधिकार का अभाव है।
स्मृति और पुराण के ज्ञाताओं में भी तीन वर्ग होगा – प्रथम ब्राह्मण (सेवा/व्यवसाय/राजनीति आदि न करने वाला) वर्ग, द्वितीय नौकरी (शिक्षक/प्रोफेसर आदि) करने वाला या अधिवक्ता/व्यवसायी आदि ब्राह्मण का वर्ग और तृतीय ब्राह्मणेत्तर वर्ग। इनमें से केवल और केवल प्रथम वर्ग ही धर्मनिर्णय के अधिकारी हो सकते हैं द्वितीय और तृतीय वर्ग नहीं।
तृतीय वर्ग की तो कोई चर्चा ही नहीं हो सकती वो तो वर्त्तमान काल में देखे जा रहे हैं इसलिये अवांछित सिद्ध करने के लिये उद्धृत किये गये, द्वितीय वर्ग भी धर्म के विषय में किसी प्रकार के निर्णय देने का अधिकार नहीं रखते, जन्मना ब्राह्मण होते हुये जातिमात्र से ब्राह्मण हैं किन्तु ब्राह्मणोचित अधिकार का कर्मणा परित्याग कर चुके हैं।
आर्तानां मार्गमाणानां प्रायश्चित्तानि ये द्विजाः । जानन्तो न प्रयच्छन्ति ते यान्ति समतां तु तैः ॥
प्रथम वर्ग जिसका अधिकार सुरक्षित है उसके लिये यह अनिवार्य है कि जहां आवश्यकता हो और शास्त्रोचित निर्णय देने में सक्षम हो तो वहां निर्णय अवश्य दे। यदि निर्णय देने में सक्षम होते हुये भी आवश्यकता पर निर्णय न दे तो उसका अधिकार नष्ट हो जाता है और यदि पाप के लिये प्रायश्चित्त प्रदान न करे तो वह भी पापी के समान हो जाता है।
इसको इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि उपस्थित और उपलब्ध विद्वानों में जो सर्वाधिक ज्ञानी हों वो निर्णय देने के लिये बाध्य होते हैं यदि उनको प्रायश्चित्त ज्ञात है तो। अज्ञात होने पर बाध्य नहीं होते अपितु अध्ययन-मनन करके देने के लिये बाध्य होते हैं अर्थात अध्ययन-मनन का समय ले सकते हैं और उक्त परिस्थिति में किसी दूसरे को निर्णय ज्ञात है तो वही वहां पर निर्णय देने हेतु बाध्य होंगे। किन्तु सोचिये बाध्य कथन का क्या तात्पर्य है जबकि व्यवहार में तो निर्णय देने के लिये अल्पज्ञों में होड़ मची रहती है।
यदि मैं अपना और अपने क्षेत्र का ही उदाहरण दूं तो यहां चतुर्दिक जो दिखते हैं उनका शास्त्र में प्रवेश भी नहीं है। उनसे जब प्रमाण विषयक चर्चा की जाती है तो वो किस पद्धति (विवाह/उपनयन/श्राद्ध आदि की पुस्तक), अथवा निर्णयसिन्धु, कृत्यसार समुच्चय आदि पुस्तकों का नाम लेते हैं स्मृति की बात ही नहीं कर पाते कि किस स्मृति या किस पुराण में है ? इसी से सिद्ध होता है कि ये लोग शास्त्र में प्रवेश भी नहीं रखते क्योंकि यदि प्रवेश होता तो स्मृति-पुराण आदि की बात करते।
अब अपनी बात करूँ तो शास्त्रोंक्त अर्हता धारण नहीं करता हूँ और अधिकारी नहीं हूँ, मात्र शास्त्र प्रवेश रखता हूँ और ये आपको यहां उपलब्ध प्रमाणों से भी विदित हो जायेगा। इस ब्लॉग पर चर्चा प्रामाणिक ही की जाती है और प्रामाणिक चर्चा का तात्पर्य स्मृति के साथ-साथ किंचित सूत्र ग्रंथों के भी और पुराणों के तो होते ही हैं, प्रमाणों द्वारा सिद्ध किया जाता है।
यदि मैं केवल शास्त्र प्रवेश रखता हूँ और चतुर्दिक जो उपलब्ध हैं वो निर्णय देने के होड़ मचाये रहते हैं, प्रतिस्पर्द्धारत रहते हैं वो मेरी उपस्थिति में अनधिकारी हैं और उनकी तुलना में मैं अधिकारी होने से बाध्य भी हूँ भले ही शास्त्रज्ञ न हूँ शास्त्र में प्रवेश मात्र ही रखता हूँ। किन्तु पिछले दीपावली, मकर संक्रांति आदि के निर्णयों में भी मैंने इन अनाधिकारियों की प्रतिस्पर्द्धा देखी है, हर कोई किसी एक प्रमाण को लेकर उसके मूल का ज्ञान रखे बिना निर्णय सिंधु में लिखा है, कृत्यसार समुच्चय में लिखा है, वर्षकृत्य में लिखा है ऐसा कहकर निर्णय देते फिर रहे थे।
विचार करें क्या ऐसे लोगों का शास्त्र प्रवेश भी सिद्ध होता है जब एक वचन से निर्णय देते हैं और उसका भी मूल ज्ञात नहीं होता जबकि जिन पुस्तकों का नाम बताते हैं उन पुस्तकों में भी मूल उद्धृत रहता है। चतुर्दिक ऐसों को ही देखता हूँ और जब कभी प्रामाणिक तथ्य उपस्थित होता है तो ये लोग व्यवहार, लोकाचार, देशाचार, बाप-दादा आदि चिल्लाकर परोक्षतः अमान्य कहते हैं और कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो प्रत्यक्षतः कहते हैं कि मैं ये सब नहीं मानता। ऐसे लोगों को शास्त्रदस्यु कहकर निंदा की गयी है।
ऐसे मूर्खों को यह भी ज्ञात नहीं है कि व्यवहार/देशाचार आदि का तात्पर्य है क्या ? व्यवहार देशाचार आदि का तात्पर्य है जब किसी विषय में शास्त्र दो अथवा अधिक मत हो तो उसमें से जिस एक मत को प्राचीन काल में ग्रहण किया गया था वो अज्ञात होने पर हमारे लिये व्यवहार है अथवा वो विशेष विधि जो शास्त्र में न तो विहित है न निषिद्ध है किन्तु किया जा रहा है या इसी प्रकार के अन्य; न कि स्वेच्छाचार को व्यवहार सिद्ध करना चाहिये।
स्वेच्छाचार का तात्पर्य जैसे वर्तमान में स्त्री-अनुपनीत बालक आदि से भी हवन कराया जाता है अथवा पैंट-सर्ट पहने व्यक्ति से भी कराया जा रहा है यह है और इसको व्यवहार/लोकाचार/देशाचार आदि कुछ नहीं कहा जा सकता है किन्तु अब जिन बच्चों का जन्म हो रहा है वो बाल्यावस्था से यही देखेंगे और अपने समय में इसके लिये भी लोकाचार/देशाचार/व्यवहार आदि चिल्लायेंगे। जैसे व्रतादि के निर्णय में भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न पक्ष ग्रहण किया गया है तो वो उनका ग्राह्य पक्ष है और यहां “महाजनो येन गतः स पन्थाः” की सिद्धि होती है।

आज घर-घर में शौचालय बना दिया गया, चूल्हा समाप्त कर दिया गया, कच्ची जगह नहीं रखते, शिखा-सूत्र त्याग प्रचलित हो गया है, आहार शुद्धि का परित्याग किया जा चुका है , चंदन के स्थान पर रोली का प्रयोग किया जा रहा है, नवग्रह समिधा के नाम पर किसी भी प्रकार की लकड़ी लेकर हुआ-हुआ किया जा रहा है, पूर्वाह्ण-सायाह्न में श्राद्ध और अपराह्न में उपनयन किया जा रहा है : ये सब जो शास्त्रविरुद्ध हैं इसको भी यदि व्यवहार/देशाचार आदि कहें तो ये मूर्खता है।
“महाजनो येन गतः स पन्थाः” का तात्पर्य यह नहीं है कि यदि बाप-दादा चोर-लुटेरे थे तो हम भी चोरी आदि ही करें, यदि हमें चोरी नहीं करना चाहिये यह ज्ञात है तो बाप-दादा चोर-लुटेरे रहे हों तो भी त्याग करना चाहिये, यह व्यवहार या “महाजनो येन गतः स पन्थाः” के नाम पर ग्राह्य नहीं है। ग्राह्य वो विषय है जो उचित है, शास्त्रसम्मत यदि न हो तो शास्त्रविरुद्ध भी न हो। लेकिन इन मूर्खों को इतनी समझ कहां है ये तो बस चिल्लाना जानते हैं।
अस्तु यह सिद्ध होता है कि किसी भी व्यवहार को लोकाचार/देशाचार आदि सिद्ध नहीं किया जा सकता और न ही बाप-दादा करते आये के नाम पर अथवा “महाजनो येन गतः स पन्थाः” कहकर शास्त्रविरुद्ध विषय को भी उचित कहा जा सकता है। आपत्काल में विकल्प ग्रहण करने की परम्परा रही है किन्तु विकल्प का भी विकल्प ढूंढे ऐसा नहीं हो सकता हां अनेक विकल्पों में से जो पक्ष ग्रहण किया गया है उसे व्यवहार कह सकते हैं।
लेकिन कुछ भी हो जब जो शास्त्रज्ञ होते हैं उनके पास समीक्षा का अधिकार होता है, उचित-अनुचित के निर्णय का अधिकार होता है और शास्त्रसंगत परिवर्तन अपेक्षित हो, मार्जन करना हो वो करने का अधिकार भी होता है। अस्तु जिसका शास्त्र प्रवेश न हो वो लोग शास्त्रज्ञों के सामने ऐसे अनाप-सनाप राग अलापकर अपनी मूर्खता सिद्ध न किया करें तो ही लाभ में रह सकते हैं अन्यथा जिस प्रकार से यहां इनकी सुध ली गयी है ऐसी दुर्गति ही निःसंदेह सुनिश्चित रहती है।
इन लोगों के पाण्डित्य का स्तर ऐसा होता है कि सभी साधन-सामग्री उपलब्ध कराकर, पुस्तक देखते हुये कोई कर्मकाण्ड (हवन, श्राद्ध आदि) कराने के लिये कहा जाय तो भी नहीं करा सकते केवल गाल बजाने की कला में पारंगत होते हैं और नाना प्रकार के मनगढंत-किस्सों को गढ़कर शास्त्र को ही अमान्य सिद्ध करते रहते हैं। ऐसे अल्पज्ञों का कोई भी निर्णय मान्य नहीं होता एक विशेष अवस्था को छोड़कर जब कोई विद्वान उपलब्ध न हों।
निष्कर्ष
आलेख का निष्कर्ष यह है कि धर्म-निर्णय केवल उसी विद्वान ब्राह्मण का अधिकार है जो जन्मना कुलीन होने के साथ-साथ शास्त्रों (विशेषकर स्मृतियों) का मर्मज्ञ हो। न्यायपालिका, राजनेता, आधुनिक कथावाचक या सरकारी सेवा में संलग्न ब्राह्मण इस निर्णय प्रक्रिया के अधिकारी नहीं हैं। गंभीर विषयों और प्रायश्चित्त हेतु ‘पर्षद’ (विद्वानों की सभा) का गठन अनिवार्य है, क्योंकि व्यक्तिगत निर्णय में त्रुटि होने पर पाप निर्णेता को लगता है। वर्तमान में ‘लोकाचार’ या ‘व्यवहार’ के नाम पर जो शास्त्र-विरुद्ध कृत्य (जैसे म्लेच्छ वेशभूषा में पूजा या विधि-लोप) हो रहे हैं, वे ‘सदाचार’ नहीं बल्कि ‘स्वेच्छाचार’ हैं और इनकी समीक्षा हो सकती है।
F&Q :
FAQ
प्रश्न : पर्षद (परिषद) क्या है?
उत्तर : ३, ४, ५ या १० विद्वान ब्राह्मणों की वह सभा जो धर्म-संशय या प्रायश्चित्त का निर्णय करती है।
प्रश्न : क्या न्यायाधीश धर्म का निर्णय दे सकते हैं?
उत्तर : नहीं, वे केवल विधिक (Legal) निर्णय दे सकते हैं, धार्मिक (Dharmic) नहीं।
प्रश्न : स्मृति का ज्ञान क्यों अनिवार्य है
उत्तर : क्योंकि कलियुग में वेद-मर्यादा के व्यावहारिक पालन हेतु स्मृतियां ही मुख्य मार्गदर्शिका हैं।
प्रश्न : ‘महाजनो येन गतः स पन्था’ का सही अर्थ क्या है?
उत्तर : श्रेष्ठ विद्वानों और ऋषियों द्वारा दिखाए गए शास्त्र-सम्मत मार्ग पर चलना। जहां अनेक मार्ग हों उनमें से जिस मार्ग को पूर्वकाल में स्वीकार किया गया हो वह मार्ग।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
सूचना: यह आलेख विशुद्ध रूप से सनातन धर्म की स्मृतियों (मनु, पाराशर, याज्ञवल्क्य, बौधायन आदि) और पुराणों के प्रमाणों पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार शास्त्रीय मर्यादाओं की रक्षा हेतु प्रस्तुत किए गए हैं। धर्म-निर्णय और प्रायश्चित्त जैसे संवेदनशील विषयों हेतु अपने स्थानीय विद्वान ब्राह्मणों से निर्णय लेना चाहिये। आलेख में प्रयुक्त मूर्ख आदि शब्दों का किसी व्यक्ति विशेष हेतु प्रयोग नहीं किया गया है अथवा सम्पूर्ण वर्ग के लिये भी नहीं। यदि ब्राह्मणेत्तरों और सरकारी संस्थानों को धर्म निर्णय में अनधिकारी कहा गया है तो वह शास्त्रीय दृष्टिकोण से कहा गया है न कि राजनीतिक या संवैधानिक दृष्टिकोण से।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








