नवरात्र में अधिकांश लोग स्वयं ही जितना ज्ञान हो उसके अनुसार पूजा आदि करते हैं क्योंकि यदि सभी चाहें भी तो सबके लिये ब्राह्मण उपलब्ध ही नहीं हो सकते। इस परिस्थिति में सामान्य जनों के लिये सामान्य पूजा विधि की चर्चा आवश्यक हो जाती है और यह व्यावहारिक आवश्यकता है। हम बिना मंत्र वाली चर्चा पीछे कर चुके हैं और अब समंत्र विधि को समझने का प्रयास करेंगे। समंत्र विधि का तात्पर्य भी इतना ही है कि न्यूनतम क्या-क्या करें, कैसे करें ?
सामान्य जन के लिये समंत्रक दुर्गा पूजा की विधि – durga pujan vidhi 02
यहां आगे बढ़ने से पूर्व यह आवश्यक है कि पूर्व आलेख को भी पढ़ और समझ लें क्योंकि उन विषयों की ही पुनरावृत्ति नहीं की जायेगी जो पूर्व आलेख में की जा चुकी है। बिना मंत्र वाली विधि में मात्र दुर्गा पूजन था यहां चूँकि मंत्र सहित विधि बताई जा रही है अतः पंचदेवता और विष्णु पूजन को भी समाहित किया जायेगा जो कि नित्यकर्म है।
स्वयं ही कर रहे हैं तो इसका तात्पर्य यहां भी यही है कि कलशस्थापन-पूजन विधि से रहित क्योंकि मंत्र पूर्वक सामान्य पूजा विधि का तात्पर्य भी पौराणिक और नाम मंत्र प्रयोग मात्र है। तथापि यदि कलश स्थापना भी करना चाहें तो कलशस्थापना विधि के अनुसार कर सकते हैं जो आपको अन्य आलेखों में प्राप्त हो जाते हैं। इसी प्रकार यदि अखण्डदीप जलाना हो तो उसके लिये भी अन्य आलेखों का अवलोकन कर सकते हैं। यहां पंचदेवता व विष्णु पूजन (स्त्रियों के लिये गौरी पूजन) के साथ दुर्गा पूजा विधि बताई जा रही है।
- स्वयं ही पूजा करने का तात्पर्य है प्रतिमा (यदि पूर्व से हो)/चित्र में पूजा करना, उपवास करना, मंत्रादि जप करना, यदि सप्तशती पाठ कर सकते हों तो पाठ करना आदि।
- स्वयं से पूजा करने पर मंडल (वेदी) आदि की कोई बात नहीं की जा सकती किन्तु अष्टदल की चर्चा होगी और अन्य रंगोली आदि भी बनाये जा सकते हैं।
- इसी प्रकार से यदि स्वयं ही कर्मकांड के ज्ञाता नहीं हों और सामान्य पूजन करते हैं तो उसमें हवन नहीं किया जा सकता। हवन करने के लिये ब्राह्मण की अनिवार्यता हो जाती है।
- यदि हम पूजन सामग्री की बात करें तो यह भी पूर्व आलेख में बताई जा चुकी है और वहां अवलोकन कर सकते हैं। यहां पुनरावृत्ति अनावश्यक है।
पूर्व दिन की तैयारी
अब हमें नवरात्र के पूर्व दिन की तैयारी और व्यवस्थापन को समझना भी आवश्यक है और आश्विन कृष्ण अमावास्या को ही नवरात्र व्रतोपासना के लिये तैयारी करनी होती है।
पूर्व दिन शारीरिक शुद्धि में पुरुष के लिये क्षौरकर्म, पुरुष-स्त्री सबके लिये गंगास्नान या पवित्र नदियों का स्नान, पूजा गृह की स्वछता, पूजा सामग्री की व्यवस्था, एकभुक्त आदि महत्वपूर्ण विषय हैं। इसके साथ ही ब्राह्मण से अनुमति लेना, विधि और नियमों के बारे में जानकारी लेना आदि भी आवश्यक है। द्विज पुरुष नवीन यज्ञोपवीत, कटिसूत्र भी धारण करें।
दुर्गा पूजा करने की विधि
स्नानोपरांत शुद्ध/पवित्र वस्त्र धारण करके, तिलक लगाकर, शिखा ग्रंथि करके यदि संध्या-तर्पण आदि नित्यकर्म का ज्ञान हो तो करें अन्यथा भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर न्यूनतम १० बार गायत्री जप कर लें, गायत्री जप पुरुष ही करें, सूर्य भगवान को अर्घ्य स्त्रियां भी दें। नित्य कुलदेवता आदि का पूजन जिस प्रकार करते हैं कर लें। नैवेद्य के लिये पक्वान्न, पायस आदि निर्माण करके तदनन्तर पूजा की तैयारी करें। नैवेद्य लगाने की सामान्य विधि कुलदेवता पूजन में जिस प्रकार पत्ते पर अर्पित करते हैं उस प्रकार करें। मिथिला में सीड़ा भरना भी कहा जाता है।
स्त्रियों के लिये व्रतादि में शृंगार का निषेध नहीं है तथापि एक तथ्य यह भी है कि मिथिला में शृंगार निषेध का व्यवहार देखने को मिलता है और इसे भी अमहत्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता है क्योंकि धर्म विषयक निर्णय में मिथिला के व्यवहार को भी निर्णायक कहा गया है। जहां शास्त्र वचन प्राप्त न हों अथवा विरोधाभाषी प्रतीत हों वहां मिथिला के व्यवहार से निर्णय ग्रहण करे। तथापि जिस क्षेत्र में हैं वहां शृंगार आदि के निषेध की परंपरा है तो उसी परम्परा का पालन करें और यदि व्यावहारिक निषेध नहीं है तो शृंगार करें।
यदि किसी संस्थाओं द्वारा भ्रमित होकर स्त्री गायत्री जप आदि कर रही हैं तो किसी ऐसे विद्वान ब्राह्मण से परामर्श ले जो ऐसी किसी भी संस्थाओं से किसी प्रकार संबंध न रखते हों। ऐसी संस्थाओं की कोई शास्त्रोक्त मान्यता नहीं है, और ऐसी संस्थाओं के व्यक्तियों के परामर्श का भी कोई औचित्य नहीं है। ऐसी संस्थाओं के विद्वान से विद्वान व्यक्ति की तुलना में भी मूर्ख-से-मूर्ख ब्राह्मण श्रेयस्कर है।
ऐसी संस्थाओं के सदस्य ब्राह्मण कहलाने के अधिकारी ही नहीं हैं, भले ही वो जन्मना ब्राह्मण भी क्यों न हों, अपनी संस्थाओं में गुरुकुल भी क्यों न चलाते हों त्याज्य ही हैं और इनकी तुलना में वो जन्मना ब्राह्मण जो मूर्ख ही क्यों न हो, गुरुकुल में भले ही अध्ययन न किया हो, शास्त्रज्ञानी न हो किन्तु वृत्ति मात्र से भी ब्राह्मण हो तो वही ग्राह्य है।
क्योंकि ऐसी सभी संस्थायें कर्मणा वर्ण के पक्षधर हैं और कर्मणा वर्ण निर्धारण करने पर वर्णसंकर दोष स्वतः उत्पन्न हो जाता है। ये सभी वर्णसंकरों की उत्पत्ति/वृद्धि में योगदान देने वाले हैं और निन्दित हैं, अग्राह्य हैं। हमारे शब्द कटु हो सकते हैं किन्तु शास्त्र-सम्मत हैं, गीता में भी वर्णसंकरों को लेकर पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं। गीता के प्रमाण से ही ये सभी वर्णसंकरता के पक्षधर स्वयं भी नारकीय हैं, अपने पितरों को भी नरकगामी बना रहे हैं, और इनके अनुगामी भी नरक के ही भागी बनेंगे। गीता में ऐसे वर्णसंकरों के पक्षधरों को कुलघ्न अर्थात कुलघाती तक कहा गया है।
इस विषय में सभी सनातन प्रेमियों से यह आग्रह भी है कि आलेख को अधिकाधिक लोगों के साथ साझा भी करें ताकि अधिकाधिक लोग लाभान्वित भी हो सकें।
- स्नानादि करके पूजा गृह को स्वच्छ करें।
- प्रथम दिन यदि संभव हो तो पंचगव्य निर्माण करें और स्नान, प्राशन, प्रोक्षण करें।
- चौकी या पट्टा बिछाकर उसपर वस्त्र (लाल) बिछाकर, रंगीन चावल आदि से यदि अष्टदल निर्माण कर सकें तो करें, अन्यथा ऐसे ही प्रतिमा/चित्र स्थापित करें।
- प्रतिमा हो तो स्नानादि के पश्चात् प्रतिदिन वस्त्र परिवर्तन होगा, चित्र में वस्त्र (चुनड़ी) लगा दें। प्लास्टिक आदि के माला का प्रयोग न करें।
- पंचदेवता कर विष्णु पूजा के लिये स्वास्तिक बना कर सुपाड़ी रखें अथवा पंचदेवता के लिये अक्षत पुंज और विष्णु के लिये तिल पुंज पर सुपाड़ी रखें। ये दो पात्रों (कटोरी) में भी किया जा सकता है, चौकी/पट्टे पर भी कर सकते हैं।
- पूजा सामग्री व्यवस्थित करें : जलपात्र में जल भरें, चंदन घिस लें, आग की व्यवस्था करके धूप जला लें, दीप जला लें, नैवेद्य लगा लें। नैवेद्य में ही पान-सुपारी आदि भी अर्पित करें।
- दीपक भगवती के बांयी ओर और धूप दांयी ओर लगायें।
- घंटी, माला, पुस्तक आदि व्यवस्थित कर लें।
- किसी पात्र में हाथ धोने के लिये भी जल रख लें, जब-जब आवश्यक हो जल से हाथ धो लिया करें। हाथ पोंछने के लिये पृथक वस्त्र भी रख लें।
- दीप, पुस्तक, माला आदि सबके लिये आसन की व्यवस्था भी करें। पुस्तक को वस्त्र में लपेटकर रखें, बिना वस्त्र के न रखें, माला को भी गोमुखी में रखें खुला न रखें।
- किसी थाली आदि में पूजा की अन्य सामग्रियां व्यवस्थित कर लें; यथा अक्षत, तिल, सिन्दूर आदि। पुष्पडाली में पुष्प, माला, बिल्वपत्र आदि ले लें।
अब आगे आसन पर बैठकर पूजा आरम्भ करें और सर्वप्रथम पवित्रीकरण हेतु जल छिड़क लें (पवित्रीकरण) : ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थाङ्गतोऽपि वा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: बाह्याऽभंतर: शुचि:॥ ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु ॥ हाथ में गंगाजल/जल लेकर इस मंत्र से शरीर और सभी वस्तुओं पर छिड़के ।
आचमन : ॐ केशवाय नमः॥ ॐ माधवाय नमः॥ ॐ नारायणाय नमः॥ मुख व हस्त मार्जन (२ बार) ॐ हृषिकेशाय नमः॥ ॐ गोविन्दाय नमः। स्त्रियां जल का स्पर्श मात्र करे, समंत्र आचमन पुरुष मात्र ही करें।
आसनशुद्धि : ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुनाधृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥
तिलकधारण : ॐ भद्रमस्तु शिवंचास्तु महालक्ष्मीः प्रसीदतु । रक्षन्तु त्वां सदा देवा: सम्पदः सन्तु सर्वदा ॥
शिखाबंधन : ॐ चिद्रूपिणि महामाये दिव्यतेजः समन्विते । तिष्ठ देवि शिखाबद्धे तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे ॥
प्राणायाम : तीन बार प्राणायाम करे।
पंचदेवता और विष्णु पूजन
पंञ्चदेवता पूजन
- अक्षत : इदं अक्षतं ॐ सूर्यादि पञ्चदेवता: इहागच्छत इह तिष्ठत ।
- जल : एतानि पाद्यार्घाचमनीयस्नानीयानि ॐ सूर्यादि पञ्चदेवताभ्यो नम: ।
- फूल चंदन : इदं सचंदनपुष्पं ॐ सूर्यादि पञ्चदेवताभ्यो नम: ।
- अक्षत : इदं अक्षतं ॐ सूर्यादि पञ्चदेवताभ्यो नम: ।
- जल : एतानि गंधपुष्पधूपदीपताम्बूल यथाभागनैवेद्यं ॐ सूर्यादि पञ्चदेवताभ्यो नम: ।
- जल : आचमनीयं पुनराचमनीयम् ॐ सूर्यादि पञ्चदेवताभ्यो नम: ।
- फूल : पुष्पांजलिं ॐ सूर्यादि पञ्चदेवताभ्यो नम: ।
- विसर्जन : ॐ सूर्यादि पञ्चदेवता: पूजितास्थ प्रसीदत प्रसन्ना: भवत छमध्वं ।
विष्णु पूजन
- तिल-यव : एते यवतिलाः ॐ भूर्भुवः स्व: भगवन् श्रीविष्णो इहागच्छ इह तिष्ठ।
- जल : एतानि पाद्यार्घाचमनीयस्नानीयानि ॐ भूर्भुवः स्व: भगवते श्री विष्णवे नमः।
- फूल चंदन : इदं सचंदनपुष्पं ॐ भूर्भुवः स्व: भगवते श्री विष्णवे नमः।
- तुलसी : इदं तुलसीदलं ॐ भूर्भुवः स्व: भगवते श्री विष्णवे नमः।
- तिल-यव : एते यवतिलाः ॐ भूर्भुवः स्व: भगवते श्री विष्णवे नमः।
- जल : एतानि गंधपुष्पधूपदीपताम्बूल यथाभागनैवेद्यं ॐ भूर्भुवः स्व: भगवते श्री विष्णवे नमः।
- जल : आचमनीयं पुनराचमनीयम् ॐ भूर्भुवः स्व: भगवते श्री विष्णवे नमः।
- फूल : पुष्पांजलिं ॐ भूर्भुवः स्व: भगवते श्री विष्णवे नमः।
- विसर्जन : ॐ भूर्भुवः स्व: भगवन् विष्णो पूजितोसि प्रसीद प्रसन्नो भव छमस्व ।
गौरी पूजन (स्त्रियां विष्णु के स्थान पर गौरी पूजन करे)
- अक्षत : इदं अक्षतं गौरि इहागच्छ इह तिष्ठ।
- जल : एतानि पाद्यार्घाचमनीयस्नानीयानि गौर्यै नम: ।
- फूल चंदन : इदं सचंदनपुष्पं गौर्यै नम: ।
- सिंदूर : इदं सिंदूराभरणं गौर्यै नम: ।
- अक्षत : इदं अक्षतं गौर्यै नम: ।
- जल : एतानि गंधपुष्पधूपदीपताम्बूल यथाभागनैवेद्यं गौर्यै नम: ।
- जल : आचमनीयं पुनराचमनीयम् गौर्यै नम: ।
- फूल : पुष्पांजलिं गौर्यै नम: ।
- विसर्जन : गणेशजननि गौरि पूजितासि प्रसीद प्रसन्ना भव क्षमस्व ।
गन्धाक्षत-पुष्पादि से घंटा पूजन भी कर ले और बजा दे। स्वस्तिवाचन पृथक प्रकाशित है और यदि स्वस्तिवाचन करना आता हो तो स्वस्तिवाचन भी करे, अन्यथा गणेशादि देवताओं का स्मरण करे लें।
दिग्रक्षण
तदनन्तर पिली सरसों, तिल, दूर्वा आदि द्रव्यों को अभिमंत्रित अगले मंत्रों से अभिमंत्रित करे अर्थात बांयें हाथ में लेकर दांयें हाथ से ढंककर मंत्रों को पढ़े :
ॐ अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः प्रेत गुह्यकाः । ये चात्र निवसन्त्यन्ये देवता भुवि संस्थिताः ॥
ॐ अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूमि संस्थिताः । ये भूता विघ्नकर्तारस्ते गच्छन्तु शिवाज्ञया ॥
ते सर्वे विलयं यान्तु ये मां हिंसन्ति हिंसकाः । मृत्युरोगभयक्रोधाः पतन्तु रिपुमस्तके ॥
फिर क्रमशः दसों दिशाओं में छिड़के : पूर्व – ॐ प्राच्यै नमः ॥ अग्निकोण – ॐ आग्नेय्यै नमः ॥ दक्षिण – ॐ याम्यै नमः ॥ नैर्ऋत्य कोण – ॐ नैर्ऋत्यै नमः ॥ पश्चिम – ॐ प्रतीच्यै नमः ॥ वायव्य कोण – ॐ वायव्यै नमः ॥ उत्तर – ॐ उदीच्यै नमः ॥ ईशानकोण – ॐ ऐशान्यै नमः ॥ ऊपर – ॐ उर्ध्वायै नमः ॥ नीचे – ॐ भूम्यै नमः ॥
संकल्प :
तदुपरांत पान-सुपाड़ी-पुष्प-चन्दन-तिल-जल-द्रव्यादि लेकर संकल्प करे, यहां सामान्य संकल्प दिया जा रहा है इसमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन भी किया जा सकता है और इस विषय में ब्राह्मण से निर्देशन प्राप्त कर लेना उचित होगा।
संकल्प मंत्र (शूद्र प्रणव के स्थान पर नमः कहे) : ॐ अद्याश्विने मासि शुक्ले पक्षे प्रतिपत्तिथौ ………. वासरे ………. गोत्रस्य ……….. शर्मणो (वर्मणो आदि) मम सपरिवारस्य उपस्थितशरीराविरोधेन राज्यायुः सुतसौख्यसेव्येश्वरकर्तृक सम्मान सदा युद्धविजय सर्वविधसौमनस्य – नैरुज्य – दीर्घायुष्ट्वसार्वदिक् – श्रीदुर्गाप्रीति-काम नवरात्र व्रतं श्रीदुर्गादेव्याः पूजनमहं करिष्ये ॥ (जो पाठ-जपादि करना हो उसका भी उल्लेख करे)
स्त्रियों के लिये संकल्प मंत्र : नमः अद्याश्विने मासि शुक्ले पक्षे प्रतिपत्तिथौ ……… वासरे ………. गोत्रायाः ……….. देव्याः मम सकल पुत्र पौत्रादिचिरजीवित्व सकल सुख सौभाग्याऽवैधव्य गोधनधान्यादि समृद्धिकामनया श्रीदुर्गायाः प्रीत्यर्थं नवरात्र व्रतं श्रीदुर्गादेव्याः पूजनमहं करिष्ये ॥ (अन्य जो पाठ-जपादि करना हो उसका भी उल्लेख करे)
आगे माता दुर्गा का आवाहन करके पूजन करे। पृथक-पृथक मंत्रों से यदि पूजा न कर सके तो सभी मंत्रों के स्थान पर “ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी । दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥” मंत्र ही पढ़े, स्त्री-शूद्र प्रणव का प्रयोग न करे। सर्वत्र प्रणव के स्थान पर नमः ही पढ़े, जिसे शास्त्र का उल्लंघन ही करना हो उसके लिये यहां बताई गयी विधि का कोई औचित्य नहीं कहीं और अवलोकन करे।
आवाहन : ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी । दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥ ॐ भूर्भुवः स्वर्भगवति दुर्गे इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ आवाहन नये चित्र, पूगीफल आदि पर ही करे, पुराने चित्र, पुराने प्रतिमा में न करे। यदि नयी प्रतिमा हो तो ब्राह्मण द्वारा विशेष पूजा करके प्राण-प्रतिष्ठा करे और प्रतिमा का ग्रहण शास्त्रानुसार करे।
ध्यान
- आसन – ॐ आसनं भास्वरं तुङ्गं माङ्गल्यं सर्वमङ्गले । भजस्व जगतां मातः प्रसीद जगदीश्वरि॥ इदमासनं ॐ भूर्भुवःस्वः भगवत्यै श्रीदुर्गा देव्यै नमः ॥
- पाद्य – ॐ गङ्गादिसलिलाधारं तीर्थं मन्त्राभिमन्त्रितम् । दूरयात्राश्रमहरं पाद्यं तत्प्रतिगृह्यताम् ॥ इदं पाद्यं …….. नमः ॥
- अर्घ्य – ॐ तिलतण्डुल संयुक्तं कुशपुष्पसमन्वितम् । सगन्धं फलसंयुक्तमर्घ्यं देवि गृहाण मे ॥ एषोऽर्घ्यः …….. नमः॥
- आचमन – ॐ स्नानादिकं विधायापि यतः शुद्धिरवाप्यते । इदमाचनीयं हि दुर्गे देवि प्रगृह्यताम् ॥ इदमाचमनीयं …….. नमः॥
- स्नान – ॐ खमापः पृथिवी चैव ज्योतिषं वायुरेव च । लोकसंस्मृतिमात्रेण वारिणा स्नापयाम्यहम् ॥ इदं स्नानीयम् …….. नमः॥
- पुनराचमन – ॐ स्नानादिकं पुरः कृत्वा पुनः शुद्धिरवाप्यते । पुनराचमनीयं ते दुर्गे देवि प्रगृह्यताम् ॥ इदमाचमनीयं …….. नमः॥
- रक्तचन्दन – ॐ रक्तानुलेपनं देवि स्वयं देव्या प्रकाशितम् । तद्गृहाण महाभागे शुभं देहि नमोऽस्तु ते ॥ इदं रक्तचन्दनं …….. नमः॥
- सिन्दूर – ॐ सिन्दूरं सर्वसाध्वीनां भूषणाय विनिर्मितम् । गृहाण वरदे देवि भूषणानि प्रयच्छ मे ॥ इदं सिन्दूराभरणं …….. नमः॥
- कुङ्कुम – ॐ जपापुष्पप्रभं रम्यं नारीभालविभूषणम् । भास्वरं कुङ्कुमं रक्तं देवि दत्तं प्रगृह्य मे ॥ इदं कुंकुमाभरणम् …….. नमः॥
- अक्षत : ॐ अक्षतं धान्यजं देवि ब्रह्मणा निर्मितं पुरा । प्राणदं सर्वभूतानां गृहाण वरदे शुभे ॥ इदमक्षतम् …….. नमः॥
- पुष्प : ॐ चलत्परिमलामोदमत्तालिगणसङ्कुलम् । आनन्दनन्दनोद्भूतं दुर्गायै कुसुमं नमः ॥ एतानि पुष्पाणि …….. नमः॥
- बिल्वपत्र : ॐ अमृतोद्भवश्रीवृक्षं शङ्करस्य सदा प्रियम् । पवित्रं ते प्रयच्छामि बिल्वपत्रं सुरेश्वरि ॥ इदं बिल्वपत्रम् …….. नमः॥
- माला – ॐ नानापुष्पविचित्राढ्यां पुष्पमालां सुशोभनाम् । प्रयच्छामि सदा भद्रे गृहाण परमेश्वरि ॥ इदं माल्यं …….. नमः॥
- वस्त्र – ॐ तन्तुसंतान संयुक्तं कलाकौशल कल्पितं । सर्वाङ्गाभरणश्रेष्ठं वसनं परिधीयताम् ॥ इदं वस्त्रं बृहस्पति दैवतं …….. नमः॥
- उपवस्त्र – ॐ यामाश्रित्य महादेवो जगत्संहारकः सदा । तस्यै ते परमेशान्ये कल्पयाम्युत्तरीयकम् ॥ इदं द्वितीयवस्त्रम् …….. नमः॥ वस्त्रान्ते आचमनीयं ०॥
- धूप – ॐ गुग्गुलं घृतसंयुक्तं नानाभक्ष्यैश्च संयुतम् । दशाङ्गं गृह्यतां धूपं दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥ एष धूपः …….. नमः॥
- दीप – ॐ मार्तण्डमण्डलान्तःस्थ-चन्द्रबिम्बाग्नितेजसाम् । निधानं देवि दीपोऽयं निर्मितस्तव भक्तितः ॥ एष दीपः …….. नमः॥
- कर्पूरदीप – ॐ त्वं चन्द्रसूर्यज्योतींषि विद्युदग्न्योस्तथैव च । त्वमेव जगतां ज्योतिः दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥ एष ‘कर्पूरदीपः …….. नमः॥ (हस्तप्रक्षालन)
- नानाविधनैवेद्य – ॐ दिव्यान्तरससंयुक्तं नानाभक्ष्यैस्तु संयुतम् । चोष्यपेयसमायुक्तमन्नं देवि गृहाण मे ॥ एतानि नानाविधनैवेद्यानि …….. नमः॥
- पायस – ॐ गव्यसर्पिः पयोयुक्तं नानामधुरमिश्रितम् । निवेदितं मया भक्त्या परमान्नं प्रगृह्यताम् ॥ इदं पायसान्नं …….. नमः॥
- पुआ-पक्वान्नादि – ॐ अपूपानि च पक्कानि मण्डका वटकानि च । पायसापूपमन्न च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ एतान्यपूपादि नेवेद्यानि० ।
- फल – ॐ फलमूलानि सर्वाणि ग्राम्याऽरण्यानि यानि च । नानाविधसुगन्धीनि गृहाण त्वं यथासुखम् ॥ एतानि नानाविधानि फलानि० ।
- पानीय जल – ॐ पानीयं शीतलं स्वच्छं कर्पूरादिसुवासितम् ॥ भोजने तृप्तिकृद्यस्मात् कृपया परिगृह्यताम् ॥ इदं पानीयम्…….. नमः॥
- करोद्वर्तन – ॐ कर्पूरादीनि द्रव्याणि सुगन्धीनि महेश्वरि । गृहाण जगतां नाथे करोद्वर्तनहेतवे ॥ इद करोद्वर्तनजलम् …….. नमः॥
- आचमन – ॐ आमोदवस्तुसुरभिः कृतमेतदनुत्तमम् । गृहाणाचमनीयं त्वं मया भक्त्या निवेदितम् ॥ इदमाचमनीयम् …….. नमः॥
- ताम्बूल – ॐ तमालदलकर्पूरनागवल्लीसमन्विम् । संशोधितं सुगन्धं च ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ॥ इदं ताम्बूलम् …….. नमः॥
- घण्टावाद्य – ॐ यया भीषयसे दैत्यान् यया पूरयसेऽसुरम् । तां घण्टां सम्प्रयच्छामि महिषघ्नि प्रसीद मे ॥ इदं घण्टावाद्यम् …….. नमः॥
- दक्षिणाद्रव्य – ॐ काञ्चनं रजतोपेतं नानारत्नसमन्वितम् । दक्षिणार्थं च देवेशि गृहाण त्वं नमोऽस्तु ते ॥ इदं दक्षिणाद्रव्यम् …….. नमः॥
पुष्पाञ्जलि
ॐ दुर्गे दुर्गे महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिणि । त्वं काली कमला ब्राह्मी त्वं जया विजया शिवा ॥
त्वं लक्ष्मीर्विष्णुिलोकेषु कैलासे पार्वती तथा । सरस्वती ब्रह्मलोके चेन्द्राणी शक्रपूजिता ॥
वाराही नारसिंही च कौमारी वैष्णवी तथा । त्वमापः सर्वलोकेषु ज्योतिस्त्वं ज्योतिरूपिणी ।
योगमाया त्वमेवासि वायुरूपा नभःस्थिता । सर्वगन्धवहा पृथ्वी नानारूपा सनातनी ॥
विश्वरूपे विश्वेशे विश्वशक्तिसमन्विते । प्रसीद परमानन्दे दुर्गे देवि नमोस्तु ते ।
नानापुष्पसमाकीर्णं नानासौरभसंयुतम् । पुष्पाञ्जलिञ्च विश्वेशि गृहाण भक्तवत्सले ॥
एष पुष्पाञ्जलिः ॐ भूर्भुवःस्वः भगवत्यै श्रीदुर्गा देव्यै नमः ॥
- नीराजन : ॐ कर्पूरवर्तिसंयुक्तं वह्निना दीपितञ्च यत् । नीराजनं च देवेशि गृह्यतां जगदम्बिके ॥ इदं नीराजनम् …….. नमः॥
- क्षमापन : ॐ प्रार्थयामि महामाये यत्किञ्चित् स्खलितं मम । क्षम्यतां तज्जगन्मातः दुर्गे देवि नमोस्तु ते ॥
साष्टाङ्ग प्रणाम करे
ॐ महिषघ्नि महामाये चामुण्डे मुण्डमालिनि । द्रव्यमारोग्यमैश्वर्यं देहि देवि नमः सदा ॥
ॐ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते । भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥
अखंड दीप स्थापन : महापूजा में अखंड दीप का भी बहुत महत्व होता है। अखंड दीप स्थापित करने में भी वाजपेय यज्ञ का फल बताया गया है। देवी के दक्षिण भाग में आसन देकर दीप प्रज्वलित करे, गन्धपुष्पाक्षतादि से पूजन करे :
तत्पश्चात त्रिकुशा-तिल-जल लेकर दीपोत्सर्ग करे : ॐ अद्य वाजपेययज्ञजन फलसम फल प्राप्तिकामः नवाहोरात्र स्थायिदीपमिदं विष्णुदैवतं श्रीदुर्गादेव्यै अहं ददे॥
इसके पश्चात् पुस्तक, माला आदि की भी पूजा कर ले। पुस्तक की आवश्यकता तब होती है जब पाठ करना हो और माला की आवश्यकता तब होती है जब जप करना हो।
- माला पूजन मंत्र : ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः॥
- पुस्तक पूजन : ऐं सरस्वत्यै नमः ॥
तदनंतर जप, पाठादि करे। जप करने की विशेष विधिऔर मंत्र पुस्तकों में वर्णित है और यदि अन्य मंत्रों का भी ग्रहण करना हो तो पुस्तक से करे। सायं काल में दिन के चढ़ाये पुष्पादि को भी हटाकर पुनः धूप-दीप जलाकर भोग लगाये और आरती करके भजन आदि करे।
जहां मंत्र का ज्ञान न हो वहां भजन का ही प्रयोग करना चाहिये और चूँकि ये आलेख सामान्य जनों के लिये मंत्र रहित पूजा के संबंध में है इसलिये भजन का विशेष महत्व समझना चाहिये किन्तु इसमें भी इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिये कि भजन स्वयं ही करे भले ही लिखा हुआ क्यों न गाये किन्तु भजन के स्थान पर साउंड, मोबाईल आदि बजाकर न निपटाये।
नवरात्र व्रती को चाहिये कि व्रत में मोबाईल आदि का जितना कम प्रयोग कर सके उतना कम करे, मात्र आवश्यक बातें करने तक सीमित रखे। न तो सोशल मीडिया का प्रयोग करे और न ही अन्यान्य अंतर्जालीय प्रयोग। सर्वत्र मन को विचलित करने वाले विज्ञापन चलाये जाते हैं जो दोषपूर्ण है और इससे नहीं बच सकते इसलिये प्रयोग ही न करे।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।