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जलयात्रा विधान – शास्त्रोक्त विधि के अनुसार

जलयात्रा विधान – शास्त्रोक्त विधि के अनुसार

फिर जलाशय के निकट भूमिपूजन करे :- भूमि पूजन विधि मंत्र सहित

  • भूमि आवाहन – ॐ आगच्छ सर्वकल्याणि वसुधे लोकधारिणि । उद्धृतासि वराहेण सशैल वनकानने ॥ ॐ स्योना पृथिवी नो भवानृक्षरा निवेशनी । यच्छा नः शर्म सप्रथाः ॥
  • भूमि पूजन मंत्र – ॐ भूर्भुवः स्वः भूम्यै नमः॥ इस मंत्र से पंचोपचार पूजन करे।
  • क्षमा प्रार्थना : कूर्मपृष्ठोपरिस्थितां शुक्लवर्णां चतुर्भुजाम् । शंखपद्मधरां चक्र शूलयुक्तां धरां भजे ॥
  • फिर 9 कलशों (ताम्रादि धातु कलश) में जलाशय से जल ग्रहण करे ।
  • पूजित भूमि पर गोधूम अथवा रक्त/पीत चावल से बड़ा अष्टदल बनाये ।
  • एक कलश मध्य में, आठ कलश अन्य दलों पर स्थापित करे।
  • कलश स्थापन विधि से अथवा समयानुसार एकतंत्र से कलशस्थापन पूजन करे । :- कलश स्थापना विधि और मंत्र
  • तब तक अन्य सभी कलशों (बहुत सारे) में जलग्रहण भी करता रहे ।
  • कुमारी, सुवासिनी, आचार्य, ब्राह्मण आदि की समयावधि के अनुसार पूजन/उपहार/दक्षिणा आदि प्रदान करे।
  • नौ कन्या/सुवासिनी को उत्ताभिमुख खड़ा करके, यान्तु देवगणाः मंत्र से पूजित देवता का विसर्जन करे ।
  • शान्त्याध्याय का पाठ करते हुए नौ कलश कन्या/सुवासिनी के सिर पर दे ।
  • अन्य कलश भी कुमारी/सुवासिनी लेकर आगे आगे चले।

अर्द्धमार्ग में क्षेत्रपाल बलि दे :- 

अर्द्धमार्ग में रुककर जल से भूमि को प्रोक्षित करे। पान पर अक्षतपुञ्ज/सुपारी आदि देकर, क्षेत्रपाल की पंचोपचार पूजा करे :

  • आवाहन मंत्र : ॐ क्षेत्रपाल इहागच्छ इहतिष्ठ।
  • पूजन मंत्र : ॐ क्षेत्रपालाय नमः।
  • दधिमाष बलि : समीप में सदीप दधिमाष बलि रखकर अर्पित करे :- ॐ नमो भगवन् क्षेत्रपाल भासुरनेत्र ज्वालामुख अवतर अवतर पिङ्गलोर्ध्वकेश जिह्वाललन छिन्धि धीं धीं धीं धीं कुरु कुरु कुरु मुरु मुरु चल चल लं लः ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः मम यज्ञं रक्ष रक्ष बलिं गृहाण गृहाण स्वाहा। सदीप दधिमाषबलिं ॐ क्षेत्रपालाय नमः। जल अर्पित करके हाथ पैर धो ले ।
  • क्षेत्रपाल स्तुति मंत्र : ॐ क्षेत्रपालान्नमस्यामि सर्वारिष्टनिवारकान् । अस्य यागस्य सिद्धयर्थं पूजयाराधितान् मया ॥
जलयात्रा विधान

पुनः मंडप (मंडप पूजन विधि) पर आकर पश्चिम दिशा में सबकी आरति कर ले। 9 वर्द्धिनीकलश लेकर कुण्ड के पश्चिमभाग में वारुणमंडल पर रखे। शेष कलशों का जल यदि स्नपन करना हो तो जलपात्र में संचित करे अथवा जिस प्रकार उचित प्रतीत हो करे।

इस प्रकार से ऊपर जलयात्रा करने की शास्त्रोक्त विधि दी गयी है। जहां प्रचुर जल की अपेक्षा हो जैसे यज्ञ में, प्राण-प्रतिष्ठा में होती है वहीं जलयात्रा करे। जहां प्रचुर जल की आवश्यकता न होती हो वहां जलयात्रा की आवश्यकता नहीं होती, जैसे नट-मंडली द्वारा आयोजित होने वाली सप्ताह भागवत आदि में जहां कि कर्मकांड और शास्त्रों को पूर्णतः तिलांजलि दे दी जाती है वहां जलयात्रा की कोई आवश्यकता ही नहीं होती। कर्मकांड का संपादन शास्त्रोक्त विधि से ही करना चाहिये इवेंट की तरह नहीं।

नित्य कर्म पूजा पद्धति मंत्र

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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