“पात्रता के बिना कर्म का बीज, ऊसर भूमि में बोए गए बीज के समान निष्फल है।”
जब हम कर्मकाण्ड की बात करते हैं तो एक प्रथम विचारणीय विषय कर्माधिकार आता है और इसमें यह भी स्पष्ट हो जाता है कि यह कर्माधिकार कर्मकाण्ड से सम्बंधित है। यह स्पष्ट करना इसलिये आवश्यक है क्योंकि जब हम कर्माधिकार की बात करेंगे तो यहां कर्म से सभी कर्मों का भी बोध हो सकता है किन्तु इस अंतर को पाटने का सबसे सरल स्पष्टीकरण यही हो सकता है कि यहां कर्माधिकार का तात्पर्य कर्मकांड परक कर्मों से है न कि निषिद्ध, जीवनयापन आदि से संबंधित कर्मों से। इस आलेख में हम कर्माधिकार की विस्तृत चर्चा करेंगे जो कर्मकांड में प्रवृत्त होने से पूर्व जानना अत्यावश्यक है।
कर्माधिकार विमर्श: शास्त्रीय मर्यादा और वर्तमान विद्रूपता
सनातन धर्म की कर्मकाण्ड परंपरा मात्र क्रियाओं का समूह नहीं है, अपितु यह एक सूक्ष्म विज्ञान है। इस विज्ञान का आधार है— पात्रता। जिस प्रकार ऊसर भूमि में बीज बोने से फल की प्राप्ति नहीं होती, उसी प्रकार बिना अधिकार के किया गया कर्मकांड न तो कर्ता को फल देता है और न ही समाज का कल्याण करता है। वर्तमान समय में ‘कर्माधिकार’ को केवल जन्मगत सुविधा मान लिया गया है, जबकि शास्त्र इसे सतत अर्जित की जाने वाली योग्यता मानते हैं। यह आलेख कर्माधिकार के उन्हीं लुप्त प्राय सिद्धांतों को पुनर्जीवित करने का एक विनम्र प्रयास है।
इस विषय में विचार करने की आवश्यकता तब होती है जब हम वर्त्तमान कर्मकाण्ड व्यवहार देखते हैं। कर्मकांड के वर्त्तमान स्वरूप को देखकर मन व्यथित भी हो जाता है क्योंकि वर्त्तमान कर्मकांड में कर्मकांड के मूल सिद्धांतों का पूर्णतः त्याग किया जा चुका है जिसे आगे स्पष्ट किया जायेगा।
यहां आगे यह भी विचार उत्पन्न होता है कि जो हो रहा है जैसे हो रहा है “मुझे क्या” का भाव उत्पन्न होता है किन्तु इसके आगे नया विचार आता है ठीक है जो हो रहा है होने दो कुछ नहीं कर सकते किन्तु इतना तो कर सकते हैं कि उसे विमर्श का विषय बनाया जाय, फलचिंतारहित भाव से चर्चा की जाय। क्योंकि विधिविरुद्ध किया गया कर्म आसुरी हो जाता है और आसुरी कर्म से असुरवृद्धि (आसुरीभावापन्न) होता है।
सर्वप्रथम जो विषय आता है वह अधिकार (कर्माधिकारी) का है। यहां कुछ प्रश्न इस प्रकार हैं :
- क्या सबको कर्माधिकार प्राप्त करने की आवश्यकता होती है अथवा जन्मसिद्ध अधिकार होता है?
- क्या कर्माधिकार नष्ट भी होता है जिसके फलस्वरूप कर्माधिकार प्राप्त करने के लिये गो(दान)निष्क्रय का विधान है?
- इस प्रकार से यदि कर्माधिकार प्राप्त किया जाय तो क्या उसे वेदाधिकार भी प्राप्त होता है; अथवा कर्माधिकार और वेदाधिकार भिन्न हैं ?
कर्माधिकार का स्वरूप और विभाजन
अब सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि हम कर्माधिकार को समझें अर्थात कर्माधिकार की हो चर्चा है वह किस कर्म से संबंधित है। यहां हमें गीता के वो तथ्य भी समझने होंगे जिसमें यह कहा गया है कि “कर्म किये बिना कोई रह ही नहीं सकता” अर्थात प्रत्येक जीव (सभी योनियां) कर्म करने के लिये बाध्य है।
न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
चूंकि कर्म किये बिना तो कोई रह ही नही सकता अर्थात कर्म तो होगा ही । तो फल भी मिलेगा । जैसा गुण और संस्कार होगा वैसा कर्म और फल होगा । अधिकार तो वर्ण और आश्रम के आधार पर तय होते है न ! और जब तक कामना होगी , कर्म (संचित-प्रारब्ध-क्रियमाण) तो चलता रहेगा । “सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः” जब तक कामना का मूल रहेगा परिणाम होगा ।
“कर्म किये बिना कोई रह ही नहीं सकता” इसका वास्तविक तात्पर्य क्या है ? इसका वास्तविक तात्पर्य यह है कि भले ही हम विहित कर्म से विमुख हो जायें किन्तु कर्म से उपरत नहीं हो सकते। देह, इन्द्रियां (मन) सहित आहार के अधीन है और आहार के लिये कर्म अनिवार्य है।
अब यहां यह भी स्पष्ट हो जाता है कि हम उन कर्मों को करने के लिये बाध्य हैं जो हमारे देह, इन्द्रियों को आहार उपलब्ध कराती है। इन कर्मों का फल भी शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है और इन कर्मों में एक प्रकार से कहें तो जन्मसिद्ध अधिकार होता है, किन्तु ध्यातव्य यह है कि ये कर्मकाण्ड के अंतर्गत नहीं हैं भले ही इन कर्मों को भी आत्मकल्याणकारी बनाने के उद्देश्य से शास्त्रों द्वारा मर्यादित किया गया हो।

यहीं पर यह भी स्पष्ट होता है कि इन कर्मों (बाध्यकारी) के लिये शास्त्रों द्वारा जिन मर्यादाओं का विधान किया गया है संभवतः वही कर्मकांड में कर्माधिकार का मूल है अर्थात यह सोपान का ही आधार है। इस विषय को और स्पष्ट करने के लिये अब हमें एक विद्वान “सौरभ अनिल टिकेकर” जी से प्राप्त तथ्य यथावत प्रस्तुत कर रहा हूँ :
दो धारा मिलकर एक अधिकार सिद्ध होता है।
- किसी एक पुरुषार्थ चतुष्टय के साधक का किसी कार्य (संस्कार) आदि में जन्मना अधिकार प्राप्त होना, ये पक्ष दैहिक है स्थूल है। पूर्व पुण्यों के अटल फल के रूप में प्राप्त देह अपने साथ कुछ अधिकार लेकर ही आती है।
- दूसरा पक्ष है विद्या तपश्चर्या आदि से अर्जित अधिकार।
दोनों से मिलकर ही कर्माधिकार निष्पन्न होता है।
जो कर्मकाल में आम्नाय भेद से गो निष्क्रय आदि देकर (विद्यारूप अधिकार ) सम्पादित करते हैं उसका मूल भी वस्तुतः पूर्व जन्म के पुण्यों से अर्जित देह का पक्ष प्रबल होना है। अर्थात् कोई ब्राह्मण कुल में पुरुष हुआ, फिर पुत्रवान हुआ, स्वयं पढ़ा नहीं कुछ पर अपने बालक का यथासमय उपनयन करने बैठा, अब यदि आचार्यत्व सिद्धि नहीं कहकर उसे अनधिकारी कहें तो बड़ी भारी बाधा पड़ेगी, अतः आम्नाय भेद से गोनिष्क्रय देकर एक “मुआवज़ा” निश्चित होता है।
यहाँ दो श्रेणियाँ स्पष्ट हैं:
- प्राकृतिक/बाध्यकारी कर्म: आहार, निद्रा, भय, मैथुन और जीवन रक्षा हेतु किए जाने वाले कर्म। इनमें ‘जन्म’ ही एकमात्र अधिकार है।
- शास्त्रीय/विहित कर्म: यज्ञ, दान, तप, संस्कार और पूजन। इनके लिए केवल जन्म पर्याप्त नहीं, अपितु ‘अधिकार’ की प्राप्ति अनिवार्य है।
शास्त्रीय दृष्टि से कर्माधिकार दो धाराओं के संगम से निर्मित होता है— दैहिक शुद्धता (जन्म) और विद्या-तपजन्य पात्रता (संस्कार)
कर्माधिकार : आवश्यकता और कारण
जब तक हम विषय को भली भांति समझें न तब तक उचित निर्णय नहीं ले सकते, उचित विश्लेषण नहीं कर सकते इसलिये अब “कर्माधिकार” को समझने के लिये यह भी आवश्यक है कि इसकी आवश्यकता और कारण दोनों को समझें :
एक नवजात का आहार में तो अधिकार होता है किन्तु वह दुग्धादि द्रव्य पर्यन्त सीमित होता है। अन्नाधिकार नहीं होता और यदि नवजात को अन्न का आहार दिया जाय तो उसके लिये ही हानिकारक होगा, अर्थात अन्नादि का आहार लेने से पूर्व यह आवश्यक है कि वो अधिकारी बने। इसी प्रकार शिक्षा आदि का भी विचार किया जा सकता है और इस कड़ी में एक है वेदाधिकार जिसके मूल में जन्म तो है किन्तु वास्तव में यह अधिकार संस्कार के पश्चात् ही प्राप्त होता है।
अब देखिये अध्ययन और अध्यापन दोनों ही ब्राह्मणों के षट्कर्म में आते हैं किन्तु इसका अधिकार प्राप्त करना होता है एवं संस्कार के नष्ट होने पर पुनः संस्कार का विधान है अर्थात जब तक पुनर्संस्कार न होवे तब तक वेदाधिकार (अध्ययन-अध्यापन परक) नहीं होता। यदि ऐसा माने कि अधिकार यथावत ही रहता है तो पुनर्संस्कार की ही आवश्यकता न हो। इसी प्रकार अध्ययन काल में ब्रह्मचर्यादि व्रत का भी विधान है।
इसी प्रकार अशौचावस्था में भी कर्माधिकार नष्ट होता है और अब हम कर्माधिकार के मूल कारण की ओर बढ़ रहे हैं। अशौच के तीन प्रकार हैं : स्पर्शाशौच, कर्माशौच और मंगलाशौच। यहां पर हमें एक कर्मशौच भी प्राप्त होता है जो यह बताता है कि विशेष अवस्थाओं में कर्म के अधिकार नहीं होते हैं और जब कर्म का अधिकार न हो तो उसे कर्माशौच (अशौच प्रकरण में) कहा गया है।
अगला प्रश्न : अशौच में जब कर्माधिकार नहीं होता (कुछ शास्त्रविहित कर्मों के अतिरिक्त) तो अशौच समाप्ति के उपरांत क्या स्वतः कर्माधिकार प्राप्त हो जाता है ? इसका उत्तर है नहीं अघनिवारण करना पड़ता है, शुद्धिकरण करना होता है। इस तथ्य को यदि हम अशौच प्रकरण में ही आगे बढ़ायें तो कर्माधिकार का विषय अधिक स्पष्ट होता चला जायेगा।
दोषाशौच : जब हम अशौच के प्रकारों की चर्चा करते हैं (निमित्ताधारित) तो चार प्रकार होते हैं : जन्माशौच, मरणाशौच, क्रियाशौच और दोषाशौच। प्रत्येक अशौच में कर्माशौच व्याप्त होता है भले ही सबमें अघ के अनुसार काल का अंतर हो। अर्थात हम यहां तक पहुंचे हैं कि अघ/अशुद्धि/दोषादि कारणों से कर्माधिकार बाधित होता है।
यह भी ध्यातव्य है कि अघ/अशुद्धि/दोषादि के निवारण के विधान में अधिकार रहता है और इसको भी कहा तो कर्म ही जायेगा, किन्तु निवारण से पूर्व अन्यान्य कर्मों में अधिकार नहीं होता। यदि मानसिक संध्या की बात करें तो वह शास्त्र से ही ज्ञात होता है और शास्त्र में वर्णित है इस कारण विहित है।
अब तक जो तथ्य स्पष्ट हुये हैं वो इस प्रकार कहे जा सकते हैं :
- देह और इन्द्रियों के आहार संबंधी अधिकारों (कर्माधिकार) की बात करें तो इसके लिये जन्म ही योग्यता होती है किन्तु सभी अधिकार जन्मना ही प्राप्त नहीं होते हैं अवस्था आदि पर भी निर्भर होते हैं।
- सभी कर्मों में जन्मना ही अधिकार होता है ऐसा नहीं कहा जा सकता अपितु जन्म (योनि/वर्णादि) के अनुसार जो कर्म हैं उनमें अधिकारी होते तो हैं किन्तु उस अधिकार को प्राप्त करने के लिये योग्यता भी निर्धारित की जाती है एवं योग्य होने पर ही अधिकारी बनते हैं। जैसे उपनयन, व्रत-अध्ययन, विवाह, गर्भाधान आदि को समझें तो स्पष्ट हो जायेगा। अर्थात मूल में जन्म सन्निहित तो है किन्तु इसके पश्चात् भी अधिकार प्राप्त करना पड़ता है एक मात्र जन्म से अधिकार प्राप्त नहीं होता।
इन दो भेदों के आधार पर प्रथम प्रकार का विचार कर्मकाण्ड में करने की आवश्यकता ही नहीं है किन्तु दूसरे प्रकार के संबंध में विचार करने पर पूर्णतः स्पष्ट है कि यह कर्माधिकार बाधित भी होता है एवं बाधित होने पर पुनः प्राप्ति का विधान है जिसका निर्धारण कारण के आधार पर आनुपातिक रूप से किया जाता है। जैसे मल, मूत्र के विसर्जन में भी भिन्न व्यवस्था होती है। कई प्रकार कि अशुद्धियों का निवारण मात्र आचमन से ही हो जाता है तो कई अशुद्धियों में आचमन भी अनिवार्य नहीं विकल्प ही प्रशस्त है।
अब आचमन की बात करें तो आचमन का भी अधिकारी बनना होता है किसी भी अवस्था में हम किसी भी प्रकार से आचमन नहीं कर सकते। आचमनोपरांत पवित्र होने पर अगले कर्म में प्रवृत्त होते हैं अर्थात अधिकारी बनते हैं जिसका तात्पर्य है कि आचमन न करें (पवित्र न हों) तो कर्म में अधिकृत नहीं होते।
संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु : से स्पष्ट होता है कि संध्या से रहित व्यक्ति (द्विज) अशुद्ध होता है और सभी कर्मों के अयोग्य होता है। और इस प्रकार कर्माधिकार का यहां क्या तात्पर्य है वह स्पष्ट हो जाता है। संध्यारहित व्यक्ति भी कर्म तो करता ही है किन्तु वह अनधिकृत कहा जायेगा अथवा नहीं। वर्त्तमान में ९९% व्यक्ति (द्विज) संध्याहीन हैं तो क्या उनका कर्माधिकार सुरक्षित है अथवा कर्माधिकार प्राप्ति का विधान है आदि विमर्श का विषय है।
संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु । यदन्यत्कुरुते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत् ॥ स्कंदपुराण (काशीखण्ड ३५/१११)
संध्या के विषय में और भी बहुत सारे तथ्य हैं जो यह सिद्ध करता है कि वो सभी जो संध्या नहीं करते हैं, अशुद्ध होते हैं पाप के भागी होते हैं और अन्यान्य कर्मों का अधिकारी नहीं रहता। अज्ञानता के कारण दिन और रात में जो पाप होते हैं वो पाप संध्या से नष्ट हो जाते हैं ऐसा याज्ञवल्क्य वचन है।
इसी प्रकार कात्यायन वचन है : “स्नानं संध्या त्यजन्विप्रः सप्ताहाच्छूद्रतां व्रजेत्” अर्थात एक सप्ताह तक संध्या का त्याग करने वाला विप्र शूद्रत्व की प्राप्ति करता है अर्थात वेदाधिकार रहित हो जाता है। वेदाधिकाररहित द्विजों के लिये कर्माधिकार कैसे सुरक्षित रह सकता है। ऐसी अवस्था में प्रायश्चित्त, पुनर्संस्कार आदि का शास्त्रों में विधान है अर्थात कर्माधिकार पुनः प्राप्त करने का विधान है।
यदि हम आगे और विचार करें तो शिखा-सूत्र की बात आती है, व्रात्यता-शाखारण्डादि दोष भी आता है। महापापों की बात करें तो वो भी स्पष्ट ही दिखता है दुर्काल ऐसा है कि महापाप करने वाला मात्र गोहत्या-ब्राह्मणहत्या आदि को ही महापाप समझता है शेष को नहीं अर्थात पापरत भी है और जानता भी नहीं, मानता भी नहीं।
यदि एक घर में ८ बच्चे हैं तो एक बच्चा (सबसे छोटा) का उचितकाल में उपनयन होता है शेष व्रात्य हो जाते हैं, शाखारण्ड वाली बात भी सामान्य सी हो गयी है। शिखा तो धारण ही नहीं करते, जब श्राद्धादि में क्षौरकर्म करते हैं तो किञ्चित शिखा प्रतिभाषित होती है जिसमें ग्रंथि भी न लग सके। आचमन की बात करें तो इतना ज्ञानी है कि आचमन के लिये जल पीकर सिर पर ग्रहण करता है और यहां भी कर्म की अयोग्यता सिद्ध हो जाती है।
सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च। विशिखो व्यूपवितश्च यत्करोति न तत्कृतं॥ – कात्यायन स्मृति
अज्ञानाद्वारुणीं पीत्वा संस्कारेणैव शुद्धयति। मतिपूर्वमनिर्देश्यं प्राणान्तिकमिति स्थितः॥ – मनुस्मृति (११-१४६)
प्रायश्चित्तविधिं वक्ष्ये श्रृणु नारद सांप्रतम् । प्रायश्चित्तविशुद्धात्मा सर्वकर्मफलं लभेत् ॥
प्रायश्चित्तविहीनैस्तु यत्कर्म क्रियते मुने । तत्सर्वं निष्फलं प्रोक्तं राक्षसैः परिसेवितम् ॥
नारदपुराण (पूर्वार्द्ध ३०/१-२)
श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममकृत्वा यश्चरेन्नरः। विकर्मस्थः स विज्ञेयः सर्वकर्मसु गर्हितः॥ वृद्ध हारीत स्मृति २०
यहां अनेकानेक प्रमाणों द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि कर्माधिकार नष्ट भी होता है जिसकी पुनर्प्राप्ति के लिये शुद्धिविधान (प्रायश्चित्त आदि) भी मिलता है।
इसी तथ्य को कर्माधिकार के रूप में समझने का प्रयास किया जा रहा है, क्योंकि वर्त्तमान में जो देखने को मिलता है कुम्भ में करोड़ों लोग डुबकी लगाते हैं, सावन में करोड़ों लोग रुद्राभिषेक करते हैं, नवरात्रा में करोड़ों लोग व्रत-पूजा आदि करते हैं, इसके अतिरिक्त उपनयनादि संस्कार जो कंकाल मात्र ही अवशेष है वो भी करते हैं, श्राद्ध भी करोड़ों होते हैं, यज्ञ भी सहस्रों होते हैं किन्तु यदि कर्माधिकार रहित होकर कर रहे हैं तो क्या उसके फल के अधिकारी होंगे ? यही बड़ा प्रश्न है।
कर्माधिकार अर्थात कर्म की अर्हता : ज्ञान और पवित्रता
अब तक कर्माधिकार के विषय में अर्थात कर्म की अर्हता के विषय में दो मुख्य तथ्य स्पष्ट हो रहे हैं जो ज्ञान (कर्म संबंधी ज्ञान) और पवित्रता (बाह्याभ्यन्तर) है। और अब इन दोनों तथ्यों को और गंभीरता से समझना आवश्यक है।
जैसे तैरने के लिये तैराकी का ज्ञान आवश्यक है, जलस्रोत का ज्ञान आवश्यक है, शिकार करने के लिये अस्त्र-शस्त्र, पशु एवं शिकार सबंधी ज्ञान आवश्यक है उसी प्रकार किसी भी कर्म में प्रवृत्त होने से पूर्व उसका ज्ञान आवश्यक होता है। सोचिये जिसे तैरना नहीं आता है वह यदि छोटे से तालाब में भी गिर जाये तो क्या होगा। जिसे शिकार का ज्ञान न हो वह अस्त्र-शस्त्र सहित भी सिंह के सामने हो तो क्या होगा ?

यहां जो उदाहरण दिया गया है जिसमें विपरीत अर्थात ज्ञान न होने पर प्रत्यक्ष हानि भी है, किन्तु सदैव और सभी कर्मों में हानि नहीं होती फिर भी कर्म निरर्थक होता है। यथा यदि किसी बालक को चलना नहीं आता और उसे हम खड़ा करके छोड़ दें तो वह नहीं चल पायेगा भले ही कोई हानि न हो। यहां हमें स्पष्ट यह करना है कि कर्म का ज्ञान न हो तो उस कर्म को संपन्न नहीं कर सकते।
इसी प्रकार अनुष्ठान, यज्ञ, व्रत, जप आदि का ज्ञान न हो तो वह निरर्थक अर्थात निष्फल होता है और शास्त्रों में ऐसे प्रमाण भरे पड़े हैं अपितु इससे आगे भी श्रद्धा-विश्वास आदि की बात भी कही गयी है। यहां स्पष्ट यह हो रहा है कि यदि ज्ञानरहित कर्म करें तो वह निष्फल होता है अर्थात कर्म की प्रमुख अर्हता कर्म का ज्ञान है।
बात जब पवित्रता की करेंगे तो यहां पर कुछ लोग “यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः” को उद्धृत करेंगे और ऐसा सिद्ध करने का प्रयास करेंगे कि पवित्रता तो भगवान विष्णु के स्मरण से हो ही जाती है। इसमें उनको अन्यान्य शास्त्रोक्त विषयों का प्रछन्न विरोध नहीं दिखेगा और इसका कारण भी अज्ञान ही है किन्तु इस विषय को भी गंभीरता से समझ लेना आवश्यक है।
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु । न्यूनं संपूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥
प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्। स्मरणादेव तद्विष्णुः संपूर्णस्यादिति श्रुतिः ॥
यहां दो और श्लोक प्रस्तुत किया गया है जो यह बताता है कि कर्मान्त में कर्म की सम्पूर्णता के लिये भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिये। किन्तु यदि हम इसका यह अर्थ लगा लें कि विष्णु भगवान का स्मरण करने से ही कर्म सम्पूर्ण हो जाता है इसलिये कर्म करने की आवश्यकता ही नहीं है मात्र संकल्प करके विष्णु भगवान का स्मरण कर लें तो यह अनर्थ होगा।
यहां वास्तविक तात्पर्य यह है कि हम कितना भी सावधान रहें, विधियों का पालन करें दोष स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते ही रहते हैं, न्यूनता होती ही रहती है चाहे भाव मात्र के दोष-न्यूनता आदि क्यों न हों। विष्णु भगवान के स्मरण से कर्म की सम्पूर्णता होती है इसका तात्पर्य यही है कि सामर्थ्यानुसार जो भी कर्म किया गया, जैसे भी किया गया अंततः न्यूनता शेष रहती ही है और इसका मुख्य उपाय भगवान विष्णु का स्मरण करना है।
इसी प्रकार कर्म के आरम्भ और मध्य में भी भगवान विष्णु के स्मरण का विधान है और कर्मारम्भ में पवित्रता हेतु भी है जैसे कर्मान्त में सम्पूर्णता हेतु। किन्तु कर्मारम्भ में पवित्रता हेतु विष्णु स्मरण का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि हम स्नानादि भी न करें और भगवान विष्णु का स्मरण करके हवन करने बैठ जायें। अपितु इसका वास्तविक तात्पर्य यह है कि हम कितना भी प्रयास करें वास्तव में पवित्र हो ही नहीं पाते और उसका एक मात्र उपाय है भगवान का ही स्मरण करना, किन्तु इसका तात्पर्य अपने सामर्थ्यानुसार पवित्रता का प्रयास ही न करें; यह नहीं है।
यहां हम वास्तव में इस तथ्य को स्पष्ट कर रहे हैं कि कर्म में प्रवृत्त होने की दूसरी मुख्य अर्हता है पवित्रता। इसकी पुष्टि अशौच में कर्म के अनाधिकार (अपवाद प्रेत कर्म को छोड़कर) से भी होती है। यहां तक कि संध्या में भी यदि प्रावधान किया गया है तो वह मानसिक संध्या का है।
अशौच में भी अशुद्धि ही है और भगवान विष्णु का स्मरण करके भी उस अशुद्धि का निवारण नहीं होगा अर्थात किसी भी कर्म के लिये शुद्ध नहीं हो जायेंगे। यदि हम आधुनिकयुगीन कुतर्कावलम्बन लें तो यह भी कह सकते हैं कि अशौचावस्था है तो क्या हुआ “यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः” अर्थात विष्णु भगवान का स्मरण करने से बाह्याभ्यंतर शुद्धि हो जाती है और अशौच का भी निवारण हो जायेगा देव-पितृ कार्यादि कर सकते हैं। इस प्रकार अनर्थ/कुतर्क करने का मूल भी अज्ञान ही होगा।
जब तक हम पाप से संलिप्त रहते हैं वहां भी अशुद्ध होते हैं। पाप से संलिप्त होने पर शुद्धि हेतु प्रायश्चित्त विधान है और जब तक हम प्रायश्चित्त न कर लें तब तक अशुद्ध ही रहते हैं एवं उपरोक्त तथ्यों को ही उपरोक्त प्रमाणों में “अनर्हः सर्वकर्मसु”, “सर्वकर्मसु गर्हितः”, “यत्करोति न तत्कृतं” आदि कहकर स्पष्ट किया गया है। इस प्रकार स्पष्ट यह होता है कि पवित्रता कर्म की एक प्रमुख अर्हता है और जब तक हम अपवित्र होते हैं तो उस समय कर्माधिकारी नहीं रहते।
कर्माधिकार और वेदाधिकार
यहां कर्माधिकार और वेदाधिकार के विषय में भ्रम उत्पन्न हो सकता है। कर्माधिकार समाप्ति का तात्पर्य यह तो है कि वेदाधिकार भी समाप्त हो जाता है किन्तु वेदाधिकार न होने पर भी कर्माधिकार नष्ट नहीं होता जैसे अनुपनीत पुत्र भी माता-पिता के श्राद्ध का प्रथम कर्माधिकार रखता है। स्त्री-शूद्र को भी शास्त्रविहित कर्म में अधिकार होता है भले ही वेदाधिकार न हो। अर्थात कर्माधिकार और वेदाधिकार को लेकर भ्रमित नहीं होना चाहिये अथवा कर्माधिकार विमर्श को वेदाधिकार के विमर्श से दिग्भ्रमित नहीं करना चाहिये।

- पापी को भी प्रायश्चित्तपरक व्रत-जप-स्नान-उपवास-दान आदि का अधिकार होता है तभी तो वह प्रायश्चित्त करता है।
- अशौचावस्था में भी प्रेतक्रिया का कर्माधिकार रहता है, अस्थिसंचयन का कर्माधिकार होता है।
- इसी प्रकार प्रातःकाल स्नानपूर्व भी प्रातःस्मरण का कर्माधिकार तो रहता है।
ये सभी कर्माधिकार अपवादस्वरूप समझने चाहिये क्योंकि इनका उपदेश भी शास्त्र ही करता है। इसी प्रकार जहां प्रायश्चित्त में भी गायत्री मन्त्र जप, हवन, वेदसूक्त पाठ (जप) आदि वर्णित है उसे प्रायश्चित्तपरक भाव में ही ग्रहण करना चाहिये वेदाधिकार और कर्माधिकार के रूप में नहीं।
निष्कर्ष
पात्रता और फल का सम्बन्ध कर्माधिकार का सूक्ष्म विश्लेषण यह सिद्ध करता है कि कर्मकाण्ड मात्र मंत्रों का उच्चारण या क्रियाओं का दोहराव नहीं है, अपितु यह कर्ता की पात्रता (अर्हता) पर आश्रित है। जिस प्रकार विद्युत प्रवाह के लिए सुचालक माध्यम की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार वेदोक्त फल की प्राप्ति के लिए कर्ता का ‘शुद्ध’ होना अनिवार्य है। बिना अधिकार (संध्या-वन्दन, शुद्धि, ज्ञान) के किया गया कर्म न केवल निष्फल होता है, बल्कि वह ‘आसुरी’ श्रेणी में जाकर समाज में आध्यात्मिक प्रदूषण उत्पन्न करता है। अतः फल की इच्छा रखने वाले को सर्वप्रथम अपनी पात्रता सिद्ध करनी चाहिए।
“संस्कारों की रक्षा ही सनातन धर्म के कर्माधिकार की रक्षा है।”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
FAQ
प्रश्न 1: क्या ब्राह्मण कुल में जन्म लेने मात्र से कर्माधिकार प्राप्त हो जाता है?
उत्तर: नहीं, जन्म ‘दैहिक’ अधिकार देता है, किन्तु ‘संस्कार’ (उपनयन) और ‘विद्या’ से ही पूर्ण कर्माधिकार निष्पन्न होता है।
प्रश्न 2: क्या संध्या न करने वाले व्यक्ति को पूजा का फल मिलता है?
उत्तर: शास्त्रों (दक्ष स्मृति) के अनुसार संध्याहीन व्यक्ति अशुद्ध है और उसके द्वारा किए गए कर्म निष्फल हो जाते हैं।
प्रश्न 3: क्या अशुद्धि (अशौच) में कर्माधिकार बना रहता है?
उत्तर: नहीं, अशौच में कर्माधिकार बाधित होता है। केवल प्रेत-कर्म या विशेष अपवादों में ही अधिकार रहता है।
प्रश्न 4: क्या कर्माधिकार और वेदाधिकार एक ही हैं?
उत्तर: नहीं, ये भिन्न हैं। वेदाधिकार के बिना भी स्त्री-शूद्र या बालकों को कुछ विशिष्ट शास्त्रीय कर्मों में अधिकार होता है।
प्रश्न 5: आचमन के बिना कर्म का क्या होता है?
उत्तर: बिना आचमन के किया गया कर्म अनधिकृत और निष्फल माना जाता है।
प्रश्न 6: क्या पापी व्यक्ति को कर्माधिकार मिल सकता है?
उत्तर: हाँ, प्रायश्चित्त और शुद्धि विधान के उपरांत वह पुनः अधिकार प्राप्त कर सकता है।
॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








