“बिना अधिकार का कर्म, भस्म में दी गई आहुति है।”
सनातन धर्म की कर्मकाण्ड परंपरा जिस धरातल पर टिकी थी, वह आज निरंतर धंसता जा रहा है। कर्माधिकार की सुरक्षा का प्रश्न आज गौण हो चुका है और ‘क्रिया’ मात्र एक प्रदर्शन बनकर रह गई है। जब हम ‘एकाध प्रतिशत’ की बात करते हैं, तो यह अतिशयोक्ति नहीं, अपितु वह भयावह सत्य है जो शास्त्रों के दर्पण में दिखाई देता है। यदि ९९% कर्मकाण्ड जगत कर्माधिकार से च्युत हो चुके हैं, तो वर्तमान में सम्पादित होने वाले सहस्रों यज्ञ, अनुष्ठान और संस्कार किस फल की उत्पत्ति कर रहे हैं?
यह लेख हमें आत्म-मन्थन की ओर प्रेरित करता है कि “क्या, कब, कैसे और क्यों” का बोध ही कर्माधिकार की पुनर्स्थापना का एकमात्र मार्ग है।
एक बार सोचो – क्या, कब, कैसे और क्यों कर रहे हो?
“क्या कर रहे हो, यह जानने से अधिक महत्वपूर्ण है कि आप उसे करने के अधिकारी हैं या नहीं।”
सनातन धर्म का कर्मकाण्ड पक्ष कोई सामान्य भौतिक क्रिया नहीं, अपितु एक अलौकिक आध्यात्मिक विज्ञान है। इस विज्ञान की प्रथम शर्त है— ‘अधिकार’। जिस प्रकार एक अयोग्य व्यक्ति यदि राजा के सिंहासन पर बैठ जाए तो वह राज्य का कल्याण नहीं, विनाश करता है, उसी प्रकार कर्माधिकार से रहित व्यक्ति जब वेदोक्त कर्मों में प्रवृत्त होता है, तो वह धर्म की रक्षा नहीं, अपितु अधर्म का पोषण करता है।
वर्तमान काल में अत्यल्प (एकाध प्रतिशत) ब्राह्मणों ने ही अपने कर्माधिकार को सुरक्षित रखा है। शेष ९९% कर्मकाण्ड जगत आज केवल औपचारिकता और प्रदर्शन के आवर्त में फंसा हुआ है। इस सत्य को समझने के लिए हमें चार आयामों पर विचार करना होगा: क्या, कब, कैसे और क्यों? ये चार प्रश्न ही वह औषधि हैं जो कर्माधिकार की मृतप्राय चेतना को पुनर्जीवित कर सकते हैं।
- क्या – धर्म जो शास्त्र से ज्ञात होता है
- कब – आजीवन
- कैसे – प्राणपन से
- क्यों – पुरुषार्थ चतुष्टय हेतु
इसी प्रकार व्यावहारिक पक्ष को उजागर किये बिना विषय-वस्तु को समझ पाना कठिन होगा, अस्तु प्रथमतः व्यावहारिक पक्ष को भूमिका के रूप में समझना आवश्यक है।
व्यावहारिक पक्ष
हम लोग आपस में ऐसा कहते-सुनते हैं कि सब आडम्बर बचा है, कुछ नहीं हो रहा है, विधिपूर्वक नहीं हो रहा है। किन्तु समस्या यह है कि बिल्ली के गले में घंटी बांधे तो कौन ? किसी दूसरे के प्रति ये वक्तव्य होते हैं भले ही सामूहिक रूप से ही क्यों न हों साथ ही ऐसा भी सिद्ध करने का प्रयास होता है कि मैंने तो शास्त्र को धारण कर रखा है। किन्तु जब अपनी बारी आती है तो वक्तव्य परिवर्तित हो जाता है और इस प्रकार कहते हैं :
- दुनियां ऐसे ही चलती है।
- आत्मारक्षितो धर्मः।
- मन चंगा कठौती में गंगा।
- देश, काल परिस्थति के अनुसार।
अरे यदि तुम्हारी बारी में ऐसे सूत्र हैं तो दूसरे की बारी में क्यों नहीं हो सकते ? जब बात औरों की करते हैं तभी क्यों कहते हैं कि सब लुप्त हो गया है, ढकोसला करते हैं आदि-इत्यादि। कर्मकांड को क्षति पहुंचाने वालों में सबसे बड़ी भूमिका उन अनधिकृत-अयोग्य कर्मकाण्डियों की है जो वेतनभोगी सेवक अर्थात टीचर-प्रोफेसर आदि होते हुये प्रसिद्ध कर्मकांडी भी बन गये। इसके पश्चात् उन व्याकरणाचार्यों की भी बड़ी भूमिका है जिन्होंने कर्मकांडी के लिये एक मात्र व्याकरणज्ञान को ही अंगीकार किया।
प्राचीन काल में गुरुकुल होते थे और गुरु-प्राध्यापक आदि राजसेवक या वेतनभोगी नहीं होते थे और वो शास्त्रज्ञान भी अनिवार्यतः प्रदान करते थे। आज के टीचर-प्रोफेसर स्वयं ही शास्त्रज्ञान नहीं रखते देने को क्या दें ? पढ़ाते कुछ अन्य विषय हैं अथवा व्याकरण पढ़ाते हैं। वास्तव में वेतनभोगी हैं, राज्य के कर्मचारी हैं अर्थात सेवक हैं और सेवकत्व से युक्त हो जाने पर ब्राह्मण अधम संज्ञक हो जाता है भले ही कितना ही बड़ा विद्वान क्यों न हो।
फिर ये सरकारी नौकर कर्मकांडी बनने के तो अधिकारी ही नहीं रहते, इनसे उत्तम तो वही ब्राह्मण होता है जो मूर्ख भी हो किन्तु गायत्री मात्र को धारण कर रखा हो, सेवक न हो, सदाचारी हो, वृत्ति मात्र से भी ब्राह्मण वृत्ति को धारण कर रखा हो।
ये सरकारी नौकर शास्त्रज्ञान तो नहीं रखते क्योंकि यदि शास्त्रज्ञ हों तो स्वयं ही घोषित कर दें कि कर्मकांड के अयोग्य हैं। चूंकि शास्त्रज्ञान से रहित होते हुये भी कर्मकांडी के रूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं तो कर्मकांड में शास्त्रविरुद्ध व्यवहार को समाविष्ट कर देते हैं और जनसामान्य उन्हें शास्त्रज्ञ समझकर उचित मान लेता है।
यदि वृत्ति परिवर्तन भी करना हो तो वह आपद्धर्म के अंतर्गत है और सीमांकन किया गया है। राज्यकर्मचारी बनना उस सीमा से परे है अर्थात निषिद्ध है। यदि ब्राह्मणवृत्ति से जीवन निर्वहन में कठिनाई हो और अन्य वृत्ति का आश्रय लेना पड़े तो भी शास्त्र का ही आश्रय ग्रहण करना होगा और शास्त्रनिर्दिष्ट वृत्ति को ही ग्रहण करना होगा। उक्त स्थिति में भी कर्माधिकार सुरक्षित रहता है। किन्तु जब हम वृत्ति के लिये शास्त्र की उपेक्षा कर देते हैं तभी कर्माधिकार से भी च्युत हो जाते हैं।
यह तथ्य उन टीचर-प्रोफेसरों को समझना आवश्यक है जो स्वयं को विद्या से जोड़कर ब्राह्मण सिद्ध करते हैं। अरे विद्वान ब्राह्मण भी यदि राजसेवक बन जाये तो अधम हो जाता है और ब्राह्मणोचित कर्मों के अयोग्य हो जाता है फिर उन लोगों की तो बात ही क्या करें तो वर्त्तमान शिक्षा व्यवस्था से सम्बंधित होने के कारण स्वयं को ब्राह्मण सिद्ध करने का कुप्रयास करते हैं।
अरे दुष्टों ब्राह्मण के एक मात्र कर्म शिक्षा देना ही नहीं है, ब्राह्मणों के षट्कर्म शास्त्रों में वर्णित हैं और कर्मणा वर्णव्यवस्था है ही नहीं। वृति से सेवकत्व युक्त होने पर भी वो व्यक्ति ब्राह्मण ही कहलाता है हाँ अधम पद भी जुड़ जाता है।
१. “क्या” कर रहे हो? (स्वरूप और पात्रता का बोध)
प्रथम प्रश्न उस ‘कर्म’ के स्वरूप पर है जिसे हम सम्पादित कर रहे हैं। क्या वह वास्तव में ‘वैदिक कर्म’ है अथवा स्मृति-पुराणादि प्रतिपादित है ? यदि हम वेदाधिकार से रहित हैं तो वैदिक मंत्रों में भी अधिकृत नहीं हो सकते ऐसी दशा में स्मृति-पुराणादि का आश्रय ही लेना होगा किन्तु इसके लिये भी कर्माधिकार तो सुरक्षित होना आवश्यक है। यदि कर्माधिकार सुरक्षित नहीं रखते तो कर ही नहीं सकते। — हम वास्तव में क्या कर रहे हैं? क्या हम शास्त्रोक्त ‘यज्ञ’ कर रहे हैं या मात्र अग्नि में द्रव्य का प्रक्षेप? क्या हम ‘मंत्र’ जप रहे हैं या मात्र ध्वनि का उच्चारण?

शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि ब्राह्मण का शरीर केवल भोग के लिए नहीं, अपितु तप और कर्माधिकार की रक्षा के लिए है। मनुस्मृति (१.९३) के अनुसार, ब्राह्मण की उत्पत्ति ही धर्म की रक्षा के लिए हुई है। किन्तु आज प्रश्न यह है कि जो कर्म हम कर रहे हैं, क्या वह कर्माधिकार की परिधि में आता है?
वर्तमान में ९९% कर्मकाण्ड में ‘अधिकार’ के अभाव के कारण कर्म का स्वरूप ही परिवर्तित हो गया है। शास्त्र कहते हैं— “यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः”। जब कर्ता संध्याहीन है, शिखा-सूत्र से रहित है और भक्ष्याभक्ष्य का विवेक खो चुका है, तब वह जो ‘क्या’ कर रहा है, वह शास्त्रोक्त कर्म नहीं, अपितु ‘राक्षसी क्रिया’ है। “क्या” उस कर्म की ‘सत्यता’ पर प्रहार करता है जिसे हम वर्तमान में कर रहे हैं। क्या वह कर्म वास्तव में वही है जो शास्त्रों में वर्णित है?
- नाममात्र का कर्म: आज उपनयन केवल विवाह की एक औपचारिकता बनकर रह गया है। ‘क्या’ के नाम पर हम केवल उन क्रियाओं को दोहरा रहे हैं जिनका ‘प्राण’ (कर्माधिकार) हम पहले ही त्याग चुके हैं। जब एक संध्याहीन और शिखा-सूत्र रहित व्यक्ति यज्ञ करता है, तो वह ‘यज्ञ’ नहीं रह जाता।
- कर्म का छद्म स्वरूप: क्या हम देवताओं की तृप्ति के लिए कर्म कर रहे हैं या यजमान के संतोष और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए? यदि कर्म का स्वरूप ‘सात्विक’ नहीं है, तो वह ‘तामस’ की श्रेणी में आता है, जिसका फल केवल विनाश है। वर्तमान में उपनयन, विवाह और श्राद्ध जैसे गंभीर संस्कार केवल ‘कंकाल’ मात्र रह गए हैं। हम मंत्र बोल रहे हैं, पर क्या उनमें ‘वीर्य’ (शक्ति) है? कात्यायन स्मृति के अनुसार— “विशिखो व्युपवीतश्च यत्करोति न तत्कृतम्”। अर्थात् बिना शिखा और बिना यज्ञोपवीत के किया गया कर्म ‘अकृत’ (नहीं किया गया) माना जाता है। तो क्या हम केवल समय और ऊर्जा का अपव्यय कर रहे हैं?
ये तो मात्र कुछ कर्मकाण्ड की बात है धर्म की तो बात ही नहीं है। यदि धर्म की बात करें तो आप स्वयं से ही प्रश्न करें कि आपने धर्म की रक्षा कब-कब की ? “धर्मो रक्षति रक्षितः” कहना तो सरल है पर धर्म की रक्षा करना सरल नहीं और जो धर्म की रक्षा नहीं करता वह स्वयं भी रक्षित नहीं होता। धर्म की रक्षा के लिये ही हरिश्चन्द्र चाण्डाल बनते हैं तो धर्म की रक्षा के लिये ही राम वनगमन करते हैं, धर्म की रक्षा के लिये ही दिलीप सिंह के भोजन में स्वयं को अर्पित करते हैं तो शिबि तराजू पर चढ़ जाते हैं।
- तुच्छ लाभ को देखकर अथवा बिना लाभ के भी जब असत्यभाषण करते हैं तब क्या धर्म की रक्षा होती है ?
- परीक्षा में उत्तीर्णता के लिये जब कदाचार करते हैं, पैरवी कराते हैं तो क्या धर्म की रक्षा करते हैं ?
- नौकरी/व्यवसाय का बहाना बनाकर जब शिखा-सूत्र-तिलक त्याग देते हैं तब किस धर्म की रक्षा करते हैं ?
- जब मद्यपान, दुराचार आदि करते हैं तो क्या धर्म की रक्षा करते हैं ?
- जब म्लेच्छ परिधान, म्लेच्छ भाषा आदि धारण करके म्लेच्छाचारी भी बन जाते हैं तो किस धर्म की रक्षा करते हैं ?
ऐसे ढेरों तथ्य हैं जो कहे जा सकते हैं यहां इन बिंदुओं का संकलन करना उद्देश्य नहीं है अपितु आप स्वयं से यह प्रश्न करें और वो यह कि आपने धर्म की रक्षा कब की है ? जिस क्षण आप धर्म की रक्षा नहीं करते उसी क्षण आप अपात्र हो जाते हैं, अनधिकारी हो जाते हैं। “धर्मो रक्षति रक्षितः” का एक भाव यह भी है कि जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसी की रक्षा करता है अर्थात उसका पतन नहीं होने देता। हम इसको भौतिक अर्थ में ही ग्रहण करते रहते हैं क्योंकि हमारी धर्म में रूचि ही नहीं होती है। पाखंडी हमें कुछ से कुछ बताते-समझाते हैं और हम वही मान लेते हैं।
धर्म का स्वाभाविक रूप से पालन करने का सबसे सरल मार्ग कर्मकांड ही है क्योंकि कर्म किये बिना तो हम रह ही नहीं सकते इसलिये कर्म को ही धर्म माध्यम बना दिया गया जिसे कर्मकांड कहते हैं। यदि धर्म से कर्मकांड को निकाल दें तो अन्यान्य किसी भी प्रकार से धर्म का ज्ञान हो ही नहीं सकता। अन्यान्य मार्गों का भी आधार कर्मकांड ही है। कुछ अपवाद सभी नियमों के होते हैं और इसके भी कुछ अपवाद पौराणिक कथाओं में अवश्य ही मिलते हैं किन्तु हम अपवाद में नहीं आते हैं हमें यह भी समझना चाहिये।
२. “कब” कर रहे हो? (काल, अवस्था और अधिकार का सन्धि-बिन्दु)
द्वितीय प्रश्न ‘काल’ और ‘अवस्था’ से सम्बंधित है। कर्मकाण्ड में ‘काल’ (Time) का अर्थ केवल घड़ी का समय नहीं, बल्कि ‘पात्रता का समय’ भी है, ‘काल’ का अर्थ केवल मुहूर्त नहीं, बल्कि कर्ता की ‘अवस्था’ भी है। कर्मकाण्ड की बात करें अथवा कर्मकांड सहित या रहित धर्म की बात करें इसका काल आजीवन है। उचित काल का जो मुहूर्त्त आदि से संबंधित भाग है वह कर्मकांड परक ही विशेषता है।
आजीवन कथन में भी एक अन्य विषय संबद्ध है जो बाल्य, वृद्ध, आतुर आदि अवस्थाओं में मिली छूट को लेकर है। यह छूट असमर्थता से संबंधित है किन्तु इसका भी लोग अनर्थ ही करते रहते हैं, स्नान-उपवास आदि में सक्षम होने पर भी “आत्मरक्षितो धर्मः” बोलकर उपरत हो जाते हैं। वास्तव में कब का उत्तर भी हमें शास्त्रों द्वारा ही प्राप्त होता है। मूल उत्तर आजीवन और समर्थ होने तक तो है ही इसके साथ ही उसमें भी और भिन्न-भिन्न धर्म-कर्म का कुछ निर्धारित कालखण्ड होता है और कब का एक तात्पर्य यह भी है।

कब का ज्ञान नहीं होने पर बड़ी हानि होती है। जैसे कृषि कार्य में कब बीजारोपण, कब सिंचन आदि करें इसका ज्ञान न होने पर हानि होती है उसी प्रकार धर्म और कर्मकांड में कब का ज्ञान न हो और उचित काल समाप्त हो जाये तो उससे हानि होती है। जो विकल्प, गौण काल आदि का विधान प्राप्त होता है वह “कर्मलोप” से बचाने के लिये है और कब को भलीभांति समझाने के लिये है।
- व्रात्यता का कालदोष: शास्त्रों में प्रत्येक संस्कार का एक निश्चित काल निर्धारित है। मनुस्मृति (२.३८-३९) के अनुसार, यदि निश्चित समय सीमा के भीतर ब्राह्मण का उपनयन नहीं होता, तो वह ‘व्रात्य’ हो जाता है और आर्यों के समस्त कर्मों से बहिष्कृत हो जाता है। आज ९९% ब्राह्मण पुत्र १६ वर्ष की आयु पार करने के बाद विवाह के समय उपनयन करते हैं। प्रश्न है— ‘कब’ कर रहे हो? जब अधिकार नष्ट हो चुका है, तब किया गया संस्कार क्या मृत शरीर को शृङ्गारित करने जैसा नहीं है?
- अशौच और कालदोष: सूतक-पातक (जन्म-मरण अशौच) में कर्माधिकार स्थगित हो जाता है। किन्तु आज अज्ञानवश या लोभवश, अशौच की निवृत्ति के बिना ही कर्म किए जा रहे हैं। ‘कब’ का यह उल्लंघन कर्माधिकार को समूल नष्ट कर देता है।
- नित्य कर्म का काल: संध्या का काल निश्चित है। त्रिकाल संध्या का त्याग कर जो व्यक्ति सीधे ‘नैमित्तिक’ कर्म (यज्ञ-पूजन) में बैठ जाता है, वह काल-दोष का भागी होता है। दक्ष स्मृति (२.१४) का उद्घोष है: “संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु”। जब आप नित्य कर्म के काल में सो रहे हैं या व्यवसाय कर रहे हैं, तो आप कर्माधिकार से च्युत हो चुके हैं। ऐसी अवस्था में किया गया पूजन ‘काल-विरुद्ध’ होने के कारण निष्फल है।
- संध्या का काल: त्रिकाल संध्या का विधान था। जब हम प्रातः की संध्या मध्याह्न में और सायं की रात्रि में करते हैं, या करते ही नहीं, तो वह ‘कब’ का प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है।
३. “कैसे” कर रहे हो? (विधि, शुद्धि और प्रक्रिया की सूक्ष्मता)
‘कैसे’ का प्रश्न सबसे अधिक व्यथित करने वाला है। यहाँ ‘कैसे’ का तात्पर्य केवल शारीरिक क्रिया मात्र से नहीं, बल्कि ‘विधि’ और ‘पवित्रता’ से भी है। यह प्रश्न कर्म की ‘प्रक्रिया’ और कर्ता की ‘आभ्यन्तर शुद्धि’ को रेखांकित करता है।
हमारे पास कितनी भी शक्ति हो किन्तु कैसे पटकनी देते हैं इसका ज्ञान न हो तो एक छोटे से पहलवान को भी पटकनी न दे सकें, विजय प्राप्त न कर सकें। हमारे पास विभिन्न दिव्यास्त्र ही क्यों न हों किन्तु उनका प्रयोग कैसे करना है यह ज्ञान न हो तो हम युद्ध में परास्त हो ही जायेंगे। इसी कारण तो जिसको जो कार्य करना हो वह उसका प्रशिक्षण भी प्राप्त करता है।
कर्मकांड के विषय में भी कैसे का ज्ञान न हो तो यह अनधिकारी ही सिद्ध करता है और स्वयं भी इस विषय को उपरोक्त उदाहरणों से समझ सकते हैं। कैसे का ज्ञान नहीं होने के कारण ही तो उपनयन, विवाह, यज्ञ, श्राद्ध आदि कुछ कंकाल अवशेष में बचे हैं और वो भी मात्र ब्राह्मणों के ऊपर निर्भर है, कर्ता को तो कोई ज्ञान ही नहीं होता।
यदि विश्वास न हो तो आप इस प्रकार समझें कि कैसे का यदि थोड़ा भी ज्ञान होता तो पैंट पहनकर हवन नहीं किया करते, अंग्रेज बनकर कन्यादान नहीं लेते, नाच-गाकर उदार में अभक्ष्य नहीं ठूंसते, अभक्ष्य का तात्पर्य मत्स्य-मांस नहीं समझते, डेयरी के दूध से रुद्राभिषेक नहीं करते, नवग्रह समिधा क्रय करके आग में नहीं फेंकते। ये सब सतही उदाहरण हैं जो यत्र-तत्र देखने को मिलते हैं।
- विधि-विद्रूपता: वर्तमान कर्मकाण्ड में विधियों का सरलीकरण (Short-cut) कर दिया गया है। आचमन कैसे करना है, प्राणायाम कैसे करना है, शिखा न होने पर क्या करें, यजमान पैंट पहने हुये है तो क्या करें, इसका ज्ञान ९९% कर्मकाण्डियों को नहीं है। ‘यत्करोति न तत्कृतं’—अर्थात जो शास्त्र विरुद्ध किया गया, वह ‘किया ही नहीं गया’ माना जाता है।
- शुद्धि का अभाव: आभ्यंतर शुद्धि के बिना बाह्य तड़क-भड़क व्यर्थ है। यदि कर्मकाण्डी स्वयं पापाचारी है या संध्या-वन्दन से रहित है, तो वह ‘कैसे’ भी कर्म करे, वह फलदायी नहीं होगा। आचमन कर्माधिकार प्राप्ति का प्रथम द्वार है। आज देखा जाता है कि लोग बिना शिखा बाँधे आचमन कर लेते हैं; जब शिखा ही नहीं तो बांधेंगे क्या ? यह ‘कैसे’ का प्रश्न हमें सचेत करता है कि अशुद्ध विधि से किया गया आचमन स्वयं अशुद्ध है, फिर उससे शुद्धि कैसे संभव है?
- मंत्रापराध: मंत्रों का सस्वर पाठ और शुद्ध उच्चारण ‘कैसे’ का मुख्य अंग है। जब अशुद्ध उच्चारण के साथ, बिना अधिकार के मंत्र बोले जाते हैं, तो वे ‘वज्र’ बनकर कर्ता का ही अनिष्ट करते हैं। मंत्रों का उच्चारण ही कर्माधिकार का प्राण है। पाणिनीय शिक्षा के अनुसार, यदि मंत्र का स्वर या वर्ण गलत हो जाए, तो वह ‘इन्द्रशत्रु’ की भांति यजमान का ही नाश कर देता है। आज ९९% कर्मकाण्डी मंत्रों का अशुद्ध पाठ करते हैं। ‘कैसे’ कर रहे हो? क्या आप मंत्रों के माध्यम से देवताओं को आहुति दे रहे हैं या अपनी अज्ञानता से उनका अपमान कर रहे हैं? आपको ये बातें अनर्गल प्रतीत हों तो सोशल मीडिया में भरे पड़े हैं थोड़ा ढूंढिये ढेरों मिल जायेगें। सबसे बड़ी बात तो यह है कि जो अनधिकारी कर्मकांडी है वही सोशलमीडिया पर कर्मकांड को सार्वजनिक करता है।
- भक्ष्याभक्ष्य विवेक: कर्माधिकार का सीधा सम्बन्ध ‘आहार’ से है। “आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः” जो ब्राह्मण अभक्ष्य भक्षण (प्याज, लहसुन, मद्य-मांस आदि) में लिप्त है, उसका कर्माधिकार तत्काल नष्ट हो जाता है। वह कैसे कर्मकाण्ड करा सकता है? उसकी उपस्थिति मात्र से स्थान अपवित्र हो जाता है। वर्त्तमान में तो यज्ञ-नवरात्र-व्रत आदि भी कर रहे हैं और ऑनलाइन फलाहार भी मंगा रहे हैं। पहुंचाने वाला व्यक्ति म्लेच्छ भी होता है और फलाहार में थूक, छिपकली आदि जीवों की भी संभावना बनती है। यही तो प्रश्न है कि जब तुम्हें विधि-विधान का ही ज्ञान नहीं तो ऐसे ही आडम्बर करोगे और कट्टर हिन्दू होने का भी दम्भ भरोगे।
४. “क्यों” कर रहे हो? (उद्देश्य और फल-मीमांसा)
सबसे मर्मस्पर्शी प्रश्न है— ‘क्यों’? हम यह सब क्यों कर रहे हैं? यह प्रश्न जनमानस और यजमानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। ‘क्यों’ का उत्तर ही कर्माधिकार के प्रति जागरूकता ला सकता है। क्यों का ज्ञान नहीं होने के कारण ही क्या, कब, कैसे सभी भूल गए हैं। यदि क्यों का ज्ञान हो जाये तो हमें क्या, कब और कैसे का भी ज्ञान प्राप्त होने लगेगा अर्थात करने लगेंगे। अर्थात क्यों ही मूल प्रश्न है और इस पर हम सबको आत्ममंथन करने की आवश्यकता है।
- निष्फल श्रम: यदि कर्माधिकार नहीं है, तो प्रश्न उठता है कि हम यह सब ‘क्यों’ कर रहे हैं? यदि फल मिलना ही नहीं है, तो यह धन और समय का अपव्यय क्यों? यजमान को यह जानना आवश्यक है कि एक ‘अधिकारी’ ब्राह्मण और एक ‘अनधिकारी’ कर्मकाण्डी के माध्यम से किए गए कर्म के फल में आकाश-पाताल का अंतर है। यजमान अपनी समस्याओं के निवारण हेतु धन व्यय करता है। किन्तु यदि कराने वाला (आचार्य) कर्माधिकार से रहित है, तो यजमान को भी कर्माधिकार के विषय में कुछ नहीं बताएगा और फल के स्थान पर ‘पाप’ की प्राप्ति होती है।
- असुरवृद्धि का भय: विधिविरुद्ध कर्म ‘आसुरी’ फल देते हैं। समाज में बढ़ती अशान्ति, रोगों और क्लेशों का एक बड़ा कारण यह ‘अनधिकारी’ कर्मकाण्ड ही है। हम कल्याण के लिए कर्म कर रहे हैं, किन्तु कर्माधिकार के अभाव में वह ‘अकल्याण’ का कारण बन रहा है। जब कर्माधिकार का त्याग होता है, तब ‘आसुरीभावापन्न’ स्थिति उत्पन्न होती है।
- ब्राह्मण का पतन: ब्राह्मण धनोपार्जन के लिए कर्माधिकार को दांव पर लगा रहा है। ‘क्यों’ कर रहे हो? क्या मात्र उदर-पूर्ति के लिए शास्त्रों की बलि चढ़ाना उचित है? गायत्री रक्षा न्यूनतम योग्यता है, संध्या और गायत्री का त्याग कर ब्राह्मण ‘शूद्रत्व’ को प्राप्त होता है। ब्राह्मणों को यह सोचना चाहिये कि क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को ‘शूद्रत्व’ उपहार में दे रहे हैं?
- जागरूकता का अभाव: जनमानस को यह जानना आवश्यक है कि कर्माधिकारहीन पूजा मात्र एक अभिनय (Drama) है। यदि हम फल की वास्तविक प्राप्ति चाहते हैं, तो हमें ‘क्यों’ के साथ ‘पात्रता’ का प्रश्न उठाना ही होगा। यदि ९९% कर्मकाण्डी अनधिकारी हैं, तो समाज में बढ़ती अशान्ति, व्याधि और अधर्म इसी का परिणाम हैं। यहां प्रश्न यह भी है कि जहां यजमान शतप्रतिशत कर्माधिकार रहित है वहां योग्य ब्राह्मण उपलब्ध ही कैसे हो सकते हैं। यदि एकाध प्रतिशत भी शेष हैं तो वो ब्राह्मणों के निमित्त और धर्मरक्षा के निमित्त हैं।
संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु । यदन्यत्कुरुते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत् ॥
स्कंदपुराण (काशीखण्ड ३५/१११) (दक्ष स्मृति २/२७)
कर्माधिकार रहित कर्म: एक भयावह भविष्य
यदि हम इन चारों प्रश्नों का उत्तर शास्त्रीय धरातल पर ढूंढें, तो परिणाम भयावह परिलक्षित होते हैं। ९९% कर्मकाण्डी आज केवल एक ‘व्यवसाय’ के रूप में इसे अपना रहे हैं और यजमान मात्र किसी भय आदि के कारण करते हैं। जब कर्म का ‘आधार’ (पात्रता) ही नहीं है, तो ‘आधेय’ (फल) कहाँ से आएगा?
- यजमान की दुर्दशा: यजमान श्रद्धावश व्यय करता है, न तो उसने स्वयं कर्माधिकार सुरक्षित रखा है और इसी कारण उसे अधिकारी/सुयोग्य आचार्य भी नहीं मिलते। अयोग्य यजमान और आचार्य के कारण कर्मकांड विधि का उल्लंघन होता है जो अंततः आसुरी हो जाता है। यदि आसुरी न हो तो निष्फल मात्र होगा किन्तु आसुरी होने से आसुरी शक्तियों की ही वृद्धि करने वाला भी हो जाता है।
- ब्राह्मणत्व का ह्रास: ब्राह्मण का बल ‘ज्ञान’ और ‘तप’ है। इसके बिना वह केवल ‘नाम-मात्र’ का ब्राह्मण है। कर्माधिकार का त्याग करके ब्राह्मण स्वयं को आध्यात्मिक शक्ति से हीन कर रहा है। आज के भारत में सर्वाधिक निंदा ब्राह्मणों की ही होती है, सर्वाधिक अपमान ब्राह्मणों का ही किया जा रहा है, सर्वाधिक गालियां ब्राह्मणों को ही दी जा रही है। इसका एक मुख्य कारण है ब्राह्मणत्व से रहित हो जाना। सेवकत्व (नौकरी) के लिये लालायित होने वाला, सेवावृत्ति अपनाने वाला व्यक्ति ब्राह्मणत्व युक्त कैसे हो सकता है ?
- धर्महानि: कर्मकांड के विकृत स्वरूप से वास्तव में धर्म की हानि होती है। यज्ञ से यदि देवताओं को आहार प्राप्त होता है तो उस आहार से देवता शक्तिशाली होकर हमारी रक्षा करते हैं, किन्तु यदि यज्ञ आसुरी हो जाये तो उस आहार का असुर हरण कर लेते हैं जिस कारण देवताओं की शक्ति तो क्षीण होती है, क्रुद्ध भी होते हैं और असुरों की शक्ति बढ़ती है जो हमें चतुर्दिक देखने को मिल भी रहा है।
समाधान
इस दुर्दशा का निराकरण ‘विमर्श’ और ‘जागरूकता’ में है। समाधान और विकल्प में अंतर होता है। कर्माधिकार रहित होने पर कर्माधिकार प्राप्ति का विधान तो शास्त्रों में वर्णित है जिसे प्रत्यम्नाय कहा गया है और इसकी चर्चा हम पृथक आलेख में करेंगे। किन्तु समाधान विषयक चर्चा का बिन्दु प्रत्यम्नाय नहीं है। समाधान का तात्पर्य है वास्तविक अधिकारी होना और यहां केवल विमर्श संभव है कलयुग में अब समाधान की संभावना बनती नहीं दिखती।
- प्रायश्चित्त का मार्ग: जो दोष हो चुके हैं, उनके लिए शास्त्रों में ‘प्रायश्चित्त’ का विधान है। कर्माधिकार की पुनर्प्राप्ति हेतु यह अनिवार्य सोपान है।
- पुनर्संस्कार: व्रात्यता आदि दोष की निवृत्ति हेतु यथोचित विधानों का पालन करना होगा।
- नित्य कर्म की दृढ़ता : मात्र किसी भी अनुष्ठान से पूर्व कर्ता को अपनी ‘नित्य कर्म’ (संध्या-वन्दन आदि) सुनिश्चित नहीं करनी होगी अपितु नित्यकर्म होने का तात्पर्य प्रतिदिन सुनिश्चित करना है।
- जागरूकता: यजमान और आचार्य दोनों को ही एक-दूसरे का चयन करते समय उसकी ‘निष्ठा’ और ‘आचार’ को प्रधानता देनी चाहिए, कर्माधिकार की सिद्धि करनी चाहिये।

आवश्यकता यह है कि हम वर्त्तमान में कर्माधिकार को रक्षित भी नहीं रख पाये, प्रायश्चित्त करके पुनः प्राप्त भी नहीं करते तो फिर कर्म में कैसे प्रवृत्त हो जाते हैं यह सोचने की है। क्या इसके लिये कोई विकल्प है ? यदि हाँ तो क्या है और उस विकल्प से हमें कितना कर्माधिकार प्राप्त होता है ? एक तथ्य तो पूर्णतः स्पष्ट है कि यदि हम आधुनिक जीवनशैली को अंगीकार कर लेते हैं तो हमारा कर्माधिकार नष्ट होता ही है।
समाधान की दिशा में जो शास्त्रोक्त विधान है हम उसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और अगली चर्चा समाधान की होगी। अन्य चर्चायें विमर्श तक ही सीमित रहने वाली है क्योंकि कर्माधिकार को सुरक्षित रखने के लिये आधुनिक जीवनशैली का भी परित्याग करना होगा। जिसे विश्वास न हो वो किसी विद्वान आचार्य के गुरुकुल में जाकर अवलोकन कर सकता है, उनके जीवनशैली से समझने का प्रयास कर सकता है।
“प्रत्येक कर्म से पूर्व स्वयं से पूछें— क्या मैं अधिकारी हूँ?”
निष्कर्ष
“क्या, कब, कैसे और क्यों” ये चार प्रश्न केवल शब्द नहीं, बल्कि कर्माधिकार की कसौटी हैं। जनमानस को यह समझना होगा कि कर्मकाण्ड कोई जादुई चमत्कार नहीं, बल्कि एक शास्त्रीय प्रक्रिया है जिसमें कर्ता की ‘पात्रता’ ही फल की गारंटी है। यदि हम आज जागरूक नहीं हुए, तो आगामी पीढ़ियों के पास केवल खोखली रीतियाँ बचेंगी, शक्ति नहीं।
“क्या, कब, कैसे और क्यों” ये चार प्रश्न हमारे अन्तरात्मा की आवाज़ हैं। यदि हम ९९% की उस भीड़ का हिस्सा हैं जो कर्माधिकार से विमुख है, तो हमें रुकना होगा। शास्त्र कहते हैं— “आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः” अर्थात् आचारहीन व्यक्ति को वेद भी पवित्र नहीं कर सकते। कर्माधिकार की प्राप्ति के बिना किया गया समस्त श्रम ‘भस्म में आहुति’ देने के समान है।
अतः, हे द्विज! हे यजमान! कर्म में प्रवृत्त होने से पूर्व अपनी पात्रता को शास्त्रों की कसौटी पर कसें। प्रत्येक कर्म से पूर्व स्वयं से पूछें— क्या मैं अधिकारी हूँ? यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो पहले अधिकार अर्जित करें, फिर कर्म में प्रवृत्त हों। अन्यथा, निष्फल कर्म का भार आपके लोक और परलोक दोनों को अन्धकारमय बना देगा।
“आचारहीन द्विज को वेद भी पवित्र नहीं कर सकते।”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
FAQ
प्रश्न 1: क्या केवल ‘क्या’ (कर्म का नाम) जान लेना पर्याप्त है?
उत्तर: नहीं, ‘क्या’ के साथ ‘पात्रता’ का बोध अनिवार्य है। बिना अधिकार के किया गया ‘यज्ञ’ केवल अग्नि का दहन है।
प्रश्न 2: ‘कब’ का उल्लंघन कर्माधिकार को कैसे नष्ट करता है?
उत्तर: काल की मर्यादा (संध्या काल, उपनयन काल) का उल्लंघन करने से कर्म ‘काल-भ्रष्ट’ हो जाता है, जिसका फल देवताओं तक नहीं पहुँचता।
प्रश्न 3: ‘कैसे’ के अंतर्गत आचमन का क्या महत्त्व है?
उत्तर: बौधायन धर्मसूत्र के अनुसार आचमन ही कर्माधिकार का द्वार है; अशुद्ध आचमन पूरे कर्म को अपवित्र कर देता है।
प्रश्न 4: ‘क्यों’ का प्रश्न यजमान के लिए क्यों आवश्यक है?
उत्तर: यजमान को यह समझना होगा कि वह ‘क्यों’ करा रहा है। यदि यजमान या आचार्य कर्माधिकारी नहीं है, तो फल की प्राप्ति असम्भव है।
प्रश्न 5: क्या आचमन के लिए शिखा-बन्धन अनिवार्य है?
उत्तर: हाँ, कात्यायन स्मृति के अनुसार बिना शिखा-बन्धन के किया गया कोई भी कृत्य ‘अकृत’ माना जाता है।
प्रश्न 6: क्या आधुनिक जीवनशैली में कर्माधिकार की रक्षा संभव है?
उत्तर: शास्त्रानुसार, ‘महाप्रायश्चित्त’ और ‘नित्य कर्म’ के प्रति दृढ़ संकल्प से अधिकार की पुनर्स्थापना संभव है।
प्रश्न 7: ‘आसुरी कर्म’ क्या है?
उत्तर: विधिहीन और अनधिकारी द्वारा किया गया कर्म जो देवताओं के बजाय असुरों को पुष्ट करता है, आसुरी कर्म कहलाता है।
॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








