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नारायण बलि करने की विधि और मंत्र – narayan bali

नारायण बलि करने की विधि और मंत्र – narayan bali

हवन

तत्पश्चात हवनवेदी के पास आकर पूर्वाभिमुख बैठे। हवन विधि आलेख में बताई गयी विधि के अनुसार अग्निस्थापन करे :

  1. परिसमूह्य : ३ कुशाओं से स्थण्डिल या हस्तमात्र भूमि की सफाई करें। कुशाओं को ईशानकोण में (अरत्निप्रमाण) त्याग करे । 
  2. उल्लेपन : गोबर से ३ बार लीपे।
  3. उल्लिख्य – स्फय या स्रुवमूल से प्रादेशमात्र पूर्वाग्र दक्षिण से उत्तर क्रम में ३ रेखा उल्लिखित करे।
  4. उद्धृत्य – दक्षिणहस्त अनामिका व अंगुष्ठ से सभी रेखाओं से थोड़ा-थोड़ा मिट्टी लेकर ईशान में (अरत्निप्रमाण) त्याग करे।
  5. अग्नानयन व क्रव्यदांश त्याग – कांस्यपात्र या हस्तनिर्मित मृण्मयपात्र में अन्य पात्र से ढंकी हुई अग्नि मंगाकर अग्निकोण में रखवाए । ऊपर का पात्र हटाकर थोड़ी सी क्रव्यदांश अग्नि (ज्वलतृण) लेकर नैर्ऋत्यकोण में त्याग कर जल से बुझा दे ।
  6. अग्निस्थापन – दोनों हाथों से आत्माभिमुख अग्नि को स्थापित करे :- ॐ अग्निं दूतं पुरोदधे हव्यवाहमुपब्रुवे । देवां२ आसादयादिह ॥ अग्नानयन पात्र में अक्षत-जल छिरके।
  7. अग्निपूजन-उपस्थान – अग्नि को प्रज्वलित कर पूजा करे, नैवेद्य वायव्यकोण में देकर स्तुति करे : ॐ अग्निं प्रज्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशनं। हिरण्यवर्णममलं समृद्धं विश्वतोमुखं ॥

तत्पश्चात अग्नि के दक्षिण भाग में पश्चिम-पूर्वक्रम से पांच कलश स्थापित करे लेकिन ब्रह्मा का स्थान छोड़कर करे। प्रत्येक कलश के सम्बन्ध में कुछ विशेष वर्णन भी मिलता है :

  1. प्रथम कलश – ब्रह्मा, प्रतिमा – चांदी, गोधूम पर, श्वेत वस्त्र
  2. द्वितीय कलश – विष्णु, प्रतिमा – स्वर्ण, चावल पर, पीत वस्त्र
  3. तृतीय कलश – रुद्र, प्रतिमा – ताम्र, मूंग पर, रक्त वस्त्र
  4. चतुर्थ कलश – यम, प्रतिमा – लौह, उड़द पर, कृष्ण वस्त्र
  5. पंचम कलश – प्रेत, प्रतिमा – रांगा/लौह, तिल पर, श्वेत वस्त्र

ऊपर बताये गये धान्य पुञ्ज पर कलश स्थापन करके, वर्णित धातु की प्रतिमा अथवा कुशात्मक रखे वर्णित वर्ण का वस्त्र कलश में वेष्टित करके क्रमशः – ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र की पूजा सव्य रहते हुये करके, यम और प्रेत की पूजा अपसव्य-दक्षिणाभिमुख करे। आवाहन के मंत्र नीचे दिये गये हैं :

  1. ब्रह्मा : ॐ ब्रह्म यज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्विसीमतः सुरुचो वेनऽआवः। सबुध्न्या उपमाऽअस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसश्च विवः ॥
  2. विष्णु : ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् समूढ़मस्य पा ᳪ सुरे ॥
  3. रुद्र : ॐ नमस्ते रुद्द्र मन्न्यव ऽउतो त ऽइषवे नमः । बाहुब्भ्यामुत ते नमः ॥
  4. यम : ॐ यमाय त्वांगिरस्वते पितृमते स्वाहा धर्माय स्वाहा धर्मः पित्रे ॥
  5. प्रेत : ॐ प्रेता जयता नर ऽइन्द्रो वः शर्म यच्छतु। उग्रा वः सन्तु बाहवोनाधृष्या यथासथ॥

पंचोपचार/षोडशोपचार पूजन करके भगवान विष्णु की प्रार्थना करे :

जितन्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । नमस्तुभ्यं हृषीकेश महापुरुषपूर्वज ॥
अनादिनिधनो देवः शङ्खचक्रगदाधरः। अक्षय्यः पुण्डरीकाक्षः प्रेतमोक्षप्रदो भव ॥

ब्रह्मा वरण ….

ॐ अद्य कर्त्तव्य नारायणवरण होम कर्मणि कृताकृतावेक्षण रूप ब्रह्मकर्मकर्तुं गोत्रं शर्माणं ब्राह्मणं एभिः वरणद्रव्यादिभिः ब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे ॥

  1. ब्रह्मावरण – उत्तर दिशा में स्थित प्रत्यक्ष ब्रह्मा (विद्वान ब्राह्मण) ब्रह्मा का वरण वस्त्र, पान, सुपारी, द्रव्य, तिल, जलादि लेकर करे : ॐ अद्य कर्त्तव्य नारायणवरण होम कर्मणि कृताकृतावेक्षण रूप ब्रह्मकर्मकर्तुं …….. गोत्रं ……… शर्माणं ब्राह्मणं एभिः वरणद्रव्यादिभिः ब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे ॥ ब्रह्मा स्वीकार करके “वृत्तोस्मि” कहे पुनः यजमान “यथाविहितं कर्म कुरु” कहे और ब्रह्मा “करवाणि” कहे। अथवा ५० कुशात्मक ब्रह्मा पक्ष में : ॐ अद्य अस्मिन् होम कर्मणि कृताकृतावेक्षणरूप कर्मकर्तुं त्वं मे ब्रह्मा भव । कुशात्मक ब्रह्मा में प्रतिवचन नहीं होता।
  2. बह्मा का आसन – दक्षिण दिशा (अग्निकोण) में, परिस्तरण भूमि को छोड़कर ब्रह्मा के लिये ३ कुश का आसान पूर्वाग्र बिछाये। प्रत्यक्ष ब्रह्मा का दक्षिणहस्त ग्रहण कर (कुशात्मक बह्मा को उठाकर) प्रदक्षिण क्रम से दक्षिण ब्रह्मासन तक ले जाकर स्वयं पूर्वाभिमुख होकर ब्रह्मा को उत्तराभिमुख बैठाये या कुशात्मक ब्रह्मा को रखे – ॐ अस्मिन होम कर्मणि त्वं मे ब्रह्मा भव॥ ब्रह्मा की पूजा अमंत्रक ही करे। पुनः अप्रदक्षिणक्रम से अग्नि के पश्चिम आकर आसन पर बैठे।
  3. प्रणीय – तदनन्तर प्रणीतापात्र को आगे में रखकर जल भरे, कुशाओं से आच्छादन करे । फिर ब्रह्मा का मुखावलोकन करते हुए अग्नि के उत्तर भाग में विहित कुशाओं के आसन पर रखे । (वाजसनेयी विशेष, छन्दोग में अभाव)
  4. परिस्तरण – तदनन्तर १६ कुशा लेकर परिस्तरण करे । ४ कुशा अग्निकोण से ईशानकोण तक उत्तराग्र, ४ कुशा दक्षिण में ब्रह्मा से अग्नि पर्यंत पूर्वाग्र, ४ कुशा नैर्ऋत्यकोण से वायव्यकोण तक उत्तराग्र और ४ कुशा उत्तर दिशा में अग्नि से प्रणीता तक पूर्वाग्र बिछाए । (परिस्तरण हेतु एक और प्राकान्तर प्राप्त होता है : पूर्व में पूर्वाग्र, दक्षिण में उत्तराग्र, पश्चिम में पूर्वाग्र और उत्तर में पुनः उत्तराग्र।)
  5. पवित्री निर्माण – पवित्री निर्माण हेतु आसादित पवित्रिकरण २ कुशाओं को ग्रहण करे फिर मूल से प्रादेशप्रमाण भाग पर पवित्रच्छेदन ३ कुशाओं को रखकर दक्षिणावर्त २ बार परिभ्रमित करके नखों का प्रयोग किये बिना २ कुशों का मूल वाला प्रादेशप्रमाण भाग तोड़ ले शेष का उत्तर दिशा में त्याग करे। ग्रहण किये हुए प्रादेशप्रमाण २ कुशाओं में दक्षिणावर्त ग्रंथि दे । प्रोक्षणीपपात्र को प्रणिता के निकट रखे।
  6. पवित्रीहस्त प्रणीता से प्रोक्षणी में ३ बार जल देकर पवित्री को उत्तराग्र करके अंगूठा व अनामिका से ३ बार प्रणीता का जल ऊपर उछाले या मस्तक पर प्रक्षेप करे।
  7. प्रोक्षणीपात्र को बांये उठाकर दाहिने हाथ से अनामिका और अंगूठे द्वारा पवित्री ग्रहण किये हुए जल को ३ बार ऊपर उछाले। प्रणीतापात्र के जल से प्रोक्षणी को ३ बार सिक्त करके प्रोक्षणी के जल से होमार्थ आसादित-अनासादित सभी वस्तुओं को सिक्त करके अग्नि व प्रणिता के मध्य भाग में कुशा के आसन पर प्रोक्षणीपात्र को रख दे।
  8. घृतपात्र में घृत डालकर घृतपात्र को प्रदक्षिणक्रम से घुमाते हुए अग्नि पर चढ़ाये। २ प्रज्वलित तृण को प्रदक्षिणक्रम से घृत के ऊपर घुमाकर (घृत में सटाये बिना ऊपर घुमाकर) अग्नि में प्रक्षेप करे दे । चरु हो तो सामान विधान करे। दाहिने हाथ से स्रुव को ३ बार अग्नि पर तपाकर बांये हाथ में रखे, दाहिने हाथ से सम्मार्जन कुशा लेकर कुशाग्र से स्रुव के ऊपरी भाग का मूल से अग्रपर्यन्त सम्मार्जन करे और कुशमूल से स्रुव के पृष्ठभाग का अग्र से मूलपर्यन्त मार्जन करके प्रणीतोदक से ३ बार सिक्त करके स्रुव को दाहिने हाथ में लेकर पुनः ३ बार तपाकर दक्षिणभाग में कुशा के ऊपर रखे। स्रुचि के लिये भी स्रुववत् विधि।
  9. घृतपात्र को प्रदक्षिणक्रम में अग्नि से उतारकर आगे में रखे (चरु हो तो उसे भी)। पूर्व की भांति पवित्री से घृत को भी ३ बार ऊपर उछाले या मस्तक पर प्रक्षेप करे। तत्पश्चात घृत को भलीभांति देखे, कुछ अपद्रव्यादि हो तो निकाल दे। पुनः प्रोक्षणी के जल को ३ बार ऊपर की पूर्ववत उछाले।
  10. फिर बांये हाथ में उपयमन कुशा ग्रहण करके, उठकर ३ घृताक्त समिधा प्रजापति का ध्यानमात्र करते हुए अग्नि में प्रक्षेप करे।
  11. पर्युक्षण – फिर बैठकर पवित्रिहस्त प्रोक्षणी से जल लेकर सभी सामग्रियों सहित अग्नि का प्रदक्षिणक्रम से पर्युक्षण करे। ३ बार पर्युक्षण करके पवित्री को प्रणीतापात्र में रख दे।

फिर कुश द्वारा ब्रह्मा से अन्वारब्ध करके पातितदक्षिणजानु होकर प्रज्वलित अग्नि में स्रुवा से आज्याहुति दे। आहुति के पश्चात् शेष प्रोक्षणी में प्रक्षेप करे :-

  1. ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये। (मानसिक मात्र) प्रजापति का स्वाहाकार मंत्र बिना बोले आहुति दे, इदं प्रजापतये भी बिना बोले शेष प्रोक्षणीपात्र में प्रक्षेप करे।
  2. ॐ इन्द्राय स्वाहा, इदं इन्द्राय।
  3. ॐ अग्नये स्वाहा, इदं अग्नये।
  4. ॐ सोमाय स्वाहा, इदं सोमाय।

फिर अगले 8 मंत्रों से आहुति दे :

  1. ॐ युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः । वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः स्वाहा ॥ इदं विष्णवे ।
  2. ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्य पा ᳪ सुरे स्वाहा ॥ इदं विष्णवे ।
  3. ॐ इरावती धेनुमती हि भूत ᳪ सूयवसिनी मनवे दशस्या। व्यस्कभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः स्वाहा ॥ इदं विष्णवे ।
  4. ॐ देवश्रुतौ देवेष्वा घोषतं प्राची प्रेतमध्वरं कल्पयन्ती ऊर्ध्वं यज्ञं नयतं मा जिह्वरतम् । स्वं गोष्ठमा वदतं देवी दुर्ये आयुर्मा निर्वादिष्टं प्रजां मा निर्वादिष्टमत्र रमेथां वर्त्मन् पृथिव्याः ॥ स्वाहा ॥ इदं विष्णवे ।
  5. ॐ विष्णोर्नुकं वीर्याणि प्र वोचं यः पार्थिवानि विममे रजा ᳪ सि । यो अस्कभायदुत्तर ᳪ सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायो विष्णवे त्वा स्वाहा ॥ इदं विष्णवे ।
  6. ॐ दिवो वा विष्ण उत वा पृथिव्या महो वा विष्ण उरोरन्तरिक्षात् । उभा हि हस्ता वसुना पृणस्वा प्र यच्छ दक्षिणादोत सव्याद्विष्णवे त्वा स्वाहा ॥ इदं विष्णवे ।
  7. ॐ प्र तद्विष्णु स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः । यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा स्वाहा ॥ इदं विष्णवे ।
  8. ॐ विष्णो रराटमसि विष्णोः श्नप्ने स्थो विष्णोः स्यूरसि विष्णोध्रुवोऽसि । वैष्णवमसि विष्णवे त्वा स्वाहा ॥ इदं विष्णवे ।

पुनः निम्न 16 आहुति दे :

  1. ॐ लोमभ्यः स्वाहा ॥
  2. ॐ लोमभ्यः स्वाहा ॥
  3. ॐ त्वचे स्वाहा ॥
  4. ॐ त्वचे स्वाहा ॥
  5. ॐ लोहिताय स्वाहा ॥
  6. ॐ लोहिताय स्वाहा ॥
  7. ॐ मेदोभ्यः स्वाहा ॥
  8. ॐ मेदोभ्यः स्वाहा ॥
  1. ॐ मा ᳪ सेभ्यः स्वाहा।
  2. ॐ मा ᳪ सेभ्यः स्वाहा ॥
  3. ॐ स्नावभ्यः स्वाहा ॥
  4. ॐ स्नावभ्यः स्वाहा ॥
  5. ॐ अऽस्थभ्यः स्वाहा ॥
  6. ॐ अऽस्थभ्यः स्वाहा ॥
  7. ॐ मज्जभ्यः स्वाहा ॥
  8. ॐ मज्जभ्यः स्वाहा ॥

पुनः निम्न 26 आहुति दे :

  1. ॐ रेतसे स्वाहा ॥
  2. ॐ पायवे स्वाहा ॥
  3. ॐ आयासाय स्वाहा ॥
  4. ॐ प्रायासाय स्वाहा ॥
  5. ॐ संयासाय स्वाहा ॥
  6. ॐ वियासाय स्वाहा ॥
  7. ॐ उद्यासाय स्वाहा ॥
  8. ॐ शुचे स्वाहा ॥
  9. ॐ शोचते स्वाहा ॥
  10. ॐ शोचमानाय स्वाहा ॥
  11. ॐ शोकाय स्वाहा ॥
  12. ॐ तपसे स्वाहा ॥
  13. ॐ तप्यते स्वाहा ॥
  1. ॐ तप्यमानाय स्वाहा ॥
  2. ॐ तप्ताय स्वाहा ॥
  3. ॐ धर्माय स्वाहा ॥
  4. ॐ निष्कृत्त्यै स्वाहा ॥
  5. ॐ प्रायश्चित्त्यै स्वाहा ॥
  6. ॐ भेषजाय स्वाहा ॥
  7. ॐ यमाय स्वाहा ॥
  8. ॐ अन्तकाय स्वाहा ॥
  9. ॐ मृत्यवे स्वाहा ॥
  10. ॐ ब्रह्मणे स्वाहा ॥
  11. ॐ ब्रह्महत्यायै स्वाहा ॥
  12. ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा ॥
  13. ॐ द्यावा पृथिवीभ्या ᳪ स्वाहा ॥

चरु होम : फिर चरु होम करे; “ॐ विष्णवे स्वाहा” मंत्र से 108 आहुति दे।

तत्पश्चात स्विष्टकृद्धोमादि पूर्णाहुति पर्यन्त हवन विधि के अनुसार करे। स्विष्टकृद्धोम की एक विशेषता यह होती है कि यह उसी चरु से करना चाहिये जो हवन की अग्नि में ही पकाई गयी हो।

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