तत्पश्चात सुवासिनी स्त्री नीराजन करे और यजमान उसे वस्त्रादि प्रदान करे।
तत्पश्चात आचार्य यजमान के दक्षिण भाग में उत्तराभिमुख बैठे और पूर्वादि चारों कलश के जल से यजमान का अभिषेक जल (कलश में शेष भी रखे) करे :
- पूर्व कलश : सहस्राक्षं शतधारमृषिभिः पावनंकृतम् ॥ तेनत्वामभिषिंचामि पावमान्यः पुनन्तु ते ॥१॥
- दक्षिण कलश : भगं ते वरुणोराजा भगं सूर्योबृहस्पतिः। भगमिंद्रश्चवायुश्च भगं सप्तर्षयोददुः ॥२॥
- पश्चिम कलश : यत्ते केशेषुदौर्भाग्यंसीमंते यञ्चमूर्द्धनि। ललाटे कर्णयोरक्ष्णोरापस्तद्घ्नन्तु सर्वदा ॥३॥
- उत्तर कलश : उपरोक्त तीनों मंत्र से अभिषेक करे।
चारों कलश के मिश्रित जल से :
- एतद्वैपावनंस्नानं सहस्राक्षमृषिस्मृतम् ॥ तेनत्वांशत धारेण पावमान्यः पुनंत्विमाः ॥१॥
- शक्रादिदशदिक्पाला ब्रह्मेशकेशवादयः। आपस्तेघ्नन्तु दौर्भाग्यं शांतिददतु सर्वदा ॥२॥
- ॐ सुमित्रियानुऽआपऽओषधयः संतु। दुर्मित्रियास्तस्मैसंतुयोस्मान्द्वेष्टियंचवयंद्विष्मः ॥३॥
- समुद्रागिरयोनद्यो मुनयञ्चपतिव्रताः ॥ दौर्भाग्यं घ्नन्तु ते सर्वं शान्तिंयच्छंतु सर्वदा॥४॥
- पादगुल्फोरुजंघास्य नितंबोदरनाभिषु ॥ स्तनोरुबाहु हस्ताग्र ग्रीवास्यंसांगसंधिषु ॥५॥
- नासाललाटकर्णेभ्रू केशांतेषु च यत्स्थितम् ॥ तदापोघ्नन्तु दौर्भाग्यं शान्तिंयच्छंतु सर्वदा ॥६॥
तत्पश्चात आचार्य यजमान के पश्चिम में पूर्वाभिमुख होकर बांये हाथ में त्रिकुशा लेकर कुशा से यजमान के सिर का स्पर्श करके औदुम्बर (गूलर) के स्रुवा (लकड़ी) से यजमान के सिर पर सरसों तेल की 6 आहुति दे :
- ॐ मिताय स्वाहा। इदं मिताय ॥
- ॐ संमिताय स्वाहा । इदं संमिताय ॥
- ॐ शालाय स्वाहा । इदं शालाय ॥
- ॐ कटङ्कटाय स्वाहा । इदं कटङ्कटाय ॥
- ॐ कूष्मांडाय स्वाहा । इदं कूष्मांडाय ॥
- ॐ राजपुत्राय स्वाहा । इदं राजपुत्राय ॥
तत्पश्चात आचार्य अग्नि के समीप आकर हवन विधि के अनुसार पवित्री निर्माण पूर्वक आज्योत्पवनादि करके सोमाय स्वाहा तक 4 आज्याहुति प्रदान करे :
- पवित्री निर्माण – पवित्री निर्माण हेतु आसादित पवित्रिकरण २ कुशाओं को ग्रहण करे फिर मूल से प्रादेशप्रमाण भाग पर पवित्रच्छेदन ३ कुशाओं को रखकर दक्षिणावर्त २ बार परिभ्रमित करके नखों का प्रयोग किये बिना २ कुशों का मूल वाला प्रादेशप्रमाण भाग तोड़ ले शेष का उत्तर दिशा में त्याग करे। ग्रहण किये हुए प्रादेशप्रमाण २ कुशाओं में दक्षिणावर्त ग्रंथि दे । प्रोक्षणीपपात्र को प्रणिता के निकट रखे।
- पवित्रीहस्त प्रणीता से प्रोक्षणी में ३ बार जल देकर पवित्री को उत्तराग्र करके अंगूठा व अनामिका से ३ बार प्रणीता का जल ऊपर उछाले या मस्तक पर प्रक्षेप करे।
- प्रोक्षणीपात्र को बांये उठाकर दाहिने हाथ से अनामिका और अंगूठे द्वारा पवित्री ग्रहण किये हुए जल को ३ बार ऊपर उछाले। प्रणीतापात्र के जल से प्रोक्षणी को ३ बार सिक्त करके प्रोक्षणी के जल से होमार्थ आसादित-अनासादित सभी वस्तुओं को सिक्त करके अग्नि व प्रणिता के मध्य भाग में कुशा के आसन पर प्रोक्षणीपात्र को रख दे।
- घृतपात्र में घृत डालकर घृतपात्र को प्रदक्षिणक्रम से घुमाते हुए अग्नि पर चढ़ाये। २ प्रज्वलित तृण को प्रदक्षिणक्रम से घृत के ऊपर घुमाकर (घृत में सटाये बिना ऊपर घुमाकर) अग्नि में प्रक्षेप करे दे । चरु हो तो सामान विधान करे। दाहिने हाथ से स्रुव को ३ बार अग्नि पर तपाकर बांये हाथ में रखे, दाहिने हाथ से सम्मार्जन कुशा लेकर कुशाग्र से स्रुव के ऊपरी भाग का मूल से अग्रपर्यन्त सम्मार्जन करे और कुशमूल से स्रुव के पृष्ठभाग का अग्र से मूलपर्यन्त मार्जन करके प्रणीतोदक से ३ बार सिक्त करके स्रुव को दाहिने हाथ में लेकर पुनः ३ बार तपाकर दक्षिणभाग में कुशा के ऊपर रखे। स्रुचि के लिये भी स्रुववत् विधि।
- घृतपात्र को प्रदक्षिणक्रम में अग्नि से उतारकर आगे में रखे (चरु हो तो उसे भी)। पूर्व की भांति पवित्री से घृत को भी ३ बार ऊपर उछाले या मस्तक पर प्रक्षेप करे। तत्पश्चात घृत को भलीभांति देखे, कुछ अपद्रव्यादि हो तो निकाल दे। पुनः प्रोक्षणी के जल को ३ बार ऊपर की पूर्ववत उछाले।
- फिर बांये हाथ में उपयमन कुशा ग्रहण करके, उठकर ३ घृताक्त समिधा प्रजापति का ध्यानमात्र करते हुए अग्नि में प्रक्षेप करे।
- पर्युक्षण – फिर बैठकर पवित्रिहस्त प्रोक्षणी से जल लेकर सभी सामग्रियों सहित अग्नि का प्रदक्षिणक्रम से पर्युक्षण करे। ३ बार पर्युक्षण करके पवित्री को प्रणीतापात्र में रख दे।