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प्रगति या पतन? शोधपरक विश्लेषण: कैसे आधुनिकता ने छीना हमारा स्वास्थ्य और सुख-चैन – Modern vs. Traditional Lifestyle

प्रगति या पतन? शोधपरक विश्लेषण: कैसे आधुनिकता ने छीना हमारा स्वास्थ्य और सुख-चैन - Modern vs. Traditional Lifestyle प्रगति या पतन? शोधपरक विश्लेषण: कैसे आधुनिकता ने छीना हमारा स्वास्थ्य और सुख-चैन - Modern vs. Traditional Lifestyle

हम प्रतिदिन आधुनिकता (Modern vs. Traditional Lifestyle) की रट तो लगाते हैं किन्तु यह विचार तक नहीं कर पाते हैं कि हमसे क्या छिन गया है। हमारी हम सुविधाभोगी तो बन गए हैं किन्तु हमारा स्वास्थ्य, मन की शांति, पारिवारिक सुख आदि हमसे छिन चुका है और हम सुखी होने, आधुनिक होने का दम्भ भर रहे हैं। आज का मानव एक ऐसी अंधविकास का भाग बन गया है जहाँ भौतिक सुख-सुविधाओं के अंबार तो हैं, लेकिन मन की शांति और शरीर का स्वास्थ्य समाप्त हो चुका है। ‘आधुनिकता’ जिसे हम प्रगति का पर्याय मानते थे, वह आज हमारे अस्तित्व के लिए एक चुनौती बन गई है।

यदि हम प्राचीन जीवन शैली और आधुनिक जीवन शैली का शोधपरक विश्लेषण करें, तो स्पष्ट होता है कि हम विकास की राह पर चलते-चलते विनाश के निकट पहुँच गए हैं। इस विषय पर विस्तृत चिंतन की आवश्यकता है किन्तु दुर्भाग्य यह भी है कि लोगों की चिंतन-मनन की शक्ति भी छिन चुकी है।

प्रगति या पतन? शोधपरक विश्लेषण: कैसे आधुनिकता ने छीना हमारा स्वास्थ्य और सुख-चैन – Modern vs. Traditional Lifestyle

“कभी साधन कम थे किन्तु साधना अधिक थी जीवन में शान्ति थी, आज साधन तो असीमित हैं किन्तु साधना लुप्त हो गयी है, शान्ति लुट गयी है”

इस विषय में हम चर्चा को आगे बढ़ायें उससे पूर्व थोड़े आँकड़ों के साथ इस विषय को समझना आवश्यक है कि हमारा क्या था जो अब हमारे पास नहीं है और उसका कारण भी हम स्वयं ही हैं। प्राचीन और आधुनिक जीवन शैली के बीच का अंतर केवल समय का नहीं, अपितु जीवनचर्या का है, सिद्धांतों और मूल्यों का है। नीचे दी गई तालिका इन दोनों के मुख्य अंतरों को स्पष्ट करती है:

प्राचीन और आधुनिक जीवन शैली एवं प्रभाव : एक शोधपरक तुलना

आधारप्राचीन जीवन शैलीआधुनिक जीवन शैली
दिनचर्याप्रकृति के साथ समन्वय (ब्रह्म मुहूर्त में जागना और रात में सबेरे सोना)।प्रकृति के विरुद्ध (देर रात तक जागना, देर से उठना)।
खान-पानशुद्ध, सात्विक और मौसमी आहार अर्थात आरोग्यवर्द्धक आहार।प्रसंस्कृत (Processed), जंक फूड और रसायनों युक्त भोजन अर्थात विषाक्त आहार।
शारीरिक श्रमदैनिक कार्यों में स्वाभाविक रूप से पर्याप्त व्यायाम।मशीनों पर निर्भरता, गतिहीन जीवन शैली (Sedentary Lifestyle)। स्वाभाविक व्यायाम का अभाव और व्यायाम के लिये समयाभाव, व्यायाम तब करते हैं जब डॉक्टर द्वारा सुझाया जाता है।
पारिवारिक संबंधसंयुक्त परिवार, आपसी प्रेम और सामूहिकता।एकल परिवार, अकेलापन और आभासी दुनिया (Social Media) की निर्भरता। वर्त्तमान में तो लिव-इन और समलैंगिकता एकल परिवार को भी नष्ट करने का कारक बनकर उभरने लगे हैं। एकल परिवार का भी अस्तित्व संकट में है।
सामाजिक संबंधविभिन्न वर्ण और जातियों में भी परस्पर समन्वय और सोहार्द्र।विभिन्न वर्ण और जातियों में कलह और विवाद, गृहयुद्ध की आहट।
मानसिक स्थितिसंतोष, धैर्य और अल्प तनाव। चिंतन-मनन की शक्ति और सोचने का अवकाश।प्रतिस्पर्धा, अवसाद और निरंतर चिंता। चिंतन-मनन की शक्ति और अवकाश दोनों का ह्रास।
स्वास्थ्यपथ्य से आरोग्य की प्राप्ति। दीर्घायु और स्वस्थ जीवन।दबाओं पर जीवन निर्भर, जीवन का एक अंग बन चुकी है दबा और निरंतर चिकित्सक का परामर्श। अस्पताल घर जैसे लगते हैं। बिना दबा के जी ही नहीं सकते।

“प्राचीन जीवन में ‘साधन’ कम थे पर ‘साधना’ अधिक थी, आज ‘साधन’ असीमित हैं पर ‘शांति’ शून्य है।”

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर स्थिति पूर्णतः स्पष्ट हो जाती है कि आधुनिकता के नाम पर हमसे क्या-क्या छिन गया है किन्तु दुर्भाग्य तो यह है कि हमारी चिंतन-मनन की शक्ति भी छिन चुकी है और न ही अवकाश है कि हम इसका चिंतन भी कर पायें। यह स्थिति कब तक बनी रहेगी क्या विनाश होने तक अथवा सचेत होंगे यह गंभीर प्रश्न है और सरकारों के लिये गंभीरता से विचार करने वाला है क्योंकि सरकारें-मीडिया-बौद्धिक वर्ग आदि ये नहीं कह सकते कि हमारे पास अवकाश नहीं है, अरे तुम तो इन्हीं कार्यों के लिये हो।

प्राचीन और आधुनिक जीवन शैली एवं प्रभाव : एक शोधपरक तुलना
प्राचीन और आधुनिक जीवन शैली एवं प्रभाव : एक शोधपरक तुलना

ध्यातव्य : जब हम सरकार कहते हैं तो सरकार का तात्पर्य राज्य के तीनों अंग हैं कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका।

आधुनिकता के दुष्प्रभाव: शरीर और मन पर प्रहार

आधुनिकता ने हमें ‘स्मार्ट’ तो बनाया हैं ऐसा दम्भ करना हमें सिखा दिया गया है और हम दम्भ भरते भी हैं, लेकिन हमारे जीवन को ‘जटिल’ और दुःखमय बना दिया है। हम शारीरिक और मानसिक दोनों ही प्रकार से दुःखमय जीवन जीने लगे हैं और हमारे भीतर आधुनिकता का ऐसा दम्भ भर दिया गया है कि हम इसी में मग्न होकर “नाली का कीड़ा” बनते जा रहे हैं। इसके दुष्प्रभाव आज समाज के हर वर्ग में देखे जा सकते हैं:

स्वास्थ्य का पतन: प्राचीन काल में लोग दीर्घायु होते थे अर्थात लंबी आयु जीते थे, जबकि आज जीवन रसायनों और दवाओं के सहारे टिका है। मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग, नेत्र विकार, बाल पकना या झड़ना आदि अब ‘जीवनशैली जन्य रोग’ बन चुके हैं। और इसका तात्पर्य है कि हमसे हमारे स्वास्थ्य को हमारी जीवनशैली ने छीन लिया है। कैंसर की चिकित्सा भले अच्छी होती जाये किन्तु इसका प्रसार बढ़ता ही जा रहा है, अल्पायु में भी होने लगा है।

स्वास्थ्य संबंधी विषयों से संबंधित बाल्यावस्था के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य तो अब भी स्मृति में बने हुये हैं : लोग दातुन के लिये विचार किया करते थे, जैसे अपामार्ग (चिड़चिड़ी), अजान का या नीम, बबूल आदि का कौन श्रेष्ठ ? परिस्थति विशेष में या विशेष लाभ के लिये किस दातुन का उपयोग करें ? और उन लोगों के दांत वृद्धावस्था तक स्वस्थ रहते थे। इसी प्रकार ऐसी जीवनशैली थी कि आंख, कान भी वृद्धावस्था तक साथ देती थी और आज भी ऐसे ढेरों लोग जीवित हैं। किन्तु वर्त्तमान पीढ़ी में जिस पर आधुनिकता की जितनी गहरी छाप है उतना ही गंवाता जा रहा है।

जो भी औसतन ५० वर्ष की आयु के हैं उन्हें ज्ञात होगा कि उनके बाल्यकाल में नवजात शिशु को कैसे स्वस्थ रखा जाता था। स्वास्थ्य के विषय में नवजात शिशु सर्वाधिक सवेदनशील होता है और प्राचीन काल में माँ के आहार (पथ्य) द्वारा भी बच्चे के स्वास्थ्य को उत्तम बनाया जाता था और वो भी गर्भावस्था से ही। तेल की मालिश, जायफल, शिरीष, आदि का प्रयोग करके बच्चे के स्वास्थ्य को उत्तम रखा जाता था और घर में ही चिकित्सा हो जाती थी।

आधुनिकता के दुष्प्रभाव: शरीर और मन पर प्रहार

वहीं आधुनिकता के दुष्प्रभाव को स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है कि बच्चे के लिये गोली और इंजेक्शन जन्म के पश्चात् नहीं, गर्भ में आने के साथ ही और कई बार तो गर्भ में आने से पूर्व भी आरम्भ कर दिया जाता है।

पर्यावरणीय असंतुलन: आधुनिकता की भूख ने जंगलों को कंक्रीट के जंगलों में बदल दिया है। प्रदूषित हवा और दूषित पानी आधुनिकता का सबसे बड़ा उपहार है। अब तो खेत भी दूषित हो गये हैं और उसका विष अन्न में भी पहुंच रहा है घास-भूसों में भी आ चुका है और गाय से प्राप्त होने वाला दूध जिसे अमृत कहा जाता था वो भी विषाक्त होता जा रहा है।

स्वास्थ्य सम्बन्धी दुष्प्रभावों में प्रदूषित पर्यावरण का ही सर्वाधिक योगदान है और प्रदूषित पर्यावरण का कारण प्रत्यक्षतः तो कल-कारखाने, वाहन आदि हैं अर्थात मुख्य रूप से उद्योग प्रतीत होता है। किन्तु परोक्षतः हमारी आधुनिक जीवनशैली ही है पेस्ट और ब्रश, साबुन आदि का उपयोग तो हमारी जीवनशैली का ही अंग बन गया है न, सीमेंट और कंक्रीट के बने पक्के मकान तो हमें ही चाहिये न, वाहन से हमको ही घूमना है न, रासायनिक उर्वरक का प्रयोग तो हम ही कर रहे हैं न ।

आधुनिकता के दुष्प्रभाव
आधुनिकता के दुष्प्रभाव

यदि ये हमारी जीवनशैली के अंग न बनते तो ऐसे कल-कारखाने न होते और प्रदूषण भी नहीं होता। ये सभी दोहरी मारक क्षमता रखते हैं प्रत्यक्षतः अर्थात उपयोग जन्य दुष्प्रभाव और परोक्षतः अर्थात इनके कल-कारखानों से होने वाला प्रदूषण।

संबंधों से विरक्ति: तकनीक ने दूर बैठे लोगों को आभासी दुनियां में पास तो लाया, लेकिन निकट बैठे लोगों के बीच की दूरी भी बढ़ा दी है, संबंधों की दूरी भी बढ़ा दी है। पहले लोग परस्पर मिलते थे, संवाद करते थे, एक-दूसरे को देने के लिये इतना अवकाश होता था कि लोग ऊब जायें।

शास्त्रों में प्रिय व्यक्ति का मिलन भी अमृत तुल्य ही कहा गया है “अमृतं प्रिय दर्शनं” और यह भी हमारे उत्तम स्वास्थ्य के एक महत्वपूर्ण भाग था क्योंकि अमृततुल्य की प्राप्ति होती थी। आज संवाद का स्थान ‘नोटिफिकेशन’ ने ले लिया है। हम सोशलमीडिया अर्थात मोबाईल और लैपटॉप से जकड़े हैं जो निःसंदेह हमारे शारीरिक कर मानसिक स्वास्थ्य पर भी दुष्प्रभाव डाल रहा है, आंखों पर तो पुछिये ही मत।

प्राचीन जीवन में 'साधन' कम थे पर 'साधना' अधिक थी, आज 'साधन' असीमित हैं पर 'शांति' शून्य है

आज के समय में शब्द के रूप में प्यार, लव, इश्क आदि शब्दों सुनकर तो बोर होने लगे हैं किन्तु प्रेम ढूंढने पर भी नहीं मिल पा रहा है। हमारी संस्कृति में शब्द बोलकर प्रकट करने की पद्धति नहीं थी, सम्मान और त्याग आदि के माध्यम से प्रेम प्रकट किया जाता था। किन्तु आज शब्द बोलकर व्यक्त करते हैं और जब सम्मान-त्याग आदि की बात आये तो व्यक्तिवादी बन जाते हैं, अपने आत्मसम्मान की बात करते हैं।

स्त्रियों को किस आत्मसम्मान के लिये नौकरी करने की आवश्यकता आ पड़ी है, सीधा तात्पर्य है कि व्यक्तिवादी सोच के कारण। ४०-५० वर्ष पूर्व तो पुरुष वर्ग भी नौकरी को हीन भावना से देखा करते थे, सरकारें पकड़-पकड़ कर ले जाती थी और वो भी भाग जाते थे।

“हाथों में स्मार्टफोन और आंखों में थकान—यही है आधुनिक मानव की नई पहचान।”

मानसिक असुरक्षा: हर समय कुछ खो देने का डर और दूसरों से आगे निकलने की होड़ ने मनुष्य को एक ‘मशीन’ बना दिया है, जिसके पास भावनाओं के लिए समय नहीं है। जीवन बीमा होना अच्छी बात है किन्तु इसका तात्पर्य क्या है ? हमने इतना तकनीकि विकास कर लिया है कि मृत्यु की संभावना भी कई गुणा बढ़ गयी है अर्थात जीवन खोने का डर भी बढ़ गया है। अर्थलोलुपता इतनी बढ़ गयी है कि हर कोई दूसरे को वैधानिक रूप से लूटने पर तुला हुआ है तो फिर हर कोई खोने के डर से डरा हुआ भी है।

सोचिये न “डिजिटल ऐरेस्ट” के माध्यम क्या है ? पता नहीं कब खाते से बैलेंस उड़ जाये, पता नहीं कहां से मोबाईल खो जाये, पता नहीं कब-कौन पत्नी-बेटी आदि को लेकर भाग जाये, पता नहीं पत्नी ही कब हत्या कर दे, पता नहीं बच्चे का कब त्याग कर भाग जायें। पता नहीं कब “राइट एक्शन डे” की पुनरावृत्ति हो जाये और जिहादी घर-बार सब लूट लें। पता नहीं कब कोई जिहादी हमारी संपत्ति को वक्फ प्रॉपर्टी बना दे और हम भटकते रहें। ऐसे ही नाना प्रकार की चिंताओं से तो भरे हैं किन्तु इसका निराकरण नहीं ढूंढ सकते, इसपर चिंतन-मनन नहीं कर सकते बस भयभीत रह सकते हैं।

“गजबा-ए-हिन्द” का भय तो सबको है और इसपर चिंतन और प्रयास किया जा रहा है कि यह न हो। जिहादियों से जो अन्य भय है उसके ऊपर भी सार्थक प्रयास किया जा रहा है किन्तु देशभर के लोगों को यह भय तो है ही न । (जिहादियों को छोड़कर) किन्तु जातिवाद की जो घृणित राजनीति की जा रही वह जो जातीय संघर्ष का भय भी उत्पन्न कर चुका है।

निष्कर्ष: प्राचीन मार्ग ही सुख का आधार

शोध और विश्लेषण यह सिद्ध करते हैं कि प्राचीन जीवन शैली केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक पद्धति थी। वह जीवन ‘सादा जीवन – उच्च विचार’ पर आधारित था, जहाँ मनुष्य अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखता था। प्राचीन जीवनशैली इस सूत्र पर आधारित था “पहला सुख निरोगी काया” इसके विपरीत, आधुनिक जीवन शैली ‘भोग’ और ‘प्रदर्शन’ पर आधारित है, जिसने हमें सुविधाओं का दास बना दिया है।

सादा जीवन - उच्च विचार
सादा जीवन – उच्च विचार

हम गद्दे के पीछे भागने लगे क्यों नींद चाहिये ये भूल गये।
विकास की अंधी आंधी में प्रकृति संस्कृति से दूर हुये।

आज हम महँगे गद्दों पर नींद की गोलियां खाकर सो रहे हैं, जबकि हमारे पूर्वज धरती पर गहरी नींद सोते थे। आज हमारे पास दुनिया भर की जानकारी है, लेकिन स्वयं का ज्ञान नहीं है। अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आधुनिकता की इस चमक-धमक ने हमारे जीवन को वास्तव में मुहाल कर दिया है। यदि हमें पुनः सुख और शांति की ओर लौटना है, तो हमें अपनी जड़ों की ओर मुड़ना ही होगा और प्राचीन जीवन मूल्यों को आधुनिक संदर्भ में अपनाना होगा।

निष्कर्ष: प्राचीन मार्ग ही सुख का आधार
निष्कर्ष: प्राचीन मार्ग ही सुख का आधार

वो मिट्टी की सोंधी सुगंध, वो अपनों का साथ था
दरिद्र भले थे पर ओठों पर हंसी-अट्टहास था।
थी आंखों में चमक पर आज कंक्रीट के जंगल हैं
और सुविधाओं की भरमार है,
“पर सच तो ये है कि, ये आधुनिकता की मार है।”

हमें विचार करना ही होगा कि हम प्रकृति और संस्कृति से जुड़ें और आधुनिक विकास के साथ संतुलन स्थापित करने का प्रयास करें। अपनी वास्तविक आवश्यकताओं को समझें और उसके लिये प्रकृति और संस्कृति को किसी प्रकार की हानि न पहुचें इसका भी विचार रखें। हम प्रगति पथ पर आगे बढ़ें किन्तु उद्देश्य को ध्यान में रखते हुये। उद्देश्य को भूलने का ही परिणाम है कि हम पथभ्रष्ट हो गए और दुष्परिणाम भोग रहे हैं।

॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

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कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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