“प्रत्याम्नाय वह सेतु है जो हमारी अक्षमता और शास्त्रीय मर्यादा के बीच की खाई को भरता है।”
कर्माधिकार के विषय में हमने विस्तृत चर्चा किया है और यह स्पष्ट हो गया है कि कर्म करने के लिये कर्माधिकार होना आवश्यक है। यदि कर्माधिकार न हो तो किया गया कर्म निष्फल होता है। द्विजातियों के लिये तो कर्माधिकार हेतु वेदाधिकार सुरक्षित रखना भी अनिवार्य होता है, क्योंकि द्विजातियों को वेद मंत्रों द्वारा ही कर्म करना चाहिये। समस्या यह है कि वेदाधिकार हो अथवा कर्माधिकार लोगों की आधुनिक जीवनशैली ने नष्ट कर दिया है और पुनः प्राप्ति के लिये जो विधान है उसकी तो कोई चर्चा करता ही नहीं है। ऐसे में विकल्प को ढूंढने का ही मार्ग शेष बचता है और आज हम इसी विषय को समझेंगे।
यह आलेख व्रात्यता, अनाश्रमी दोष, शिखा-त्याग और अभक्ष्य भक्षण जैसे गंभीर दोषों का विश्लेषण करते हुए ‘अनुग्रह प्राप्ति’ और ‘गो-दान निष्क्रय’ के माध्यम से कर्माधिकार की पुनर्प्राप्ति का शास्त्रीय मार्ग प्रशस्त करता है।
कर्माधिकार का विकल्प – प्रत्याम्नाय
द्विजातियों को संस्कार के द्वारा वेदाधिकार प्राप्त होता है और तदनन्तर वेद मंत्रों से ही कर्म का विधान मिलता है। किन्तु यह अनिवार्य नहीं कि वेदाधिकार होने पर ही कर्माधिकार होगा हां यह अवश्य है कि यदि वेदाधिकार न हो तो वेद मंत्रों से रहित कर्माधिकार होता है।
किन्तु इसमें एक तथ्य यह भी है कि सभी प्रकार के कर्माधिकार नहीं होते हैं मात्र अपरिहार्य कर्माधिकार ही होते हैं, यथा यदि अनुपनीत पुत्र हो तो भी माता-पिता के श्राद्ध का अधिकार होता है किन्तु मन्त्ररहित (वेदमन्त्र से रहित) श्राद्ध का, किन्तु विवाह, यज्ञादि का अधिकार ही नहीं होता है। द्विजाति यदि व्रात्य हो जाये तो भी विवाह-यज्ञादि का अधिकार समाप्त हो जाता है।
कर्माधिकार अभाव कैसे ?
हम वैकल्पिक कर्माधिकार को समझने का प्रयास करें उससे पूर्व हमें उन महत्वपूर्ण तथ्यों को प्रामाणिक रूप से समझना आवश्यक हो जाता है जिससे यह सिद्ध होता है कि वर्त्तमान में यदि हमारे उपनयन हो भी गए हैं तो प्रतीकात्मक निर्वहन मात्र किया गया है वास्तव में अधिकार प्राप्त ही नहीं हुआ है। यदि प्रतीकात्मक निवर्हन के आधार पर वेदाधिकार और कर्माधिकार को सिद्ध कर भी लें तो आगे हमने उसका १% भी संरक्षण नहीं किया है।
जब हमने स्वयं ही अपने वेदाधिकार और कर्माधिकार का परित्याग कर दिया है तो हमें किसी न किसी विकल्पात्मक आधार की ही आवश्यकता होती है अर्थात एक मात्र मार्ग ही शेष बचता है। यद्यपि प्रायश्चित्त पूर्वक पुनर्संस्कार के माध्यम से प्राप्ति संभव है किन्तु वो भी १०-२० प्रतिशत मात्र को होता है किन्तु उन्हें भी इसका ज्ञान नहीं है और ज्ञान होने पर भी प्राप्त करके सुरक्षित नहीं रख सकते। वर्त्तमान जीवनशैली ही ऐसा है कि संभव नहीं भी कह सकते हैं।

यदि सरल शब्दों में व्यक्त करें तो एक ही अवस्था में संभव है और वो यह है कि ५ दशक पूर्व की जो जीवनशैली थी उसे अपनायें तो ही वेदाधिकार और कर्माधिकार को सुरक्षित रखा जा सकता है।
प्रतीकात्मक निवर्हन के उदाहरण
वर्त्तमान काल में कर्माधिकार ९९% समापन हो चुका है और इस विषय को समझना भी आवश्यक है।
हम कर्माधिकार के विकल्प पर आएंगे किन्तु पहले आवश्यकता को समझना अनिवार्य है। कुछ चर्चायें नित्यकर्म का अभाव, पाप संलग्नता आदि की चर्चा पूर्व में ही की जा चुकी है एवं संबंधित आलेखों को यहां संलग्न भी किया जा रहा है ताकि जिन्हें आवश्यक लगे अवलोकन कर सकें।
परिमार्जन रहित संस्कार लोप
षोडश संस्कार तो सभी जानते हैं किन्तु व्यवहार में कितने विद्यमान हैं एक बार सोचिये ? प्रतीकात्मक रूप से ६ संस्कार विद्यमान हैं – मुंडन, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन, विवाह और दाह। शेष १० संस्कार कहां गये ? यदि नहीं कर रहे हैं तो संस्कारलोप हो रहा है अथवा नहीं ? मुण्डनपूर्व के सभी संस्कार विलुप्त हो गए हैं, कुछ अपवाद हो सकते हैं। क्या कभी इसके बारे में कोई चर्चा होती है कि उक्त स्थिति में क्या करें ? क्या संस्कारलोप होना उचित है अथवा कोई विकल्प भी है?
निर्णयसिन्धु, स्मृति मुक्तावली आदि में शौनक वचन कहकर प्राप्त होता है :
आरभ्याधानमाचौलात् कालेऽतीते तु कर्मणाम्।
व्याहृत्याग्निं तु संस्कृत्य हुत्वा कर्म यथाक्रमम्॥
एतेष्वेकैकलोपे तुं पादकृच्छ्रं समाचरेत्।
चूडायामर्धकृच्छ्रं स्यादापदि त्वेवमीरितम्।
अनापदि तु सर्वत्र द्विगुणं द्विगुणं चरेत्॥
स्मृत्यर्थसार का कहना है कि उपनयन को छोड़कर यदि अन्य संस्कार निर्दिष्ट समय पर न किये जायें तो व्याहृतिहोम के उपरान्त ही वे सम्पादित हो सकते हैं। यदि किसी आपत्ति (विघ्नादि) के कारण कोई संस्कार समय से सम्पादित न हो सका; तो पादकृच्छ्र नामक प्रायश्चित्त करना चाहिये।
इसी प्रकार समय पर चौल न करने पर अर्घ-कृच्छ्र करना पड़ता है। यह व्यवस्था आपत्ति में है और यदि बिना के आपत्ति के जान-बूझकर संस्कार न किये जायें तो दूना प्रायश्चित्त करना पड़ता है। इस विषय में निर्णयसिन्धु ने शौनक के उपरोक्त श्लोक उद्धृत किये हैं।
अब देखिये हम जिस कर्माधिकार के विकल्प की बात कर रहे हैं उसकी आवश्यकता तो यहीं से आरम्भ हो जाती है। जो संस्कार छूट गये हैं उनको करे या न करे इस विषय में अनेकों पक्ष हैं और कुछ संस्कार तो किये ही नहीं जा सकते, जिनको करना संभव ही नहीं जैसे गर्भाधान तो कैसे करें ? नामकरण में तो ऐसा हो सकता है कि पुनः कर लें, अन्नप्राशनादि व्यावहारिक रूप से लगता है की सम्भव हो सकता है किन्तु जो पूर्व से अन्नभक्षण कर रहा है उसका अन्नप्राशन कैसे किया जा सकता है ?
इसी प्रकार मुंडन में जन्म से ही विचार करे तो तृतीय वर्ष उत्तम होता है और पंचम और सप्तम वर्ष में मध्यम एवं गर्भ से विचार करने पर और नवम और एकादश वर्ष में अधम होता है। किंचित मतान्तर भी होते हैं हमें इन निर्णयों का निष्कर्ष नहीं निकलना है अपितु मूल विषय पर ही स्थिर रहना आवश्यक है।
उपनयन के समय भी मुंडन किये जा सकते हैं किन्तु यदि अधम काल का भी अतिक्रमण हो गया हो तो प्रायश्चित्त का वर्णन मिलता है। मुंडन का तात्पर्य चूडाकरण है न कि जो व्यवहार में देखने को मिल रहा है। जा प्रायश्चित्त नहीं कर सकते तो कोई विकल्प भी क्यों नहीं ढूंढते प्रश्न यह है।
यदि ये विचार-विमर्श भी नहीं कर पाते हैं तो यजमान की बात कौन करे कराने वाले पंडित भी अनधिकारी हैं, क्योंकि उनको तो ज्ञान होना ही चाहिये न, वो तो मार्गदर्शन करने के लिये ही आमंत्रित किये जाते हैं न।
यदि कर्मकांडी ही मार्गदर्शन न कर रहा हो तो किसका दोष ? योग्य कर्मकांडी (विद्वान ब्राह्मण) हों तो ही उचित मार्गदर्शन कर सकते हैं अयोग्य हों तो नहीं कर सकते। आमंत्रित करने वाला तो इतना अज्ञानी है कि वो योग्य-अयोग्य का भेद भी नहीं जानता-समझता। इस दोष का निर्णय हम यहां नहीं कर सकेंगे कि उक्त दोष यजमान का अथवा मूर्ख कर्मकांडी का अथवा दोनों का किसका होगा ? किन्तु हमारा मूल प्रश्न तो यहां पुनः स्थापित हो रहा है कि कर्माधिकार किसे ? यदि कर्माधिकारी होते तो इसका विचार करते न।
व्रात्य दोष
इसी प्रकार आगे उपनयन का काल भी शास्त्रों ने निर्धारित कर रखा है, ब्राह्मणादि के लिये गर्भ से क्रमशः ८, ११ और १२ वर्ष अधिकतम में इसका दूना अर्थात १६, २२ और २४ वर्ष तक कहा गया है। यदि अधिकतम आयु में भी उपनयन न कर सके तो वह बालक व्रात्य हो जाता है, व्रात्य शब्द तो अब कुछ वर्षों में चर्चा का विषय बन गया है और कुछ लुटेरे व्रात्यता निवारण के नाम पर भी लूटने का कार्य कर रहे हैं, इससे अच्छा तो १ – २ दशक पूर्व ही था जब व्रात्य की चर्चा भी विलुप्त थी। इनका ध्येय व्रात्यता को रोकना न तो था और न है, अपितु व्रात्यता के नाम पर लूटना है।
व्रात्य के लिये क्या विधान किया गया है, व्रात्य क्या करे और क्या न करे कभी शास्त्रपरक चर्चा होती है ? क्या इन व्रात्यों ने यदि विवाह के समय कुछ दिन पूर्व अथवा विवाह के ही दिन किसी भी प्रकार से जनेऊ पहन लिया तो इसके व्रात्यता का निवारण हो गया? क्या वेदाधिकार और कर्माधिकार प्राप्त हो गया ?
“अत ऊर्द्ध्वं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः।
सावित्रीपतिता व्रात्या भवन्त्यार्य्यविगर्हिताः ॥” मनुः
आगे प्रश्न व्रात्यता निवारण का शास्त्र सम्मत विधान (प्रायश्चित्त) जो है वो तो करने से रहे अर्थात नहीं करेंगे जानकर भी क्या करें ? यदि जानना हो तो व्रात्य विषयक चर्चा पूर्व में की जा चुकी है जिस आलेख को यहां संलग्न भी किया गया है, अवलोकन कर सकते हैं। इस आलेख में लगभग व्रात्य संबंधी सभी प्रकार के संशयों का निवारण हो जायेगा। यदि कोई संशय शेष बचे तो टिप्पणि में प्रश्न कर सकते हैं। अब तक यह स्पष्ट हो गया है कि द्विजातियों में एक बड़ा वर्ग व्रात्य हो चुका है क्योंकि अधिकांश का उपनयन तो २५ – ३० वर्षों में किया जाता है।
वृषलीपति, दुराचार
एवं आगे प्रश्न यह भी है कि जब भी उपनयन हुआ हो तब से कितने दिन संध्या वंदन आदि करता है अर्थात एक भी दिन नहीं। यदि संध्या वंदन आदि नित्यकर्म करते ही नहीं तो पुनः वो सूत्र “अनर्हः सर्वकर्मसु” सिद्ध हो जाता है, भले ही उचित काल में उपनयन हुआ हो अथवा व्रात्य हो चुका हो।
इसी प्रकार विवाह में वृषलीपति का अवलोकन किया जा सकता है अन्यान्य अधिक चर्चा नहीं की जा रही है, संकेत मात्र किया गया है। इसी प्रकार अंतर्जातीय विवाह को भी राजकीय प्रोत्साहन प्रदान करके बढ़ाया जा रहा है किन्तु इसका दुष्प्रभाव आगे भी होता है जिसको समझना चाहिये। साथ ही दुराचार के दोष को भी समझना होगा नई पीढ़ी के बारे में वास्तविक तथ्य यदि लिखा जाय तो बहुत ही कड़वा होगा।
यः स्वकर्म्म परित्यज्य यदन्यत् कुरूते द्विजः । अज्ञानाद्यदि वा मोहात् स तेन पतितो भवेत् ॥ दक्षसंहिता २/३
अनाश्रमी
आगे एक अन्य दोष भी उपस्थित होता है यदि सामान्य रूप से धर्माचरण करने वाला परिवार हो तो भी और वो है अनाश्रमी होने का दोष। अनाश्रमी होने का तात्पर्य है कि उपनयन के पश्चात् चार आश्रमों में से किसी न किसी एक आश्रम को ग्रहण करना चाहिये। यदि किसी भी आश्रम में न हों तो अनाश्रमी संज्ञक होते हैं।
चार आश्रम हैं – ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास। उपनयन के पश्चात् ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश करते हैं किन्तु समावर्तन में उसका समापन हो जाता है और अगला आश्रम है गृहस्थाश्रम जो विवाह से आरम्भ होता है। अर्थात समावर्तन और विवाह के मध्य का जो कालखण्ड होता है उस कालखण्ड में व्यक्ति अनाश्रमी संज्ञक होता है। इस काल में वह न तो ब्रह्मचारी होता है और न ही गृहस्थ।
अब प्रश्न आएगा कि ये सब तो जानते भी नहीं और कोई बताता भी नहीं तो प्रतिप्रश्न भी है कि आपने जानने का प्रयास ही कब किया था, एवं विद्वान ब्राह्मणों का आश्रय कब ग्रहण किया था जो उपदेश करते ? कर्मकाण्डी बनाकर तो उनको विख्यात कर दिया जिनका शास्त्रों से कोई संबंध ही नहीं था, शिक्षक होने का सेवकत्व प्राप्त था। वो कहां से बतायें क्योंकि उनको स्वयं ही तो ज्ञान नहीं है।
- अनाश्रमी के विषय में दक्ष का वचन इस प्रकार प्राप्त होता है : अनाश्रमी न तिष्ठेत्तु दिनमेकमपिद्विजः। आश्रमेण विना तिष्ठन्प्रायश्चित्तीयते हि सः॥ दक्षसंहिता १/१०
- पुनः मिताक्षरा में अनाश्रमी होने पर इस प्रकार प्रायश्चित्त का वर्णन प्राप्त होता है : अनाश्रमी संवत्सरं प्राजापत्यं कृच्छ्रं चरित्वाऽश्रममुपेयात् द्वितीये अतिकृच्छ्रं। तृतीये कृच्छ्रातिकृच्छ्रं। अत ऊर्ध्वं चान्द्रायणमितिहारीतोक्तेः ॥

ऊपर के प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि एक दिन भी अनाश्रमी न रहे। वर्ष पर्यन्त (१ संवत्सर) अनाश्रमी रहने पर प्राजापत्य, कृच्छ्र, २ संवत्सर में अतिकृच्छ्र, ३ संवत्सर में कृच्छ्रातिकृच्छ्र और इससे ऊपर चान्द्रायण करे। अर्थात अनाश्रमी रहने पर प्रायश्चित्त का विधान है और यहीं पर यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि कौन अनाश्रमी नहीं होता और यदि अनाश्रमी होता है तो इस प्रायश्चित्त का क्या ? कहीं चर्चा तो होती ही नहीं।
यहां एक प्रश्न उत्पन्न हो सकता है कि तब क्या वो ही सही है जो विवाह के दिन या कुछ दिन पूर्व उपनयन करता है ? अरे नहीं कैसी बात कर रहे हैं वो तो व्रात्य हो जाता है, ये अनाश्रमी वाली बात तो उसके लिये है जो व्रात्य होने से बच जाता है।
उपनयन का वर्त्तमान स्वरूप जो अवशेष मात्र है वो यही है कि उपनयन के दिन एक संस्कार नहीं ४ संस्कार होते हैं – चूडाकरण, उपनयन, वेदारम्भ और समावर्तन। यदि समावर्तन न हो और ब्रह्मचर्य धारण करे, विवाह वर्ष में कुछ दिन पूर्व समावर्तन करे तो अनाश्रमी वाले उक्त दोष से मुक्त रहेगा किन्तु ऐसा तो होता नहीं है। उपनयन के दिन ही समावर्तन (ब्रह्मचर्याश्रमत्याग) हो जाता है और विवाह पर्यन्त वह अनाश्रमी ही रहता है।
उद्देश्य इस समस्या को उठाना नहीं अपितु समस्या के निराकरण को ढूंढना है। व्रात्य हो अथवा अनाश्रमी; उचित निराकरण के बिना उसका तो विवाह में भी अधिकार सिद्ध नहीं होता ।
शिखा त्याग का प्रायश्चित्त
वर्त्तमान में यद्यपि शिखा धारण करने वालों की संख्या बढ़ती दिख रही है किन्तु क्या उसे शिखा धारण करने का ज्ञान है ? शिखा ग्रंथि कब करें और शिखा मुक्त (ग्रंथिमुक्त) कब करें (शिखा विधान) यह ज्ञान है ? अरे कोई ज्ञान नहीं है प्रतीकात्मक रूप से सनातनी सिद्धि के लिये ऐसा कर रहा है किन्तु शास्त्रप्रेरणा से रहित है, राजनीति प्रेरित है। चूडाकरण में ही शिखा धारण किया जाता है जब जब मन करे तब नहीं और चूडाकरण के पश्चात् शिखाच्छेदन का निषेध है।
अभी जो शिखा धारण कर रहे हैं ये तो वर्षों तक बारम्बार शिखाच्छेदन करते रहे हैं। बहुत लोगों की तो शिखा भी ऐसी होती है कि ग्रंथि ही न पड़े। बहुत लोग श्राद्ध में जब क्षौरकर्म करते हैं तब छोटी सी शिखा प्रतीत होती है। शिखाच्छेदन दोष और प्रायश्चित्त का एक प्रमाण :
शिखां छिन्दन्ति ये केचिद्वैराग्याद्वैरतोऽपि वा । पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः ॥
मोहाच्छिन्दन्ति ये केचिद्विजातीनां शिखां नराः। चरेयुस्ते दुरात्मानः प्राजापत्यं विशुद्धये ॥
लघुहारित स्मृति : १८-१९
यहां हम शिखा और शिखाच्छेदन विषयक निर्णय तो नहीं करने जा रहे हैं किन्तु जो स्पष्ट हो रहा है वो यह कि मोहादि के कारण यदि द्विजाति शिखाच्छेदन कर ले तो शुद्धिकरण हेतु प्राजापत्य/कृच्छ्र आदि का विधान मिलता है और पुनर्संस्कार (चूडाकरण) की भी बात कही गयी है। अब सोचने की बात यह है कि ९९ प्रतिशत से अधिक व्यक्ति तो इस श्रेणी में भी आ जाते हैं। यदि उन्होंने प्रजापत्यादि विधिपूर्वक नहीं किया तो वो शुद्ध ही नहीं हुआ। फिर अशुद्ध होते हुये वह कर्म का अधिकारी कैसे हो सकता है अर्थात उसका कर्माधिकार कैसे सुरक्षित रहा ?
पूर्वं व्रतं गृहीत्वा तु नाचरेत् काममोहितः । जीवन् भवति चाण्डालो मृतः श्वा चैव जायते ॥
छागलेय स्मृति
जिस व्रत को ग्रहण करे उसका समापन भी विधि पूर्वक करे अन्यथा अर्थात व्रत का निर्वहन न करने से “जीवन् भवति चाण्डालो मृतः श्वा चैव जायते” का विधान है। अब सोचिये शिखा धारण तो किया (चूडाकरण में) किन्तु निर्वहन नहीं किया। उपनयन तो हुआ ब्रह्मचर्य धारण तो किया किन्तु व्रत का पालन एक दिन भी नहीं किया, इसको शास्त्रों से ज्ञात करें कि ब्रह्मचर्याश्रम के क्या-क्या नियम हैं और कितने दिनों या वर्षों तक पालन करना चाहिये।
अभी क्या करते हैं प्रतीकात्मक वेदारम्भ हुआ और तत्काल ही समावर्तन हो गया तो ब्रह्मचर्य का पालन कितने दिन किया ? एक भी दिन नहीं ? यद्यपि ब्रह्मचर्य धारण और पुनः समावर्तन से ब्रह्मचर्य का समापन तो सिद्ध होता है किन्तु ब्रह्मचर्य का पालन ही असिद्ध हो जाता है।
पुनर्संस्कार (पुनरुपनयन)
इसी प्रकार पुनरुपनयन की भी अनेकों परिस्थितियां हैं जिनकी विस्तृत चर्चा तो यहां अपेक्षित नहीं है किन्तु संक्षेप में उन प्रमुख दोषों को जिससे सामान्यतः सभी दूषित हैं जानना अपेक्षित है। इसमें सर्वोपरि यह है की लोग अभक्ष्य के रूप में मांस-मत्स्य की चर्चा तो करते हैं जो वास्तव में शास्त्रानुसार अभक्ष्य है ही नहीं। किन्तु जो वास्तविक अभक्ष्य है उसे भर-भर कर भक्षण करते हैं और इसमें लहसुन, प्याज, गाजर, सलजम, कुक्कुरमुता (मशरूम) आदि भी आता है।

धूर्त्त वैष्णवों ने वैष्णवता का ऐसा प्रपञ्च रचा है कि जो वैष्णव मात्र के लिये निषिद्ध है उसे जनमानस के लिये निषिद्ध और अभक्ष्य सिद्ध कर दिया एवं जो जनमानस के लिये अभक्ष्य है उसकी चर्चा को ही समाप्त कर दिया। श्राद्ध में मत्स्य-मांसादि प्रयोग शास्त्रीय है अर्थात मत्स्य-मांस होना ही अभक्ष्यता का प्रमाण नहीं है अपितु मांसाहारियों के लिये अभक्ष्य मांस का भी वर्णन है अर्थात अभक्ष्य श्रेणी के अतिरिक्त अन्य भक्ष्य है।
शाकाहारियों के लिये सभी मांस अभक्ष्य हैं, किन्तु मांसाहारियों के लिये भक्ष्य और अभक्ष्य का विचार है अर्थात मांस मात्र ही अभक्ष्य की श्रेणी में नहीं आता हां शाकाहारियों, वैष्णवों के लिये अभक्ष्य अवश्य है। किन्तु लशुन, प्याज, गाजर, मशरूम आदि तो शाकाहारी और मांसाहारी सबके लिये अभक्ष्य है। इसको कोई अभक्ष्य क्यों नहीं कहता। जो मत्स्य-मांस को अभक्ष्य कहता है किन्तु वास्तविक अभक्ष्यों की चर्चा नहीं करता है निश्चय ही शास्त्रज्ञान से रहित है और धर्म के नाम पर राजनीति कर रहा है।
पलाण्डुं विड्वराहं च छत्राकं ग्रामकुक्कुटम् । लशुनं गृञ्जनं चैव जग्ध्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
याज्ञवल्क्य स्मृति १/१७६
लशुनं गृञ्जनं जग्ध्वा पलाण्डुं च तथा शुनम् । उष्ट्रमानुषकेभाश्वरासभीक्षीर भोजनात् ॥
उपनायं पुनः कुर्यात्तप्तकृच्छ्रं चरेन्मुहुः ॥ शातातप वचन (निर्णयसिन्धु)
अभक्ष्य के साथ-साथ प्रतिषिद्ध देशगमन, गधा-उष्ट्र आदि पर चढ़ना आदि भी अनेकानेक वर्णन मिलते हैं और इनमें भी प्रतिषिद्ध देश गमन तो सामान्य सी बात बन गयी है। पैसे हुये नहीं कि म्लेच्छादि देशों की यात्रा आरम्भ हो गयी। इन सभी परिस्थितियों में प्रायश्चित्त और पुनर्संस्कार (पुनरुपनयन) का विधान बताया गया है। अभक्ष्य-भक्षण और प्रतिषिद्ध देशगमन तो सामान्य सी बात हो गई है और सभी करते हैं फिर शुद्धि कहां धरी है, अर्थात कर्माधिकार कहां शेष है ? (प्रायश्चित्त और पुनर्संस्कार के अतिरिक्त)

कर्माधिकार रहित कर्म: एक भयावह सत्य
९९ प्रतिशत लोगों का वेदाधिकार और कर्माधिकार नष्ट हो चुका है किन्तु ये बातें तो कोई शास्त्रज्ञ ही बता सकता है न। टीवी पर दिखने वाले स्वघोषित धर्मगुरु/जगद्गुरु/कथावाचक आदि के वश का यह कार्य है ही नहीं। ये लोग तो राजनीति और व्यवसाय कर रहे हैं और इसी उद्देश्य से भगवा धारण करके अनाप-शनाप बकते रहते हैं।
यहीं पर आकर अब आगे यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि यदि ९९% लोग वेदाधिकार और कर्माधिकार से च्युत हो गए हैं तो उनका आगे क्या ?
- क्या बच्चों के संस्कार न करें अथवा करें तो कैसे करें ?
- क्या यज्ञानुष्ठान न करें और करें तो कैसे करें ?
- क्या श्राद्ध न करें और यदि करें तो कैसे करें ?
एक मार्ग तो यह दिखता है कि म्लेच्छाचारी हो चुके हैं जो कि पुराणादि कलयुग प्रभाव के रूप में बताता है, तो क्या आगे के सभी कर्मों का त्याग करके पूर्णतः म्लेच्छ बन जायें अथवा किसी ऐसे मध्यम मार्ग का आश्रय लें जहां भविष्य में धर्म की पुनर्स्थापना की संभावना शेष रहे। क्या नरकगामी बन जायें अथवा नरक से बचने का शास्त्रोक्त मार्ग ढूंढें ?
समाधान : विकल्प और आगे का मार्ग
“जहाँ वेद-मंत्रों का सामर्थ्य क्षीण हो, वहाँ पौराणिक विधि और अनुग्रह ही कर्माधिकार का आधार है।”
उपरोक्त चर्चा पूर्णतः शास्त्रीय आधार पर की गयी है और शास्त्रीय आधार से ही ९९% लोग वेदाधिकार और कर्माधिकार से च्युत हो गए हैं और शास्त्रीय आधार पर ही इसका समाधान भी ढूंढना होगा न कि मनगढंत कुतर्कों का आश्रय लेकर।
कर्माधिकार रहित होने का तात्पर्य पतित होना नहीं है, पापयुक्त होने पर प्रायचित्त, पुनर्संस्कार आदि का विधान है। किन्तु ध्यान देने का विषय यह है कि गायत्री का अधिकार (द्विजों के लिये) शेष रहता है, व्रत का भी अधिकार रहता है ये सत्यनारायण व्रत कथा आदि से भी स्पष्ट होता है :
“कलौ सर्वे भविष्यन्ति पापकर्मपरायणाः । वेदविद्याविहीनाश्च तेषां श्रेयः कथं भवेत् ॥”
यहां पूजा का अधिकार भी स्पष्ट होता है। हां शालिग्राम, शिवलिंग आदि स्पर्शाधिकार विमर्श का विषय हो सकता है। इसी प्रकार अन्यान्य पौराणिक पूजा, व्रत की कथाओं से भी पापियों का अधिकार सिद्ध होता है। इसी प्रकार दीक्षितों का मन्त्र में भी अधिकार रहता है। अर्थात व्रत-जप-पूजा आदि का कर्माधिकार शेष रहता है हां विधि के विषय में पौराणिक विधि ही ग्राह्य होता है।
गायत्री रहितो विप्रः शूद्रादप्य शुचिर्भवेत्। गायत्री ब्रह्म तत्वज्ञाः सम्पूज्यस्तु द्विजोत्तमः॥
पाराशर स्मृति ८/३१
संध्या-वंदन के अधिकार की बात करने से ही क्या लाभ या होने से ही क्या लाभ जब कभी किया ही नहीं ? गायत्री जप के अधिकार का तात्पर्य यह है कि प्रायश्चित्त में भी गायत्रीजप (पुरश्चरण) का विधान मिलता है अर्थात गायत्री जप का अधिकार शेष रहता है। शेष पौराणिक कृत्यों में अधिकार भी स्थित रहता है। जहां प्रायश्चित्त परक हवन का विधान है वहां हवनाधिकार भी शेष रहता है।
आगे संस्कार, श्राद्ध, वैदिक मंत्र से पूजा-अनुष्ठान यथा रुद्राभिषेक, शान्तिक कर्म, हवन-यज्ञ आदि की बात आती है और यहां पर आकर स्पष्ट हो जाता है कि अनेकानेक कारण उपस्थित हैं और सभी मिलकर अनधिकार ही सिद्ध करते हैं एवं इनका भी लोप नहीं किया जा सकता।
अब शास्त्र में कर्माधिकार प्राप्ति का एक विकल्प/उपाय मिलता है जो अनधिकार (अज्ञान/प्रायश्चित्त अभाव आदि) का निवारण करने लिये वर्णित है।
मुख्य विकल्प : अनुग्रह प्राप्ति और प्रत्याम्नाय
अनुग्रह प्राप्ति में सर्वप्रथम तथ्य तो यह है कि वर्त्तमान में नास्तिकों/अधर्मियों की संख्या अत्यधिक बढ़ गयी है और ये लोग “जय श्री राम”, “धर्मो रक्षति रक्षितः”, “सनातन धर्म” आदि चिल्लाते तो हैं किन्तु जैसे ही लाभ की बात आती है नारा ही बदल लेते हैं, बदले नारे को लिखने की आवश्यकता नहीं है संकेत मात्र से समझ सकते हैं कि देशभर में राजनीतिक रूप से एक विशेष नारा लगाया जा रहा है और उस नारे के साथ मनुवादियों, ब्राह्मणों, सवर्णों को समाप्त करने तक की भी बात की जा रही है।

ये अनुग्रह प्राप्ति का विषय उनके लिये है ही नहीं, ये मात्र उनके लिये है जिनको उपरोक्त तथ्य समझ में आ गयी हो, यह स्वीकार कर रहे हों कि हाँ वास्तव में वो आजीवन पाप और बस पाप में ही निमग्न रहे हैं। जिसे यह तथ्य समझ में आए उसके लिये अनुग्रह विधान है जिसमें ब्राह्मणों (विद्वान ब्राह्मणों के पर्षद/गुरु) आदि से अनुग्रह प्राप्ति का विधान है।
दुर्बलेऽनुग्रहः प्रोक्तस्तथा वै बालवृद्धयोः। अतोऽन्यथा भवेद्दोषस्तस्मान्नानुग्रहः स्मृतः ॥
स्नेहाद्वा यदि वा लोभाद्भयादज्ञानतोऽपि वा। कुर्वन्त्यनुग्रहं ये तु तत्पापं तेषु गच्छति ॥
पाराशर स्मृति ६/५५-५७
यद्यपि यहां मैं इस अनुग्रह के विषय में विस्तृत चर्चा नहीं करने जा रहा हूँ तथापि उपलब्ध प्रमाणों के माध्यम से विद्वान स्वतः अवगत हो जायेंगे। विश्लेषण करने से अयोग्यों द्वारा अधिक दुरुपयोग ही संभावित है। अनुग्रह करने के लिये अनुग्रह करने का सामर्थ्य भी तो होना चाहिये, किन्तु सामर्थ्य पक्ष का त्याग करके मात्र धनलोभ का आश्रय ग्रहण किया जायेगा जिसका की पूर्णतः निषेध है।
ऐसे तथ्य वर्त्तमान में ब्राह्मणों (जाति मात्र) के उन्मूलन से भी संबंधित होते प्रतीत होते हैं। ब्राह्मणों ने धन के लिये धर्म की बलि दे दिया आज न घर के रहे न घाट के, अब “रोटी और बेटी” दोनों ही छीनने का कुकर्म वैधानिक रूप से किया जा रहा है। दोषी थे तो अब दण्ड भी ग्रहण करना होगा। एक पीढ़ी पीछे जाकर देखें तो ब्राह्मणों द्वारा धर्म हेतु नौकरी का तिरष्कार किया जाता था और वर्त्तमान पीढ़ी को देखें तो शिक्षा और नौकरी के नाम पर धर्म का त्याग किया जा रहा है।
जब तुमने धर्म का त्याग कर ही दिया है तो धर्म भी तुम्हारा त्याग करेगा अर्थात रक्षा नहीं करेगा। ये अगली पीढ़ी के लिये शिक्षा के रूप में ग्राह्य है कि धर्म को धारण करो शिक्षा और नौकरी के चक्कर में मत फंसो अन्यथा इससे भी बड़े दुर्दिन देखोगे।
अनुग्रह के विषय में ब्राह्मण के पास आज्ञा प्रदान करने का अधिकार शास्त्र देते हैं। ब्राह्मण यजमान के अनुकूल विचार करके उचित आज्ञा प्रदान करे अर्थात प्रायश्चित्त न करने की अवस्था में अनुग्रह करते हुये अन्य विकल्प की आज्ञा दे :
स एव नियमस्याज्यो ब्राह्मणं योऽवमन्यते। वृथा तस्योपवासः स्यान्न स पुण्येन युज्यते ॥
स एव नियमो ग्राह्यो यं यं कोऽपि वदेद्द्विजः। कुर्याद्वाक्यं द्विजानां तु अन्यथा भ्रूणहा भवेत् ॥
व्रतच्छिद्रं तपश्च्छिद्रं यच्छिद्रं यज्ञकर्मणि। सर्वं भवति निश्च्छिद्रं ब्राह्मणैरुपपादितं ॥
ब्राह्मणा जङ्गमं तीर्थं निर्जलं सर्वकामदं । तेषां वाक्योदकेनैव शुध्यन्ति मलिना जनाः ॥
ब्राह्मणा यानि भाषन्ते मन्यन्ते तानि देवताः। सर्वदेवमयो विप्रो न तद्वचनं अन्यथा॥
पाराशर स्मृति ६/५६-६१ (शातातप व अन्यान्य स्मृतियों में भी उपलब्ध)
हम श्लोकार्थ का विश्लेषण करने ही नहीं जा रहे हैं भिज्ञजनों के लिये प्रमाणों को संकलित कर रहे हैं ताकि सही मार्ग ज्ञात हो सके। आगे अनुग्रह पूर्वक कर्माधिकार प्रदान करने का विधान जो है उसमें गोदान की बात कही गयी है अर्थात ऐसा नहीं कि ब्राह्मण ने अनुग्रह किया और बस हो गया, अपितु कर्माधिकार प्राप्त करने वाला अनुग्रह करने वाले ब्राह्मणों को गोदान करे।
कृच्छ्रोऽयुतं तु गायत्र्या उपवासस्तथैव च । धेनुप्रदानं विप्राय सममेतच्चतुष्टयम् ॥
मिताक्षरा (प्रायश्चित्त काण्ड), स्मृति मुक्ताफल (श्राद्ध कांड), मदनरत्न
कृच्छ्र, अयुत गायत्री जप, उपवास (प्रायश्चित्तात्मक) और गोदान (ब्राह्मण को) ये चारों समान होते हैं अर्थात अन्यान्य विकल्प प्रदान करे और इसमें सबसे सरल गोदान है क्योंकि यजमान को गोदान करना है किन्तु अन्यान्य कुछ कार्य करने की आवश्यकता नहीं रहती। यह वचन भी पराशर वचन ही कहा गया है किन्तु मैंने स्वयं पाराशर स्मृति में इसकी नहीं किया है।
प्राजापत्ये तु गामेकां दद्यात्सान्तपने द्वयम् । पराकतप्तातिकृच्छ्रे तिस्रस्तिस्रस् तु गास्तथा ॥
जन्मप्रभृति पापानि बहूनि विविधानि च । कृत्वार्वाग् ब्रह्महत्यायाः षडब्दं व्रतमाचरेत् ॥
प्रत्याम्नाये गवां देयं साशीति धनिना शतम् । तथाष्टादशलक्षाणि गायत्र्या वा जपेद् बुधः ॥
मिताक्षरा (प्रायश्चित्त काण्ड)
यदि गोदान की भी अक्षमता हो तो गोमूल्य का भी विधान है और गोमूल्य का निर्धारण भी शास्त्रों में किया गया है, गोमूल्य का तात्पर्य निष्क (एक स्वर्णमुद्रा) कहा गया है। यदि उसमें भी अक्षम हो तो अर्द्ध और उसमें भी अक्षम हो तो पाद (चार आना) कहा गया है किन्तु पाद (चार आना) से कम गोमूल्य नहीं कहा गया है अर्थात यदि न्यूनतम में भी अक्षम हो तो अयुत गायत्री जप आदि ही करे।
कृच्छ्रप्रतिनिधिं कुर्याद्गोभिरेव सवत्सकैः। गवामभावे निष्कं स्यात्तदर्धं पादमेव वा ॥
प्राजापत्य क्रियाशक्तौ धेनुं दद्याद्विचक्षणः। धेनोराभावे दातव्यं तन्मूल्यं नात्र संशयः ॥
धेनोरभावे निष्कं स्यात्तदर्धं पादमेव वा। पादहीनं न कर्त्तव्यमिति वेदविदो विदुः ॥
स्मृति मुक्ताफल (श्राद्ध कांड), मिताक्षरा (प्रायश्चित्त काण्ड)
प्रायश्चित्तमयूख में भी गोदान व गोमूल्य दान के विषय में विस्तृत संग्रह व विश्लेषण मिलता है। अनेकानेक तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि गोमूल्य का निर्धारण प्रचलित मुद्रा से भी किया जा सकता है यथा रजत, ताम्र आदि। किन्तु स्वर्ण मुद्रा के अतिरिक्त जिस किसी मुद्रा का विधान प्राप्त होता है वहां गाय के अभाव में अथवा असमर्थता में मुद्रा का विकल्प कहा गया है ।
इसका तात्पर्य प्रचलित मुद्रा और काल के अनुसार गोमूल्य का निर्धारण करना है। तदुपरांत वास्तविक गोमूल्य में अक्षम होने पर अर्द्ध और उसमें भी अक्षम होने पर पाद (चतुर्थांश) का विधान है। वर्त्तमान में तो कागज की ही मुद्रा प्रचलित है और उससे आगे प्रतिभाषिक मुद्रा (डिजिटल करेंसी) भी प्रचलित है तो उसमें भी वर्त्तमान काल के अनुसार वास्तविक गोमूल्य का ही निर्धारण करना चाहिये।
यहां विषय को समझने के लिये किंचित प्रमाण और विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है अधिक ज्ञान हेतु उपरोक्त महत्वपूर्ण ग्रंथों का अवलोकन करना चाहिये। प्रत्याम्नाय का मूल अर्थ “प्रतिनिधि का विकल्प” के रूप में ग्रहण करना चाहिये। अर्थात मुख्य विधान जो है उसमें असमर्थ होने पर उसके लिये गोदान अथवा गोमूल्य दान आदि का जो विधान है वही विकल्प “प्रत्याम्नाय” है।
“कृच्छ्रादि क्रियाशक्तौ प्रत्याम्नायान् समाचरेत् ॥” – स्मृति मुक्ताफल (श्राद्ध कांड) ; यहां पर ध्यान रखने का महत्वपूर्ण विषय यह है कि जो भी निर्णय करेंगे वो शास्त्रनिष्ठ विद्वान ब्राह्मण करेंगे और शास्त्रों के अनुसार ही करेंगे न कि मनमुखी। अब ब्राह्मणों की सक्षमता को लेकर भी विमर्श अपेक्षित है अर्थात निर्णय करने वाले ब्राह्मणों योग्यता क्या हो ? ब्राह्मणों की योग्यता का यदि एक प्रमाण से निर्धारण करना चाहें तो वो भी लघुशातातप, बौधायन आदि स्मृतियों में इस प्रकार वर्णित है :
धर्मशास्त्र रथारुढा वेदखड्गधरा द्विजाः। क्रीडार्थमपि यद्ब्रूयुः स धर्मः परमः स्मृतः॥
बौधायन स्मृति १/१/१४
इसमें परमधर्म की भी एक बड़ी परिभाषा दी गयी है और अनेकों स्थान पर ऐसे वचन मिलते हैं अर्थात प्रक्षिप्तवाद का शिकार भी नहीं बनाया जा सकता। आज धर्म और सनातन चिल्लाने वाले भी समता की बात करते और धर्म की मनमुखी व्याख्या करते हैं ब्राह्मण की महत्ता, श्रेष्ठता आदि को अस्वीकार करते हैं।
शास्त्रों पर इनसे अधिक विश्वास तो सनातनद्रोहियों का ही है, वो स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि सनातन का अस्तित्व ब्राह्मण से ही है और सनातन पर प्रहार करना है तो ब्राह्मणों पर प्रहार करना होगा। ब्राह्मणों के नाश का तात्पर्य ही सनातन का नाश है क्योंकि परमधर्म भी ब्राह्मणों के वचन में निहित है। इसी कारण देश में दशकों से ब्राह्मणविरोध का दुश्चक्र चलाया जा रहा है जो वर्त्तमान में चरमोत्कर्ष की ओर अग्रसर है।
यहां स्पष्ट यह किया जा रहा है कि सनातनद्रोही तो इस तथ्य को स्वीकारते हैं और ब्राह्मणवाद भी घोषित कर रखे हैं किन्तु सनातन का झंडा उठाने का स्वांग रचने वाले नहीं स्वीकारते तभी तो शंकराचार्य को ही फर्जी बताया जाता है, छद्म मृदुभाषी स्वघोषित संतों (पाषंडियों) से तुलना की जाती है। शंकराचार्य के विरुद्ध क्या-क्या नहीं बका जा रहा है और बकने वाले कौन हैं भगवाधारी।
यहां एक तथ्य पूर्णरूपेण स्पष्ट करना आवश्यक है कि “प्रत्याम्नाय” के अंतर्गत गोदान अथवा गोमूल्य निष्क्रय विद्वान और सुयोग्य, सदाचारी, शास्त्रनिष्ठ ब्राह्मण को ही देना चाहिये, पुरोहित होने के कारण किसी मूर्खादि ब्राह्मण को नहीं। यह स्पष्ट करना इस कारण अपेक्षित है क्योंकि वर्त्तमान में दान पर पुरोहितों ने एकाधिकार समझ लिया है और इसका कारण भी अज्ञानी होना ही है। यह अज्ञानता स्वयं ही सिद्ध कर देता है कि वो दान लेने के अयोग्य हैं। योग्यता तो स्पष्ट किया जा चुका है : “धर्मशास्त्र रथारुढा वेदखड्गधरा द्विजाः।”

पुरोहित के उपस्थित होते हुये भी विधिपूर्वक किसी कर्म हेतु अन्य विद्वान कर्मकाण्डी को आमंत्रित करना ही यह सिद्ध कर देता है कि पुरोहित अयोग्य है। इस पंक्ति का उद्देश्य पुरोहितों की भावना को ठेंस पहुंचाना नहीं है अपितु योग्यता के लिये प्रेरित करना है, एवं शास्त्रविधान का यथावत विश्लेषण करना है। यजमान वर्ग इस पंक्ति से पुरोहित की अयोग्यता का अन्य अर्थ ग्रहण न करें अपितु पुरोहितों को योग्यता ग्रहण करने हेतु प्रेरित करने के भाव में ग्रहण करें।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि शास्त्रोचित कर्म से निवृत्ति, शास्त्रविरुद्ध कर्म में प्रवृत्ति, पापाचार वर्तमान जीवनशैली का अभिन्न अंग बन गया है और ऐसे में यदि प्रायश्चित्त करने लगें तो आजीवन प्रायश्चित्त ही करते रह जायें जबकि कर एक भी नहीं सकते अर्थात एक मात्र मार्ग विकल्प “प्रत्याम्नाय” का ही शेष है। तात्पर्य यह है कि जब हम संस्कारादि जैसे कर्म में प्रवृत्त होने जाते हैं तो अयोग्यता के साथ-साथ पाप निवारण (कर्माधिकार हेतु) आवश्यक होता है और उसका एक मात्र मार्ग “प्रत्याम्नाय” अर्थात गोदान व गोमूल्य निष्क्रय शेष बचता है।
यह मार्ग पलायन नहीं, बल्कि शास्त्रीय मर्यादा के भीतर रहकर धर्म के बीज की रक्षा का एक प्रयास है, जिससे समयानुसार पुनः धर्म का पुनर्जागरण हो सके।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
FAQ
प्रश्न 1: ‘प्रत्याम्नाय’ का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर: मुख्य शास्त्रीय विधान (जैसे कृच्छ्र व्रत आदि) में अक्षम होने पर उसके बदले ‘गो-दान’ या ‘गो-मूल्य निष्क्रय’ का जो विकल्प दिया जाता है, उसे प्रत्याम्नाय कहते हैं।
प्रश्न 2: यदि उपनयन १६ वर्ष के बाद हुआ हो, तो क्या केवल जनेऊ पहन लेने से दोष मिट जाता है?
उत्तर: नहीं, वह व्यक्ति ‘व्रात्य’ हो जाता है। इसके निवारण हेतु विशिष्ट प्रायश्चित्त और विधिपूर्वक पुनर्संस्कार अनिवार्य है।
प्रश्न 3: ‘अनाश्रमी’ होने का दोष क्या है?
उत्तर: उपनयन के बाद और विवाह से पूर्व के काल में यदि व्यक्ति किसी आश्रम के नियमों में नहीं है, तो वह अनाश्रमी है, जिसके लिए प्राजापत्य कृच्छ्र आदि प्रायश्चित्त का विधान है।
प्रश्न 4: क्या लहसुन और प्याज खाने से कर्माधिकार नष्ट होता है?
उत्तर: हाँ, याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार ये अभक्ष्य हैं और इनके भक्षण के बाद चान्द्रायण व्रत या पुनरुपनयन का विधान कर्माधिकार की शुद्धि हेतु आवश्यक है।
प्रश्न 5: शिखा-त्याग करने पर क्या दण्ड है?
उत्तर: लघुहारीत स्मृति के अनुसार मोहवश शिखा काटने पर द्विज को प्राजापत्य व्रत और पुनर्संस्कार (चूडाकरण) करना पड़ता है।
प्रश्न 6: ‘गो-मूल्य’ का निर्धारण कैसे किया जाता है?
उत्तर: शास्त्रानुसार यह ‘निष्क’ (स्वर्णमुद्रा) या काल-परिस्थिति के अनुसार प्रचलित मुद्रा में वास्तविक गाय के मूल्य के बराबर होता है।
प्रश्न 7: क्या कोई भी ब्राह्मण अनुग्रह प्रदान कर सकता है?
उत्तर: नहीं, केवल वे ब्राह्मण जो “धर्मशास्त्र रथारूढ़” और सदाचारी हैं, उन्हीं के वचन में अनुग्रह का सामर्थ्य होता है।
प्रश्न 8: कर्माधिकार प्राप्त करने का सबसे सरल मार्ग क्या है?
उत्तर: विद्वान ब्राह्मणों की शरण में जाकर अपने दोषों को स्वीकार करना और उनके द्वारा निर्देशित ‘प्रत्याम्नाय’ (निष्क्रय) करना।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
यह आलेख केवल शास्त्रीय सूचना और विमर्श हेतु है। कर्माधिकार और प्रायश्चित्त सम्बन्धी कोई भी निर्णय स्वयं न लें। किसी भी संस्कार या अनुष्ठान से पूर्व अपने क्षेत्र के शास्त्रनिष्ठ, सदाचारी और विद्वान ब्राह्मणों (पर्षद) से परामर्श कर ‘अनुग्रह’ प्राप्त करना ही शास्त्रसम्मत है।
॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।











