बाबरी विध्वंस कांड – अयोध्या का राम मंदिर
सर्वप्रथम बाबरी विध्वंस का सही तात्पर्य समझना होगा। अभी तक जो तात्पर्य समझा-समझाया जाता है वह है बाबरी ढांचे का गिरना। लेकिन यह अर्थ सही नहीं लगता है।
सर्वप्रथम बाबरी विध्वंस का सही तात्पर्य समझना होगा। अभी तक जो तात्पर्य समझा-समझाया जाता है वह है बाबरी ढांचे का गिरना। लेकिन यह अर्थ सही नहीं लगता है।
श्री अयोध्या पुरी को शकों ने उजाड़ दिया था। अन्य मंदिरों के साथ-साथ श्री राम का प्राचीन मंदिर भी विध्वंस कर दिया था और विध्वंस ऐसा था कि उस स्थान का पता करना भी असंभव कार्य था।
पंडित देवीदीन पांडे एक शूरवीर ब्राह्मण थे, जिन्होंने मुग़ल सेना के विरुद्ध रणभूमि में वीरगति प्राप्त किया था। उनकी वीरता का इतिहास गोपनीय रहा पर उन्होंने भारतीय धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए अपना जीवन न्योछावर किया। उनका और राम मंदिर के नाम सदैव जुड़ा रहेगा।
नारायण सूक्त में ब्रह्मज्ञान विषयक गूढ़ार्थ सन्निहित है।
इसे पुरुष सूक्त का परभाग भी कहा जा सकता है।
यह ब्रह्म ज्ञान के महत्व को भी बताता है।
देवता ब्रह्मज्ञानियों के वश में होते हैं इसमें ऐसा भी बताया गया है।
इसमें परमात्मा के विषय में यह बताया गया है की वह सर्वव्यापी तो है ही अर्थात उसे बाहर भी देखा जा सकता है किन्तु वह सबके भीतर भी है और उसे भीतर भी पाया या जाना जा सकता है।
इसमें यह भी बताया गया है कि परमात्मा को जाने बिना कल्याण अर्थात मोक्ष का कोई अन्य उपाय नहीं है।
प्रायः ऐसा देखा जाता है कि सामवेदीय सूक्तों के पाठ क्रम में शुक्ल यजुर्वेदी मात्र ᳪ (ग्गूं) का उच्चारण अनुस्वार कर देते हैं। परन्तु बात इतनी नहीं है; सामवेदीय सूक्तों में अन्य परिवर्तन भी होते हैं जो यहाँ दिये गये सामवेदीय पुरुष सूक्त से स्पष्ट हो जाता है।
शंकराचार्य ज्ञान पक्ष में होते हैं। कर्मकांड में शंकराचार्य की भूमिका नगण्य होती है अथवा बिल्कुल ही नहीं होती। राम लला की प्राण प्रतिष्ठा में विरोधियों को बड़ा अच्छा प्रश्रय मिल रहा है और वह है शंकराचार्यों के वक्तव्य। लेकिन शंकराचार्यों के वक्तव्य में कुछ प्रच्छन्न पीड़ा भी है जो पूर्व से है। जहां तक प्राण प्रतिष्ठा संबंधी विहित-निषिद्ध, उचित-अनुचित आदि वाली बातें हैं उसके लिये शंकराचार्य का कोई दायित्व ही नहीं है यदि उपस्थित न हों ।
जहां शुक्लयजुर्वेद के पुरुषसूक्त में १६ ऋचायें मिलती है वहीं कृष्ण यजुर्वेद में १८ ऋचायें प्राप्त होती हैं।
कृष्ण यजुर्वेदियों को कृष्णयजुर्वेद के मंत्रों का ही उपयोग करना चाहिये।
सर्वत्र शुक्ल यजुर्वेद की ऋचायें इसलिये उपलब्ध होती है क्योंकि अधिकांश लोग शुक्ल यजुर्वेद के ही माध्यन्दिन शाखा का पालन करने वाले हैं।
किन्तु अन्य वेदों व शाखा वाले लोग भी हैं।
सबको अपने वेद व शाखा का ही पालन करना श्रेयस्कर कहा गया है।
जिस तरह से विभिन्न देवताओं के सूक्त होते हैं उसी तरह पितरों के लिये भी विभिन्न वेदों में सूक्त हैं जिसे पितृसूक्त कहा जाता है। जिसमें से अन्य सभी सूक्तों की तरह ही शुक्ल यजुर्वेदोक्त पितृसूक्त ही मुख्य रूप से प्रयुक्त होता है।
सरल रुद्राष्टाध्यायी – रुद्री पाठ संस्कृत : यहां संपूर्ण रुद्राष्टाध्यायी सरल करके प्रस्तुत किया गया है। लेकिन प्रायः ऐसा देखा गया है कि सरल करने के क्रम में विसंगतियां या असंगतियां उत्पन्न हो जाती है। यहां सरल पाठ के साथ-साथ त्रुटियों को दूर करके सर्वाधिक शुद्ध पाठ देने का प्रयास किया गया है, जिस कारण रुद्राभिषेक में यह विशेष उपयोगी हो जाता है।
इसके साथ ही एक और महत्वपूर्ण समस्या को दूर करने का भी प्रयास किया गया है। प्रायः मंत्रों के बीच में भी विज्ञापन आते हैं यहां इसका भी निवारण किया गया है।
इस लेख में हम सर्प सूक्त के बारे में जानेंगे साथ ही शुद्ध सर्पसूक्त भी देखेंगे। सर्पों के लिये जो स्तुति हो उसे सर्प सूक्त कहते हैं। सर्प सूक्त पाठ करने के कई लाभ भी होते हैं।