प्राधानिक रहस्य
भगवन्नवतारा मे चण्डिकायास्त्वयोदिताः।
एतेषां प्रकृतिं ब्रह्मन् प्रधानं वक्तुमर्हसि॥१॥
आराध्यं यन्मया देव्याः स्वरूपं येन च द्विज।
विधिना ब्रूहि सकलं यथावत्प्रणतस्य मे॥२॥
कर्मकांड में पूजा, पाठ, जप, हवन, शांति, संस्कार, श्राद्ध आदि सभी प्रकरण समाहित हो जाते हैं। कर्मकांड विधि द्वारा इन सभी कर्मकांड पूजा पद्धति से संबंधित विधि और मंत्रों का यहाँ पर्याप्त संग्रहण उपलब्ध है – karmkand
भगवन्नवतारा मे चण्डिकायास्त्वयोदिताः।
एतेषां प्रकृतिं ब्रह्मन् प्रधानं वक्तुमर्हसि॥१॥
आराध्यं यन्मया देव्याः स्वरूपं येन च द्विज।
विधिना ब्रूहि सकलं यथावत्प्रणतस्य मे॥२॥
श्रीगणपतिर्जयति। ॐ अस्य श्रीनवार्णमन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः, गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि, श्रीमहाकाली महालक्ष्मी महासरस्वत्यो देवताः, ऐं बीजम्, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकम्, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः॥
सप्तशती पाठ के बाद देवीसूक्त पाठ करना चाहिये। देवीसूक्त भी वेदोक्त और तंत्रोक्त दो प्रकार के हैं। यहां ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त और तंत्रोक्त (जो कि श्रीदुर्गासप्तशती का ही है) देवी सूक्त, दोनों दिया गया है।
ॐ बालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम्।
पाशाङ्कुशवराभीतीर्धारयन्तीं शिवां भजे॥
स्तुति से प्रसन्न होकर देवताओं को बाधानिवारण का वरदान देने के पश्चात् बारहवें अध्याय में भगवती स्वयं ही सप्तशती के पाठ, श्रवण आदि का माहात्म्य बताती हैं। ग्यारहवां अध्याय वास्तव में सप्तशती का माहात्म्य ही है जो स्वयं भगवती द्वारा ही बताया गया है।
देवी द्वारा शुम्भ वध के उपरांत दशों दिशाओं में हर्ष व्याप्त हो गया, देवताओं के मुखकमल खिल गये और हर्षित होकर देवताओं ने देवी की स्तुति किया। स्तुति से प्रसन्न होने के बाद देवी ने वर मांगने के लिये कहा तो देवताओं ने सभी बाधाओं को शमन करने के लिये कहा।
देवी द्वारा निशुम्भ वध के उपरांत शुम्भ लांछन करता है कि औरों के बल पर आश्रित होकर गर्व करती हो तब देवी कहती है इस अखिल विश्व में एक मैं ही हूँ,
सभी प्रमुख असुरों की मृत्यु के उपरांत शुम्भ-निशुम्भ विशाल सेना के साथ युद्ध करने आया। भयंकर युद्ध के साथ ही नौवें अध्याय में निशुम्भ वध की कथा है।
ॐ अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं
धृतपाशाङ्कुशबाणचापहस्ताम्।
अणिमादिभिरावृतां मयूखै-
रहमित्येव विभावये भवानीम्॥
ॐ ध्यायेयं रत्नपीठे शुककलपठितं शृण्वतीं श्यामलाङ्गीं
न्यस्तैकाङ्घ्रिं सरोजे शशिशकलधरां वल्लकीं वादयन्तीम्।
कह्लाराबद्धमालां नियमितविलसच्चोलिकां रक्तवस्त्रां
मातङ्गीं शङ्खपात्रां मधुरमधुमदां चित्रकोद्भासिभालाम्॥