ईसा के लगभग १०० वर्ष पूर्व उज्जैन के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को खदेड़ा था । इस लेख में हम चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य से जुड़े हुये इतिहास के उस भाग को समझेंगे जिसे ढोंगी इतिहासकारों ने छुपाया और मुगलों का महिमामंडन किया। राम मंदिर पहले भी था जिसका विध्वंस ईसापूर्व ही शकों ने भी किया था।
राम मंदिर किसने बनवाया था
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ईसा पूर्व के वो राजा थे जिनका इतिहास, साक्ष्य आज भी जीवित है। चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की महानता को इस बात से भी जाना जा सकता है कि उन्होंने एक संवत्सर का भी आरम्भ किया था जिसका नाम विक्रम संवत रखा और वो आज भी प्रचलित है।
विक्रम संवत
२०२४ में विक्रम संवत २०८०-२०८१ चल रहा है। वर्त्तमान पञ्चाङ्गों का निर्माण मुख्यरूप से विक्रम संवत के आधार पर ही किया जाता है। ५७ वर्ष ईसा पूर्व उनका राज्याभिषेक हुआ था और उसी वर्ष से विक्रम संवत का आरंभ हुआ।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य द्वारा अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि की खोज
श्री अयोध्या पुरी को शकों ने उजाड़ दिया था। अन्य मंदिरों के साथ-साथ श्री राम का प्राचीन मंदिर भी विध्वंस कर दिया था और विध्वंस ऐसा था कि उस स्थान का पता करना भी असंभव कार्य था।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य एक बार आखेट करते हुये अयोध्या पहुंचे। मुगलों से पहले शकों ने भी श्रीराम मंदिर विध्वंस किया था और उत्पात मचाया था। थकान होने के कारण अयोध्या में सरयू नदी के किनारे एक आम वृक्ष के नीचे वो विश्राम करने लगे।
तीर्थराज प्रयाग द्वारा चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को श्रीराम मंदिर निर्माण की प्रेरणा देना
उसी समय दैवीय प्रेरणा से तीर्थराज प्रयाग (मूर्तिमान) से उनकी मुलाकात हुई और तीर्थराज प्रयाग ने सम्राट विक्रमादित्य को अयोध्या और सरयू की महत्ता के बारे में बताया और उस समय तक नष्ट सी हो गयी श्री राम जन्मभूमि के उद्धार के लिए कहा।
महाराजा विक्रमादित्य ने कहा की महाराज अयोध्या तो उजड़ गयी है , मिटटी के टीले और स्तूप ही यहाँ अवशेषों के रूप में हैं, फिर मुझे ज्ञात कैसे होगा कि अयोध्या नगरी कहा से शुरू होती है , क्षेत्रफल कितना होगा और किस स्थान पर कौन सा तीर्थ है।
- इस संशय का निवारण करते हुए तीर्थराज प्रयाग ने कहा की यहाँ से आधे योजन की दूरी पर मणिपर्वत है ।
- उसके ठीक दक्षिण चौथाई योजन के अर्धभाग में गवाक्ष कुण्ड है ।
- उस गवाक्ष कुण्ड से पश्चिम तट से सटा हुआ एक रामनामी वृक्ष है, यह वृक्ष अयोध्या की परिधि नापने के लिए ब्रह्मा जी ने लगाया था। सैकड़ो वर्षों से यह वृक्ष उपस्थित है वहा।
- उसी वृक्ष के पश्चिम ठीक एक मील की दूरी पर एक मणिपर्वत है।
- मणिपर्वत के पश्चिम सटा हुआ गणेशकुण्ड नाम का एक सरोवर है , उसके ऊपर शेष भगवान का एक मंदिर बना हुआ है ( ज्ञातव्य है की अब इस स्थान पर अयोध्या में शीश पैगम्बर नाम की एक मस्जिद है जिसे सन १६७५ में औरंगजेब ने शेष भगवान के मंदिर को गिरा कर बनवाया था ).
- शेष भगवान के मंदिर से ५०० धनुष पर ठीक वायव्य कोण पर भगवान श्री राम की जन्मभूमि है।
रामनामी वृक्ष (यह वृक्ष अब सूखकर गिर चुका है) के एक मील के इर्द गिर्द एक नवप्रसूता गाय को ले कर घुमाओ जिस जगह वह गाय गोबर कर दे , वह स्थल मणिपर्वत है फिर वहा से ५०० धनुष नापकर उसी ओर गाय को ले जा के घुमाओ जहाँ उसके स्तनों से दूध की धारा गिरने लगे बस समझ लेना भगवान की जन्मभूमि वही है।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य द्वारा ईसा पूर्व में श्रीराम मंदिर निर्माण
सच यही है कि ढोंगी इतिहासकारों को वह दृष्टि ही नहीं मिल सकती जिससे तीर्थराज प्रयाग द्वारा चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को श्रीराम मंदिर निर्माण की प्रेरणा मिलना उन्हें दिख सके। ये सब तो उनको बस मनगढंत कहानी ही लगेगी। उनके लिये तो यह चर्चा भी सांप्रदायिक है और इसे छुपाना चाहिये और उन्होंने हमेशा यही किया भी है।
- रामजन्मभूमि को सन्दर्भमान के पुराणों में वर्णित क्रम के अनुसार तुम्हे समस्त तीर्थों का पता लग जायेगा।
- ऐसा करने से तुम श्री राम की कृपा के अधिकारी बनोगे यह कहकर तीर्थराज प्रयाग अदृश्य हो गए।
- लेकिन ये तो ढोंगी इतिहासकारों के लिये मनगढंत कहानी जैसी है उसे ज्ञात ही नहीं की भारत का सच्चा इतिहास इन कहानियों में ही छुपा होता है।
श्री रामनवमी के दिन पूर्ववर्णित क्रम में सम्राट विक्रमादित्य ने सर्वत्र नवप्रसूता गाय को घुमाया जन्म भूमि पर उसके स्तनों से अपने आप दूध गिरने लगा उस स्थान पर महाराजा विक्रमादित्य ने श्री राम जन्मभूमि के भव्य मंदिर का निर्माण करा दिया, जिसमें काले रंग के कसौटी पत्थर वाले 84 स्तंभ थे।
- सनातन द्रोह की आग में उबलने वाले ढोंगी इतिहासकार चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की महिमा कैसे बता सकते हैं, उन्हें तो बाबर के वंशजों का गुणगान करना था इसलिये ऐसे ढोंगी “इतिहासकार मानते हैं कि 1130 और 1150 में गहड़वाल (गहरवार) राजपूत वंश के सम्राट गोविंदचंद्र ने श्री रामजन्मभूमि स्थल पर एक विष्णु मंदिर का निर्माण कराया था”
- लेकिन भारत का अरबों वर्ष का इतिहास जीवित है तो १०००-२००० वर्ष के इतिहास को कैसे कब्र में दफनाया जा सकता है।
- यदि हजारों फीट धरती में जाकर भी दफना दिया जाय तो भी धरती का सीना चीर के सच्चाई एक दिन बाहर निकल ही जायेगी लेकिन इस तथ्य को केवल सनातनी ही समझता है; ये समझना उन ढोंगी इतिहासकारों के वश की बात ही नहीं है।
- ईसा की ग्यारहवी शताब्दी में कन्नोज नरेश जयचंद आया तो उसने मंदिर पर सम्राट विक्रमादित्य के प्रशस्ति को उखाड़कर अपना नाम लिखवा दिया।
- पानीपत के युद्ध के बाद जयचंद का भी अंत हो गया फिर भारतवर्ष पर लुटेरे आक्रांता लुटेरों का आक्रमण शुरू हो गया।
- आक्रांता लुटेरों ने जी भर के जन्मभूमि को लूटा और पुजारियों की हत्या भी कर दी , मगर मंदिर से मुर्तिया हटाने और मंदिर को तोड़ने में वे सफल न हो सके।
- विभिन्न आक्रमणों के बाद भी सभी झंझावतो को झेलते हुए श्री राम की जन्मभूमि अयोध्या १४वीं शताब्दी तक बची रही।
ढोंगी इतिहासकारों को तीर्थराज प्रयाग द्वारा चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को श्रीराम मंदिर निर्माण की प्रेरणा मिलना मिथक लगना स्वाभाविक ही है क्योंकि वो पूर्वाग्रह से ग्रसित रहते हैं। उन्हें ज्ञात न हो कि ऐसी घटनायें तो आज भी हो रही है।
- जब श्री कृष्ण मोहन पांडे फैजाबाद (अब अयोध्या) के जिला जज नियुक्त हुए तो उन्होंने 40 वर्ष से लंबित इस मुकदमे को प्राथमिकता दी थी। जज कृष्ण मोहन पांडे के फैसले को भी याद करना चाहिये जो उन्होंने 1 फरवरी 1986 को दिया था।
- इस निर्णय के लिये उन्हें सरकारी प्रताड़ना का भी भाजन बनना पड़ा।
- इसी आदेश से जन्मभूमि का ताला खोलकर हिंदुओं को वहाँ पूजा पाठ करने की अनुमति दी गई थी और इसका क्रेडिट भी कांग्रेसी लूटने का कुप्रयास करती रही है।
- इस प्रसंग में उन्हीं के शब्दों को समझाना आवश्यक है । 1991 में उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘अंतरात्मा की आवाज’ में लिखा है :
- ”जिस दिन मैं ताला खुलवाने का फैसला दे रहा था उस दिन मुझे बजरंगबली के वानर के रूप में दर्शन हुए। मेरे दरबार की छत पर एक काला बंदर दिन भर झंडा-स्तंभ पकड़े बैठा रहा। जो लोग इस फैसले को सुनने के लिए दरबार में आए थे, वे उन्हें चना दे रहे थे और उस बंदर को मूँगफली, लेकिन मजे की बात है कि उस बंदर ने कुछ भी नहीं खाया। वह चुपचाप झंडा चौकी पकड़कर लोगों को देखता रहा। वह मेरे आदेश सुनाते ही चला गया। जब फैसला देने के बाद डीएम और एसएसपी मुझे घर ले गए तो मैंने देखा कि वही बंदर मेरे घर के बरामदे में बैठा है। मैं बहुत हैरान हुआ। मैंने उसे प्रणाम किया। वह कोई दिव्य शक्ति रही होगी।”
- आज भी प्रत्यक्ष रूप से चमत्कार दिख रहा है लेकिन अंधों को तो नहीं दिख सकता।
- लुप्तप्राय गिद्ध (जटायु के प्रतीक) एक-दो नहीं झुंडों में अयोध्या के निकट एक गांव में देखे गये। संबंधित विभाग और अन्य शोध करने वाले भी अचंभित हैं। लेकिन सामान्य जन अचंभित नहीं आनंदित है क्योंकि वो समझ रहा है।
आप कौन हैं – मोदी
मोदी को लेकर एक प्रश्न उठाया जा रहा है आप कौन हैं? पवन खेड़ा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बार-बार पूछा था “आप कौन हैं?”
सनातनी पुनर्जन्म का सिद्धांत सिर्फ जानते ही नहीं समझते भी हैं। कहीं ऐसा तो नहीं चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने ही श्रीराम मंदिर के पुनर्निर्माण और भारत के स्वर्णिम काल की पुनर्वापसी के लिये मोदी के रूप में पुनर्जन्म लिया ?
इस तथ्य पर विचार करने की आवश्यकता है और यह विचार करने का अधिकार न तो ढोंगी इतिहासकारों को है, न समाजशाष्त्रियों को है और न ही वैज्ञानिकों को क्योंकि इसके लिये पहले पुनर्जन्म सिद्धांत को स्वीकारना होगा, फिर इस विषय में वेद-शास्त्रों का गहन अध्ययन करना होगा।
इसका विचार तो को दिव्यद्रष्टा संत ही कर सकते हैं।
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ सुशांतिर्भवतु ॥ सर्वारिष्ट शान्तिर्भवतु ॥
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।