रामनवमी कब है 2025 में – Ram navami

रामनवमी कब है 2025 में - Ram navami

भये प्रकट कृपाला – रामचरित मानस में भगवान श्रीराम की स्तुति

भए प्रगट कृपाला दीन दयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मनहारी अद्भुत रूप बिचारी॥
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता॥
करुना सुखसागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता॥

ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै॥
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥

माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते प परहिं भवकूपा॥

बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार ॥

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रामनवमी व्रत की विधि

रामनवमी व्रत को बहुत अधिक महत्वपूर्ण माना गया है, अन्य सभी व्रतों की अपेक्षा रामनवमी में अधिक पुण्य बताया गया है। लेकिन किसी भी व्रत का फल प्राप्त करने के लिये उसके नियम एवं विधियों का पालन करना भी आवश्यक होता है। वर्त्तमान काल में बहुत सारे ज्ञानी उत्पन्न हो गये हैं जो शास्त्रों के नियम और विधि को जाने या न जाने मनमाना नियम बता देते हैं।

व्रत का तात्पर्य न तो केवल अन्न-जल का त्याग करना होता है, न ही मनमाने तरीके से करना होता है। व्रत के लिये शास्त्रों में जो नियम कहे गये हैं उन नियमों और विधियों का पालन करना आवश्यक होता है। शास्त्र में बताये गये नियम और विधियों का त्याग कर मनमाने तरीके से कुछ भी करने का वास्तविक तात्पर्य यही होता है कि न तो श्रद्धा है न विश्वास और ऐसे लोग ही मनमाने तरीके से धर्माचरण करते है जो स्वाँग मात्र ही कहा जा सकता है।

  • रामनवमी से एक दिन पहले ही व्रत का नियम ग्रहण करे अर्थात स्नानादि करके विशेष रूप से शुद्ध हो जाये।
  • रामनवमी के पहले दिन एकभुक्त करे। एकभुक्त का अन्न-जल दोषरहित होना चाहिये। भिक्षा में प्राप्त अन्न शुद्ध हो सकता है किन्तु अनीतिपूर्वक अर्जित किया गया अन्न-धन शुद्ध नहीं हो सकता। पुनः भौतिक रूप से अन्न को शुद्ध करना चाहिये, पापियों का स्पर्श तो दूर उस पर दृष्टि भी नहीं पड़नी चाहिये।
  • व्रत के लिये कहे गए सत्य, अक्रोध, अस्तेयादि दश नियमों का न्यूनतम तीन दिन पालन करे और व्रत के एक दिन पहले ही नियम ग्रहण करे।
  • विद्वान ब्राह्मण/गुरु से इन सभी नियमों का पालन करके व्रत करने की आज्ञा ग्रहण करे। बिना आज्ञा प्राप्त किये ही जो व्रतादि किये जाते हैं वो अनधिकृत या अमान्य होते हैं।
  • व्रत के दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर नित्यकर्म करे।
  • मध्याह्न काल में सामर्थ्यानुसार विधि-विधान से पूजा-हवन करे।
  • विद्वान ब्राह्मण से कथा श्रवण करे। यदि व्यक्तिगत रूप से न कर सके तो सामूहिक रूप से करे।
  • सायंकाल पुष्पाञ्जलि-आरती करके रात्रि जागरण करे।
  • अगले दिन पुनः प्रातः काल (अरुणोदय वेला में) नित्यकर्म करके देवताओं की पूजा और विसर्जन करे।
  • ब्राह्मण को दक्षिणा से संतुष्ट करे, उत्तम भोजन कराये। फिर स्वयं भोजन करे।

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