वर्ष 2026 में एक अत्यंत दुर्लभ और भ्रमकारी ज्योतिषीय संयोग बन रहा है। 14 जनवरी 2026 को पूरे भारत में मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाएगा, परंतु इसी दिन षटतिला एकादशी भी पड़ रही है। सनातन धर्मावलंबियों के बीच अब यह चर्चा का विषय है कि एकादशी का निराहार व्रत रखें या संक्रांति पर खिचड़ी का सेवन करें? विशेषकर गृहस्थों के लिए यह स्थिति और भी पेचीदा है क्योंकि शास्त्र संक्रांति पर उपवास का निषेध करते हैं। आइए, इस गुत्थी को शास्त्रों के प्रमाणों से सुलझाते हैं।
मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी एक ही दिन: गृहस्थ क्या करें? व्रत रखें या खिचड़ी खाएं? जानें शास्त्रोक्त समाधान
वर्ष 2026 में धर्मपरायण परिवारों के सामने एक विचित्र स्थिति उत्पन्न होने वाली है। 14 जनवरी को सूर्य का मकर राशि में प्रवेश (संक्रांति) और भगवान विष्णु की प्रिय षटतिला एकादशी एक साथ पड़ रही हैं। जहाँ एक ओर जैमिनी ऋषि पुत्रवान गृहस्थों को संक्रांति पर उपवास से वर्जित करते हैं, वहीं एकादशी का नित्य व्रत छोड़ना भी वर्जित है। क्या इस दिन खिचड़ी खाना शास्त्र सम्मत होगा? या फलाहार से ही व्रत पूर्ण होगा? आइये जानते हैं स्मृतियों और पुराणों के प्रकाश में इसका सटीक उत्तर …
गृहस्थों के लिए महा-संकट: जैमिनी ऋषि का निषेध
एक बड़ी समस्या २०२६ में मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी एक ही दिन, अब क्या और कैसे करें ? यह एक समस्या है और इस पर लोगों में भ्रम उत्पन्न हो सकता है। एकादशी को निराहार रहना और संक्रांति को उपवास न करना ये भ्रम का मुख्य विषय है। इस विषय में शास्त्रों के अनुसार क्या और कैसे करें यह समझना अत्यावश्यक है।
आदित्येऽहनिसंक्रान्तौ ग्रहणेचन्द्रसूर्ययोः। उपवासो न कर्त्तव्यः पुत्रिणागृहिणा तथा ॥
यह जैमिनी का वचन है जो पुत्रवानों और गृहस्थों के लिये रविवार, संक्रांति और सूर्य-चन्द्र ग्रहण में उपवास का निषेध करता है। 2026 में मकर संक्रांति बुधवार को है, लेकिन संक्रांति होने के कारण यहाँ उपवास का निषेध लागू होता है।
एकादशी का ‘नित्य व्रत’ और उसका महत्व
दूसरी ओर, एकादशी को ‘व्रतराज’ कहा गया है। पद्म पुराण के अनुसार एकादशी एक ‘नित्य व्रत’ है, जिसे किसी भी स्थिति में छोड़ा नहीं जा सकता। एकादशी के दिन अन्न (चावल, दाल, अनाज) का सेवन महापाप माना गया है। गृहस्थों और पुत्रवानों के लिये यही समस्या है कि एक ओर तो संक्रांति है जिसमें उपवास का निषेध है और दूसरी ओर षटतिला एकादशी है जिसका उपवास भी करना है।
विरोधाभास का विश्लेषण: क्या खिचड़ी खाना सही है?
मकर संक्रांति पर खिचड़ी (चावल और दाल), तिल या तिल से बनी वस्तुयें खाने की परंपरा है, लेकिन एकादशी तिथि पर चावल और दाल (शिम्बी धान्य) दोनों पूरी तरह वर्जित हैं। यदि आप संक्रांति के नाम पर खिचड़ी खाते हैं, तो एकादशी व्रत भंग होता है। और यदि आप पूर्ण उपवास करते हैं, तो जैमिनी ऋषि के मतानुसार गृहस्थ धर्म का उल्लंघन होता है।

शास्त्रोक्त समाधान: ‘प्रतिनिधि’ और ‘फलाहार’ का मार्ग
धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार, जब नित्य व्रत (एकादशी) और निषेध तिथि (संक्रांति) एक साथ हों, तो मध्यम मार्ग अपनाना चाहिए:
- निराहार न रहें: चूंकि गृहस्थ के लिए संक्रांति पर उपवास मना है, इसलिए आप ‘फलाहार’ (दूध, फल, शकरकंद) ग्रहण करें। फल ग्रहण करने से वह ‘उपवास’ (Complete Fast) नहीं कहलाता, जिससे जैमिनी ऋषि के नियम का पालन हो जाता है।
- व्रत की विधि : चूंकि वह एकादशी भी है, इसलिए ‘अन्न’ या ‘खिचड़ी’ का सेवन बिल्कुल न करें। किन्तु नक्त, एकभक्त, अयाचित आदि विधियों के अनुसार एकादशी करें। इसमें उपवास की अनिवार्यता नहीं होती अपितु व्रत के अनुसार आहार (हविष्यान्न) ग्रहण किया जा सकता है और इस प्रकार संक्रांति में उपवास न करने के नियम का भी पालन होगा और एकादशी के व्रत का भी।
- तिल का प्रयोग: षटतिला एकादशी में तिल का भक्षण अनिवार्य है, लेकिन इसे ‘भोजन’ के रूप में नहीं बल्कि अपितु षटतिला एकादशी के व्रत नियम के अनुसार ही ग्रहण किया जा सकता है।
निष्कर्ष: भ्रम में न पड़ें
“षटतिला एकादशी स्वयं में वह समाधान लेकर आती है जो मकर संक्रांति के भ्रम को दूर करता है। जहाँ एक ओर संक्रांति पर खाली पेट रहना वर्जित है, वहीं षटतिला का ‘तिल भक्षण’ नियम गृहस्थों को वह मार्ग देता है जिससे वे बिना अन्न खाए भी ‘खाली पेट’ नहीं रहते। यह धर्म का अद्भुत संतुलन है।”
तिलस्नायी तिलोद्वर्ती तिलहोमी तिलोदकी । तिलभुक् तिलदाता च षट्तिलाः पापनाशकाः ॥
षटतिला एकादशी का एक विशेष नियम है तिल का छः प्रकार से सेवन करना, जो षट्तिला एकादशी माहात्म्य में भी वर्णित है और श्लोक ऊपर दिया गया है : षटतिला एकादशी का नाम ही इसके विधान ‘षट’ (छह) और ‘तिल’ से बना है। शास्त्र स्पष्ट निर्देश देते हैं कि इस दिन सफलता और पाप मुक्ति के लिए तिल का छह रूपों में प्रयोग अनिवार्य है। जब षट्तिला एकादशी के विधान में ही तिलभक्षण का नियम है तो एकादशी को तिल भक्षण करने से एकादशी के नियम का उल्लंघन न होकर पालन होगा । मकर संक्रांति और एकादशी के इस संयोग में, यह नियम और भी प्रासंगिक हो जाता है। यहाँ उन छह प्रकारों का विवरण और संक्रांति के साथ संगति की गयी है।

षटतिला एकादशी के छह अनिवार्य तिल-प्रयोग:
- तिल स्नान: जल में तिल मिलाकर स्नान करना ।
- तिल उबटन: शरीर पर तिल का उबटन लगाना (यह आरोग्य और शुद्धि देता है)।
- तिल हवन: हवन में तिलों की आहुति देना (विष्णु पूजन का मुख्य भाग)।
- तिल तर्पण: पितरों को तिल मिश्रित जल से तर्पण करना (संक्रांति पर पितृ तर्पण अक्षय फल देता है)।
- तिल दान: तिल या तिल से बनी वस्तुओं का दान (संक्रांति का मुख्य कर्म)।
- तिल भक्षण: तिल का सेवन करना।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: 2026 में मकर संक्रांति और एकादशी एक ही दिन होने पर क्या खिचड़ी खाना अनिवार्य है?
उत्तर: मकर संक्रांति पर खिचड़ी का दान महापुण्यदायी है, लेकिन एकादशी तिथि होने के कारण इसका सेवन वर्जित है। शास्त्रों के अनुसार, एकादशी का व्रत ‘नित्य’ है, इसलिए संक्रांति की खिचड़ी का सेवन अगले दिन (द्वादशी) पारण के समय करना ही श्रेष्ठ है।
प्रश्न 2: जैमिनि ऋषि के अनुसार गृहस्थों को संक्रांति पर उपवास क्यों नहीं करना चाहिए?
उत्तर: जैमिनि स्मृति के अनुसार, संक्रांति, रविवार और ग्रहण के दिन ‘पूर्ण निराहार उपवास’ करने से गृहस्थों के स्वास्थ्य और वंश वृद्धि पर प्रभाव पड़ता है। इसलिए, इस दिन पूरी तरह खाली पेट रहने के बजाय फलाहार या दुग्धाहार लेने का परामर्श दिया जाता है।
प्रश्न 3: क्या षटतिला एकादशी पर तिल खाना अन्न खाने के समान है?
उत्तर: नहीं, तिल ‘अष्ट धान्य’ में नहीं आता। षटतिला एकादशी पर तिल का सेवन विधि का हिस्सा है।
प्रश्न 4: यदि मैं पुत्रवान गृहस्थ हूँ, तो क्या मैं एकादशी व्रत छोड़ सकता हूँ?
उत्तर: एकादशी व्रत का त्याग दोषपूर्ण माना गया है। समाधान यह है कि आप ‘निराहार’ (बिना जल/भोजन) रहने के बजाय ‘फलाहारी’ व्रत रखें। इससे जैमिनि ऋषि के निषेध (उपवास न करने) और एकादशी के नियम (अन्न न खाने) दोनों का पालन हो जाएगा। षटतिला एकादशी के नियम में एक नियम तिल सेवन करना भी है अतः इससे मकर संक्रांति और एकादशी दोनों ही नियमों का पालन हो जायेगा।
प्रश्न 5: मकर संक्रांति 2026 का पुण्यकाल और दान का सही समय क्या है?
उत्तर: 14 जनवरी 2026 को सूर्योदय के साथ ही संक्रांति का पुण्यकाल प्रारंभ हो जाएगा। एकादशी और संक्रांति के इस संयोग में तिल, गुड़, वस्त्र और खिचड़ी (कच्चा अनाज) का दान करना सामान्य दिनों से सौ गुना अधिक फलदायी होगा।
प्रश्न 6: तिल अन्न में आता है या फल में ?
उत्तर: यह एक गंभीर प्रश्न है और इसके संबंध में अंतर्जाल पर भ्रामक जानकारी भरी हुई है। मैंने AI पर इस विषय में शोध किया और वो बारम्बार तिल की गणना फल में ही करता रहा और यह कहता रहा कि तिल की गणना अष्टधान्य में नहीं होती। और मेरी दृष्टि में ये धूर्तता है, जनमानस को दिग्भ्रमित करने का प्रयास है जो निन्दनीय है। अरे जब धान्य की चर्चा होती है तो मुख्य रूप से सप्तधान्य की चर्चा की जाती है और इसके अनेकों प्रमाण मिलते हैं एवं तिल की गणना धान्य (अन्न) में ही की गई है न कि फल में । इस विषय में विस्तृत विमर्श पृथक आलेख में करेंगे यहां दो श्लोक यहां दिया गया है और दोनों में ही तिल ग्रहण किया गया है :
- यवधान्यतिलाः कंगु मुद्गचणकश्यामकाः। एतानि सप्तधान्यानि सर्वकार्येषु योजयेत्॥
- यवगोधूमधान्यानि तिलाः कङ्गुस्तथैव च।श्यामाकाश्चणकश्चैव सप्तधान्यामुदाहृतं ॥
॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








