“जब तक सपिण्डीकरण न हो, तब तक प्रेत ‘पितृ-गण’ में सम्मिलित नहीं होता।”
श्राद्ध में पुरोहित को भी दान क्यों किया जाता है यह एक गंभीर प्रश्न है और यत्र-तत्र उत्पन्न होते ही रहते हैं किन्तु इसका प्रामाणिक उत्तर कहीं कहते-सुनते नहीं देखा जाता है जो कर्मकाण्डियों को संदिग्ध सिद्ध कर देता है। जबकि इस प्रश्न का उत्तर गरुडपुराण (षोडषाध्यायी – प्रेतकल्प) में भी मिलता है एवं लगभग सभी कर्मकांडी ब्राह्मण कथा कहते हैं। यदि आपको भी कभी यह प्रश्न निरुत्तर करता रहा है तो आज आपके लिये यहां इस प्रश्न का प्रामाणिक उत्तर यहां दिया जायेगा एवं आगे उपयोगी सिद्ध होगा क्योंकि आगे से निरुत्तर नहीं होंगे।
इसके साथ ही एक और प्रश्न है कि सामन्योत्सर्ग जो प्राङ्गण में पुरोहित को दिया जाता है वह एकदशाह को करे अथवा द्वादशाह को ? दोनों प्रश्न परस्पर संबंधित भी हैं और दोनों का ही उत्तर गरुडपुराण में ही मिलता है।
श्राद्ध में पुरोहित को भी दान क्यों किया जाता है ?
आज हमारी चर्चा के जो दो मूल प्रश्न हैं वो हैं :
- श्राद्ध में महापात्र को दान देने के पश्चात् पुरोहित को भी दान क्यों दिया जाता है ?
- प्राङ्गणकृत्य सामान्योत्सर्ग एकादशाह को करें या द्वादशाह को ?
सभी जीव प्रारब्ध के वशीभूत तो होते हैं किन्तु कर्म (सत-रज-तम/पुण्य-पाप) कि स्वतंत्रता अवश्य ही रहती है। इस संसार में आये सभी प्राणियों की भूमिका भी निर्धारित होती है किन्तु उस भूमिका का निर्वहन वो करेगा अथवा नहीं यह निर्णय लेने की स्वतंत्रता उसे होती है, जैसे महाभारत सबके साथ गाण्डीवधारी अर्जुन की विशेष भूमिका निर्धारित तो थी किन्तु वो निर्वहन से पीछे हट रहा था तब भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान प्रदान किया।

इसी कड़ी में मैं जब अपनी भूमिका को समझने का प्रयत्न करता हूँ तो ऐसा लगता है कि मात्र जीवन व्यतीत करना अनुचित होता है और अपनी क्षमता के अनुसार जहां पर सुधार/शोध आदि किया जा सके करना ही चाहिये। आपकी भूमिका आपके सामर्थ्य से प्रत्यक्ष जुड़ी होती है यदि दूसरे शब्दों में कहें तो आपकी जो भूमिका होती है आपको उसके निर्वहन संबंधी सामर्थ्य भी प्राप्त होते हैं जैसे अर्जुन की भूमिका महाभारत में थी तो उसके पास युद्धज्ञान, दिव्यास्त्र और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भी थे।
ये सब सामर्थ्य उसकी भूमिका के अनुकूल ही उसे प्राप्त हुआ था और इसी प्रकार सभी अपनी भूमिका की पहचान कर सकते हैं कि संसार में उनकी भूमिका क्या है ? जहां तक मैंने अपनी भूमिका को समझने का प्रयास किया तो मुझे यही ज्ञात होता है कि वर्त्तमान युग में धर्म/कर्मकांड क्षत-विक्षत है, ढांचा मात्र अवशेष है और उसमें भी पाषण्ड का ही वास है।
मेरे चिंतन का विषय यही रहता है कि धर्म की स्थापना ब्राह्मण का कर्तव्य है और वर्त्तमान युग में धर्म की स्थापना हेतु किस प्रकार से योगदान दे सकता हूँ। यदि सामान्य लोगों की बात करें तो धर्म कर कर्मकाण्ड भी उन्हीं तक सीमित है, जैसे ही धन-संपत्ति बढती है धर्म-कर्मकाण्ड से निवृत्ति और पाखण्ड-पाप में प्रवृत्ति होने लगती है और जो जितने धनाढ्य होते हैं वो धर्म से उतने ही अधिक विमुख होते हैं एवं पाप के उतने ही निकट होते हैं। एक उदाहरण से समझें तो अधिक पुष्ट हो जायेगा :
सामान्य जन अब जाकर विधवाविवाह के प्रति भ्रमित हो गया है और करने लगा है किन्तु मात्र दो-तीन दशक पीछे जायें तो किसी भी प्रकार से भ्रमित नहीं था एवं नहीं करता था। यदि ब्राह्मणों की बात करें तो अभी भी अपवादस्वरूप ही होता है। किन्तु धनाढ्य वर्ग की बात करें तो विधवा विवाह क्या तलाक और शादी भी एक क्रीड़ा की भांति हो गया है। सामान्य जन में अभी भी धर्म का इतना तो अवशेष है कि वो तलाक और शादी के खेल को स्वीकार नहीं कर रहे हैं वो विवाह को प्रतीकात्मक रूप से ही सही किन्तु विवाह के स्वरूप में ही अंगीकार करते हैं।
इसको स्पष्ट करने के पश्चात् एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह आता है कि ऐसा क्यों हो रहा है तो इसका मूल कारण कलयुग का प्रभाव होना है और भले ही वर्त्तमान में सामान्य जन धर्म को प्रतीकात्मक रूप से ही सही धारण करते हैं किन्तु इन्हें भी भ्रमित करने का पर्याप्त प्रयास और षड्यंत्र किया जा रहा है एवं भक्ष्याभक्ष्य विचार समाप्त हो चुका है अथवा मांस और मदिरा अभक्ष्य-अपेय मात्र मानते हैं वो भी वो जो शाकाहारी वैष्णव वर्ग हैं। इसके अतिरिक्त और कुछ भी न तो अभक्ष्य रहा न अपेय अर्थात यदि मांस-मदिरा को छोड़ दें वो भी कुछ लोगों के लिये हो तो शेष स्वतः सर्वभक्षी सिद्ध हो जाते हैं क्योंकि ऐसा ही हो रहा है।

ये षड्यंत्र पूर्वक ही किया गया है और जनमानस को जाल में फंसाया गया है। आज जो इस प्रकार की बातें करते हैं उन्हें ही पिछड़ा, उन्नीसवीं सदी का, दकियानूसी विचारों वाला आदि कहा जाता है और जो पातकी हैं वो बड़े गर्व से ५६ इंच का सीना करके कहते हैं मैं इन सब बातों को नहीं मानता। यद्यपि यह शास्त्र ही बताते हैं कि कलयुग का प्रभाव और बढ़ता ही जायेगा एवं भारतीय मनुष्य भी म्लेच्छाचारी हो जायेंगे अर्थात इसको रोका नहीं जा सकता।
किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं होता कि हम सब जान बूझकर म्लेच्छाचारी ही बन जायें, धर्म का पूर्णतः परित्याग कर दें। जैसे यदि कोई चाकू से गले पर प्रहार कर रहा है तो वहां हाथ आगे करके गले की सुरक्षा करनी ही चाहिये भले ही हाथ कट क्यों न जाये किन्तु हाथ की सुरक्षा के लिये गले को नहीं कटाया जा सकता। इसी प्रकार यदि धर्म को छिन्न-भिन्न करने का वैश्विक षड्यंत्र चल रहा है तो उस अवस्था में भी किसी न किसी प्रकार से रक्षा करने का प्रयास करना भी धर्म ही है।
जनमानस भ्रमित इस कारण हो जाते हैं कि नई पीढ़ियों को शास्त्र का रत्तीभर भी ज्ञान प्राप्त नहीं हो पाता, वो इतना भी नहीं समझते कि धर्म के विषय में शास्त्रों से ही ज्ञान प्राप्त हो सकता है यदि कदाचित समझ भी लें तो शास्त्र का तात्पर्य रामायण, भागवत, गीता मात्र समझते हैं उन्हें इतना भी नहीं ज्ञात की इतने शास्त्र हैं जिनका अध्ययन करने के लिये आयु कम पड़ जाएगी किन्तु तपाक से किसी भी विषय पर बोलने लगते हैं कि ऐसा कहीं नहीं लिखा है आदि-इत्यादि।
“ऐसा कहीं नहीं लिखा है” अथवा “ऐसा कहां लिखा है” आदि प्रश्न का तात्पर्य यह होता है कि शास्त्रों में जो लिखा है वही प्रमाण है वही मान्य है, किन्तु नई पीढ़ी इतनी दिग्भ्रमित हो चुकी है कि इसे लिखा हुआ दिखा भी दें तो नहीं स्वीकारेंगे और आगे तो उसे बदलने की बात भी करेंगे। मोहन भागवत ने कहा न कि “शास्त्र ऑउटडेटेड हो गये हैं, संशोधन करने की आवश्यकता है” अर्थात यदि हमारे मनोनुकल बातें यदि शास्त्रों में नहीं है तो हम उसे नहीं स्वीकारेंगे, शास्त्रों में भी मनोनुकूल बातें जोड़ेंगे, जैसे विधवा विवाह, तलाक आदि जोड़ेंगे, धर्म-पाप की परिभाषा बदलेंगे, अस्पृश्यता को हटायेंगे आदि।
इसका तात्पर्य क्या है अगली पीढ़ी को पूर्णतः शास्त्रविरोधी बनाया जा रहा है और वो भी “जय श्री राम”, “हर हर महादेव” आदि का ही नारा लगाकर। यदि शास्त्रों को संशोधित ही किया जायेगा तो ये लोग उसमें मोहन भागवत, मोदी आदि को भी भगवान के अवतार लिख देंगे और संभवतः यह भी इच्छा होगी।
धर्म की रक्षा के लिये यह आवश्यक है कि उसका ज्ञान हो और ज्ञान के लिये यह आवश्यक है कि उसका स्रोत शास्त्र हो, तर्क-कुतर्क नहीं या संशोधित शास्त्र नहीं। और इसी कड़ी में मेरी भूमिका मुझे यही प्रतीत होती है कि धर्म की रक्षा के लिये कर्मकांडी वर्ग को सामान्य बातें और किसी भी विषय से संबंधित प्रमाण और प्रमाणित तथ्य सरलता से प्राप्त हो सकें। धर्म का ज्ञान ब्राह्मण ही दे सकते हैं एवं इसके लिये जिन्होंने यह दायित्व स्वीकार किया है (वृत्तिवशात्) वो सामान्य प्रश्नों के तो कम से कम प्रामाणिक उत्तर दें, प्रमाणों के प्रति जागरूक हों।
जो प्रमाणों के प्रति ही जागरूक नहीं है, शास्त्र में ही निष्ठा नहीं रखता, कुतर्कजीवि है, वह धर्म की स्थापना में कोई योगदान नहीं कर सकता। इसलिये मैं उन जिज्ञासु कर्मकांडी ब्राह्मणों के लिये जिनका दायित्व धर्म की स्थापना करना है किसी भी विषय पर शास्त्रीय और प्रामाणिक विमर्श करता हूँ जो “संपूर्ण कर्मकांड विधि” व अन्यान्य ब्लॉग पर भी आपको प्राप्त होता है।
इसी कड़ी में इस आलेख का भी मूल दो प्रश्न आता है जो सामान्य कर्मकांडी ब्राह्मणों के लिये भी जानना आवश्यक है और यजमानों के लिये भी। क्योंकि किसी भी कर्म में श्रद्धा-विश्वास/आस्था तभी उत्पन्न हो सकता है जब उसका प्रामाणिक ज्ञान हो अर्थात शास्त्रीय ज्ञान हो और इसी कारण हम यहां इन प्रश्नों का शास्त्रीय उत्तर ही अवलोकन करेंगे और वर्त्तमान काल की व्यवस्था एवं अपने सामर्थ्य के आधार पर हमें यही हमारी भूमिका ज्ञात होती है।
श्राद्ध में महापात्र को दान देने के पश्चात् पुरोहित को भी दान क्यों दिया जाता है ?
“गरुड़पुराण का श्रवण वैकल्पिक नहीं, बल्कि पितृ-ऋण से मुक्ति का अनिवार्य मार्ग है।”
इस प्रश्न का उत्तर हमें गरुडपुराण के फलश्रुति से मिलता है इस कारण यह उत्तर प्रामाणिक भी सिद्ध होता है न कि तर्क पर आधारित। गरुडपुराण माहात्म्य का अंतिम तीन श्लोक इस प्रकार है :
श्रुत्वा दानानि देयानि वाचकायाखिलानि च । पूर्वोक्तशयनादीनि नान्यथा सफलं भवेत् ॥
पुराणं पूजयेत्पूर्वं वाचकं तदनन्तरम् । वस्त्रालङ्कारगोदानैर्दक्षिणाभिश्च सादरम् ॥
अन्नदानैर्हेमदानैर्भमिदानैश्च भूरिभिः । पूजयेद्वाचकं भक्त्या बहुपुण्यफलाप्तये ॥
यश्चेदं शृणुयान्मर्त्यो यथापि परिकीर्तयेत् । विहाय यातनां घोरां धूतपापो दिवं व्रजेत् ॥
गरुडपुराण/प्रेतकाण्ड (धर्मकाण्ड)/४९/१३३ – १३६
यद्यपि यदि षोडषाध्यायी संकलन में देखें तो वहां हमें यह श्लोक प्राप्त होता है :
वाचकास्यार्चनेनैव पूजितोऽहं न संशयः। संतुष्टे तुष्टितां यामि वाचके नात्र संशयः ॥
हमें इसमें पड़ने की आवश्यकता नहीं है अपितु मूल प्रश्न का उत्तर ढूंढने की है। यहां “श्रुत्वा दानानि देयानि वाचकायाखिलानि च” कहकर जो वाचक (गरुडपुराण वक्ता) को भी सभी प्रकार के दान देने की बात कही गयी है उसे समझने की है। “पूर्वोक्तशयनादीनि” से यह भी स्पष्ट किया गया है कि जो श्राद्ध के लिये शय्यादि दान पूर्वोक्त कहे हैं वो सभी कथावाचक को भी दे।
यहां यह तो सिद्ध हो गया कि कथावाचक को भी वो सभी दान दे जो श्राद्ध के लिये कहे गए हैं किन्तु पुरोहित को ही देना है इसपर आने से पूर्व यहां अब अगला प्रश्न यह उत्पन्न हो जाता है कि यदि गरुडपुराण की कथा श्रवण ही न करे तो क्या अर्थात तब क्यों दे, तब तो नहीं देना चाहिये। तो आगे उसका भी प्रामाणिक उत्तर प्राप्त होता है जो यह सिद्ध करता है कि गरुडपुराण श्रवण वैकल्पिक नहीं है कि मन करे तो सुने और न करे तो न सुने अपितु अनिवार्य है :
इदं कर्म न कुर्वन्ति ये नास्तिकनराधमाः। तेषां जलमपेयं स्यात्सुरातुल्यं न संशयः॥
देवताः पितरश्चैव नैव पश्यन्ति तद्गृहं। भवन्ति तेषां कोपेन पुत्राः पौत्राश्च दुर्गताः॥
न श्रुतं गारुडं येन गयाश्राद्धं च नो कृतं। वृषोत्सर्गः कृतौ नैव न च मासिकवार्षिके॥
स कथं कथ्यते पुत्रः कथं मुच्येदृणत्रयात्। मातरं पितरं चैव कथं तारयितुं क्षमः ॥
अब यह सिद्ध हो गया कि गरुडपुराण श्रवण अनिवार्य है और वक्ता को भी सभी प्रकार के दान देने ही चाहिये। तब पुरोहित वाले प्रश्न पर आना होगा कि पुरोहित को ही क्यों ? क्योंकि प्रथम अधिकारी तो पुरोहित ही होता है यदि वर्त्तमान काल के दुष्प्रभाव को छोड़कर शास्त्रीय विमर्श करें। पुरोहित होने का तात्पर्य अज्ञानी (मूर्ख) होना नहीं अपितु विद्वान ब्राह्मण होना ही है, एवं आश्रित व निकटवर्ती विद्वान ब्राह्मण को छोड़कर दूरस्थ का ग्रहण करना अतिक्रमण दोष कहलाता है अर्थात पुरोहित का ही प्रथम अधिकार होता है और अविद्वान का त्याग करके विद्वान को ग्रहण करने में अतिक्रमण दोष नहीं होता है।

वर्त्तमान में पुरोहितों के अविद्वान होने का कारण यह है कि पुरोहित वर्ग भी अपने बच्चों को डॉक्टर/इंजिनियर आदि ही बनाना चाहते हैं अथवा किसी न किसी नौकरी के लिये ही पढ़ाई कराते हैं, किन्तु वेदशास्त्र का ज्ञान नहीं देते। जो सफल हो जाता है वो तो इस वृत्ति से दूरस्थ हो जाता है क्योंकि उसकी आवश्यकता नहीं रहती किन्तु जो असफल हो जाये अर्थात कोई अन्य वृत्ति प्राप्त न कर पाये वह पुनः पौरोहित्य वृत्ति का आश्रय लेता है किन्तु शास्त्रज्ञान से रहित होता है।
किन्तु यहां एक दूसरा पक्ष भी है भले ही पुरोहित विद्वान न हों किन्तु सदैव विद्वान ही नहीं बुलाये जाते, जीवनपर्यन्त अनेकानेक कर्म ऐसे होते हैं जो पुरोहित ही संपन्न कराते हैं जैसे सत्यनारायण पूजा। इसी प्रकार समाज के मात्र धनीवर्ग ही विशेष विद्वान ब्राह्मण को आमंत्रित कर सकते हैं सभी लोग नहीं, समाज के अधिकांश यजमान वर्ग उस पुरोहित के ही आश्रित होते हैं और देश-काल-परिस्थिति के अनुसार धनाढ्यों को भी उसी पुरोहित का आश्रय लेकर रहना उचित है।
तीसरी बात यह भी है कि यजमानों का जो सामान्य व्यवहार होता है वो पुरोहित ही झेल सकता है, यदि विद्वान को पुरोहित बना भी लें तो भी वो पुरोहित व्यवहार (अधीनता) स्वीकार नहीं करेंगे और पुरोहित वही बन सकता है जो अधीनता/चाकरी (अनकही-व्यावहारिक) भी स्वीकार करे। इसी कारण यदि पुरोहित गरुडपुराण का पाठ मात्र करने में भी सक्षम न हो तो अन्य विद्वान को आमंत्रित किया जाता है किन्तु वो सदैव निर्वहन नहीं करेंगे इस कारण पुरोहित वही रहते हैं एवं कथावक्ता को अतिरिक्त दानादि प्रदान किया जाता है किन्तु मुख्य दान पुरोहित ही लेते हैं।
इस प्रकार यह पूर्णतः स्पष्ट हो गया श्राद्ध में पुरोहित को भी पृथक दान क्यों दिया जाता है। तथापि यदि आपकी कोई अन्य शंका शेष हो तो वो भी प्रकट कर सकते हैं हम उसका समाधान करने का प्रयास अवश्य करेंगे। पुरोहित को दिया जाने वाला यह दान सामन्योत्सर्ग नाम से जाना जाता है जो गृह प्रांगण में किया जाता है। अब दूसरा प्रश्न :
प्राङ्गणकृत्य सामान्योत्सर्ग एकादशाह को करें या द्वादशाह को ?
इस प्रश्न का भी प्रामाणिक हल ही निकालेंगे न कि तर्क-कुतर्क मात्र से। यद्यपि देवकर्म में नियुक्त होने वाले पुरोहितवर्ग हों अथवा पितृकर्म में नियुक्त होने वाले महापात्र हों दोनों ब्राह्मण ही हैं। प्रामाणिक रूप से योग्यता (तप और ज्ञान की अधिकता) के आधार पर ब्राह्मण को नियुक्त करने का विधान है किन्तु श्राद्ध में नियुक्त होने वाले ब्राह्मण के लिये अर्थात श्राद्धभोजी ब्राह्मण के लिये बहुत सारे अवरोध भी कहे गए हैं, तप भी कहे गए हैं और इस कारण यह सामाजिक वर्गीकरण देखने को मिलता है।
मान लीजिये एक समाज में एक ही दिन श्राद्ध भी है और विवाह अथवा कुछ अन्य कार्य तो श्राद्धभोजी ब्राह्मण विवाहादि में उसदिन नियुक्त नहीं हो सकता अथवा आगे भी प्रायश्चित्तादि तप के बिना नियुक्त नहीं किया जा सकता। इस कारण पुरोहित वर्ग उनसे पृथक हो गए जो विवाहादि कार्य करें किंतु श्राद्धभोजी न बने। बहुत स्थानों पर पुरोहितवर्ग के ऊपर भी श्राद्धभोजी बनने का दबाव देखा जाता है एवं एकादशाह के दिन भी भोजन कराया जाता है यह यजमान के लिये ही हानिकारक है, क्योंकि यदि किसी दूसरे यजमान का उसी दिन विवाहादि हो तो वो पुरोहित वहां भी नियुक्त होंगे ही होंगे।
इस विषय में हम यहां ढेरों प्रमाण नहीं देंगे मात्र एक ही प्रमाण प्रस्तुत करेंगे और भिज्ञजन इसका आशय समझ लेंगे, भले ही इसके विषय में भी ढेरों प्रमाण उपलब्ध हैं :
पुनर्भोजनमध्वानं यानमायासमैथुनम्। श्राद्धकृच्छ्राद्धभुक् चैव सर्वमेतद्विवर्जयेत्॥
स्वाध्यायं कलहं चैव दिवा स्वप्नञ्च सर्वदा।
मत्स्यपुराण/१६/५६, पद्मपुराण/१/९/१२०
पाचकान्ने नवश्राद्धे सग्रहे चन्द्रसूर्ययोः । स्त्रीणां प्रथमगर्भेषु भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥ अंगिरा स्मृति १०९
नवश्राद्धे त्रिपक्षे च षण्मासे मासिकेऽब्दिके । पतन्ति पितरस्तस्य यो भुङ्क्तेऽनापदि द्विजः ॥
चान्द्रायणं नवश्राद्धे पराको मासिके तथा । त्रिपक्षे चैव कृच्छ्रः स्यात्षण्मासे कृच्छ्रमेव च ॥
आब्दिके पादकृच्छ्रे स्यादेकाहः पुनराब्दिके। ब्रह्मचर्यमनाधाय मासश्राद्धेषु पर्वसु ॥
द्वादशाहे त्रिपक्षेऽब्दे यस्तु भुङ्क्ते द्विजोत्तमः । पतन्ति पितरस्तरय ब्रह्मलोके गता अपि ॥
एकादशाहेऽहोरात्रं भुक्त्वा संचयने त्र्यहम्। उपोष्य विधिवद्विनः कूष्माण्डीं जुहुयाद्धृतम् ॥
अत्रि संहिता ३०७ – ३११
इस प्रकार समाज में व्यावहारिक विसंगति और दोष से बचने के लिये श्राद्ध में नियुक्त होने वाले महापात्र और श्राद्ध में नियुक्त नहीं होने वाले पुरोहित दोनों भिन्न-भिन्न ब्राह्मण वर्ग बन गए।
श्राद्ध में नियुक्त होने वाले ब्राह्मण जो अन्यान्य कर्मों में नियुक्त नहीं हो सकते वो महापात्र वर्ग एक मात्र श्राद्ध में ही नियुक्त होते हैं और सपिंडीकरण पर्यन्त षोडश श्राद्ध में सम्पूर्ण अधिकार रखते हैं और वर्त्तमान में महापात्र हों अथवा पुरोहित किसी की भी योग्यता का विचार नहीं किया जा रहा है, कारण वही कि योग्य हों तो यजमान ही उनको न झेल पाये अर्थात यजमान भी अयोग्य ही होता है और अयोग्य के लिये योग्य उपलब्ध नहीं हो सकते।
शिखा आदि से रहित, व्रात्यादि अनेकानेक दोषयुक्त व्यक्ति योग्य ब्राह्मण का यजमान बनने का अधिकार ही नहीं रखता। अस्तु इस व्यावहारिक समस्या या विसंगति का निराकरण नहीं है। क्योंकि वही पुरोहित यदि योग्य हो जायें तो उस यजमान के यहां अधिक दान-दक्षिणा-सम्मान आदि मिलने पर भी न जायें जिसके यहां अयोग्यता के कारण कम दान-दक्षिणा और अपमान होने पर भी जाते हैं। योग्य ब्राह्मण का यजमान वही बन सकता है जिसका कर्माधिकार सुरक्षित हो, पाप का प्रायश्चित्त करता हो।
यहां जो स्पष्ट हो रहा है वो यह कि पुरोहित वर्ग सपिण्डीकरण से पूर्व भोजन आदि भी न करें, वरण-दान लेने की तो बात करनी ही नहीं चाहिये, अर्थात श्राद्ध कर्म में किसी भी प्रकार सम्मिलित ही न हों, यद्यपि सम्मिलित हो जाते हैं। इसका भी कारण है कि पुरोहित वर्ग ही अधिक संख्या में उपलब्ध होते हैं एवं कर्मकांड का थोड़ा-बहुत ज्ञान भी पुरोहितों ने ही सुरक्षित रखा है, कर्मकांड संबंधी ज्ञान के विषय में महापात्र वर्ग जो है वो पुरोहित वर्ग से भी पीछे रहता है और इस कारण जो उपलब्ध हैं उनको सम्मिलित होना ही होगा, भले ही भोजन-दान आदि ग्रहण न करें।
किन्तु यहां सम्मिलित होने पर भोजन भी एक प्रकार से बाध्यकारी हो जाता है श्राद्ध में वही ब्राह्मण सम्मिलित हो सकते हैं जो भोजन करें, जो भोजन नहीं करेंगे वो सम्मिलित ही नहीं हो सकते। तो इस विषय में विकल्प ही रहता है कि श्राद्धकर्ता के हाथ से भोजन नहीं करते हैं बस।
विमर्श यहां पर आ गया है कि पुरोहित सपिंडीकरण से पूर्व दानादि क्यों नहीं ले सकते ? इसका क्या प्रमाण है ?
सपिण्डने ततो वृत्ते पितृलोकं स गच्छति । तस्मात्पुत्त्रेण कर्तव्यं सपिण्डीकरणं पितुः ॥
संवत्सरे तु सम्पूर्णे कुर्यात्पिण्ड प्रवेशनम् । पिण्डप्रवेशविधिना तस्य नित्यं मृताह्निकम् ॥
निश्चितं पक्षिशार्दूल वर्षान्ते पिण्डमेलनम् । सहपिण्डे कृते प्रेतस्ततो याति परां गतिम् ॥
तन्नाम सम्परित्यज्य ततः पितृगणो भवेत्। त्रिपक्षे वापि षण्मासे मेलयेत्प्रपितामहैः ॥
ज्ञात्वा वृद्धिविवाहादि स्वगोत्रविहितानि च। विवाहं नैव कुर्वीत मृते च गृहमेधिनि ॥
भिक्षुर्भिक्षां न गृह्णाति यावत्कुर्यात्सपिण्डनम्। स्वगोत्रेऽप्यशुचिस्तावद्यावत्पिण्डं न मेलयेत् ॥
मेलनात्प्रेतशब्दस्तु निवर्तेत खगेश्वर ॥
गरुडपुराण/२/२६/७ – १२
गरुडपुराण (षोडषाध्यायी) के अध्याय १३ में कुछ इस प्रकार मिलता है :
मया तु प्रोच्यते तार्क्ष्यशास्त्रधर्मानुसारतः। चतुर्णामेव वर्णानां द्वादशाहे सपिण्डनम्॥
अनित्यत्वात्कलिधर्माणां पुंसां चैवायुषः क्षयात् । अस्थिरत्वाच्छरीरस्य द्वादशाहे प्रशस्यते॥
व्रतबन्धोत्सवादीनि व्रतस्योद्यापनानि च। विवाहादि भवेन्नैव मृते च गृहमेधिनि॥
भिक्षुर्भिक्षां न गृह्णाति हन्तकारो न गृह्यते। नित्यं नैमित्तिकं लुप्येद्यावत्पिण्डो न मेलितः॥ ३२॥
कर्मलोपात्प्रत्यवायी भवेत्तस्मात्सपिण्डनम् । निरग्निकः साग्निको वा द्वादशाहे समाचरेत्॥
गरुडपुराण (षोडषाध्यायी) /१३/२९ – ३३
अस्थिक्षेपे गयाश्राद्धं श्राद्धञ्चापरपक्षिकम् । अब्दमध्ये न कुर्वीत सपिण्डीकरणं विना ॥
गरुडपुराण २/३४/११३
भिक्षुर्भिक्षां न गृह्णीयाद्यावन्न स्यात्सपिण्डनम् । स्वगोत्रेष्वशुचिस्तावद्यावत्पिण्डं न मेलयेत् ॥
आनन्त्यात्कुलधर्माणां पुंसां चैवायुषः क्षयात्। अस्थिरत्वाच्छरीरस्य द्वादशाहे सपिण्डयेत् ॥
लक्ष्मीनारायणसंहिता/खण्डः १ (कृतयुगसन्तानः)/७३/१९ – २१
यहां अनेकों प्रमाणों द्वारा यह स्पष्ट होता है कि सपिण्डीकरण से पूर्व प्रेतकर्म के अतिरिक्त अन्यान्य सभी कर्म निषिद्ध होते हैं। इस प्रकार वो सभी कर्म निषिद्ध हो जाते हैं जिसमें पुरोहित ब्राह्मण की आवश्यकता होती है। यह उपरोक्त प्रमाणों का निष्कर्ष है उसका विश्लेषण नहीं किया जा रहा है विद्वद्जन स्वयं ही चिंतन-मनन करें क्योंकि मनन शक्ति तो होनी ही चाहिये।
विवाहादि कर्म, गयाश्राद्ध, व्रतोत्सवादि के साथ ही अन्यान्य सभी नित्य-नैमित्तिक कर्मों का सपिण्डीकरण न होने पर बाध हो जाता है। ब्राह्मण (पुरोहित) भोजन, पुरोहित को दानादि की तो चर्चा ही क्या करें, अतिथिभोजन, भिक्षा आदि तक का भी बाध स्पष्ट हो रहा है। अस्तु पुरोहित वर्ग का भोजन, पुरोहित को दिया जाने वाला दान प्रमाणों द्वारा सपिण्डीकरण के पश्चात् को ही सिद्ध होता है, एकादशाह को नहीं। यद्यपि व्यवहार में बहुत स्थानों पर एकादशाह के दिन ही होते हैं।

अब यहां आगे एक प्रश्न पुनः उत्पन्न होता है कि यदि पुरोहित को दानादि नहीं कर सकते तो महापात्र को (एकादशाह को होने वाला दान) कैसे दे सकते हैं? यद्यपि ऊपर यह स्पष्ट किया जा चुका है कि प्रेतकर्म (श्राद्ध) के अतिरिक्त अर्थात महापात्र की नियुक्ति जिसमें हुई हो उसके अतिरिक्त अन्य कर्मों का बाध होता है, प्रेतत्वनिवृत्यर्थ महापात्र को दान देने का नहीं और इसके प्रशस्त होने के बहुशः प्रमाण भी गरुडपुराण में ही प्राप्त होते हैं। हम यहां मत्स्यपुराणोक्त प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं :
सूतकान्ताद्वितीयेऽह्नि शय्यां दद्याद्विलक्षणाम्। काञ्चनं पुरुषं तद्वत् फलवस्त्रसमन्विताम्॥
संपूज्य द्विजदाम्पत्यं नानाभरणभूषणैः। वृषोत्सर्गं प्रकुर्वीत देया च कपिला शुभा॥
मत्स्यपुराण/१८/१२ – १४
अन्यान्य प्रमाण गरुडपुराण में वर्णित एकादशाह विधि में अवलोकनीय।
इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि वर्त्तमान काल में सपिण्डीकरण द्वादशाह को ही प्रशस्त है किन्तु सपिण्डीकरण से पूर्व अन्य कर्म (जिसमें पुरोहित नियुक्त होते हों) का बाध हो जाता है और इस कारण एकादशाह को सामान्य उत्सर्ग (पुरोहित को दिया जाने वाला दान) निषिद्ध सिद्ध होता है। एवं महापात्र को दिया जाने वाला दान एकादशाह को ही सिद्ध होता है।
आगे सामान्योत्सर्ग विषयक एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न होता है “पुरोहित को दिये जाने वाले दान-दक्षिणा आदि में यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय का प्रयोग क्यों करते हैं जबकि पुरोहित का तो नाम-गोत्र होता है ?” इस प्रश्न का तार्किक हल अगले आलेख में प्रस्तुत करेंगे।
निष्कर्ष: शास्त्र-सम्मत दृष्टिकोण की अनिवार्यता
शास्त्रों के अनुसार, पुरोहित को दिया जाने वाला दान ‘सामान्योत्सर्ग’ पितरों की अक्षय तृप्ति का कारण बनता है। काल-निर्णय के विषय में यह स्पष्ट है कि सपिण्डीकरण (द्वादशाह) से पूर्व अन्य नित्य-नैमित्तिक कर्मों का बाध होता है, अतः पुरोहित को दिया जाने वाला मुख्य दान सपिण्डीकरण के उपरांत ही शास्त्रसम्मत प्रतीत होता है। विधि और पात्र का सही चयन ही श्राद्ध को ‘आसुरी’ होने से बचाकर ‘दैवीय’ फल प्रदान करता है।
॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
“संबंधित प्रश्न” (FAQ)
FAQs
प्रश्न: श्राद्ध में पुरोहित को दान देना क्यों अनिवार्य है?
उत्तर: गरुड़पुराण के अनुसार, कथावाचक (पुरोहित) की पूजा के बिना श्राद्ध निष्फल होता है। वक्ता की संतुष्टि ही साक्षात् भगवान की संतुष्टि मानी गई है।
प्रश्न: सामान्योत्सर्ग एकादशाह को करना चाहिए या द्वादशाह को?
उत्तर: शास्त्रीय प्रमाणों के अनुसार, सपिण्डीकरण (द्वादशाह) से पूर्व अन्य कर्मों का बाध होता है, अतः सपिण्डीकरण के पश्चात ही पुरोहित को दान देना श्रेष्ठ है।
प्रश्न: क्या महापात्र और पुरोहित एक ही दिन दान ले सकते हैं?
उत्तर: महापात्र एकादशाह के प्रेत-कर्म में दान लेते हैं, जबकि पुरोहित सपिण्डीकरण के पश्चात पितृ-भाव प्राप्त होने पर दान के अधिकारी होते हैं।
प्रश्न: गरुड़पुराण श्रवण क्यों आवश्यक है?
उत्तर: जो नास्तिकवश गरुड़पुराण नहीं सुनते, उनके घर के जल को पितर स्वीकार नहीं करते और उनके वंश में दुर्गति होती है।
प्रश्न: ‘वाचक’ की पूजा का क्या फल है?
उत्तर: वाचक की पूजा से साक्षात् श्रीहरि प्रसन्न होते हैं और श्रोता समस्त पापों से मुक्त होकर दिव्य लोक को प्राप्त करता है।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








