“वर्त्तमान शिक्षा कहने के लिये उच्च हो सकती है किन्तु इसने विवेक को हर लिया है।”
कन्यादान (Kanyadan) को विविध दानों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है और पितरों कि ये आकांक्षा होती है कि उनके वंश में कोई ऐसा धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न हो जो कन्यादान (गौरी) करे। धर्म और शास्त्र के सभी विषय बस औपचारिक कर्मकांड तक ही सीमित होते रहने के कारण कर्मकांड भी शास्त्रविरुद्ध होता जा रहा है, हां अज्ञानियों को अवश्य ऐसा प्रतीत होता है कि धर्म की वृद्धि हो रही है क्योंकि ६५ करोड़ डुबकी तो लगाते हैं। कन्यादान के विषय में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हैं जिनका ज्ञान न होने से विवाह ही नहीं परिवार का भी अस्तित्व संकट में है। यहां हम कन्यादान के कुछ विशेष महत्वपूर्ण तथ्यों और उनसे जुड़े प्रश्नों का उत्तर समझेंगे।
शास्त्रसम्मत कन्यादान : भ्रांतियां और सत्य – Kanyadan
पुष्पं पुष्पं विचिनुयान्मूलच्छेदं न कारयेत् । मालाकार इवारामे न यथाङ्गारकारकः ॥
पाराशरस्मृति/१/६२
विवाह में वरार्चन करके देवाग्निद्वज के सन्निधान में कन्या दान किया जाता है। सामान्य जन कन्यादान का तात्पर्य इतना ही लेते हैं कि बेटी के विवाह में पिता गोत्रोच्चारण पूर्वक कन्या का दान करता है जिससे बहुत ही पुण्य का भागी बनता है। इससे अधिक जो चर्चा होती है वो यह भी कि कन्यादान को तो सरकार प्रतिबंधित कर चुकी है और अब कन्यादान नहीं हो पाता है? अविवेक का स्तर और दुर्भाग्य देखिए कि स्वीकार करने के पश्चात् आधुनिक युग की भी बात करता है और सब उचित है ऐसा भी सिद्ध करने का प्रयास करता है, किन्तु इसमें क्या-क्या दोष उत्पन्न हुआ, उसका सम्मार्जन कैसे होगा यह सोच भी नहीं पाता ।
हम यहां भी ध्यानाकर्षण करेंगे। पुनः तलाक, पुनर्नविवाह, विधवाविवाह आदि के नाम पर धूर्तों ने समाजसुधारक का सम्मान प्राप्त किया क्योंकि सरकारें भी धर्म के विरुद्ध ही हैं, अहर्निश असत्यवादी नेताओं को अधर्मी नहीं तो क्या कहा जा सकता है? किसी मंदिर में फोटो खिंचवाने से धर्मात्मा थोड़ी न हो जायेगा। अस्तु पुनर्विवाह ही यदि होता है तो अनेकों गंभीर प्रश्न हैं इसमें कन्यादान होगा या स्त्रीदान (कन्या तो है नहीं), यदि होगा कौन करेगा, इससे धर्म होगा या अधर्म ? आदि प्रश्न ।
पुनः आगे भी प्रश्न उठता है और कारण यह है कि कन्यादान के समय पिता अकेले बैठता है, माता पंडित जी से पूछती है अकेले करेंगे क्या और पंडित जी हाय-फाय हो गये कारण कि शास्त्राध्ययन से रहित होने पर भी सारा ज्ञान भरा पड़ा है, प्रश्न पूछा नहीं कि उत्तर दे देंगे : नहीं-नहीं अकेले कैसे करेंगे? आप भी बैठिये और फिर माता-पिता संयुक्त रूप से कन्यादान करते हैं। संभवतः अभी यह विषय स्पष्ट नहीं हुआ है किन्तु इस प्रश्न का बिना विचारे उत्तर देने से मुख्य प्रश्न ही समाप्त हो गया। मुख्य प्रश्न तो यह है कि कन्यादान अकेले ही किया जायेगा क्या ?

कन्यादान में एक प्रश्न यह भी है कि क्या माता कन्यादान कर सकती है? यहां तात्पर्य स्वतंत्र रूप से माता के कन्यादान का है कि यदि पिता-भाई न हो तो क्या माता अकेले कन्यादान कर सकती है और यदि माता कन्यादान करगी तो मातृकापूजन, वसोर्द्धारा (घृतढारी) कौन करेगा अर्थात् माता ही करेगी या कोई अन्य? यहीं पर मामा आदि के लिये भी प्रश्न उत्पन्न होता है और संबंधित ही है कि कन्यादान कर सकते हैं अथवा नहीं और यदि करेंगे तो मातृकापूजन – वसोर्द्धारा (घृतढारी) कौन करेगा?
इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि कन्यादान विषयक चर्चा में यहां क्या-क्या विचार किया जायेगा। यह स्पष्ट कर दूं कि यहां की चर्चा तो शास्त्रों पर आधारित होती है अस्तु इस विमर्श को समझने के लिये यह अनिवार्य है कि जो मनगढ़ंत पूर्वाग्रह हैं उनका परित्याग करना ही होगा अन्यथा समझ ही नहीं सकते।
कन्यादान विषय महत्वपूर्ण प्रश्न
इस प्रकार से इस आलेख में जो विचार-विमर्श किया जायेगा वो पर्याप्त प्रमाणों पर आधारित है अर्थात शास्त्रसम्मत है और अभी तक की चर्चा इसकी भूमिका मात्र थी। यहां कन्यादान विषय की चर्चा में कई प्रश्नों पर विचार किया जायेगा जिनमें से कुछ प्रश्न इस प्रकार हैं :
- कन्या का तात्पर्य क्या है ?
- कन्यादान कौन करे ?
- कन्यादान कब करें ?
- कन्यादान कैसे करें ?
- कन्यादान के पश्चात् उसका भोजन करें या न करें ?
- क्या माता कन्यादान कर सकती है ?
- यदि माता कन्यादान करेगी तो मातृकापूजन-वसोर्द्धारा (घीढ़ारी) कौन करेगा ?
- क्या मामा, फूफा, नाना आदि कन्यादान कर सकते हैं ?
- क्या स्वयं कन्या ही अपना दान (आत्मदान) कर सकती है ?
- क्या दुबारा कन्यादान किया जा सकता है ? यदि हां तो किन-किन परिस्थितियों में ?
- रजोधर्म वाली कन्या (वृषली) का दान में दोष निवारण का क्या विधान है ?
- यदि विवाहकाल में कन्या रजस्वला हो जाये तो क्या करे ?
प्रामाणिक विमर्श
“कन्यादान एक बार ही किया जाता है; दुबारा दान का विधान केवल विशेष आपत्तियों में है।”
इन प्रश्नों का अवलोकन करने के पश्चात् अब आप भी समझ गए होंगे कि यह आलेख कितना महत्वपूर्ण है और कितना विस्तृत होना चाहिये। एक बार पुनः यह स्मरण कराना चाहूंगा कि इन विषयों में जो पूर्वाग्रह (अर्थात पूर्व से मन में जो उत्तर, विचार) है उसका परित्याग करके ही अवलोकन करें तभी लाभान्वित हो पायेंगे, क्योंकि विमर्श का आधार शास्त्र ही है न कि कुतर्क।
कन्या का तात्पर्य क्या है ?
प्रथम प्रश्न है कन्या का तात्पर्य क्या है अर्थात कन्या के विषय में कोई प्रमाण है अथवा नहीं। साथ ही उत्तर के पश्चात् जो दूसरा संबंधित प्रश्न उत्पन्न होगा वो यह भी है कि चाहे कितनी भी आयु में विवाह किया जा रहा हो कहते तो कन्यादान ही हैं यदि वह कन्या नहीं है तो कन्यादान क्यों कहते हैं।
दशवर्षा भवेत्कन्या : यह एक विशेष संज्ञा है; अष्टवर्षा गौरी, नववर्षा रोहिणी और दशवर्षा कन्या है। रजोधर्म प्रारम्भ हो जाये तो वह वृषली कहलाती है। कन्यादान में कन्या का जो तात्पर्य है वो दशवर्षा संज्ञक नहीं है अपितु पुत्रीपरक है अर्थात यदि ३० वर्षीया हो तो भी पिता के लिये पुत्री ही रहेगी अर्थात कन्या ही कही जायेगी। इन विशेष वर्षों में अर्थात १० वर्ष पर्यन्त की कन्यादान में विशेष पुण्य कहा गया है और उसमें भी सर्वाधिक गौरी (अष्टवर्षा) के लिये।
अधिकतम द्वादश वर्ष (रजोदर्शन पूर्व) तक कन्यादान करने करने के लिये शास्त्रों में आज्ञा किया गया है और रजोदर्शन के पश्चात् वृषली संज्ञा कही गयी है एवं उसका अत्यधिक दोष भी बताया गया है। किन्तु नास्तिकों, अधर्मियों, म्लेच्छाचारियों को शास्त्र व धर्म के क्या लेना-देना उनको तो वोट चाहिये, प्रोग्रेसिव होने का तमगा चाहिये। ये तो पिछड़ापन है न। अरे अधर्मियों पिछड़ी तुम्हारी सोच है और उसका कारण तुम्हारा नास्तिक होना है।
अष्टवर्षा भवेद्गौरी नववर्षा तु रोहिणी । दशवर्षा भवेत्कन्या अत ऊर्ध्वं रजस्वला ॥
प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे यः कन्यां न प्रयच्छति । मासि मासि रजस्तस्याः पिबन्ति पितरः स्वयम् ॥
माता चैव पिता चैव ज्येष्ठो भ्राता तथैव च । त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम् ॥
यस्तां समुद्वहेत्कन्यां ब्राह्मणो मदमोहितः । असंभाष्यो ह्यपाङ्क्तेयः स विप्रो वृषलीपतिः ॥
पाराशर स्मृति/७/४ – ८
पितुर्गेहे तु या कन्या पश्यत्यसंस्कृता रजः। भ्रूणहत्या पितुस्तस्याः कन्या सा वृषली स्मृता ॥
यस्तां विवाहयेत्कन्यां ब्राह्मणो मदमोहितः। असंभाष्यो ह्यपाङ्क्तेयः स विप्रो वृषलीपतिः ॥
प्राप्ते द्वादशमे वर्षे कन्यां यो न प्रयच्छति । मासि मासि रजस्तस्याः पिता पिबति शोणितम् ॥
अष्टवर्षा भवेगौरी नववर्षा च रोहिणी । दशवर्षा भवेत्कन्या अत ऊर्ध्वं रजस्वला ॥
माता चैव पिता चैव ज्येष्ठभ्राता तथैव च । त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम् ॥
बृहद्यम स्मृति ३/१८ – २२
अष्टवर्षा भवेद्गौरी नववर्षा तु रोहिणी । दशवर्षा भवेत्कन्या अत ऊर्ध्वं रजस्वला ॥
माता चैव पिता चैव ज्येष्ठो भ्राता तथैव च । त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम् ॥
तस्माद्विवाहयेत्कन्यां यावन्नर्तुमती भवेत् । विवाहो ह्यष्टवर्षायाः कन्यायास्तु प्रशस्यते ॥
संवर्त स्मृति/६५ – ६७
पितुर्गृहेषु या कन्या रजः पश्यत्यसंस्कृता । सा कन्या वृषली ज्ञेया तत्त्पतिर्वृषलीपतिः ॥
प्रजापति स्मृति ८५
पितुर्वेश्मनि या कन्या रजस्तु समुपस्पृशेत् । भ्रूणहत्या पितुस्तस्याः सा कन्या वृषली स्मृता ॥
माता चैव पिता चैव ज्येष्ठो भ्राता तथैव च । त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम् ॥
उद्वहेद्यस्तु तां कन्यां ब्राह्मणो मदमोहितः । असंभाष्यो ह्यपातेयः स विप्रो वृषलीपतिः ॥
अंगिरा स्मृति ११८ – १२०
दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम्, कन्या पश्यत्यसंस्कृता रजः, कन्या सा वृषली स्मृता, सा कन्या वृषली ज्ञेया, सा कन्या वृषली स्मृता आदि से यह सिद्ध हो रहा है कि रजोदर्शन होने पर वृषली एक विशेष संज्ञा है कन्या का मुख्य तात्पर्य पुत्री ही है और कन्यादान का तात्पर्य पुत्री का दान है। इस प्रकार किसी भी आयु में पुत्री का विवाह (दान) करे वह कन्यादान ही कहा जायेगा। जैसे गौरी दान, रोहिणी दान न होकर कन्यादान ही होगा उसी प्रकार वृषलीदान न कहकर कन्यादान ही कहा जायेगा। व्यभिचारादि दोष का विषय भिन्न है यहां मात्र रजोदर्शन विषयक विषय ग्रहण किया गया है।

एक शंका का तो पूर्ण निवारण हो गया जो कि यत्र-तत्र सामान्य जन भी विमर्श करते हैं कि कन्यादान होता कहां है वो तो स्त्री (मौगी/औरत) दान होता है और इसी से यह शंका उत्पन्न होती है कि क्या कन्यादान कहना उचित है ? कन्यादान कहना ही उचित है भले ही वह वृषली क्यों न हो अर्थात रजोधर्म प्रवृत्त हो। अब यहीं पर इसके दोष और सम्मार्जन का भी प्रश्न उत्पन्न होता है किन्तु इसकी चर्चा आगे करेंगे।
कन्यादान कौन करे
अब द्वितीय प्रश्न है : कन्यादान कौन करे ? इसके साथ ही और भी प्रश्न हैं : क्या माता कन्यादान कर सकती है, क्या मामा, फूफा, नाना आदि कन्यादान कर सकते हैं, क्या स्वयं कन्या ही अपना दान (आत्मदान) कर सकती है आदि। ये सभी गौण प्रश्न हैं और मुख्य प्रश्न “कन्यादान कौन करे” में ही कहीं न कहीं समाहित हैं। आलेख का भी मुख्य प्रश्न वास्तव में यही है और इसी से सम्बंधित है। सर्वप्रथम कन्यादान के अधिकारी का मुख्य प्रमाण देखते हैं जो विभिन्न स्मृति पुराणों में मिलता है :
पिता पितामहो भ्राता सकुल्यो जननी तथा । कन्याप्रदः पूर्वनाशे प्रकृतिस्थः परः परः ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति/१/६३, गरुडपुराण/आचारकाण्ड/९५/१३,
स्कन्दपुराण/४ (काशीखण्डः)/४०/५०, विष्णुधर्मोत्तरपुराण/३/३२९/१५
कन्यादान के अधिकारी क्रमशः इस प्रकार हैं : पिता, पितामह, भ्राता, सकुल्य और माता। ध्यातव्य है माता का क्रम सबसे अंत में आता है किन्तु अधिकारिणी है। पूर्व अधिकारी के न होने पर ही उत्तरोत्तर अधिकारी होंगे, पूर्व अधिकारी की उपस्थिति में पूर्व ही कर सकता है अन्य नहीं। लोग ऐसे प्रमाणों का आधा भाव ग्रहण करते हैं और आधे का परित्याग कर देते हैं जो शास्त्रोल्लंघन ही कहा जायेगा।
“कन्याप्रदः पूर्वनाशे प्रकृतिस्थः परः परः” स्पष्ट रूप से यही आज्ञा दे रहा है कि पूर्वनाश होने पर ही पर अधिकारी हो सकता है अर्थात यदि सबके रहते माता अधिकार चाहे तो नहीं है। अर्थात “पिता पितामहो भ्राता सकुल्यो जननी तथा” जो है यह आधा है और इसका अनर्थ जो लगाया गया है वो यह कि ये सभी अधिकारी हैं और इनमें से कोई भी कन्यादान कर सकता है जबकि अगली पंक्ति में इसका नियम भी स्पष्ट कर दिया गया है। आगे विस्तारक्रम में कुछ और प्रमाण आते हैं जिनमें से नारद का एक वचन इस प्रकार है :
पिता दद्यात् स्वयं कन्या भ्राता वाऽनुमते पितुः। मातामहौ मातुलस्य सकुल्यो बांधवस्तथा ॥
माता त्वभावे सर्वेषां प्रकृतौ यदि वर्त्तते । तस्यामप्रकृतिस्थायां कन्यां दद्युः स्वजातयः ॥
नारदस्मृति/व्यवहारपदानि/१२/२० – २१
इसमें पिता का तात्पर्य पिता, पितामहादि है और भ्राता को एक विशेष छूट ज्ञात होता है “भ्राता वाऽनुमते पितुः” अर्थात पिता की अनुमति से भ्राता भी कर सकता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि पिता के जीवित रहते एक अन्य ही अधिकारी है जो कन्यादान कर सकता है और वो है भ्राता। आगे मातामह, मातुल, और बांधव को भी अधिकारी कहा गया है एवं यहां भी अंत में माता को अधिकारिणी बताया गया है।
उन लोगों के द्वारा भी यही प्रमाण बताया जायेगा जो मातामह, मातुल आदि से कन्यादान कराते हैं। यह अधिकार प्रथम क्रम में नहीं आता है एवं औरस कन्या हेतु भी नहीं है जो कि आगे कात्यायन के वचन से स्पष्ट होता है :
स्वयमेवौरसीं दद्यात्पित्रभावे स्वबान्धवाः । मातामहस्ततोऽन्यां हि माता वा धर्मजां सुताम् ॥
कात्यायन (मदनपारिजात), संस्काररत्नमाला,
औरस कन्या से भिन्न होने पर मातामह, मातुल व माता का अधिकार प्रथम हो जाता है अर्थात औरस कन्या में अधिकार नहीं होता। अर्थात यदि औरस कन्या है तो सकुल्य (सपिण्ड से भी अधिक १० पीढ़ी तक के) का ही प्रथम अधिकार होगा, उसका भी अभाव हो तो माता का अधिकार होगा। अथवा प्रवासादि कारण उपस्थित होने पर यदि उचित काल का अतिक्रमण होता देखे तो भी अन्य की अनुपस्थिति और धर्म पालन के उद्देश्य से कन्यादान कर सकती है। यह अगले प्रमाण स्पष्ट होता है :
दीर्घप्रवासयुक्तेषु पौगण्डेषु च बन्धुषु । माता तु समये दद्यादौरसीमपि कन्यकाम् ॥
संस्काररत्नमाला,
इस प्रकार माता का कन्यादान में अधिकार सिद्ध तो है किन्तु अंतिम है; प्रथम नहीं। औरस कन्या होने पर नाना, मामा, फूफा, मौसा आदि का कोई अधिकार ही नहीं है। यदि कन्या का कोई न हो अथवा पितृपक्ष ने त्याग कर दिया हो तो पालन-पोषण करने वाले नाना-मामा का अधिकार हो सकता है अथवा माता भी अधिकारिणी है। किन्तु फूफा, मौसा आदि अधिकारी हैं ही नहीं। अनाथ होने पर तो जाति का कोई भी व्यक्ति कर सकता है फिर फूफा, मौसा भी अनधिकारी नहीं होंगे किन्तु यदि अन्य अधिकारी न हो तो।
यहां वर्त्तमान काल के प्रदूषणवश कुछ और गौण प्रश्न भी उत्पन्न होते हैं, क्योंकि तलाक, पुनर्विवाह, विधवाविवाह, अंतर्जातीय विवाह आदि को सामान्य विषय बनाया जा रहा है और इस अवस्था में भी अनेकों परिस्थितियां बनती हैं। यद्यपि ऐसे अधर्मियों से धर्मविचार की अपेक्षा तो कर ही नहीं सकते तथापि कदाचित किसी की धार्मिक आस्था जग जाये और जिज्ञासा हो तो प्रमाणित उत्तर होना ही चाहिये।
सर्वप्रथम अंतर्जातीय विवाह से उत्पन्न कन्या के लिये कौन अधिकारी होगा इसको समझते हैं। माता-पिता के वर्ण का विचार करेंगे तो औरस है अथवा नहीं इसका निर्णय होगा। यदि सहोदर ज्येष्ठ भ्राता हो तो उसका अधिकार पिता से अधिक होगा। बीजवशात पिता का भी अधिकार होगा, तदुपरांत मातामह, मातुल आदि का भी अधिकार होगा क्योंकि वह औरसी कन्या नहीं है और माता का अधिकार अंतिम ही होगा। यद्यपि इस विषय में और विमर्श व अन्वेषण शेष है। तथापि विमर्श हेतु कुछ तो आधारभूत प्रमाण होना ही चाहिये :
क्षेत्रिकस्य यदज्ञातं क्षेत्रे बीजं प्रदीयते । न तत्र बीजिनो भागः क्षेत्रिकस्यैव तद्भवेत् ॥
ओघवाताहृतं बीजं क्षेत्रे यस्य प्ररोहति । फलभुग्यस्य तत्क्षेत्रं न बीजी फलभाग्भवेत् ॥
महोक्षो जनयेद्वत्सान्यस्य गोषु व्रजे चरन् । तस्य ते यस्य ता गावो मोघं स्यन्दितं आर्षभम् ॥
क्षेत्रिकानुमतं बीजं यस्य क्षेत्रे प्रमुच्यते । तदपत्यं द्वयोरेव बीजिक्षेत्रिकयोर्मतम् ॥
नारदस्मृतिः/व्यवहारपदानि/१२/५५ – ५८
अब विधवा के कन्या की बात आयेगी; यदि विधवा ने पुनर्विवाह न हो तो अधिकार की चर्चा यथावत अर्थात पूर्वोक्त प्रमाणानुसार ही सकुल्य तक होगा फिर माता का होगा, किन्तु यदि पुनर्विवाह कर चुकी हो अथवा पतिकुल का त्याग कर चुकी हो तो मातामह, मातुल, माता आदि क्रमशः अधिकारी होंगे। इसमें शर्त यह है कि कन्या भ्रातारहिता हो और पितृकुल में कोई अधिकारी न हो अथवा करने के लिये तैयार न हो। यदि पूर्वपतिकुल में सपिण्ड, सकुल्य इच्छित हों तो उन्हीं का प्रथम अधिकार होगा।
अर्थात यदि पूर्वपति से पुत्र उत्पन्न भ्राता है तो प्रथम अधिकार उसी का होगा, भ्राता के पश्चात् चाचा आदि का अधिकार होगा। यदि कन्या पितृपक्ष में ही है अर्थात पिता ने अपने पास ही रखा हो तब तो कोई प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। यदि तलाक लेने वाली स्त्री की प्रथम पति से उत्पन्न कन्या के लिये अधिकारी का विचार किया जाय तो वह भी इसी प्रकार होगा।
अब विधवा के पुनर्विवाह से उत्पन्न कन्या की बात आयेगी और इसमें तलाक लेकर पुनर्विवाह करने वाली स्त्री के द्वितीय पति से उत्पन्न कन्या का भी विचार समान रूप से होगा। द्वितीय पति से उत्पन्न कन्या औरसी तो होगी ही नहीं एवं पौनर्भवा होगी। इसमें पिता, भ्राता का अधिकार तो होगा किन्तु सपिण्ड, सकुल्यादि का अधिकार नहीं होगा। सहोदर भ्राता का अधिकार द्वितीय रहेगा, मातामह, मातुल आदि का भी अधिकार होगा; माता का अधिकार अंतिम ही होगा।
पुनः स्पष्ट करना आवश्यक है कि इस निर्णय में विद्वानों को विमर्श करने की आवश्यकता है एवं अन्वेषण शेष है। इसे निर्णय की भांति ग्रहण न किया जाय।
कानीनको ह्यनूढाजो मातृवर्णं प्रपद्यते । गणिकानामपत्यानि मातृवर्णानि तानि वै ॥
दासीनां पतिहीनानामपत्यानि तु यानि वै । मातृवर्णानि बोध्यानि स्वामिवर्णानि वा तथा ॥
भिक्षादीक्षालभ्यबाला अच्युतगोत्रका हि ते । साध्व्यश्च साधवः सर्वे भवन्त्यच्युतगोत्रकाः ॥
लक्ष्मीनारायणसंहिता/३/१०६/१३ – १५
भार्या चतुर्विधा लक्ष्मि प्रायशः संभवन्ति हि । पत्नी विवाहिता प्रोक्ता दासी या तु सहागता ॥
उपकुर्वाणिका या तु कञ्चित्कालं गृहे स्थिता । प्रच्छन्नयोगमापन्ना रक्षिता सा तु कीर्तिता ॥
स्वामिनोऽपि तथा सन्ति चतुर्धा पद्मजे! शृणु । विवाहितः पतिः प्रोक्तो लग्नितः श्रेष्ठ एव सः ॥
देवरादिर्गौणकान्तो द्वितीयः स प्रकीर्तितः । नियोगमाप्तस्तृतीयश्चोपकुर्वाणकः स हि ॥
प्रच्छन्नयोगमापन्नो रक्षितः स प्रकीर्तितः । प्रजास्तयोर्यथायोगं नार्या वा च नरस्य वा ॥
विवादेऽपत्यमेवाऽत्र यमिच्छेत्तस्य वै हि तत् । देशभेदात्कालभेदाद्रीतिभेदात्पृथग्वृषः ॥
लक्ष्मीनारायणसंहिता/३/१०६/१८ – २३
- औरसी कन्या के दान में पिता आदि का अधिकार है और माता का अंतिम अधिकार है; किन्तु मातामहादि का अधिकार ही नहीं है।
- औरसी से भिन्न में मातामहादि का अधिकार है।
- भ्राता के अधिकार में विशेषता यह है कि वह संस्कृत हो, असंस्कृत होने पर अनधिकारी। यद्यपि सामाजिक व्यवहार में तो विवाहित होने का भ्रम भी देखने को मिल सकता है किन्तु संस्कृत होने का तात्पर्य उपनीत होना ही ग्राह्य है।
क्या दुबारा कन्यादान किया जा सकता है ? यदि हां तो किन-किन परिस्थितियों में ?
अब आगे तो प्रथम प्रश्न यही उत्पन्न होता है कि क्या पुनर्विवाह किया जा सकता है ? यदि पुनर्विवाह किया जा सकता है तो दुबारा कन्यादान किया जा सकता है क्या यदि नहीं तो दान कौन करेगा ?
प्रथम पक्ष तो यही है कि पुनर्विवाह शास्त्रसम्मत नहीं है ये नास्तिकों, अधर्मियों का रचा कुचक्र है। द्वितीय तथ्य यह है कि कन्यादान एक बार ही किया जा सकता है।
सकृदंशो निपपति सकृत्कन्या प्रदीयते । सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सकृत्सकृत् ॥
मनुस्मृति/९/४७, नारदस्मृतिः/व्यवहारपदानि/१२/२८
तृतीय पक्ष यह है कि यदि वचन दिया गया हो किन्तु संस्कार (विवाह संस्कार) नहीं हुआ हो और वर में दोष उजागर हो जाये तो उसका त्याग करके अन्य को कन्यादान किया जा सकता है।
वाचा दत्ता तु या कन्या मन्त्रैश्चैव न संस्कृता। अन्यस्य सा भवेद्देया सति भर्तरि दोषिणी॥
विष्णुधर्मोत्तरपुराण/३/३२९/१३
नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीबेऽथ पतिते पतौ । पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते॥
पाराशर स्मृति/४/३०, नारदस्मृतिः/व्यवहारपदानि/१२/९७, विष्णुधर्मोत्तरपुराण/३/३२९/१४, गरुडपुराण/आचारकाण्डः/१०७/२९
तृतीय स्थिति “नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीबेऽथ पतिते पतौ” में आपत्काल के समान कहा गया है किन्तु इसका भी अनर्थ किया जाता है। ये पांच विशेष परिस्थतियां हैं जिनमें विवाहिता का पुनर्विवाह किया जा सकता है किन्तु एक शर्त जो अन्यत्र वर्णित है कि कन्या यदि अक्षता हो तो। कन्या के अक्षता होने पर अर्थात यदि पति-पत्नी का शारीरिक संपर्क न हुआ हो तो उसका पुनर्विवाह हो सकता है अर्थात दुबारा कन्यादान भी किया जा सकता है।
दुबारा कन्यादान किया जा सकता है इसमें यह भी स्पष्ट होता है कि यदि नपुंसक-पतितादि हो और अक्षता रहते ज्ञात हो जाये तो पुनः वापस ग्रहण करके दुबारा कन्यादान किया जा सकता है। नष्ट, मृत, सन्यास आदि की अवस्था में तो वापस ग्रहण करने की आवश्यकता ही नहीं होगी। किन्तु अक्षता वाली शर्त का यदि त्याग कर दें तो यहां अनर्थ हो जायेगा और वर्त्तमान के पाखंडी ऐसा ही अनर्थ करेंगे।
दत्तामपि हरेत्पूर्वाच्छ्रेयांश्च वर आव्रजेत् ॥
याज्ञवल्क्य
कुलशील विहीनस्य षंढादिपतितस्य च । अपस्मारी विधर्मस्य रोगिणां वेषधारिणाम् ॥
दत्तामपि हरेत्कन्यां सगोत्रोढां तथैव च ॥
वसिष्ठ
वरयित्वा तु यः कश्चित्प्रवसेत्पुरुषो यदा । ऋत्वागमांस्त्रीनतीत्य कन्यान्यं वरयेत्पतिम् ॥
कात्यायन
दत्तामपि हरेत्कन्यां वरश्चेद्दोषभाग्भवेत् । नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीबेऽथ पतितेऽपतौ ॥
पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते । मृते तु देवरे देया तदभावे यदृच्छया ॥
विष्णुधर्मोत्तरपुराण/२/८७/१० – ११
पिता अर्थात मातृपक्ष “पत्नीत्वेनाहं सम्प्रददे” से कन्यादान करता है अर्थात पत्नीरूप में ही योग्य पति रख सकता है। मातृपक्ष का कन्या पर अधिकार नष्ट नहीं होता और आवश्यक होने पर कन्या को पुनः वापस ले सकता है। इसमें दो स्थिति होगी एक तो वह अक्षता हो और दूसरी यह कि अक्षता न हो। इस तथ्य को यदि संक्षेप में स्पष्ट करें तो ही श्रेयस्कर है :
- यदि अक्षता है तो उसका पुनः कन्यादान करना प्रशस्त है।
- यदि अक्षता नहीं है तो कन्यादान नहीं किया जा सकता है।
इस विषय का विशेष वर्णन “नारदस्मृतिः/व्यवहारपदानि/स्त्रीपुंसयोगः” में देखने को मिलता है, विद्वद्जन अवलोकन कर सकते हैं।
क्या स्वयं कन्या ही अपना दान (आत्मदान) कर सकती है ?
अब आगे प्रश्न आता है कि यदि कन्यादान नहीं किया जा सकता तो पुनर्विवाह होगा कैसे यदि कन्या की भोगेच्छा हो तो। इसमें प्रथम पक्ष यह है कि पुनर्विवाह की उक्त स्थिति सदाचार नहीं है और शास्त्रप्रशस्त भी नहीं है। किन्तु यदि वेश्या ही बनना चाहे तो कोई रोक नहीं सकता न। उपरोक्त स्थिति में उसके पास स्वयं ही वरण करने का अधिकार होता है। किन्तु इसका विश्लेषण करना उपर्युक्त नहीं लगता क्योंकि इससे दुराचार कि प्रवृत्ति बढ़ने में सहयोगी सिद्ध होने की आशंका है।
अप्रयच्छन्समाप्नोति भूणहत्यामृतावृतौ । स्वयं त्वभावे दातॄणां कन्या कुर्यात्स्वयं वरम् ॥
स्कन्दपुराण/४ (काशीखण्डः)/४०/५१
अप्रयच्छन्समाप्नोति भ्रूणहत्यामृतावृतौ। एषामभावे दातॄणां कन्या कुर्य्यात्स्वयंवरम् ॥
गरुडपुराण/आचारकाण्ड/९५/१४
प्रतिगृह्य तु यः कन्यां अदुष्टां उत्सृजेद्वरः । विनेयः सोऽप्यकामोऽपि कन्यां तां एव चोद्वहेत् ॥
नारदस्मृतिः/व्यवहारपदानि/१२/३५
वर्षाणि त्रीण्यृतुमती कांक्षेत पितृशासनम् । ततश्चतुर्थे वर्षे तु विंदेत सदृशं पतिम् ॥
बौधायन
त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमार्यृतुमती सती । ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद्विंदेत सदृशं पतिम् ॥
मनु
अनेक परिस्थितियां बताई भी गयी हैं जिसमें कन्या को स्वयं ही वरण करने का अधिकार होता है अर्थात कर सकती है अर्थात वह स्वयं का ही दान कर सकती है जिसे आत्मदान कहा गया है। किन्तु अब आगे एक और प्रश्न आएगा कि यदि पुनर्विवाह करती है तो किस गोत्र से आत्मदान करेगी ? इसका प्रमाण भी पूर्व में दिया जा चुका है और पुनः दे रहे हैं, वहां कन्या का गोत्र अच्युत हो जायेगा :
भिक्षादीक्षालभ्यबाला अच्युतगोत्रका हि ते । साध्व्यश्च साधवः सर्वे भवन्त्यच्युतगोत्रकाः ॥
लक्ष्मीनारायणसंहिता/३/१०६/१५
कन्यादान कब करें
कन्यादान कब करें का तात्पर्य यहां जो मुख्य विवाद उत्पन्न किया जा रहा है कि रात में न करके दिन में करे; से संबंधित है। जो प्रमाण उपलब्ध है उसके अनुसार दिन में ही विवाह निन्दित है और रात में ही प्रशस्त है। वो धर्मद्रोही हैं जो आक्रांताओं आदि का कुतर्क गढ़कर रात में विवाह को अनुचित सिद्ध करते हैं और दिन में ही करने को प्रेरित करते हैं।
रात्रौ दानं न शंसंति विना चाभयदक्षिणाम् । विद्यां कन्या द्विजश्रेष्ठ दीपमन्नं प्रतिश्रयम् ॥
विवाहे तु दिवाभागे कन्या स्यात्पुत्रवर्जिता । विवाहानलदग्धा सा नियतं स्वामिघातिनी॥
कन्यादान कैसे करें
अब एक मुख्य प्रश्न है : कन्यादान कैसे करें और इसमें भी कई अन्य अन्तर्निहित प्रश्न भी हैं जो क्रमशः आते रहेंगे और विमर्श चलता रहेगा। कैसे करें में जो मुख्य अन्तर्निहित प्रश्न है वो है बैठकर करें अथवा खड़ा होकर करें अथवा और कैसे ? किस दिशा में मुख करके करे ? इसी प्रकार धर्मद्रोहियों द्वारा दहेज प्रथा कहकर बकवास किया जाता है वह भी संबंधित हो जाता है। प्रमाणों का अवलोकन करें स्पष्ट भी हो जायेगा :
अलंकृत्य तु यः कन्यां वराय सदृशाय वै । ब्राह्मेण तु विवाहेन दद्यात्तां तु सुपूजिताम् ॥
स कन्यायाः प्रदानेन श्रेयो विन्दति पुष्कलम् । साधुवादं स वै सद्भिः कीर्ति प्राप्नोति पुष्कलाम् ॥
ज्योतिष्टोमातिरात्राणां शतं शतगुणीकृतम् । प्राप्नोति पुरुषो दत्त्वा होममन्त्रैश्च संस्कृताम् ॥
तां दत्त्वा तु पिता कन्यां भूषणाच्छादनाशनैः । पूजयेत्स्वर्गमाप्नोति नित्यमुत्सववृद्धिषु ॥
संवर्त स्मृति/६० – ६३
ब्राह्मो विवाह आहूय दीयते शक्त्यलङ्कृता। तज्जः पुनात्युभयतः पुरुषोनेकविंशतिम् ॥
गरुडपुराण/आचारकाण्ड/९५/७
स्पष्टतः अलंकृत्य कहा गया है जिसका तात्पर्य वस्त्राभूषण से अलंकृत करना है। अलंकृत करना ब्राह्म विवाह का विशेष लक्षण है। जो धर्मद्रोही दहेज-प्रथा चिल्लाते रहते हैं वो ये बतायें कि क्या दहेज संस्कृत शब्द है ? यदि नहीं तो इसे सनातन धर्म के साथ क्यों जोड़ा गया है ?
शास्त्रों के अनुसार सीधा उत्तर है एक तो कन्या को अलंकृत करके दान करना और दूसरा कन्यादान की दक्षिणा देना। इन धूर्तों को स्पष्टतः बताना आवश्यक है कि तुम जिसे दहेज कहते हो वो दहेज है ही नहीं, जिसका शब्द है वो अपने लिये विचार करे। हमारे शास्त्रों में अलंकृत करना कहा गया है और दिये गए धन से मुख्यतः वस्त्राभूषण ही क्रय किया जाता है। शेष दक्षिणा में गण्य हो सकता है यदि अधिक हो तो किन्तु ऐसा तो होता ही नहीं है।
सामान्य परिवार के लोग तो लगभग पूरे धन का आभूषणादि ही क्रय कर लेते हैं। हां दक्षिणा वाला भाग पूर्व नहीं हो सकता वो कन्यादान के उपरांत ही हो सकता है। वरपक्ष अविश्वास के कारण प्रथम ही मांगकर ले लेता है, कन्यापिता की इच्छा और सामर्थ्य पर नहीं छोड़ता। यह एक व्यावहारिक पक्ष है यदि ऐसा न हो तो एक रिक्शेवाला अडानी-अंबानी के यहां भी प्रस्ताव लेकर जा सकता है। जो व्यवस्था है वह उचित ही है। इसी माध्यम से यह सिद्ध होता है कि दोनों परिवार संबंध के योग्य है।
इसी प्रकार कन्यादान कर्ता के लिये बैठने की दिशा हेतु भी विमर्श होता ही रहता है। यहां भी स्पष्ट प्रमाण प्राप्त होता है कि कन्यादानकर्ता पश्चिमाभिमुख होगा। अन्य प्रमाण भी हैं किन्तु यह भी प्रमाण है :
प्राङ्मुखायाभिरूपाय वशय शुचिसन्निधौ। दद्यात् प्रत्यङ्मुखः कन्यां क्षणे लक्षणसंयुते ॥
शंख
सर्वत्र प्राङ्मुखोदाता प्रतिग्राही उदङ्मुखः। एष एव विधिर्दाने कन्यादाने विपर्ययः ॥
बैठकर करे अथवा खड़ा होकर करे अथवा कैसे कन्यादान करे इसके लिये भी एक वचन इस प्रकार मिलता है :
चतुष्पादं गृहं कन्यां दासीं छत्रं रथं तरुम्। तिष्ठन्नेतान् द्विजो दद्याद् भूम्यादीनुपविश्य च ॥
यहां चतुष्पाद, गृह, कन्या, दासी, छत्र, रथ और वृक्ष दान के लिये तिष्ठन् शब्द कहा गया है और भूम्यादि दान में उपविश्य कहा गया है। उपविश्य के लिये बैठकर करना स्पष्ट है फिर तिष्ठं का क्या भाव होगा तो इसके लिये थोड़ा उठा हुआ भी रहे किन्तु न बैठा रहे न खड़ा रहे, बैठने के उपक्रम जैसा भाव। इसका विस्तार से वैयाकरण विशेष विश्लेषण कर सकते हैं जो हमारे सामर्थ्य से बाहर है।
विवाह पद्धति से प्राप्त विश्लेषण के अनुसार बैठना दो प्रकार का होता है एक पालथी लगाकर जिसमें पातितवामजानू और पातितदक्षिणजानू भी मिलता है। किन्तु जब एक भी जानू गिरा न रहे अर्थात पीढ़ी पर जिस प्रकार बैठते हैं (चुक्कुमाली) वह भाव लिया गया है। इसी कारण विवाह में पीढ़ी भी विशेषरूप से बनवाया जाता है और उसी पर बैठकर (चुक्कुमाली) कन्यादान किया जाता है।
अतो द्विजः समावृत्तः सवर्णा स्त्रियमुद्वहेत् । कुले महति संभूतां लक्षणैस्तु समन्विताम् ॥
ब्राह्मणैव विवाहेन शील रूपगुणान्विताम् । अतः पञ्च महायज्ञान्कुर्यादहरहर्द्विजः ॥
न हापयेत्तु तान्सक्तः श्रेयस्कामः कथंचन । हानिं तेषां तु कुर्वीत सदा मरणजन्मनोः ॥
संवर्त स्मृति/३३ – ३५
अब पुनः वह मुख्य प्रश्न कि कन्यादान अकेले करे अथवा सपत्नीक करे यह है। वर्त्तमान में सपत्नीक वाली व्यवस्था प्रचलित होते देखने को मिलती है किन्तु कुछ दशक पूर्व अकेले ही करने का व्यवहार दृष्ट है। इसी कारण कोई भी पत्नी कन्यादान में सहभागी होने से पूर्व यह प्रश्न करती है अथवा परिवार के लोग करते हैं और पंडित जी की अनुमति होने पर ही सपत्नीक किया जाता है, अन्यथा नहीं।
जहां तक माता के अधिकार का प्रश्न है तो उसके पास अंतिम अधिकार होता है अथवा आपात्काल में प्रथम अधिकार भी हो जाता है यह पूर्व ही स्पष्ट हो चुका है। अब बात आती है कि पति अकेले कोई कर्म नहीं कर सकता और यही तर्क दिया भी जाता है। कारण यह है कि यज्ञ-अनुष्ठान, पूजा, तीर्थ आदि में तो सपत्नीक ही करने का विधान भी है और वहीं से यह विषय यहां भी (संस्कार में) प्रकट हो जाता है।
इसका सीधा उत्तर है कि यह विधान संस्कार से भिन्न कर्मों के लिये है, संस्कार तो सपत्नीक होता ही नहीं है। यदि अविश्वनीय लगे तो गर्भाधान से दाह तक के सभी संस्कारों का (विवाह के अतिरिक्त) अवलोकन करें क्या किसी भी संस्कार में सपत्नीक का विधान है। नहीं, सभी संस्कार पति-पिता-पुत्र ही करते हैं। दाह संस्कार तो पूर्णतः पत्नीरहित ही होता है। इसी प्रकार उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन आदि को देखें तो अपत्नीक ही है।
चूडाकरण (मुंडन) में माता बाल ग्रहण करती है न कि यज्ञादि की भांति सपत्नीक किया जाता है। विवाह अर्थात कन्यादान में ही यह प्रश्न क्यों उठता है ? संस्कार तो वहां पति ही करता है और कन्यादान अधिकारी पिता आदि करते हैं। कोई भी कर्म (संस्कार में) एक ही अधिकारी करेगा, यह विधान संस्कार से भिन्न श्राद्ध में नहीं है। श्राद्ध पितृयज्ञ है और वहां सपत्नीक ही होता है, किन्तु श्राद्ध कोई संस्कार नहीं है।
कन्यादान के पश्चात् उसका भोजन करें या न करें ?
पुनः द्वितीय विमर्श में भोजन ग्रहण का नियम भी आता है और पिता के लिये अप्रजावती कन्या के भोजन का निषेध है। पिता से तात्पर्य पिता आदि दानकर्ता है अर्थात यदि भ्राता ने कन्यादान किया हो तो वो भी अप्रजावती भगिनी का भोजन नहीं करेगा। वर्तमान में तो धर्मद्रोही इस नियम का भी कुतर्कों से खंडन करने लगे हैं और कहते हैं कहीं नहीं लिखा है तो ये रहा लिखा हुआ, ऑंखें खोलकर देखो :
विष्णुं जामातरम्मन्ये तस्य कोपं न कारयेत्। अप्रजायां तु कन्यायां नाश्नीयात्तस्य वै गृहे ।
यदि भुंजति मोहाद्वा पूयाशी नरकं व्रजेत् ॥
आदित्यपुराण (बृहद्दैवज्ञरंजन)
अप्रजायां तु कन्यायां न भुञ्जीत कदाचन। दौहित्रस्य मुखं दृष्ट्वा किमर्थमनुशोचति ॥
भविष्यपुराण (मदनरत्न)
दुहित्रन्नं न भुञ्जीयाद्यावत्तस्या भवेत्सुतः । अन्यथा यस्तु भुञ्जीत दानं तस्य वृथा भवेत् ॥
कन्यायास्त्वप्रसूताया यस्त्वन्नं भुञ्जते यदि । अघं स केवलं भुङ्क्ते प्राजापत्येन शुध्यति ॥
संस्काररत्नमाला,
पुनः इस भय से कि ऐसा ही व्यवहार प्रचलित भी है तो अन्य कुतर्क भी करते हैं कि दुःख हो जायेगा और दुःखी करना भी पाप है। जितना खाओ उससे अधिक धन दे दो। अरे धूर्तों बिना खाये भी देना ही होता है और दिया ही जाता है, तुम तो कन्या और जामाता के लिये भी एक और दोष उत्पन्न कर रहे हो, वो अन्न विक्रय करेगी और अपने पिता आदि को ही। तुम्हारे इस कुतर्क से तो अन्न विक्रय का भी दोष उत्पन्न हो जायेगा अर्थात दोनों पक्ष दोषी हो जायेंगे।
इस प्रकार अब यह स्पष्ट होता है कि दानकर्ता हेतु कन्या के अन्नग्रहण का भी निषेध है अन्यान्य द्रव्यों की तो बात ही क्या करें, इसमें एक शर्त भी यह है कि जब तक प्रजावती न हो अर्थात संतान का मुख न देख ले तब तक ही निषेध मान्य है। अब इसमें बात यह स्पष्ट होता है कि कन्यादाता कोई एक अधिकारी ही हो सकता है और जो भी हो उसी के लिये निषिद्ध होगा सभी के लिये नहीं। वह कन्या जब नैहर (पितृगृह) आती है तो बहुत कुछ लेकर आती है और भोज्य-मिष्टान्न आदि भी लाती है।
यहां माता के साथ तो यह निषेध भी प्रभावी हो होगा यह सपत्नीक कन्यादान किया गया हो तो। माता-पुत्री में तो अधिक घनिष्ठता होती है और पुत्री का भी द्रव्य ग्रहण करती है; फिर दोष लगेगा न ! अस्तु माता दोषी न हो इस कारण भी पिता अथवा दानकर्ता अकेले ही दान करे यही स्पष्ट होता है।
पुनः मैथिलेत्तर देशों में एक अन्य व्यवहार भी देखने को मिलता है कि कन्यादान के समय अन्यान्य अधिकारी-अनधिकारी भी उदकदान (अमन्त्रक) करते हैं किन्तु भाव यही होता है कि कन्यादान कर रहे हैं। तो उन लोगों को यह विचार करना चाहिये कि फिर कन्या का लाया हुआ जो कुछ भी है वह ग्रहण कैसे करते हैं ? यदि ग्रहण करते हैं तो दोष लगता है अथवा नहीं। अर्थात यह अनुचित व्यवहार है।
अब कहेंगे कि सपत्नीक निषेध का प्रमाण तो नहीं मिला है, तो तुम सपत्नीक का ही प्रमाण प्रस्तुत कर दो न कि तुम किस प्रमाण के आधार पर सपत्नीक सिद्ध कर रहे हो और कितने संस्कार सपत्नीक किये जाते हैं। उपस्थिति होना भिन्न विषय है और कन्यादान में भी उस प्रकार से उपस्थिति तो रहेगी ही किन्तु सपत्नीक दान की सिद्धि नहीं होती अपितु यह खंडित ही हो जाता है।
यदि माता कन्यादान करेगी तो मातृकापूजन-वसोर्द्धारा (घीढ़ारी) कौन करेगा ?
आगे एक प्रश्न आता है कि अंतिम ही सही माता के पास कन्यादान का अधिकार तो है ही। यदि माता ही कन्यादान करे तो मातृकापूजन और वसोर्द्धारा कौन करेगा ?
यद्यपि यह प्रश्न मातामह, मातुल, पितृष्वसृ (फूफा) आदि के विषय में उठाया जाता है और अब शहरों में रहने वाले आधुनिक शिक्षित होने का भ्रम पालने वाले मूर्खाधिराजिनी मातायें भी पिता रहित होने पर प्रथम अधिकार सिद्ध करके स्वयं ही कन्या दान करती है अथवा तलाक-पुनर्विवाह, विधवाविवाह आदि के कारण परिवार से विच्छिन्न होने पर संकटकाल में तो करती ही हैं। ऐसी कुलटाओं के लिये क्या विमर्श करना, किन्तु यदि आपत्ग्रस्त माता करे तो उसके लिये इस प्रश्न का उत्तर होना आवश्यक है।
अर्थात जो अन्यत्र पग-पग पर शास्त्र की आज्ञा का उल्लंघन करते हैं उनके लिये यहां शास्त्र की आज्ञा का क्या औचित्य है अर्थात प्रश्न करना ही अनुचित है, जो मन करे वैसा करते रहो क्योंकि स्वेच्छाचारी बन गये हो। अब बात उनकी की जाय जो शास्त्र में आस्था रखते हुये अधिकारिणी हैं और कन्यादान करेगी। इसमें भी दो परिस्थिति संभावित है प्रथम भ्राता न हो और द्वितीय भ्राता हो किन्तु असंस्कृत हो असंस्कृत होने से कन्यादान में अधिकार नहीं होगा, और यदि भ्राता हो ही न तो अधिकार का प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होगा।

अब प्रश्न को भी सही करना होगा क्योंकि मातृकापूजन-वसोर्द्धारा (घीढ़ारी) कौन करेगा यह प्रश्न ही व्यर्थ है एवं इसका कहीं भी उत्तर प्राप्त नहीं होगा। इस प्रकार से प्रश्न करने वाला तो अल्पज्ञ हो सकता है किन्तु उत्तरदाता भी अल्पज्ञ हो तो उस उत्तर का क्या महत्व होगा यह सोचने का विषय है।
अधिकांशतः इसी प्रकार से प्रश्न किया जाता है और इसी प्रश्न का उत्तर भी दिया जाता है कि मातृकापूजन-वसोर्द्धारा (घीढ़ारी) अपने कुलादि का ही कोई व्यक्ति कर सकता है, अन्य कुल से संबंधित व्यक्ति नहीं। किन्तु मैं यहां यह कह रहा हूँ कि ये प्रश्न ही अनुचित है और इसका कोई उत्तर होगा ही नहीं। इस प्रश्न को यदि सही करें तो इस प्रकार होगा : वृद्धिश्राद्ध कौन करेगा ?
मातृकापूजन-वसोर्द्धारा (घीढ़ारी) स्वतंत्र कर्म न होकर वृद्धिश्राद्ध का कर्मांग है और उत्तर वृद्धिश्राद्ध के विषय में ही प्राप्त होगा। ये चिंताजनक विषय है कि आज अधिकांश कर्मकांडी मातृकापूजन-वसोर्द्धारा (घीढ़ारी) को स्वतंत्र कर्म समझते हैं एवं चांदी के सिक्के, वस्त्रादि का लोभ रहता है इसी कारण बिना वृद्धिश्राद्ध के भी कराते रहते हैं। कलयुग का प्रभाव है कि शास्त्र में रुचि ही नहीं है, जिसे ज्ञान है वो भी देने के लिये तत्पर नहीं है और यदि तत्पर हों भी तो किसी को प्राप्त करना ही नहीं है।
अस्तु हमनें यहां प्रश्न को इस प्रकार संशोधित किया – वृद्धिश्राद्ध कौन करेगा ? अब हमें शास्त्र से इसका उत्तर प्राप्त होगा, अन्यथा प्राप्त ही नहीं हो सकता। अब वो लोग चुल्लू भर पानी ढूंढे जो मातृकापूजन-वसोर्द्धारा कौन करेगा इसका उत्तर देते हैं।
- पुत्र (कन्या का भ्राता) होने और न होने की जो बात कही गयी और पुत्र होने पर संस्कृत और असंस्कृत होने की बात है वो सभी इस प्रश्न से सम्बंधित है।
- यदि पुत्र (कन्या का भ्राता) है और संस्कृत है तो पुत्र ही सभी कार्य करेगा अर्थात वृद्धिश्राद्ध पूर्वक कन्यादान।
- यदि पुत्र (कन्या का भ्राता) है किन्तु असंस्कृत है तो कन्यादान नहीं करेगा किन्तु वृद्धिश्राद्ध पुत्र (कन्या का भ्राता) ही करेगा, स्वयं माता नहीं करेगी। पुत्रहीन स्त्री को श्राद्ध का अधिकार है न कि पुत्रयुक्त को। असंस्कृत पुत्र को भी श्राद्ध का अधिकार होता है यह सिद्ध है।
- यदि पुत्र (कन्या का भ्राता) न हो तो स्वयं माता ही करेगी, किन्तु पुरोहित को प्रतिनिधि बनाकर वृद्धिश्राद्ध करेगी एवं कन्यादान स्वयं ही करेगी।
- अब बचे अनधिकृत कन्यादानकर्ता तो उनके लिये भी कोई उत्तर देना ही अनुचित होगा क्योंकि प्रथम तो उनके अधिकार का ही खंडन हो जायेगा यदि शास्त्र और धर्म में आस्था है तो; अथवा यदि आस्था ही नहीं तो उत्तर क्यों दें ?
असंस्कृतास्तु संस्कार्या भ्रातृभिः पूर्वसंस्कृतैः । भगिन्यश्च निजादंशाद्दत्वांशन्तु तुरीयकं ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति/२/१२४, अग्निपुराण/२५६/११
पुत्रेषु विद्यमानेषु नान्यो वै कारयेत् स्वधाम्॥
वीरमित्रोदय, मदनपारिजात
रजोधर्म वाली कन्या (वृषली) का दान में दोष निवारण का क्या विधान है ?
अब वृषली दोष की बात करें क्योंकि यह तो सर्वत्र होगा ही और क्यों न हो, जब शासनव्यवस्था ही धर्मविरोधी हो और शास्त्रविरुद्ध आचरण हेतु विधान से बाध्य करे। यद्यपि उस अधर्म के दोषी भी शासनतंत्रस्थ ही होंगे किन्तु ये तो तब हो न जब बलपूर्वक भी बाध्य किया गया हो।
मतिभ्रमित होकर लोगों ने स्वयं ही स्वीकार किया, स्वेच्छा से ही ऐसा करते हैं तो स्वयं भी दोषी क्यों नहीं होंगे। शासनतंत्र ने १८ वर्ष तक के लिये ही बाध्य किया है न तो ३० – ३५ वर्ष तक विवाह क्यों नहीं करते हैं एवं उसके पश्चात् कौन दोषी होगा। यदि बाध्यकारी आयु के पश्चात यथाशीघ्र करें अर्थात उन्नीसवें वर्ष में ही करें तब तो एक बार निर्दोष माने जा सकते हैं किन्तु जब २१ – ३० वर्षों में करते हैं तो निर्दोष नहीं कहे जा सकते।
अर्थात शासनतंत्रस्थ १८ वर्षपर्यन्त से उत्पन्न दोष के ही भागी होते हैं, उसके पश्चात् के नहीं वो पितादि का ही दोष होता है। इस दोष हेतु ढेरों प्रमाण ऊपर भी दिख चुके हैं एवं कुछ अन्य भी देख सकते हैं :
गौरी ददन्नाकपृष्ठं वैकुंठं रोहिणी ददत् । कन्याददद्ब्रह्मलोकं रौरवं वृषली ददत् ॥
मरीचि (बृहद्दैवज्ञरंजन)
पितृवेष्मनि या कन्या रजः पश्यत्यसंस्कृता । भ्रूणहत्या पितुस्तस्याः सा कन्या वृषली स्मृता ॥
लघु शातातप स्मृति ६५
अब यदि दोष के सम्मार्जन को समझने का प्रयास करें तो इस प्रकार का वचन उपलब्ध है :
कन्यामृतुमतीं शुद्धां कृत्वा निष्कृतिमात्मनः । पिता ऋतून्स्वपुत्र्यास्तु गणयेदादितः सुधीः ॥
दानावधि गृहे यत्नात्पालयेच्च रजोवतीम् । दद्यात्तदृतुसंख्या गाः शक्तः कन्यापिता यदि ॥
दातव्यैकाऽपि यत्नेन दाने तस्या यथाविधि । दद्याद्वा ब्राह्मणेष्वन्नमतिनिस्वः सदक्षिणम् ॥
तस्यातीतर्तुसंख्येषु वराय प्रतिपादयेत् । उपोष्य त्रिदिनं कन्या रात्रौ पीत्वा गवां पयः ॥
अदृष्टरजसे दद्यात्कन्यायै रत्नभूषणम् । तामुद्वहन्वरश्चापि कूष्माण्डैर्जुहुयाद्घृतम् ॥
संस्काररत्नमाला (शौनक),
कन्यका तु विवाहात्प्राग्रजसा चेत्परिप्लुता । पादकृच्छ्रेण शुद्धा स्यात्पाणिग्रहणकर्मणि ॥
संस्काररत्नमाला,
अब आगे करें तो क्या करें; प्रायश्चित्त की तो बात ही न करें, फिर गोदान तो उसकी बात भी न करें; तो आगे १००० – २००० का लोभ प्रकट करके गोनिष्क्रिय करना हो तो उसकी बात कर सकते हैं। ये कटाक्ष है न कि प्रमाण के अनुसार विश्लेषण। हां कोई आस्थावान व्यक्ति समझना चाहे तो उसके लिये चर्चा की जा सकती है। वास्तव में इस दोष का सम्मार्जन करने के लिये भी गोदान की बात आती है और वही प्रत्याम्नाय अर्थात गोनिष्क्रिय पर पहुंचती है।
अतिनिर्धन होने पर दक्षिणा सहित सामर्थ्यानुसार अन्नदान की भी बात आती है किन्तु जो सामर्थ्य हो वही करना होगा न। यदि ५०,००० के पटाखे फोड़े जा रहे हों, आर्क्रेष्ट्रा किया गया हो, गाड़ियों में तेल भरे गए हों तो वह व्यक्ति गोदान में कैसे समर्थ नहीं है?
वृषली कन्या से विवाह करने में भी दोष कहा गया है और उसका पति को वृषलीपति कहकर निंदा भी की गयी है, अपांक्तेय तक कहा गया है। उसके दोष का क्या करें ? तो वर हेतु विवाह में ही कूष्माण्डी होम करने के लिये कहा गया है : “तामुद्वहन्वरश्चापि कूष्माण्डैर्जुहुयाद्घृतम्”
अर्थात लगभग तीन चौथाई तो ऐसे ही विवाह होते हैं तो सबको ये होम करके दोष निवारण करना ही चाहिये। पूर्वकाल में यह दोष सामान्य नहीं था इस कारण इसके मार्जन की विवाह पद्धति में कोई आवश्यकता ही नहीं थी, वर्त्तमान काल में सामान्य हो चुका है इसलिये अब विवाह पद्धति में होना ही चाहिये एवं, सबको (वृषलीपति) विवाह में करना ही चाहिये।
यदि विवाहकाल में कन्या रजस्वला हो जाये तो क्या करे ?
अब एक प्रश्न यह भी है कि यदि विवाहकाल में कन्या रजस्वला हो जाये तो क्या करे ? इसमें दो परिस्थिति हो सकती है और चर्चा आस्थावानों के निमित्त ही की जायेगी चाहे वर्तमान के हों अथवा भविष्य में हों। दो परिस्थिति की बात इस प्रकार कही गयी है कि विवाह आरम्भ होने से पूर्व (अलाभे सुमुहूर्तस्य) और विवाह आरम्भ होने पर (विवाहे वितते यज्ञे होमकाले उपस्थिते)।
विवाहे वितते यज्ञे संस्कारे च कृते यदा । रजस्वला भवेत्कन्या संस्कारस्तु कथं भवेत् ॥
स्नापयित्वा तदा कन्यामन्यैर्वस्त्रैरलंकृताम् । पुनर्मेत्याहुतिं हुत्वा शेषं कर्म समाचरेत् ॥
आपस्तम्ब स्मृति ७/९ – १०
अलाभे सुमुहूर्तस्य रजोदोषे ह्युपस्थिते । श्रियं संपूज्य विधिवत्ततो मंगलमाचरेत् ॥
विवाहे वितते यज्ञे होमकाले उपस्थिते । कन्यामृतुमतीं दृष्ट्वा कथं कुर्वंति याज्ञिकाः ॥
स्नापयित्वा तु तां कन्यामर्चयित्वा यथाविधि । युंजानामाहुतिं हुत्वा ततस्तंत्रं प्रवर्तयेत् ॥
बृहद्दैवज्ञरंज
विवाहपूर्व अर्थात विवाह के दिन ही जब विवाह काल रजस्वला अवस्था में ही पड़ रहा हो तो उस अवस्था में श्रीशांति करे, यह व्यवस्था माता के रजस्वला होने में भी है। अर्थात प्रथम अवस्था में श्रीशांति करके विवाह करने वाली व्यवस्था मिलती है और द्वितीय अवस्था विवाह काल की है। यदि होम काल में अर्थात विवाह आरम्भ होने पर रजस्वला हो जाये तो : “स्नापयित्वा तु तां कन्यामर्चयित्वा यथाविधि । युंजानामाहुतिं हुत्वा ततस्तंत्रं प्रवर्तयेत् ॥”
इस विषय में और विशेष वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है :
यजः पवित्रैस्सावित्र्या प्रोक्षयेत्पूतवारिभिः। अनेन चानुवाकेन पवमानस्सुवादिना ॥
स्नापयित्वाऽथ विद्वद्भिरन्यवस्त्रादलङ्कृताम्। पूर्णाहुत्यथमिन्दाभ्यां महाव्याहृतिभिस्सह ॥
हुत्वा तन्तुमतीं चैव व्याहृतीभिस्तथैव च। अनाज्ञातं च विद्वद्भिश्शेषं कार्यं समाचरेत् ॥
और अधिक देखना चाहें तो : हविष्मतीरिमा आपो हविष्मान् देवो अध्वरः (तै० सं० १|३|१२|१) इति मन्त्रेण कन्यकां स्नापयित्वा नववस्त्राभ्यामलङ्कृत्य युञ्जानः प्रथमं मनः (तै० सं० ४|१|१|१) इति द्वे आहुती जुहुयादिति भट्टीये विवाहखण्डे प्रतिपादितत्वेन तत्र रजस्वलाशौचस्य विवाहदीक्षापवादकत्वाभाववच्च |
एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
विवाह के पश्चात् प्रथम वर्ष भिन्न-भिन्न मासों में कन्या के वास निषेध संबंधी एक वचन इस प्रकार मिलता है जो जानने योग्य है :
उद्वाहात्प्रथमे शुचौ यदि वसेद्भर्तुर्गृहे कन्यका
हन्यात्तज्जननी क्षये निजतनुं ज्येष्ठे पतिज्येष्ठकम् ।
पौषे च श्वशुरं पतिं च मलिने चैत्रे स्वपित्रालये
तिष्ठंती पितरं निहंतिमभयं तेषामभावे भवेत् ॥
विवाहात्प्रथमे पौषे आषाढे चाधिमासके । न सा भर्तृगृहे तिष्ठेच्चैत्रे पितृगृहे तथा ॥
बृहद्दैवज्ञरंजन (ज्योतिर्निबंध)
इस प्रकार यह आलेख कन्यादान के विषय में ढेरों गंभीर प्रश्नों के गूढ़ उत्तर का अन्वेषण करने वाला सिद्ध होता है और विस्तृत चर्चा की गयी है। ऐसा तो नहीं कि कन्यादान से संबंधित सभी प्रश्नों का उत्तर दिया गया है और भी बहुत सारे प्रश्न हो सकते हैं किन्तु जैसे मातृकापूजन का प्रश्न ही व्यर्थ था और उत्तर नहीं मिल सकता उसी प्रकार अन्य प्रश्नों का विचार करें कि क्या वो प्रश्न उचित है। यदि प्रश्न उचित होगा तो शास्त्रों में उत्तर प्राप्त होगा किन्तु यदि प्रश्न ही अनुचित हो तो उत्तर कहां से मिलेगा अर्थात नहीं मिलेगा।
त्रुटि होना अथवा शास्त्र के प्रमाणों का भी अनर्थ या विपरीत अर्थ करने की संभावना को अस्वीकार नहीं किया जा सकता एवं यदि ऐसी कोई त्रुटि/विसंगति प्रतीत हो तो विद्वद्जनों से ध्यानाकर्षण और समाधान प्राप्त करने का अकांक्षी हूँ एवं महती कृपा होगी।
निष्कर्ष
“अविवेक का स्तर यह है कि हम अधर्म को भी आधुनिकता के नाम पर स्वीकार कर रहे हैं।”
आलेख का निष्कर्ष यह है कि कन्यादान का अधिकार शास्त्रसम्मत उत्तराधिकार के नियमों से बंधा है। वर्तमान में प्रचलित ‘सपत्नीक कन्यादान’ या ‘मातुल (मामा) द्वारा कन्यादान’ के व्यवहार अधिकांशतः शास्त्रीय विधि के विपरीत हैं। कन्यादान का फल तभी प्राप्त होता है जब वह उचित अधिकारी (पिता, भ्राता आदि) द्वारा, उचित काल (रात्रि) में और उचित विधि (अलंकृत करके) से संपन्न किया जाए। ‘रजस्वला कन्या’ (वृषली) के दान के दोष और उनके सम्मार्जन हेतु ‘कूष्माण्डी होम’ का विधान यह सिद्ध करता है कि शास्त्र हर समस्या का समाधान देते हैं, बशर्ते हम स्वेच्छाचार का त्याग करें।
F&Q :
FAQ
प्रश्न : कन्यादान का मुख्य अधिकारी कौन है?
उत्तर : क्रमशः पिता, पितामह, भ्राता, सकुल्य और अंत में माता।
प्रश्न : वृषली कन्या क्या है?
उत्तर : जिस कन्या को रजोदर्शन (Periods) शुरू हो गया हो, वह वृषली कहलाती है।
प्रश्न : कन्या के घर भोजन करना क्यों वर्जित है?
उत्तर : जब तक वह ‘प्रजावती’ (संतान वाली) न हो जाए, उसका अन्न दानकर्ता हेतु ‘अघ’ माना गया है।
प्रश्न : दहेज और कन्यादान में क्या अंतर है?
उत्तर : अलंकार (आभूषण) शास्त्र सम्मत है, ‘दहेज’ एक बाहरी कुप्रथा है। दहेज का हमारे विधान, परम्पराओं से कोई संबंध ही नहीं है, धर्मद्रोही हमें नीचा दिखाने के उद्देश्य से ऐसे षड्यंत्र करते ही रहते हैं। कन्यादान में अलंकृत कन्या देना अथवा आभूषणादि के निमित्त धन प्रदान करना दहेज है ही नहीं। धर्मद्रोही अपनी विकृत मानसिकता के कारण धर्म और शास्त्र के प्रत्येक विषय का इसी प्रकार से खंडन करते रहते हैं।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
सूचना: यह आलेख विशुद्ध रूप से विभिन्न स्मृतियों (पाराशर, बृहद्यम, अंगिरा आदि) और पुराणों के प्रमाणों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि धर्म-जिज्ञासुओं हेतु ‘शास्त्र-सम्मत’ पक्ष प्रस्तुत करना है। किसी भी विशेष परिस्थिति में निर्णय लेने हेतु अपने कुल-पुरोहित या धर्मशास्त्र के विद्वानों से परामर्श अवश्य लें।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








