गांठ बांध लो आध्यात्मिक उन्नति का मूल चरणसेवा है

गांठ बांध लो आध्यात्मिक उन्नति का मूल चरणसेवा है

“आत्मकल्याण का मार्ग बंद कपाट की तरह है, जिसे केवल विप्र-गुरु चरणसेवा की कुंजी ही खोल सकती है।”

लोग धर्म को निमित्त बनाकर यत्र-तत्र भटकते रहते हैं, अनेकानेक कर्मकांड भी करते हैं, व्रत-उपवास आदि भी करते हैं, बहुत लोग बड़े-से-बड़े (प्रसिद्ध) गुरु से दीक्षा प्राप्त करते हैं और अधिकांश लोग कान फुंकवाते हैं, बड़े-बड़े नौटंकीबाजों के यहां भीड़ देखकर उसको बड़ा विद्वान समझकर उसकी भ्रामक कथायें भी सुनते रहते हैं, घर में कभी इस देवता की तो कभी उस देवता की और कभी-कभी तो चाइनीज और साईं की मूर्ति-चित्र आदि भी लगाकर पूजा करते रहते हैं।

इसी प्रकार धर्म के नाम पर और भी न जाने क्या-क्या करते रहते हैं किन्तु जो मूल है वो जानते भी नहीं। यहां हम मूल को जानने-समझने का प्रयास करेंगे और जो कुछ लोग आध्यात्मिक उन्नति, विद्या चाहते हैं उनके लिये बहुत ही उपयोगी होगा क्योंकि इसके (चरणसेवा) बिना आपको कुछ नहीं प्राप्त होने वाला।

गांठ बांध लो आध्यात्मिक उन्नति का मूल चरणसेवा है

यह चर्चा पूर्णतः सामान्य जनों से संबंधित है और भीतर से आत्मकल्याण की इच्छा होते हुये भी उसका दमन करके धर्म के नाम पर उपरोक्त एवं अन्यान्य भी गतिविधि में जीवन व्यतीत करते रहते हैं किन्तु अंत में हाथ मलते रह जाते हैं कुछ प्राप्त ही नहीं होता। जबकि आजीवन धर्म के नाम पर समय भी कहीं न कहीं व्यतीत करते हैं, मन भी लगाने का प्रयास करते ही हैं और धन तो व्यय होता ही है।

आज के समय में तो सप्ताह भागवत और रामायण नवाह के नाम पर लाखों ही नहीं करोड़ तक का व्यय किया जाता है। फिर इसका कुछ तो लाभ होना चाहिये न; होता है नामस्मरण-नामसंकीर्तन आदि जितना कर लेते हैं वह अवश्य ही अपना फल प्रदान करता है। किन्तु कितने मन से किये ये कुछ समय पश्चात् ही ज्ञात हो जाता है न कि सप्ताह भागवत का आयोजन किये एवं उसके कुछ काल पश्चात् ही अन्याय से पुनः धन संग्रह करने लगते हैं, बड़े-बड़े धनिकों का तो यह अन्यायपूर्वक धनार्जन उक्त काल में भी विरमित होता ही नहीं है।

उक्त काल में यदि अन्यायपूर्वक धनार्जन विरमित होता भी है तो सामान्य और निम्नवर्गों का, मध्यमवर्गीय भी नहीं कर पाते। असत्य सम्भाषण छूटता ही नहीं अर्थात उक्त काल में भी अभ्यासवश असत्य सम्भाषण करते ही रहते हैं। मध्यमवर्ग में अहंकार भी अत्यधिक होता है जिसका उच्च वर्ग तो परित्याग करने से श्रेष्ठ सिद्ध होते हैं और निम्नवर्ग में अहंकार होता ही नहीं, किस चीज का हो किन्तु मध्यमवर्ग का अहंकार और प्रदर्शन भाव इतना प्रबल होता है कि सबकुछ निरर्थक ही हो जाता है।

यहां मतिच्छिन्न पंडितों की कोई चर्चा ही नहीं की जाएगी अर्थात सामान्य वर्ग (पंडित वर्ग के अतिरिक्टी) की चर्चा में समझने के लिये जिस तीन वर्ग निर्धारण किया गया निम्न, मध्यम और उच्च वर्ग इन तीनों के लिये चर्चा की जा रही है और इनमें से तो आत्मकल्याण चाहने वाले हैं वो लाभान्वित होंगे, शेष नहीं।

प्रथम चरण अध्ययन से आरम्भ होता है और शिक्षा के नाम पर शैक्षणिक संस्थानों से प्रमाणपत्र प्राप्त करते हैं, विद्या नहीं। आप जहां शिक्षा प्राप्त करते हैं संभव है आप उनको भी गुरु समझने का भ्रम पालते हों किन्तु वो गुरु नहीं हैं सेवक हैं जनसेवक, सरकारी कर्मचारी, सरकारी नौकर और इसी सरकारी नौकर शब्द को थोड़ा हर्षित बनाने के लिये जनसेवक में रूपांतरित किया गया है।

वह यदि ब्राह्मण भी है तो अधम श्रेणी में गण्य होता है और उससे प्राप्त शिक्षा को भी ज्ञान नहीं कहा जा सकता, शेष तो वर्णादि की बात क्या करें म्लेच्छ भी होते हैं। अब संस्कृत विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में भी ब्राह्मणों का अभाव सा होता जा रहा है एवं अन्यान्य अनधिकारियों द्वारा ही अध्यापन कराया जा रहा है। अब जिसने शिक्षा भी म्लेच्छादिकों से प्राप्त किया हो और विद्या प्राप्त ही नहीं किया उसे ज्ञान कैसा अर्थात वह ज्ञान और विवेक से रहित ही होता है, अविद्याग्रस्त होता है। उसकी भौतिक दृष्टि प्रगाढ़ होती है और वो भौतिक सुख-संसाधन-समृद्धि आदि का ही चक्कर काटता रहता है।

गांठ बांध लो आध्यात्मिक उन्नति का मूल चरणसेवा है
गांठ बांध लो आध्यात्मिक उन्नति का मूल चरणसेवा है

उसका धर्माचरण भी भौतिक सुख-संसाधन-समृद्धि आदि के निमित्त ही होता है, वह आध्यात्मिक यात्रा को आरम्भ भी नहीं कर पाता। इसके साथ ही इन संस्थानों में जितने सदाचार परम्परावश सुरक्षित हैं और प्राप्त होते उसे भी नष्ट किया जाता है एवं स्वतंत्रता-समानता आदि का मनगढंत पाठ पढ़ा दिया जाता है। जितनी उच्चशिक्षा और बड़े संस्थान होते हैं उतना ही अधिक और यही कारण है कि निम्नवर्ग में आज भी अंतर्जातीय विवाह न के बराबर है किन्तु उच्च वर्ग में सर्वाधिक है।

मध्यम वर्ग उच्च वर्ग जैसा प्रदर्शन के दुराग्रह से ग्रसित होकर उसी का अनुकरण करता रहता है। तलाक भी अधिकतम उच्चवर्गों में ही होता है और कुछ अंशों में मध्यम वर्ग भी अनुगामी होने के कारण करता है एवं निम्नवर्ग न के बराबर। तलाक या विवाह विच्छेद व द्वितीयादि विवाह वर्ण-जाति के अनुसार भी होता है, जिसे सवर्ण या सामान्य वर्ग कहा जाता है वास्तविक वर्णत्रय अथवा द्विजाति उसमें तलाक नामक आचरण निन्दित है। इनमें से जो कोई भी लिविंग, ब्रेकअप, लवमैरिज, तलाक, पुनर्विवाह (स्त्री), अंतर्जातीय विवाह, अनैतिक संबंध आदि प्रकार के दलदल में फंस जाता है वो तो फंस ही गया।

इनमें से अंतर्जातीय विवाह करने वाली संताने त्याज्य हैं अर्थात आत्मकल्याण चाहने वाला उसका परित्याग कर दे, किन्तु पुत्री के लिये विशेष है कि वो वापस पिता के पास आ सकती है और यदि संतान उत्पन्न हो गया है तो संतान के साथ भी आ सकती है अर्थात पुत्री का पूर्ण त्याग नहीं होता जो कन्यादान में भी नहीं होता, किन्तु अपुत्र (कथित पुत्र) का पूर्ण त्याग होता है। अपुत्र का तात्पर्य वैसा पुत्र जो नरकगामी बनाने वाला हो। और जितने उच्चसंस्थान या उच्चशिक्षा होते हैं पुत्र को उतना ही अधिक नरकगामी बनाते हैं, विदेश में पढ़ने वालों की तो चर्चा ही क्या करें वो तो समझो म्लेच्छ हो गये।

धनिकों या उच्चवर्ग की ये समस्या उसके शिक्षा की प्रक्रिया में ही निहित है और यदि वो चाहें तो इसका सरलता से समाधान कर सकते हैं क्योंकि वो अपने बच्चों के लिये मनोनुकल शिक्षणसंस्थान सरलतापूर्वक खोल भी सकते हैं। किन्तु उनकी समस्या ये है कि जैसे उच्च वर्ग का नकल करने से मध्यम वर्ग की अहंकार को भोजन प्राप्त होता है वैसे ही उच्चवर्ग को विदेशियों की नकल करने से अहंकार तृप्ति होती है।

निम्नवर्ग भी मध्यमवर्ग की नकल करने का प्रयास करता है किन्तु जो व्यवहार विदेशियों से उच्चवर्ग को प्राप्त होता है उसकी मात्रा न्यून हो जाती है, पुनः और न्यून होकर मध्यम वर्ग को प्राप्त होता है और निम्न वर्ग के पास आते-आते अत्यल्प हो जाती है। इसके प्रभाव को वर्ग के सापेक्ष ही एक अन्य प्रकार से भी समानांतर भी आंका जाना चाहिये और वो है महानगर, नगर व गांव। महानगर के लोगों विशेषकर उच्च वर्ग की जीवनशैली पूर्णतः विदेशी (मलेच्छतुल्य) हो चुकी है कुछ लक्षण रूप में जिसे प्रदर्शन मात्र भी कहा जा सकता है भारतीयता विद्यमान है।

शिक्षा के पश्चात् आजीविका और धनार्जन की बात आती है तो उसकी शिक्षा में उसे यही तो मूलतः सिखाया जाता है अस्तु जितनी उच्च शिक्षा उतना अधिक धनप्राप्ति संभव किन्तु उतने ही अन्यायपूर्वक भी। प्रत्येक नियम के अपवाद तो होते हैं इस कारण इसके भी अपवाद होंगे ही और अपवाद होने से नियम भंग नहीं होता। धन की कमी न होने के कारण ये वर्ग अधिकतम कथा का प्रयास करते हैं और नौटंकीबाज इनसे धन ठगते रहते हैं।

इनका दान भी ट्रष्टों को जाता है इनको इतना भी विवेक नहीं होता कि दान भी सही से कर सकें। दान में भी इनकम टैक्स का विषय सन्निहित होता है और वो भी व्यापार होता है न कि दान आत्मसंतुष्टि हेतु डोनेशन का अर्थ दान समझना बहुत अच्छा है, मग्न रहो। लेकिन प्रदर्शन ऐसा होता है कि मध्यम वर्ग नकल को आतुर हो जाये, उच्च वर्ग पर प्रदर्शन का प्रतिबंध लगना चाहिये किन्तु समस्या ये है कि यदि ये कभी सड़क पर दिख जायें तो वो भी देश भर में चर्चा का विषय बन जाता है।

प्रतिबंध इनके प्रदर्शन पर ही नहीं अपितु इनके व्यवहार दिखाने वाले फिल्म, धारावाहिक आदि पर भी हो। मध्यम वर्ग को अहंकार तृप्ति हेतु अनुकरण के विचार का त्याग करना होगा अस्तु मूल सुधार मध्यम वर्ग के लिये अपेक्षित है। उच्चवर्ग का सुधार दुष्कर है, है तो है उनकी संख्या ही कम है उसे सुधार के लिये प्रेरित करना चाहें तो प्रदर्शन निम्नवर्ग का हो और उसमें सदाचारी ब्राह्मणों का।

ब्राह्मणों का ही क्यों ?

“भारतीयता का ९९% दर्शन आज भी केवल शास्त्रनिष्ठ ब्राह्मणों के आचरण में सुरक्षित है।”

यहां सदाचारी ब्राह्मणों के आचरण-व्यवहार के प्रदर्शन की बात कही गयी और यह दग्ध करने वाली है और जो जितने उच्चशिक्षा प्राप्त होंगे, जितने बड़े राजनीतिबाज होंगे उन्हें उतना ही अधिक दग्ध करने वाली है। तो प्रश्न करो न ब्राह्मणों का ही क्यों ? मैं उत्तर देता हूँ, भारतीयता का ९९% दर्शन यदि कहीं होता है तो वो ब्राह्मणों में ही होता है। भारतीयता का तात्पर्य मूल सनातन है और जो वेद-स्मृति-पुराणादि से ज्ञात होता है। समझो बात को उदाहरण दे रहा हूँ :

  • परिधान : यदि तुमको परिधान से देखना है तो ९९% ब्राह्मणों में ही दर्शन होगा एकाध प्रतिशत ही ब्राह्मणेत्तरों में दिखेगा। कितने धोती पहनने वाले कहां मिलेंगे सोचो। तुम जिसे प्रगति समझकर पहन रहे हो वो प्रगति नहीं म्लेच्छ परिधान है, विदेशी परिधान है। बताओ भारतीयता कहां दिखेगी ? विदेश में यदि तुम धोती पहन लो तो तुम्हारा परिधान ही सिद्ध कर देगा कि तुम भारतीय हो।
  • शिखा : कुछ विशेष गोत्र शिखा विहीन भी होते हैं किन्तु विशेष गोत्रों के अतिरिक्त चारों वर्णों के लिये शिखा अनिवार्य है। देश भर में शिखा धारण करने वालों का सर्वेक्षण करा लो, शिखा धारण करने वालों में तीन चौथाई ब्राह्मण ही होंगे। यदि तुमने शिखा धारण कर रखा है तो विदेश में भी तुम भारतीय हो यह तुम्हारी शिखा सिद्ध कर देगी।
  • तिलक : जैसे तीन चौथाई शिखा धारण करने वाले ब्राह्मण होंगे उसी प्रकार तिलक में भी समझो। जैसे धोती-शिखा से विदेश में तुम्हारी भारतीयता दिखेगी वैसे तिलक से भी दिखेगी।
  • भाषा : अब तुम्हारी वाणी की बात आती है अर्थात तुम्हारी बोली से तुम्हारी पहचान की जा सकती है। भारतीय होने की मूल वाणी संस्कृत है और यह भी ९९% ब्राह्मण के पास ही सुरक्षित है। आगे कर्म की बात ही मत करना।

मैं भारत में ही प्रदर्शन की बात कर रहा हूँ और भारत में प्रदर्शन के लिये यदि भारतीयों की बात कर रहा हूँ तो तुम्हें आग क्यों लग रही है ? इसीलिये न कि तुम दिखने में कहीं से भी भारतीय नहीं लगते हो तो ये तुम्हारी कमी है, तुम भारतीयता से रहित हो। सभी भारतीय दिखो तो सभी का प्रदर्शन होना चाहिए। किन्तु भारत में विदेशियों का प्रदर्शन क्यों किया जा रहा है ? ये अनर्थ है।

लेकिन इनमें से कोई नहीं सुधरेगा और उच्चवर्ग में से वही आत्मकल्याण के पथ पर आगे बढ़ता है जिसका सबकुछ नष्ट हो जाये। इसकी चर्चा हमें नहीं करनी एकाध होंगे तो हों उनके लिये भी मार्ग वही होगा जो अन्य के लिये। मध्यमवर्ग को नकल की प्रवृत्ति अर्थात व्यावहारिक अनुकरण का त्याग तो नहीं करना है केवल परिवर्तन करना चाहिये और जो भारतीय हैं भी व दिखते भी हैं उनका अनुकरण। इसके साथ ही अहंकार का त्याग करना कठिन है प्रयास करना चाहिये और इसके बिना भारतीय का अनुकरण नहीं कर सकते, म्लेच्छों का ही अनुकरण करते रहोगे।

भारतीयता का दर्शन
भारतीयता का दर्शन

निम्नवर्ग के पास अहंकार भी नहीं है और आत्मकल्याण के लिये अपेक्षित सबकुछ सुलभ है किन्तु दिग्भ्रमित कर दिया गया है। दिग्भ्रमित करने वाले हैं – राजनीति, शिक्षा, फिल्म, सीरियल, मिडिया, सोशल मीडिया इत्यादि। तुम्हें यदि बचना है तो इन सबसे बचना होगा। भारतीयता का प्रसार उच्च से निम्न की ओर न होकर निम्न से उच्च की ओर विपरीत क्रम से ही संभव है। इसलिये निम्नवर्ग को ही अड़ियल बनने की आवश्यकता है, अहंकार अपनाने की आवश्यकता है भारतीयता का अहंकार।

निम्नवर्ग में अहंकार नहीं होता ग्लानि का भाव होता है और वो भी विदेशियों के समान न होने की ग्लानि का भाव। तुम्हें इस ग्लानि भाव का त्याग करना होगा। ये ग्लानि भाव या हीन भावना भी दो प्रकार की होती है एक तो विदेशी न होने से जैसे; सूट-बूट के अभाव से या फर्राटेदार अंग्रेजी न बोलने का और दूसरा भारतीय बनने में भी जैसे; धोती, शिखा, तिलक आदि धारण करने में।

कलयुग में आत्मकल्याण का सरल-सुगम मार्ग

“जो पुण्य बड़े-बड़े यज्ञों से नहीं मिलता, वह विप्र/गुरु चरण के स्पर्शमात्र से सुलभ हो जाता है।”

कलयुग का प्रभाव उग्रतर होता जा रहा है और इसका सर्वोत्तम व ज्वलंत उदाहरण है कि भगवाधारी कालनेमियों की बड़ी सेना उत्पन्न हो गयी है। मैंने दूरदर्शन के बहसों में भगवाधारियों को भी एक कहते सुना है : “मैं और मेरा भगवान, बीच में तीसरे (गुरु/ब्राह्मण) का क्या काम”

साथ ही देशभर में ब्राह्मणों के विरुद्ध, शास्त्र के विरुद्ध कुछ भी बकवास करने की स्वतंत्रता है और जिसे जो मन आता है बक देता है। ऐसी अवस्था में सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि विषय से संबंधित मुख्य प्रमाणों का अवलोकन कर लें।

क्योंकि कुछ भी हो उनकी संख्या २ – ४ प्रतिशत ही है केवल सरकार उस दस्युवर्ग को छूट दे रही है, केवल छूट ही नहीं दे रही है अपितु उत्प्रेरित भी कर रही है, संरक्षण और पोषण भी कर रही है। न्यायपालिका, संसद या अन्यान्य संस्थानों सबकी यही दशा है, केवल कथनी के लिये सनातन/धर्म/हिन्दू/हिंदुत्व/जय श्रीराम आदि है करनी पूर्णतः विरुद्ध है जो देश में हो रहे देवी-देवताओं के अपमान, सनातन के अपमान, शास्त्रों के अपमान एवं गुरु/ब्राह्मणों के अपमान से सिद्ध होता है। इन राक्षसी प्रवृत्ति वाले राक्षसों का निश्चित ही संहार होगा और जितने शीघ्र बढ़ेंगे उतने ही शीघ्र नष्ट भी होंगे।

इसकी चर्चा का उद्देश्य यह है कि वर्त्तमान काल में धर्म-धर्म करने वाला भी, जय श्री राम का नारा लगाने वाला भी, तीर्थों में डुबकी लगाने वाला भी, मंदिर-मंदिर दर्शन करने वाला भी दिग्भ्रमित है और निरर्थक विधि से धर्माचरण का प्रदर्शन करते हुये वास्तव में पापाचार ही कर रहा है। मंदिरों में देवताओं के दर्शन की बात करें तो अस्पृश्यों द्वारा मंदिर और देवता का सान्निध्य समाप्त कर दिया गया है, तीर्थाटन की बात करें तो घर से निकलते ही आहार-व्यवहार संबंधी किसी भी शुद्धि का पालन नहीं किया जाता, हां निषिद्ध कार्य अवश्य किये जाते हैं जैसे ट्रेन-फ्लाइट-बस आदि पर चढ़कर जाना, जूते-चप्पल पहनकर जाना आदि।

यहां जो तथ्य कहे जा रहे हैं वो शास्त्रीय सिद्धांतों पर आधारित हैं एवं धर्म का निर्णय शास्त्रीय सिद्धांतों से ही होगा न कि सांविधानिक धाराओं से और न ही न्यायपालिका की व्याख्या से। लोगों के मन में एक भ्रम उत्पन्न कर दिया गया है कि व्यावहारिक दृष्टिकोण ही विचार करना चाहिये और साथ ही विदेशियों के जो विचार हैं वही श्रेष्ठ हैं, हमारे विचार-सिद्धांत-नियम-परम्पराएं सभी निम्नस्तरीय हैं, तभी तो बात-बात में एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति कुरीति-कुप्रथा आदि चिल्लाता रहता है।

इसे मात्र विवेकशून्यता कहने से काम नहीं चलेगा, विवेकशून्यता के साथ ही मानवत्व का परित्याग करके राक्षसत्व को अंगीकार भी करते जा रहे हैं। प्रचार-प्रसार तो वो चाहेगा, किन्तु जब हम मानवत्व को धारण करेंगे तो उसके दुर्गुणों को अंगीकार नहीं कर सकेंगे। किन्तु जब हम अपने गुणों का त्याग कर देंगे तो रिक्त स्थान को उसके दुर्गुण स्वतः परिपूर्ण कर देंगे। भ्रमित अवस्था में गति विपरीत है, धर्म के विपरीत और जब गति विपरीत है तो कुछ मंदिर-तीर्थ आदि में आत्मसंतुष्टि कहकर धर्म का पाखंड कर लेते हैं।

आवश्यकता समस्या मूल को ढूंढने की है और मूल का उच्छेदन किये बिना समस्या का समाधान नहीं होगा। आगे समस्या का मूल भी स्पष्ट हो जायेगा उससे प्रथम हम संबंधित प्रमाणों का अवलोकन कर लेते हैं :

गूढ विद्या जगन्माया देहे चाज्ञान संभवा। उदयः यत्प्रकाशेन गुरुशब्देन कथ्यते॥
सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरोः पादसेवनात्। देही ब्रह्म भवेद्यस्मात्त्वत्कृपार्थं वदामि ते॥

लघुगुरुगीता/१० – ११

इमं लोकं मातृभक्त्या पितृभक्त्यातु मध्यमम्। गुरुं शुश्रूषया चैव ब्रह्मलोकं समश्नुते ॥
मत्स्यपुराण/२१०/११

भर्तारं नानुवर्तेत सा च पापगतिर्भवेत्। भर्तुः शुश्रूषया नारी लभते स्वर्गमुत्तमम्॥
अपि या निर्नमस्कारा निवृत्ता देवपूजनात्। शुश्रूषामेव कुर्वीत भर्तुः प्रियहिते रता॥

बाल्मीकि रामायण/अयोध्याकाण्ड/२४/२७

शुश्रूषया परमया पादसंवाहनादिभिः । पूजितो देवदेवेन विप्रदेवेन देववत् ॥
श्रीमद्भागवतपुराण/१०/उत्तरार्द्ध/१८

ज्ञातव्या गुरुशुश्रूषा परमं धर्मकारणम् । गुरुशुश्रषया विद्यां नरः समधिगच्छति ॥
विद्यया तदवाप्नोति यत्र गत्वा न शोचति । सुवर्णपुष्पां पृथिवीं विचिन्वन्ति नरास्त्रयः ॥
शूरश्च कृतविद्यश्च यश्च जानाति सेवितुम् । सर्वधर्मविहीनोऽपि गुरुशुश्रूषणे रतः ॥
स्वर्गलोकमवाप्नोति पुरुषोऽपि सुदारुणः । मातरं पिंतरं वापि ज्येष्ठभ्रातरमेव च ॥
गुरुं विद्याप्रदं वापि यश्च शुश्रूषते नरः । स्वर्गलोकमवाप्नोति यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥
यदेव पुण्यमाप्नोति गुरुशुश्रूषया द्विजः । द्विजशुश्रूषया शूद्रस्तदेव फलमश्नुते ॥
प्राप्नोति पुण्यं परमं च साध्वी शुश्रुषते या पतिमप्रमत्ता ।
शुश्रूषया भूमिपतेः प्रजानां पुण्यं प्रदिष्टं परमं नृलोके ॥

विष्णुधर्मोत्तरपुराण/३/२५६/१ – ७

प्रयत्नेन खनन्यद्वद्भूमेर्वार्यधिगच्छति । शुश्रूषया गुरोस्तद्वद्विद्या शिष्योधिगच्छति॥
स्कन्दपुराण/४ (काशीखण्डः)/३६/७०

यो दद्यात् फलताम्बूलं विप्राणां पादसेवने । इह लोके सुखं तस्य परलोके ततोऽधिकम् ॥
पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम् । मोक्षार्थीलभते मोक्षं विप्रपादस्व सेवनात् ॥
रोगी रोगात्प्रमुच्येत पापी मुच्येत पातकात् । मुच्येत बन्धनाद्बद्धो विप्राणां पादसेवनात् ॥
अनपत्याश्च या नार्य्यो मृताऽपत्याश्च या स्त्रियः । बह्वपत्या जीववत्साः स्युर्विप्रपाद सेवनात् ॥

पाद्मे क्रियासारयोगे – वाचस्पत्यं

सत्, रज, तम तीनों ही गुणों में निरंतर ह्रास-वृद्धि का क्रम चलता ही रहता है यदि किसी एक का ह्रास होता है तो दूसरे किसी न किसी की वृद्धि भी होती है। वर्त्तमान में सत् का अपेक्षा से अधिक ह्रास हो गया है एवं रज व तम की आवश्यकता से अधिक वृद्धि हो गयी है। इसके अनपेक्षित अंतर को पाटना ही समस्या का समाधान है – सांकेतिक

कोई भी युग हो आत्मकल्याण के इच्छुक सभी युगों में रहते हैं युगधर्म के अनुसार संख्या में न्यूनाधिक्यता होती रहती है। वर्त्तमान युग में आत्मकल्याण की कामना रखने वालों के समक्ष बड़ी विकट स्थिति है कि वो दूसरों को दलदल में देख भी रहे हैं और चतुर्दिक दलदल ही दिख रहा है, कहीं कोई मार्ग ही नहीं दिखता। जो फंसा हुआ है वो तो फंसा हुआ है ही किन्तु जो दलदल में नहीं फंसा है उसके चारों ओर भी दलदल ही है, किसी भी दिशा में आगे बढे फंस जायेगा। यहीं पर बात स्पष्ट होती है कि कहीं न कहीं किसी संयोग, कृपा आदि की आवश्यकता है जिससे चमत्कारिक रूप से बाहर निकल जाये, जैसे कोई हेलीकॉप्टर आ जाये और ….।

आत्मकल्याण के विषय में इस अवस्था का समाधान शास्त्रों में पूर्व ही से वर्णित है किन्तु इस उपाय का परित्याग करने के कारण ही सत् की मात्रा घटती गयी, रज और तम की वृद्धि होती गयी। आत्मकल्याण चाहने वाले इस बात की गांठ बांध लें आपके पास इस कलयुग में आत्मकल्याण का एक मात्र उपाय शेष बचा है और वो है – चरणसेवा। अन्यान्य सभी उपाय व्यावसायिक हो गया है चरणसेवा के अतिरिक्त। श्रीमद्भागवत कथा माहात्म्य में भक्ति के पुत्रों (ज्ञान और वैराग्य) का उपचार किसी भी उपाय से नहीं हुआ तो भागवत कथा का उपाय मिला, गोकर्ण हेतु भी यही मिला।

आत्मकल्याण का एक मात्र उपाय
आत्मकल्याण का एक मात्र उपाय

वर्त्तमान काल में भागवत या रामायण की कथा भी तो एक बड़ा व्यवसाय ही बन गया है। कथाकार कहते रहेंगे, प्रमाण है किन्तु प्रयोग तो होता नहीं न; अरे वो कथाकार ही तो व्यवसायी है जो उसके रूप-रंग-परिधान-निवास-भोजन आदि से भी स्पष्ट हो जाता है। ये कहते रहें, प्रमाण है तो कहना ही होगा कि कथा से सब कुछ संभव है, कहने में कोई त्रुटि नहीं है, किन्तु होगा तो नहीं न। अन्यान्य उपाय तो केवल भौतिक सुख की प्राप्ति के ही साधन मात्र बनकर रह गए हैं, आत्मकल्याण तो उद्देश्य है ही नहीं।

ऐसी दशा में अब जो उपाय शेष बचा वो है चरणसेवा

विप्र और गुरुजनों की चरणसेवा और इसी का त्याग लोगों ने कर दिया है। जो आत्मकल्याण चाहते हैं उनके लिये चरणसेवा और मात्र चरणसेवा ही सर्वोपरि उपाय है। इसमें व्यवसाय होगा ही नहीं, किन्तु चरणसेवा और सुश्रुषा को भी धूर्त लोग सेवा शब्द मात्र में समेट लेते हैं और गरीब-दुःखी आदि की सेवा तक पहुंचाते हैं, ब्राह्मण और गुरु की चर्चा ही नहीं करते। अरे अन्यों की सेवा का तात्पर्य है उसकी अपेक्षा और आवश्यकता के अनुसार धन-अन्न-वस्त्रादि की सेवा।

यह भी पुण्य है किन्तु इसमें वस्तु/धन की आवश्यकता है, वस्तु/धन जहां जुड़ा वहां व्यवसाय बन जायेगा और फिल्मों में आपने भिखाड़ियों और उसके लम्पट सरगना को देखा होगा, कैसे व्यवसाय यह समझा जा सकता है। गरीबों के नाम पर, सेवा के नाम पर ट्रस्ट बनाकर लूट मचा रखी है। ब्राह्मण और गुरु की अपेक्षा चरणसेवा है ही नहीं और इसमें धन की आवश्यकता भी नहीं है, ये उसकी आवश्यकता है जो आत्मकल्याण चाहता है।

आत्मकल्याण के मार्ग का बंद कपाट खुलेगा ही ब्राह्मण और गुरु की चरणसेवा से, यहां माता-पिता-पति आदि की चरणसेवा का भी विशेष महत्व ही है।

इस विषय का और अधिक विस्तार नहीं किया जायेगा, प्रमाण प्रस्तुत करते हुये स्पष्ट किया जा चुका है और आत्मकल्याण चाहने वालों को यह बात समझ में भी आ जायेगी, शेष को समझाना ही नहीं है क्योंकि नरकगामियों का कार्य तो शास्त्रसिद्ध विषय पर भी विवाद करना ही है।

चरणसेवा
चरणसेवा

निष्कर्ष (Conclusion)

“ब्राह्मण और गुरु में देहधारी भगवान का दर्शन होने लगे (स्थायी भाव हो जाये) तो समझो आत्मकल्याण का मार्ग खुल गया।”

इस आलेख का मूल तत्व यह है कि वर्तमान कलियुग में बाह्य प्रदर्शन, व्यावसायिक कथाओं और आडंबरपूर्ण भक्ति से आत्मकल्याण संभव नहीं है। मानवीय बुद्धि जब रज और तम के प्रभाव से दूषित हो जाती है, तो वह सत्य मार्ग को छोड़कर भ्रामक प्रदर्शनों में उलझ जाती है। शास्त्रों के प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि समस्त जप, तप और तीर्थाटन से भी जो फल प्राप्त नहीं होता, वह ‘चरणसेवा’ और ‘शुश्रूषा’ से सुलभ हो जाता है।

अतः आत्मकल्याण के इच्छुक जिज्ञासुओं के लिए ब्राह्मणों, गुरुजनों और माता-पिता की निष्काम चरणसेवा ही वह विशेष उपाय है जिसमें कृपा की प्राप्ति होगी हो आत्मकल्याण मार्ग के बंद कपाट को खोलेगा। ये शास्त्रों से प्रमाणित भी है और मेरा अनुभवसिद्ध भी।

FAQ

प्रश्न : ‘चरणसेवा’ को ही सर्वश्रेष्ठ उपाय क्यों बताया गया है?

उत्तर: क्योंकि अन्य सभी धार्मिक उपाय (कथा, दान, आयोजन) वर्तमान में व्यावसायिक हो चुके हैं। चरणसेवा में अहंकार का नाश होता है और यह प्रत्यक्ष सेवा है जिसमें धन का कोई स्थान नहीं है।

प्रश्न : क्या आधुनिक शिक्षा प्राप्त व्यक्ति विद्वान नहीं हो सकता?

उत्तर: प्रमाणपत्र प्राप्त करना और विद्वान होना भिन्न है। यदि शिक्षा म्लेच्छ पद्धति पर आधारित है और सदाचार से रहित है, तो वह व्यक्ति अविद्याग्रस्त ही माना जाएगा।

प्रश्न : क्या स्त्रियों के लिए भी चरणसेवा अनिवार्य है?

उत्तर: शास्त्रों के अनुसार, पति की सेवा ही स्त्री के लिए स्वर्ग प्राप्ति का मुख्य साधन है, चाहे वह अन्य देव पूजन न भी करे।

प्रश्न : राजनीतिक बहस आध्यात्मिक उन्नति में कैसे बाधक है?

उत्तर: राजनीति राग-द्वेष और बुद्धि प्रदूषण का केंद्र है, जो चित्त की शांति को भंग कर मनुष्य को आत्मकल्याण के मार्ग से भटका देती है।

प्रश्न : ब्राह्मणों का ही अनुकरण क्यों करना चाहिए?

उत्तर: क्योंकि ब्राह्मण वर्ग ने ही सदियों से भारतीयता के मूल तत्वों (संस्कृत, परिधान, सदाचार) जिसे स्पष्टतः समझ भी सकते हैं; को सुरक्षित रखा है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

अस्वीकरण: इस आलेख में प्रस्तुत विचार पूर्णतः शास्त्रीय सिद्धांतों और शास्त्रीय दृष्टिकोण पर आधारित हैं। इसमें प्रयुक्त शब्द जैसे ‘म्लेच्छ’, ‘अधम’ या ‘राक्षसी प्रवृत्ति’ का प्रयोग शास्त्रीय परिभाषाओं के संदर्भ में किया गया है, जिसका उद्देश्य किसी की व्यक्तिगत मानहानि करना नहीं अपितु समाज को शास्त्रोक्त मार्ग के प्रति सचेत करना है। पाठक स्वविवेक और श्रद्धा के अनुसार इन विचारों का अनुसरण करें।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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