“सांवत्सरिक श्राद्ध पितृकर्म है, इसमें महापात्र (प्रेतकर्म के अधिकारी) की कोई आवश्यकता नहीं है।”
यदि श्राद्ध विधि को संशोधित करके विकारों का निस्तारण किया जा रहा है तो इसमें सांवत्सरिक श्राद्ध का संशोधन भी अपेक्षित है अपितु इसके विषय में तो और भी गहन व सूक्ष्म चिंतन-मनन की आवश्यकता है क्योंकि यह तो विलुप्तप्राय है। पार्वण के पश्चात् वृद्धि का विलोप हुआ और अब वार्षिक का क्रम है जो आरम्भ हो चुका है। यहां हम क्षयाह श्राद्ध के महत्व आदि को भी समझेंगे एवं इससे संबंधित अन्यान्य विषयों को भी तदनंतर संशोधित सांवत्सरिक श्राद्ध विधि का अवलोकन करेंगे।
संशोधित सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट अर्थात वार्षिक श्राद्ध – वाजसनेयी
सांवत्सरिक श्राद्ध कहें, क्षयाह श्राद्ध कहें अथवा आब्दिक श्राद्ध कहें अथवा वार्षिक श्राद्ध कहें सबका एक ही तात्पर्य है और वो है प्रतिवर्ष माता-पिता (अन्य का श्राद्धाधिकारी होने पर उसका भी) की मृत्यु तिथि पर किया जाने वाला श्राद्ध। इसे बोलचाल की भाषा में वर्षी अथवा और टूटी बोली में बरखी भी कहा जाता है। ब्राह्मणों में अभी भी ५ वर्ष अथवा और अधिक वर्त्तमान में भी देखने को मिलता है किन्तु जातिमात्र का भेद होने से एक वर्ष देखा जाता था कुछ वर्ष पूर्व तक, वर्त्तमान में वो भी समाप्त होता जा रहा है एवं तेरहवीं को किया जाने लगा है जो की पूर्णतः शास्त्रविरुद्ध है किन्तु कराने वाले तो कोई-न-कोई पुरोहित ही होते हैं दोषी तो वही हैं।
दोषारोपण यजमान पर करना सरल है किन्तु सिद्ध करना कठिन, यदि यजमान विषपान करने के लिये कहे (प्रचुर धन देकर भी) तो क्या करेंगे ? वहां बुद्धि कार्य करेगी, किन्तु जहां कर्मकांड का विषय आयेगा वहां यजमान जो कहेगा वो कर देंगे और दोषारोपण भी यजमान पर ही लगायेंगे, वाह ! मुख्य दोषी आप ही हैं और यजमान के दोष को भी आप ही ग्रहण कर रहे हैं, यजमान तो दोषमुक्त हो सकेगा कि ब्राह्मण की अनुमति प्राप्त हो गयी किन्तु शास्त्रविरुद्ध करने वाले ब्राह्मण दोषमुक्त नहीं हो सकते।
पूर्वप्रकाशित सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट विधि में सांवत्सरिक श्राद्ध विषयक महत्वपूर्ण चर्चा तो है ही पुनः प्रकाशन का तात्पर्य परिष्करण पूर्वक है और कुछ महत्वपूर्ण विषयों को यहां भी स्पष्ट करना आवश्यक है :
सामान्यतः लोग श्राद्ध शब्द से ही महापात्र अर्थ ग्रहण कर लेते हैं और इसके कारण जो विकृति आ गयी वो सर्वाधिक ब्राह्मण वर्ग में है कि सांवत्सरिक श्राद्ध में भी महापात्र को ही बुलाया जाता है जो कि अनुचित है। षोडश श्राद्ध प्रेत कर्म होता है जिसमें से सपिंडीकरण में देव-पितृ-प्रेत तीनों कर्म होते हैं इस कारण प्रेतकर्म में महापात्र ही अधिकारी होते हैं, किन्तु देव-पितृ कर्म में पुरोहित वर्ग। सांवत्सरिक श्राद्ध क्या है देव कर्म, पितृकर्म अथवा प्रेतकर्म ? आपका भी उत्तर होगा पितृकर्म है न कि प्रेतकर्म।
यदि प्रेतकर्म नहीं है तो महापात्र की आवश्यकता कहां है ? सांवत्सरिक श्राद्ध पितृकर्म है और इसमें महापात्र की कोई आवश्यकता ही नहीं है पुरोहितवर्ग के देव-पितृ संबंधी ब्राह्मण ही अधिकारी हैं एवं उन्हीं के अधिकार में वार्षिक श्राद्ध आता है। संशोधन की कितनी आवश्यकता थी इस विषय से विद्वद्जन स्पष्टतः अवगत हो गये होंगे। किन्तु ब्राह्मणवर्ग में सांवत्सरिक श्राद्ध विषयक इतनी बड़ी विकृति आने का तात्पर्य है कि फिर तो श्राद्ध में और भी अनेकानेक विकृतियां भरी-पड़ी होंगी और थी जिसका संशोधन किया गया है। सभी विषयों का विश्लेषण करके स्पष्ट भी किया गया है जिसका अवलोकन कर सकते हैं :
“वास्तविक विद्वान वही है जो शास्त्रसम्मत और प्रामाणिक विषयों का आदर करे।”
भूस्वामि भाग विषयक चर्चा पूर्वकृत है, सांवत्सरिक श्राद्ध सामान्यतः स्वभूमि (गृह) में ही किया जाता है अस्तु भूस्वामि भाग अनावश्यक है किन्तु इस विषय में भी गंभीर विकार आ गया था एवं भूस्वामि भाग को श्राद्ध का अंग बना दिया गया। यह कार्य वाचस्पति मिश्र का अनुगमन करने वालों ने भी अपनी पद्धतियों में किया, विकृतियां स्वाभाविक न होकर पद्धतिकारों द्वारा उत्पन्न की गयी। वाचस्पति मिश्र का अनुगमन करते तो संकल्प के पश्चात् ही यदि परकीयभूमि में श्राद्ध किया जा रहा हो तो भूस्वामि पितरों का भाग प्रदान करते न कि भोजन से पूर्व, भोजन से पूर्व देने के कारण यह विकार उत्पन्न हुआ क्योंकि श्राद्ध का अंग समझ लिया गया, चिंतन-मनन की शक्ति, संशोधन का सामर्थ्य तो रहा नहीं।
ऐसे ही मूर्खाचार्य आज यदि संशोधन किया भी गया है तो बकवास करेंगे, किसी भी विषय का प्रामाणिक खंडन मांगा जा है किन्तु इसमें असमर्थ हैं, केवल बकवास का सामर्थ्य रखते हैं। यहां मूर्खाचार्य पूर्व पद्धतिकारों को नहीं कहा गया है भले ही त्रुटियां हुई हों, हम उन्हीं विसंगतियों का तो निस्तारण आज कर रहे हैं। मूर्खाचार्य उनको कहा जा रहा है जो यह समझ तो लेंगे कि विकृतियां हैं, किन्तु शोधन अस्वीकार करेंगे।
ये ईर्ष्यालु प्रवृत्ति का द्योतक है, चहुंओर किसी भी चर्चा में जो देखने को मिलता है वो यह कि स्वयं त्रुटियुक्त भी बक रहे हों तो अड़े रहेंगे, दूसरे पंडित प्रामाणिक रूप से भी कुछ कहें तो अस्वीकार करेंगे क्योंकि मूढ़ हैं, उन्हें लगता है कि इससे अगले की श्रेष्ठता सिद्ध होगी और हमारी मूर्खता। अरे मूर्खाचार्यों तुम लोग अनधिकृत रूप से अभाव के कारण कर्मकांड में पाखंड कर रहे हो यदि संशोधन को स्वीकार नहीं किया तो प्रामाणिक खंडन करो और प्रामाणिक खंडन नहीं कर सकते तो स्वीकार्यता बाध्य है, किन्तु मूढ़ हो, मूढत्व तो प्रकट करोगे ही।
ध्यान रखना यदि ऐसा अपराध किया तो इसका दण्ड भी (दैवीय विधान से) प्राप्त होगा। संशोधन करना मेरा दायित्व था इसको स्थापित करना मेरा दायित्व नहीं है वो शास्त्र स्वयं करेगा और खंडन के बिना अस्वीकार करने वालों को दण्डित भी करेगा।
विकृतियों और इन मूर्खाचार्यों के मूढत्व का प्रदर्शन सांवत्सरिक श्राद्ध में चरम पर होता है। त्रयोदशाह (तेरहवीं) को वार्षिक श्राद्ध नहीं किया जा सकता किन्तु कराते हैं और ब्राह्मण वर्ग में भी ऐसा करने का प्रयास होने लगा है। ब्राह्मणेत्तरों में तो तेरहवीं को ही वार्षिक श्राद्ध व्यवहार बना दिया गया है। अरे मूढ़ों षोडश श्राद्ध के अपकर्षण की आज्ञा शास्त्र में है और इस कारण विद्वानों ने अपकृष्ट किया। वार्षिक श्राद्ध के अपकर्षण की आज्ञा शास्त्रों में नहीं है अस्तु अपकृष्ट नहीं किया जा सकता।

ये एक बार का कर्म नहीं है आजीवन करने का कर्म है। कौन करा रहा है यही मूढ़ मूर्खाचार्य करा रहे हैं न, शास्त्रविरोधी होना सिद्ध कर रहे हैं न। यजमान पर दोषारोपण करने से तुम दोषमुक्त नहीं हो सकते क्योंकि तुम्हीं करा रहे हो। वार्षिक श्राद्ध का अपकर्षण नहीं किया जा सकता और पुत्र को आजीवन करना चाहिये। किये गए अपकर्षण का कोई महत्व ही नहीं है अपितु निरर्थक और शास्त्रविरुद्ध है।
सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट विधि
ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण, पवित्रीकरण, सूर्यार्घ्य दान, गायत्री जप, पंचदेवता-विष्णुपूजन, अंगारभ्रमण, गौरमृत्तिका आच्छादन, रक्षादीप प्रज्वलन, दिग्बन्धन, पाक आदि करके आगे की यथाव्यवस्था क्रिया आरम्भ करे। पवित्रीकरणादि का उचित क्रम : तिलकधारण, शिखाग्रंथि, पवित्रीधारण, पवित्रीकरण, आचमन इस प्रकार है।
पञ्चगव्य निर्माण, प्राशन, प्रोक्षण आदि भी करे।
दिग्रक्षण मंत्र : ॐ नमो नमस्ते गोविन्द पुराण पुरूषोत्तम । इदं श्राद्धं हृषीकेश रक्ष त्वं सर्वतो दिशः ॥
निर्देश :
- जिस क्रिया में स.द.त्रि. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – सव्य, दक्षिणाभिमुख, त्रिकुशहस्त।
- जिस क्रिया में स.पू.त्रि. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – सव्य, पूर्वाभिमुख, त्रिकुशहस्त।
- जिस क्रिया में अ.द.त्रि. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – अपसव्य, दक्षिणाभिमुख, त्रिकुशहस्त।
- जिस क्रिया में अ.द.मो. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – अपसव्य, दक्षिणाभिमुख, मोटकहस्त।
सव्य-अपसव्य क्रम और त्रिकुशा-मोड़ा आदि के सम्बन्ध में अन्य पद्धतियों में किञ्चित अंतर संभव है।
यदि पाककर्त्ता द्वारा पाककर्म हुआ हो तो श्राद्धकर्त्ता पाककर्त्ता से पूछे “सिद्धम्” और पाककर्त्ता कहे “ॐ सिद्धम्” ॥ यदि पाककर्ता न हो तो पूछने की आवश्यकता नहीं है।
सर्वप्रथम कुशादि धारण कर शुद्धिकरण करे, तीन बार आचमन करते हुए आत्मशुद्धि करे :
पवित्रीकरण मंत्र (सव्य-पूर्वाभिमुख) : ॐ अपवित्रः पवित्रोऽ वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याऽभ्यन्तरः शुचिः पुण्डरीकाक्षः पुनातु । ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु ॥
मासिक श्राद्ध तंत्रपूर्वक करना ही शास्त्रसम्मत पक्ष है और पृथक-पृथक करने में अनेकों दोष उत्पन्न होते हैं अस्तु मासिक श्राद्ध में तंत्र का आरम्भ संकल्प से ही हो जायेगा अर्थात एक बार में ही संकल्प किया जायेगा। पूर्वाभिमुख-सव्य-त्रिकुशा-तिल-जल लेकर पहले मासिक-श्राद्ध का संकल्प करे :-
मासिक श्राद्ध संकल्प (स.पू.त्रि.): ॐ अद्य ………. मासे ……….. पक्षे ……….. तिथौ ……..… गोत्रस्य ……….. पितुः ……….. शर्मणः प्रथम सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट श्राद्धमहं करिष्ये॥
- संकल्प कर तिल जलादि भूमि पर गिराये त्रिकुशा सहित।
- त्रिकुशा लेकर तीन बार गायत्री मंत्र जप करे। तीन बार देवताभ्यः मंत्र पढ़े (स.पू.त्रि.) : ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च । नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः ॥३॥
इसके बाद दक्षिणाभिमुख-अपसव्य-पातितवामजानु होकर पूर्वकल्पित दक्षिणाग्र आसन को तिल-जल से प्रोक्षित करे, फिर मोटक, तिल, जल से आसन उत्सर्ग करे :
आसन (अ.द.मो.): ॐ अद्य ……….. गोत्र पितः ……….. शर्मन् इदं आसनं ते स्वधा॥ पितृतीर्थ से पूर्वकल्पित सभी आसनों पर अपसव्य क्रम (पश्चिम-पूर्व) से छिड़के।
तिल विकिरण (अ.द.त्रि.) : ॐ अपहता ऽअसुरा रक्षा ᳪ सि वेदिषदः ॥ श्राद्धभूमि में तिल बिखेरे।
आवाहन (अ.द.त्रि) : ॐ आयन्तु नः पितरः सोम्यासोऽ अग्निष्वाता: पथिभिर्देवयानै: अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान् ॥ करबद्ध पित्र्यावाहन करे।
अर्घ्य स्थापन – अर्घ्यपात्र में दक्षिणाग्र पवित्री देकर, शन्नो देवी मंत्र से जल दे, तिलोऽसि मंत्र से तिल दे :
- जल (अ.द.त्रि.) : ॐ शन्नो देवीरभिष्टय ऽआपो भवन्तु पीतये शंय्योरभि स्रवन्तुनः॥ अर्घ्य पात्र में जल दे।
- तिल (अ.द.त्रि.) : ॐ तिलोऽसि सोम देवत्यो गोसवो देवनिर्मितः। प्रत्नद्भिः पृक्त: स्वधया पितृन् लोकान् प्रीणाहि नः स्वाहा ॥ तिल दे।
अर्घ्य पात्र में तिल देकर पुष्प चन्दन भी दे दे। अर्घ्य पात्र को बांये हाथ में लेकर कुशा निकाल कर भोजन पात्र पर रख कर अन्य जल से सिक्त करे। दांये हाथ से अर्घ्य पात्र को ढंककर अगले मंत्र से अभिमंत्रित करे : –
अर्घ्याभिमंत्रन (अ.द.त्रि.) : ॐ या दिव्या आपः पयसा सम्बभूबुर्या आंतरिक्षा उत पार्थीवीर्या:। हिरण्यवर्णा याज्ञियास्ता न आपः शिवा: स ᳪ स्योना: सुहवा भवन्तु ॥
मोटक, तिल, जल लेकर क्रमशः अर्घ्योत्सर्ग करे :
अर्घ्योत्सर्ग (अ.द.मो.) : ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… शर्मन् एषोऽर्घः ते स्वधा ॥
इस मन्त्र से उत्सर्ग करके अर्घपात्र दाहिने हाथ में लेकर पूर्वसिक्त कुशा पर पितृतीर्थ से उसका अर्द्ध जल दे दे। अर्घ्यपात्र को वामहस्त में करके पवित्री को उसमें रख ले और आसन वामभाग (पश्चिम) में न्युब्ज करे अर्थात औंध कर रख दे :
न्युब्जीकरन (अ.द.मो.) : ॐ पित्रे स्थानमसि ॥ न्युब्ज करे; इनको मतिपूर्वक दक्षिणा से पूर्व (श्राद्ध संपन्न होने से पूर्व) न हिलाये। यदि वायुवेगादि हो तो उसके अनुसार व्यवस्था भी कर दे।
अर्चन गन्धादि उत्सर्ग (अ.द.मो.) : ॐ अद्य ………….. गोत्र पितः ……….. शर्मन् एतानिगन्धपुष्पधूपदीपताम्बूल वस्त्रादिऽऽआच्छादनानि ते स्वधा ॥ गन्धादि सभी अर्चन की वस्तुओं का उत्सर्ग करे।
अ.द.मो. भोजन पात्र और आसन को अपसव्य/अप्रदक्षिण क्रम से जल से मंडल करे (यह ध्यान रखे कि आसन और भोजन पात्र के मध्य अन्य सामग्रियां न रहे)। भोजनपात्र के तिल का निवारण करके अन्न, व्यञ्जन, दधि, घृत, मधु आदि परोसे। अन्नादि परोसकर अधोमुखी दाहिने हाथ से अन्न का स्पर्श कर (अथवा मधु दे) मधुव्वाता मंत्र पढ़े , दाहिने हाथ के नीचे अधोमुखी बांया हाथ लगाते हुए पृथिवी ते …… आदि मन्त्र पढ़े। अवगाहन करने के लिये अन्य पूड़े में सतिल-जल-घृत जलपात्र (पूड़े) में जल रखकर, घृतपात्र (पूड़ा) में घृत देकर रखे :
मधु दे अथवा यदि पहले दिया गया हो तो दाहिने हाथ से भोजन पात्र का स्पर्श करे (अ.द.त्रि.) : ॐ मधुव्वाता ऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्न: सन्त्वोषधिः मधुनक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव ᳪ रजः मधुद्यौरस्तु नः पिता मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमां२ अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तुनः ॥ ॐ मधु मधु मधु ॥
पात्रालम्भन (अ.द.त्रि.) :
- ॐ पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुखे अमृते ऽअमृतं जुहोमि स्वाहा ॥
- ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् समूढ़मस्य पा ᳪ सुरे स्वाहा ॥
- ॐ कृष्ण कव्यमिदं रक्षमदियं ॥
बांये हाथ को अन्न में लगाकर रखते हुए दाहिने हाथ के अंगूठे से क्रमशः अन्न, जल, घी और अन्न का स्पर्श अगले मन्त्र से करे; बहुत जगह व्यवहार में यह नहीं देखा जाता अपितु दीप वाले घी का ही स्पर्श किया जाता है जो अनुचित है :-
अवगाहन (अ.द.त्रि.) : ॐ इदमन्नं ॥ इमा आपः ॥ इदं आज्यं ॥ इदं हविः ॥
तिल विकिरण (अ.द.त्रि.) : ॐ अपहता ऽअसुरा रक्षा ᳪ सि वेदिषदः ॥ पितरान्न के चारों ओर तिल बिखेरे। मोड़ा, तिल, जल लेकर अन्नोत्सर्ग करे :
अन्नोत्सर्ग (अ.द.मो.) : ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ………… शर्मन् इदं अन्नं सोपकरणम् ते स्वधा ॥
सव्य-त्रिगायत्री जप , अपसव्य-मधुव्वाता पाठ : सव्य होकर तीन बार गायत्री जप करे फिर अपसव्य-दक्षिणाभिमुख मधुमती ऋचा का पाठ (मधुमती ऋचा पाठ का तात्पर्य पूरी ऋचा का पाठ है न कि मधु-मधु-मधु उच्चारण करना) करके अगला मन्त्र पढ़े :
ॐ अन्नहीनं क्रियाहीनं विधिहीनं च यद्भवेत्। तत्सर्वमच्छिद्रमस्तु ॥
गायत्री मंत्र से संकल्प वाली त्रिकुशा को आसन के नीचे रखे (कुशाभाव में किंचित कुशा तोड़कर रखा जाता है)। पुनः अपसव्य-दक्षिणाभिमुख “मधुमती ऋचा” (पूरी ऋचा) पाठ करे । तदनन्तर पुनः सव्य होकर रक्षोघ्नसूक्तादि पाठ अथवा श्रवण करे :
ॐ कृणुष्वपाजः प्रसितिन्न पृथिवीं याहि राजे वामवां इभेन । तृष्वीमनु प्रसितिं द्रूनाणोऽस्तासि विध्य रक्षसस्तपिष्ठैः । तवभ्रमास आसुया पतन्त्यनुस्पृस धृषता शोसुचानः । तपू ᳪ ष्यग्ने जुह्वा पतङ्गानसन्दितो विसृज विश्वगुल्काः । प्रतिष्पशो विसृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्याऽअदब्धः । यो नो दूरे अघश ᳪ सो यो अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत । उदग्ने तिष्ठ प्रत्या तनुष्वन्य मित्रां ओषता तिग्महेते । यो नो ऽअराति ᳪ समिधानचक्रे नीचा तं धक्ष्यत सन्न शुष्कम् । उर्ध्वो भव प्रतिविध्या ध्यस्मदा विष्कृणुष्व दैव्यान्यग्ने अवस्थिरा तनुहि यातु यूनाम् जामिमजामिं प्रमृणीहि शत्रून् ॥ पाठ कर तिल बिखेरे।
ॐ उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सौम्यासः । असूंऽयईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु अङ्गिरसो नः पितरः सौम्यासः । तेषा ᳪ वय ᳪ सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासोऽअनुहिरे सोमपीथं वशिष्ठाः तेभिर्यमः स ᳪ रराणो हवी ᳪ स्युसन्नुसद्भिः प्रतिकाममत्तु ॥
ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । भूमि ᳪ सर्वतस्पृत्त्वात्त्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ इत्यादि पुरुषसूक्त पाठ
ॐ आशुः शिषाणो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभनश्चर्षनिनां ।
संक्रदनो निमिष एकवीरः शत ᳪ सेना अजयत्साकमिन्द्रः ॥
ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ॥
ॐ नमस्तुभ्यं विरूपाक्ष नमस्तेनेक चक्षुषे । नमः पिनाकहस्ताय वज्रहस्ताय वै नमः ॥
ॐ सप्तव्याधा दशार्णेषु मृगाः कालञ्जरे गिरौ । चक्रवाकाः शरद्वीपे हन्साः सरसि मानसे ॥
तेऽपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः । प्रस्थिता दूरमध्यानौ यूयं तेभ्योवसीदथ ॥
ॐ रुची रुची रुचिः ॥ पाठ करे।
विकिरदान : पिंडवेदी के पश्चिम भाग में एक त्रिकुशा रख कर जल से सिक्त कर दे, एक पूड़े में अन्नादि लेकर जल से आप्लावित करके (जल देकर) बांये हाथ के पितृतीर्थ से मोड़ा द्वारा त्रिकुशा पर अगले मन्त्र से दे :-
विकिरदान मंत्र (अ.द.मो.) : ॐ अनग्निदग्धाश्च ये जीवा ये प्रदग्धा: कुले मम। भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यान्तु पराङ्गतिम् ॥
सव्य-पूर्वाभिमुख दो बार आचमन करके हरिस्मरण कर तीन बार गायत्री मन्त्र जपे। पुनः अपसव्य दक्षिणाभिमुख-पातितवामजानु होकर मधुमती ऋचा पाठ करके, लम्बी-चौड़ी वेदी बनाये।
हस्तमात्र चतुरंगुलोच्छ्रित वेदी निर्माण करे अथवा पूर्वनिर्मित होने पर उसको ही सही आकार प्रदान करे। जल से सिक्त कर दे
उल्लेखन (अ.द.त्रि.) : प्रादेश प्रमाण रेखा दर्भ पिञ्जुलि (मुख्य तात्पर्य वाजसनेयी के लिये एक कुशा) से खींचे :- ॐ अपहता ऽअसुरा रक्षा ᳪ सि वेदिषदः ॥
अंगारभ्रमण : अंगार लेकर उसे पिण्ड वेदी की रेखा पर भ्रमण कराये। यह भूमि शोधन क्रिया है। मोड़ा या त्रिकुशा से करें यहां ऐसा कोई प्रश्न ही नहीं है। अंगार ही ऐसा हो जिसका एक भाग प्रज्वलित हो और दूसरा भाग अप्रज्वलित हो जिसे पकड़ कर भ्रमण किया जा सके। अंगारभ्रमण करते हुये वेदी के दक्षिणभाग में उसका परित्याग करे :
अंगारभ्रमण मंत्र (अ.द.मो.) : ॐ ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति। परापुरो निपुरो ये भरंत्यग्निष्टांलोकात् प्रणुदात्यस्मात् ॥
रेखा पर तीन छिन्नमूल कुश देकर जल से सिक्त कर दे। स.पू.त्रि. तीन बार देवताभ्यः मन्त्र पढ़े :-
स.पू.त्रि. – ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः ॥३॥
अत्रावन (अ.द.मो.) : ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ……… शर्मन् सांवत्सरिक श्राद्धपिण्डस्थाने अत्रावने निक्ष्व ते स्वधा ॥
अत्रावन का उत्सर्ग करते हुए पूड़े का आधा जल पिंडवेदी के पूर्वसिक्त कुशाओं पर गिरावे और आधा प्रत्यवन वास्ते रखे।
पिण्ड निर्माण : पिण्ड निर्माण उसी समय करे जब उत्सर्ग करना हो न कि पहले, पिण्ड निर्माण करके हाथ धोये बिना ही पिण्ड का उत्सर्ग करे अर्थात पिण्डनिर्माण करके उत्सर्ग ही करे। पिण्ड निर्माण करके बांये हाथ में पिण्ड लेकर उत्सर्ग करे :-
पिण्ड (अ.द.मो.) : ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ……… शर्मन् एष पिण्डः ते स्वधा ॥
पिण्ड दाहिने हाथ में लेकर पितृतीर्थ से वेदी के कुशाओं पर रखे। पिंडतलस्थ कुशाओं में हाथ पोछ ले। अब हाथ धोया जाना चाहिये… पिण्डनिर्माण संबंधी विश्लेषण ऊपर किया जा चुका है पुनरावृत्ति अनपेक्षित है।
पिण्ड प्रदान करने के पश्चात् सव्य-पूर्वाभिमुख होकर दो बार आचमन करके हरिस्मरण करे। फिर दक्षिणाभिमुख हो जाये –
- ॐ अत्र पितरोमादयध्वं यथाभाग मा वृषादयध्वम् ॥ सूर्य स्वरूप पिता का ध्यान करते हुए उत्तर से श्वास ले।
- ॐ अमीमदन्त पितरो यथाभाग मा वृषायिषत ॥ पश्चिम की ओर श्वास छोड़े।
अत्रावन के पश्चात् जो जलयुक्त पूड़ा पूर्व में रखा गया पुनः वामहस्त में लेकर उत्सर्ग करे और पिंड पर प्रत्यवन प्रदान करे; दाहिने हाथ में तिल-जल-मोड़ा लेकर प्रत्यवन उत्सर्ग करे :
प्रत्यवन (अ.द.मो.) : ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ………. शर्मन् सांवत्सरिक श्राद्धपिण्डे अत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते ते स्वधा॥
प्रत्यवन का उत्सर्ग कर पिण्ड पर दे। (नीवीं विसर्जन)
पिण्डपूजन (अ.द.मो.) : ॐ नमो वः पितरो रसाय नमो वः पितरो शोषाय नमो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितरो घोराय नमो वः पितरो मन्यवे नमो वः पितरः पितरो नमो वो गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो द्वेष्म ॥ ॐ एतद् वः पितरो वासः ॥ दोनों हाथों से (बांया हाथ आगे, दाहिना पीछे) पकड़ कर सूता पिण्ड पर दे। पिण्ड पर कच्चासूत्र देकर तिल, जल लेकर वस्त्रोत्सर्ग करे :
वस्त्रोत्सर्ग (अ.द.मो.) : ॐ अद्य ………… गोत्र पितः ………… शर्मन् एतद्वास्ते स्वधा ॥
पिंडार्चन (अ.द.मो.) : पान, पुष्प, चन्दन, द्रव्यादि भी चुपचाप सभी पिण्डों पर चढ़ा दे। पिण्डशेषान्न पिण्ड के चारों अपसव्य (अप्रदक्षिण) क्रम से बिखेड़ दे ।
- ॐ शिवा: आपः सन्तु ॥ भोजनपात्र पर जल दे।
- ॐ सौमनस्यमस्तु ॥ भोजनपात्र पर फूल दे।
- ॐ अक्षतंचारिष्टमस्तु ॥ भोजनपात्र पर अक्षत दे।
तिल, मधु, घृत मिश्रित जल (अक्षय्योदक) पूड़े से पिण्ड पर दे। अक्षय्योदक का निर्माण कर ले और उत्सर्जन करके पिण्ड पर दे :
अक्षय्योदक (अ.द.मो.) : ॐ अद्य ………. गोत्रस्य पितु: ……… शर्मणो दत्तैतदन्न पानादिकमक्षय्यमस्तु ॥
पूर्वाभिमुख-सव्य हो दो बार आचमन कर ले।
जलधारा (स.पू.त्रि.) : ॐ अघोरः पिताऽस्तु॥ पिण्ड पर पूर्वाग्र वारिधारा दे।
आशीष प्रार्थना (स.पू.त्रि.) : ॐ गोत्रन्नो वर्द्धतां दातरो नोऽभिवर्द्धन्तां वेदा: सन्ततिरेव च। श्रद्धा च नो मा व्यगमद्बहु देयञ्च नोऽअस्तु। अन्नं च नो बहु भवेदतिथींश्च लभेमहि। याचितारश्च नः सन्तु मा च याचिष्म कञ्चन। एताः सत्याशिषः सन्तु ॥ दक्षिण दिशा में देखते हुये पढ़े
अपसव्य-दक्षिणाभिमुख-पवित्रीहस्त पिण्डस्थ सूत्रादि हटा दे। पिण्ड पर त्रिकुशा रख कर जल या दुग्धधारा दे :-
वारिधारा (अ.द.मो.) : ॐ ऊर्जं वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिश्रुतम् । स्वधास्थ तर्पयत् मे पितृन् ॥
थोड़ा नम्र होकर पिण्ड को सूँघ ले और थोड़ा उठाकर फिर रख दे। पिण्ड के नीचे वाले कुशाओं को निकाल कर और पूर्व में वेदी पर भ्रमण किया गया अंगार लेकर आग में प्रक्षेप कर दे। अर्घ्यपात्र को उत्तान कर दे। मोड़ा, तिल, जल, द्रव्यादि लेकर दक्षिणा करे :-
दक्षिणा (अ.द.मो.) : ॐ अद्य …… गोत्रस्य पितुः ……… शर्मणः कृतैतत् सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट श्राद्ध प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यक रजतं चन्द्रदैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥
दो बार आचमन कर तीन बार देवताभ्यः मन्त्र पढ़े : ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः ॥३॥
द.अप. दीप का किसी पत्रादि से आच्छादन कर दे। हाथ-पैर धोकर सव्य-पूर्वाभिमुख होकर अगला मन्त्र पढे :-
ॐ प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेत्ताध्वरेषुयत् । स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः ॥
॥ ॐ विष्णुर्विष्णुर्हरिर्हरिः ॥
पिण्डवेदि को कनिष्ठिका अङ्गुलि से थोड़ा तोड़ दे। सूर्य भगवान को प्रणाम कर ले। श्राद्ध की सभी उपयोगी वस्तुयें ब्राह्मण को दे, पत्र-पुष्पादि जल में प्रवाहित करे।
॥ इति पं० दिगम्बर झा सुसम्पादितं “करुणामयीटीकाऽलंकृतं” वाजसनेयिनां संशोधिता सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट विधिः ॥
“संशोधन का मार्ग कभी अवरुद्ध नहीं होता, यह पूर्वाचार्यों द्वारा प्रशस्त मार्ग है।”
सांवत्सरिक श्राद्ध के विषय में भी महापात्र के अधिकार और औचित्य का प्रश्न भी गिरधारी जी के द्वारा ही किया गया था और इसके लिये पुनः बारम्बार साधुवाद। मैं तो अन्यों से भी बारम्बार सुझाव मांग रहा हूँ, खंडन के लिये कह रहा हूँ किन्तु अन्यान्य स्वतः ही सिद्ध कर रहे हैं कि सक्षम ही नहीं हैं। त्रुटियां तो हैं, कुछ छोड़ी भी गयी हैं ताकि शास्त्र में जिसकी रूचि हो उसे दृष्ट हो व सुझाव दे। प्रकाशित पुस्तक में निवारण कर दिया जायेगा किन्तु तब तक अवसर है।
बात-बात में बाप-दादा चिल्लाने वालों को सीधा कहा जा रहा है कि यदि बाप-दादा चोर हों तो बच्चे को भी चोर ही बनना चाहिये क्या ? ये उदाहरण मात्र है किसी के बाप-दादा को चोर कहा नहीं जा रहा है। यदि पूर्व में मासिक श्राद्ध का अपकर्षण करके द्वादशाह को विधान किया गया अर्थात संशोधित किया गया, पात्रत्वाभाव होने पर अपात्रक विधान करके संशोधन किया गया उसी प्रकार यदि वर्त्तमान में ढेरों विकार उत्पन्न हो गये हैं तो उनका भी संशोधन-परिष्करण होगा, ये पूर्ववर्ती आचार्यों का ही मार्ग है और अनुगमन किया गया है।

हम अन्य विद्वानों को भी साधुवाद देने के लिये तत्पर हैं शास्त्रसम्मत सुझाव व परामर्श और शास्त्र विरुद्ध विषय का प्रामाणिक खंडन भी आमंत्रित करते हैं : 7992328206
निष्कर्ष (Conclusion)
सांवत्सरिक (वार्षिक) श्राद्ध पितृलोक को प्राप्त हो चुके पूर्वजों के निमित्त किया जाने वाला एक विशुद्ध ‘पितृकर्म’ है। वर्तमान समाज और विशेषकर ब्राह्मण वर्ग में यह अत्यंत गंभीर विसंगति व्याप्त है कि वे इस कर्म में भी महापात्र का आवाहन करते हैं, जबकि शास्त्रों के अनुसार वार्षिक श्राद्ध में केवल देव-पितृ कार्य के अधिकारी पुरोहित वर्ग के ब्राह्मण ही ग्राह्य हैं। इस आलेख के माध्यम से उत्पन्न विकारों का निस्तारण कर, विशुद्ध शास्त्रसम्मत और दोषमुक्त सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट विधि को स्थापित किया गया है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: इस आलेख में प्रस्तुत संशोधित वार्षिक श्राद्ध विधि धर्मशास्त्रों के सूक्ष्म अन्वेषण और शास्त्रनिष्ठ विद्वानों (जैसे विद्यागौरव गिरिधारी मिश्र जी) के प्रामाणिक परामर्श पर आधारित है। प्रचलित लोक-व्यवहार से भिन्नता दिखने पर सुधी पाठक शास्त्रीय मूल ग्रंथों और अपने विवेक का आश्रय लें, अन्वेषण करें और उचित प्रतीत होने पर स्वीकार करें । यह सामग्री केवल कर्मकांड की शुद्धता और धार्मिक जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित है।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।










