वारवेला क्या है ? काल वेला का अर्थ, – अर्द्ध प्रहर विचार .

वारवेला क्या है , काल वेला का अर्थ, अर्द्ध प्रहर विचार

अर्द्धप्रहर के अन्य नाम

अर्द्धप्रहर के अन्य भी कई नाम हैं – यामार्द्ध, प्रहरार्द्ध, अर्द्ध्याम, अधपहरा आदि।

शुभ कामों में क्यों निषिद्ध है

अर्द्धप्रहर दिन या रात का 8-8 भागों विभाजन करने पर प्रतिदिन आने वाला अशुभ कालखंड होता है और इसीलिए किसी भी शुभ कार्य या यात्रा आदि में यह निषिद्ध होता है।

अर्द्धप्रहर का प्रकार और निर्धारण

अर्द्धप्रहर दो प्रकार के होते हैं – 1. वारवेला और 2. कालवेला (रात की कालवेला ही कालरात्रि कहलाती है) । अब हम अर्द्धप्रहर निर्धारण विधि को समझेंगे।

यूं तो सारणी द्वारा हम आसानी से अर्द्धप्रहर जान सकते हैं किन्तु इसके विषय का ज्ञान सारणी से प्राप्त नहीं हो सकता और इस कारण इसके अशुभता को भलीभांति नहीं समझ सकते।

दोनों प्रकार के अर्द्धप्रहर वारवेला और कालवेला का निर्धारण भी अलग-अलग विधि एवं सूत्रों से किया जाता है और दोनों प्रकारों व विधियों को यहां हम विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे।

वार वेला क्या है
वार वेला क्या है

वार वेला क्या है ?

प्रत्येक वार (दिन और रात दोनों) में एक निश्चित सूत्र से निकाला गया आठवां भाग जो कि किसी भी शुभ कार्य के लिये निषिद्ध किया गया है वारवेला कहलाता है।

वार वेला निकालने का सूत्र : वारस्त्रिघ्नोऽभिष्टस्ततः सैकः स्यादर्द्धयामकः।

दिन की संख्या को 3 से गुणा करके उस गुणनफल में 8 से भाग दें। जो शेष बचे उसमें 1 जोड़ने से जो संख्या प्राप्त हो वही उस दिन का अर्द्ध्याम या वारवेला होती है।

दिन की संख्या इस प्रकार होती है : रविवार – 1. सोमवार -2. मंगलवार – 3. बुधवार – 4. गुरुवार – 5. शुक्रवार – 6. शनिवार – 7.

अर्द्ध प्रहर विचार – वारवेला
  • पहली क्रिया : वारस्त्रिघ्नः – वार (दिन संख्या) को 3 से गुणा करें।
  • दूसरी क्रिया : अभिष्टस्ततः – प्राप्त गुणनफल में 8 से भाग दें।
  • तीसरी क्रिया : सैकः – प्राप्त शेष में 1 जोड़ें।
  • स्यादर्द्धयामकः – शेष में 1 योग से जो योगफल प्राप्त हो वही उस दिन का अर्द्ध्याम (वारवेला) होता है ।

कालवेला का अर्थ

रविवार से शनिवार तक सातों दिन के सूर्यादि ग्रह अधिपति होते हैं। उसी तरह ये सभी ग्रह एक निर्धारित क्रम से अर्द्धप्रहरों के भी स्वामी होते हैं और जिस अर्द्धप्रहर का स्वामी शनि होता है उसे कालवेला कहा जाता है।

ज्योतिष शास्त्र में अर्द्धप्रहर के अधिपतित्व का एक विशेष सूत्र अथवा नियम बताया गया है।

आदौ दिनेशयामार्द्धस्तदन्ते तत्पराः क्रमात् । दिवसेषु षड़ावृत्त्या पञ्चावृत्त्या तु रात्रिषु ॥ सारसंग्रह

वारेशादर्द्धयामेषु रात्र्यह्नोः पञ्चषट्क्रमात् । अधिपाः स्युर्ग्रहास्तत्र यथाऽर्काहे भवन्ति ते ॥ स्मृति मुक्तावली

कालवेला का अर्थ
कालवेला का अर्थ
  • दिन और रात दोनों में पहला अर्द्धप्रहर वाराधिपति (दिन के अधिपति ग्रह) का ही होता है।
  • तत्पश्चात् दिन के अगले अर्द्धप्रहर का स्वामी उस अधिपति से छठा होता है ।

इसी क्रम से जिस अर्द्धप्रहर का स्वामी शनि निकलता है वह कालवेला होता है जिसे सभी प्रकार के शुभ कार्यों में त्याज्य कहा गया है।

उदाहरण 1. – जैसे रविवार को पहले अर्द्धप्रहर के स्वामी सूर्य, दूसरे के (सूर्य से छठा) शुक्र, तीसरे के (शुक्र से छठा) बुध, चौथे के चन्द्र, पांचवें के शनि, छठे के गुरु सातवें के मंगल और आठवें के पुनः सूर्य अधिपति होते हैं।

रविवार को पांचवें अर्द्धप्रहर का अधिपति शनि होता है, इसलिए रविवार का पांचवा अर्द्धप्रहर कालवेला होता है।

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