रविव्रत या रविवार व्रत भगवान सूर्य का व्रत है। तुला राशि में सूर्य नीच होने के बाद छठ पूजा से सूर्य को सबल करने के लिये व्यापक रूप से छठ पूजा की जाती है। तत्पश्चात वृश्चिक राशि के सूर्य में रविव्रत का आरंभ और मेष राशि के सूर्य में समापन किया जाता है।
इस प्रकार ६ महीने रविव्रत का विधान है और इसलिए इसे षाण्मासिक रविव्रत कहा जाता है।
रविवार व्रत के नियम क्या-क्या हैं ?
यदि भाद्रपद मास में अधिकमास लगे तो सिंहादित्य में भी सौरव्रत करने का विधान है। रविव्रत निराहार नहीं किया जाता है अर्थात इसमें एक बार भोजन करना चाहिये और भोजन की विधि नक्तव्रत के नियम से बताई गयी है।
रविवार व्रत कब से शुरू करना चाहिए
वृश्चिकार्के सितेऽर्केह्नि रविव्रतमथारभेत् । मेषस्थेऽर्के सिते पक्षे तद्व्रतं च समापयेत् ॥ – सूर्य जब वृश्चिक राशि में स्थित रहें तो जो शुक्ल पक्ष हो उसमें रविव्रत आरम्भ करना चाहिये। इसी तरह सूर्य जब मेष राशि में रहें तो शुक्ल पक्ष में रविव्रत का समापन करना चाहिये।
मार्गे मासि तथा माघे वैशाखाषाढयोरपि । शुक्लपक्षे व्रतं कुर्यात् सम्यग्देवस्य भास्वतः ॥ – मार्गशीर्ष अर्थात अग्रहायण या अगहन, माघ और वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में रविव्रत करना चाहिये।
साम्बपुराण – अलिमेषगते भानौ भगवत्यर्कवासरे । शुक्लपक्ष स विधिवद् व्रतं साम्ब ! समाचरेत् ॥ धनुवृषगते भानौ यः कुर्यात् सवितुर्व्रतम् । सप्तजन्मनि कुष्ठी स्याद् दरिद्रश्चोपज्ञायते ॥ देवोत्थानात् परं ग्राह्यं व्रतं देवस्य भास्वतः । कदाचिदलि (वृश्चिक) मेषार्के कृष्णपक्षे न कारयेत् ॥
वृश्चिक से मेष राशि तक के सूर्य होने पर रविवार को शुक्लपक्ष में विधिवत रविव्रत करना चाहिये। यदि धनु से वृष राशि में रविव्रत किया जाता है तो सात जन्मों तक कुष्ठी और दरिद्र होता है। रविव्रत देवोत्थान एकादशी के बाद ही आरम्भ करना चाहिये और कभी भी कृष्णपक्ष या वृश्चिक राशि के सूर्य में आरंभ न करे एवं इसी तरह मेष राशि के सूर्य में भी कृष्ण पक्ष में समापन न करे।
स्मृत्ति – आदौवृश्चिकमेषान्ते रविवारो यदा भवेत्। तदा रविव्रतारम्भविसर्गौ शास्त्रसम्मतौ॥ – पुनः अन्य स्मृति का वचन है कि वृश्चिक राशि के आदि में जो शुक्ल पक्ष प्राप्त हो उसमें आरम्भ करे और मेष राशि के अंत में जो शुक्लपक्ष प्राप्त हो उसमें समापन करे।
रविवार व्रत कब से शुरू करे प्रमुख बातें :-
- सूर्य जब वृश्चिक राशि में रहें तो आरम्भ करें।
- शुक्ल पक्ष में आरम्भ करे।
- देवोत्थान एकादशी के बाद ही आरम्भ करे।
- अर्थात मार्गशीर्ष और कार्तिक दोनों में से जिस किसी महीने में वृश्चिक राशि के सूर्य प्राप्त हों तभी
- व्रत का आरम्भ करना चाहिये।
- यदि देवोत्थान एकादशी के बाद कार्तिक मास में रविवार उपलब्ध न हो और मारशीर्ष मास के
- शुक्ल पक्ष में वृश्चिक राशि के सूर्य उपलब्ध न हों तो मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष में भी पंचमी तक में जो प्रथम रविवार उपलब्ध हो उसमें रविव्रत आरम्भ करे।
रविवार व्रत समापन कब करे प्रमुख बातें :-
- सूर्य जब मेष राशि में स्थित हो तब करे।
- शुक्ल पक्ष में ही समापन करे।
- अंतिम रविवार को समापन करे।
- किसी भी कारण से वृष राशि के सूर्य में रविव्रत समापन न करे।
- कृष्ण पक्ष में भी समापन नहीं करे।
- समापन हेतु यदि मेष राशि के अंत में शुक्ल पक्ष मिले तो उसी में करे।
विष्णुधर्मोत्तर – ये त्वादित्यदिनं प्राप्य नक्तं कुर्वन्ति मानवाः । सप्तजन्मनि ते प्राप्य सम्भवन्त्यवियोगिनः ॥ – जो व्यक्ति नक्त विधि से रविव्रत करता है सात जन्मों तक उसे वियोग का दुःख नहीं होता है।
भविष्य पुराण – ये त्वादित्यदिने ब्रह्मन् नक्तं कुर्वन्ति मानवाः । दिनान्ते ते तु भुञ्जीरन् निषेधो रात्रिभोजने॥ – जो व्यक्ति नक्त विधि से रविव्रत करता है उसे दिन के अंत में ही भोजन करना चाहिये। रात्रि में भोजन का निषेध है।
अपरार्क – यदा तु प्राङ्मुखी छाया पुरुषाद् द्विगुणा भवेत् । तदा नक्तं विजानीयादनक्तं त्वन्यथा भवेत् ॥ – पूर्वाभिमुख होकर खड़ा होने पर छाया जब दोगुनी हो उस समय भोजन करने का नाम नक्तव्रत है।
रविव्रते वर्ज्याणि, पद्मपुराण – वर्जयेच्च शिलाघृष्टं श्रृङ्गवेरं च शाककम् । कोरदूषकपत्रं च रम्भां छागीघृतं तथा ॥ केशकीटादिकं वर्ज्यमुष्णोदकस्नानमेव च । अल्पबीजादिकं सर्वं व्रते सूर्यस्य वर्जयेत् ॥
रविवार व्रत का महत्व :
- भगवान सूर्य आरोग्य प्रदाता कहे गये हैं अर्थात रविव्रत द्वारा सूर्य के प्रसन्न होने पर आरोग्य लाभ होता है।
- ज्योतिष में सूर्य नेत्र के कारक भी कहे गये हैं अतः नेत्र पीड़ा का भी निवारण होता है।
- सूर्य की आराधना से हृदयरोग में भी लाभ प्राप्त होता है।
- सूर्य के प्रसन्न होने पर राजकृपा सहज उपलब्ध हो जाती है अर्थात सरकारी नौकरी, पदोन्नति आदि की प्राप्ति होती है।
- सूर्य की प्रसन्नता से दरिद्रता का भी नाश होता है।
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