“श्रद्धा के बिना किया गया श्राद्ध, तप और दान सब व्यर्थ है, वह न इस लोक में फल देता है न परलोक में।” — श्रीमद्भगवद्गीता
भारतीय सनातन धर्म की परम्परा में श्राद्ध कर्म केवल एक अनुष्ठान नहीं, अपितु एक गम्भीर आध्यात्मिक ऋण-शोधन की प्रक्रिया है। ‘श्राद्ध’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘श्रद्धा’ शब्द से बताई गई है, जिसका अर्थ है— श्रद्धापूर्वक पितरों के निमित्त सम्पादित किया जाने वाला त्याग। धर्मशास्त्रों के अनुसार, जीव की मृत्यु के उपरान्त उसके स्थूल शरीर का परित्याग हो जाता है, किन्तु सूक्ष्म शरीर अपनी अतृप्त वासनाओं और कर्म-बन्धन के कारण पितृलोक या अन्य लोकों में विचरण करता है। उस जीवात्मा की ऊर्ध्वगति और परलोक में उसकी तुष्टि हेतु जो दान श्रद्धा के साथ शास्त्रोक्त विधि से दिया जाता है, उसे ही ‘श्राद्ध’ की संज्ञा प्रदान की गई है।
सनातन धर्मशास्त्रों में श्राद्ध के विविध भेद एवं उनका शास्त्रीय विवेचन: एक विस्तृत अनुसन्धान प्रतिवेदन
“पितरों की पूजा देवताओं की पूजा से भी अधिक फलदायी और पहले करने योग्य है।” — यम स्मृति
शास्त्रों में पितरों को देवताओं से भी पूर्व पूजनीय माना गया है। मत्स्य पुराण के अनुसार, श्राद्ध कर्म से सन्तुष्ट होकर पितरगण मनुष्य को वे समस्त सुख प्रदान करते हैं जिनकी वह सांसारिक जीवन में आकांक्षा करता है।
श्राद्ध के सम्पादन में चार तत्त्वों की अनिवार्यता है— उपयुक्त देश (पवित्र स्थान), उपयुक्त काल (तिथि एवं समय), सुपात्र (विद्वान ब्राह्मण) और श्रद्धापूर्वक शास्त्रोक्त विधि। आधुनिक विचारधारा जो इसे केवल एक अन्धविश्वास मानती है, वह पितृ-ऋण की उस दार्शनिक गहराई को स्पर्श करने में असमर्थ है जो ऋषियों ने अनुभव की थी। पितृ-ऋण से मुक्ति हेतु किया जाने वाला यह कर्म मनुष्य के अभ्युदय और नि:श्रेयस दोनों के लिए अपरिहार्य है।

मार्कण्डेय पुराण में भी इसी तथ्य की पुष्टि की गई है कि पितरों की पूजा से मनुष्य संसार के समस्त सुखों को भोगता हुआ अन्त में परम पद को प्राप्त करता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति सामर्थ्य होते हुए भी श्राद्ध का परित्याग करता है, उसके पितर उसे शाप देकर लौट जाते हैं, जिससे उसके कुल में विघ्न और कष्ट उत्पन्न होते हैं।

श्राद्ध के विविध प्रकार एवं उनका विभाजन
“पुत्र वही है जो पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए गया में पिण्डदान और श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करे।”
विभिन्न स्मृतियों और पुराणों में श्राद्ध के भेदों का विस्तृत और भिन्न-भिन्न परिप्रेक्ष्य में वर्णन मिलता है। मत्स्य पुराण मुख्य रूप से तीन प्रकार के श्राद्ध स्वीकार करता है, यम स्मृति पाँच प्रकार के, जबकि भविष्य पुराण और विश्वामित्र स्मृति द्वादश (१२) प्रकार के श्राद्धों का विस्तृत विधान प्रस्तुत करते हैं। भविष्य पुराण (ब्राह्मपर्व, अध्याय १८३) के अनुसार श्राद्ध के १२ प्रकारों इस प्रकार है:
नित्यं नैमित्तिकं काम्यं वृद्धिश्राद्धं सपिण्डनम्। पार्वणं चेति विज्ञेयं गोष्ठी शुद्धयर्थमष्टमम्॥
कर्माङ्गं नवमं प्रोक्तं दैविकं दशमं स्मृतम्। यात्रास्वेकादशं प्रोक्तं पुष्ट्यर्थं द्वादशं स्मृतम्॥
उपर्युक्त श्लोक के आधार पर गहन विश्लेषण अग्रलिखित है:
१. नित्य श्राद्ध : नित्य श्राद्ध वह है जिसे गृहस्थ को प्रतिदिन सम्पादित करना चाहिए। यह पंचमहायज्ञों के अन्तर्गत ‘पितृ-यज्ञ’ का स्वरूप है। इसमें विश्वेदेवों का आवाहन नहीं किया जाता और न ही इसमें अर्घ्य या पिण्डदान की अनिवार्यता होती है। वास्तव में नित्यकर्म का एक अंग तर्पण है और मुख्य रूप से तर्पण को ही नित्य श्राद्ध कहा गया है।
अहरहर्यद्दीयते तन्नित्यं श्राद्धमुच्यते। न तत्र क्रियते पूजा विश्वेषां तु कदाचन॥
अर्थ: जो प्रतिदिन दिया जाता है वह नित्य श्राद्ध है। इसमें विश्वेदेवों की पूजा नहीं होती।
२. नैमित्तिक श्राद्ध : किसी विशेष निमित्त या अवसर पर किए जाने वाले श्राद्ध को नैमित्तिक श्राद्ध कहते हैं। इसे ‘एकोद्दिष्ट श्राद्ध’ भी कहा जाता है क्योंकि यह केवल एक ही मृत व्यक्ति के उद्देश्य से किया जाता है। प्रतिवर्ष आने वाली मृत्यु तिथि पर किया जाने वाला वार्षिक श्राद्ध इसी श्रेणी में आता है। इस प्रकार नैमित्तिक श्राद्ध का एक विशेष लक्षण एक पिण्ड दान है और विधि के अनुसार यह एकोद्दिष्ट की श्रेणी में आता है।
एकमुद्दिश्य यत्तु स्यादेकोद्दिष्टं तदुच्यते। तन्नैमित्तिकमित्याहुराशौचान्तरतः कृतम्॥
नैमित्तिक श्राद्ध की प्रक्रिया में विश्वेदेवों का पूजन वर्जित है। यह श्राद्ध उस विशिष्ट आत्मा की परलोक में क्षुधा-पिपासा की शान्ति और उसकी निरन्तर तृप्ति हेतु सम्पादित किया जाता है।
३. काम्य श्राद्ध : जब किसी विशिष्ट सांसारिक या आध्यात्मिक कामना की पूर्ति हेतु श्राद्ध किया जाता है, तो उसे काम्य श्राद्ध कहा जाता है। विभिन्न नक्षत्रों, तिथियों और वारों के संयोग से किए जाने वाले श्राद्धों का फल अलग-अलग बताया गया है।
यत्तु काम्याय क्रियते तद्धि काम्यमिति स्मृतम्। स्वर्गादिफलसिद्ध्यर्थं यत्तु कार्यं हि मानवैः॥
याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार, नक्षत्रों के अनुसार किए गए काम्य श्राद्ध से सन्तान, स्वर्ग, आरोग्य और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। उदाहरणार्थ, कृतिका नक्षत्र में श्राद्ध करने से स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है, जबकि रोहिणी में श्राद्ध करने से सन्तान लाभ होता है।
४. वृद्धि श्राद्ध : परिवार में होने वाले मांगलिक आयोजनों, जैसे पुत्र-जन्म, विवाह, गृह-प्रवेश या अन्य संस्कारों और यज्ञादि के समय जो श्राद्ध किया जाता है, उसे वृद्धि श्राद्ध कहते हैं। इसे ‘नान्दीमुख श्राद्ध’ या ‘आभ्युदयिक श्राद्ध’ भी कहा जाता है। नान्दीमुख श्राद्ध में प्रथम मातृपक्ष फिर पितृपक्ष का श्राद्ध होता है और इसका उचित काल पूर्वाह्न में ही बताया गया है।
विवाहादौ च यत् कार्यं वृद्धिश्राद्धं तदुच्यते। नान्दीमुखमिति प्रोक्तं पितृप्रीतिविवर्धनम्॥
इस श्राद्ध में पितरों का मुख ‘नान्दी’ (प्रसन्नता) की ओर होता है। इसमें पितरों को सत्य और वसु नामक विश्वेदेवों के साथ पूजा जाता है। यह मांगलिक कार्यों की निर्विघ्नता सुनिश्चित करता है।
५. सपिण्डन श्राद्ध : सपिण्डन या सपिण्डीकरण वह संस्कार है जिसके द्वारा मृत व्यक्ति की जीवात्मा ‘प्रेत’ योनि से मुक्त होकर ‘पितृ’ संज्ञा प्राप्त करती है और अपने पूर्वजों (पिता, पितामह और प्रपितामह) के लोक में सम्मिलित हो जाती है। यह सामान्यतः (कलयुग में) मृत्यु के १२वें दिन किया जाता है।
प्रेतपिण्डं पृथक् कृत्वा पितृपिण्डैश्च योजयेत्। यदेतत् क्रियते श्राद्धं तदाहुस्तु सपिण्डनम्॥
इसमें चार पिण्डों का निर्माण किया जाता है— एक प्रेत का और तीन उसके पूर्वजों के। प्रेत के पिण्ड को तीन भागों में विभाजित कर क्रमशः तीनों पितृ-पिण्डों में मिलाया जाता है। यह प्रक्रिया जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर के पूर्ण रूपान्तरण और उसके पितृ-मण्डल में प्रवेश की द्योतक है। सपिंडीकरण श्राद्ध में विश्वेदेव श्राद्ध भी होता है। इसे पार्वण श्राद्ध की विधि से संपन्न किया जाता है।
६. पार्वण श्राद्ध : अमावास्या, पितृपक्ष, संक्रान्ति या अन्य विशिष्ट पर्वों पर किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाता है। यह विश्वेदेवों के साथ सम्पादित होता है और इसमें तीन पीढ़ियों के पितरों का पूजन किया जाता है। ‘पर्व’ का अर्थ है संधिकाल। जब चन्द्रमा और सूर्य का मिलन (अमावास्या) होता है, तब पितरों के लिए जल और अन्न ग्रहण करना सुलभ हो जाता है। पार्वण श्राद्ध पितृऋण मुक्ति का सबसे व्यापक और नियमित मार्ग है। महालय (पितृपक्ष) के दौरान किया जाने वाला श्राद्ध इसी श्रेणी का सर्वोत्कृष्ट रूप है।
अमावास्या यदा सा स्यात् तदा श्राद्धं तु पार्वणम्। विशालं च विधातव्यं विश्वेदेवपुरःसरम्॥
७. गोष्ठी श्राद्ध : जब परिवार के सभी सदस्य या समाज के विद्वान व्यक्ति एकत्रित होकर सामूहिक रूप से पितरों की प्रसन्नता और लोक-कल्याण हेतु श्राद्ध करते हैं, तो उसे गोष्ठी श्राद्ध कहा जाता है। जहाँ व्यक्तिगत सामर्थ्य न्यून हो, वहाँ गोष्ठी श्राद्ध के माध्यम से पितरों की तृप्ति सुनिश्चित की जाती है।
बहुभिर्मिलितैः कार्यं गोष्ठीश्राद्धं तदुच्यते। विद्वद्भिः क्रियते यत्तु धर्मचर्चादिहेतवे॥
८. शुद्धि श्राद्ध : किसी अशुद्धि के निवारणार्थ या आत्म-परिमार्जन के लिए जो श्राद्ध सम्पादित किया जाता है, उसे शुद्धयर्थ श्राद्ध कहते हैं। इसमें विशेष रूप से ब्राह्मणों को भोजन कराकर पितरों के नाम पर शुद्धि की प्रार्थना की जाती है। यह मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि का एक महत्वपूर्ण सोपान है।
शुद्ध्यर्थं क्रियते यत्तु विप्रभोजनपूर्वकम्। श्राद्धं तदाहुः शुद्ध्यर्थं ब्राह्मणैश्च अनुमोदितम्॥
९. कर्माङ्ग श्राद्ध : जो श्राद्ध किसी कर्म विशेष का अंग होने के कारण किया जाय वह कर्मांग श्राद्ध कहलाता है। जैसे तीर्थयात्रा प्रकरण में उसके अंग के रूप में भी श्राद्ध किये जाते हैं। कर्माङ्ग का अर्थ है कर्म का हिस्सा। निषेकादि संस्कारों के लिए कर्म के रूप में किया गया श्राद्ध कर्मांग श्राद्ध के रूप में भी मान्य होता है।
निषेकादौ च संस्कारे यत्तु श्राद्धं विधीयते। कर्माङ्गमभ्युदयिकं तच्छ्राद्धं समुदाहृतम्॥
१०. दैविक श्राद्ध : देवताओं की प्रसन्नता और पितरों के दैवीय स्वरूप के सान्निध्य हेतु जो श्राद्ध किया जाता है, उसे दैविक श्राद्ध कहते हैं। भविष्य पुराण में इसे ‘वैदिक’ श्राद्ध भी कहा गया है। पितृगण दो प्रकार के होते हैं— एक वे जो हमारे पूर्वज हैं (मूर्त), और दूसरे वे जो शाश्वत पितृ देवता हैं (अमूर्त), जैसे सोमपा, हविष्मन्त आदि। दैविक श्राद्ध इन शाश्वत पितृ शक्तियों को सन्तुष्ट करने के लिए किया जाता है, जो ब्रह्माण्ड की व्यवस्था का संचालन करते हैं।
देवतानां प्रतोषाय यच्छ्राद्धं सम्प्रदीयते। विज्ञेयं दैविकं नाम सर्वविघ्नविनाशकम्॥
११. तीर्थ श्राद्ध : देशान्तर गमन या तीर्थ यात्रा पर प्रस्थान करते समय अपनी यात्रा की निर्विघ्नता और पितरों के रक्षण हेतु जो श्राद्ध किया जाता है, वह यात्रार्थ श्राद्ध है। इसमें घी (घृत) का विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है। यात्री अपने पितरों का आशीर्वाद लेकर निकलता था ताकि वे अदृश्य रूप में उसकी रक्षा करें।
गयादिषु च तीर्थेषु यच्छ्राद्धं क्रियते जनैः। तीर्थश्राद्धं तदाख्यातं पितॄणां अक्षयप्रीतिदम्॥
यात्रायां निर्गता यत्तु कुर्वन्ति घृतसंयुतम्। यात्रिकं नाम तच्छ्राद्धं गच्छद्भिः क्रियते सदा॥
१२. पुष्ट्यर्थ श्राद्ध : स्वयं के शरीर की पुष्टि, आरोग्य, बल और आर्थिक उन्नति के निमित्त जो श्राद्ध किया जाता है, वह पुष्ट्यर्थ श्राद्ध कहलाता है। यह पितरों की उस ऊर्जा का आवाहन है जो भौतिक जगत में पोषण प्रदान करती है। ‘पुष्टि’ का अर्थ है विकास। यह श्राद्ध व्यक्ति को केवल आध्यात्मिक रूप से ही नहीं, बल्कि शारीरिक और आर्थिक रूप से भी सुदृढ़ बनाता है। पितर जब तृप्त होते हैं, तो वे अपनी वंश-परम्परा को शक्तिशाली बनाने हेतु आशीर्वाद देते हैं।
पुष्ट्यर्थं क्रियते यत्तु देवेभ्यः प्रीतिवर्धनम्। दैविकं तद्विजानीयात् समृद्धिं प्रार्थयद्भिः॥
श्राद्ध कर्म में द्रव्यों की शुद्धि एवं वर्जनाएं
श्राद्ध की सफलता केवल भावना पर ही नहीं, अपितु प्रयुक्त द्रव्यों की शास्त्रीय शुद्धता पर भी निर्भर करती है। ऋषियों ने श्राद्ध में कुछ विशिष्ट वस्तुओं के प्रयोग का निर्देश दिया है और कुछ का कठोर निषेध किया है।
पवित्र द्रव्य
- तिल (Sesame): भगवान विष्णु के शरीर से उत्पन्न होने के कारण तिल असुरों का नाश करने वाला है। इसके बिना श्राद्ध का अन्न राक्षसों के भाग में चला जाता है।
- कुश (Darba Grass): कुश को पवित्रता का प्रतीक माना गया है। इसके अग्र भाग में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और मूल में शिव का वास होता है।
- रजत (Silver): श्राद्ध में चांदी के पात्र या चांदी का दान पितरों को अक्षय तृप्ति प्रदान करता है क्योंकि पितृलोक चन्द्रमा से सम्बन्धित है और चांदी चन्द्रमा की धातु है।
निषिद्ध वस्तुएं
- लोहा (Iron): श्राद्ध में लोहे के पात्रों का प्रयोग सर्वथा वर्जित है। लोहे का स्पर्श होने से पितर भोजन ग्रहण नहीं करते।
- भोजन वर्जनाएं: मसूर, राजमा, चना, अरहर की दाल, बैंगन, लहसुन, प्याज, मांस (कलियुग में पूर्णतः निषिद्ध) और बासी अन्न श्राद्ध में वर्जित हैं।
- पुष्प वर्जनाएं: धतूरा, केतकी, बेलपत्र (श्राद्ध में), तुलसी (विशिष्ट स्थितियों में पितृपिण्ड पर नहीं), और दुर्गन्धित फूल वर्जित हैं।
निष्कर्ष: शास्त्र-सम्मत दृष्टिकोण की अनिवार्यता
पितरों की प्रसन्नता ही वंश की समृद्धि का आधार है; अतः शास्त्र विधि का पालन करते हुए श्रद्धापूर्वक श्राद्ध अनुष्ठान ही श्रेयस्कर है।
श्राद्ध के १२ प्रकारों का यह विस्तृत अध्ययन यह सिद्ध करता है कि हमारे ऋषियों ने जीवन और मृत्यु के पश्चात् की अवस्थाओं का कितना गहन विश्लेषण किया था। आधुनिक विज्ञान जहाँ इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष को ही सत्य मानता है, वहीं शास्त्र उन सूक्ष्म शक्तियों और बन्धनों की व्याख्या करते हैं जो मृत्यु के उपरान्त भी बने रहते हैं। पितृ-ऋण से मुक्ति केवल एक कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि अपनी जड़ों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है।
श्राद्ध न करने से कुल की जो हानि बताई गई है, वह आधुनिक ‘जेनेटिक्स’ या समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से परे है—यह एक आध्यात्मिक वास्तविकता है। अतः प्रत्येक गृहस्थ का कर्तव्य है कि वह अपनी सामर्थ्य के अनुसार शास्त्रोक्त विधि से पितरों की सेवा करे। जो लोग अन्धकारपूर्ण कुतर्कों में फंसकर इस महान परम्परा का त्याग करते हैं, वे न केवल अपने पितरों को कष्ट देते हैं, बल्कि स्वयं के जीवन में भी अशांति और अवरोधों को आमन्त्रित करते हैं।
॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
“संबंधित प्रश्न” (FAQ)
FAQs
प्रश्न १. यदि मुझे अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि याद न हो, तो क्या करूँ?
उत्तर : ऐसी स्थिति में शास्त्र आश्विन मास की ‘सर्वपितृ अमावास्या’ को श्राद्ध करने का निर्देश देते हैं। इस दिन किया गया श्राद्ध सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों को तृप्त करता है।
प्रश्न २. क्या कोई निर्धन व्यक्ति भी श्राद्ध कर सकता है?
उत्तर : अवश्य। वराह पुराण के अनुसार, यदि किसी के पास सामग्री का अभाव है, तो वह केवल श्रद्धापूर्वक अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर पितरों को नमन करे और अपनी विवशता प्रकट करे। पितर केवल श्रद्धा के भूखे हैं।
प्रश्न ३. श्राद्ध में तिल और कुश का क्या महत्व है?
उत्तर : तिल भगवान विष्णु के पसीने से उत्पन्न होने के कारण असुरों को दूर रखता है और कुश भगवान के रोमों से उत्पन्न होने के कारण स्थान को पवित्र करता है। इनके बिना श्राद्ध असुरों का भोजन बन जाता है।
प्रश्न ४. क्या गया श्राद्ध के बाद वार्षिक श्राद्ध करना आवश्यक है?
उत्तर : गया श्राद्ध पितरों की विशेष मुक्ति के लिए है, किन्तु वार्षिक तिथि पर नैमित्तिक श्राद्ध और प्रतिदिन का नित्य श्राद्ध (तर्पण) करना तब तक आवश्यक है जब तक श्राद्धकर्ता जीवित है।
प्रश्न ५. १२ प्रकार के श्राद्धों में से कौन सा गृहस्थ के लिए अनिवार्य है?
उत्तर : गृहस्थ के लिए नित्य, नैमित्तिक और पार्वण (अमावास्या का श्राद्ध) मुख्य रूप से अनिवार्य माने गए हैं। वृद्धि श्राद्ध केवल मांगलिक अवसरों पर किया जाता है।
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कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








