वर्तमान युग में तकनीक और सूचना का प्रवाह इतनी तीव्र गति से हो रहा है कि सत्य और असत्य के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। विशेषकर भारत जैसे धर्मप्राण देश में, जहाँ आस्था जीवन का आधार है, अंतर्जाल (Internet) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के माध्यम से फैलने वाले भ्रामक तथ्य सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित कर रहे हैं।
यह एक बड़ी समस्या इसलिये बनती जा रही है क्योंकि नई पीढ़ी धर्मविषयक ज्ञान के लिये भी इन्हीं पर निर्भर होती जा रही है और यहां उन्हें भ्रामक तथ्य परोसे जा रहे हैं। ऐसे में धर्माचरण भी अनिष्टकारक ही हो जाता है जो एक विषम परिस्थिति का संकेत है। आज इन्हीं विषयों को गंभीरता पूर्वक उदाहरण के साथ समझेंगे।
डिजिटल मायाजाल: क्या AI और इंटरनेट आपकी धार्मिक आस्था को भ्रमित कर रहे हैं – AI and Dharm
वर्ष 2026 में धर्मपरायण परिवारों के सामने एक विचित्र स्थिति उत्पन्न होने वाली है। 14 जनवरी को सूर्य का मकर राशि में प्रवेश (संक्रांति) और भगवान विष्णु की प्रिय षटतिला एकादशी एक साथ पड़ रही हैं। जहाँ एक ओर जैमिनी ऋषि पुत्रवान गृहस्थों को संक्रांति पर उपवास से वर्जित करते हैं, वहीं एकादशी का नित्य व्रत छोड़ना भी वर्जित है। क्या इस दिन खिचड़ी खाना शास्त्र सम्मत होगा? या फलाहार से ही व्रत पूर्ण होगा? आइये जानते हैं स्मृतियों और पुराणों के प्रकाश में इसका सटीक उत्तर …
अंतर्जाल (Internet) और सूचना का विस्फोट
इंटरनेट ने ज्ञान का लोकतंत्रीकरण तो किया है, लेकिन साथ ही इसने ‘बिना फिल्टर’ वाली सूचनाओं का अंबार भी लगा दिया है। धर्म के विषय में प्रामाणिक तथ्यों की आवश्यकता होती है किन्तु अंतर्जाल पर तथ्यों को प्रमाणित नहीं किया जाता है साथ ही एक गंभीर समस्या यह भी है कि वो लोग अधिक सक्रीय होकर तथ्य परोसते हैं जो धर्मविरोधी हैं। मूल विषय, मानवता, वैज्ञानिकता आदि के आधार पर कुतर्क करके धार्मिक सिद्धांतों को परिवर्तित करके धर्मविरुद्ध नियम बनाकर परोसे जा रहे हैं जो चिंता का विषय है।
- पुष्टि का अभाव: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (WhatsApp, Facebook, X) पर किसी भी धार्मिक दावे को बिना किसी प्रमाण या आधिकारिक स्रोत के साझा कर दिया जाता है। इसके साथ ही गूगल पर भी इसी प्रकार के तथ्य पर्याप्त मात्रा में होते हैं। प्रामाणिक तथ्यों का पूर्णतः अभाव देखने को मिलता है।
- क्लिकबेट और सनसनी: कई वेबसाइटें केवल व्यूज पाने के लिए धार्मिक ग्रंथों की गलत व्याख्या या भविष्यवाणियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती हैं। अर्थातुरता ऐसी हो गयी है कि धर्म के विषय में भी पैसा कमाना ही उद्देश्य हो गया है और ये वास्तव में धर्म के प्रामाणिक व्यक्ति नहीं कर रहे होते हैं अपितु धर्म से जुड़े विषयों पर अप्रमाणिक व्यक्तियों द्वारा किया जा रहा होता है।
- इको चैंबर (Echo Chambers): एल्गोरिदम हमें वही दिखाते हैं जो हम देखना चाहते हैं। यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष वामपंथी/आधुनिक विचारधारा को पसंद करता है, तो इंटरनेट उसे बार-बार वही सामग्री दिखाएगा, जिससे उसका भ्रम “सत्य” में बदल जाता है। और स्वाभाविक रूप से भी अधिकतर ऐसा ही होता है जो हमने अनुभव किया है।
AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) और भ्रम की नई तकनीकें
AI ने भ्रामक तथ्यों को फैलाने के तरीकों को और अधिक परिष्कृत और खतरनाक बना दिया है। AI धर्म के विषय में शास्त्रोक्त तथ्यों तक सही-सही पहुँच नहीं पाता है और यदि पहुंच भी जाये तो उसका विस्तार नहीं कर पाता है। सनातन धर्म विषयक सभी ज्ञान मूल रूप से संस्कृत में हैं और AI संस्कृत श्लोकों को शुद्ध-शुद्ध लिख पढ़ भी नहीं पाता है अर्थ लगाना तो दूर की कौड़ी है।
- डीपफेक (Deepfakes) : AI के माध्यम से किसी भी धार्मिक गुरु या प्रतिष्ठित व्यक्तित्व का नकली वीडियो या ऑडियो बनाया जा सकता है। इसमें वे ऐसी बातें कहते हुए दिख सकते हैं जो उन्होंने कभी कही ही नहीं। यह शास्त्रों के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध तथ्य भी प्रस्तुत कर देता है।
- एआई हेलुसिनेशन (AI Hallucination) : AI मॉडल कभी-कभी बहुत ही आत्मविश्वास के साथ गलत तथ्य (Hallucinations) पेश करते हैं। यदि कोई उपयोगकर्ता किसी जटिल धार्मिक सूत्र या इतिहास के बारे में पूछता है, तो AI अधिकांशतः मनगढ़ंत संदर्भ दे देता है जो दिखने में बिल्कुल सही लगते हैं।
- पक्षपाती डेटा (Biased Data) : AI मॉडल उसी डेटा पर प्रशिक्षित होते हैं जो इंटरनेट पर उपलब्ध है। इंटरनेट पर धर्म के बारे में पहले से ही नकारात्मक या भ्रामक सामग्री अधिक है, तो AI का उत्तर भी उसी पूर्वाग्रह से ग्रसित होगा।
जनमानस पर पड़ने वाले प्रभाव
सोचिये हम क्यों धर्म के विषय में भी अंतर्जाल और AI पर निर्भरता बढ़ाते जा रहे हैं। हमें तो लगता है कि अंतर्जाल और AI हमें सार बताने में सहयोग करेगा, तथ्यों को समझने में सहयोग करेगा किन्तु ये हमें भ्रामक तथ्य देकर और भ्रमित कर देता है किन्तु आधुनिकता और वैज्ञानिकता की ओट लेकर कुतर्कों के आधार पर तथ्यों को इस प्रकार से प्रस्तुत करता है कि वो शास्त्रविरुद्ध होते हुये भी हमें सही लगने लगते हैं। धार्मिक विषयों पर भ्रामक सूचनाओं के परिणाम केवल मानसिक भ्रम तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके व्यावहारिक दुष्प्रभाव भी होते हैं:

- सामाजिक विद्वेष: गलत धार्मिक तथ्यों के कारण जातीय विद्वेष को बढ़ावा मिल रहा है। लोग अपनी वर्ण-जाति के अनुसार धर्म के लिये प्रेरित न होकर जातीय द्वेष में जलने लगते हैं। सोचिये सनातनधर्म के विषय में, शास्त्रों ने ब्राह्मण को देवतुल्य बताया है किन्तु यत्र-तत्र धर्म के नाम पर भी ब्राह्मण के विरुद्ध तथ्य ही परोसे जाते हैं। ब्राह्मणविरोधी न तो भक्त हो सकता है, न संत हो सकता है, न धर्मात्मा हो सकता है तो फिर धर्म के विषय में भी ब्राह्मण विरोध कैसे किया जा सकता है। उदाहरण आगे दिया जायेगा जहां पूरा विषय ही स्पष्ट हो जायेगा।
- आस्था का बाजारीकरण: वर्त्तमान युग में अर्थव्यवस्था के लिये ही सब कुछ किया जा रहा है चाहे वह व्यक्तिगत हो अथवा सार्वजनिक। ये सभी स्वयं भी आर्थिक लाभ चाहते हैं साथ ही यहां सामग्री परोसने वाले भी। उनका धर्म से कोई लेना-देना नहीं होता है अपितु आर्थिक लाभ कमाना होता है और इस करना आस्था का बाजारीकरण किया जा रहा है।
- मूल ग्रंथों से दूरी: लोग वेदों, पुराणों या ग्रंथों को पढ़ने के बजाय इंटरनेट पर उपलब्ध मनगढंत तथ्यों, ‘शॉर्ट्स’ या ‘रील्स’ आदि को ही अंतिम सत्य मान लेते हैं। जबकि शास्त्र के विषय में किसी भी प्रकार का ज्ञान देने में ये पूर्णतः असफल रहते हैं।
समाधान और बचाव के मार्ग
यद्यपि सावधानी तो सदैव ही आवश्यक रही है जैसे हनुमान जी सावधान थे तो कालनेमि उन्हें भ्रमित न कर पाया किन्तु तकनीक के इस युग तनिक असावधानी भी अत्यधिक खतरनाक सिद्ध हो सकती है और अब हमें अत्यधिक सावधान रहने की आवश्यकता हो गयी है। वर्त्तमान में सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है:
- स्रोत की जाँच (Fact-Check): किसी भी धार्मिक सूचना पर विश्वास करने से पहले उसके मूल ग्रंथ या आधिकारिक विद्वानों से पुष्टि करें।
- धार्मिक साक्षरता: जनमानस को यह समझना होगा कि हर वह चीज जो स्क्रीन पर दिख रही है, वह सच नहीं है। विशेषकर AI-जनित लेखों, चित्रों, वीडियो आदि से।
- आधिकारिक मंचों का उपयोग: धार्मिक संस्थाओं को अपनी आधिकारिक वेबसाइटों और प्रमाणित डिजिटल सामग्री को शास्त्रोक्त संदर्भ सहित होने पर ही बढ़ावा देना चाहिए ताकि भ्रम की गुंजाइश कम हो।
उदाहरण तिल की गणना अन्न में न करके फल में करना
प्रश्न : तिल अन्न में आता है या फल में ?
उत्तर: यह एक गंभीर प्रश्न है और इसके संबंध में अंतर्जाल पर भ्रामक जानकारी भरी हुई है। मैंने AI पर इस विषय में शोध किया और वो बारम्बार तिल की गणना फल में ही करता रहा और यह कहता रहा कि तिल की गणना अष्टधान्य में नहीं होती। और मेरी दृष्टि में ये धूर्तता है, जनमानस को दिग्भ्रमित करने का प्रयास है जो निन्दनीय है। अरे जब धान्य की चर्चा होती है तो मुख्य रूप से सप्तधान्य की चर्चा की जाती है और इसके अनेकों प्रमाण मिलते हैं एवं तिल की गणना धान्य (अन्न) में ही की गई है न कि फल में । इस विषय में विस्तृत विमर्श पृथक आलेख में करेंगे यहां दो श्लोक यहां दिया गया है और दोनों में ही तिल ग्रहण किया गया है :
- यवधान्यतिलाः कंगु मुद्गचणकश्यामकाः। एतानि सप्तधान्यानि सर्वकार्येषु योजयेत्॥
- यवगोधूमधान्यानि तिलाः कङ्गुस्तथैव च।श्यामाकाश्चणकश्चैव सप्तधान्यामुदाहृतं ॥
यहां अवलोकन कर सकते हैं कि तिल को किस प्रकार से AI फलाहार की श्रेणी में सिद्ध कर रहा है। साथ ही प्राशन करने की भी बात करता है। जबकि षटतिला एकादशी के विधान में प्राशन नहीं अपितु में स्पष्ट रूप भक्षण (तिलभुक्) कहा गया है; प्राशन नहीं क्योंकि प्राशन तो द्रव्य का होता है जैसे घृत, मधु आदि का; अन्न आदि का नहीं : तिलस्नायी तिलोद्वर्ती तिलहोमी तिलोदकी । तिलभुक् तिलदाता च षट्तिलाः पापनाशकाः ॥

पुनः तिल फल की श्रेणी में नहीं आता है ऐसा बताने पर यह अष्टधान्य की बात करता है जबकि प्रमाण सप्तधान्य विषयक मिलते हैं। संभव है अष्टधान्य का भी कोई प्रमाण हो किन्तु यह कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं करता और सप्तधान्य का भी प्रयोग नहीं करता है। जबकि तिल स्पष्ट रूप से सप्तधान्य में आता है और हविष्यान्न में भी आता है अर्थात तिल की गणना अन्न में ही होती है।
“तिल भक्षण का अर्थ: षटतिला एकादशी में ‘तिल भक्षण’ का अर्थ पेट भरकर तिल खाना नहीं है, बल्कि इसे ‘प्राशन’ (औषधि के समान ग्रहण करना) माना गया है” ऐसा उत्तर देता है। पुनः “तिल का प्रयोग: संक्रांति और षटतिला के निमित्त तिलों का दान करें और जल में तिल डालकर उसका आचमन करें। इसे भोजन नहीं, ‘विधि’ माना जाएगा” ऐसा उत्तर देता है।

शास्त्रों के अनुसार उपवास के अतिरिक्त भी व्रत के नियम होते हैं यथा : एकभुक्त, नक्त, अयाचित और इन प्रकारों में हविष्यान्न का भोजन किया जाता है। यदि हविष्यान्न भोजन का भी व्रत के विभिन्न प्रकारों में शास्त्रीय सिद्धांत है एवं षटतिला एकादशी में भी “तिलभुक्” का प्रमाण है तो संगति बैठ ही जाती है एवं शास्त्र से सिद्धि हो ही जाती है कि एकभुक्त या नक्त विधान से एकादशी करे और तिल का भक्षण करे। प्राशन या फलाहार जैसा कुतर्क करने की तो कोई आवश्यकता ही नहीं है। किन्तु ऐसा स्पष्ट उत्तर एक बार भी नहीं देता।
पुनः अष्टधान्य के लिये एक श्लोक बताता है जो इस प्रकार है “शालींश्च तण्डुलं चैव विहीन् (व्रिहीन्) गोधूममेव च। प्रियंगुं सर्षपं चैव मुद्गं माषं तथैव च ॥” किन्तु सप्तधान्य; जिसमें तिल अन्न की श्रेणी में आता है, हविष्यान्न में भी तिल की गणना होती है किन्तु यह अनदेखी कैसे करता है यह सिद्ध हो जाता है। अर्थात भ्रामक तथ्य परोसता है।
आगे इसी आलेख का वीडियो AI से बनाउंगा और उसमें यदि इसमें से किसी एक श्लोक का भी पाठ वो करे तो उसमें आप स्पष्ट अनुभव कर सकेंगे कि ये संस्कृत को सही-सही पढ़ भी नहीं पाता है किन्तु जनमानस को भ्रमित करने का भरपूर प्रयास करता है।
दान के विषय में कैसे भ्रमित करता है यह भी देखें
अब दान के विषय में कैसे भ्रमित करता है यह भी देखें। दान का तात्पर्य है विधि पूर्वक ब्राह्मण को दान देना। ब्राह्मणेत्तर दान का अधिकारी ही नहीं होता है। किन्तु यह ब्राह्मण को द्वितीय स्थान पर रखता है वो भी () में दिखाकर अर्थात उसमें भी गौण लक्षण स्पष्ट करता है “जो समाज का कल्याण कर रहा है” अर्थात आगे इसे जो सिद्धि करनी है उसका आधार बना रहा है।
आधार बनाने के पश्चात् आगे कैसे दान का सनातनी सिद्धांत ही समाप्त कर देता है उसे इस पंक्ति से समझा जा सकता है – “आज के संदर्भ में: एक अनाथ बच्चा, एक ईमानदार विद्यार्थी या एक ऐसा संस्थान जो निस्वार्थ सेवा कर रहा है, वे सभी ‘सुपात्र’ की श्रेणी में आते हैं।”

सोचिये उपकार करना, दया करना, सहायता करना और दान के अंतर को मिटा कर कैसे सनातन सिद्धांतों को मटियामेट कर देता है। एक अनाथ बच्चा, एक ईमानदार विद्यार्थी या एक ऐसा संस्थान जो निस्वार्थ सेवा कर रहा है ये सब उपकार, दया या सहायता के पात्र हैं, प्रतिग्रह के अधिकारी ही नहीं हैं अर्थात प्रतिग्रह नहीं लेते अर्थात इनको दान नहीं दिया जाता है, इनकी सहायता की जाती है, उपकार किया जाता है, इनपर दया की जाती है इत्यादि।
इस प्रकार की परिभाषा करने पर तो सरकार को भी जो दिया जाता है वह दान ही सिद्ध होगा फिर उसे कर (टैक्स) क्यों कहते हैं, दान क्यों नहीं कहते।
प्रतिग्रह उसे कहते हैं जहां विधिपूर्वक कुछ दिया जाता है और ग्रहण करने वाला उसे विधिपूर्वक स्वीकार करता है : जैसे कन्यादान सभी वर्ण-जाति के लोग करते हैं और “वर” वहां पर प्रतिग्रह स्वीकारता है, अन्यत्र ब्राह्मण मात्र ही प्रतिग्रह स्वीकार करता है और दान ब्राह्मण मात्र को ही दिया जाता है। किन्तु किस प्रकार से यह ब्राह्मण जो एक मात्र दान का अधिकारी होता है उसको गौण सिद्ध कर देता है, दान का शास्त्रीय सिद्धांत ही समाप्त कर देता है।
ब्राह्मण के षट्कर्म इस प्रकार हैं : अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन, दान-प्रतिग्रह। इसमें से अध्ययन, यजन और दान ये तो क्षत्रिय वैश्य के लिये भी कहे गए हैं किन्तु उनके लिये भी अध्यापन, याजन और प्रतिग्रह का निषेध है, निन्दित है। यदि ब्राह्मणेत्तरों के लिये प्रतिग्रह का विधान ही नहीं है तो ब्राह्मणेत्तर दान किस अधिकार से ले सकते हैं और यदि ले नहीं सकते तो उन्हें दिया कैसे जा सकता है। सोचिये कितनी धूर्तता से शास्त्र के सिद्धांत को समाप्त किया जा रहा है।
इस विषय में वाल्मीकि रामायण का एक प्रसंग विशेष रूप से उल्लेखनीय है और वो प्रसंग है अगस्त्य ऋषि से भगवान राम का विश्वकर्मा निर्मित दिव्य आभूषण दान ग्रहण करना। यहां अनेक तथ्य हैं प्रथम यह कि वह दिव्य आभूषण विश्वकर्मा निर्मित था, दूसरा यह कि उसको धारण करने की योग्यता मात्र भगवान श्रीराम में ही थी ऐसा अगस्त्य ऋषि ने कहा तीसरा राजा (प्रतिष्ठित) में देवताओं का अंश होता है और अगस्त्य ऋषि ने उन्हें इन्द्र के अंश से दान लेने का एवं एकमात्र अधिकारी होने की बात बताई तब उन्होंने ग्रहण किया।
इससे पूर्व भगवान श्रीराम ने कहा “प्रतिग्रहोऽयं भगवन्ब्राह्मणस्याविगर्हितः । गृह्णीयां क्षत्रियोऽहं वै कथं ब्राह्मणपुङ्गव ॥” अर्थात प्रतिग्रह (दान लेना) तो मात्र ब्राह्मण के लिये ही निन्दित नहीं है, मैं क्षत्रिय होने के कारण दान कैसे ले सकता हूँ ? अर्थात दान नहीं ले सकता या यदि आप कह रहे हैं तो कोई विशेष बात होगी जो स्पष्ट करें और तब अगस्त्य ऋषि सभी बातें स्पष्ट करते हैं और जीवन में मात्र एक बार (विवाह के अतिरिक्त) भगवान श्री राम ने दान लिया।
अन्यत्र ब्राह्मणेत्तरों के लिये दान लेने का प्रकरण प्राप्त नहीं होता। रही बात विद्यार्थियों की तो उसमें वर्ण नहीं देखा जाता है किन्तु उसका दूसरा नियम भी तो है कि वो ब्रह्मचारी हो। यहां भी स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि अंतर्जाल और AI कैसे भ्रामक तथ्य प्रस्तुत करते हैं ब्रह्मचारी को छुपाकर ईमानदार विद्यार्थी का प्रयोग करते हैं। ईमानदार विद्यार्थी तो म्लेच्छ भी हो सकता है किन्तु वो ब्रह्मचारी नहीं हो सकता।
निष्कर्ष: भ्रम में न पड़ें
यहां उदाहरण सहित स्पष्ट किया गया है कि AI शास्त्र के सिद्धांत के विरुद्ध कैसे सिद्धि करता है और जनमानस को किस प्रकार दिग्भ्रमित करता है। एवं उक्त सन्दर्भ में जनमानस को AI या अंतर्जाल से पूर्णतः सावधान रहना आवश्यक है।
ग्रंथों के हज़ारों साल पुराने होने के कारण, AI अक्सर अलग-अलग भाष्यों, टीका, (Commentaries) को मिला देता है, जिससे अर्थ का अनर्थ हो जाता है। अंतर्जाल और AI केवल साधन हैं; इनका उपयोग ज्ञानवर्धन के लिए भी हो सकता है और भ्रम फैलाने के लिए भी। वर्त्तमान समय में जैसा की हमारा अनुभव है यहां धार्मिक विषयों में भ्रमित करने का ही कार्य देखने को मिलता है। धार्मिक विषयों पर “श्रद्धा” के साथ-साथ “विवेक” का उपयोग अनिवार्य है। हमें तकनीक का स्वागत करना चाहिए, लेकिन अपनी वैचारिक स्पष्टता को एल्गोरिदम के हाथ में नहीं सौंपना चाहिए।
॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








