“विचारशून्य व्यक्ति कभी विवेकवान मार्गदर्शक नहीं ढूंढ सकता।”
यहां जो ब्रह्मसूत्रम् शब्द प्रयुक्त है वह वाह्टसप पर विद्वान ब्राह्मणों का एक समूह है जिसके प्रशासक विद्यावारिधि आचार्य दीनदयाल मणि त्रिपाठी जी हैं जिनका परिचय देने में मैं अक्षम हूँ, जो लिखा जा सकता है वो इस प्रकार है : कुलपति, आदि शंकर वैदिक विद्या संस्थान, इन्दिरा नगर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश। इस समूह में मैं वर्षों से विद्यमान हूँ और कब-कैसे जुड़ा यह ज्ञात नहीं बस ईश्वर कृपा समझता हूँ। आत्मपरिचय का तात्पर्य मेरे आलेखों का अवलोकन करने वाले मेरे बारे में जो जानना चाहते होंगे अथवा मैं जो बता सकता हूँ दोनों ही है।
आत्मकथा और ब्रह्मसूत्रम्
अपना नाम दिगम्बर झा बताता हूँ, सिमरिया-बेगूसराय (बिहार) मातृभूमि है और स्पष्ट हो जाता है कि मैथिल ब्राह्मण हूँ, यदि गोत्र की बात करें तो भरद्वाज है । शिक्षा की बात करें तो माध्यमिक तक की शिक्षा श्रीसीताराम राय उच्च विद्यालय रजौड़ा से आगे चलते हुये गणेश दत्त महाविद्यालय में अंतरस्नातक (कला संकाय) के पश्चात् आगे स्नातक हेतु भी उक्त महाविद्यालय में प्रविष्ट हुआ जो ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से संबद्धता और विषय था राजनीति शास्त्र।
यहां तक यह स्पष्ट हो जाता है कि जो लोग मुझे आचार्य समझते होंगे उनका भ्रम दूर हो जायेगा। यहां तक की शिक्षा में संस्कृत की बात करें तो वो माध्यमिक तक ही रही। आगे वेद, व्याकरण, साहित्य, धर्मशास्त्र, ज्योतिष आदि कुछ संबद्ध रहता ही नहीं। और यहीं पर प्रश्न आता है कि मेरी शिक्षा में संस्कृत और शास्त्र का कोई विषय कहीं दूर-दूर है ही नहीं जो है वो सबके लिये माध्यमिक स्तर तक समान ही होता है तो पंडित कैसे बन गया और अपने जिले में २०१० तक पंडित के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका था।
आज जो “संपूर्ण कर्मकांड विधि” पर आलेख और विश्लेषण आदि किये जाते हैं वो धर्मशास्त्र में जिसका प्रवेश नहीं है और शास्त्रीय दृष्टिकोण से रहित है वो यदि व्याकरण-ज्योतिष आदि से आचार्य हों भी तो उनकी समझ से परे होती है ऐसा कैसे संभव है ? ये परे होने का कारण मेरी विद्वत्ता (क्लिष्ट शब्दादि) न होकर उनके शास्त्रीयदृष्टि रहित होना है क्योंकि विश्लेषण तो सरल भाषा में ही करता हूँ और व्याकरण से भाषागत अनेकानेक त्रुटियां यत्र-तत्र प्रकट होती रहती हैं।
समझ से परे का तात्पर्य जैसे यदि मैं कहता हूँ कि एकादशाह को पुरोहित वर्ग का वरण नहीं होना चाहिये, द्वादशाह को १४/१५ मासिक श्राद्ध तंत्र से ही होना चाहिये पृथक-पृथक नहीं, अथवा अधिकमास में श्राद्ध संबधी विश्लेषण हो या कुलटूट से सम्बंधित, अशौच से संबधित हो अथवा संस्कार से, पूजा से संबंधित हो अथवा हवन से सरल भाषा में होते हुये भी अशास्त्रज्ञों की समझ से पड़े होती है भले ही उनके पास आचार्य का प्रमाणपत्र क्यों न हो। ऐसा बहुत सारे परिचितों के साथ होने वाले वार्तालाप में स्पष्ट होता है।

जिन लोगों ने समझ लिया उसके प्रश्न का उत्तर एक पंक्ति में देना भी पर्याप्त होता है और जिन लोगों ने नहीं समझा है उनको वार्तालाप के माध्यम से समझाना दुष्कर है और प्रयास करते-करते थक गया हूँ एवं शास्त्र सेवक होने के कारण अब दुत्कार-धिक्कार पूर्वक शास्त्र में रूचि प्रकट करने का प्रयास कर रहा हूँ, क्योंकि मैं ये भलीभांति समझ चुका हूँ की कर्मकांड वृत्ति से जुड़े ब्राह्मण जितने अधिक पढ़े हैं उतने अहंकारी तो हैं किन्तु शास्त्र में उनकी रूचि उतनी ही कम है।
मेरे पास कर्मकाण्ड और शास्त्र विषयक ज्ञान आता कहां से है तो इसका सीधा उत्तर ईश्वरीय कृपा से। मेरे पितृव्य आचार्य पारसनाथ झा, बेगूसराय के गणमान्य और प्रतिष्ठित विद्वानों में से एक थे। चिरायु मिश्र उच्च विद्यालय, चाक (छितरौर); वित्तरहित से संबद्ध थे और एक कुशल कर्मकांडी थे एवं कार्तिक माह में गंगा तट पर प्रतिवर्ष कथा भी करते थे। मेरी शिक्षा कहने के लिये रजौड़ा उच्चविद्यालय से हुई किन्तु दसवीं से मैं चिरायु मिश्र उच्च विद्यालय में ही चाचा के साथ रहा, साथ में चचेरा भाई बलबंत भी रहता था।
लगभग ५ वर्ष वहां हमें थोड़ा-बहुत कर्मकांड और शास्त्रों का भी ज्ञान प्राप्त हुआ। स्नातक तृतीय वर्ष में रहते हुये अचानक मैं कुछ ढूंढने के लिये घर से निकल गया और सप्ताह पर्यन्त अन्न-जल त्याग करके दिल्ली, हरिद्वार, हृषिकेश, अयोध्या आदि स्थलों पर घूमकर वापस आया। दिल्ली होकर जाने का कारण अब समझ आता है कि वहां तक चप्पल पहनकर गया था जो चोरी हो गया और आगे के तीर्थों में अनपेक्षित था इसी कारण अनिच्छा होते हुये भी पकते पांव गया । ट्रेन वाली यात्रा बिना टिकट ही किया था। कुछ प्राप्त करना चाहता था किन्तु कुछ प्राप्त हुआ अथवा नहीं ज्ञात भी नहीं हुआ यद्यपि अब ज्ञात हो रहा है कि ईश्वरीय कृपा प्राप्त हो गयी।
वापस आने के पश्चात् घर में रहकर (शिवालय) में मैंने रुद्राष्टाध्यायी का स्वाध्याय किया, श्रीदुर्गासप्तशती पाठ का भी अभ्यास किया, कर्मकांड के मंत्रों को स्मरण किया, स्वाध्याय और अभ्यास का ज्ञान प्राप्त हो चुका था। तत्पश्चात लगभग १ वर्ष बीहट गणेश पीठ में रहकर आचार्य विनायक मिश्र शरण दिव्य की सेवा का अवसर प्राप्त हुआ जो गुरु जी नाम से भी प्रसिद्ध थे और मूर्धन्य विद्वानों में गण्य थे। इस क्रम में फुफेरा भाई मोती लाल झा भी साथ था।
कर्मकांड में आवागमन आरम्भ हो गया और आरम्भिक काल में ही महामृत्युंजय जप, रुद्राभिषेक आदि से लेकर यज्ञादि तक का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हो गया। विद्वानों का सान्निध्य सदैव प्राप्त होता ही रहता था। गरुडपुराण कथा तो चाचा श्री और गुरुजी दोनों को बारम्बार सुना और इस विषय में उनके समकक्ष कोई स्थानीय कथावाचक नहीं थे। मेरी ज्ञान प्राप्ति का प्रारंभिक स्रोत कथाश्रवण, सेवा का अवसर और विद्वानों का सान्निध्य है कोई विश्वविद्यालय नहीं।
सेवा का तात्पर्य अन्यान्य से लेकर चरण सेवा (पैर दबाना) तक का अवसर प्राप्त हुआ और यह भी ईश्वर की कृपा ही थी जो सबको प्राप्त नहीं होता। अब तो चरणसेवा पूर्वक कुछ भी ज्ञान प्राप्त करने की प्रवृत्ति ही समाप्त होने लगी है, किन्तु आगे जाकर मुझे दीक्षागुरु की चरणसेवा का अवसर भी प्राप्त हुआ।
बीहट में अनेकों अन्य ग्रामीण आदि टुनटुन, गोपाल, रमेश आदि का भी आवागमन होता रहता था मोहन तो वहीं रहता था। प्रतिवर्ष गणेश जन्मोत्सव तो कहना ही क्या। कर्मकांड वृत्ति का आरम्भ तो पूर्व में ही २००४ – २००५ में हो चुका था और निःसंदेह चाचाश्री एवं गुरूजी के आशीर्वाद से २०१० तक मैं भी एक पंडित के रूप में विख्यात होने लगा किन्तु श्राद्धकर्म न सीखना औरों की भांति मेरी भी समस्या थी। इस प्रकार विद्या प्राप्ति की जो शास्त्रोक्त विधि है उसके विलुप्त होते हुये भी प्रतीकात्मक रूप से ही सही मुझे विद्या प्राप्त हुई न कि मैने शैक्षणिक आचार्य प्रमाणपत्र प्राप्त किया।
जैसे अन्यान्य पंडित श्राद्ध के विषय में प्रश्न करने पर कहते थे कि मैं इस कर्म से दूर ही रहता हूँ किन्तु एकादशाह को भी वेद-भागवत आदि वरण लेने व भोजन करने में प्रेतकर्म नहीं सूझता था मेरी भी वही दशा थी और मुझे भी कहना पड़ता था कि प्रेतकर्म से दूर ही रहता हूँ, यह कहना कि नहीं आता अंतर्मन को स्वीकार नहीं होता है अतः कुछ न कुछ बहाना चाहिये होता है।
२०१२ में मुझे इसकी चिंता सताने लगी कि इस प्रकार कितना असत्य बोलता रहूं, कब तक बोलूं और वहीं से मैंने श्राद्धकर्म पर स्वाध्याय आरम्भ किया और अचानक विचार आया कि ये समस्या तो और भी बहुत पंडितों की है, मैं तो स्वाध्याय से समझ गया, सीख गया किन्तु औरों का क्या ? औरों के लिये सुगम श्राद्ध पद्धति की आवश्यकता थी और उस समय मैं शास्त्रीय दृष्टिकोण से रहित था, व्यावहारिक दृष्टिकोण से ही युक्त था किन्तु एक पुण्यकार्य यह हो गया कि २०१४ में सुगम श्राद्ध विधि (मिथिलादेशीय पञ्चदान श्राद्ध) छन्दोगी-वाजसनेयी दोनों एक कलेवर में संपादित करके प्रकाशित कराया, साथ ही एक शक्ति साधना नाम से भी।
तदनन्तर पुस्तक के प्रकाशन में पंडित अजय मिश्र; संपादक – वैदेही पञ्चाङ्ग (मिथिलादेशीय) का आशातीत सहयोग प्राप्त हुआ और उनका आभारी हूँ।
अन्यान्य व्यक्ति इनके बारे में जो कुछ कहे मेरे प्रति इनका व्यवहार व सहयोग ऋणी करने वाला रहा। चूंकि व्यवाहरिक दृष्टिकोण से ही संपादन किया गया इस कारण पुस्तक में शास्त्रीय दृष्टिकोण से कई विसंगतियां हैं तथापि पुस्तक से सहस्रों पंडित लाभान्वित हुये और जो कभी श्राद्ध नहीं कराने वाले थे वो भी सामान्य रूप से भी श्राद्ध कराना सीख गए कुछ तो बड़े कर्मकांडी के रूप में भी विख्यात हो गए हैं। पुस्तक की त्रुटियों को तो आगामी संस्करणों में ही संशोधन संभव है किन्तु इस ब्लॉग पर अब यथाशीघ्र शास्त्रीय दृष्टिकोण से उचित श्राद्ध विधि प्रकाशित करेंगे।

कुछ ही काल के उपरांत ईश्वर की एक और बड़ी कृपा हुई और मुझे स्वतः गुरुजी ने स्वीकार कर लिया। गुरुजी (दीक्षागुरु) के चरणों की सेवा का भी अवसर सेवक को प्राप्त हुआ, आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ कृपा भी प्राप्त हुई। गुरु जी की कृपाप्राप्ति के संबंध में मात्र इतना ही कह सकता हूँ कि मैं आत्मकल्याण के विषय में पूर्णतः निश्चिंत हूँ। कृतकृत्य हूँ, गुरु जी को बारम्बार नमन है, नमन है और नमन है। अभी हमारे धराधाम पर गुरुदेव सदेह उपस्थित भी हैं।
२०१७ से लेकर २०२१ तक मैंने व्यापार भी किया जो अंतर्जाल पर देखा जा सकता है। कंपनी का नाम DigiGovi Multi Services PVT. LTD. रखा और साझेदार थे गोविन्द मिश्रा, दरभंगा। इसमें भी ईश्वरीय कृपा को इस प्रकार समझा जा सकता है कि ये भी पूर्वपरिचित नहीं थे और प्रथम मिलन व्यापार आरम्भ होने के पश्चात् हुआ, अब मैं व्यापार में नहीं हूँ। गोविंद जी का भी ऋणी हूं और ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उनके जीवन में सुख-शांति-समृद्धि भरें, ज्येष्ठ पुत्र की अक्षमता दूर करें ।
किन्तु जब तक मैंने व्यापार किया पूर्णतः कर्मकाण्ड वृत्ति का परित्याग कर दिया, यदि विशेष आग्रह पर किसी यजमान के यहां उपस्थित होता था और कुछ द्रव्य की प्राप्ति हो जाये तो वो भी यजमान के समक्ष ही उपास्थित कर्मकांडियों को दे देता था और इसी कारण आज मैं स्पष्ट रूप से यह बोलने में समर्थ हूँ कि जो कोई अन्यान्य वृत्ति से जुड़ा है वो कर्मकांड नहीं करा सकता अयोग्य होता है, ये जो शिक्षक आदि कर्मकाण्डी बने फिरते रहते हैं इनकी प्रचुर भर्त्सना करता हूँ।
ब्रह्मसूत्रम् : ईश्वर की पुनः महती कृपा
मुझे ज्ञान कहां से कैसे मिला यह लगभग स्पष्ट हो चुका है और गुरुदेव की कृपा से शास्त्रीय दृष्टिकोण भी जाग्रत हुई। संभवतः २०१९ – २० में ही कभी पुनः ईश्वर की एक और महती कृपा हुयी एवं विद्वद्जनों के एक व्हाट्सप समूह जिसका नाम “ब्रह्मसूत्रम्” है और इसमें विद्वानों की कमी नहीं है।
इस समूह के प्रशासक विद्यावारिधि आचार्य दीनदयाल मणि त्रिपाठी जी हैं जिनकी विद्वत्ता के बारे में कुछ कहना सूर्य के दीपक दिखाना होगा। ईश्वर की कृपा इस प्रकार से कि इस समूह में प्रवेश पाने की अर्हता निर्धारित है, जो कोई भी प्रविष्ट नहीं हो सकता इच्छा होने पर भी और थोड़े से नियम भंग होने पर बहिर्गत भी कर दिया जाता है, मैंने कई को बहिर्गत होते भी देखा है, किन्तु बिना किसी परिचित सदस्य के मैं उस समूह में कब और कैसे पहुंचा यह मुझे ज्ञात ही नहीं है।

विद्यावारिधि आचार्य दीनदयाल मणि त्रिपाठी जी के अनेकानेक आलेखों को भी अनुमति पूर्वक मैंने https://karmkandsikhen.in/ पर प्रकाशित किया है। वास्तव में मुझे शास्त्रीय दृष्टि की प्राप्ति “ब्रह्मसूत्रम्” में विद्वद्जनों के सान्निध्य से ही हुई। इससे पूर्व मैं भी व्यावहारिक दृष्टि ही रखता था और शास्त्रीयदृष्टि से रहित ही था। इसका तात्पर्य यह है कि आज मैं जिसकी सार्वजनिक भर्त्सना करने लगा हूँ, धिक्कारने-दुत्कारने लगा हूँ १० वर्ष पूर्व मैं भी वैसा ही था, अंतर यह कि शास्त्र में रूचि थी और आज जिसे धिक्कारता-दुत्कारता हूँ उसका कारण है कि उनकी शास्त्र में कोई रूचि ही नहीं है।
शास्त्र और स्वाध्याय में मेरी रूचि प्रारम्भ से ही रही इसका प्रत्यक्ष प्रमाण “सुगम श्राद्ध विधि” ही तो है और उस समय मैं शास्त्रीय दृष्टि से रहित था इसका भी प्रत्यक्ष प्रमाण यह पुस्तक ही है। आज मुझे मेरी ही पुस्तक में अनेकानेक त्रुटियां, विसंगतियां दिखती है और इसका कारण यही है कि मुझे शास्त्रीय दृष्टि की प्राप्ति हो चुकी है और इसके लिये “ब्रह्मसूत्रम्” के सभी विद्वद्जनों को नमन करता हूँ एवं विद्यावारिधि आचार्य दीनदयाल मणि त्रिपाठी जी के बारे में क्या कहूं इनसे प्राप्त ज्ञान हेतु बारम्बार नमन, चरण वंदन।
बस इतना ही कहूंगा कि कृतकृत्य हूँ और निःसंदेह ईश्वर की महती कृपा से ही मुझे इनका सान्निध्य (वहट्सप समूह) “ब्रह्मसूत्रम्” में प्राप्त हुआ और इसके लिये ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि कभी जीवन में एक बार भी इनकी चरणसेवा का अवसर प्राप्त हो जाये। इनके ज्ञान का लाभ आप मोबाईल ऐप पर भी प्राप्त कर सकते हैं जिसका नाम है “धर्मकल्पद्रुम” जो प्ले स्टोर पर उपलब्ध है।
चरणसेवा का महत्व मेरे जैसा व्यक्ति ही समझ सकता है जिसे चरणसेवा से ही सब कुछ प्राप्त हुआ हो और मैंने क्या पढ़ा, कहां पढ़ा, कितना पढ़ा इसका भी सत्य और स्पष्ट उत्तर यहां मिल जाता है। सत्य में मेरी निष्ठा बढ़ी है तो यह भी गुरुदेव और विद्वद्जनों की कृपा का फल है, शास्त्र में निष्ठा बढ़ी, शास्त्रसेवा कर पा रहा हूँ तो यह भी बस ……. अब यदि कोई मुझसे मेरे विश्वविद्यालय का नाम कोई पूछना चाहे तो मेरा उत्तर है : “ब्रह्मसूत्रम्” जहां मेरा अध्ययन सुचारु ही है। इसके अतिरिक्त किसी को दिखाने के लिये मुझे किसी प्रमाणपत्र की आवश्यकता ही नहीं है, मेरी योग्यता “संपूर्ण कर्मकाण्ड विधि” स्वतः सिद्ध कर देती है।
“ब्रह्मसूत्रम्” समूह में उपस्थित समान और निम्न स्तर के सदस्यों को यह कहना चाहूंगा कि आप ईश्वर की कृपा से ऐसे विद्वद्जनों के सान्निध्य में हैं और प्रमाण मैं स्वयं हूँ मेरी शास्त्रीय दृष्टि इस समूह में ही पुष्ट हुई। शास्त्रीय दृष्टि को समझने के लिये एक उदाहरण से व्यावहारिक और शास्त्रीय दृष्टि में अंतर को स्पष्ट करता हूँ । यह स्पष्ट कर चुका हूँ कि १० – १२ वर्ष पूर्व तक मैं भी शास्त्रीय दृष्टि से रहित ही था और व्यावहारिक दृष्टिकोण से ही विचार करता था इसकी झलक “सुगम श्राद्ध विधि” में मिल जायेगी। उदाहरण का विषय आचमन है :

उदाहरण : कर्मकांड की अधिकांश पुस्तकों में आचमन के उपरांत शिखा ग्रंथि प्राप्त होती है। जब मैं व्यावहारिक दृष्टिकोण से विचार करता था तो यदि कोई आचमन से पूर्व शिखाग्रंथि की बात करता तो उसे अनेकों पुस्तक में दिखा देता और गलत सिद्ध कर देता। जब शास्त्रीय दृष्टि प्राप्त हुई तो आचमन से पूर्व ही शिखा ग्रंथि अनिवार्य है यह कहता हूँ, प्रमाणों से सिद्ध करता हूँ और यदि कोई यह कहे कि फिर पुस्तक में गलत है क्या तो मेरा उत्तर होता है कि पुस्तककार को गलत कहने का अपराध मैं नहीं करने वाला, उनकी विद्वत्ता की तुलना में मैं चरणधूलि के बराबर भी नहीं हूँ किन्तु जो शास्त्रों से सिद्ध होता है वही स्वीकार करूँगा।
कर्मकांडियों को कहना चाहूंगा कि शास्त्रीय दृष्टिकोण अंगीकार करें, इसके लिये आवश्यक है कि शास्त्रनिष्ठ बनें। आपकी समस्या मुझे ज्ञात है वो यह है कि आपको गुरुजनों की चरण सेवा का अवसर प्राप्त नहीं हुआ है अथवा यदि प्राप्त भी हुआ तो आपने मन से किया जिसका दुष्परिणाम है कि आपको शास्त्रीय दृष्टि की प्राप्ति नहीं हो पाई। जबतक व्यावहारिक दृष्टिकोण मात्र से विचार करेंगे मैं आपकी भर्त्सना, दुत्कारने और धिक्कारने के लिये कटिबद्ध हूँ।
जो कर्मकांड सीखना चाहते हैं और सीख रहे हैं, ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, आत्मकल्याण चाहते हैं उनसे कहूंगा कि गुरुजनों की तन-मन-धन से त्रिविध सेवा करें और चरणसेवा विशेष रूप से करें। एक दिन की मनपूर्वक की गयी चरणसेवा का से जो ज्ञान प्राप्त होगा, दृष्टि प्राप्त होगी, कृपा प्राप्त होगी वो आजीवन अध्ययन करने से प्राप्त नहीं हो सकती। चरणसेवा के प्रति अरुचि एक बड़ी समस्या है इससे दूर रहें।
सामान्य जनों के लिये भी कहना चाहूंगा कि राजनीतिक बहस से पूर्णतः दूरी बनायें। गुरुजनों विद्वद्जनों की भक्तिभाव से सेवा करें, चरणसेवा का अवसर कभी न चूकें। फिल्म, धारावाहिक, गूगल, यूट्यूब, सोशलमीडिया या मीडिया को गुरु न बनायें। यहां आपके दृष्टिदोष को भी उजागर करना चाहूंगा आपका प्रश्न हो सकता है कि जिस “ब्रह्मसूत्रम्” की इतनी चर्चा यहां की गयी है वो भी तो सोशलमीडिया ही है।
\तो इसका उत्तर यह है कि मेरे पास पण्डित और अपण्डित, पुण्यात्मा और पापी को पहचान लेने की शास्त्रदृष्टि है जो आपके पास नहीं है। वर्त्तमान काल की शिक्षा पद्धति ने बुद्धि को ही प्रदूषित कर दिया है एवं सामान्य जन दीक्षागुरु तक की भी चरणसेवा से वंचित रहते हैं। राजनीतिक बहस से दूर रहने के लिये कहने का कारण यही है कि मुख्य रूप से इसी ने बुद्धि को प्रदूषित किया है।
ये प्रणाम पैर को किया जाता है इसकी व्याख्या शूद्र कहकर करेंगे और मैं इसकी व्याख्या प्रणम्य व्यक्ति के चरण धूलि से भी निकृष्ट होने के रूप में करूँगा। मैं यह कहूंगा कि उनके चरण के स्पर्श का भी अधिकार नहीं होता वो भी जब दिया जाता है तब प्राप्त होता है। यहां गुरुजनों का तात्पर्य केवल गुरु नहीं हैं, पुरोहित/कर्मकांडी ब्राह्मण आदि भी हैं। जो पुण्य आपको बड़े-बड़े यज्ञ करके प्राप्त नहीं होगा, ईश्वर की जो कृपा आजीवन उपवास करने से भी प्राप्त नहीं होगी वो एक दिन के चरणसेवा से प्राप्त होगी। भगवान आपको दिखने वाले नहीं और देखना चाहें तो गुरु/ब्राह्मण में देहधारी भगवान देख सकते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
मूल मंत्र यह है कि वास्तविक ज्ञान केवल विश्वविद्यालयों की डिग्रियों से नहीं, अपितु ‘ईश्वरीय कृपा’ और ‘गुरुजनों की चरणसेवा’ से प्राप्त होता है। मेरा जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि हृदय में शास्त्र के प्रति अनुराग और गुरुजनों के प्रति समर्पण हो, तो ही शास्त्रीय दृष्टि और ईश्वर की कृपा प्राप्त की जा सकती है। “ब्रह्मसूत्रम्” समूह और गुरुजनों का सान्निध्य एक ऐसा विश्वविद्यालय सिद्ध हुआ, जिसने व्यावहारिक कर्मकांड को शास्त्रीय मर्यादा में परिवर्तित कर दिया। यह आलेख उन सभी कर्मकांडियों के लिए एक दर्पण है जो शास्त्रों की उपेक्षा कर केवल मनगढंत शास्त्रविरुद्ध व्यवहारों को ढो रहे हैं। चरणसेवा का महत्व अवसर का लाभ उठाये बिना नहीं समझ सकते।
आत्मकल्याण का द्वार चरणसेवा से ही खुलता है इसके बिना अन्यान्य सबकुछ निरर्थक हो जाता है क्योंकि कपाट ही बंद रहता है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत अनुभव, उनकी आध्यात्मिक यात्रा और शास्त्रीय शोध पर आधारित हैं। लेख में की गई आलोचना का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को अपमानित करना नहीं, अपितु कर्मकांड में व्याप्त अशुद्धियों के प्रति ध्यानाकर्षण करना है। लेखक की संस्थागत शिक्षा और शास्त्रीय योग्यता के विषय में दी गई जानकारी पूर्णतः पारदर्शी है।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








